Apradh Unmoolan Ke Baad Part 9

अपराध उन्मूलन के बाद–9

लेखक~ तल्हा फ़रान

प्रथम अध्याय–भूत

हवेली के मुख्य हॉल में सभी धड़धड़ाते हुए घुसते आ रहे थे। नागराज ने चिल्ला-चिल्लाकर तार सप्तक के सभी सुरों को पार कर दिया था और अब उसके गले से एक अलग ही प्रकार की ध्वनि निकल रही थी। हीहीही।

नागराज :- अबे जल्दी आओ!! जल्दी आओ सबलोग!

डोगा,परमाणु,ध्रुव,तिरंगा और कोबी कूदते फांदते अंदर प्रविष्ट हुए। 

कोबी :- का भइल चचा। इतना लपरसट्ट काहे मचा रिये हो?

नागराज :- अबे एंथोनी…..एंथोनी भाग गया।

सुनकर डोगा ने सबसे भयंकर रिएक्शन दिया। 

डोगा(जोर से) :-क्या!!!!!!! 

परमाणु :- अबे चचा बारूद पुत्र हो तो का कहीं भी फट जाओगे? साला कान के कच्छे फाड़ दिए।(कान में उंगली करते हुए)

तिरंगा(मासूमियत से) :- लेकिन नागराज। तुम्हारे चंगुल से तो मौत भी बचकर नही भाग सकती थी न। 

नागराज :- अबे गच्चा देकर भागा है ससुरा। मुझसे बोला छोड़ दो मुझे मैं तुमको नोरा फतेही वाला डांस करके दिखाऊंगा(लार चुआते हुए) हम तो ठहरे नोरू के फैन। छोड़ दिये और साला लभेड़चन्द छूटते ही लभेड़पन्ति दिखा दिहिस। खिड़की के रास्ते टेलीपोर्ट होकर भाग गवा साला मुर्दा चिरकुट। 

ध्रुव :- अच्छा। दिशा कौनसी थी?

परमाणु(लार चुआते हुए) :- दिशा पटानी।

तिरंगा(खुद से) :- इन सालों ठरकी लोग के बीच पता नही मैं क्या कर रहा हूँ।

परमाणु :- गुर्र। अबे तू भी कुछ कम नही है। पिछले महीने तुझे ‘चमन चिंदी’ कॉम्प्लेक्स में देखा था कपड़े की दुकान के सामने डमी से लिपट के खड़ा था। 

तिरंगा (हकलाते हुए) :- वह मैं नही रहा होऊंगा 💭 वैसे था तो मैं ही। हीही। क्या आइटम थी वो डमी💭 मेरा कोई फैन मेरे कॉस्ट्यूम में घूम रहा होगा। 

परमाणु :- साले लोलरचन्द तेरेको लगता है कि तेरे फैन भी होंगे। 

तिरंगा :- क्यों? जब कोबी के हो सकते हैं तो मेरे क्यों नही।

कोबी बीच मे कूद पड़ा।

कोबी :- अबे चिल्गोजों। देखो हमरा नाम न बीच मे आए बताए दे रहे हैं। पान चबा के मुंह में पीक थूक देंगे। 

परमाणु :- शरीर में इत्ते परमाणु छल्ले भर दूँगा की सारे अणु खण्ड-खण्ड होकर खंडहर बनते नज़र आएंगे।(तिरंगा और कोबी को घूरकर) ऐसी जगह विस्फोट करूँगा न कि दोनों टांगे चियारकर(फैलाकर) चलते बनोगे सालों।

तिरंगा :- और मैं जैसे मेहंदी लगाकर बैठा हूँ…

कोबी :- घूँघट भी ओढ़ ल्यो बस।

तिरंगा :- चुप बे। डायलॉग पूरा करने दे। एक तो Rc वाले ढँग का रोल तो देते नही, डायलॉग भी नही देते ढंग का। (फिर परमाणु की ओर घूम गया) हाँ तो मैं कहाँ था?

कोबी :- पिलंग(पलंग) पर घूँघट औढ़के पियवा के इंतजार में।

तिरंगा :- गुर्र। सुन बे परमाणु। मैं भी मेहंदी लगाकर नही बैठा हूँ, ढाल मार मारकर ढलान बना दूँगा। 

कोबी :- अबे तुम दूनो एक दूसरे का ढिलान और चबुतरा बनाओ और फिर ससुरा अपुन अपनी गदा से तुमलोगों को रगड़-रगड़ कर सपाट कर देगा। 

तीनो आपस में लड़ने में मशगूल थे और डोगा,ध्रुव तथा नागराज उन्हें घूरने में। 

लड़ते-लड़ते तीनो की नज़र उनपर पड़ी। ध्रुव की नज़रों ने उनलोगों पर कहर बरसाए और डोगा अपनी गन से चड्ढी खुजला रहा था जब नागराज धीरे से बोला– “डोगे एक गन मेरेको भी दे। खुजली हो रही चड्डी में।” 

डोगा गन थमाते हुए– “देखियो चचा फुल्ली लोडेड है। अगर चल गई तो तुम न इधर के रहोगे न उधर के। बोले तो तुमरी जमात ही बदल जाएगी।” 

नागराज :- भक्क साले तू ही रख इसे। मेरे खुज्जासर्प ही काफी हैं।

“हीहीहीही।” तिरंगा, परमाणु और कोबी ने खिसियाकर एक दूसरे को छोड़ा। 

ध्रुव गुस्से में बोला :- “एक ओर हमारा स्टील गायब है! दूसरी ओर एंथोनी भाग गया, शायद वह हमारी कुछ मदद कर सकता था और यहाँ तुमलोग आपस में एक दूसरे को लोलिया रहे हो! 

