Adwika ( Adwitya Shakti ) Part – 9

बारहवा अध्याय : देवताओं का द्वंद

(भूतकाल में, स्थान – युद्ध क्षेत्र)

साधु महाराज पूरे युद्ध क्षेत्र का निरीक्षण करने के पश्चात उस स्थान पर जाते है, जहां राजकुमारी अद्विका के आधे शरीर को दफनाया हुआ था। वहाँ पहुँच कर वो अपनी मांत्रिक शक्ति से उसे खोद कर बाहर निकालते हैं।  काफी समय से धरती में दबे होने के कारण मांस का एक लोथड़ा भी नहीं था, सिर्फ़ कंकाल शेष रह गया था। वो उस कंकाल को ध्यान पूर्वक देखता है, फिर अपने झोले में से कुछ राख और अस्थियां निकाल उस पर डाल देता है ; फिर हाथ जोड़कर अपने इष्ट का ध्यान करते हुए बोलता है… हे श्री हरि,आपके आदेश अनुसार मैंने अद्विका के दोनों खंडों की संधि करवा दी है। अब मैं अनुष्ठान प्रारंभ करने की अनुमति चाहता हूँ,कृपया आप सप्त ऋषियों को प्रकट होने का आदेश दें।

साधु की प्रार्थना के साथ ही आकाश में बदलाव होने शुरू हो गए।  दिन के समय एकाएक सप्तऋषि तारामंडल  उजागर हो गया, कुछ समय में ऐसा लगा जैसे वो तारा समूह धरती की ओर बढ़ रहा है ; जैसे ही  वो और पास आए, सभी तारे अपनी स्वाभाविक जगह छोड़ कर गोल गोल घूमने लगे।  आसमान से एक एक करके सात तारे धरती पर युद्ध क्षेत्र में गिरे और ऋषियों का रूप धारण करने लगते है।

सभी ने एक साथ उस साधु को कहा , “सप्तऋषियों का प्रणाम स्वीकार करे ऋषिवर। ”

वो साधु भी उन्हें प्रणाम कर बोलते है , “आपको भी मेरा प्रणाम स्वीकार हो महान सप्तऋषियों , कृपया यज्ञ का आरम्भ करे। ”

वहां सभी ने  एकत्रित होकर मांत्रिक शक्ति से एक हवन कुंड का निर्माण कर यज्ञ की शुरुआत की।  कुछ ही पलों में पूरा क्षेत्र मंत्रों की ध्वनि से गूंज उठता है।

(वर्तमान में)

अद्विका और ओलिम्पीयंज़ के बीच युद्ध चरम पर था, हर एक योद्धा किसी ना किसी देवता का पुत्र या पुत्री होने के कारण वो स्वयं मे एक देवता था ; किन्तु  उनके सामने अद्विका अकेली ही उनपर इक्कीस लग रही थी। परंतु समय के खेल मे लिखी हुई घटनाओ में यह युद्ध सिर्फ एक युद्ध ही नहीं बल्कि ओलिम्पीयंज़ के लिए एक नया अध्याय साबित होने वाला था। यहां सभी देवताओं ने एक सम्मिलित आक्रमण अद्विका पर किया, जिसे अद्विका ने अपनी खड़ग से रोका और हवा में एक छलांग मारकर  चंद्रहास को जमीन पर मारती है ; जिसके कंपन से सभी देव पीछे की ओर सरक जाते है।  साथ ही कंपन वहाँ के सभी पेड़ो को हिला देती हैं, और वहाँ एक गुफा के अंदर एक माटी के टीले मे दरार आ जाती है। बाहर अद्विका और देवो के बीच हुए टकराव से उत्पन्न प्रत्येक कंपन के साथ उस टीले की दरारें बढ़ती जाती हैं। बाहर युद्ध चरम पर था, वहाँ मौजूद सभी बुजुर्ग बस तमाशबीन बने खड़े थे ; किसी को समझ नहीं  आ रहा था कि वे ये सब कैसे रोके, या फिर वो इसे रोकना ही नहीं चाहते थे।

