Ant Hi Prarambh hai

अंत ही प्रारम्भ है

 

पहाड़ो को ऐसे ही नही स्वर्ग कहा जाता,

वहां सुंदर नदियां भी होती हैं, सुंदर झरने भी होते हैं।

होती हैं तो ऊँची ऊँची पहाड़ियां जिनमे रहते हैं सुंदर पेड़ हरे भरे पेड़।

वो ऊँचे ऊंचे पहाड़ों पर पड़ रही सूरज की किरणें जो पेड़ो से छनकर जब धरती पर पड़ती है तो बहुत ही विहंगम दृश्य नजर आता है।

लेकिन पहाड़ो की सुंदरता केवल यहीं तक सीमित नही है।

पहाड़ो में बहता है एक सुंदर प्रेम रस जिसमें पेड़ पौधे पशु पक्षी मंत्रमुग्ध रहते हैं और पहाड़ो के जंगल को भी अद्भुत प्रेम के आवरण में ढक देती है।

जब जंगल और पहाड़ में प्रेम रस बह रहा हो तो मनुष्य ही इससे अछूता कैसे रह सकता है।

 

पेड़ो की झुरमुट में ऐसे ही प्रेम में सराबोर एक प्रेमी जोड़ा प्रेम रस में डूबा हुआ है।

वेशभूषा से ये कोई जंगली कबीले वाले दिख रहे थे। प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे को निहार रहे थे, जैसे वर्षों से उन्होंने एक दूसरे को देखा तक न हो किन्तु यही तो प्रेम है।

प्रेमिका की गोद मे सिर रखे प्रेमी ने चुप्पी को तोड़ते हुये कहा-

“प्रीति आखिर कब तक हमें ये समय देखना होगा? क्या इसका कोई अंत नही है?”

 

प्रीति- देवांश तुम समझने का प्रयास करो अगर ये सब मेरे या तुम्हारे हाथ मे होता तो क्या आज यह दशा होती हमारे प्रेम की?

 

देवांश उठ बैठा और निश्छल प्रेम से प्रीति की आँखों मे आंखे डालकर बोला-

देवांश- क्या कोई उम्मीद नही है? क्या यही अंत है?

 

प्रीति जानती थी कि उसके पास देवांश के किसी भी सवाल का जवाब नही था और न ही वो देना चाहती थी।

 

प्रीति- मुझे जाना है बाबा मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।

 

देवांश- क्या जो मेरे प्रेम की प्रतीक्षा है उस ओर कोई कर्तव्य नहीं तुम्हारा? हर एक क्षण जो मेरा हृदय तुम्हारा नाम लेता है वो नाम नहीं सुनायी देता तुम्हें?

 

प्रीति की आँखों में आँसू बह रहे थे।

 

देवांश- मुझे तुम्हारी हृदय गति महसूस हो रही है, सुन सकता हूँ कि तुम क्या सोचती हो। फिर ये निर्णय क्यों?

 

प्रीति- मैं भी मजबूर हूँ। मुझे दूर जाना ही होगा तुमसे। तुमसे दूर रहकर मैं जीवित नहीं रह सकती और न ऐसा चाहती हूँ।

 

देवांश- तो क्यो जाना चाहती हो दूर?

 

प्रीति- मेरे प्रेम के लिए।

 

देवांश- मुझसे दूर ये कैसा प्रेम है?

 

प्रीति- तुम कुछ नही जानते।

 

देवांश- मुझे जानना भी नही है। यदि जीवन और मृत्यु तुम्हारे साथ नही है तो फिर जीवन जीवन नही और मृत्यु मृत्यु नहीं। ये महत्व नही रखता कि गांव वाले क्या सोचते हैं? उन्हें जो करना है करने दो, तुम मेरे साथ हो फिर कोई डर नहीं।

 

प्रीति- लेकिन मुझे डर है। हर एक क्षण का डर, तुमसे अलग होने का डर।

 

देवांश- मैं तुम्हें नहीं छोड़ रहा हूँ और न ही दूर जा रहा हूँ।

 

कुछ ही दूरी पर कुछ आवाजें आ रही थी जिसने उन दोनों का ध्यान भंग किया।

 

प्रीति- तुम चले जाओ यहाँ से (प्रीति की आँखों मे अनजाना भय साफ दिख रहा था)।

 

देवांश- मुझे कहीं नही जाना तुमसे दूर।

 

प्रीति- गांव वाले आ रहे हैं, चले जाओ यहां से।

 

प्रीति की आँखों से अब आंसुओ की बाढ़ सी आ गयी थी।

देखते देखते गांव वाले बिल्कुल पास आ गये थे।

 

प्रीति- अब भी समय से चले जाओ यहाँ से। सुबुक सुबुक।

 

देवांश- नहीं मैं नही जाऊँगा। जो भी हमारे भाग्य में होगा वो मिलेगा, डर के जाने से कुछ प्राप्त नही होगा। यदि अंत समय आ गया है तो मुझसे गले मिल जाओ और मुझे ऐसे ही विदा करो।

 

प्रीति- नहीं तुम्हे कुछ नही होने दूँगी।

 

प्रीति और देवांश गले मिल जाते हैं और इतने में गांव वाले भी आ जाते हैं।

एक भारी आवाज से प्रीति और देव अलग होते हैं।

“प्रीतिलता तुम्हें पहले ही चेतावनी दी गयी थी कि इस पापी से दूर रहना। फिर क्यों नही माना तूने मेरा आदेश?”

 

प्रीति- बाबा मुझे इससे दूर नहीं रहना और इसने कुछ नही किया ये निर्दोष है।

 

बाबा- तू ऐसे नहीं मानेगी। (गांव वालों की ओर इशारा करके) इसे अलग करो इससे।

 

गांववाले दोनों को अलग करते हैं।

देवांश- नही नही उसे कुछ मत करना । मुझे चाहे जो भी सजा दो।

 

बाबा- तुझे ही तो सजा देंगे और रही बात इसकी तो मेरी बेटी है तो क्या हुआ कबीले के सभी लोगो के लिए सजा एक जैसी है इसे भी सजा दी जाएगी।

 

प्रीति- जो भी सजा देनी है साथ दो।

 

देवांश- उसे छोड़ दो ।

 

बाबा एक जोरदार थप्पड़ देवांश पर मारता है।

 

बाबा-तेरी इतनी हिम्मत की तू चिल्लाए। (गांववालों से) इसे कुछ सबक सिखाओ।

 

गांव वाले देवांश पर टूट पड़ते हैं। कुछ ही देर में देवांश लहूलुहान होकर जमीन पर पड़ा हुआ था। उसके हाथ पैर टूट चुके थे और खून भी काफी बह रहा था।

 

देवांश- आह! आह!

 

प्रीति- नहीं। सुबुक सुबुक। ऐसा क्यों कर रहे हो तुम लोग।

उसने कुछ नहीं किया है।

 

इस बार बाबा एक थप्पड़ प्रीति को मारते हैं और प्रीति के मुँह से खून निकल आता है और वो जमीन पर गिर पड़ती है। ये देखकर हर गांववाला स्तब्ध हो जाता है।

 

कुछ वर्षों पूर्व-

 

मुंगेर गांव की जान कही जाने वाली एक छोटी सी नदी बिंदाल जहाँ हर आस पास का गांव वाला अपनी प्यास बुझाने आया करता था।

हर दिन की तरह ही गांव की एक बुढ़िया जिसका न पति था न बच्चे, पानी लेने नदी आयी थी।

जब वो पानी भर रही थी तभी उसे नदी किनारे झाड़ियों में हलचल सुनायी दी।

वो दबे कदमों से घबरायी हुयी उस ओर बढ़ने लगी, जैसे जैसे वो नजदीक गयी उसे एक महिला की आवाज सुनाई देने लगी।

बुढ़िया झाड़ियां हटाती हुयी महिला तक पहुंची।

महिला को देखकर बुढ़िया की चीख निकल गयी। महिला के शरीर के हर अंग से खून रिस रहा था, सम्भवतः महिला को किसी ने बड़ी बेरहमी से पीटा था।

महिला ने जैसे ही उसे देखा वो बदहवास सी भागने की कोशिश करने लगी।

 

बुढ़िया ने जैसे तैसे खुद को संभाला और महिला को समझते हुए बोली-

“डरो मत बेटी डरो मत।”

“तुम्हे डरने की जरूरत नही है मैं तुन्हें कुछ नहीं होने दूंगी।”

 

महिला को जैसे कि विश्वास ही नही हुआ कि कोई उसकी सलामती की बात कर रहा था।

महिला सुबकती हुई खुद को घसीटती हुई भागने की कोशिश फिर से करने लगी।

 

बुढ़िया उसकी हालत देखकर खुद भी रोने लगी और महिला के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखकर उसको रुकने का इशारा करने लगी।

 

महिला इस स्थिति में भी नहीं थी कि वो कुछ बोल पाती।

महिला को अब ये लगने लगा था कि बुढ़िया उसे नुकसान नही पहुँचाएगी।

 

जब महिला कुछ शांत हुई तो बुढ़िया ने पूछा-

“बेटी तू कौन है?”

“कहाँ से आयी है?”

 

महिला ने इस बार भी कुछ नहीं कहा। वो बस अपने पल्लू को समेटते हुए अपने सीने से बार बार लगा रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे उसने कुछ छुपाया हो।

 

बुढ़िया ने फिर पूछा-

“क्या छुपा रही हो बेटी?”

“क्या है पल्लू के नीचे?”

