An Old Debt To Settle Part 2

तिरंगा लगभग दस दिनों से दिल्ली की सड़कों पर नज़र नहीं आया था। परमाणु और शक्ति अपने कामों को बखूबी अंजाम दे रहे थे पर रात की कालिमा चढ़ते ही तिरंगा  जो ग्राउंड लेवल पर अपराध का खात्मा करता था उसकी बहुत ज्यादा कमी खल रही थी। और इस बात ने अपराधियों के हौसलों को दोगुना कर रखा था।
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चंडीगढ़ के रास्ते दिल्ली आने वाली सड़क पर अभी चहल पहल कम थी। एक नव दंपत्ति मनाली से घूम कर आ रहे थे । अचानक सड़क पर बड़े बड़े पत्थरों को गिरा देख उनको रुकना पड़ा। कार के रुकते ही चारों तरफ से गुंडों ने घेर लिया।

गनपॉइंट पर कार का दरवाजा खुलवा कर उनका बॉस बोला, ”क्या समझ रखे थे? सरजू दादा के इलाके से बिना टैक्स दिए निकल जाओगे?”

पति: जो लेना है ले लो भाई पर हमें जाने दो।

सरजू दादा: वो तो हम लेंगे ही। हाहाहाहा। छीन लो रे सब कुछ गुर्गों। और तू गाड़ी की चाभी इधर दे चिकने।

सरजू दादा कार की चाभी छीन लेता है।

एक गुंडा: सरजू दादा ये लौंडिया की अंगूठी नहीं निकल रही है।

सरजू दादा: खून खराबा तो मैं चाहता नहीं था पर अब कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है। काट दे उंगली ससुरी का।

अचानक पति ने गुंडो को धक्का दिया। “भाग अवनि भाग”, वो पत्नी का हाथ पकड़ कर भागा।
और पीछे से गुंडों की बंदूकें गरज उठीं। पर इससे पहले की उनको कोई भी गोली छू पाती हवा में सरसराती आयी एक ढाल जिसको देख के गुंडों के जेहन में भी सरसरी दौड़ गयी।
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“जब  भी कोई गोली बनना चाहेगी किसी निर्दोष का काल,
तब तब वहाँ उसे बचाने को पहुंचेगी  ये तीन रंगी ढाल।”
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और इसके साथ ही गुंडों की हँसी और धमकियाँ चीखों में बदलतीं चली गई।
सरजू दादा ने संभल के अपनी AK-56 राइफल का मुंह खोल दिया। पर गोलियाँ कब तिरंगा के लबादे को भी छू पायी हैं? तिरंगा ने करामाती नट की भाँति हवा में ही गोलियों को छकाते हुए सरजू दादा के थोबड़े पर ज़ोर से प्रहार किया जिससे उसकी नाक टूट गई।

सरजू दादा: आह! हमने तो सुना था तिरंगा ने क्राइम फाइटिंग छोड़ दी है। तुम कहाँ से आ गए?

तिरंगा: आंखों में वहशीपन लेकर निकलते हो जो तुम करने दंगा।
क्यों भूल जाते हो कि हर मोड़ पर खड़ा मिलेगा तुम्हे ये तिरंगा।
अब बता तुझे कैसे पता चला कि तिरंगा अब दिल्ली में सक्रिय नहीं है?

सरजू दादा: मुझे कुछ नहीं मालूम। हम सबको एक गुमनाम टिप मिली थी कि अब तिरंगा ने क्राइम फाइटिंग छोड़ दी है। इतने दिनों से तुम सक्रिय नहीं थे तो हमने भी मान लिया था।

तिरंगा: तिरंगा अब कहीं नहीं जाएगा। अब कोई कहीं जाएगा तो वो होगी सेंट्रल जेल जहाँ तुम जैसे अपराधी जाएंगे।

तिरंगा ने सबको बाँध कर पुलिस को कॉल कर दिया। और खुद वहाँ से निकल पड़ा।
वो रात अपराधियों के लिए कयामत की रात थी। हर गली-चौराहे, नुक्कड़ पर, बार में, क्लब में, रेव पार्टीज़ में तिरंगा पहुँच रहा था। अपराधियों को तोड़ कर बस एक ही सवाल कर रहा था, “किसने विश्विद्यालय के पास वाली बिल्डिंग को आग लगाई थी?”

