अगड़म-बगड़म

अगड़म-बगड़म

प्रस्तावना–

इतिहास में पहली बार! चारों नागराज आमने सामने। नरक नाशक, विश्वरक्षक, आतंकहर्ता और क्लासिक नागराज आज एक दूसरे के सामने खड़े हैं। क्यों और कैसे यह जानने के लिए शुरू से आखिर तक इस श्रृंखला में हमारे साथ बने रहिये।

प्रथम अध्याय–पों

महानगर–

आंधियां चल रही थीं, धूल के गुबार उड़ रहे थे,साँय-साँय करती हवाएं कानों में चिल्ल–पों मचा रही थीं। परन्तु “पों” को घण्टा फर्क नही पड़ रहा था–क्योंकि उसका नाम ही पों था।
वह नाटे कद का एक बेहद चालाक सा दिखने वाला प्राणी था। उसने अपने पूरे शरीर को एक काली सी चादर में ढक रखा था और अपनी लाठी के सहारे पहाड़ पर ऊपर की ओर बढ़ रहा था–मतलब चढ़ रहा था। उसके दूसरे हाथ मे एक लोटा था(नही वह जंगल करने नही जा रहा था,क्योंकि पहाड़ पर जंगल था ही नही।)

कुछ ऊपर पहुँच कर वह एक बड़े पत्थर पर बैठ गया और कुत्ते की तरह हांफने लगा। भाई पौने ढाई किलोमीटर बिना रुके चढ़ना आसान बात नही। अच्छे-अच्छों की हाथ मे आ जाती है–पसीने की बूंदे।
मैं जान रहा हूँ तुमलोग ने वही सोचा होगा……..जो तुम सोचते रहते हो(ही ही) ।

“पुर्र–पुर्र–पुर्र”
यह स्वर सुनकर मुझे भी एक पल को वही लगा जो आपको लगा होगा। परन्तु नही। पों यह स्वर अपने मुंह से निकाल रहा था।

इसका मतलब वह अपने मुँह से….?
ही ही ही यह तो असम्भव है( हां, अगर कोई बन्दा एक किलो हाजमोला एक ही बार मे गटक ले तो वह शायद यह महानतम कार्य कर सके। परन्तु ऐसा आजतक किसी ने नही किया होगा, वरना उसका नाम गिनीज बुक में होता।)

नोट :- कृपया गिनीस बुक में अपना नाम डलवाने के लिए पेट मे एक किलो हाजमोला डालने की कोशिश बिल्कुल भी न करें, अन्यथा आपके घर वालों को आपको icu में डालना पड़ेगा।

तो जैसा कि मैंने बताया पों पुरपुरा रहा था, आई मीन अपने मुंह से पुर्र-पुर्र के स्वर उतपन्न कर रहा था–जैसे बच्चे अपने मुंह से अजीबो-गरीब स्वर निकाला करते हैं।

परन्तु वह ऐसा क्यों कर रहा था? शायद यह उसके हाँफने का यूनिक स्टाइल था। नही!…..यह तो एक कोडवर्ड था। और अब ये भी पता चला गया कि पों उस पत्थर पर बैठकर यह बकैती क्यों पोंक रहा था।
ठीक उस पत्थर के सामने ही एक गुफा थी जिसका मुंह एक चट्टान से ढका हुआ था। जैसे ही पों ने तीन बार पुर्र-पुर्र किया वह चट्टान अपने स्थान से हटने लगी और नज़र आया उस गुफा में तैरता अँधेरा।

पों उठकर उस गुफा में घुस गया। परन्तु गुफा में घुसने पर तो बैन लग चुका है।

जबसे मोदीजी गुफा में होकर आए थे, साला गुफा में घुसने का ट्रेंड सा चल पड़ा था। हर कोई गुफा में ही घुस रहा था।

कुछ दिनों पहले मेरा एक दोस्त भी गया था। और जब बाहर आया तो अधमरी अवस्था मे था–क्योंकि, उस गुफा में पहले से भालुओं का एक जोड़ा रोमांस कर रहा था।
अब भइया ऐसे स्पेशल मौके पर तुम किसी को डिस्टर्ब करोगे तो कोई तुम्हारे साथ चुम्मा-चाटी थोड़ी करेगा, नोचे खसोटेगा ही।

