Apradh Unmoolan Ke Baad Part 7

श्रृंखला:- अपराध उन्मूलन के बाद

भाग – 7

प्रथम अध्याय ☆भेड़िया की वापसी☆

स्थान ○ असम का जंगल।

लोगों की भीड़ लगी हुई थी , जंगल के बॉर्डर पर। उस बॉर्डर पर, जहाँ से एक सड़क मेन रोड की ओर जाती थी । और वहाँ से शहर की ओर। आज सभी कबीले के लोग, जंगली जानवर और फूजो तथा जेन……जेन, जेन, । ऐं! ये मैं क्या लिख रहा हूँ । जेन! लिखना तो पड़ेगा ही । क्योंकि ये जेन ही है। अरे! पर ये तो जलकर मरखप गई थी। फिर इस बुड्ढे-टुड्ढे के बगल में कैसे खड़ी है आज। और ये सभी जंगलवासी किसे हाथ हिलाकर विदा कह रहे हैं। ऐं! ये कोट-धारी बन्दा कौन है? जो हाथ में सूटकेस थामकर जंगल से बाहर जाने वाली सड़क पर बढ़ रहा है। इसने तो नागराज जैसा कोट पहना हुआ है। सर-पर नागराज के जैसा टोपा भी है। आखिर ये है कौन? थोड़ा नज़दीक चलता हूँ। ……………….अरे! कसम देवेन्द्र भाई की पगली की । ये तो, ये तो भेड़िया है। ये, ये, ये नइखे हो सकत। ये ज़िंदा कैसे है ।

और फिर देखते ही देखते भेड़िया सबकी नज़रों से ओझल हो गया। सभी कबीले, जानवर, फूजो तथा जेन वापस हो लिए ।

लेकिन मुझे घनचक्कर कर दिया है इन- लोगों ने,गुर्र। अब कैसे पता करूं की भेड़िया जीवित कैसे हुआ।

दोस्तों आपके भी मन में सवाल उठ रहे होंगे । है न। तो आइये चलते हैं सवाल का जवाब जानने। मुझे एक ही बन्दा नज़र आ रहा है जिससे मै सवाल कर सकूं। और वो है खाटू कबीले का सरदार खटुवा, हीही। तो आइये चलते हैं खटुवा के खाटू कबीले  की ओर।

खाटू का कबीला –

अरे! यहाँ तो नाच गाना चल रिया है।

“ पनघट पे आके सइयां , मरोड़े बइयां ”

खटुवा : तेरी बइयां कौन मरोड़ेगा रे मोटकी। चल हट । अनारकली को बुला।

खटुवा का ख़ास सेवक पड़ुवा

पड़ुवा : सरदार अनारकली नही आएगी आज।

खटुवा : काहे? कहाँ गईस ?

पड़ुवा : ऊ सलीम की गली छोड़कर डिस्को चली गई।

खटुवा : क्या! गुर्र । अब हम क्या यहाँ गैंडियों का नाच देखें। गुर्र।

पड़ुवा : सरदार गुस्सा पुचक दो।

खटुवा : आक्… थू। ले पुचक दिया गुस्सा ।

पड़ुवा : हाँ। अब लो ये हूरो।

पड़ुवा ने एक छोटा सा कागज़ का पैकेट बढ़ाया खटुवा की तरफ । खटुवा उस पैकेट से निकाल-निकाल कर खाने लगा वो– मिठाई।

खटुवा : अहा: । वाह। अरे ओ…पड़ुवा, बड़ी बढ़िया मिठाई है। कहाँ से पड़ुवा पाई है?

पड़ुवा : सरदार इस-बार पड़ुवा नही पाई है । ये मेरठ की मशहूर नानखटाई है। अब अपने जंगलवा में भी आई है…। आपके इस सेवक ने ख़ास आपके लिए खरीदकर लाइ है।

खटुवा : क्या? अपने जंगलवा में भी आई है?

पड़ुवा : हाँ!

खटुवा : वाह! फिर तो रोज़ हूरा करेंगे।

अब बस बहुत हुआ ।

“ अबे ओ खटुवे! ”

खटुवा : क क कौन है?

“ वही, जिसने तुझे इस पार्ट में रोल दिया ”

खटुवा : अच्छा तल्हा बाबू तुम!

“ गुर्र। बाबू मत बोलियो। वरना तूने जो गिड़गिड़ा-गिड़गिड़ा-कर रोल माँगा है न, कट कर दूंगा। गुर्र। ”

खटुवा : सारी, भइया।

“ हाँ अब ठीक है। चल अब मुझे बता कल क्या हुआ था, भेड़िया कैसे जीवित हुआ? और जेन जल-कर मरी क्यों नही? ”

खटुवा : ओ जी,भेड़ियवा मरा ही कहाँ रहा।

“ क्या!! ”

खटुवा : हाँ। सुनो मैं बताता हूँ। उस दिन भेड़िया की चिता सज चुकी थी। जेनिया भी इस जिद पर अड़ी रही की मुझे भी अपने पति की चिता के साथ जलना है।―और…..आगे अब आप सुनते जाओ।

एक दिन पहले:-

भेड़िया की चिता पर मिट्टी का तेल डाला जाने लगा था, साथ ही जेन पर भी। जल्द ही ये प्रक्रिया पूर्ण हो गई।

जेन : 💭अबे बुड्ढे-टुड्ढे, कितना ज़ालिम है तू। गुर्र💭

फूजो : अब पत्थर मारने की प्रक्रिया आरम्भ की जाए।

जेन : 💭 पत्थर! 💭 लेकिन बाबा! पत्थर किसे मारना है।

फूजो : अरे बेटी, ये हमारा रिवाज है। पत्थर मारकर चिता जलाना। भूल गई क्या।

जेन : अ…न न नही ।

फूजो बाबा खटुवा की तरफ मुड़े।

फूजो : खटुवा! अब मैं चिता के इस साइड से पत्थर मारता हूँ और तुम उधर से। ठीक है। हमे पत्थरों को निशाना साधकर फेंकना होगा। ताकि पत्थर हवा में ही आपस में टकराएं और उनमे से चिंगारियां निकलें। जिससे चिता में आग धर ले। समझ गया। 💭हीहीही।💭

खटुवा : हाँ समझ गया 💭बे बुड्ढे💭

फूजो : ठीक है ।मेरे तीन गिनने पर।………..तीन!