तिरंगा पर पागलपन सवार था। मानसी की अकस्मात मौत ने उसके अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा दिया था।
गुरुग्राम के 7 बैरल ब्रू, सोई 7 पब, नई दिल्ली के ब्लूज़ क्लब, ब्लू बार, सूत्रा गैस्ट्रोपब और बहुत सारी रेव पार्टीज सब में आज हड़कंप मचा हुआ था। कोई भी तिरंगा के कहर से बचा नहीं था। अपराधियों में त्राहि त्राहि मची हुई थी। जॉन दादा, टुंडा भाई, पीटर दादा, असलम भाई, मंगल भाई सब पूरे गैंग सहित एक रात में ही पुलिस के हत्थे चढ़ गए थे। पर इस बार कुछ अलग था। इस बार कोई भी सही सलामत नहीं था। इस बार हर एक के हाथ पैर और दांत टूटे हुए थे। अंडरवर्ल्ड और गैंगस्टर्स को कहीं से भी तिरंगा बख्शने के मूड में नहीं था।

रात भर की खोज के बाद एक सूत्र तिरंगा के हाथ लगा। कोई दहाका नाम का अरसोनिस्ट दिल्ली में कदम रख चुका था। और एक गुंडे की ज़ुबान पर उसी का नाम आया था। तिरंगा को क्लू मिल चुका था। पर रात की कालिमा को धीरे धीरे सुबह की किरणें धो रही थी। और रात भर की मेहनत के बाद तिरंगा को आराम के साथ साथ प्लानिंग की भी ज़रूरत थी। वो वापस अपने नए बेस पर बूढ़े के भेष में पहुँच गया।

सुबह के 11 बज चुके थे। अभय सो कर उठ चुका था और अब उसको थोड़ी तैयारी करनी थी क्योंकि इस नए रोग खलनायक के बारे में वो कुछ नहीं जानता था। शिखा चाय और नाश्ता ले आयी थी। अभय पूरे दिन व्यस्त रहा बीच बीच में शिखा को निर्देश देता रहता। अभय ने इस बेस में मौजूद कंट्रोल पैनल को पूरी दिल्ली और एनसीआर के सीसीटीवी कैमरों से कनेक्ट कर लिया था। आज उसकी कंप्यूटर साइंस की डिग्री काम आ रही थी। उसने अपनी ढाल निकाली। उसकी हैंडल के पास मौजूद स्विच को दबाया तो सारे नेज़े बाहर आ गए। उसने क्षतिग्रस्त नेज़ों को बदला और हर ब्लेड के साथ अलग अलग टाइप के कैप्सूल संलग्न किये। और हर तरह के कैप्सूल के लिए हैंडल के पास एक बटन भी संलग्न कर दिया। तिरंगा की ढाल अब मामूली नहीं थी। एक खतरनाक हथियार बन चुकी थी।

शाम हो चुकी थी। अँधेरे ने आकाश को घेर लिया था। तिरंगा बहुत सी चीज़ों से लैस ग्रेटर नोएडा की तरफ बढ़ रहा था। उस गुंडे से मिली जानकारी के अनुसार दहाका बुद्धा स्टेडियम में ही छुपा हुआ था। तिरंगा ये समझ रहा था कि डायरेक्ट अटैक करना सही रणनीति नहीं है। वो बुद्धा स्टेडियम के कुछ दूरी पर ही एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया और वहाँ से नाईट विज़न दूरबीन की सहायता से अंदर की स्थिति का जायज़ा लेने लगा। उसे सब कुछ स्पष्ट नज़र आ रहा था पर कुछ संदेहास्पद नहीं नज़र आया। पर कुछ देर वहाँ बैठे रहने पर स्टेडियम के उत्तर-पूर्व दिशा में मौजूद फ्लड लाइट्स टावर के नीचे कुछ लोग संदिग्ध अवस्था में दिखे। तिरंगा इतनी दूरी से उनके होठों को पढ़ भी नहीं पा रहा था। उसने नज़र रखना ज़ारी रखा। कुछ देर बाद वो लोग टावर से हट कर एक कार्यालय नुमा मकान की तरफ बढ़ने लगे। तिरंगा बहुत ध्यान से उनकी हरकतें देख रहा था। वो सारे लोग अंदर घुस गए और दो हट्टे कट्टे गुंडे बाहर आकर पहरा देने लगे। तिरंगा उन लोगों के घुसते समय दरवाजे पर मौजूद लॉक का पासकोड डालते समय उनके उंगलियों की गतिविधि ध्यान से देख रहा था। अब ऊपर चढ़े रहने का कोई मतलब नहीं था।
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इसी वक्त एक अनजान जगह पर-