तभी कोबी को कोई काला साया हॉल की पूर्वी खिड़की से दुड़की होता हुआ दिखा। 

कोबी(चिल्लाकर) :- अबे उ रहा कब्रिस्तानी खटमल। चाप ल्यो साले को। 

वह चिल्लाता हुआ झपटा……अचानक ही किर्र-किर्र की कई आवाज़ों के साथ हॉल की सारी लाइट्स भी दुड़की हो गई। 

घना अंधेरा छा गया। चाँदनी रात में चांद का हल्का-हल्का प्रकाश हवेली के कई हिस्सों से छनकर आ रहा था। 

परमाणु :- अबे अब ई किसकी बकैती है।

तिरंगा :- बिजली विभाग की। 

नागराज :- देवेन्द्र गमठियाल को फोन मिलाओ। रिश्वत मांगे तो बताना। 

डोगा :- अबे चमन चूरनों! यहाँ बिजली नही है कितनी बार बताना पड़ेगा। 

परमाणु :- तो दीवारों पर क्या तेरे चाचा लोग लालटेन लेकर चिपके थे।

डोगा :- अबे सौर ऊर्जा से जल रही थीं बत्तियाँ और साले तू मेरे चाचा लोग को कैसे जानता है। 

परमाणु :- ओह्ह। तो इसका मतलब तेरे चचालोग सच में पृथ्वी पर मौजूद हैं…

तिरंगा :- और यह भी सच है कि वे लालटेन लेकर घूमते हैं??

डोगा :- हाँ सालों। ग्रीन लैंटर्न के मामू हैं मेरे चाचा लोग। गुर्र। 

परमाणु :- अब मुझे ज्योतिषी बन जाना चाहिए। देखा…. डोगा के चाचाओं के बारे में बता दिया मैंने। 

ध्रुव :- चुप हो जाओ बे अब। वरना ऐसी जगह पहुँचा दूँगा की सारी ज्योतिष विद्या, बालन बनने चली जाएगी। गुर्रर्र!!! 

ध्रुव की दहाड़ पर सब खामोश हो गए। 

डोगा :- 💭साला हार्ट का मरीज़ न हो जाए हमलोगों के चक्कर मे इसलिए खामोश होना पड़ता है। यह न रहा तो आवारा कुत्तों और लंगूरों से कौन बतियाएगा।💭

 तल्हा :- ओह्ह। अच्छा किया डोगा चाचा बताकर।

डोगा :- अबे इसको कहानी में ऐसे दिखाना जैसे मैं सोच रहा हूँ….बोल नही रहा हूँ, वर्ना खामखा ही बेचारा धरु हार्ट का मरीज़ हो जाएगा।

तल्हा :- ठीक बा।

परन्तु परमाणु नही चुप रहने वाला था। वैसे भी वह आजकल कुछ ज्यादा ही चुनियाने लगा है।

परमाणु (ध्रुव से):- क्यों बे कैप्टन! इतना काहे गर्मिया रहे हो। जब से एन्डगेम देख लिए हो तुमको कुछ ज्यादे ही चुल्ल मची है कैप्टन अमरीका बनने की। 

तभी तिरंगा की आवाज़ गूँजी।

तिरंगा :- अबे ससुर ढाल तो मेरे पास है….हीहीही।

परमाणु :-(आवाज़ की दिशा में पलटते हुए) तो साले अब उस ढाल में दाल-भात भरके खा या उसे भंगार में बेचकर नई चड्ढी खरीद ले(पुरानी वाली बहुत महकती है) क्योंकि वह ढाल अब किसी काम की न रही…..अपराध तो खत्म हो चुका है।

डोगा की आवाज़– घबराओ मत चपड़घँचुओं। जल्द ही Rc में सिविल वॉर होने वाला है। फिर मैं तिरंगा से ढाल छीन लूँगा। 

नागराज :- क्यों बे? तूने ही वह ढाल बनाई थी क्या……आयरन मैन की तरह?

डोगा :- डोगा ढाल जैसी बकैती नही पेलता– डायरेक्ट बम पेलता है। वह तो डोगा का प्रिय काम है छीनना। यह बन्दूक……यह बम….यह रायफल सब छीनकर ही तो लाया हूँ अपराधियों से। 

परमाणु :- चड्डी भी छीनकर ही पहनी होगी किसी से। 

डोगा :- हाँ तेरी ही चड्डी है। ले ले उतार ले। 

तिरंगा :- अबे परमाणु! तुम सबकी चड्डी के ही पीछे क्यों पड़े हो? टिक-टॉक तो नही बना रहे आजकल।

परमाणु :- पटक के मार दूँगा साले। चुप हो जा।

तभी एक धमाका हुआ और ज़मीन पर उनसब के बीच आग की लपटें उठने लगीं। 

यह लपरसट्ट हरकत नागराज के विध्वंसक सर्पों ने की थी। 

नागराज(जोर से) :- शांत हो जाओ बे! गुर्र……अब अगर किसी ने भी एन्डगेम, मार्वेल, डीसी वाली लभेड़पन्ति चालू की तो सबको पीट-पाटकर अनन्त मणि बना दूँगा। फिर तुम ससुर लोग अनंत-अंतरिक्ष मे चमचमाते हुए भटकोगे।

यह धमकी सुनकर सभी सन्न मार शांति की अवस्था में पहुँच गए। मगर तिरंगा सन्न मारते हुए फुसफुसाया था– “फिर थेनॉस आएगा….बड़े ही मंगल अवसर पर और अमंगल मचाकर सबको मंगल ग्रह पर भेज देगा…. हीहीही।”

नागराज ध्रुव की तरफ पलटा। विध्वंसक सर्पों की हल्की-हल्की लपटों में सभी को एक दूसरे के धुंधले चेहरे दृष्टिगोचर हो रहे थे। 

नागराज :- हाँ। अब तुम बोलो ध्रुव। अब यह लोग खामोश हो चुके हैं। 

डोगा :- 💭होना पड़ता है, क्योंकि हमलोगों के चक्कर मे कहीं यह लोग…💭

तल्हा (बीच में) :- हार्ट के मरीज न हो जाएं। 

डोगा:- 💭 हाँ। और इस दृश्य को उसी तरह दिखाना….समझे किस तरह।💭

तल्हा :- समझ गया। सोचते हुए। हीहीही।

ध्रुव(कोबी से) :- हाँ। बताओ कोबी तुमने क्या देखा?