मोह या किसी निश्चय पर ना पहुँचना रोके हुए था उन सबको। अधिकार किसका हो किसका ना हो इसी संशय में फंसे हुए बस वो देख रहे थे, वहाँ उन सबको लड़ते हुए।  एक तरफ़ देवों की संताने जो आज इतने बड़े हो गए थे कि  वे स्वयं ही किसी देवता से कम नहीं थे ; हर एक अपने पिता के अनुसार शक्ति धारण किए हुए था।  कोई वायु का, तो कोई अग्नि का, कोई धरती का, तो कोई जल का, किसी के पास रफ़्तार का हुनर, तो कोई मृत्यु देव का पुत्र होने के कारण आत्माओं का साधक था।  उनके सामने अकेली टिकी हुई थी अद्विका, आदिशक्ति के आशीष और अपनी पूरी क्षमताओं से अनजान, अचानक जिसकी आँख खुली तो वो एक दूसरी ही  दुनिया में थी।  पर उसके साथ थी उसकी प्रबल इच्छाशक्ति जो  उसे शक्ति दे रही थी लड़ने की, ताकि वो जा सके समय के पार अपना और अपने माँ बाप का बदला लेने। 

(भूतकाल में)

युद्धक्षेत्र में मंत्रों की गूँज बढ़ती जा रही थी, हर एक आहुति के बाद यज्ञ की अग्नि और अधिक प्रज्वलित होती। वहाँ मौजूद सप्तऋषियों का तेज़ भी समय के साथ और तीव्र होता जा रहा था।

तब मुनि अत्रि (सप्तऋषियों में से एक ) अग्निकुंड में आहुति देने के साथ आह्वान करते है, “हे पंचमहाभूतो मैं अग्नि का अहवाहन करता हूँ , द्वार की रचना के लिए प्रकट हो…”

हवन कुंड से एक अग्नि का गोला निकल कर आकाश में एक स्थान पर जाकर स्थिरहो गया, और यज्ञ फिर से पूर्व की भांति चलने लगा।

(पाताल के एक हिस्से में जहाँ जल, अग्नि पर हावी रहता है)

मकराक्ष के क़िले में, नमिचि प्रवेश करते हुए बड़ी उत्सुकता से बोलता है, “मकराक्ष भ्राता आप कैसे है?”

मकराक्ष : आज हमारी काफ़ी फ़िक्र हो रही है तुम्हें अनुज, बताओ आज क्या लालसा तुम्हें मेरे दर पर ले आयी?

नमिचि : यह  तो आपने हृदयाघात वाली बात कर दी, क्या मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता से मिलने भी नहीं आ सकता?

मकराक्ष : अगर तुम भेंट करने आते तो मुझे अत्यंत हर्ष होता, परंतु…

नमिचि : परंतु क्या?

मकराक्ष : हमें तुम्हारी और रक्तकूट की भेंट की जानकारी मिली, और तुमने उसे हमारे पास आने के लिए मना कर दिया ये भी हमें ज्ञात हुआ। 

नमिचि : मैं भी आपको वही संदेश देने आया हूँ। 

मकराक्ष : संदेश तो हमारे पास पहुँच गया है, पर तुम्हारे आने की मंशा कुछ और ही है…

नमिचि : तो उसमें बुराई ही  क्या है ?

मकराक्ष : बुराई है विश्वासघात की ; जो तुम चाहते हो वो धरोहर है गुरु शुक्राचार्य की हमारे पास। 

नमिचि : पर यहाँ तुम अपने वचन से नहीं डिग रहे हो, शुक्राचार्य जी ने रक्तकूट को आदेश दिया था उसे लाने के लिए। रक्तकूट को मैंने वचन दिया कि मैं उसे आपसे लेकर  उनके पास पहचा दूँगा, तभी मैंने  रक्तकूट को  आपके पास आने नहीं दिया। 

मकराक्ष : तुम्हारी यही कुटिल बुद्धि तुम्हारे विनाश का कारण बनेगी। 

नमिचि : तो अब आप उसे मेरे सुपुर्द कर दीजिए, क्योंकि शुक्राचार्य के वचनानुसार जब उन्हें इसकी ज़रूरत पड़ेगी तो वो उन्हें देना ही  होगा, इसलिए आप उसे और अधिक अपने अधिकार में नहीं रख पाएँगे। 

मकराक्ष : अवश्य, मुझे आज भी याद है, हमारे पूर्वज महाराक्षस रावण की मृत्योपरांत शुक्राचार्य  जी ने इसकी ज़िम्मेदारी हमारे पूर्वजों को दी थी ; ताकि हम इसकी पूर्ण सुरक्षा कर सके। यह  इस संसार में अद्वितीय है, त्रिदेवो में सर्वश्रेष्ठ भगवान शिव की कृपा से उत्पन्न “चन्द्रहास खड़ग”

(वर्तमान में)