 

महिला कुछ नही बोली उस पर धीरे धीरे बेहोशी सी छा रही थी। वो कुछ देर सोच में पड़ गयी।

वो बदहवास सी अचानक ही इधर उधर देखने लगी।

उसे देखकर ये लगने लगा कि शायद जैसे उसे अब अपने घावों की कोई परवाह ही न हो, उसने डरते हुए आने पल्लू को हटाया तो उसके अंदर एक कुछ ही महीने का बच्चा था जो शायद बेहोश हो गया था।

बच्चे को हरकत ना करता देखकर महिला पागल सी हो गयी थी। उसे ये लगने लगे गया था कि बच्चा मर गया है।

 

बुढ़िया ने जैसे ही बच्चा देखा उसे प्रकृति पर क्रोध आने लग गया। बुढ़िया को भी लगा कि बच्चा मर गया है।

 

महिला ने बच्चे को जमीन पर रखा और उसके हाथ पैर हिलाकर ये देखने लगी की बच्चा जिंदा है या मर गया है।

उसकी हालत एक पागल के जैसे हो गयी थी। एक तरफ से उसके आँसू लगातार बहते जा रहे थे और एक तरफ वो अपने बच्चे को हिलाये जा रही थी।

 

बुढ़िया ने बच्चे को अपनी गोद मे उठाया और उसे सही से देखा तो उसे महसूस हुआ कि बच्चा बस बेहोश हुआ है मेरा नही है।

बुढ़िया ने महिला से कहा कि-

“बेटी रो मत बच्चा जिंदा है, जिंदा है बच्चा।”

 

बुढ़िया के मुँह से बच्चे को जिंदा है जानकर महिला को जैसे सुकून मिल गया था।

उसने बच्चे को अपनी गोद मे लिया और बच्चे को अपनी छाती से लगाकर लेट गयी और भारी भारी सांसे लेने लगी।

 

कुछ देर ऐसी ही शांति छायी रही। फिर बुढ़िया को ऐसा महसूस हुआ कि जैसे हवा ने चलना बंद कर दिया हो, नदी ने बहन बन्द कर दिया हो, समय मानो रुक से गया है।

बुढ़िया ने नजर महिला पर मारी तो वो शांत हो चुकी थी।

बच्चा अब होश में आ चुका था और वो जोर जोर से रो रहा था जैसे अपनी माँ को पुकार रहा हो लेकिन उसकी माँ अब उसे कभी जवाब नही देने वाली थी।

 

बुढ़िया ने रूँधे गले से बच्चे को उठाया और उसे अपनी गोद मे ले लिया।

उसी समय कुछ लोगों की आवाज आने लगी जो उसी रास्ते से आ रहे थे शायद जिस रास्ते से वो महिला आ रही थी।

बुढ़िया ने जल्दी से अपना मटका और बच्चे को उठाया और महिला को वहीं उसी के हाल पर छोड़ती हुई तेज कदमों से अपने घर की ओर चली गयी।

 

कुछ ही देर में नदी के किनारे कुछ गांव वालों की भीड़ नजर आने लगी।

कुछ देर इधर उधर कुछ ढूंढने के बाद वो महिला को लेकर चले गए।

 

बुढ़िया तब तक घर पहुँच चुकी थी उसने बच्चे को अपनी एक छोटी सी झोपड़ी में ले गयी। बुढ़िया की झोपड़ी गांव से थोड़ी दूर थी जो बच्चे को रखने के लिए सबसे अच्छी जगह भी थी। बुढ़िया बच्चे को सुलाकर  और उसके लिए दूध का इंतज़ाम करके अपने दैनिक कामों को बिना निपटाए पूरे दिन घर मे ही रही।

उस दिन गांव में हर जगह हल्ला और अफरातफरी ही फैली रही।

शाम होते होते कुछ माहौल शांत से हुआ।

 

बुढ़िया भी अपनी झोपड़ी से बाहर निकल आयी। उसने गांव के ही एक आदमी से पूछा कि आज इतना हो हल्ला क्यों हो रहा है?

 

गाँववाला- अरे अम्मा आज सुबह गजब हो गया! तुम कहाँ थी दिन भर? यहां आज सुबह नदी में एक डायन आयी थी सुनने में आया है उसने कोई जादू टोना किया है। मुखिया बाबा ने कहलवा दिया है कि अब कोई भी नदी में नही जाएगा।

 

बुढ़िया पहले तो डर गई लेकिन बाद में अनजान बनती हुई पूछने लगी-

बुढ़िया- डायन! कौन थी वो? कहाँ से आयी थी?

 

गाँववाला- अरे अम्मा। पास के किसी गांव की थी। मुझे ज्यादा तो नही पता लेकिन सुना है कि आज सुबह ही नदी के किनारे उस डायन की लाश मिली थी। उसका बच्चा नदी में बह गया था और पास के ही जखेड़ गांव वालों को बच्चा तो नही मिला लेकिन डायन को गांव वालों ने उसे नदी से उठाकर गांव के बीचों बीच आग लगा दी थी।

 

बुढ़िया- हे राम! अब क्या होगा डायन तो मर गयी है फिर इतनी अफरा तफरी क्यों अब?

 

गाँववाला- अरे अम्मा क्या तुझे याद नहीं है कि मुखिया के घरवाली के बच्चा होने वाला है। इसीलिए सब दर रहे हैं कि कहीं डायन की छाया उसपर ना पड़ जाए। मैं भी मुखिया के घर जा रहा हूँ, बाद में आता हूँ। तू भी चल।

 

बुढ़िया- नहीं बेटा आज सुबह ही अपने दूर के रिश्तेदार के यहां से आयी हूँ तो थक गई हूं। तू जा और भगवान करे सब सकुशल होगा।

 

गाँववाला चला गया और बुढ़िया के मन मे कई सवाल छोड़ गया।

बुढ़िया झोपड़ी के अंदर आकर एक कोने में बैठ गयी और सोचने लगी।

बुढ़िया- ये बच्चा डायन का है जरूर ये पूरे गांव को खा जाएगा अब क्या होगा! लेकिन अगर वो लड़की अगर डायन नही हुई तो! क्या पता गांव वालों को गलतफहमी हो गयी होगी। मैंने भी देखा है उसे क्या हालत थी बेचारी की, कौन डायन करती है अपने बेटे की इतनी परवाह! न न वो डायन नही है और न ये बच्चा मनहूस होगा! लेकिन अगर हुआ तो?

 

बुढ़िया अपने आप से ही सवाल करती जा रही थी। बुढ़िया एक बड़ी उलझन में फंस चुकी थी जिसका जवाब उसे खुद ही ढूंढना था।

 

बुढ़िया- नहीं नहीं भगवान ने मुझे एक सहारा भेजा है इसे ऐसे ही नही जाने दे सकती। ये मेरा उद्धार करने ही आया है। ये ना मनहूस है और ना ही डायन का बेटा। ये देवता ने भेजा है मेरे पास देवों का अंश है ये। हाँ देवो का अंश “देवांश” है ये। इसे अपने से अलग नहीं करूँगी अब चाहे जो भी हो।

 

बुढ़िया ने तो अपना मन बना लिया था और बुढ़िया का मन अब शांत था लेकिन कहीं और अब भी अशांति थी।

 

मुखिया का घर-

 

मुखिया का घर एक सीध में तीन कमरों से बना था। और उसके ऊपर ही तीन कमरों की एक मंजिल भी चढ़ी थी। जिसपर लकड़ी के नक्काशीदार जंगले से घेरे बंदी की थी।

निचले कमरे में मुखिया की पत्नी प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी।

मुखिया गांववालों से घिरा पत्थर को सुंदर ढंग से सजाए हुए आंगन में टहल रहे था।

मुखिया के चेहरे पर बनते बिगड़ते भावो को आराम से देखा जा सकता था।

 

गांववालों में से एक बुजुर्ग मुखिया से बोले- मुखिया जी क्या आज जो भी हुआ और ये सब हो रहा है! क्या ये ठीक है?

 

मुखिया- चुप रहो तुम लोग। वो डायन हमारे गांव की नही थी और न जाने कितनी डायनें रोज मरती होंगी।

 

बुजुर्ग- लेकिन मुखिया जी गांववालों की भलाई….!

 

बुजुर्ग कुछ बोल भी नही पाए थे कि मुखिया ने उन्हें टोक दिया।

 

मुखिया- आप लोग यहां आए धन्यवाद लेकिन फालतू बातें बोलनी हैं तो आप चले जाओ।

 

इतने में बच्चे की किलकारी से पूरा घर गूँज उठा।

दाई बाहर आयी और बोली-

“सुरेंद्र जी आपको लड़की हुई है।”

 

मुखिया के शरीर पर जैसे सांप लोट गया था । मुखिया के साथ साथ पूरे गांववाले भौंचक रह गए।

अब धीरे धीरे आपस मे गांववाले बात करने लग गए।

जिन्हें मुखिया की एक आवाज ने चुप करा दिया-

“चुप हो जाओ मेरी बच्ची नया सूरज लाएगी और गांव को उजाले से भर देगी।”

 

वहीं गांव के मुख्य मंदिर के पुजारी जी भी आये थे।

पुजारी- मुखिया जी इसका जन्म बहुत अशुभ घड़ी में हुआ है ये लड़की बहुत तबाही लाएगी इसे खत्म कर दीजिए।

 

पुजारी की बात सुनकर मुखिया की आंखे गुस्से से लाल हो गयी।

मुखिया- पुजारी अपनी जीभ सोच समझ कर चलानी चाहिए। मेरी बच्ची प्यार का पैगाम लायेगी और ये गांव की खुशहाली का प्रतीक बनेगी। प्रीतिलता नाम होगा इसका। आप सबका धन्यवाद अब आप सभी लोग जा सकते हो।

 

मुखिया से ऐसी बेज्जती सुनकर सभी काफी दुखी थे और गुस्से में भी।

हर तरफ मुखिया की बातें ही थी जिसने डायन की खबर तक को दबा दिया था।

लेकिन लोगो के मन में प्रीतिलता के बारे में अब डर होने लगा था।

 

सुबह जहाँ हर ओर मुखिया की ही चर्चा थी वही एक जगह ऐसी भी थी जहाँ किसीको मुखिया की बेटी और मुखिया से कोई सरोकार नही था।

वो जगह थी बुढ़िया का छोटा सा घर-

 

बुढ़िया अभी बच्चे को अपने साथ खिला रही थी, घर बच्चे की आवाजों से गूंज रहा था और ये गूँज घर की दीवारों से भी बाहर जा रही थी।

उस रास्ते तक भी जहां लोग आवाजाही करते थे।

 

एक औरत दूसरी औरत से- ये क्या हो रहा है? बुढ़िया के घर से बच्चे की आवाज? ये बच्चा कहाँ से आया?