कोबी तो मुंह फुलाकर भरा बैठा था। 

कोबी :- पहिले ई ताऊ लोगन को पंचाइत कर लेवेन दो। फिर हम कल सुबह बताएंगे रात को क्या टीपा हमने। 

नागराज :- अबे तू अब ज्यादा चोचला मत कर। चुपचाप बता दे। गुर्र। 

कोबी :- अरे ऊ ममुवा एंथोनी था! ख़िड़खिड़ाती खिड़की के रस्ते ससुरा कूदत-फांदत-भागत दिखिस हमको।

डोगा :- अबे तो पहले क्यों नही बताया!!! 

डोगा ने चिल्लाकर पूछा था। उसे एंथोनी को सबक सिखाने की कुछ ज़्यादा ही चुल्ल मची हुई थी। 

कोबी (गुस्से में):- अबे ज़्यादा चिल्ला-चिल्ली मत मचाओ। लभेड़ दूँगा। 

ध्रुव उनकी हरकतों को नज़रअंदाज़ करके बोला– “अच्छा कोबी। कौनसी खिड़की थी?” 

कोबी ने उस खिड़की की तरफ हाथ उठाना शुरू किया कि तभी– चाँद की मद्धम रौशनी में, उसी खिड़की के करीब कोई काला साया हिलता डुलता दिखा। 

कोबी(जल्दी से इशारा करके–जैसे ट्रेन छूट रही हो) :- देखो ऊsss रहा ससुरा। धर लो साले को। जल्दी चलो। 

और उसी क्षण नागराज के ध्वंसक सर्पों द्वारा मचाई गई उत्पात मेरा मतलब आग ठंडी पड़ गई तथा चाँद बादलों के पीछे जा छुपा और हवेली का कोना-कोना अंधकार में नहा गया। 

तिरंगा :- ओ तेरी अब कैसे पकड़ेंगे उसको? 

परमाणु :- हाथ से। 

कोबी :- ससुर लोग। घबराओ मत। अपुन अंधेरे में सबकुछ टीप सकते हैं। हम अभी उसको चांपते हैं ससुरा बचकर भाग नही पाएगा। नोच खसोट दूँगा।

थोड़ी देर कोबी के यहाँ-वहाँ लड़खड़ाने की आवाज़ आई और फिर…

कोबी :- ई पकड़ लिया पकड़ लिया साले को। 

तिरंगा :- कहाँ ? कहाँ? कहाँ?

कोबी :- इंहा इंहा इंहा।

कोबी अपने द्वारा पकड़े गए व्यक्ति को हिलाता हुआ बोला।

अचानक कोबी को एक चांटा पड़ा। 

कोबी :- अबे चांटा किससे पूछ के मारिस। गुर्रर्र!

डोगा :- साले मुझे पकड़ेगा तो चांटा ही न मारूँगा। 

कोबी :- अरे ताऊ तुम? 

डोगा :- गन छोड़ मेरी।

कोबी :- ई… तुमरी…..गन है?

डोगा :- गुर्र। छोड़ दे साले! तेरे ससुर का नाड़ा नही है, गन ही है। 

कोबी(गन छोड़ते हुए) :- अरे मगर अपुन तो खिड़की की तरफ कूदिस रहे और डोंगा तो खिड़की से विपरीत दिशा में ठाड़(खड़ा) है। अइसन कईसे हो सकत?

डोगा :- अबे तूने ही तो मुझे खींचकर पकड़ा है। साले जेन को याद कर करके तेरी आंखें कमजोर हो गई हैं। 

कोबी :- गुर्र। अइसन कुछु नही है, मैंने तुमको नेई खींचा और ससुर मई तो अंधेरे जंगिल में भी पेड़ पर लटके टिकोरे टीप लेता हूँ। अइसन मिस्टीक हमसे नक्को हो सकत। असम्भौं बाटे ई। 

तभी तिरंगा की काँपती आवाज़ सबके कानो में पड़ी– “दोस्तों! यहाँ कुछ तो गड़बड़ झाला चल रहा है। अभी किसी ने मेरा लबादा खींचने की कोशिश की।” 

परमाणु :- कोई चूहा रहा होगा….देखना चड्डी भी न खींच ले जाए। 

नागराज :- साले किटाणु तुझे इन विकट परिस्थितियों में भी चड्ढी दिख रही है। पक्का टिक-टॉकिया है तू। 

ध्रुव :- शश्श! (फुसफुसाते हुए) सबलोग शाँत हो जाओ और गौर से सुनो।

ध्रुव की बात पर ध्यान देना तो दूर की बात है। उसके शब्द सुनकर ही तिरंगा की हवा टाइट हो गई। 

डोगा अपनी जगह पर कसमसाया। 

परमाणु ने परमाणु छल्ले छोड़कर रोशनी करनी चाही परन्तु अगले ही क्षण रुक गया। क्या पता उनमे से ही किसी को लग जाएं वे छल्ले। फ्री-फंड में परलोक पहुंच जाएंगे सब तो।

और तभी– ‘टिक-टिक………टिक-टिक’ 

हवेली में घड़ी की सुइयां टिकटिका रही थीं। मालूम नही चल पा रहा था यह आवाज़ साफतौर पर कहाँ से आ रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा था सामने के जंगलों में कहीं बज रही हो यह घड़ी। 

नागराज :- तुम में से किसी ने घड़ी पहनी है क्या?