सन्ss……..भड़ाक !

खटुवा : आहsss

बिलबिला उठा खटुवा । पत्थर ने सीधा उसका टकला बजा डाला था।

फूजो : क्या हुआ! ठीक तो हो? तुमने पत्थर क्यों नही फेंका। मैंने कहा था न तीन गिनने पर फेंकना।

खटुवा : 💭साला बुड्ढा 4#5। तीन तक गिनने को बोला , तीन तक तो गिना ही नही। 💭 फूजो बाबा आपने तो कहा था तीन गिनने पर । लेकिन तीन तक तो गिना ही नही।

फूजो : मैंने तीन गिनने पर कहा था। ये थोड़ी कहा था तीन तक गिनने पर। मैंने एक और दो मन में गिना और तीन ज़ोर से बोला। हीहीही।

खटुवा : 💭साला पोपला बुड्ढा! दाँत हैं नही,फिर भी बत्तीसी चियार रहा है। गुर्र।💭

फूजो : चलो । अब फिरसे तीन गिनने पर फेंकना ।……….तीन।

इस-बार खटुवा सतर्क था, ज्यों ही उसने तीन सुना, फ़ौरन पत्थर भाज दिया। फूजो और खटुवा के पत्थर आपस में टकराये और एक तेज़ “चिंगss” की आवाज़ के साथ चिंगारियां बाहर निकलीं। चिंगारी भेड़िया की चिता पर गिरी और चिता फ़ौरन भभक उठी। देखते ही देखते चिता को आग ने चारों ओर से चाँप लिया। भक्-भक् करके जल उठी चिता। पर जेन क्यों नही जली? अरे! जेन! जो की कुछ देर पहले चिता से सट-कर बैठी थी अब दो कदम दूर जाकर बैठी है। फूजो बाबा जेन की तरफ मुड़ते हुए बोले।

फूजो : अरे जेन बेटी! यहाँ क्यों बैठी हो? जाओ आग में कूद जाओ।

जेन : 💭बुड्ढा , बोल तो ऐसे रहा है जैसे आग नही स्विमिंग पूल हो।💭

फूजो : क्या हुआ बेटी ? डर लग रहा है? कोई बात नही , धीरे-धीरे डर खत्म हो जायेगा💭शरीर के साथ। हीहीही।💭

जेन : अ…बाबा..पता नही क्यों मेरा दिल कह रहा है की भेड़िया अभी जीवित होकर बैठ जायेगा।

खटुवा : 💭गुर्र। हाँ तेरा भेड़िया जस्टिस लीग का सूअर मैन…मेरा मतबल सुपर मैन है , जो टनटना कर खड़ा हो  जाए…💭ओ…ओ..

खटुवा के शब्द उसके मन में ही आधे अटक गए और उसके मुंह से टार्ज़न बोलने लगा, ओ…ओ…ओ..। जिसका कारण थी–भेड़िया की चिता। जिसपे रखे हुए जलते लट्ठे अचानक भड़-भड़ करके गिरने लगा। अचानक सारे लट्ठे एक-साथ हवा में उड़ने लगे । और तभी– भेड़िया कूदकर खड़ा हुआ, तत्काल ही कूदता हुआ एक ओर भागने लगा। उसकी डिक्की में आग लगी हुई थी।

भेड़िया चिल्लाता हुआ भागा।

भेड़िया : अरे मइय्या! जला दिया रे ! जला दिया । भैं……….

पास ही कीचड़ का गड्ढा था। फौरन ही भेड़िया उसमे लुढ़क गया।

सभी जंगलवासी और साथ में फूजो–हैरान थे। तथा जेन गच्च् थी।

जेन : 💭भेड़िया…..भेड़िया वापस आ गया। और मैं जलकर मरने से बच गई।💭

सभी एक साथ कूदते-फांदते उस गड्ढे तक पहुंचे।

भेड़िया धीरे-धीरे बाहर निकला। उसके सर पर एक मेंढक विराजमान था।

भेड़िया : पुच्च…(कीचड़ थूकते हुए) गुर्र। मेरी चिता किसने सजाई?

“ हम सब ने । हीहीही ”

सभी जंगलवासी एक-साथ दांत चियारते हुए बोले ।

भेड़िया : गुर्र, बेशर्मों । एक तो जीवित व्यक्ति की चिता सजा देते हो। ऊपर से हंसते हो!

“ टर्र-टर्र ”

भेड़िया के सर पर बैठा हुआ मेंढक टर्राया ।

खटुवा भेड़िया के करीब पहुंचा, और कान में फुसफुसाया।

खटुवा : “ एक बात बोलूं । मैंने तुम्हारी चिता नही सजाई थी । एक ढेला भी नही सजाया था मैंने। ”

कहकर खटुवा ने भेड़िया के सर पर बैठे मेंढक को हाथों में लेकर गटक लिया।

खटुवा : अहा। बड़ा ही स्वादिष्ट कीचड़ भरा मेंढक  था। हीही।

तब-तक फूजो के आदेश पर एक हाथी अपने सूंड में जल भर लाया था। हाथी ने वो जल भेड़िया पर छिड़का। कुछ ही देर में भेड़िया पूरी तरह धुल चुका था।

जेन आकर भेड़िया से लिपट गई।

खटुवा : 💭 ससुरी। जब कीचड़ लगा रहा । तब नाही लिपटिस रही भेड़िया से।💭

जेन : भेड़िया…..भेड़िया…तुम क्यों मर गए थे?

