Adwika ( Adwitya Shakti ) Part – 8

एकादश: अध्याय : भविष्य और भाग्य

अद्विका अमित और विलियम के समक्ष खड़ी थी. उसके हाँथों में चन्द्रहास खड्ग चमक रही थी.  पीछे से विधि आती है और अद्विका के पीछे घायल पड़े विशाल बीस्ट को देखकर बोलती है.

विधि : तुमने इन्हें जीवित क्यूँ छोड़ दिया ?  इनका वध करना उचित होगा ताकि ये दुबारा आक्रमण ना करे।

अद्विका : मुझे ऐसा कोई भी कारण नहीं लगा जिससे उनका वध करना सही हो. मैं किसी निर्दोष प्राणी के बेवजह प्राण नहीं लेती।

विधि : परंतु ये मानवता के सबसे बड़े शत्रु है…

अद्विका : इस धरती पर लोगों को बस लड़ना है.. उन्हें कोई बहाना चाहिए लड़ने के लिए, हज़ारों वर्ष पूर्व लोग शिव और विष्णु के नाम पर आपस में लड़ते थे… वो स्वयं को एक दूसरे से श्रेष्ठ बताते थे.. जबकि स्वयं विष्णु और शिव एक दूसरे को अपना पूरक बताते थे… आज मैं  देखती हूँ मनुष्य धर्म के नाम पर आपस में लड़ रहा है। धर्म कोई भी हो सभी इंसानो को एक ही शिक्षा देता है.. लेकिन वो युद्ध की शिक्षा तो बिलकुल नहीं देता।  कल को एक नयी जंग शुरू हो जाएगी इंसानो और बीस्ट के बीच में… जब संसार को असलियत पता चलेगी…ये बस यहीं ख़त्म नहीं होगी ये जंग एक दुनिया से दूसरी दुनिया के बीच भी होगी.. बस तुम लोगों को एक बार ज्ञात हो जाए , कौन सी दूसरी दुनिया में जीवन है जहाँ तुम लोग जाके अपनी जंग की वासना को शांत कर पाओ। जब मैंने अंजनी के मस्तिष्क से जानकारी इकट्ठा की तभी निश्चय कर लिया था की मैं बीस्ट के साथ और अन्य प्राणियों के साथ कोई अन्याय नहीं करूँगी.. भले ही वो विकास में आप लोगों से काफ़ी पीछे है.. परंतु इस धरती पर जितना अधिकार आपका है उतना ही उनका है।

(इतना बोलकर जैसे ही वो पीछे घूमी वो दैत्याकार बीस्ट्स वहाँ से जा चुके थे..)

(भूतकाल में)

रक्तकूट ज्वालामुखी के अंदर प्रवेश कर चुका था।अंदर का नज़ारा किसी भव्य और आँखो को चकाचौंध करदेने वाले शीशमहल की तरह था ,जहाँ हर जगह काँच के स्थान पर  हीरे लगे हुए थे…दैत्य सैनिक हर जगह पहरे पर तैनात थे।  वो एक कक्ष के सामने जाकर वहाँ खड़ी सेविका को बोलता है, “ख़बर करो की रक्तकूट आया है…” वो अंदर जाती है और बाहर आकर बोलती है… आप अंदर जा सकते है…

रक्तकूट कक्ष में प्रवेश करता है… उस शयन कक्ष की रौनक देखते ही बनती थी… एक तरफ़ मखमली बिस्तर और छत पर हीरो का झूमर पूरे कक्ष को रोशनी से जगमगा रहा था… वहीं एक दीवार की ओर श्रृंगार – पटल पर बैठी एक युवती, पीछे से लाल रंग के घने बाल उसकी गोरी कमर को छू रहे थे… रक्तकूट उसके पास पहुँच कर बोलता है…

रक्तकूट : युद्ध की रणभेरी बजने को है…

वो पलटती है और बोलती है… “युद्ध तो आते जाते रहते है , ऐसा क्या हो गया की आज स्वयं रक्तकूट को अग्निका के पास आना पड़ा ?”
उसके के पलटते ही ऐसा रूप की परियाँ भी फीकी पड़ जाए और शरीर की बनावट एक योद्धा के समान…