तिरंगा(काँपते हुए) :- समय ही बेकार चल रहा है, घड़ी पहनकर खुदको कष्ट क्यों दें।

तभी एक और आवाज़ वहां के भारी वातावरण को चीरती चली गई। ‘धप्प-धप्प-धप्प।’ 

ध्रुव :- शश्शsss छत पे कोई है। 

डर के मारे थरथराने वालों में तिरंगा टॉप पर था। बाकी सब भी भयभीत थे पर तिरंगा जितने नही……और ध्रुव तो वैसे भी इस समय उस रामू काका की भूमिका निभा रहा था जो पुरानी हवेली में छुट्टियां मनाने गए लोगों को लालटेन दिखा-दिखाकर डरावनी कहानियां सुनाता है…..तो तिरंगा की हवा और संट हो चुकी थी। 

कोबी :- अबे ससुर लोग इंहा हो का रिया है?

डोगा :- सुना नही क्या बे। छत पर कोई तेरी कैटेगरी का प्राणी आ गया है, जा मिल ले जाके। (कुटिल लहजे में) सीढ़ियां तो दिख ही रही होंगी तुझे। 

कोबी ने काँपते हुए बहाना बनाया।

कोबी :- कौन सीढ़ी? कइसन सीढ़ी? कुछ न लउकता हमको ससुर। हम तो अन्हरा गए हैं अब। 

डोगा :- अबे! ये देख परमाणु इस चालाक जंगली जीव को! कैसे बहाने बना रहा है।

परमाणु तो पहले से ही खुंदक में भरा खड़ा था ऊपर से अब उसपर डर भी हावी हो चुका था। वह बुरी तरह किचकिचा गया।

परमाणु (दाँत किटकिटाते हुए) :- डोगे! तू तो साले चुप हो जा तेरी ही वजह से यह सब देखने को मिल रहा है।

तिरंगा :- ससुरा कुछ दिख ही तो नही रहा है। बहूहू। 

काँपता हुआ तिरंगा अपने मे ही बड़बड़ा कर रह गया बेचारा। 

डोगा :- साले नमकहराम बर्रमाणु! बिरयानी  चांपने के लिए सबसे पहले तू ही आया था कूदते-फांदते।

परमाणु :- तेरी बिरयानी आज हमारा कोरमा बनवाएगी। गुर्र। 

तभी ध्रुव ने फिर सभी को चुप कराया। 

ध्रुव:- शश्श…..सुनो। 

धप……..धप….धप..धप धप धप

छत पर चलने वाला प्राणी चलते-चलते दौड़ने लगा था। कदमों की आवाज़ सुनकर ध्रुव ने कहा– “मेरे अनुमान से यह जिस तरफ भाग रहा है उधर तो सीढ़ियां हैं!” 

ध्रुव ऐसी आवाज़ में बोला जैसे कोई भूतिया कहानी सुना रहा हो और सामने वाले को डराने की कोशिश कर रहा हो। उसकी आवाज़ सुनकर तिरंगा थरथर-थरथर थरथरा उठा। 

नागराज :- अबे यह अनुमान तो हम सब ने भी लगा लिया है…..साले ज्यादे होशियारपना मत झाड़। 

ध्रुव :- ठीक है तो फिर सुनो। वह प्राणी जो कोई भी है…….वह न तो एंथोनी हो सकता है, न स्टील।  न ही कोई सुपर विलेन जिससे हम लड़ सके। यह ज़रूर कोई आलौकिक शक्ति है……..यानी…..भूत। 

उसने ठंडी आवाज़ में बात खत्म की। 

नागराज :- तू साले उस भूत का चेला-चपाटी है क्या? इतना ज्यादा सीन क्यों क्रिएट कर रहा है साले लोलर। 

ध्रुव (माथे मर हाथ मार कर) :- अबे तुमलोग समझते नही हो बात। मैं यह कहना चाह रहा हूँ………कि हमे भागना होगा, यही एकमात्र रास्ता है। 

परमाणु :- ठीक है हम सब भागेंगे….और डोगा तू तो यहीं रहेगा न, क्योंकि तू तो मुसीबत को जड़ से उखाड़े बिना कहीं नही जाता💭हीहीही।💭

डोगा :- साले जड़ की क्या जड़ी-बूटी बनाऊंगा! डोगा हूँ गोगा नही। भागूंगा मैं तो सबसे पहले। 

ध्रुव :- ठीक है। अब सब लोग मेरा प्लान सुनो। (खिड़की से बाहर झाँकते हुए) मुझे चन्द्रमा को घेरे हुए बादल दिख रहे हैं और जिस रफ्तार से वह भाग रहे हैं, उस हिसाब से अगले दस सेकेंड में चन्द्रमा बाहर आ जाएगा। फिर उसके सामने से जो दूसरे बादल आ रहे हैं उनकी रफ्तार की गणना के हिसाब से मैंने अनुमान लगाया है कि वे अगले सात सेकेंड्स में चन्द्रमा को पुनः ढँक लेंगे। 

ध्रुव चुप हो गया।

ध्रुव :- सब लोग सुन रहे हो न बे? 

नागराज :- अबे तू बकता रह होशियारचंद! 