खटुवा : 💭 आईं!…..। 💭

भेड़िया : मैं मरा नही था जेन! बस मैंने कुछ देर के लिए अपनी आत्मा को अपने शरीर से अलग कर लिया था।

फूजो : क्या!!! ये तुमने कहाँ से सीखा? मैंने भी सुना है इस बारे में। पर ये बहुत ही मुश्किल है।

भेड़िया : ये कला मुझे गुरुराज-भाटिकी ने सिखाई थी। पर ज़्यादा इस्तेमाल करने से व्यक्ति सच में मर सकता है। मैंने इसका इस्तेमाल आज दूसरी बार किया है। चूंकि मेरे शरीर में भयंकर और असहनीय पीड़ा हो रही थी, जिसे मैं अब बर्दाश्त नही कर पा रहा था। इसलिए मैंने कुछ देर के लिए अपनी आत्मा को अपने शरीर से अलग कर लिया।

फूजो : ओss।

भेड़िया : और आप-सब ने मुझे मरा जानकर मेरी चिता सजा दी। गुर्र।

फूजो : गलती तो होती है बेटा। सबसे होती है। तुमसे भी तो गलती हुई । तुम्हे मुझे बता देना चाहिए था–कि  तुम अपनी आत्मा को कुछ देर लेफ्ट-राईट करने के लिए निकाल रहे हो। हीही।

भेड़िया : वो सब छोड़िये। सबसे पहले मुझे ये बताइये….वो कोबी का बच्चा कहाँ है?

खटुवा : 💭बाप बनने ही कहाँ दे रहा है तू उसे….अरे बाप रे! ये क्या बोल गया।💭

भेड़िया के चेहरे पर अचानक ख़ूँख़ारपना झलकने लगा।

भेड़िया : बताओ मुझे !!! जल्दी बताओ !!! कहाँ है वो जानवर? आज उसे जीवित नही छोड़ूंगा मैं।

खटुवा : 💭 अबे जा जा। अभी-अभी मरकर बचा है उसके हाथों तू। 💭

फूजो बाबा बोले।

फूजो : उसका कुछ पता नही है भेड़िया। जब तुम्हारा उपचार चल रहा था, उस वक़्त हमने उसे ढूँढने की खूब कोशिश की। परन्तु वो हमे नही मिला।

भेड़िया : मेरे डर से कहीं जा छुपा होगा। पर जायेगा कहाँ मैं उसे ढूंढ निकालूँगा।

भेड़िया चलकर फूजो की कुटिया में गया। कुछ जंगलवासी अपने अपने घरों की ओर चल दिए, कुछ अब भी पीछे-पीछे थे। भेड़िया ने सुराही से पानी निकाल कर पिया।

भेड़िया : आह: । गले में नागफनी उग आये थे,गुर्र। अब चैन पड़ा।

तभी भेड़िया की नज़र ट्रांसमीटर पर पड़ी जो उसे ब्रह्माण्ड रक्षकों की ओर से मिला था। उसपर एक मैसेज साफ़ दिख रहा था।

भेड़िया ने उसे मन ही मन पढ़ा।

भेड़िया : 💭 समझ गया मैं! कहाँ गया है ये जानवर। ब्रह्माण्ड रक्षकों के साथ छर्रे खेल रहा होगा। मुझे ब्रह्माण्ड रक्षकों के नए हेडक़वार्टर का पता तो नही पता। लेकिन महानगर जाने का रास्ता जानता हूँ मैं। वहां पहुंचकर नागराज का पता मिल जायेगा। और जब नागराज का पता मिल जायेगा तो कोबी का पता भी मिल जाएगा। अब तो उसे बिना जान से मारे नही छोड़ूंगा मैं। गुर्र। 💭

और फिर भेड़िया महानगर जाने की तैयारी करने लगा ।

वर्तमान में :-

खटुवा : और आज का सारा दृश्य तो तुमने देख ही लिया “तल्हा भाई” । भेड़िया महानगर की ओर निकल चुका है।

“ तो ये थी सारी कहानी। ”

खटुवा : हाँ।

तभी खटुवा का सेनापति “मरवा” पिनपिनाता हुआ आया।

मरवा: सरदार! सरदार!

खटुवा चौंककर सिंहासन से नीचे लुढ़क गया।

खटुवा : (उठते हुए) इतना भयंकर राग क्यों फाड़ रहा है बे? तेरी बीवी मर गई क्या?

मरवा : बीवी मर जाती तो पूरे कबीले को दावत देता मैं। चिल्लाता थोड़ी न।

खटुवा : फिर क्या हुआ?

मरवा : वो जी , नगाड़ा कबीले की नाड़ियों…मेरा मतलब नारियों ने नाड़ा बांधकर…म..मेरा मतबल नगाड़ा बजाकर हम पर आक्रमण कर दिया है।

खटुवा : क्यों बे?

मरवा : वो जी, बात ये है कि–मैं अपने कुछ सैनिकों के साथ छोटे लेकर निकला हुआ था.. बोतल हीही। तभी मैंने देखा–नगाड़ा कबीले की एक नारी हमारे कबीले से हीरे चुराकर भाग रही थी ।

खटुवा : क्या??

मरवा : हाँ। मैंने और मेरे सैनिकों ने तत्काल ही उसे चाँप लिया और हीरे छीनने की कोशिश करने लगे। लेकिन उस स्त्री ने फौरन हल्ला मचाना शुरू कर दिया। और देखते ही देखते नगाड़ा कबीले की सभी नारियां चिमटे ले-लेकर उखड़ कर चली आईं।

पड़ुवा : (खटुवा से) लेकिन सरदार हमारे पास तो एक भी हीरा नही है! हीरा क्या, एक ढेला भी नही है। हमारा कबीला तो भुंगी कबीलों में से एक है।

खटुवा : (कुछ सोचता हुआ) अबे हाँ!