रक्तकूट : गुरु शुक्राचार्य का संदेश है और असुरराज पाशा का आदेश।

अग्निका : ओह तो हमें आपके संदेश पर कार्यवाही करनी होगी… (वो एकदम रक्तकूट के पास आकर  बोलती है अपने मुँह को उसके कान के पास लाकर अपनी साँसे उस पर छोड़ती है…, उसकी इस हरकत से कोई भी पुरुष कामग्नि में जलने लगे)

इससे पहले रक्तकूट कोई अगला क़दम उठा पाता पीछे से आवाज़ आयी… “तब तो महागुरु का हमारे लिए भी कोई आदेश होगा…”

रक्तकूट पीछे घूम के देखता है वहाँ नमिचि खड़ा हुआ था…

रक्तकूट : मुझे ज्ञात नहीं था कि आप भी यहां होंगे, अच्छा ही हुआ अपने मेरा परिश्रम थोड़ा कम किया , आपके लिए भी यही आदेश है।

नमिचि बग़ल में रखे अपने कवच को पहनते हुए बोलता है… ठीक है तुम जाकर  बोल दो तुम ने अपना कार्य पूर्ण कर दिया है।

रक्तकूट : अभी मकराक्ष के पास भी जाना है…

नमिचि : उनको संदेश मैं भिजवा दूँगा..

रक्तकूट : उनको सिर्फ़ संदेश ही नहीं देना बल्कि…

नमिचि : हमें ज्ञात है.. तुम बेफ़िक्र होकर वापिस जाओ… अब तुम्हें और अधिक पाताल में रहने की आवश्यकता नहीं है…

(वर्तमान में)

आर्या अपने रूम पर है, तभी दरवाज़े की घंटी बजती है… वो उठ कर दरवाज़ा खोलता है.. दरवाज़े पर खड़े शख़्स को देख वो थोड़ा ख़ुश होता होता है…

“पिताजी… आप अचानक कैसे आए..”

“बस बेटा… शर्मा जी के बेटे की तबियत एक दम से बिगड़ गयी थी तो उन्हें लेकर  हॉस्पिटल आए थे.. सोचा तुम से भी मिलते चले “

“अच्छा किया “

“और बताओ सब कैसा चल रहा है?”

“कुछ नहीं बस थोड़ा काम का प्रेशर ज़्यादा है”

“मैं बाप हूँ तेरा, तेरी शक्ल देख के बता सकता हूँ तेरी परेशानी काम की है या ज़हनी..”

“वैसे पिताजी अगर मैं आपसे पूछूँ कि आपको एक मौक़ा मिले कि आप वो कर पाओ जो आपकी डेस्टिनी का एक हिस्सा है.. लेकिन दूसरी ओर आपको पता हो की उसके अंजाम से आप अपना सब कुछ खो सकते हो..”

“बेटा… इंसान यहा ख़ाली हाथ आता है और ख़ाली हाथ ही निकल लेता है… कुछ नहीं है जो सदा तुम्हारे साथ रहे… माँ बाप भी एक समय के बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाते है… उस बीच जो इंसान का प्रारब्ध है वो ही उसकी पहचान है… कई लोगों को तो अपने जीवन का उद्देश्य जानने में पूरा जीवन लग जाता है, और अगर तुम्हें एक मौक़ा भी मिलता है तो जाओ और पहले अपने उत्तरदायित्व को पूर्ण करो…”

आर्या अपने पिता की आँखो  देखता जैसे उसे उसके कई सारे सवालों के जवाब एक साथ मिल गए हो… वो धीरे धीरे आँखों की गहराई में खोता जाता है तभी पीछे से आवाज़ आती है..

टिंग…. टोंग……

टिंग…. टोंग……

आवाज़ से आर्या उठता है… और वो नींद से बाहर आता है.. देखता है रूम में कोई नहीं है ,वो सपना देख रहा था।  वो उठ के दरवाज़ा खोलता है सामने उसका दोस्त और सहकर्मी दरवाज़े पर खड़ा है ,“अरे  तू अभी तक तैयार नहीं हुआ.. ऑफ़िस नहीं जाना क्या ?”