ध्रुव :- हाँ तो चन्द्रमा के निकलते ही यहाँ से भागकर हवेली के दो लम्बे-चौड़े गलियारे को पार कर बाहर पहुंचने के लिए हमारे पास बस सात सेकेंड्स होंगे। 

नागराज :- ओके। समझ गए हम। चन्द्रमा के निकलते ही रोशनी फैल जाएगी और उस रोशनी के समाप्त होने से पहले हमें बाहर पहुंचना होगा।

डोगा :- ठीक है मैं भी समझ गया। दौड़ने में तो मेरा कोई सानी नही। 

कोबी :- हम भी ससुर कूदत-फांदत निकल लेंगे। 

तिरंगा :- तुम में से कोई मुझे अपनी पीठ पर टांग लेना 💭 क्योंकि पैरों का तो चिंता-ता-ता हुआ पड़ा है।💭

परमाणु :- ठीक है सब लोग तैयार हो जाओ। बस तीन सेकेंड्स का समय है। 

ध्रुव (कैप्टन अमेरिका की आवाज़ में) :- अवेंजर्स!…….. असेम्बल!! 

कोई कुछ नही बोला। 

नागराज (अंधेरे में घूरते हुए) :- गुर्र। अबे अब कौन अवेंजर-अवेंजर कर रहा है? साले मार-मार कर लोकी बना दूँगा……हाँ नई तो….बता दे रहा हूँ अब कोई भी यहाँ मार्वेल के किसी भी जीव-जंतु का नाम नही लेगा वर्ना पटक के ऐसा पेलूँगा साले कि ग्रूट बनकर फिर यही तीन शब्द बड़बड़ाओगे……..नागराज ने पेला! नागराज ने पेला! गुर्र…….साले गमोरा कहीं के!

नागराज की इस भयानक धमकी पर भी किसी की कोई प्रतक्रिया नही गूँजी। 

नागराज :- 💭 ससुरे टपक गए क्या मेरी धमकी सुनकर?💭 

तभी चाँद निकल आया और सब एकसाथ चिल्लाते हुए भागे– “भागोssssss” 

नागराज :- ओह्ह। तो साले लभेड़चन्द लोग सन्न मार-मार कर चाँद की प्रतीक्षा कर रहे थे। 

तब तक सब हॉल से निकल कर प्रथम गलियारे में प्रविष्ट हो चुके थे और एक दूसरे से लड़ते-भिड़ते भागते जा रहे थे। तिरंगा तो गिरते-पड़ते भाग रहा था।  

नागराज भी गलियारे में पहुंच चुका था। 

अभी वे दूसरे गलियारे तक पहुँचे भी नही थे कि एक बार फिर– घुप्प अँधेरा!

सब एक दूसरे से लड़ते-भिड़ते एक ही जगह पर एकत्रित हो गए। 

नागराज :- गुर्र। ई…साला ध्रुव किधर है बे?

कोबी :- का भइल चचा?

ध्रुव सन्नाटा खींचकर खड़ा था।

नागराज :- कुछ नही बस चुम्मी लेनी है कमबख्त की। वाह बेटा क्या अनुमान लगाया था! सात सेकेंड मिलेंगे! अबे ई तो चार ही सेकेंड में चाँद फिर से छुप गया। बादल तीन सेकेंड पहले कैसे पहुंच गया बे? 

ध्रुव :- हीहीही। अरे यार हवा चल गई होगी। 

नागराज :- वाह ससुर वाह! बादल के बहने की रफ्तार से उसके चाँद तक पहुँचने के समय का अनुमान लगा सकते हैं किन्तु हवा का अनुमान नही लगा सकते? 

ध्रुव :- अबे यार गलती हो गई माफ कर दे 💭गुर्रर्र💭 गुणा-भाग करते समय मैं हासिल लेना तो भूल ही गया था। 

नागराज :- साले तू मुझे हासिल मत आ जइयो! पटक के लोलिया दूँगा। 

परमाणु :- लगता है काढ़े का ओवरडोज़ ले रहा है आजकल अपना कैप्टन…….एक भी अनुमान सही सिद्ध नही हो रहा। 

ध्रुव :- साले टिपा(चुप हो) जा। तू मेरे बिल्कुल पीछे ही खड़ा है, अभी एक बैक किक मारूँगा न तो तेरा बैक बुक-बुक करके बुड़क देगा। 

कोबी :- अहा! बुड़कने से याद आइस। 

‘पुर्र-पुर्र-पुर्र’ 

डोगा :- गुर्र। अबे कौन है बे ससुर का मामू।

परमाणु :- ये कोबी के पाचनतंत्र की लभेड़पन्ति है। 

तिरंगा :- अबे….कोबी….क्या कर रहे….हो बे?

कोबी :- अबे हम तो तुम लोगन का मदद कर रिया हूँ बे। दरइसल हमरे खाद में उ सक्ति है कि हम जब रात में जंगल करने जाता हूँ तो पूरा जंगल जिगमिगा उठता है। कबीले वाले अब मिशाल नही बल्कि हमारी खाद का उपयोग करते हैं…..उसको बलब की तरह छत पर चिपिका कर।

डोगा :- अबे चुप चुप चुप साले गन्धौड़ प्राणी! नही चाहिए तेरी बदबूदार रोशनी…..हमारे लिए ये अंधकार ही ठीक है। 

तभी ध्रुव को कुछ अजीब सा अहसास हुआ। 

ध्रुव(जल्दी से) :- शश्श! चुप हो जाओ…

तिरंगा :- यार कैप्टन शश्श-शश्श करना बंद करो यार! एक तो पहले ही मेरी लगी पड़ी है…..तुम इसी प्रकार शश्श-शश्श करते रहोगे तो पतलून में बिन मौसम बरसात हो जाएगी। 

ध्रुव(फुसफुसाती हुई तीव्र आवाज़ में) :- हमलोग यहाँ कुल कितने लोग हैं?

नागराज :- अबे अब फिरसे कोई बकैत अनुमान मत लगइयो! 

ध्रुव :- अरे अनुमान नही लगा रहा हूँ यार। बताओ तो सही कितने लोग हैं हमलोग?