पड़ुवा : और सरदार , हमारे और नगाड़ा कबीले के बीच हुड़क-बाज़ कबीला पड़ता है। मान लीजिये अगर सेनापतिजी ने उस स्त्री को अपने कबीले के पास पकड़ा था तो फिर उस स्त्री के चिल्लाने से उसके कबीले की स्त्रियां कैसे चलीं आई। उसकी आवाज़ इतनी तेज़ तो नही रही होगी की हुड़क-बाज़ कबीले को पार करती हुई उसके कबीले वालों को सुनाई दे जाए।

खटुवा का माथा अब ठनका, उसकी आँखें नाचती सी लगीं।

खटुवा गुस्से में हरा-पीला होकर सेनापति की ओर पलटा।

खटुवा : साले मरवे! तू मरवाकर मानेगा। हमेशा मुझे मरवाने के चक्कर में रहता है तू। साला खुद पी-कर लुढ़कता हुआ नगाड़ा कबीले तक पहुँच गया और वहाँ की स्त्री को छेड़कर चला आया।गुर्र।

तब-तक बाहर नगाड़े की तेज़ आवाज़ें सुनाई देने लगी थीं।

पड़ुवा : गुर्र। अब तो पंगा ले ही लिया है तो फिर चलो, नुचवाओ अपना-अपना झोटा।

खटुवा : नही। हम भी नोचेंगे। सेनापति! सैनिकों को चिमटे थमा दो। हम ईंट का जवाब ईंट से ही देंगे।

सेनापति सैनिकों की ओर मुंह करके चिल्लाया।

सेनापति : सैनिकों ! चिमटे उठा लो रे! चलो झोटा नुचव्वल करने !

“ लो । ये तो चल दिए झोटा-नुचव्वल करने। आइये अब आप और मैं राजनगर चलते हैं। क्योंकि वहां भी हालात झोटा नुचव्वल वाले ही होने वाले हैं। ”

★प्रथम अध्याय समाप्त★

द्वितीय अध्याय ☆पीछे पड़ा रोबो☆

राजनगर की हवाओं में आज ख़ामोशी भरी हुई थी। राजन मेहरा निवास देखने में भूतनाथ की हवेली लग रहा था, क्योंकि सन्नाटा बहुत ही भयानक पसरा हुआ था वहां।

और तभी उस भयानक सन्नाटे को हैलीकॉप्टर की उस भयानक आवाज़ ने भंग किया। फट-फट करता हुआ हैलीकॉप्टर सीधा मेहरा निवास के सामने लैंड कर गया। और उसमे से उतरा–ग्रैंड मास्टर रोबो। और पीछे-पीछे…अरे बाप रे! नताशा तो दुल्हन के जोड़े में है! तब-तक हैलीकॉप्टर की आवाज़ सुनकर राजन मेहरा सहित रजनी तथा श्वेता भी बाहर आ चुके थे। राजन मेहरा अपने दरवाज़े पर रोबो को देखकर चौंके , और उससे भी ज़्यादा तब चौंके जब उनकी नज़र नताशा पर पड़ी। रजनी और श्वेता की आँखें भी बड़ा वाला कंचा बन गईं।

रोबो एक हाथ में बेटी का हाथ पकड़े हुए आगे बढ़ा। और कमिश्नर के पास पहुँचा।

रोबो : नमस्ते समधी जी।

राजन मेहरा : हैं!!

रोबो : हैं नही हाँ बोलो अब। मुझे पता था तुम और तुम्हारा लौंडा बारात लेकर नही आओगे । तुम इसलिए नही आते क्योंकि मैं एक आतंकवादी हूँ, और तुम्हारा बेटा इसलिए नही आता क्योंकि मैं उसका दुश्मन हूँ। इसलिए मैं खुद ही आ गया अपनी बेटी को लेकर । अब बुलाओ अपने लौंडे को । फेरे लगवाएं जाएँ। पण्डित जी भी हैलीकॉप्टर में बैठे हुए हैं। हीही

अब सारा माजरा कमिश्नर और उनके परिवार को समझ में आ गया था।

कुछ पल ख़मोशी छाई रही, जिसे फिर रोबो ने ही तोड़ा।

रोबो : क्या हुआ कमिश्नर ? तुम्हारे छोकरे ने कुछ बताया नही था क्या?

राजन मेहरा : मेरा छोकरा अब नही रहा वो भगोड़ा।

रोबो : भगोड़ा?

राजन मेहरा : हाँ भगोड़ा। घर छोड़कर भाग गया वो । तीन दिन हो गए आज । ढूंढते-ढूंढते थक गया। मुझे तो लग रहा था तेरी बेटी के साथ ही भागा–

रोबो : खामोश!

बीच में ही दहाड़ उठा रोबो।

रोबो : मेरी बेटी क्या तुझे तेरे बेटे की तरह भगोड़ी नज़र आती है।

नताशा रोबो के कान में फुसफुसाई ।

नताशा : “गुर्र। पापा। लगता है वो रिचा उसे लेकर भाग गई!”

राजन मेहरा रोबो के थोड़ा करीब आकर फुसफुसाए।

राजन मेहरा : “रोबो अब चुपचाप यहाँ से निकल लो। तुम्हारी बेटी की वजह से मैं तुम्हे यहाँ से जाने दे रहा हूँ। सरक लो यहाँ से वरना अगर किसी ने तुम्हे देख लिया तो ,मुझे तुम्हे पकड़ना ही होगा। ”

ज़ोरदार हंसी फूटी रोबो के बुक्के से ।

रोबो : मैं सब समझता हूँ कमिश्नर। तूने ही अपने बेटे के साथ मिलकर उसे कहीं भगा दिया । ताकि तेरा बेटा इस आफत…सॉरी मेरी बेटी से बच सके।

राजन मेहरा : अबे मैंने कुछ नही किया। गुर्र।

राजन मेहरा भी दहाड़ उठे थे।

राजन मेहरा : ज़रूर वो उस दूसरी छोकरी रिचा के साथ कहीं भाग गया है।

राजन मेहरा, रजनी और श्वेता के मुँह से एक साथ निकला “ रिचा! ”

क्योंकि रिचा भी वहां आ पहुंची थी।

रिचा ने सभी को हाय किया।

रिचा: (राजन मेहरा से) अंकल ध्रुव किधर है?

कमिश्नर तो दीदे फाड़े खड़े थे । जैसे दिन में एंथोनी को देख लिया हो । बेचारे कमिश्नर तो यही सोच रहे थे की ध्रुव, नताशा या रिचा के साथ भाग गया है। परन्तु वो दोनों तो आज खुद ध्रुव को खोज रही थीं।

रिचा: क्या हुआ आपलोग ऐसे मुंह फाड़ कर क्यों खड़े हैं?और रोबो के साथ ये चुड़ैल कौन है?