 

दूसरी औरत- मैं भी सुन रही हूँ आवाज। कहीं ये बुढ़िया दूसरे का बच्चा तो नहीं चुरा लायी?

 

पहली औरत- जो डायन मरी थी कल ये बच्चा उसका तो नहीं?

 

कुछ ही दिन में ये बातें केवल गांव वालों तक ही नही बल्कि मुखिया तक भी पहुँच गयी और उसने बुढ़िया को अपने पास बुलाया। बुढ़िया जल्द ही मुखिया के घर पर थी।

 

बुढ़िया ने मुखिया को प्रणाम किया और मुखिया ने बुढ़िया से कहा-

“अम्मा ये मैं क्या सुन रहा हूँ? आजकल तुम्हारे घर से एक बच्चे की आवाज आ रही है कौन है ये बच्चा? और किसका है?

 

बुढ़िया- मुखिया जी ये मेरे दूर के रिश्तेदार का बच्चा है। इसका अब कोई नही है तो मैं ले आयी अपने घर।

 

मुखिया- वो सब ठीक है लेकिन कहीं ये उस डायन का बच्चा तो नही?

 

बुढ़िया- नहीं मुखिया जी ये बच्चा मेरे रिश्तेदार का था अब मेरा है।

 

मुखिया- देख लो। लेकिन ध्यान रहे अगर ये बच्चा डायन का हुआ तो गाँव का बहुत बुरा हो सकता है।

 

मुखिया डायन वाली बात बढ़ाना नहीं चाहता था तो उसने बुढ़िया को जाने दिया।

 

बुढ़िया मुखिया के घर से अपने घर आ गयी लेकिन साथ मे बहुत सारी चिंता भी ले आयी।

धीरे धीरे दिन बीतते गए और फिर साल।

 

आज भी गांव वाले देवांश को डायन का बच्चा ही मानते थे जिस कारण वो गांव से दूर ही रहा, कोई न उससे खेलने आता और न ही वो किसी से खेल पाता।

 

17 साल बाद-

 

बुढ़िया अपनी आखिरी साँसे लेती हुई पुरानी टूटी हुई खाट पर पड़ी थी। जिसपर बमुश्किल एक गद्दा था जो जगह जगह से फटा हुआ और जिसपर चादर भी नहीं थी। उसके तकिये की ओर देवांश खड़ा था।

बुढ़िया अपने कांपते हुए हाथों से इशारा करके देवांश को अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा-

“बे….बे…टा। तुझे याद है ना खों….खों… जो भी मैंने तुझे समझाया था… ठीक….ठीक…ऐसे….ऐसे ही करना…”

बुढ़िया के इतना कहते कहते उसकी आँखें एकदम से बंद हो गयी।

उसके हाथ एकदम से छटक कर निढाल हो गए।

देवांश की आँखों में न आँसू थे न ही चेहरे पर कोई भाव।

लेकिन उसका मन बहुत दुःखी था और होता भी क्यों न उसके जीवन का एकमात्र सहारा जो थी बुढ़िया।

 

वर्तमान-

गांववालों की असहनीय मार से देवांश जमीन पर गिरा पड़ा था। गांववालों ने उसे घेरा हुआ था।

उसके ही सामने प्रीतिलता खड़ी थी जिसके मुँह से खून बह रहा था।

गांव का मुखिया-

“प्रीतिलता अभी भी मान जा ये लड़का सही नहीं है।”

 

प्रीतिलता- नहीं बाबा मुझे देवांश के साथ ही रहना है। आप लोग हमें अकेला छोड़ क्यों नहीं देते। क्यों जान के दुश्मन बन हुए हैं आप मेरे।

 

मुखिया को बहुत गुस्सा भी आता है लेकिन वो मनमसोस कर रह जाता है।

मुखिया- तू बेटी है मेरी कैसे छोड़ दूं तुझे?

 

प्रीतिलता- छोड़ दो बाबा मैं खुश हूँ बिना आपके भी।

 

मुखिया- बेटी इतनी अंधी मत हो कि तू भूल जाये सही गलत। क्या याद नहीं तुझे की तू जब पहली बार मिली थी इसे तो क्या देखा था तूने? बेटी ये हैवान है काल है ये गांव के लिए।

 

प्रीतिलता- हाँ बाबा याद है मुझे। हर एक बात याद है। तब आपकी तरह मैंने भी इसे गलत समझा था। वो सुबह कभी नही भूल सकती बाबा।

 

कुछ महीनों पहले-

 

अपनी माँ के मरने के बाद मुखिया का एकमात्र सहारा प्रीतिलता थी। जिसे उसने कभी कोई कमी नहीं होने दी गांववालों ने हमेशा उसको डायन की नजर से ही देखा लेकिन मुखिया ने उसे हमेशा इन सब से दूर ही रखा।

हमेशा अकेली रहने वाली प्रीतिलता हर दिन की तरह ही सुबह सुबह उठकर टहलने के लिए निकली थी। ज्यादातर वो बस कुछ ही दूर जाती थी लेकिन आज उसने सोचा था कि क्यों न नदी से पानी भरकर वो खुद ही ले आये और बाबा को खुश कर दे।

प्रीतिलता गुनगुनाते हुये बिंदाल नदी के नजदीक पहुंच चुकी थी तभी उसके कानों ने एक आवाज सुनी जो शायद कुछ अजीब से मंत्रोच्चार की आवाज थी।

 

प्रीतिलता- कौन हो सकता है इतनी सुबह जो मंत्र पढ़ रहा है? वो भी नदी के पास।

 

प्रीतिलता के मन में डर था लेकिन डरते डरते वो नदी के पास पहुंच गयी। नदी से कुछ ही दूर वो एक ऐसे ऊंचे स्थान पर गयी जहाँ से उसे साफ साफ दिखायी दे। नदी के किनारे इधर उधर नजर दौड़ाकर उसने एक नजारा देखा जिसे देखकर वो सहम गयी।

 

बिंदाल नदी के किनारे एक लड़का समाधि में बैठा हुआ था। उसके बाल लंबे थे, उसने अपनी हाथों और कलाइयों में रुद्राक्ष की माला पहनी हुयी थी, शरीर पर भस्म लगायी हुयी थी और माथे पर एक लाल रंग का टीका लगाया हुआ था। उसके ठीक आगे एक लाश थी जिसके तीन ओर से एक लंबे लंबे लोहे के चिमटे जमीन में गड़े हुए थे।

लाश लाल रंग के सिंदूर से बने तंत्र के अंदर थी।

लाश एक काले कपड़े से ढकी थी।

 

पास में ही लड़के के सामने एक छोटे से लोहे का तसला रखा था जिसमें आग जल रही थी।

प्रीतिलता को साफ साफ मंत्र सुनायी नही दे रहे थे लेकिन उसने देखा कि मंत्रो का उच्चारण करते करते लड़के ने उस लाश के चेहरे पर से कपड़ा थोड़ा हटाया और एक बड़ा सा चाकू निकालकर अपने हाथ पर चलाया।

लड़के के हाथ से खून निकलने लग गया था।

इतना देखते ही प्रीतिलता बहुत जोर से चिल्लायी जिसे लड़के ने सुन दिया।

प्रीतिलता बदहवास सी घर की तरफ भाग गयी।

लड़के ने उसका पीछा नही किया।

बल्कि वो चुपचाप अपने स्थान पर बैठ गया।

ये लड़का और कोई नहीं देवांश ही था।

देवांश- आज ये कौन आ गया यहाँ! अब अपनी काल साधना कैसे करूँगा? कैसे करूँगा अपनी दादी को जिंदा।

 

वो लाश और कोई नहीं बुढ़िया की ही थी।

 

देवांश- अब मुझे जल्दी ये सामान समेटना होगा।

देवांश सामान समेटने में लग गया उसे बहुत जल्दी थी। बुढ़िया को देवांश ने दोबारा नदी में दफना दिया था।

 

देवांश- दादी माफ करना आपको कुछ दिन और इंतज़ार करना होगा। आपको अपने पास अभी नही बुला सकता।

 

देवांश कुछ देर बुढ़िया को दफनाने के बाद वहीं बैठा रहा और उसकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।

 

देवांश- दादी तुम ही तो सहारा थी मेरी। तुम भी छोड़ कर चली गयी मुझे। आज न जाने किसने मेरी साधना भंग करके तुम्हें मेरे पास आने में कुछ समय के लिए रोक दिया है लेकिन तुम्हे फिर से जरूर अपने पास वापस लाऊँगा। अभी जा रहा हूँ लेकिन जल्द ही वापस आऊंगा।

 

देवांश तेज तेज कदमों से सामान गठरी में समेटकर वापस अपने घर की ओर निकल पड़ा।

 

प्रीतिलता ये वीभत्स दृश्य देखकर सहम गए थी। वो गिरते पड़ते जैसे तैसे अपने घर पर पहुंची। उसने देखा तो अभी भी सभी सोये हुए थे उसने किसी को जगाया नहीं बल्कि बिना शोर किये अपने कमरे में जाकर लेट गयी।

प्रीतिलता के सामने बार बार वही दृश्य बार बार आ रहा था उसने डर से चादर ओढ़ ली।

फिर उसे पता नहीं चला कि उसे कब नींद आ गयी।

 

दोपहर में जब उसकी आंख खुली तो उसने अपने कमरे के बाहर हल्ला सुना वो चौंक कर बाहर आ गयी।

बाहर उसकी दोस्त आरती और उसके बाबा बातें कर रहे थे।

आरती प्रीतिलता से उम्र में लगभग एक साल छोटी थी शरीर पतला था और रंग गोरा था।

प्रीतिलता को देखते ही चहकते हुए आरती प्रीतिलता के पास आ गयी।

 

आरती- तुम कहाँ थी आज सुबह से? इतनी देर कौन सोता है?