आर्या : यार आज मैं नहीं आ रहा मुझे बहुत ज़रूरी काम है, कहीं जाना है…

“पर बॉस को क्या बोलू?”

आर्या : बोल दे बत्ती बना के दे ले अपनी नौकरी की…

इतना बोलकर अपना रूम लॉक करके उसके सामने से निकल जाता है…

(कुछ समय उपरांत)

भानु, अद्विका और बाक़ी सारे साथी किसी अन्य स्थान पर जा चुके थे, तभी वहाँ का दरवाज़ा ज़ोर से खड़खडाता है.. सबका ध्यान उस ओर जाता है फिर भानु उठ कर दरवाज़े को खोलते है तो दूसरी ओर आर्या खड़ा हुआ था…

आर्या : और ताऊ, इतना टेम क्याते ला दिया… आड़े धूप में कती सड़ा दिए मेरेबेटे…

भानु : तुम यहाँ कैसे पहुँचे…?

आर्या : इब तू क्याते मज़े लेण  लग राहसै , इन दोनो लड़धुआ ने तू हे तै  छोड़ के आया था..

वो बाहर खड़े 2 लोगों की ओर इशारा करता है, और भानु समझ जाता है.. इतने में पीछे से अद्विका आकर आर्या को देखती है और बोलती है… “ये कौन है?”

भानु : देवी मैंने इसके बारे में ही आपको बताया था…

आर्या : आप अभी पूर्ण नहीं हो, मैंने जो देखा था वो रूप तो कुछ और ही था…

अद्विका : तुमने मुझे कब देखा?

आर्या : समय की धाराओं के परे… असल में मेरा पूरा जीवन ही वहाँ आपको देखते हुए निकला है…

फिर आर्या भानु की तरफ़ मुड़कर बोलता है, “मैं सिर्फ़ अपने सपनो में ही समय धारा के पार जा सकता हूँ, वो भी मेरे नियंत्रण में पूर्णता नहीं है.. फिर मैं  इनकी क्या सहायता कर पाउँगा? “

भानु : वैसे बात अगर सिर्फ़ समय के परे जाने की होती तो हम तुम्हारी शक्तियों को पूर्ण जागृत करने में तुम्हारी सहायता करते परंतु यहाँ सिर्फ़ समय नहीं इन्हें ब्रह्माण्ड के दूसरे सिरे पर भी भेजना है वो भी एक निश्चित समय पर। उसके लिए हमारे पूर्वज पहले से ही इंतज़ाम करके गए है।

आर्या : और वो क्या है?.

भानु : उन्होंने एक पोर्टल का निर्माण किया था देवी की वापसी के लिए , उस पोर्टल में इतनी शक्ति है की वो इन्हें वापिस पहुँचा सकता है।  कोई उसका दुरुपयोग ना करे इसलिए उसे सिर्फ़ पंचतत्व से ही खोला जा सकता है। यहाँ पर चारों महाभूत, जल, धरती, वायु, और अग्नि धारक मौजूद है।  लेकिन पोर्टल को खोलने के लिए जो प्रमुख शक्ति है वो है समयधारा की, जो की सिर्फ़ तुम्हारे पास है।

आर्या : और ये पोर्टल है कहाँ ?

भानु : वहीं  जहाँ  पहले मनुष्य ने जन्म लिया था , अफ़्रीका के जंगलो में।

आर्या : फेर ते मुश्किल सै ,मेरे धोरे तो पासपोर्ट कोनी।

भानु हल्का सा मुस्कुराता है, और बोलता है , “तुम्हें लगता है कि हमें पासपोर्ट की ज़रूरत पड़ती होगी, यहाँ धरती पर चारो ओर हमने काफ़ी छोटे छोटे पॉर्टल्ज़ सेट किये हुए हैं  जिनका कनेक्शन सभी ख़ास जगहों तथा बड़े बड़े शहरों से सीधा बना हुआ है। चलो अब हमें चलना चाहिये। “

अंजनी : पर विधि तो अभी यहाँ पहुंची नहीं है, उसके बिना निकलना सही होगा ?