नताशा : 💭गुर्र। थोबड़ा फोड़ देती इसका अगर मेरा ससुर सामने न खड़ा होता। 💭

रोबो : (कमिश्नर से) ये बेहूदी लौड़िया कौन है?

रिचा: वो तो दिख रहा है, बेहूदी मैं हूँ या तेरी बेटी ।

नताशा : 💭गुर्र💭

रिचाअब श्वेता के पास पहुंची।

रिचा: श्वेता बताओ मुझे! ध्रुव कहाँ है?

श्वेता : रिचा। तीन दिन से ध्रुव भैया का अता-पता लापता है।

रिचा: व्हाट!!!

श्वेता : हाँ। (सुबुक)

तभी रोबो तालियां बजाने लगा।

रोबो : मैं समझ गया। सब समझ गया मैं। तुम सब मिलकर नाटक कर रहे हो। ताकि मैं यहाँ से चुपचाप चला जाऊं। पर मैं आज ऐसे नही सरकने वाला । तेरे लौंडे से अपनी नताशा की शादी करवाकर ही जाऊंगा मैं।

राजन मेहरा : हम कोई नाटक नही कर रहे बे। चुपचाप दुड़की  हो जा यहाँ से, वर्ना अभी पुलिस फ़ोर्स बुलाता हूँ।

रोबो : हा हा हा । तेरी फ़ोर्स क्या मुझे पकड़-कर जेल में घुसेड़ देगी? इतना दम नही तेरी फ़ोर्स में।

रोबो ने राजन मेहरा का गिरेबान पकड़ लिया।

रोबो : जब तक तू तेरे बेटे को मेरे हवाले नही करता मैं यहीं धरना जमाउंगा।

और तभी रोबो के सीने पर पड़ी वो किक। रोबो राजन मेहरा का गिरेबान छोड़कर दो कदम पीछे लुढ़का।

चण्डिका , राजन मेहरा के बगल में खड़ी थी।

चंडिका : कमिश्नर पर हाथ उठाने से पहले सत्तर बार सोच ले टर्मिनेटर की औलाद। वरना चण्डिका का चण्डी रूप देखना पड़ेगा तुझे।

नताशा : 💭चण्डिका!💭

रिचा: 💭चण्डिका! इसी से पूछती हूँ ध्रुव कहाँ है।💭

रोबो किसी पियक्कड़ की भांति लड़खड़ाता हुआ उठा ।

रिचा चण्डिका के पास पहुंची ।

रिचा: आ…चण्डिका! तुम्हे पता है , ध्रुव कहाँ है?

चंडिका : गुर्र। अभी तो बताया वो तीन दिन से गायब है।

रिचा: 💭हैं!!! इसने कब बताया!💭

तब-तक रोबो सम्भल चुका था।

रोबो : (चण्डिका से) मुझे पता था तुझ जैसे नमूने-नमूनियां फ़टे में टंगरी अड़ाने ज़रूर आएंगे। इसलिए मैं भी कुछ नमूनों को लेकर आया हूँ।

रोबो हैलीकॉप्टर की ओर थोबड़ा करके चिल्लाया।

रोबो : सड़ी-बण्डी! ज़रा इस चण्डी को अपनी सड़ी हुई बण्डी तो सुंघा।

रोबो की पुकार पर हैलीकॉप्टर का पिछला दरवाज़ा भड़ाक की आवाज़ के साथ खुला। और उसमे से एक शख्स एक्शन में छटक-कर बाहर निकला और…..सड़क पर औंधे मुंह पसर गया।

रोबो ने अपनी आँखों पर हाथ रख लिया। चण्डिका बुक्का फाड़कर हंसने लगी।

सड़ी-बण्डी कराहता हुआ उठा।

सड़ी-बण्डी : अरे दइया रे दइया ! अंगुरी टूट गई।

उसकी बाएं हाथ की एक उँगली टूटकर लटक रही थी।

रोबो : अबे ! तुझसे किसने कहा था अल्लू-अर्जुन की तरह एंट्री मारने को! गुर्र। अब ज़्यादा रो मत। चल इस चण्डी को अपनी बण्डी का कमाल दिखा।

सड़ी-बण्डी हिहियाता हुआ चण्डिका की ओर बढ़ा।

सड़ी-बण्डी : हीहीही। मेरा नाम है सड़ी-बण्डी । साढ़े ढाई साल, साढ़े ढाई महीने, साढ़े ढाई हफ्ते, साढ़े ढाई घण्टे, साढ़े ढाई मिनट, साढ़े ढाई सेकेण्ड हो गए मुझे इस बण्डी को पहने हुए…

उसने अपनी बण्डी की ओर इशारा किया जो उसके हड्डी जैसे शरीर पर लहरा रही थी और अपनी फूटी किस्मत पर रोती सी मालूम पड़ रही थी। बेचारी बण्डी को इतने वक़्त से धोया नही गया था–पर वो बण्डी अकेली नही थी। उस चंचेड़े शरीर ने एक झोला जैसी चड्डी भी पहन रखी थी जिसकी हालत भी उसके सगे भाई(बण्डी) जैसी ही थी।

सड़ी-बण्डी : …और इतने दिनों से न ही मैंने अपनी बण्डी धोई है न ही चड्ढी । और अब मेरी बण्डी तथा चड्ढी सड़ कर इतना बुरा महक छोड़ने लगे हैं की सामने वाले की नाक के बाल तो क्या, सर के बाल भी जल जाएँ…इस भयानक बदबू से । हीहीही। यही मेरी शक्ति है। मैं अपने दुश्मनो को बदबू सुंघा-सुँघाकर मारता हूँ।

सड़ी-बण्डी के द्वारा छोड़ी गई ये डींग सच्चाई थी…ये बात चण्डिका को तब पता चली जब वो उसके करीब पहुँच गया।