 

मुखिया ने भी मजाक बनाते हुए कहा-

“आज तो जल्दी ही उठ गयी है, मुझे लगा था कल सुबह उठेगी अब ये हाहाहा।”

 

प्रीतिलता ने कुछ नहीं बोला और आरती को अपने कमरे में ले गयी।

कमरे में जाकर उसने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।

आरती- अरे हुआ क्या किस जल्दी में है तू?

प्रीतिलता- अरे सुन तो।

 

आरती- बोल।

 

प्रीतिलता- तू किसी से कहेगी तो नही?

 

आरती- कब कब कह दिया मैंने?

 

प्रीतिलता- मजाक मत कर।

 

आरती- ठीक है तू बता तो! क्या कोई लड़का पसंद आ गया है तुझे?

 

प्रीतिलता- नहीं। सुन…

 

प्रीतिलता ने सारी सुबह में घटी घटनाएं आरती को बता दी , जिसे सुनकर आरती पहले तो समझ नहीं पाई लेकिन जल्द ही डरने भी लगी।

 

आरती- ये बात हमें बाबा को बतानी चाहिए प्रीतिलता।

 

प्रीतिलता- चुप हो जा उसे मैं जानती नहीं कि कौन है वो! फिर बाबा से क्या कहूँगी? कल सुबह फिर जाऊंगी मैं और तू भी साथ चलेगी, बस।

 

आरती- मुझे डर लग रहा है मैं नहीं चलूँगी।

 

प्रीतिलता- मैं हूँ तो चल अभी घर जा मेरा सिरदर्द हो रहा है। अब सुबह मिलना मुझे।

 

आरती सीधे अपने घर की ओर निकल गयी लेकिन प्रीतिलता को पूरे दिन भर चैन नहीं मिल पाया। वो बस उसी घटना के बारे में सोचने लगी।

 

वहीं देवांश के घर-

देवांश अपने दैनिक काम कर रहा था लेकिन वो भी आज परेशान था।

देवांश- मेरे हाथ से एक मौका निकल गया। दादी ने कहा था कि इस विद्या का प्रयोग एक बार ही कर सकते हैं। बचपन से उनके सिखाये इतने जादू से भी मैं उन्हें अब तक जिंदा नहीं कर पाया हूँ। अब आगे क्या होगा मैं नहीं जानता। कुछ दिन नदी किनारे नहीं जा सकता।

 

देवांश लकड़ी काटने में व्यस्त था लेकिन उसके मन में अब भी वही चल रहा था-

“क्या हो अगर मुझे कुछ दिन घर में ही रहना पड़े!”

“नहीं नहीं मैं ये नहीं कर सकता।”

“दादी का शरीर अब गलने भी लगा है।”

“मुझे एक बलि की भी जरूरत पड़ेगी लेकिन अब कैसे करूँ सब।”

 

देवांश खुद के ही सवालों का उत्तर भी देता जा रहा था। उसने अन्ततः ये सोचा कि अब वो बलि भी उसी की लेगा जिसने उसे देखा था।

 

देवांश- कल सुबह मैं भी जाऊँगा लेकिन इस बार काल साधना नहीं करूंगा बस देखूंगा कि क्या अब भी वो जगह सुरक्षित है काल साधना के लिए?

 

अब दोनों प्रीतिलता और देवांश को अगले दिन का इंतज़ार था। इंतज़ार में कब रात से सुबह हो गयी पता ही नहीं लगा।

देवांश तिमिर छँटते ही बिंदाल के किनारे पहुँच चुका था। उसने नदी के किनारे कभी पानी बढ़ने के समय इकट्ठा हुए बड़े बड़े पत्थरो की टोह में छुपने का मन बनाया। किस्मत से नदी के पास में ही एक बड़ा सा पत्थर था जो नदी के किनारे ही था और उसका एक सिरा नफ़ी की तरफ था जिसके पाद पर पानी इकट्ठा था लेकिन दूसरी ओर का हिस्सा बिल्कुल सूखा हुआ था और छुपने की एक बढ़िया जगह बना रहा था। छूपने की जगह पर आराम से बैठने के बाद उसे अब इंतज़ार था तो केवल इस बात का कि कोई वहां आता है या नहीं!

देवांश अपने मे ही खोया था कि अचानक पेडों के झुरमुट से कुछ पत्तो के हिलने की आवाज आने लगी। वह अपने स्थान पर शांत जल के समान बैठ गया।

 

पेड़ो की झुरमुट से दो जवान लड़कियां बाहर आयीं। दोनों ही लड़कियां प्रातः काल के हल्के तिमिर के बावजूद भी चांदनी के समान प्रतीत हो रही थी। दोनों की चाल में बहुत तेजी थी। देवांश ने देखा कि वो लड़कियां कुछ ढूंढ रहीं थी शायद देवांश को ही लेकिन जब नदी की तरफ उन्हें कुछ दिखायी नहीं दिया तो उन्होंने भी छूपने की कोई जगह ढूंढी और नदी किनारे एक छोटी सी झाड़ी के पीछे दोनों ने ओट ली।

ये दोनों लड़कियां आरती और प्रीतिलता थे। जो देवांश को देखने ही आये थे।

 

अब दोनों ही ओर इंतज़ार होने लगा।

 

झाड़ियों के पीछे-

 

आरती- तू मुझे ये कहाँ ले आयी है प्रीतिलता? मुझे बहुत डर लग रहा है।

 

प्रीतिलता- डर मत कुछ नहीं होगा। बस एक बार वो लड़का दिख जाए और पता चल जाये कि वो कर क्या रहा है? फिर घर चले जायेंगे।

 

आरती-  कोई जंगली जानवर कभी भी इस ओर आ सकता है और कैसे पता लगे कि वो लड़का कब आएगा?

 

प्रीतिलता- आएगा जरूर आएगा कल उसकी साधना में व्यवधान पड़ गया था, आते हुए मैंने देखा था वो उदास हो गया था।

 

आरती- मैं यहाँ उदास हो रही हूँ तुझे उससे फर्क नही पड़ रहा है?

 

प्रीतिलता- श….श….शशशशशश। चुप हो जा। अब हल्ला मत कर वो आता ही होगा।

 

दोनों ओर अब शांति छा गयी थी। कोई भी पहले बाहर आने को तैयार नहीं था।

धीरे धीरे कुछ घण्टे बीत गए लेकिन कोई हलचल न हुई।

 

देवांश- ये दोनों लड़कियां यहां करने क्या आयीं हैं? शायद यही रही होंगी इन्होंने बताना होता तो कई लोग आ चुके होते। इनके सामने जाने में कोई बुराई अभी नजर नही आती।

 

मन बनाकर देवांश पत्थर के पीछे से बाहर आ गया और धीरे धीरे झाड़ियों की ओर बढ़ने लगा।

 

प्रीतिलता- अरे ये तो वही नजर आ रहा है।

 

आरती- हे भगवान ये तो हमारी ओर ही आ रहा है। कहाँ फंसा दिया तूने प्रीतिलता।

 

प्रीतिलता- तू चुप करेगी कुछ देर? ये वही है या नहीं ये तो पता चलने दे।

 

प्रीतिलता खुद घबरायी हुई थी लेकिन आरती के सामने निडर बनी हुई थी। जल्द ही देवांश उसके सामने आ गया।

आरती और प्रीतिलता भी झाड़ियों के झुरमुट से बाहर आ गए।

 

देवांश- तुम मेरा पीछा क्यों कर रही हो?

 

प्रीतिलता कुछ नही बोली।

 

देवांश- कल तुम ही थे न यहाँ सुबह?

 

ये सुनकर अब प्रीतिलता और आरती को ये पता लग गया था कि ये वही है जो कल साधना कर रहा था अब उनका डर के मारे हाल बेहाल होने लगा था।

डर के मारे उनके कदम अपने आप पीछे की ओर होने लगे थे।

 

देवांश- डरो मत। कुछ नहीं कहने वाला हूँ लेकिन तुम लोग मेरा पीछा क्यों कर रहे हो बताओ।

 

आरती- तुम ही हो वो अघोरी? और क्या किया तुमने कल उस आदमी के साथ?

 

प्रीतिलता ने आरती का हाथ पकड़ा और अपनी तरफ खींच दिया और उसे चुप होने के लिए इशारा किया।

 

देवांश- ओह तो वो तुम थी जिसने वो सब देखा था।

 

प्रीतिलता- नहीं वो मैं थी। इसने कुछ नहीं किया। क्यों कर रहे थे तुम वो सब?

 

देवांश- वो मेरी दादी थी। जिनकी मृत्यु हो चुकी थी।

 

प्रीतिलता- तो तुम क्या कर रहे थे?