नागराज :- साले खुद जोड़ ले। जब बादल के रफ्तार की गणना कर सकता है तो हमारी नही कर सकता क्या?

ध्रुव :- 💭गुर्र! साले लोग सीन भी नही क्रिएट करने देते।💭 ठीक है…..तो हमलोग कुल मिलाकर यहाँ छः लोग हैं। अब जरा सब गौर से सुनने की कोशिश करो। 

डोगा :- अबे ओ चतुरनारायण! ज्यादे माहौल न बना। क्या सुने बे? झींगुरों की आवाज़ें? 

ध्रुव :- हम लोग यहाँ छः…लोग हैं….राइट! 

परमाणु :- लेफ्ट! 

ध्रुव :- किन्तु गौर से सुनो…..साँस लेने की आवाज़ें सात लोगों की आ रही है। 

डोगा :- अबे लपरसट्ट इंसान। कानों में भी काढ़ा पेलने लगे हो का बे?

नागराज :- नही! यह सच कह रहा है….मैं भी अपनी सर्प इंद्रियों की मदद से सुन पा रहा हूँ। सात लोग साँस ले रहे हैं यहाँ। 

तिरंगा :- स….स….सातवाँ कौन है?

परमाणु :- पिस्सू! 

डोगा :- ऐं! अबे तू क्या बके जा रहा है?

परमाणु :- अबे बक नही रहा हूँ। यह सातवाँ पिस्सू ही है…..कोबी के शरीर मे वास करने वाला पिस्सू। यह नामुराद कोबी परसों जब मेरी बगल में सोया था तो इसके अंदर से सैकड़ों खर्राटे गूँज रहे थे। सुबह साले ने बताया इसके शरीर मे सैकड़ों पिस्सू हैं वही खर्राटे मार रहे थे………और इस समय ज़रूर उन्ही में से कोई साँस ले रहा होगा। 

ध्रुव :- क्या बकवास है! यह साला परमाणु क्या-क्या बकवास छोड़ने लगा है आजकल। सच मे टिक-टॉकीया ही है साला। 

कोबी :- 💭खी खी खी💭

परमाणु :- गुर्र! 

नागराज :- नही परमाणु….यह साँस कोई इंसान ही ले रहा है। 

तिरंगा की हालत सरकती जा रही थी। 

परमाणु :- अच्छा! तो मुझे क्यों नही सुनाई पड़ रही?

नागराज :- अब सुनाई देगी। यह ले। 

नागराज परमाणु के बगल में ही था उसने परमाणु के दोनों हाथों में कोई चीज़ थमाई। 

परमाणु :- अबे चचा ई का है? 

नागराज :- सर्पकन्टोप! दोनों कानो में पहन इसे। 

परमाणु :- ईयूss कितना गिलगिला है। 

नागराज :- साले तो लड़की की तरह रिएक्शन क्यों दे रहा है….(बनावटी आवाज़ में)ईयूsss! अब तो सौ प्रतिशत सहमत हूँ कि तू टिक-टॉकीया ही है। 

परमाणु :- गुर्र! देखो चचा….मैं टिक-टॉक नही बनाता। लेकिन तुमलोग इतना खोदिया रहे हो कि सच में बनाने लग जाऊँगा।

डोगा :- साले अगर तूने यह लपरसट्ट हरकत करके हम ब्रह्मांड रक्षकों के नाम पर कलंक लगाने की कोशिश भी की न…सच बता रहा हूँ……मार-मार कर परमाणु से किटाणु में कन्वर्ट कर दूंगा। 

ध्रुव :- अबे तुमलोग आपस में ही खौंखियाते रहोगे या उस सातवें व्यक्ति का पता भी लगाओगे। 

नागराज :- मैं लगाता हूँ….सर्प इंद्री से मुझे याद आया कि मैं तो इसकी मदद से देख भी सकता हूँ। हीहीही 💭साला पहले क्यों नही याद आया? अब तक तो मैं इस हवेली से दूर निकल चुका होता। अब भी कौनसी देर हुई है…..फूट लेता हूँ।💭 

नागराज ने भागने के लिए सर्प इंद्री का प्रयोग करना चाहा और चौंक कर चौक की तरह सफेद हो गया। 

नागराज :- अरे यह क्या? नही!!! 

ध्रुव :- क्या हुआ??

नागराज :- मेरी सर्प इंद्री मुझे कुछ भी नही दिखा पा रही। ऐसा लगता है कोई अदृश्य शक्ति बाधा खड़ी कर रही है। बहूहू! 

ध्रुव(ठंडी आवाज़ में) :- यह ज़रूर कोई प्रेतआत्मा है। 

तिरंगा (रोते हुए) :- भैंsssssa निकल गई…..निकल गई।

कोबी :- कहाँ निकर गई?

परमाणु :- क्या निकल गई?

तिरंगा :- बांध टूट गया! बहूहूहूहू।

डोगा :- इससे पहले की टँकी भी फट जाए…..साले फेविकोल मार कर चिपका ले। अगर तनिक भी बदबू फैली न यहाँ…..कसम रायफल की….बारूद से नहला दूँगा। 

नागराज :- अबे….क…कहीं यह साँस लेने की आवाज़ उसी प्रेतात्मा की तो नही। 

अब नागराज भी ध्रुव को कंपनी देने आ गया था। दोनों ने मिलकर डर का जो माहौल क्रिएट किया तो इस बार डोगा, परमाणु और कोबी भी कँपकँपा उठे थे। 

जबकि वह लोग जिस सातवें शख्स को ढूंढ रहे थे वह उनसे ही थोड़ी दूर पर एक खम्बे के पीछे छुपा बैठा था। 

अरे यह तो एंथोनी है! 

पर यह तो भाग गया था….