अजनबी: कर्नल मुझे संदेह हो रहा है तिरंगा कोई बड़ा गुल  खिलाने वाला है। उसपर पागलपन सवार है। कहीं वो हम तक ना पहुँच जाए।

एक्स रे: चिंता मत कीजिये। वो आप तक कभी नहीं पहुँच सकता। अरे जब इतने सालों तक उसे कोई अंदाज़ा नहीं हुआ तो आज क्या होगा।

अजनबी: पता नहीं। उसका ये रौद्र रूप आज तक नहीं दिखा। और उसने अपने परिवार को जाने कहाँ छुपा लिया है। हमारे हाथ का सबसे बड़ा ट्रम्प कार्ड उसका परिवार ही है कर्नल। उन्हें ढूंढो कहीं से भी। अपने संगठन को इस काम पर ही लगा दो।

एक्स रे: हाँ मैं अपने सबसे अच्छे एजेंट्स को इस काम पर लगाता हूँ। आप चिंता मत कीजिये।
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स्थान- बुद्धा स्टेडियम ग्रेटर नोएडा।
समय- रात के 11 बज चुके थे।

तिरंगा पेड़ से नीचे उतर कर स्टेडियम की तरफ बढ़ गया। स्टेडियम की चारदीवारी पर रस्सी अटका कर  तिरंगा ऊपर चढ़ गया। वहाँ कंटीली तारें लगी थी जिनमें शर्तिया विद्युत दौड़ रहा था। तिरंगा ने अपना न्याय स्तम्भ निकाला और ज़मीन पर पटकते ही उसने उस क्षेत्र की विद्युत ऊर्जा को कुछ देर के लिए सोख लिया। इतना समय काफी था तिरंगा के उन कंटीली तारों को पार करने के लिए। स्टेडियम के अंदर जगह जगह पर गुंडे पहरा दे रहे थे। एक ज़रा सी आहट सबको सतर्क कर सकती थी। हर जगह गुंडे जोड़ों में थे। एक जोड़े पर तिरंगा ऊपर से कूदा और दोनों के मुँह पर हाथ रख कर घुटने दोनो के सिर पर रखते हुए गिरा दिया। दोनों वहीं ढेर हो गए। उसने दोनों को अंधेरे में छिपा दिया। और एक जोड़े पर उसने एक कैप्सूल का बटन दबाते हुए ढाल फेकी। एक नेज़े से नर्व गैस का कैप्सूल फूटा और वो दोनों भी बेहोश हो गए। उनके शरीरों को भी उसने छुपा दिया। तीसरे जोड़े के पीछे छुपते हुए पहुँचा और दोनों के सिरों को लड़ाकर उनको भी मैदान से बाहर कर दिया। तिरंगा बहुत खामोशी से सबका सफाया करता जा रहा था। अब बस उस मकान के बाहर वो आखिरी दो गुंडे बचे थे। तिरंगा ने फिर एक बटन दबाते हुए ढाल फेकी। उससे विद्युत चुम्बकीय पल्स निकला जिसने न सिर्फ थोड़ी देर के लिए दोनों गुंडों को अंधा कर दिया बल्कि वहाँ मौजूद सीसीटीवी कैमरे को भी ध्वस्त कर दिया। तिरंगा लगभग उड़ता हुआ वहाँ पहुँचा और दोनों गुंडों को एक एक घूंसे में ही बेहोश कर दिया। अब रास्ता साफ था। उसने पासकोड डालने की कोशिश की। दूसरी बार में ही वह दरवाजे के अंदर था।

इधर उस मकान के अंदर-

एक गुंडा कंट्रोल रूम में बैठा ट्रांसमीटर पर चिल्ला रहा था, “कक्का, अब्दुल, बीपड़े, टिंडे, गोगे, गुरु, कहाँ मर गए सब? उफ्फ किसी से संपर्क क्यों नहीं हो पा रहा है?”