ऊपर से उस समय भालू लोग और पगलाए हुए थे। साला जिसको देखो गुफा में घुस जा रहा था। भालुओं से उनका घर छीना जा रहा था इसलिए वे बौरा गए थे। उत्तराखण्ड में तो एक अविश्वसनीय घटना घटी। पहाड़ों पर रहने वाले लगभग सैकड़ों भालू, मानवों के बीच चौराहे पर उतर आए और जमघट लगा दिया। अजीब सा हो हल्ला मचा रहे थे वे। कुछ लाग पहाड़ों पर विराजमान पहाड़ी बाबा श्री देवेन्द्र पहाड़ाचार्य की शरण मे पहुंचे और सारा हाल सुनाया(उस समय बाबा पहाड़ी-नृत्य कर रहे थे। जिसमे अजीब–अजीब से पोज़ बनाने पड़ते हैं, बिल्कुल पहाड़ों जैसे। इसलिए तो पहाड़ी-नृत्य कहते हैं उसे।)

पहाड़ी बाबा पहाड़ से नीचे उतरे। उनके पास एक अद्भुत शक्ति थी–जब वह कहीं जाते तो पहाड़ भी उनके पीछे-पीछे जाते थे। केवल पहाड़ ही नही, पत्थर से बनी हर एक चीज़, अगर किसी चीज़ में ज़र्रा बराबर भी पत्थर शामिल होता तब भी।

पहाड़ी बाबा के बारे में एक प्रसिद्ध घटना है–
एक बार वे स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी देखने गए थे और जब वे वापस उत्तराखण्ड आए तो स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी भी उनके पीछे-पीछे चला आया था।
अमेरिका ने तुरंत केस कर दिया कि एक इंडियन हमारा स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी लेकर भाग गया।

किसी तरह समझा बुझा कर , बहलाकर, पुचकारकर देवेन्द्र बाबा ने स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी को वापस भेजा, वर्ना उसने तो आधार कार्ड के लिए भी अप्लाई कर दिया था।

अगले दिन पहाड़ी बाबा को pm की ओर से एक लेटर भी आया था कि, कृपया आप भृमण करना छोड़ दें वरना हिमालय कहीं और पहुंच जाएगा कश्मीर कहीं और पहुंच जाएगा उत्तराखंड कहीं और। पूरा भारत अस्त-व्यस्त हो जाएगा।

तब से बाबा जी अपने तेज पर काबू पाने के लिए पहाड़ी-नृत्य कर रहे थे। आज उनका नृत्य पूरा हो चुका था। इसलिए इस बार पहाड़ उनके पीछे-पीछे नही आया था–क्योंकि वे अब अपनी उस शक्ति पर काबू पा चुके थे।

पहाड़ी बाबा उस चैराहे पर पहुँचे, कुछ देर भालुओं से बतियाए। और फिर अचानक ही सारे भालू वापस लौटने लगे। सभी लोग यह दृश्य देखकर हैरान हो गए।

उनके जाने के बाद बाबा ने बताया। “भालू यहाँ धरना धरने आए थे। आपलोग गुफा में जाना बंद कर दीजिए।” भालुओं ने कुछ लोगों की गिरफ्तारी की भी मांग की थी–ये वो लोग थे जिन्होंने गुफा में जाकर भालुओं के एमएमएस बनाए थे, भाई भालुओं की भी कोई इज्जत होती है।

खैर। भालुओं की माँग को गम्भीरता से लिया गया और पूरी सख्ती के साथ आदेश लागू हुआ कि अब कोई भी किसी गुफा में घुसता हुआ न दिखे–साथ ही उनलोगों को भी ढूंढकर गिरफ्तार किया गया जिन्होंने बेचारे इज्जतदार भालुओं के एमएमएस बनाए थे।

परन्तु आज यह ‘पों’ फिर गुफा में घुस गया। इसकी इतनी हिम्मत!

पों :- हा हा हा। यह गुफा मेरे बाप की है,दहेज में मिली थी।

फिर पों अंदर बढ़ गया। कुछ आगे जाने पर गुफा बन्द थी। पर जैसे ही पों ने सामने पथरीली दीवार को छुआ, वह दीवार बाईं ओर खिसक गई।

अरे बाप रे! लिफ्ट?

पों :- कहा न। गुफा मेरे बाप की है।

पों उस लिफ्ट में घुस गया।

यह लिफ्ट पों को कहाँ पहुंचाने वाली थी? जहाँ फ्लोर नंबर दिखता है वहाँ तो लिखकर आ रहा था “तेरी माँ की आँख।”

“तेरी माँ की आँख?” यह कौनसा फ्लोर था?