भानु : विधि को यहीं रुकना है, हम सब यहाँ से जा रहे हैं , यहाँ किसी को तो रुकना होगा। चलो अब समय व्यर्थ किए बिना यहाँ से चलतेहैं।

फिर भानु सबको लेकर  वहाँ से एक गुप्त द्वार के रास्ते, एक सुरंग से होते हुए एक कक्ष में पहुँचता है.. जहाँ एक बड़ा सा गोल यंत्र जिसके बीच में से काले रंग के बादलनुमा धुएँ के बीच में से हल्की बैंगनी रोशनी निकल रही थी।

भानु ने उसके कंट्रोल पैनल पर जाकर  कुछ कमाण्ड एंटर किए और उसकी रोशनी तीव्र हो गयी।

भानु : चलो मैंने द्वार खोल दिया है अब चलते है।

अमित के चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे जैसे वो किसी और ही दुनिया में खड़ा है। सबके उस में एंटर करने के बाद वो भी द्वार में एंटर करता है, फिर पीछे से भानु भी उसमें समा जाते है। पोर्टल की रोशनी फिर से पहले जैसी हो जाती है।

 बारहवाँ अध्याय : रेलिक

(स्थान : अफ़्रीका के जंगल)

एक पहाड़ी से झरने का पानी नीचे नदी में गिर रहा है, नदी के किनारे कुछ जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी पी रहे हैं ,बाक़ी गर्मी से बचने के लिए पानी में स्नान कर रहे है।  वहाँ का दृश्य काफ़ी मनोरम और सुंदर प्रतीत होता है, पर कभी कभी तूफ़ान के आने की  सूचक,ऐसी ही  शांति होती है।जो कि ज्यादा समय तक बरक़रार नहीं रहनी थी। तूफान के आने की शुरुआत चिड़ियों की बढ़ती चहचहाहट से हो चुकी थी,तभी  वानरो का झुंड एक तरफ़ से भागता हुआ आया जैसे उन्होंने भूत देख लिया हो।

जिस गुफा से वानर भाग कर बाहर आए थे उसके वातावरण में बहुत तेज़ी से बदलाव आ रहे थे,और एक प्रकाश पुंज प्रकट हो रहा था, धीरे धीरे प्रकाश पुंज का आकर बढ़ता गया तथा उसने वैसा ही रूप ले लिया जैसा भानु ने पोर्टल को ओपन किया था। 

उस प्रकाश पुंज से भानु और उनके पीछे अद्विका तथा बाक़ी सब एक के बाद एक बाहर आते हैं ,लास्ट में अमित और आर्या बाहर आते हैं। 

अमित : यहाँ हमारे पास दुनिया के दूसरे कोने में एक क्षण में पहुँचने की टेक्नॉलजी है औरआप मुझे आज तक बसो और ट्रेनों में धक्के खिलवाते रहे ? 

आर्या : ताऊ, इब वापिस कुकर जावेंगे , मै तो आते हुए सुट्टा लाना भी भूल गया अर  यहाँ तो दूर दूर कोई दुकान भी ना दिख री ?

जफरिना : will you mind the situation and behave accordingly ?

अर्या : आएँ… हाँ जी.. yes sir.. means mam….. (हल्का सा wink करते हुए)

अंजनी : इन्हें भी आज मौसम का रंग चढ़ा हुआ है, भानु वैसे तुम्हें पता है हमें जाना कहाँ है?

भानु : मैं भी तुम्हारी तरह यहाँ पहली बार ही आया हूँ। 

रॉबर्ट : वैसे तुम्हारे पास यहा का मैप तो होगा ना ?

भानु : हाँ मैप है मेरे पास, बस मैं आस पास का जाएजा ले रहा था की पता चले की हमें किस direction में जाना है ,पर मैप सैंकड़ों साल पहले बना था, उसके बाद काफ़ी बदलाव हो चुके है।  पर इस नदी के पास से हम उत्तर दिशा की ओर बढ़ें तो लगभग 2 मील की दूरी पर हमें पोर्टल मिल जाएगा। 

सब लोग भानु के साथ पोर्टल की खोज में निकल पड़ते है। 

जैसे जैसे वो जंगल के रास्ते आगे बढ़ते जाते है, जंगल उनके आने की ख़बर सब जगह फैलाने लगता है। और कुछ साये एक के बाद एक उनकी हर एक हरकत पर लगातार नज़र रखे हुए थे। 