धड़ाम की आवाज़ के साथ दरवाजा टूटा और गुंडे की आंखों में खौफ बैठ गया।

“जितने बिछा रखे थे तुमने बाहर मुस्टंडे ,
सारे बेहोश पड़े हैं होकर लंगड़े और टुंडे।”

तिरंगा ने सीधे उसकी गर्दन दबोची और पूछा, “बता दहाका कौन है और कहाँ है?”

गुंडा हँसने लगा और बोला, “आखिर तुमने अपनी मौत को खोज ही लिया। हाहाहाहा।”

तिरंगा अगर तुरंत ही वहाँ से न हट जाता तो उस कांच के बल्ब का शिकार हो जाता जो ज़मीन से टकराते ही फूटी और आग की लपटें निकल उठी। तिरंगा ने पीछे मुड़कर देखा और उसकी आँखें सिहर उठी। भयानक, भयावह, डरावनी, लंबी चौड़ी आग की लपटों से घिरी आकृति खड़ी थी।

दहाका: तो तुम मुझे ढूंढ रहे थे तिरंगा? आज तक एक बात नहीं समझ आयी के गीदड़ की जब मौत आती है तो वो शहर की तरफ ही क्यों भागता है।

तिरंगा ने इतनी डरावनी आवाज़ कभी नहीं सुनी थी। पर वो भी न्याय और इंसाफ का योद्धा ऐसे ही नहीं था। उसने भी भयंकर हूंकार भरी,
“मौत तो सत्य है, वो आनी है उसे रोक पाया है कौन,
तय ये होना है यहाँ शहर कौन है और गीदड़ कौन।”

तिरंगा ने छलांग लगाकर एक उड़ती किक दहाका के चेहरे पर मारी और तुरंत ही उसे उसके नाम का मतलब समझ आ गया। तिरंगा के बूटों के रबर सोल्स गर्मी से पिघलने लगे थे। दहाका ने तुरंत सफेद फॉस्फोरस से भरी काँच के बल्ब तिरंगा की तरफ फेके और तिरंगा ने भी अपने ढाल का एक बटन दबाया और उसके नेज़ों से बहुत से कैप्सूल्स निकले जिन्होंने उन बल्बों से टकराकर न सिर्फ उन्हें हवा में ही फोड़ दिया बल्कि उनसे पैदा होने वाली आग को भी वहीं ठंडा कर दिया। इस प्रतिक्रिया से दहाका सन्न रह गया।

तिरंगा ने हँसते हुए कहा, “मुझे हर इस तरह के हमले की उम्मीद थी दहाका और इसलिए मैं पूरी तैयारी के साथ आया हूँ। ये कैप्सूल्स दो भागों में बंटे हुए हैं। ऊपर के भाग में क्लीन एजेंट FS 49 C2 भर हुआ है जो आग को ठंडा कर रहा है और उसके साथ ही दूसरा भाग फूट  जाता है जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड शुष्क बर्फ के रूप में भरी हुई है जो आग को बुझा देती है। तुम बच नहीं सकते दहाका।”

“अभी तो खेल शुरू हुआ है बच्चे।”, कहकर दहाका ने हाईड्रोजन से भरे बुलबुले तिरंगा पर हाई प्रेशर से छोड़े और अपने हाथ मे लगे पैनल से छोटा सा धमाका किया और सारे बुलबुले एक एक कर के फटने लगे। तिरंगा ने तुरंत ही अपने आप को अपने लबादे में ढक लिया। उसके एस्बेस्टस से बने लबादे ने आग को अपने ऊपर ही झेल लिया। यह देखकर दहाका गुस्से से आग बबूला हो गया और पागलों की तरह दाएं हाथ में लगे पैनल से आग छोड़ने लगा। तिरंगा कुछ देर तो उछल कूद कर के बच गया।