युद्ध यहाँ थमने का नाम ही नहीं ले रहा था, इन्हें लड़ते हुए पूरा दिन हो चुका था ; पर कोई भी थकने या समर्पण के लक्षण नहीं दिखा रहा था।  सभी देवों ने मिलकर अद्विका को नीचे गिराकर एक साथ ऊपर से जैसे ही प्रहार किया, अद्विका के हाथ में खड़ग फिर से वापिस आ गयी और टकराव होते ही फिर से एक तीव्र कंपन्न से सब अपनीजगहों पर जैसे हिल गए। उस गुफा के अंदर उस माटी के टीले पर दरारें बढ़ती जा रही थी, अब तो लगता था वो किसी भी पल बिखर सकता है।  बाहर जिस प्रकार युद्ध पल प्रतिपल भयंकर होता जा रहा है, लगता नहीं कि ये ज्यादा समय तक टिकी रहेगी। 

लड़ते लड़ते एक वार से अद्विका के हाथ से खड़ग कहीं दूर जा गिरी, इसी मौक़े का फ़ायदा उठाकर  सभी देवों ने अपनी शक्ति एकत्रित कर एक बड़ी सी चट्टान को उत्पन्न कर उठाकर , हवा में उड़ते हुए अद्विका के ऊपर तीव्र गति से फेंका।  पता नहीं वो चट्टान अद्विका का क्या नुक़सान करती पर एकदम हुए वार से स्तब्ध, बिना हथियार के वो वहाँ खड़ी थी। चट्टान उसकी तरफ़ आ रही थी, दैवीय शक्ति के संयोजन से बनी चट्टान घातक थी, पर एक प्रचंड स्वर के साथ उसके टुकड़े हवा में उछले और आसपास का वातावरण धूल से भर गया।  देवों को बिलकुल उम्मीद ना थी इस वार के विफल होने की, वो भी तब जब अद्विका के हाथ से खड़क निकल चुकी थी।  जब धूल छँटी तो अद्विका वहीँ खड़ी थी, अब उसके हाथ में एक नया हथियार उत्पन्न हो चुका था, एक फरसा , जिसकी चमक से सबकी आँखे चुँधिया रही थी। 

ये वार इतना प्रचंड था की सबकी रूहें तक काँप गयी थी।तभी उस गुफा के अंदर, उस टीले से माटी की एक मोटी परत नीचे गिरी और अंदर किसी इंसान का एक हाथ दिखाई दिया। इससे पहले की अगला प्रहार हो, प्लेटफार्म के एक कोने में बनी एक शिला पर बना एक चिन्ह चमकने लगता है।  वो ज़मीन से बाहर निकल कर ऊँची खड़ी हो जाती है।  तभी युद्ध पुनः आरम्भ हो जाता है  और वहाँ भानु अपनी उत्सुकता को शांत करने के लिए लायनुस के पास जाते है, और बोलते है, “(पिलर की ओर इशारा करते हुए) ऐसा पहले भी कभी हुआ है क्या?”

लायनुस : नहीं ! मैं भी आज ही देख रहा हूँ, आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। 

भानु : इसका कुछ तो कारण होगा, जिसकी वजह से यह  हुआ है?

लायनुस : आप ही  बताइए, यह  जगह तो आपके पूर्वजों की बनाई हुई है।  कुछ समय पहले तो आप दावा कर रहे थे आप इसके प्रयोग के बारे में सब जानते है ?

भानु : मेरी जानकारी बस कुछ लिपियों तक सीमित है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे पास रही ; हम कभी इस जगह नहीं आए तो हमारी जानकारी भी सीमित है।  हमने सोचा था ये जगह वीरान होगी तो यहाँ आकर कुछ प्रयोगो के बाद शायद समझ आ जाए क्या करना है, परंतु हमें आपके बारे में क़तई ज्ञान नहीं था। 

लायनुस : हमने अपना पूरा जीवन यहाँ बिता दिया परंतु समझ नहीं पाए इसका प्रयोग कैसे करना है? और जब आप लोग आए तो ये युद्ध छिड़ गया इसके अधिकार के लिए। 

(भूतकाल में: किसी अन्य आयाम में)

पाशा अंधेरे में एक ओर बढ़ा जा रहा था, उसकी लाल आँखें अंधरे में भी शोलों के समान धधक रही थी।  वो अपने एक हाथ में एक भारी फरसे को ज़मीन पर रगड़ते हुए जा रहा था, फरसे के रगड़ने से निकलती हुई चिंगरिया अंधेरे में दूर से दिखाई पड़ती।