 

देवांश- मैं नहीं बता सकता मुझे जाना होगा काफी देर हो गयी है। अब मेरा पीछा फिर मत करना।

 

प्रीतिलता- तुम कहाँ रहते हो?

 

देवांश- मुझे जाना होगा।

 

इतना कहकर देवांश चला गया।

प्रीतिलता और आरती भी घर के लिए निकल गयीं।

 

घर पहुंचकर प्रीतिलता के मन में केवल देवांश को लेकर ही ख्याल था। उसने दूसरी सुबह भी नदी किनारे जाने का निर्णय ले लिया था।

रात जैसे तैसे कटी और सुबह फिर से वो नदी किनारे पहुंच गयी लेकिन आज देवांश वहां नहीं आया।

आज पूरे दिन प्रीतिलता का ध्यान अपने कामों में नहीं लगा।

 

लेकिन ये केवल उसके साथ ही नहीं था कमोबेश ये हाल देवांश का भी था लेकिन उसका कारण कुछ और ही था।

 

देवांश- उन लड़कियों के कारण अब दादी को फिर से जिंदा करना मुश्किल हो गया है, बहुत दिन हो गए हैं अब दादी का शरीर गलने भी लग गया होगा। मेरा खून कालसाधना में चढ़ चुका है इसीलिए अब उनको मेरे खून से जीवित करना सम्भव नहीं है अब किसी और का खून चढ़ाना होगा। हाय! दादी आपके बिना और कितने दिन रहूंगा तुम एक मात्र सहारा थी मेरा।

“अब इसका एक ही रास्ता है किसी तरह किसी को पकड़ना होगा जिसका खून चढ़ाया जा सके। कोई अपनी इच्छा से तैयार नही होगा। हे महाकाल किस भँवर में फंस चुका हूं मैं.।”

 

दोपहर में-

सूरज अपने उफान पर था आसमान से आज ज्वाला बरस रही थी। गर्मी मानो धरती के प्राण निकालने पर आमादा हो।

इस गर्मी से हर कोई बेहाल था लेकिन किस्मत आज देवांश पर मेहरबान थी या शायद प्रीतिलता की किस्मत मेहरबान थी।

देवांश मौके की तलाश में था कि कहीं क्या पता कोई मिल जाये जिसका खून चढ़ाया जा सके साधना में, इसके लिए वो अपने घर से बाहर निकलकर आज गांव की तरफ आया था लेकिन उसको प्रीतिलता ने देख लिया।

प्रीतिलता उसे देखते ही उसके पास आ गयी।

 

प्रीतिलता- तुम गांव में क्या कर रहे हो? पहले तो कभी नहीं दिखे।

देवांश- किसी को कुछ मत बताना। मैं किसी का अहित नहीं करना चाहता और न ही कर रहा हूँ।

प्रीतिलता- अगर चाहते हो वो राज राज ही रहे तो तुम्हें मुझे वो सब बताना होगा।

देवांश कुछ देर सोचता है लेकिन फिर उसकी बात मान जाता है।

 

देवांश- ठीक है। मैं तैयार हूँ लेकिन यहाँ नहीं बता सकता।

प्रीतिलता- तो फिर कहाँ?

देवांश- कल सुबह नदी के पास।

प्रीतिलता हाँ में सिर हिलाती है।

फिर अपने घर की ओर निकल पड़ती है।

 

आज की रात दोनों पर भारी थी। जहाँ प्रीतिलता राज जानने को तत्पर थी वहीं देवांश को अपनी दादी को जिंदा करने की एक उम्मीद नजर आ रही थी।

 

प्रातः बिंदाल नदी का किनारा-

 

अभी अंधकार छंट ही रहा था। चारों तरफ शांति थी केवल पेड़ पौधों के हिलने की आवाज सुनायी दे रही थी। देवांश एक बड़े से पत्थर के ऊपर बैठा हुआ था और शांत पानी में कंकण मार रहा था। उसके चेहरे पर मिश्रित भाव देखे जा सकते थे।

 

“जैसे जैसे दिन निकलते जा रहे हैं दादी के आने की संभावना भी खत्म होती जा रही है।”

 

टपाक टपाक की ध्वनि बीच बीच में सुनायी दे रही थी जो कंकड़ के पानी मे फेंकने से आ रही थी।

 

“आज पूरे चार हफ्ते खत्म होने को आ गए हैं दादी ने चेताया भी था कि 27(सत्ताइस) वें दिन से पहले ये साधना पूर्ण हो जानी चाहिए लेकिन……”

 

यकायक देवांश के चेहरे के भाव कठोर हो गए और उसके जबड़े भिंच गए और उसने कंकण पूरी जोर से नदी में फेंका । जोर से छपाक की आवाज हुयी।

 

“लेकिन उन दोनों लड़कियों ने सब बिगाड़ दिया सब।”

“मुझे कुछ जल्दी करना होगा बहुत जल्दी”

“लेकिन”

 

“लेकिन….”

 

“कैसे?”

 

इसी बीच नदी की तरफ आने वाले रास्ते मे कुछ आहट सुनायी दी।

 

“वो आ गयी! अब यही है मेरी एकलौती उम्मीद”

“लेकिन किसीको नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा मैं।”

 

वो देखते देखते सामने आ गयी लेकिन अब भी देवांश ख्यालों में खोया हुआ था।

प्रीतिलता- क्या अब तुम मुझे बता सकते हो?

 

अचानक देवांश का ध्यान टूटता है…

 

“हां …….हां….” देवांश बोल पड़ा।

 

जिस पत्थर पर देवांश बैठा हुआ था उसी पत्थर पर प्रीतिलता भी आकर बैठ जाती है और देवांश को एकटक देखने लगे जाती है।

 

देवांश- कहाँ से शुरू करूँ?

 

प्रीतिलता कुछ नहीं कहती बस चुपचाप ही रहती है।

 

देवांश- देखो मैं नहीं जानता क्या तुम समझ पाओगी मेरी स्तिथि या नही! लेकिन फिर भी मैं तुम्हें बता रहा हूँ एक उम्मीद से..

 

प्रीतिलता अब भी भाव हीन मुद्रा में बैठी देवांश को सुन रही थी।

 

देवांश- मैं इस गांव का नहीं हूँ और ना ही वो मेरी दादी थी लेकिन फिर भी वो मेरी दादी से भी बढ़कर थी। उन्होंने ही मुझे माँ बाप भाई बहन सबका प्यार दिया।

 

प्रीतिलता- तुम कहाँ के हो फिर? और क्या कर रहे थे तुम यहाँ उस दिन?

 

देवांश- सब बताता हूँ धैर्य रखो।

“मेरी दादी ने बताया था कि मेरी माँ का नाम नैना था दादी कहती थी कि वो बहुत सुंदर थी। वह जखेड़ के नजदीक ही एक गांव कमेडा रहा करती थी।”

“उसके माता पिता बचपन में ही चल बसे थे और वो मिट्टी के बर्तन बनाकर गुजर बसर किया करती थी।”

“एक अकेली लड़की के लिए दुनिया मे रहना कितना मुश्किल होता है वो दादी बताया करती थी। आये दिन लोग उसे परेशान करने चले आया करते थे।”

“उसके घर दो बच्चे हीरा और मणिराम खेलने आया करते थे। वो दोनों ठाकुरों के बच्चे थे। बच्चे हर दिन उसके साथ खेलते थे और फिर घर चले जाते थे। ऐसा कई दिन होता रहा। एक दिन……”

 

सुबह का समय-

नैना दिन भर थककर गहरी नींद में सोयी हुई थी। आधी रात को ही उसे अपने दरवाजे पर दस्तक सुनायी दी।

“ठक ठक ठक”

 

ठंड का मौसम था और अभी ही उसे नींद आयी थी। दिन भर की थकान अब भी उस पर हावी थी। उसका मन तो हुआ कि वो उठ जाए और देखे क्या हो रहा है बाहर और कौन है इतनी रात को? क्या कोई ग्राहक? लेकिन इतनी रात को क्या आवश्यकता आन पड़ी होगी। इसी उधेड़ बुन में वो पुनः सो गयी।

लेकिन दरवाजे पर फिर दस्तक हुयी।

 

“ठक ठक ठक…”

 

इस बार बाहर से कुछ आवाजें भी सुनायीं दी।

 

“किवाड़ खोलती क्यों नहीं? मर गयी क्या?”

 

दूसरी आवाज- नहीं नहीं वो क्यों मरने लगी?

 

अब आवाजें और बढ़ने लगी। नैना के नैनों से नींद गायब हो गयी। वो उठी और किवाड़ खोलकर ज्यों ही बाहर देखती है- एक बहुत बड़ी भीड़ उसका इंतजार कर रही थी।

सबके चेहरे पर सवाल थे गुस्सा था।

तभी ठाकुर दीवान चंद सामने आकर नैना को एक जोरदार तमाचा मार देता है।

“डायन खा गयी तू मेरे बच्चे को? हीरा मेरा प्यारा हीरा!”

इतना कहते ही उसके जबड़े जोर से भिंच गए।

 

नैना से सामने नजर दौड़ायी तो सामने दो महिलाएं जोर जोर से रो रही थी। उसकी समझ मे कुछ नहीं आ रहा था कि आखिर ये हो क्या रहा है?

 

एक और आवाज ने उसका ध्यान भंग किया।

“आखिर क्या बिगाड़ा था मेरे बच्चे ने तेरा डायन? मासूम सा तो था मेरा मणि।”

ये आवाज मणि के पिता ठाकुर ध्यान सिंह की थी। जो इतना बोलते ही जोर जोर से रोने लगा था।

 

दीवान चंद- ऐसे रोने से कुछ नहीं होगा ध्यान सिंह इस डायन को भी मार दो जैसे हमारे बच्चे जहर से तड़प तड़प कर इस दुनिया से दूर हो गए।

 

“हीरा और मणि मर गए?”