लगभग पाँच मिनट बाद लिफ्ट खुली। पों उस विशाल-और ऊँचे पहाड़ की चोटी पर खड़ा था–अब समझ आया फ्लोर का नाम तेरी मां की आंख क्यों था।

यहाँ से सारा महानगर दिख रहा था।
परन्तु पों यहाँ क्या करने के लिए आया था? ‘ईगल व्यू’ के लिए?

पों ने आसमान की ओर सर उठाया। शाम का वक़्त था इसलिए सूरज के साथ-साथ चन्द्रमा भी दिख रहा था।
पों अट्टहास करने लगा।

पों :- हा हा हा। आज वह सारी क्रियाएं पूर्ण हुईं…..अब बस मुझे अगड़म-बगड़मासुर को अंतिम चढ़ावा चढ़ाना है। फिर मेरी इच्छा पूर्ण हो जाएगी।

पों चोटी के अंतिम छोर पर आ कर खड़ा हो गया। उसने चादर उतारकर फेंक दी।

अरे बाप रे! यह तो बिल्कुल नँगा था।
सिर्फ कच्छा पहन रखा था।

उसने जो लोटा हाथ मे ले रखा था उसे मुंह मे लगाकर पीने लगा।

पों :- ही ही ही। जब दो लीटर पानी अंदर जाएगा तभी तो आधा लीटर पानी बाहर आएगा।

ओह! तो यह नामुराद ‘वन’ करने के लिए आया था यहाँ। मुझे लगा था ईगल व्यू के लिए आया है कमबख्त!

अबे अगर यही करना था तो नीचे नाले में कर लिया होता।

पों :- ही ही ही। एक महान कार्य के लिए ऐसी बकैतियाँ पेलनी पड़ती हैं।

अजीब बेहया-बेशर्म इंसान है। यह तो नही मानने वाला, भाईलोग अपनी आँखें मूंद लो।

पों स्टार्ट हो गया।

थोड़ी ही देर में अजीब सी हवाएं चलने लगी। मौसम अजीब होने लगा। आकाश में बादल इकट्ठा होने लगे थे। पों जल्दी से उछलकर बीचो-बीच वाले स्थान पर आ गया। वह आकाश की तरफ सर उठाए हुए था, जहाँ अजीब सी हलचल मची हुई थी। नारंगी, हरी, नीली कई तरह की रौशनियाँ आकाश में भागम भाग किये हुए थीं–जैसे सांपों के झुण्ड।

कुछ ही देर में हवाओं से भी रौशनियाँ निकलने लगी। हलचल बढ़ती जा रही थी साथ ही पों के चेहरे की चमक भी। अचानक से आकाश में सिर्फ कुछ क्षण के लिए एक भयानक से चेहरे की आकृति की झलक दिखी–जिसे देखकर पों ने सिर झुका लिया था। फिर पूरा आकाश एक भयानक धमाके से गूंज उठा, धरती हिल गई और आकाश से रँगीन रौशनियों की बारिश सी होने लगी। उस धमाके के बीच एक छड़ी जैसी चीज नीचे गिरती हुई दिखी थी।
एक पल को आंखें चुंधिया गईं। फिर धीरे-धीरे सब कुछ साफ हुआ।
पहाड़ पर धुँआ तैर रहा था और उसी धुएँ के बीच हाथ मे एक अजीब सी लाठी लिए खड़ा था–पों।

यह उसकी लाठी तो नही थी, बिल्कुल भी नही और न ही वह अब पहले जैसा दिख रहा था,बिल्कुल भी नही।

वह तो….वह तो…..कुछ-कुछ नागराज जैसा लग रहा था।

पों :- गुर्र। मैं हूँ पोंराज!

क्रमशः

कौन है पों?
क्या करना चाहता है?
कहां से आया है कमबख्त?
जल्द पता लगेगा।

कहानी कैसी लगी बताना न भूलें।

 

Written By – Talha for Comics Haveli

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3 Comments on “अगड़म-बगड़म”

  1. अरे तल्हा सर् मेरी बेज्जती न कर दियो ज्यादा साहेब। नागराज तो अभी एक भी नहीं आया है चार कब आएंगे? ये पौं तो आपके जैसा है मतलब मसखरा। चलिए देखते हैं आपकी स्टोरी कहाँ तक जाती है मतलब पौं की। पंचेस ठीक हैं ज्यादा बढ़िया नहीं कहूंगा क्योंकि आपसे बहुत बढ़िया पंचेस देखे हैं मगर शुरुआत फिर भी शानदार है । all the best

  2. चेहरे पर हंसी मिली,आगे लिखिए,हम रेगुलर पढ़ेंगे

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