दहाका: कितनी देर बचेगा तिरंगा? तेरी मौत तो आज मेरे हाथ ही लिखी है।

तिरंगा ने आखिर में अपना न्याय स्तंभ निकाला और ज़मीन में धम्म से पटका और सारी आग की लपटें उसमें समा गयीं। तिरंगा ने अपनी ढाल को दहाका पर दे मारा और उसके नेज़ों से निकले दसों अग्निशामक कैप्सूलों ने दहाका के जलते हुए शरीर से भी आग की लपटें सोख ली और उसे काला कोयला बना डाला।

“ये न्याय स्तम्भ है दहाका। ये विश्वास की ऊर्जा से चलता  है। न्याय और सत्य के इस दंड में किसी भी तरह की ऊर्जा को सोखने की शक्ति है और उसे पलट कर वार करने की भी। अब बता क्या दुश्मनी है तेरी मुझसे।” कहकर तिरंगा ने उसपर लात घूंसों की बरसात कर दी।

दहाका: हाहाहाहा। तिरंगा मेरी तुझसे कोई दुश्मनी नहीं है। मैं तो बस एक कॉन्ट्रैक्ट किलर हूँ। अपने अतीत में झाँको तिरंगा। देखो तुमने क्या भूल की है। कौन सी ऐसी एक दरार छोड़ रखी है तुमने? क्या तुम्हें याद भी है तुम क्यों तिरंगा बने थे? याद करो सब कुछ क्योंकि आने वाले दिनों में तुम्हारा पूरा अस्तित्व खत्म होने वाला है।

यह कहकर दहाका बेहोश हो गया। तिरंगा सोच में पड़ गया। अगर दहाका होश में होता तो कुछ पूछ सकता था। पर अब उसे उसके होश में आने का इंतज़ार करना था। अचानक हवा में कुछ सरसराने की आवाज़ आयी औऱ तिरंगा एक पल के सौंवे हिस्से में ही अपनी जगह छोड़ चुका था। इसके साथ ही बहुत सारे तीर दहाका के शरीर में धंस चुके थे। उसने मौत की आखिरी हिचकी ली और शांत हो गया।

Written By- Pradip Burnwal

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17 Comments on “An Old Debt To Settle Part 2”

  1. वाह! शानदार! ज़बरदस्त! गर्दा!
    शुरू से लेकर अंत तक सिर्फ एक्शन ही एक्शन।
    शुरुआत में ये चीज़ बहुत अच्छे से बताई की दिल्ली को तिरंगा की भी सख्त ज़रूरत है।
    शुरुआत का एक्शन सीन भी गजब था। तिरंगा की शायरी बहुत तगड़ी थी।
    फिर हमे तिरंगा की तैयारियां भी देखने को मिली है। तिरंगा का जूनून देखने को मिला। मानसी की मौत ने उसपर सच में पागलपन सवार करा दिया है। क्या होगा अब दिल्ली के सभी क्रिमनल्स का? बेचारे अब अपनी टांगो और दांतों को बचाते फिरेंगे । हीहीही।
    तिरंगा सारी तैयारी करके पहुंचा बुद्धा स्टेडियम। और यहाँ तिरंगा को बिलकुल एक जासूस की तरह दिखाया गया है। उसका नाईट विज़न दूरबीन से देखना। उँगलियों की गतिविधियाँ देखना । ऐसा तो शायद Rc भी कभी न दिखा पाई हो।
    उसके बाद देखने को मिला एक्शन सीन । तिरंगा जो बारी-बारी से गुंडों के जोड़ों को मारता गया, काबिले तारीफ है। तिरंगा की ढाल तो अब विनाशकारी हथियार बन चुकी है। प्रदीप भाई इतना भयंकर लिखा कैसे। हमे भी बताइये। हीही।
    तिरंगा और दहाका का युद्ध तो सबसे गजब रहा है। और यहाँ हमे तिरंगा का वैज्ञानिक ज्ञान भी देखने को मिला । तिरंगा का वो कैप्सूल ज़बरदस्त लगा जिसमे आधे हिस्से में क्लीन एजेंट Fs 49 C2 और एक भाग में कार्बन-डाई ऑक्साइड शुष्क बर्फ के रूप में भरा हुआ था। गजब।
    दहाका के हाइड्रोजन से भरे बुलबुले भी खतरनाक थे। लेकिन इन सारी पॉवर्स के बावजूद वो तिरंगा से हार गया। हारना ही था। लेकिन वो तीर किसने चलाये थे जिसने दहाका की जान ले ली । मुझे लगता है वो जो कोई भी था। नेक्स्ट पार्ट में वही दिखने वाला है।