“लेकिन कैसे मर गए? दिन में ही तो मेरे साथ खेल रहे थे।”

नैना खुद से ही बात किये जा रही थी।

 

दीवान चंद अपने हाथ में रखी दराती से ही नैना को मारने आगे बढ़ा लेकिन गांव वालों ने उसे रोक दिया।

“पागल हो गया है क्या दीवान चंद?”

मुखिया ने उसे पूछा।

 

दीवान चंद- हाँ तो क्या पागल न हो जाऊं? ये डायन मेरा एकलौता बेटा खा गयी और मैं देखता रहूं?

 

मुखिया- क्यों तुम ये समझ रहे हो कि इसने ज़हर देकर मार दिया तुम दोनों के बच्चों को? ये तो उन दोनों के सिवा किसीको जानती तक नहीं थी।

 

नैना- वो दोनों कहाँ हैं?

 

ध्यान सिंह- डायन मेरे बच्चे का नाम भी मत लेना अपने मुँह से।

ध्यान चंद उसको मारने को आगे बढ़ा। लेकिन नैना इन सब से अनजान अपनी ही धुन में बोलने लगी।

 

नैना- मुझे देखना है उन दोनों को। मुझे ले चलो उनके पास।

 

जो माएँ अब तक रो रही थी उनकी आंखों में भी अब खून उतर आया था। वो भी नैना को मारने बढ़ चलीं। जैसे तैसे भीड़ ने उन दोनों को रोका।

 

मुखिया- नैना वहीं रुक जाओ उन दोनों को अंतिम बार भी तुम्हे देखने का हक़ नही है। क्या शाम को तुम्हारे पास थे बच्चे?

 

नैना- नहीं आज तो जल्दी चले गए थे दोनों, बहुत रोका मैंने लेकिन नहीं रुके। आखिर बात क्या है क्या हुआ है उन्हें? किसने किया है उनका बुरा?

 

दीवान चंद- बुरा? डायन उन दोनों को खा गयी है तू।

 

मुखिया- शांत हो जाओ सभी मुझे नहीं लग रहा है कि नैना झूठ बोल रही है। इसने नहीं मारा है उन्हें। असली अपराधी को ढूंढना होगा।

 

दीवान चंद- यही है अपराधी मुखिया जी यही है अपराधी।

 

मुखिया- होश में आओ दीवान चंद।

 

ध्यान सिंह- ये डायन है इसे गांव से दूर करो अगर ये मुझे दिखती रही तो इसे जान से मारने में देर नहीं करूँगा मैं।

 

मुखिया- ठीक है। नैना तू गांव छोड़कर कल सुबह ही निकल जा।

 

नैना- मुखिया जी मैं कहाँ जाऊँगी? कौन है मेरा इस दुनिया में सिवाय आप लोगों के? मुझे गांव से मत निकालो मुखिया जी।

 

मुखिया- माफ करना बेटी।

 

इतना कहकर सभी अपने अपने घर चले गए।

छोड़ गए तो इस गहरी काली रात में रोती बिलखती उस अकेली जान नैना को।

नैना अपनी झोपड़ी के अंदर भाग के गयी और उसने धम्म से किवाड़ बन्द कर लिए।

ये नैना के लिए सबसे भयानक रात थी। रोते हुए वो अपना सामान समेटने लगी।

उसकी आँखों मे अब नींद का नामोनिशान नहीं था।

जैसे तैसे रात कटी और सुबह की पहली किरण उसके लिए एक त्रासदी के समान थी।

 

सुबह जब सभी गांववाले उठे तो उन्हें इसका एहसास भी नहीं हुआ कि अब वहां नैना नहीं है।

 

**************************************

 

लगभग दो साल बाद-

 

कमेडा गांव रात का समय-

 

अधिकतर रात के समय गांव का माहौल शांत रहता है ना वहां कोई आवाजाही करता है ना ही किसी की आवाज सुनायी देती है।

लेकिन आज की रात और रातों से अलग थी।

दीवान चंद के घर के बाहर आज शोर सुनायी दे रहा था।

दीवान चंद किसी महिला को घर के बाहर धक्के मार कर निकाल रहा था।

“नैना?”

इतने सालों बाद आज फिर से कमेडा गांव में दिखी थी।

 

दीवान चंद (धीमी आवाज में)- जिससे पहले कोई आ जाये दूर हो जा तू मेरी नजरों के सामने से।

 

नैना – कहाँ जाऊं? कौन है अब मेरा यहां?

 

दीवान चंद- तो मैं क्या करूँ? कहीं भी जा बस मेरी चौखट पर फिर कभी नजर मत आना।

“जितना तुझे सहारा दे सकता था मैंने दे दिया है”

 

नैना- सहारा?

“कैसा सहारा?”

“क्या मैं तुमसे सहारा माँगने आयी थी?”

 

दीवानचंद- देख मेरा सिर मत खपा और सुबह होने से पहले दूर हो जा मेरी नजरों से।

 

नैना- दूर हो जाऊं? क्या हुआ जब तुमने मुझसे कहा था कि तुम अपना लोगे इस बच्चे को?

 

दीवानचंद- मूर्ख था मैं। दूर ले जा अपना बच्चा मेरी नजरो के सामने से। आज फिर मुँह उठा कर चली आयी तू यहां! आज अंतिम बार है दूर हो जा और आगे से शक्ल मत दिखाना अपनी।

नैना- मैं चली आयी? क्या तुम समझते हो मैं भूल गयी की किस तरह से तुम मेरे घर मे घुस आए थे उस रात।

 

दीवानचंद उसकी बात पूरी करने से पहले ही तमतमाकर अपने घर की सीढ़ियों से नीचे उतरा और एक जोरदार तमाचा नैना के गाल पर जड़कर बोला।

 

दीवानचंद- तू निकल यहाँ से नहीं तो आज तेरी हत्या हो जाएगी मेरे हाथ से।

इतने में ही अंदर से दीवान चंद की पत्नी शोर सुनकर बाहर आ गयी थी।

 

संध्या(दीवानचंद की पत्नी) – क्या हुआ है जी? इतनी रात को क्या कर रहे हो बाहर?

दीवानचंद सकपका गया और संध्या नैना को देखकर अचंभित हो गयी।

 

“तू?”

“फिर से आ गयी?”

“पहले मेरे फूल से बच्चे को खा गयी डायन अब क्या मेरे परिवार को खाने आयी है?”

 

नैना- ठकुराइन ऐसा न कहो। मैंने नहीं मारा तुम्हारे बच्चे को अपने इस बच्चे की सौगंध खाकर कहती हूँ।

 

संध्या- सौगंध? किसका बच्चा ले आयी तो डायन? और यहां क्या कर रही है तू?

 

दीवानचंद डर रहा था कि कहीं उसका राज न खुल जाए इससे पहले वो खुद बोल पड़ा

“न जाने मुँह उठाकर क्यों यहाँ चली आयी है ये।”

 

नैना- मुँह उठाकर? ये तुम्हारा भी बच्चा है दीवानचंद।

दीवानचंद- ये क्या बकवास कर रही हो?

 

संध्या- ये क्या कह रही है जी?

 

दीवानचंद- झूठ कह रही है। इसने हमारे बच्चे को मार अब हमें बर्बाद करने आयी है। निकल जा तू यहां से नैना वरना बहुत बुरा होगा।

 

नैना- बुरा? बुरा ये नहीं बुरा वो था जो उस रात तुमने किया था मेरे साथ मेरे अकेले होने का फायदा उठाकर।

 

संध्या- झूठ मत बोल मेरे पति पर डोरे मत डाल अब डायन। निकल जा घर से।

 

दीवानचंद ने आगे बढ़कर एक जोरदार तमाचा नैना पर मारा  और नैना जमीन पर गिर गयी। इसी में उसका दुधमुहाँ बच्चा भी उसके हाथ से जमीन पर गिर गया।

बच्चे ने जोर जोर से रोना शुरू कर दिया और अब तक शांत दिखने वाली रात अब शांत न रही। नैना मुखर हो गयी।

 

नैना- दीवानचंद ये तूने अच्छा नहीं किया पहले मेरा फायदा उठाया और अब मुझे धक्के मार रहा है बता अब इस बच्चे का क्या होगा?

 

नैना की हर एक बात में अब जोर था बौंखलाहट थी और शोर था जो गांव वालों को किसी भी पल इकठ्ठा कर सकता था।

जिसे संध्या समझ रही थी।

 

संध्या- जी इसे जल्दी भगा दो यहां से वरना हम किसी को मुँह दिखाने के काबिल न रहेंगे अब।

 

दीवानचंद- बस अब बहुत हो गया तुझे अपने बच्चे की बहुत हो रही है ला इसे अभी खत्म किये देता हूँ।

दीवानचंद पागलो की तरह नैना पर झपटा जिसे नैना किसी तरह बचा गयी।

 

नैना- पागल हो गया है क्या दीवानचंद ये तेरा ही बच्चा है इसे ही मारने आ रहा है?

 

दीवानचंद- क्यों मेरा बच्चा भी तो तू खा गयी डायन आज तेरे बच्चे की बारी है।

संध्या- हाँ अब मेरे बच्चे को शायद शांति मिल सकेगी। छोड़ना मत इस डायन के बीज को।

 

दीवानचंद की आंखों में अब संध्या के साथ के साथ ही खून तैरने लगा था। वो एक पल के लिए भाग कर अन्दर गया और एक लंबी सी दराती लेकर बाहर निकला। जिसे देखकर नैना को देर न लगी कि क्या होने वाला है।

नैना ने अब आव देखा न ताव और वो अपने बच्चे को सीने से लगाकर पागलो की तरह भागने लगी।

 

गांव वाले भी अब तक पहुंच चुके थे।

मुखिया- क्या हुआ दीवानचंद? ये कौन भाग रही है?