कुछ दूर चलने के पश्चात…

जफरिना : काफ़ी देर से हमारा पीछा किया जा रहा है। 

अंजनी : हाँ हमें भी ज्ञात है।  ये काफ़ी दूर से नज़र रखे हुए है , पर पता नहीं चल रहा कौन है। इसलिए अभी कुछ करना ठीक नहीं, सावधान रहो। 

कुछ दूर जाते ही, जंगल में चारो तरफ़ से पेड़ों पर लकड़ियों को मार के ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें निकालते है।  सब लोग सतर्क होकर एक झुंड में खड़े होकर चारो ओर देखते है तभी ऊपर से 8-9 नक़ाबपोश, चीते की खाल से बनी पोशाक पहने नीचे आते है। 

अमित एक दम रीऐक्ट करके अपने हाँथों से एक आग का गोला फेंकता है।  तभी उन नकाबपोशों में से एक अपने हाथ को आगे बढ़ा कर उस गोले को अपने हाथ से रोकता है ,उसके छूते ही आग का गोला  एक बर्फ़ के गोले में बदल जाता ह। पर वापिस वार करने की जगह वो उसे ज़मीन पर गिरा देता है। 

नक़ाबपोश : हम अभी युद्ध करने नहीं आए, हमारे बुज़ुर्ग ने हमें आदेश दिया है आपको उनके सामने उपस्थित करने का। या तो आप लोग स्वयं ही हमारे साथ चले या फिर हमें आपको बंदी बनाकर ले जाना होगा। 

अंजनी सबको शांत रहने का इशारा करती है, और बोलती है, हम भी आपके बुज़ुर्ग से मिलना चाहेंगे, चलो। 

(भूतकाल में, स्थान : पंचम नगर)

सूरज की किरण अभी अभी बिखरनी शुरु ही हुई थी, आज जैसे ही नगर का द्वार खुला, वैसे ही नगर में प्रवेश करने वाला सबसे पहला व्यक्ति एक गेरुए वस्त्रों को धारण किए हुए वृद्ध उम्र का एक साधु था।  एक हाथ में कमंडल और एक हाथ में चिमटा बजाते हुए नगर में प्रवेश करता है, “अलख निरंजन ” का अलख जगाते हुए, जैसे उसकी आवाज़ नगर के हर एक घर में जा रही हो। 

वो साधु एक द्वार के आगे जाकर चिल्लाता है , “भिक्षाम देही” कुछ देर बार अंदर से एक औरत आकर उसे भिक्षा देकर  चली जाती है। 

फिर वो साधु कुछ दूर चलकर एक अन्य द्वार के आगे आकर चिल्लाता है..“भिक्षाम देही” ,   कुछ देर बाद अंदर से एक औरत आकर उसे भिक्षा देकर चली जाती है। 

वो नगर में कई घरों में जाता है और भिक्षा लेकर  आगे बढ़ता जाता है जब तक वो एक घर पर आकर खड़ा  होकर आवाज़ लगता है ,“भिक्षाम देही”

कुछ देर प्रतीक्षा करने के उपरांत भी जब कोई नहीं आया तो वो एक बार फिर आवाज़ लगाता है ,“भिक्षाम देही”

फिर से कोई उत्तर ना आने पर वो फिर से आवाज़ लगाता  है “भिक्षाम देही”

इस बार अंदर से सफ़ेद वस्त्रों में एक महिला बाहर आती है ,तन से इतनी कमज़ोर की देख कर  लगता है जैसे कई दिनो से कुछ खाया ना हो। 

साधु : क्या हुआ पुत्री इतना समय क्यूँ लगा दिया? किसी साधु को प्रतीक्षा कराना  सदाचार नहीं है। 

“पर किसी साधु को ख़ाली हाथ विदा करना भी तो सही नहीं है महात्मन “

साधु : क्या हुआ पुत्री, इतनी निराश क्यूँ दिख रही हो ?