    पर एक बात-
    मुझे ये स्टोरी भी बहुत छोटी लगी। कुछ घटनाएं बहुत तेज़ी से भागती हुई लगीं। अभी दहाका और तिरंगा को और देर लड़ना था।
    खैर स्टोरी गजब है। पहली बार में इतना अच्छा शायद कोई न लिख पाये।

    मेरी ओर से 5 में से 4 स्टार ☆ ☆ ☆ ☆

  2. Wow meri story se lamba to tumhara review hai… Mujhe bahut khushi hui tumko pasand aayi itni… Main koshis me hoon k puri story suspense me hi rakhu.. Ek chiz shayd tumne miss kar di kyun ki tumhare review me uska discussion nhi dikha.. But it’s going to be very interesting.. Even I’m very excited while writing this… Thanks Talha

  3. Waah gajab pradeep bhai kafi achcha likha hai…
    Mujhe shuruat ki do shayri khas nhi jami…
    Balki shayri ki wajah se hi lagta hai tiranga bakwas bana rha rc me kyunki bahut kamjor aur ajibo garib shayri banayi hoti thi… Baad ki shayri thik hain achchi lagi hai… Lekin mai shayri pasand nhi karta waise tiranga par lekin ye uska style hai to sahi hai… Shayri achchi ho to maja aayega… Maut satya hai.. wali shayri mujhe bahut pasand aayi..
    Manali se chandigarh aayi sawari to gundo ko punjabi language ka hona chahiye tha ya haryanvi… Khne ka arth hai ye jyada jamti…
    Tiranga phli baar aapki story me hi detective lag rha hai… Iski aapki tarif ki jani chahiye aapne ek jasoos jaisa dikhaya hai use jo wo hai.
    Aapke dwara banaye gye action scene bahut hi gajab hain maja aa rha hai padhne me… Chahe wo dahaka tak pahunchne me raste me aane walegunde hain chahe khuf dahaka unko marne me use huyi chize aur action kafi badhiya hai…

    Mai to kahunga ab bhi speed kafi tej hai thoda explain kiya jaa sakta hai…
    Story is baar bhi chhoti hai..
    Aapne suspense bana ke rkha hai.. mujhe to ab ye janne ki utsukta hai ki akhir dahaka bhi mar gya hai to ab kaun hai asli villain…
    Dahaka to bhade ka gunda tha…
    Kaise pahunchega tiranga mansi ke katilo tak?
    Waah gajab saspense.
    Lekin jo bhi hai rc se badhiya story lag rhi hai… Thanks aisi story dene ke liye..
    All d best

    1. Dev bhai mujhe pata h non comic readers ko shayari hazam nahi hogi par ye RC ka character hai aur iski stories me shayari rahi hain to dalni padi
      Aur I guess meri shayari ko jo bhi thi usko behtar banaya editor sahab ne
      Baki maine koshish to ki hai pichhli galtiyon ko sudharne ki
      Story lambi to likhta hu pata nahi chhoti kaise ho jati hain padhte waqt
      Is bar action bharpur dena tha kyun ki tiranga ki khoj zari ho chuki h
      Tiranga ek detective hero hai to iski kahani suspenseful banani hi thi
      Aur main puri koshish karunga events ko aur describe karne ki
      Aur kahani ka ant bahut jabardast ho ye koshis karunga
      Ek chiz maine dekha h k sare reviews me ek chiz kisi ne note nhi ki hai
      Hopefully koi note kare us baat ko
      Thanks for such review

  4. Bht hi jabarajast
    Shayari to aapne ekdum gajab likhi hai.
    Last part me suspence bhi badh gaya hai.
    Keep it up