 

दीवानचंद- मुखिया जी ये वही सांप है जिसे आपने जिंदा छोड़ दिया था। डायन आज फिर मेरा बच्चा उठाने आयी थी मुझे देखकर भाग रही है।

 

मुखिया- किसकी बात कर रहे हो दीवानचंद?

 

दीवानचंद- भोले मत बनो मुखिया नैना की बात कर रहा हूँ। वही डायन जो फिर से अब सबके बच्चे खाने आयी है।

 

दीवानचंद की बातें सुनकर अब गांववालों में डर होने लगा था।

 

“तुमने अगर मुखिया उसे छोड़ा ना होता तो आज फिर वो मेरा बच्चा मारने नहीं आती।”

“ अब भी समय है खत्म कर दो इस डायन को और अपने बच्चों को बचा लो।”

 

गांववालों ने उसकी हाँ में हाँ मिलायी। अपनी दराती लहराकर चीख कर बोल पड़ा दीवानचंद।

 

“मैं आज उस डायन को खत्म करके ही मानूँगा जिसे साथ चलना है चलो”

 

इतना कहकर दीवानचंद नैना की ओर भाग पड़ा। देखा देखी सभी गांव वाले भी उसके पीछे हो लिए।

 

नैना गांव से नीचे उतरते जंगल में पहुंच गयी और बेतहाशा भागती जा रही थी उसे भी नहीं पता था कि वो कहाँ जा रही है बस उसे सबसे दूर भागना था।

न जाने कितने काँटो और पत्थरों ने उसको रोकने की कोशिश की थी लेकिन वो केवल उसका कुछ मांस ही नोचने में कामयाब हो पाए।

 

“ठीक उसी समय मेरी दादी यहीं….”

उंगली से इशारा करके देवांश प्रीतिलता को दिखा रहा था।

 

“इसी जगह पर मेरी दादी ने उस बेचारी अभागिन की गोद से मुझे उठाया और वो यही मार गयी।”

 

इतना कहते ही देवांश की आंखों में आँसू बहने लगे गए।

 

प्रीतिलता ने कुछ नहीं बोला बस चुपचाप बैठी रही। सुबह भी अब काफी प्रकाशमान हो गयी थी सूरज ने अपने दर्शन देने शुरू कर दिए थे।

प्रीतिलता अपनी जगह से उठी और अपने घर की ओर चल दी। एक पल वो रास्ते में रुकी और मुड़कर देवांश से बोली-

“मैं कल इसी समय फिर आऊंगी।”

 

इतना कहकर वो बस आगे बढ़ चली लेकिन फिर पीछे नहीं मुड़ी।

 

रास्ते मे घर आते वक्त छुपते छुपाते चलते हुए प्रीतिलता पर उसकी सहेली आरती ने उसे नदी किनारे से आते देख लिया।

 

पूरा दिन ऐसे ही बीता लेकिन प्रीतिलता ने किसी से इस बार मे बात नहीं की और ना ही आरती उससे ये पूछने आयी।

लेकिन आरती के मन मे अब शक जन्म ले चुका था जिसका इलाज उसने सोच लिया था।

 

दूसरी सुबह-

 

देवांश आज भी उसी पत्थर पर बैठा हुआ था प्रीतिलता उसे देखकर वहीं उसके पास बैठ गयी।

 

दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराये।

 

प्रीतिलता- आगे सुनाओगे?

 

देवांश- हाँ क्यों नहीं।

“मेरी माँ मतलब नैना को गांव वालों ने लेजाकर जला दिया था और मुझे मरा जानकर व गांववालो से सच्चाई छुपाकर दीवानचंद सब भूल गया। मुझे अब केवल एक ही इंसान का पता था वो थी मेरी दादी।”

 

प्रीतिलता- लेकिन तुम्हारी दादी को ये सब किसने बताया क्योंकि तुम तो छोटे रहे होंगे बहुत।

 

देवांश- मेरी दादी काला जादू या यूं कहो जादू टोना जानती है। जिससे वो सब पता लगा लेती थी। फिर उसकी हर जगह जान पहचान भी थी।

 

प्रीतिलता- तो यही कारण है तुम भी जादू टोना जानते हो?

देवांश – हाँ।

प्रीतिलता- तो तुम उस समय क्या कर रहे थे? उस सुबह?

 

देवांश- दादी ने एक विधि बतायी थी जिससे कोई भी आदमी जिंदा किया जा सकता है लेकिन…….

 

प्रीतिलता- लेकिन क्या?

 

देवांश- लेकिन आज सत्ताईसवां दिन है और आज ही दादी को जिंदा किया जा सकता है वरना फिर कभी नहीं।

 

प्रीतिलता- तो करो मैं भी देखना चाहती हूं।

 

देवांश- लेकिन उसमें एक समस्या है।

प्रीतिलता- क्या समस्या?

 

देवांश- एक बार ही एक आदमी का खून चढ़ाया जा सकता है किसी भी विधि में उसके जिंदा रहते हुए ही…

 

प्रीतिलता- और वो तुम कर चुके?

 

देवांश – हां।

 

प्रीतिलता- मैं तैयार हूँ।

 

इसको सुनकर देवांश जहां खुश था वहीं पास ही दो कान इसे सुनकर अचंभे में पड़ गए जिसका असर ये पता कि एक तह आवाज सुनायी दी।

 

“क्या?”

दोनों ने उस ओर नजर दौड़ायी तो उन्हें आरती दिखायी दी जो इतना कहने के बाद ही वापस भाग रही थी।

 

“मुझे जाना होगा जिससे पहले कोई बड़ी बात हो जाये।”

प्रीतिलता ने हड़बड़ाहट में बस इतना ही कहा और तेज कदमों से अपने घर की ओर निकल गयी।

घर पहुंचकर उसे अंदाज़ा हो चुका था कि सब बताया जा चुका है।

 

सुरेंद्र- तुझे कितनी बार बोला था कि हमेशा उस नदी से दूर रहना। तू आज फिर चली गयी?

 

अभी प्रीतिलता ने घर मे कदम भर ही रखा था और उसे ऐसा सुनायी दिया।

 

प्रीतिलता- बाबा सुनो तो।

सुरेंद्र- तू आज के बाद उस बुढ़िया के बच्चे से दूर रहना सुर कभी दोबारा ये सब किया तो तेरे लिए अच्छा नहीं होगा।

 

प्रीतिलता- बाबा लेकिन बात क्या है? मुझे बोलने तो दो।

 

सुरेंद्र- बहुत सुन लिया बेटी तेरी बातों को अब और नहीं। तू चुप चाप अपने कमरे में जा और अब बाहर मत निकलना।

प्रीतिलता  ने निराशा से भरी नजरें आरती पर घुमायी और अपने कमरे की ओर चली गयी।

 

कुछ पहर बीते फिर कुछ दिन बीते लेकिन देवांश का ख्याल प्रीतिलता अपने मन से नहीं निकाल पायी। जिसका असर ये हुआ कि आज का दिन इन दोनों पर भारी था।

 

वर्तमान-

 

धूल सूंघता देवांश जमीन पर पड़ा हुआ था और एक ओर प्रीतिलता भी जमीन पर पड़ी हुई थी।

 

सुरेंद्र- मेरे पास और कोई रास्ता नहीं बचा है मुझे ये कदम उठाना ही होगा।

 

प्रीतिलता के चहरे पर दर का भाव देखा जा सकता था। उसकी आँखें लाल हो चुकी थी शायद अब उनमें आँसू के लिए पानी खत्म हो चुका था।

अगर कुछ खत्म नहीं हुआ था तो मुखिया के मुख से गुस्सा जो जल्द ही सामने आने वाला था।

 

प्रीतिलता- क्या करने वाले हो आप?

 

मुखिया कुछ नहीं बोला। बस एक झुंझलाहट में अपना सिर हिलाया कुछ देर सोचता रहा फिर अपने हाथ में रखी छोटी सी खुंखरी(तलवार से छोटा जो अक्सर घास झाड़ियां काटने के लिए गांव के लोग रखते हैं) निकाली।

मुखिया ने देवांश को उठाने के लिए गांववालों को इशारा किया जिसे गांव वालों ने सहर्ष स्वीकार किया और देवांश को खड़ा किया। देवांश की हालत ऐसी नहीं थी कि वो प्रतिकार कर सकता और प्रीतिलता कमोबेश ऐसी ही हालात में नजर आ रही थी लाचार और अजीब सी सोच में पड़ी हुई।

मुखिया ने कुछ नहीं कहा और अपने चेहरे पर हाथ रखकर एक बार अपने सिर पर से घुमाता हुआ हाथ को नीचे लाया।

अचानक तेज सरसराहट के साथ खच्च की आवाज के साथ खुंखरी देवांश का कुछ मांस अपने साथ लेती हुई देवांश के पेट को चीरते हुए बाहर निकल आयी।

एक जोरदार कराहट के साथ धम्म की आवाज से देवांश जमीन पर गिर पड़ा।

प्रीतिलता भी एक जोर से चीख मारती हुई अपने पिता पर झपटी लेकिन खुंखरी फिर चमकी और फिर से खच्च की आवाज से उसके पेट को चीरती हुई एक कोने से बाहर निकल गयी।