“क्या बताऊँ महात्मन, युद्ध  में, मैंने अपना सुहाग ही  नहीं, मेरे बच्चों ने अपने पिता को भी खो दिया। वो जो थोड़ा बहुत कमाते थे, उसी से ही घर ख़र्च चलता था ,अब कई दिनो से मैं और बच्चे अन्न के एक दाने को भी तरस रहे है। 

साधु को जो भी भिक्षा अभी तक मिली थी वो उसे देते है ,“ये लो बेटी इस पर शायद आज तुम्हारा ही नाम लिखा है , साधु को बस एक रोटी काफ़ी है वो तुम इसमें से बनाकर  देदो। “

वो झिझकते हुए उस से भिक्षा का झोला ले लेती है। 

साधु : पुत्री इस  साधु की एक मदद और करो ये बता कर की राज कुमारी की अंतिम युद्ध  किस ओर हुआ था ?

और वो जानकारी प्राप्त करके युद्ध  के मैदान की ओर चल पड़ता है। 

(वर्तमान में, स्थान : अफ़्रीका के जंगल)

नक़ाबपोश सबको अपने कबीले  में लेकर गए।  कबीले  में चारो ओर पेड़ों के ऊपर मचान पर घर बने हुए थे, पेड़ों के बीच में पत्थर का एक बहुत  बड़ा चबूतरा  बना हुआ  था। उसके चारो  कोनो पर चार बड़े बड़े पत्थर अलग से दिख रहे थे जिनपर  पेड़ों की बेले चढ़ने से वो बिलकुल हरे रंग में ढक चुके थे। 

चबूतरे के एक सिरे के आख़िर में एक बाँस की लकड़ी से बना आसन रखा था। जिसपर एक काफ़ी बूढ़े व्यक्ति बैठे हुए थे।  सबको उनके सामने ले जाया जाता है। 

वहाँ पहुँच कर आर्या अमित के कानो में बोलता है ,” ये इस बुढ्ढे के कान बकरी की तरह लटके हुए क्यूँ है? “

अमित : भाई मैं भी तेरी तरह नया नया इन सब में पड़ा हूँ, चल देखते हैं आगे क्या होता है ?

भानु : (मन में सोचते हुए) मैप के हिसाब से ये जगह ठीक वही है जहाँ पोर्टल होनाचाहिए ,इस प्लेटफार्म की बनावट भी बिलकुल डिटेल्ज़ से मिलती है। 

तभी वो बुज़ुर्ग बोलते है, “ कोन हैं आप लोग , और यहाँ आने का कारण ?”

भानु : इस जगह का निर्माण हमारे पूर्वजों ने किया था, ये एक यंत्र है तथा आज हमें इसकी आवश्यकता आन पड़ी है ,इसलिए हम यहाँ है। 

बुज़ुर्ग : ये असत्य है। 

अंजनी : असत्य कैसे…?

बुज़ुर्ग : क्यूँकि पिछली कई सदियों से हम यहाँ रह रहे है ,ये स्थान हमारे लिए देवता समान है।  इसने ही हमें एक नया जीवन दिया है। 

भानु : हमें कुछ समझ नहीं आया, क्या आप विस्तार से बताएँगे ?

वो बुज़ुर्ग अपने आसन से खड़े होते है, और  सबका ध्यान सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके पैरों पर होता है ,वो बकरी के पैर थे।  इससे पहले की भानु या अंजनी कुछ बोल पाते बुज़ुर्ग बोलते है, “आश्चर्य मत हो, मैं अपना परिचय देता हूँ, मेरा नाम लायनुस है। “

भानु : लायनुस, देव गुरु….

लायनुस : हाँ सही पहचाना ,मैं  एक satyr हूँ। ज़्यूस की सभी सन्तानो को  मैंने ही शिक्षित किया है। 

अमित : देव गुरु?