    1. Thank you mam
      It feels good k meri likhi story pasand ki ja rahi hai
      Maine nhi socha tha k ek serious story ki reader ko attract kar payegi itna
      Hoti hain achhi stories but unke writers badhiya hote hain
      Aur maine expect nhi kiya tha itna achha response
      Hopefully aage k parts aur behatar bane
      Aur suspense bana rhega
      Kafi kuch judte jayenge abhi

      1. सबसे पहले तो मैं लेखक महोदय को बधाई देना चाहूंगा कि उन्होंने इतने कम समय में अपनी कहानी का दूसरा भाग प्रकाशित कर दियाI मैं तो इतने कम समय में कभी भी अपनी कहानी ना लिख पाऊंI

        आते हैं कहानी परI कहानी की रोचकता और ज्यादा बड़ी है पिछले साल के मुकाबले इस भाग में तिरंगा का जो भोकाल दिखना चाहिए वह दिखाl तिरंगा को इस भाग में बहुत अच्छे से दिखाया गया है जितना खौफ मुजरिमो के अंदर उसका होना चाहिए में ठीक वैसा ही दिखाया गया है।

        अब भाग कि कुछ पॉजिटिव बातों पर बात की जाए । इस भाग का लंबाई पिछले भाग से काफी अधिक है जो कि देखकर अच्छा लगा। कहानी में तिरंगा के गैजेट्स को जिस ढंग से दिखाया और सज़मझाया गया है इस बात के लिए मैं लेखक की तारीफ करना चाहूंगा ।लेखक ने बहुत ही अच्छे ढंग से तिरंगे के गैजेट्स जिनके बारे में हमें अपनी जानकारी नहीं थी उस को दिखाया है तिरंगा के ढाल लबादे न्यायस्तम्भ और उसके बाकी गैजेट को अच्छे ढंग से दिखाया गया । इस भाग में लेखक ने एक्शन का भरपूर डोज दिया है ।एक्शन सीन लिखना किसी भी लिखा के लिए बहुत मुश्किल होता है मगर मैं लेखक की तारीफ करना चाहूंगा कि उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में काफी अच्छा लिखा ।उन्होंने एक हर चीज़ को बहुत अच्छे से समझाया मुझे पढ़ कर अच्छा लगा ।साइंटिफिक ज्ञान भी बहुत अच्छे से दिया गया है।लेखक ने इस भाग में भी रोचकता को बनाए रखा है।पिछले भाग के मुकाबले इस भाग में शब्दों का चयन बेहतर था

        अब बात करते हैं उन पहलुओं पर जिन पर सुधार की गुंजाइश है हालांकि लेखक ने इस बात को लंबा किया मगर फिर भी यह भाग काफी छोटा है लिखित में हुआ सुधार करें और अगला भाग इस से भी लंबा जाएं। लेखक को अपने शब्द चयन पर अभी थोड़ा और ध्यान देना चाहिए । कुछ शब्द अभी भी गलत तरीके से लिखे गए थे।इस भाग में मुझे सबसे बड़ी गलती यह लगी कि पिछले भाग में जो अभय के परिवार को दिखाया गया इस भाग में उसके परिवार को बिल्कुल भी नजरअंदाज कर दिया गया उनका थोड़ा रोल तो होना ही चाहिए था जिससे कि कहानी की निरंतरता बनी रहे। खैर यह भी हो सकता है कि लेखक के दिमाग में कुछ और चल रहा हो।और हां अजनबी के कैरेक्टर में अचानक से वदलाव लगा पिछले भाग में जहां वह एकदम टशन मैं लग रहा था इस भाग मैं थोड़ा डरा हुआ सा लगा।

        अंत में यही कहना चाहूंगा कि कहानी बहुत अच्छी लग रही है।रोचकता अभी भी बनी हुई है अगले भाग का इंतजार रहेगा।