चण्डिका : 💭उफ्…लाहौल वला कूवत। कितनी भयंकर बदबू है, जैसे नर्क से आ रही हो।💭

चण्डिका को अपना दम घुटता सा लगा। वो चकरा सी गई। और इसी बात का फायदा उठाया सड़ी-बण्डी ने। एक घूँसा सीधा आकर चण्डिका के मुंह पर पड़ा। चण्डिका को दिन में सूरज नज़र आ गया। हीही।

चण्डिका : 💭आह…देखने में ये सींकड़ी सा है , पर इसके वार में ज़बरदस्त ताकत है। 💭

और इससे पहले की चण्डिका संभलती–एक किक उसके दाएँ घुटने के पीछे पड़ी–तत्काल ही चण्डिका का दायाँ पैर मुड़ गया और वो गिर पड़ी।

चण्डिका : 💭उफ्.., लगता है इसे मार्शल-आर्ट्स का भी ज्ञान है।💭

सड़ी-बण्डी : क्या सोच रही है रे छोरी? ब्रूस-ली के परपोते के नाती के नाना की बेटी के बेटे ने मुझे सिखाया है मार्शल आर्ट्स ।

कहने के साथ ही सड़ी-बण्डी ने अपने घुटने से एक ज़ोरदार वार किया चण्डिका की ठुड्डी पर । चण्डिका पीछे की ओर पलटी खाकर गिर पड़ी।

रजनी परेशान होकर राजन मेहरा से बोलीं।

रजनी : अजी क्या देख रहे हो जी। यहाँ दंगा शुरू हो चुका है और आपने अभी तक पुलिस फ़ोर्स नही बुलाई।

राजन मेहरा घूमे।

राजन मेहरा : (इधर-उधर देखते हुए) श्वेता कहाँ गई??

रजनी : उसे बहुत अर्जेंट में घर के अंदर जाना पड़ा।

राजन मेहरा : कौनसा अर्जेंट?

रजनी : अजी समझा करो। गुर्र!

राजन मेहरा : ओह। अच्छा तो अब मुझे पुलिस फ़ोर्स को बुलाना ही होगा।

राजन मेहरा के हाथ में उनका मोबाइल-फोन नज़र आने लगा। अभी वो सही से नम्बर डायल भी नही कर पाये थे की, रोबो ने फोन झपट लिया।

रोबो : हीहीही। बहुत हो गई शरीफ-गिरी । अब मैं भी ज़बरदस्ती करूंगा। अपने लौंडे को जल्दी बुला वरना मैं यही बैठा रहूँगा।

रोबो आलथी-पालथी मार-कर कमिश्नर के सामने ही बैठ गया और नताशा का हाथ खींचकर उसे भी बैठा लिया।

उधर दूसरी तरफ चण्डिका पिट-पिट कर बेहाल हो गई थी।

चण्डिका : 💭ये क्या हो रहा है? पहली बार किसी से इतना पिटी हूँ मैं। इसके शरीर से आती ये भयंकर बदबू मुझे ध्यान से कुछ सोचने का भी मौक़ा नही दे रही और न ही इसके पास जा पा रही हूँ मैं। साथ ही दम भी घुटता जा रहा है।💭

अचानक ही चण्डिका को ध्यान आया उसकी बेल्ट में रखा हुआ वो नोज़ फिल्टर।

चण्डिका : अरे वो फिल्टर तो अभी भी मेरी बेल्ट में ही है। एक बार जब मुझे भैया का पीछा करते हुए गटर के रास्ते जाना था तब मैंने उसे बनाया था।

चण्डिका ने अपनी बेल्ट से वो फिल्टर निकाला और फौरन ही अपनी नाक में घुसेड़ लिया।

चण्डिका : 💭अब देखती हूँ ये बदबूदार मच्छर कितनी देर मेरे सामने टिक पाता है।💭

सड़ी-बण्डी एक ज़ोरदार वार करने के लिए तैयार था। वो थोड़ा पीछे होकर दौड़ता हुआ आया–चण्डिका जानबूझकर सड़क पर बैठी हुई थी। सड़ी-बण्डी किसी बावले गधे की तरह दौड़ता हुआ आया और चण्डिका के थोड़ा करीब पहुंचकर उसने अपनी दोनों टँगरियां हवा में उछाल दीं। उसका इरादा चण्डिका की पीठ पर धम्म की आवाज़ के साथ गिरने का था। परन्तु चण्डिका न सिर्फ ऐन समय पर अपने स्थान से हट गई बल्कि बड़ी ही फुर्ती के साथ गोल घूमकर उसने एक जबर किक सड़ी-बण्डी की पीठ पर लगा दी जब वो हवा में ही था। उस किक की वजह से सड़ी-बण्डी और आगे उड़ गया और कुछ दूर जाकर सड़क पर पसर गया। जब वो उठा तो उसके बाएं हाथ की बाकी चार उँगलियाँ भी टूट कर लटक रही थीं।

सड़ी-बण्डी फुफकारा ।

सड़ी-बण्डी : गुर्र । लड़की! लगता है तुझपर मेरी बदबू असर नही कर रही है…क्योंकि मैंने तुझे देखा था नाक में कुछ ठूसते हुए। पर अब तू देख मेरा एक और कमाल।

सड़ी-बण्डी तत्काल ही अपने दोनों हाथों को आगे पीछे करने लगा और उसके बगलगीरों(काँख) में घर्षण होने लगा। परिणाम स्वरूप…बगलगीरों ने ढेर सारा पसीना उतपन्न करना शुरू कर दिया।

चण्डिका कुछ समझ नही पा रही थी। उसे लगा सड़ी-बण्डी बावला हो गया है। इसीलिए वो उसे बेहोश करने के लिए अपने मुक्के को हवा में लहराते हुए आगे बढ़ी।

परन्तु जैसे ही वो उसके नजदीक पहुँची, उसकी नाक में घुस गई…वो भयंकर बदबू। चण्डिका लड़खड़ा गई–और उसका जो घूँसा सड़ी-बण्डी को पड़ने के लिए तैयार था,हवा में ही रुक गया। सड़ी-बण्डी ने दाँत चियारा और तत्काल ही कूदकर एक घूँसा जमा दिया चण्डिका पर। चण्डिका को फिरसे दिन में सूरज नज़र आ गया।