भानु :  हाँ बेटा ! इस ब्रह्माण्ड के एक क्षेत्र के देव है ये।  तुम्हारी language में ये हर्कुलस के गुरु हैं। 

अमित थोड़ी देर ऐसे देखता है जैसे सब  कुछ उसकी समझ के बाहर चला गया हो। 

लायनुस : वहाँ सब कुछ बहुत बढ़िया चल रहा था, मैं  माउंट ओलम्पस पर जन्मे हर बालक को शिक्षित करता ताकि वो बड़े होकर अपने माता या पिता की जगह ले सके और एक अच्छे देवता साबित हो। पता नहीं कब ओलम्पस पर काली घाटा छा गयी और सबकुछ निगल गयी। ज़्यूस की ही एक संतान ने उनके ख़िलाफ़ बग़ावत करदी, और वहाँ सभी देवताओं का अंत कर दिया। जिस से दुनिया का संतुलन ही बिगड़ गया। शायद ज़्यूस को इसका पहले से ही पता था इसलिए उन्होंने ओलम्पस से सभी बालकों को निकालने का फ़ैसला लिया। उन्होंने पाँच महाभूत का आहवाहन किया और एक द्वार का निर्माण किया जो हमें यहाँ पर ले आया। तब से मैंने इन सभी बालकों का पालन पोषण किया पीढ़ी दर पीढ़ी सबको सिखाया, लेकिन हम यहीं रहे क्यूँकि हमें पता था कि ,जिस द्वार से हम इस दुनिया में आए हैं उसी से हम वापिस भी जा सकते है।  पिछले कईसौ सालों से हम इस द्वार को खोलने की कोशिश कर रहे हैं , ताकि इन सबको मैं वापिस माउंट ओलम्पस ले जाऊँ और वहाँ ये फिरसे जीवन का निर्माण करके  उस दुनिया को बसा लें। आज हज़ारों सालों के बाद तुम सब आए हो ये दावा करने की ये कोई यंत्र हैऔर ये तुम्हारे पूर्वजों ने बनाया है ?

अंजनी : हाँ ये सत्य है। ये हमारे पूर्वजों ने इस ग्रह पर आने से साथ ही बनाया था, जब ज़्यूस ने द्वार खोला होगा तो इस ग्रह पर वो द्वार इसी यंत्र के कारण बन पाया होगा। 

लायनुस : अगर ऐसी बात है तो तुम्हारे पूर्वजों ने तुम्हें इसके प्रयोग का तरीका भी बताया होगा, और वो तुम्हें पता होगा?

अंजनी : हाँ हमें पता है , उसी मकसद से यहाँ आए है ,पर हम इस द्वार को सिर्फ़ एक बार ही खोल सकते है। 

लायनुस : अगर इसको खोलने का कोई तरीका है तो वो हमें वापिस हमारी दुनिया में वापिस ले जाएगी। 

अद्विका : मेरा वापिस जाना उस से भी अधिक आवश्यक है। 

अद्विका ने अपना हाथ हवा में उठाया और उसमें खड़ग प्रकट हो गया। 

तभी उसके सामने 10-12 नक़ाबपोश आ गए, इस बार सब युद्ध की मुद्रा में थे तथा सबके हाथों से अलग अलग क़िस्म की ऊर्जा निकल रही थी। 

To be continued…

Written By- Sonya Singh for Comic Haveli

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5 Comments on “Adwika ( Adwitya Shakti ) Part – 8”

  1. अद्विका का यह आठवां भाग बहुत बढ़िया था।
    हर भाग के साथ कहानी और भी मजेदार और mature होती जा रही है।
    हर भाग में कुछ नए रहस्य भी खुल रहे हैं।
    कहानी भूतकाल और वर्तमान में घूमती रहती है जिससे कहानी की रोचकता बढ़ जाती है।
    सारी घटनायें एक महायुद्ध की तरफ इशारा करती है।पर क्या वो युद्ध भूतकाल में होगा या वर्तमान में।।
    इस बार नेक्स्ट पार्ट जल्दी लाइएगा plzzz।

  2. Kasam sy ….mjaa as gyaa ..yeh Wala part padh kar , story kaffi jayada adventure wali lg rhi Hy ..jb yeh Puri ho jaaygi this is ik baar for sy pdungaa …aur apny dosto ko bi pdaayungaa….khaani ka yeh part bhut bdaa tha..isliy pdkar accha lgaa…khaani ky end m eyshaa lg rhaa Hy jese 2 gods being ki ldaai hogi…but gods ki nhi ..kyunki unko tho good of war my maar diyaa Hy ..time poratal wali chij bi bhut bdiyaa thi…ab bus next part ka intzaar Hy

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