एंथोनी :- भाग ही तो नही सका ससुर। बहूहू। हवेली का गेट पार करते ही सामने अँधेरा जंगल है। वहाँ भूत लोग आइटम सॉन्ग गा रहे थे। मेरी तो चियर के हाथ मे आ गई…..अगर मैं गया होता तो वे लोग पटक-पटक कर मेरा रबड़पट्टी बना देते। (बाकियों की तरफ देखकर) और ई कमबख्त लोग को पता नही है कि इस हवेली में भी एक दुष्टात्मा है….जो किसी को भी जीवित नही छोड़ेगी…..वह इतनी पावरफुल है कि मुझे भी पटक के लोलिया दे। बहूहूहू…….हे ऊपरवाले इस बार बचा ले…..एक बार मुझे मेरी कब्र में पहुंचा दे फिर कभी ज़िन्दा ही नही होऊंगा। 

तल्हा :- हीहीही। अरे एंथोनी चचा! आप तो तिरंगा से भी बड़े फटफटिया निकले। 

एंथोनी :- अबे तल्हा तुम? अबे इस दृश्य को कट कर देना। नही तो मुर्दों में मेरा खौफ खत्म हो जाएगा। 

तल्हा :- हीहीही। अब क्या….मैं तो लिख दिया। 

एंथोनी :- गुर्र बहुत गलत किया….मैं तुमको शाप देता हूँ कि तुम्हारी होने वाली बीवी….

तल्हा(बीच मे) :- कोई भी शाप देने से पहले सोच ल्यो चाचा! अभी तो केवल एक ही दुष्टात्मा है यहां। कहीं चार-पाँच और न आ जाएं। 

एंथोनी :- अरे नही तल्हा!(मक्खन लगाते हुए) तुम तो मेरे सबसे अच्छे भतीजे हो…..याद है पिछली बार अपने सुपी ने तुम्हारी शिकायत की थी। मैंने उसी को झापड़ मार दिया था। तुम तो बहुत अच्छे बच्चे हो यार! तुम्हारे लिए तुम्हारा चाचा दुष्टात्मा तो क्या दुरात्मा से भी पिट सकता है। हीहीही।

तल्हा :- हिहि। तो फिर शाप क्यों दे रहे थे चचा? 

एंथोनी :- अरे शाप कहाँ दे रहा था यार। मैं तो कह रहा था कि तुम्हारी होने वाली बीवी, बीवी बनने से पहले तुम्हारी जीएफ बने। 

गलियारे में खड़े छः छर्रे लोग अब भी अंधेरे में नहाए हुए थे। तभी चाँद धीरे-धीरे फिर बादलों से बाहर आने लगा। 

ध्रुव :- चलो बे! इस-बार पूरी जी जान लगाकर दौड़ जाएंगे। 

और तभी– ठक….ठक….ठक

तिरंगा :- क….क…..कौन है?

ध्रुव :- शश्श! कोई गलियारे में चलता हुआ आ रहा है। 

तिरंगा :- यार…..क….क….क…

परमाणु :- किरण??

तिरंगा :- क….कैप्टन….फिरसे शश्श-शश्श मत क…….क…….क…

परमाणु :- किरण??

डोगा :- अबे तू क्या किरण के पीछे पड़ा है साले….गुर्र! 

तिरंगा चालू था। 

तिरंगा :- ….करो….वरना मैं सेकेंड राउंड के लिए भी तैयार हो जाऊँगा। बहूहू।

तभी चाँद निकल आया और सबने जो देखा उनके होश फाख्ता हो गए। सामने गलियारे की दीवार पर दौड़ता हुआ एक साया छत से होता हुआ बाहर भाग गया था। 

“भू….भू…भूत भूत!” सब एक साथ चिल्लाते,गिरते-पड़ते बाहर भागे। 

एंथोनी भी पीछे हो लिया। 

एंथोनी :- चलो अच्छा है मैं नही देख पाया उस भूत को। वरना मैं भी भूत बन गया होता। 

जल्द ही सब गिरते-पड़ते किसी तरह हवेली से बाहर निकल कर बगीचे तक पहुंच चुके थे। वहाँ पहुँचते ही सब एक दूसरे के ऊपर गिर पड़े। 

ध्रुव :- अबे यह गिरने का समय नही है। जल्दी गेट तक पहुँचो और निकल लो! 

सब खड़े हुए। उनके सामने बीस कदम की दूरी पर  विशालकाय द्वार था और…..पीछे हवेली।

सब भागने को हुए की तभी नागराज बोल पड़ा। 

नागराज :- अबे गधों! अपने दो पंटर लोग, स्टील और पुरातन लफ़ंगा तो हवेली में ही हैं। 

ध्रुव :- अरे हाँ!

कोबी :- बिचारे! च्च्च्। 

नागराज :- क्या बिचारे बे। जाकर ले आ उन्हें! 

कोबी :- म….मम…मई नक्को जाएगी अब वहाँ। 

नागराज:- ध्रुव तू जा!

ध्रुव(आँखें तिरछी करके):- मेरा काम केवल राय देना है। तू जा! 

नागराज :- साले रायचंद मेरा काम केवल ऑर्डर देना है। परमाणु तू जा! 

परमाणु :- कोई कुछ बोल रहा है क्या? मुझे सुनाई नही पड़ रहा।

नागराज :- गुर्र! अबे तिरंगे तू जा! 

तिरंगा(हकलाते हुए) :- क्या चचा! चाहते क्या हो? मेरा बांध और टँकी एक साथ फट पड़े? 

नागराज :- डोगा….तू…

नागराज डोगा की तरफ मुड़ा पर डोगा वहाँ था ही नही। 

नागराज :- ल्यो….ई ससुरा तो पहले भाग गया। 

कोबी :- भागा नाही है….ऊssss देखो। 

कोबी ने दूर हवेली के प्रवेश द्वार की सीढ़ियों पर इशारा किया। डोगा चढ़ता हुआ अंदर जा रहा था। 

नागराज :- अरिस्साला। ई तो जांबाज़ खिलाड़ी निकला। 

परमाणु :- सच मे मर्द है यार ये तो! 