चण्डिका : 💭आह! नही ये कैसे हो गया। हायsss। मेरा पॉवर फुल नोज़ फिल्टर काम क्यों नही आया। 💭

चण्डिका ने अपनी नाक से नोज़ फिल्टर निकाला। और उसे देखकर वो चौंक गई। उसका नोज़ फिल्टर सड़कर कोयला बन गया था। हीहीही।

सड़ी-बण्डी भी हिहियाया मेरी तरह।

सड़ी-बण्डी : हीहीही। देखा मेरी बदबू का कमाल….तेरा नोज फिल्टर ही सड़ गया।

### : सही कहा। बहुत ही खतरनाक है तू और तेरी सड़ी हुई चड्डी-बण्डी । और ऐसी खतरनाक चीज़ों को जला देती है ब्लैक कैट ।

ब्लैक कैट पास के ही एक घर की छत से कूदी और सड़ी-बण्डी पर पेट्रोल उड़ेलती हुई सड़क पर उतर गई।

चण्डिका : 💭आह! बड़े सही टाइम पर एंट्री की इस काली बिल्ली ने।💭

ब्लैक कैट :💭आखिरकार मैं सही समय पर पहुँच गई। जब मैंने देखा की यहाँ मार पीट शुरू हो चुकी है, मैं तुरन्त घर की ओर भागी, क्योंकि मेरी ब्लैक कैट की पोशाक घर पर ही थी। पर अब इस डंडे जैसे बदमाश का काम तमाम कर दूँगी मैं।💭

ब्लैक कैट लाइटर निकालकर आगे बढ़ी।

सड़ी-बण्डी ने लड़कियों जैसी आवाज़ में चीख निकाली।

सड़ी-बण्डी : नही!!!! ऐसा मत करना प्लीज़ , वरना मैं जलकर मर जाऊँगा । फिर मैं भूत बनकर रातों को तुम्हे बदबू सुंघाने आऊंगा।

ब्लैक कैट: तेरे भूत को भी जला डालेगी ब्लैक कैट ।

ब्लैक कैट ने जलता हुआ लाइटर सड़ी-बण्डी की ओर उछाल दिया। लाइटर सीधा सड़ी-बण्डी के ऊपर गिरा और इसी के साथ ही सड़ी-बण्डी अट्टहास कर उठा।

सड़ी-बण्डी : हा हा हा । मज़ाक कर रहा था मैं तो। मुझे आग जला ही नही सकती। क्योंकि मुझ जैसे बदबूदार बन्दे के पास तो आग भी आने से डरती है। तेरा पेट्रोल भी मेरे शरीर पर पड़ते ही पानी बन गया। हीहीही।

सड़ी-बण्डी सही कह रहा था। क्योंकि लाइटर तो जलता रहा पर उसकी बण्डी जलने को तैयार न हुई।

चण्डिका और ब्लैक कैट की आँखें हैरत से गोटा बन गईं।

सड़ी-बण्डी : हा हा हा हा । उड़ गए न होश । अब तुम्हारे जिस्म से तुम्हारी आत्माएं भी उड़ जाएँगी।

पास में ही एक घर का छत बनाया जा रहा था । बल्ली और पटरों से छत को रोका गया था। अचानक ही सड़ी-बण्डी ने एक पूरी बल्ली उखाड़ ली। छः फुट लम्बे उस बल्ली को जितनी फुर्ती के साथ उखाड़ा था उसने, उतनी ही फुर्ती के साथ ब्लैक कैट तथा चण्डिका पर प्रहार कर दिया। दोनों स्तब्ध सी खड़ी होने की वजह से खुद का बचाओ न कर सकीं और दूर जा छटकीं।

दोनों कराहती हुई उठीं। चण्डिका के मुंह से खून आने लगा था।

चण्डिका : 💭आह! मुझे ऐसा लग रहा है कि अभी बेहोश हो जाऊंगी ।💭

राजन मेहरा निवास से कुछ ही दूरी पर :-

खोलपोल अखबार का कार्यालय। जहाँ का मालिक मिस्टर खोलपोल अपने केबिन में बैठा हुआ मोबाइल से नंबर घुमा रहा था। दूसरी तरफ घण्टी बजने की आवाज़ आई । तुरन्त ही कॉल रिसीव की गई।

खोलपोल : हलो…हलो….हलो।

दूसरी तरफ से गुर्राती हुई आवाज़ आई।

### : बोल बे! कबसे हलो हलो किये जा रहा है। अबे कैसे हलूँ बे! मोबाइल में कोई हल पाता है भला!

खोलपोल खिसियाहट में बोला

खोलपोल : हीहीही। बड़ा अच्छा मज़ाक कर लेते हो आप।

### : अब बक, क्या बकने वाला है?

खोलपोल : वो जी बात ये है….की…तुम तो जानते ही हो कि अपराध का अब पूरी तरह से उन्मूलन हो चुका है। जिस कारण हम जैसे लोगों का धंधा मन्दा पड़ गया है।

### : सीधी तरह ये क्यों नही बोलता की तुझे ध्रुव के बेइज़्ज़ती वाले फ़ोटोज़ चाहिए।

खोलपोल : हीही। बड़े समझदार हो तुम तो।

### : हाँ तो सुन अब। अब तुझे वैसे कोई फ़ोटोज़ नही मिलेंगे।

खोलपोल : हैं! लेकिन क्यों जी?

दूसरी ओर से आवाज़ आई।

### : क्योंकि मेरा जो मकसद था वो अब पूरा होने वाला है। जिस मकसद के लिए मैं ध्रुव के ऐसे फ़ोटोज़ खींचता था, वो मकसद अब कुछ ही देर में पूरा हो जायेगा। अब दुबारा फोन मत करबे! गुर्र!