प्रीतिलता हक्क की आवाज निकालती हुई धम्म से जमीन पर गिर पड़ी।

मुखिया खून से रंगी खुंखरी पकड़े एक ओर खड़ा था जिसके साथ ही कई गांववाले आश्चर्य की मुद्रा में अफसोस करते हुए मुखिया को देख रहे थे।

मुखिया बिना कुछ कहे अपने घर की ओर चल पड़ा साथ ही उसके पीछे पीछे गांव वाले भी चल पड़े।

 

पहाड़ की चोटी पर सांय सांय की आवाज के साथ तेज हवाएं चल रही थी जो बार बार आकर देवांश और प्रीतिलता को हिला रही थी जैसे मानो कह रही हों कि जाग जाओ अभी अंधेरा छंटा नही है।

 

देवांश में कुछ हरकत दिखायी दी और उसने आंखे खोली।

प्रीतिलता को देखकर उससे रहा नहीं गया और घिसटता हुआ वो उसके पास जा पहुंचा ।

बहुत कोशिश की लेकिन वो उसे जगा नहीं पाया जगाता भी कैसे वो चिरनिंद्रा जो कर रही थी।

उसने हिम्मत जुटाकर आस पास से कुछ सामान जुटाना शुरू किया खून बह रहा था लेकिन उसे परवाह नहीं थी जितना जल्दी हो सके उसने कुछ लकड़ियां और घास फूस इकट्ठा किया और ये सब आरती देख रही थी।

जो शायद अब तक नहीं गयी थी ये देवांश को तब एहसास हुआ जब उसे आरती की सिसकियां सुनायी दी।

 

देवांश- मेरी कुछ मदद करो कुछ दूर ही इस पहाड़ी के पीछे मुर्दे जलाने की जगह है वहां से कुछ राख ले आओ और हो सके तो एक छुरा भी ले आना।

 

आरती जैसे इसी को सुनने का इंतज़ार कर रही थी। वो तुरंत उस ओर भागी।

 

एक एक पल बहुत लंबा खिंच रहा था जो भारी हो रहा था देखते देखते देवांश की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था।

उसने जैसे तैसे कुछ बुदबुदाते और खाँसते खाँसते प्रीतिलता के चारों ओर एक घेरा बनाना शुरू किया।

काफी देर मंन्त्र बोलता हुआ वो अचानक से निढाल होकर प्रीतिलता के ऊपर ही गिर पड़ा।

 

तब तक आरती भी आ गयी थी उसने राख और छुरा जमीन पर रखकर देवांश को जगाने की कोशिश की बहुत कोशिश की लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ।

आरती एक ओर अपना सिर पकड़ कर बैठ गयी और अपने किये पर पछताने लगी।

वो अभी अफसोस ही कर रही थी कि देवांश की आंखे खुली और वो बोला-

“ले आयी तुम राख?”

 

आरती ने हाँ में अपना सिर हिलाती हुयी सिसकियां लेती हुयी आँसू पोंछते हुए बोली-

“हाँ”

 

देवांश बैठा बैठा ही रख को चारों तरफ अजीब सी मुद्रा में घूमते हुए मंत्र बुदबुदा रहा था।

उसने छुरा कांपते हुए हाथों से उठाया और चिल्लाते हुए ऊपर आसमान की तरफ देखता हुआ अपनी गर्दन पर छुरा चलकर सारा खून प्रीतिलता के ऊपर उढेल दिया और उसके ऊपर ही गिर पड़ा।

 

आरती को एहसास भी नहीं हुआ कि ये क्या हो गया वो बस उन दोनों के मृत शरीर को देखती हुई रोये जा रही थी।

शाम हुई अंधेरे ने उन दोनों को अपने आगोश में ले लिया तब तक आरती जा चुकी थी।

रात फिर एक अधूरी कहानी की गवाह बनी थी एक ऐसे अधूरे किस्से की गवाह जिसका पूरा होना अब नामुमकिन था।

तेज सर्द हवाओं और हर तरफ टर्र टर्र की भयावह आवाजों ने यह देख लिया था कि अब एक दुखदायी दिन ने अपनी बलि फिर से दे दी है।

 

अचानक अंधेरे को चीरती हुई एक तेज किरण देवांश और प्रीतिलता के शरीर से टकरायी और वापस लौट गयी।

 

कुछ देर बाद वातावरण में एक भयानक आवाज ने अपना पहरा जमा दिया।

अब हर तरफ बस यही आवाज सुनायी दे रही थी साथ ही दिख रही था एक साया जो अभी धूल से सनकर उठा था।

 

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Written By- Devendra Gamthiyal for Comic Haveli

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9 Comments on “Ant Hi Prarambh hai”

  1. वाह गुरुजी! बेहद शानदार कहानी है, शुरुआत तो ऐसे हुई जैसे बेहद रोमांटिक कहानी है, परन्तु जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती गयी ,वैसे वैसे ही रोमांच बढ़ने लगा, अन्याय , दुराचार , त्याग और बलिदान से परिपूर्ण इस कथा में मुझे बस एक ही चीज बहुत बुरी लगी और वो है देवांश का अपने माँ पर हुए दुराचार कस बदल न ले पाना, गाँव वालों के हाथों बेरहमी से पीटा जाना,।

    अपनी मोहब्बत पर कुर्बान हो जाना, ये आशिको के लिए प्रेरणा हो सकती है मगर बिना प्रतिरोध किये

    नैना की स्टोरी बहुत ही सैड है ,जो स्टोरी में नया मोड़
    लाती है , मगर बदल न पाना इसकी अफसोस है।
    पूरी की पूरी कहानी लव और रोमांच ,थ्रिलर से भरी हुई ,एक्शन का तो कही नामोनिशान तक नही है।

    रोना आ गया ,आँखों में आँसू भर आये
    क्या किसी समाज मे इतनी बुरी प्रथा हो सकती है?? ,क्या किसी को भी सच्ची मोहब्बत करने का हक़ नही है??, क्या आज भी लोग सच्ची मोहब्बत को समझने से इनकार करते है???
    या फिर लोग इस चीज को समझना ही नही चाहते???
    ऐसे कई सवाल मन मे एक साथ उठ खड़े हुए।

    किसी भी व्यक्ति के मन मे इस कहानी को पढ़ने के बाद ऐसे सवालों का उठना वाजिब है, कोई भी इसे पढ़कर भावुक हो जाएगा, अन्तरात्मा तक को झकझोर कर रख देने वाली कहानी है ये। बहुत कुछ कह देना चाहता हूं मगर कह नही पा रहा ,शायद अब मेरे पास शब्द ही ना बचे हो, अंत मे मैं यही कहूंगा कि बहुत बहुत शानदार कहानी है,
    10/10
    धन्यवाद गुरुजी, ऐसी कहानी हमे पढ़ने को देने के लिए।
    ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️

    Just Love this ❤️

  2. एकदम मस्त और सब से हटकर कहानी। आज तक इस वेबसाइट पर ऐसी कहानी न आई होगी। आखिरी तक रुला गई। देवांश की माँ के साथ हुआ दुराचार बहुत बुरा था। सच में कुछ गांवों में आज भी ऐसे अंधविश्वास भरे हुए हैं।
    शुरू में लग रहा था यह कहानी बहुत रोमांटिक होने वाली है परन्तु देवांश और प्रीतिलता की प्रेम कथा शुरू होते ही समाप्त हो गई।

    समझ नही आ रहा मैं इस कहानी की तारीफ़ कैसे करूँ ? क्योंकि मुझे ऐसे शब्द ही नही मिल रहे। काफी कुछ नया देखने को मिला। देव भाई का कहानी कहने का ढंग बिल्कुल अलग है जो की मुझे बहुत अच्छा लगता है। कहानी किसी फ़िल्म की तरह आँखों के सामने चलती हुई सी लगती है।
    कहानी का अंत भी सही है । लेकिन न जाने क्यू ऐसा लग रहा है कुछ रह गया है। धूल में सन कर उठने वाली आकृति कौन थी? देवांश या प्रीतिलता? खैर दोनों में से जो भी हो। लेकिन एक बात तो पक्की है अब दुश्मन बहुत बुरी मौत मरने वाले हैं।

    धन्यवाद देव भाई । इतनी मस्त कहानी के लिए। जल्दी अगला भाग भी ले कर आइए। जल्दी से भी जल्दी

    10 out of 10

    1. बहुत बहुत धन्यवाद तल्हा जी आशा है आपको इसका द्वितीय खण्ड पसंद आएगा।

  3. देवेंद्र , बहुत अच्छा लगा कहानी पढ़कर ,
    फ़्लैश बैक में जाना फिर वर्तमान आना और कहानी से कनेक्ट होना , फिल्मी टच देता है कहानी को
    पर तुम्हारा अपना अलाग तरीका है कहानी को व्यक्त करने का ।

    मेरा अनुमान है कि प्रीतिलता जो ज़िन्दा कर गया देवांश मरते मरते , और अब वो बदला लेगी ।

    अगली कहानी और शानदार होने वाली है ।

    शुभकामनाएं

  4. आपका कहानी कहने का जो स्टाइल है वो बहुत अच्छा है। बस एक बात ये समझ नहीं आयी कि देवांश की मां तो पहले कभी बुढ़िया से नहीं मिली थी तो बुढ़िया ने देवांश को उसके बारे में कैसे बताया होगा?
    बाकी कहानी काफी डार्क और गंभीर है, शुरुआत जब इतनी धमाकेदार है तो आगे तो न जाने क्या क्या होगा।

    1. इसका जवाब तो कहानी में ही है, क्योंकि सेम यही सवाल प्रीतिलता भी पूछती है, देवांश बताता है कि उसकी दादी काले जादू टोने में माहिर थी इससे वे उसकी माँ का अतित जान पाई।

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