वो खुद से ही बोलता हुआ जा रहा था  : मैंने 5 आयामों में जाकर 5 को मार डाला, बस एक और , फिर मैं  वापिस प्रस्थान करूँगा। परंतु ये इतना आसान नहीं  है, गुरुजी ने मुझे चेताया था कि  इसकी हत्या नहीं करनी है, इसे सिर्फ़ बंधक बनाना है  तथा अपने साथ ले जाना है।  इसका जीवित रहना अति आवश्यक है ताकि ब्रह्मांड का संतुलन बना रहे और त्रिदेव बीच में ना पड़े। 

जैसे ही वो थोड़ा आगे बढ़ा सूरज की पहली किरण ने भोर का एलान किया।  हल्की सी रोशनी में वो एक पहाड़ी की चोटी पर पहुँच चुका था, उसने दूसरी ओर नीचे देखा, राक्षसों की विशाल सेना।  राक्षस हाथियों से भी विशाल और ऐसे प्राणी जो कभी सपने में भी ना देखे थे। ये सब देख पाशा की आँखो में चमक साफ़ दिखाई देती है, “हाहाहा इस आयाम में राक्षसों का साम्राज्य है, अब मज़ा आएगा एक शक्तिशाली प्रतिद्विंदी से युद्ध का….”

इसी के साथ वो ऊपर से छलाँग लगाता है, एक नए युद्ध की शुरुआत के लिए। 

(भूतकाल – युद्धक्षेत्र में)

यज्ञ की अग्नि धधक रही है , सभी सप्तऋषि साधु के साथ बैठ कर मंत्रजाप कर रहे है,अत्रि अग्निकुंड में आहुति देने के साथ फिर से आह्वान करते है, “हे पंचमहाभूतो मैं जल का आह्वान करता हूँ , द्वार की रचना के लिए प्रकट हो…”

हवन कुंड से एक अग्नि का गोला निकल कर बाहर आता है, फिर वो कुछ ही पलों में जल के गोले में परिवर्तित होकर आकाश में एक स्थान पर जाकर स्थिर हो गया। ऋषिगण फिर से यज्ञ में मंत्रोचारण में व्यस्त हो गए….

(वर्तमान में)

अद्विका के पास एक नया हथियार आ चुका था, वो अभी भी समझने की कोशिश कर रही थी अपनी शक्तियों को किन्तु  साथ में उसे लड़ना भी था अपने अधिकार के लिए।  वो फरसे को हाथ में गोल गोल तेज़ी से घुमाकर  हवा का तेज़ बवंडर बना सभी को पीछे धकेलने की कोशिश करती है, तभी दूसरी तरफ़ से एक ऊपर आए हुए बादल से सारा पानी एक साथ अद्विका के ऊपर तेज़ रफ़्तार से गिरा कर आक्रमण करता है।  आकाश से पानी एक तीर के आकार में तीव्र गति ने अद्विका की ओर आता है ; ठीक समय पर वो उसे आते हुए देख फरसे को ऊपर कर हवा से उसका रूख बदल देती है और वो पानी का तीर कोने में एक शिला से जा टकराता है, जिससे वो पत्थर की चट्टान चूर चूर हो जाती है। उसके पीछे एक पिलर स्वतंत्र हो जाता है , उस शिला पर बना चिन्ह चमकने लगता है , वो भी पहली शिला की तरह ऊँची खड़ी हो जाती है। 

जो भी वहाँ हो रहा था वो उन सबके लिए बिलकुल नया था, कोई विकल्प भी ना था सिवाए वहाँ खड़े होकर देखने के। 

(एक अज्ञात स्थान पर)

विधि उस अज्ञात वृद्ध साधु के साथ थी जहाँ एक बार पहले भी वोआ चुकी थी।वृद्ध की शक्ल अभी भी नहीं दिख रही थी, बस उसकी पीठ और कंधे के ऊपर से विधि का चेहरा। 

विधि : गुरुदेव, जो आप चाहते थे मैंने ला दिया, कृपया मुझे बताइए आगे क्या करना है। अगर मेरे पिताजी को पता चला के मैंने बिना उनकी आज्ञा के ये आपको दिया है, तो पता नहीं क्या होगा।

वृद्ध : शांत पुत्री, इसके लिए सिर्फ़ मैं  ही नहीं बल्कि तुम्हारी ख़ुद की मंशा भी शामिल है, प्रतीक्षा करो।  समय अपनी गति से ही चलेगा और घटनाए होंगी, वो आने वाले समय का रूप तय करेंगी।  पर मुझे इंतज़ार है समय के बीच में हुए रिक्त स्थान की पूर्ति का। मैं  देख सकता हूँ  समय का रुझान अब इंतज़ार समाप्ति की ओर है।

 

Written By –  Sonya Singh for Comic Haveli 

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