कॉल डिसकनेक्ट हो गई।

खोलपोल : गुर्र! बड़ा ही वाहियात बन्दा है। और मतलबी भी ।

खोलपोल की अंतरात्मा ने उसे झिड़का।

खोलपोल की अंतरात्मा : अबे तू भी तो मतलबी है साले टकले! मतलब से ही तो तूने फोन किया था उसके पास। और ये बता तूने एक चवन्नी भी उस बन्दे को दी थी।

खोलपोल : बात तो सही कह रिया है। बुहुहु। पर अब म्हारे अखबार क्या होगा?

खोलपोल को जल्द ही बड़ी और विफोटक खबर मिलने वाली है। परन्तु घबराइये मत उससे पहले हमे मिलेगी वो खबर।

राजन मेहरा निवास :-

ब्लैक कैट बड़ी मुश्किल से सड़ी-बण्डी को प्लास्टिक के तारों की मदद से बाँध पाई थी । सड़ी-बण्डी अब बेबस था। बड़ी ही सख्ती से बांधा था ब्लैक कैट ने उसे।

ब्लैक कैट : (चण्डिका से) इसपर वार करने के लिए हमे इसके पास नही जाना है। वर्ना इसकी बदबू हम झेल नही पाएंगे।

चण्डिका : फिर क्या करें?

ब्लैक कैट : हमे जो करना है, इसका रास्ता तो खुद इसी ने हमे दिखा दिया है।

चण्डिका : समझ गई।

अगले ही पल चण्डिका तथा ब्लैक कैट के हाथों में वो बल्ली थी।

ब्लैक कैट : अब हम इसे दूर से ही मार सकेंगी ।

और फिर सड़ी बण्डी पर वार होने लगे। ब्लैक कैट और चण्डिका उसका काम तमाम कर देने के मूड में थीं।

चीख उठा सड़ी बण्डी

सड़ी-बण्डी : बॉस! कुछ करो। मेरी खतरनाक बदबू इस प्लास्टिक के तार को तो थोड़ी ही देर में सड़ा देगी पर उससे पहले ही ये दोनों मुझे ऊपर पहुंचा देंगी ।

रोबो : मर जा नमक हराम, किसी काम का नही है तू! लड़कियों से नही निपट सकता । थू।

अब बहुत देर हो चुकी थी। नताशा का सब्र खत्म हो रहा था।

नताशा : (रोबो से) पापा कुछ करो! वरना यहीं जान दे दूँगी मैं।

रोबो गुस्से में राजन मेहरा से बोला।

रोबो : कमिश्नर!! बेहयाई छोड़ दे और अपने बेटे को बुला!

राजन मेहरा : बेहयाई तो तू कर रहा है! गुर्र। पीछे पड़ गया है एकदम।

रोबो : तेरे पूरे घर को बड़ाम बुला दूँगा। बुला दे अपने छोरे को!

### : मैं तो यहीं हूँ।

इस आवाज़ को सुनकर सभी चौंक पड़े और तत्काल आवाज़ की दिशा में पलटे। सुपर कमांडों ध्रुव कुछ ही दूरी पर खड़ा था।

 

 

★द्वितीय अध्याय समाप्त★

क्रमशः

दोस्तों मुझे पता है आपको ये पार्ट छोटा लगेगा। क्योंकि छोटा है ही। मैं आगे अभी और लिखता पर अभी मुझे किन्ही कारणोवश मुझे कुछ दिन टाइम नही मिलेगा। इस स्टोरी के पिछले पार्ट्स आपलोग भूल न जाओ इसलिए ये वाला पार्ट दे रहा हूँ।

अब आपलोग रिव्यूज़ देकर मेरा साथ दीजिये। क्योंकि आपके रिव्यूज़ ही मेरे मार्गदर्शक हैं। धन्यवाद।

आपका अपना😊😊😊

Written By- Talha Faran

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6 Comments on “Apradh Unmoolan Ke Baad Part 7”

  1. Bahut gajab
    Kya likhe ho talha waah padhkar maja aa gya.
    Bhediya aur jen wala scene to mast hai ekdam…
    Sati nhi ho payi bechari.
    Fuzo comedy bhi krne lag gya btao.
    Khatua ke kabile ki ladkiyo se ladai bhi btaoge to maja aa jayega..
    Sadi bandi kya naam diya hai waah hahahahaha…
    Shweta chandika black cat sabke samvad bde mast hain..
    Ladai to jabardast hai maja aa gya.
    Bandi wo bhi barso se nhi dhoyi aur chaddi bhi… Badbudar story likhi hai is baar… Dir se hi review dena pad rha hai kyunki nose filter to kaam karega nhi yahan…
    Robo se bhi comedy karwa rhe ho bahut sahi…
    Lekin ant me ye tataiyya(dhruv) kaha se aa gya?
    Kaun hai ye?
    Hoga to majedar character hi

    Waah majedar story banane ka dhanyawad… All the best aage ke part ke liye

  2. bahut badhiya talha..
    khud ko kahani me lane ka jo tareeka hai wo mujhe bahut pasand aaya.
    kahani ki length thik hai par maine haveli me maujood baki heroes ko miss kiya.. khas kar kobi ko .
    ab bas ye dekhna hai ki kya bhediya bhi usi haveli ke jayega?

  3. Ohh god meri hansi hi nahi ruk rahi
    Robo to chha gaya iss part me
    Jen ke dialouge bhi mast lage
    Natasha as bride dekhne ki hasrat hi rah gai thi aaj puri hui

  4. Likhne ka andaz bahut mast h, chandika aur sadi bandi ki ladai me maja aaya, sadi bandi ne to hasa hasa k lot pot kar diya aur ye kahani k end me kaun aaya dhruv ya koi aur vo dekhne wali baat hogi,but baki heroes ka is part me na aana acha nhi laga

  5. Hahaha had kar di tumne talha
    Matlab bahut hi bhayankar
    Haste haste mujhe bhi din me suraj dikh gya
    Hihihi
    Bahut hi mazedaar
    Mujhe sadi bandi bahut mast laga
    Allu arjun ki tarah entry
    Hahaha
    Sab kuch dhamakedar hasi wale sanwad se bhara hua
    You’re really a genius in comedy genre
    Wish you good luck for taking it to the next level

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