        1. Tripathi ji bas aapke review padh k hi dimag ki batti jalti hai.. Shabdo wala gyan thoda lena hi padega aapse. Kayi bar aisa bhi hota h k koi shabd jehan me hota h par zubaan par nhi aa pata.. Action scenes actually kathin pad raha tha kyun ki kaisi picture me dikha sakte hain waise shabdo me nhi dikha pate
          Is part me sirf action jyada tha isiliye pariwar ko nhi dikhaya tripathi ji
          Plus ek chiz main isme dalta lekin wo next part me repeat bhi karna hai to fir readers ko maza nhi aata
          Shayari ka thoda gyan aapse lena padega kyun ki tiranga ki story me shayari to rakhni hi padegi
          Ajnabi bahut interesting character hai tripathi ji aur bas itna zarur bolunga k ye puri kahani usi k aaspas ghumti rahegi
          Koshis karunga lambi karne ki
          Thode sanwad k ideas aapse lene padenge
          Bahut bahut dhanyawad tripathi ji for the review

  5. Kya baat ,, kya baat….

    Bhai to writer ho gaya…

    Good story….keep good writing….

    Bahut hi umda story hain ….

    Aab thoda suspense badhana hain bus uske baad….to garda…hain…

    1. Thanks dheeraj ji
      Aur bhi suspense dalu??
      Thik hai aap kahte hain to next part me aur suspense dekhne milega

  6. Very interesting aur shayari mujhe achi lagi kyuki tiranga ki story me vo honi cahiye, tiranga ki dhaal ka use aur bhi mast laga yahan thodi dhruv ki jhalak aa gayi jis tarah usne dahaka ko haraya, sath me jasusi mode acha laga uska, dahaka ne Jo kaha usse mujhe doubt ho raha ki is kahani ka villain “hawaldar” to nahi Jo tiranga ki pita hain kyuki unko Hi pata h abhay ka tiranga banne ka maksad

    1. Shshsh mere aage k parts me kuch rahne bhi doge k nhi.
      Tumse bach k rahna padega
      Guess karte raho abhilash
      Next part jaldi hi lane ki koshis karunga

  7. बहुत बढ़िया प्रदीप जी।
    यह पार्ट पिछले भाग से बड़ा और मुझे उम्मीद है कि अगला वाला इससे भी बड़ा होगा।
    बात करें कहानी की तो वह बहुत ही रोचक है।
    अपनों के मरने पर हीरोज का उग्र स्वभाव का हो जाना भी लाजिमी है।
    पर आखिर कौन है इन सबके पीछे।
    आखिर क्या छुपा है तिरंगा के अतीत में?

    1. Is part me kafi chize to thi guess karne wali but abhi tak reviews me aisa kuch samjh nhi aaya mujhe
      But that’s better for me
      It means suspense jyada h
      Akash guess karo bahut maza aane wala hai
      Abhi khel khatrnak hone wala hai
      Next part me tiranga k atit k kuch panne dekhne milenge sabko

  8. Gurudev to sach mein writer bn gye …..
    Mtlab kya likha h….
    Main ese hi tiranga ka fan nhi….
    Wo ek acha detective h yh to pata tha
    Pr itna aggressive mene usko kbhi b nhi dekha….
    (Ho skta h ki kisi comics mein esa ho pr mene pdha nhi )
    Itne gusse mein b bande ne focus nhi khoya ….
    Yh dahaka se mujhe zyada expectation thi..
    Fight bahut mamuli lgi. thodi der aur khich skti thi….
    Ek baat ki tareef krna chahta hn ki aapne pace bahut badiya banayi h story mein… Mtbal ek second k liye b mujhe kuch aur sochne nhi de rhe ….
    Story baandhti h last tk
    Shayari achi h pr mujhe zyada pasand nhi aayi

    1. Bilkul utkarsh
      Next part me maine yahi koshis ki h
      Actually pahli bar h to mujhe length ka idea nhi lag raha tha
      Likhte time lamba lagta h but padhte time kam
      Fir logo ne btaya k likhne k bad bar bar padho
      Scenes ko conversations ko expand karo
      To ab wahi kar raha hu
      Dahaka bahut khatrnak villain to banaya but tiranga totally taiyar hokar aaya tha har chiz k liye
      Ye baat bhi sach h k main itna dikha nhi paya
      Time k sath sikh jaunga
      Bas tumlogo ko aise hi pasand aati rahe to main bhi aalas chhod k likhunga

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