ध्रुव :- इसे कहते हैं सच्चा दोस्त! देख अपने दोस्त स्टील को बचाने भूतिया हवेली में घुस गया। 

और तभी एक जोर की बिजली कड़की। 

कड़ड़ाम्म!!! 

सभी हिल गए। परन्तु तिरंगा ने ऐसा कुछ देख लिया था कि वह सबसे ज़्यादा हिला।

तिरंगा :- व…व…वहाँ छत पर कौन खड़ा है?

परमाणु :- वेयर? वेयर?

कोबी :- केहर? केहर? 

तिरंगा ने डरते-डरते हाथ से इशारा किया। 

वहाँ नज़र पड़ते ही सब सन्न मार गए। सिर के पीछे के रोएँ भयाक्रांत होकर खड़े होते चले गए और चेहरों पर खौफ की लकीरें खिंच गईं। हवेली की छत पर, रेलिंग से सटकर खड़ा एक साया उन्हें ही घूरता प्रतीत हो रहा था। 

तिरंगा :- ज…ज…जय हनुमान ज्ञान गुण सागर…..जय….हनुमान ज्ञान गुण सागर….जय हनुमान ज्ञान गुण सागर…

परमाणु :- अबे त….त….तिरंगे इससे आगे नही आता क्या बे! तबसे जय-जय किए जा रहे हो साले। 

नागराज (तिरंगा से) :-  साले दो लाइन भी याद नही कर पाए। अबे मन्दिर किसलिए जाते थे? सिर्फ प्रसाद चांपने! 

तिरंगा:-  नही। 💭जाता तो भीख मांगने था💭 

परमाणु :- ससुरों! तुमलोग आपस मे ही खिचपिचाते रहो मैं तो उड़कर भागने वाला हूँ। 

प्रेतात्मा अब भी उसी प्रकार खड़ी होकर उन्हें घूर रही थी। 

नागराज चिल्ला पड़ा– “उड़ तो मैं भी सकता हूँ न। अबे कोई बताओ मैं कौनसा वाला नागराज हूँ?” 

नागराज ध्रुव के पास पहुँचा और उसकी कॉलर पकड़कर हिलाने लगा– “अबे ध्रुव मैं कौनसा वाला नागराज हूँ? तेरे बाप वाला?” 

ध्रुव सकपका गया। 

ध्रुव :- 💭अगर इसे बता दिया यह कौनसा वाला नागराज है तो यह भाग जाएगा यहां से।💭 त….त….तुम क्लासिक नागराज हो। 

नागराज :- गुर्र! भक्क बे! उसको तो ढंग से दौड़ना भी नही आता….उड़ कहाँ से पाएगा। कह दे…कह दे मैं अनुपम सिन्हा वाला नागराज हूँ। 

नागराज पगला गया था। एक-एक की कॉलर पकड़कर पूछ रहा था– “अबे मैं कौनसा वाला नागराज हूँ?” 

कोबी :- तुम नातिन मिर्चा वाले नागराज हौ ससुर। 

नागराज रुक कर उसे घूरने लगा। 

परमाणु :- शायद नितिन मिश्रा कहना चाह रहा था बेचारा। 

कोबी :- हाँ बे उहे! 

नागराज :- भक्क सालों! उस नागराज ने तो साला नागराज नाम पर कलंक लगा दिया। साला कपड़े पहन कर घूमता है, गुर्र!!!

परमाणु :- साले चचा तुम अपने अस्तित्व की तलाश करो अपुन तो अपना अस्तित्व बचाकर निकलता है यहाँ से। 

कहकर परमाणु उड़ता हुआ गेट की तरफ भाग गया। तिरंगा चिल्लाता रह गया– “अबे मुझे भी ले ले। गुर्र! सही ही कहा गया है। जब तक पैसा होता है दोस्त पीठ पर बैठा कर घुमाते हैं। पैसा खत्म तो पहचानना भी भूल जाते हैं साले।” 

इधर नागराज अलग पगलाया हुआ था। उसने कोबी को हवा में उठा लिया।

नागराज :- बोल साले बोल मैं अनुपम सिन्हा वाला नागराज हूँ…..बोल जल्दी! 

कोबी :- अबे छोड़ दे। अबे मुझे मेरे बारे में नही पता तेरेको क्या बताऊँ रे। 

तिरंगा :- 💭बेचारे नागराज के साथ इतने लोगों ने काण्ड किए हैं कि बेचारा कन्फ़्यूज़ हो गया है।💭

तभी तिरंगा डर के मारे जड़ हो गया। उसकी चड्डी सरकते-सरकते बची। 

दुष्टात्मा का भय बढ़ता ही जा रहा था। क्योंकि ऐसा लग रहा था वह सबको घूर-घूर कर देख रही है। 

नागराज ध्रुव पर झपटा– “बोल बे पोपट मैं कौनसा नागराज हूँ?” 

ध्रुव :- शांत हो जाओ नागराज। तुम पर झुंझलाहट हावी हो रही है….और झुंझलाहट का चचेरा मामू है क्रोध! वह भी आता ही होगा और क्रोध हमेशा विनाश का कारण बनता है। खुद पर काबू करो। 

नागराज :- साले बलेल इंसान! ज्यादे प्रवचन मत झाड़। चुप-चाप बता मैं कौन हूँ? 

कोबी एक तरफ गला पकड़ कर बैठा हुआ था। उधर तिरंगा की हालत सरकती जा रही थी, उसकी आँखें एक ही स्थान पर टिकी हुई थीं– मानो पथरा गईं हों। अब तक रेलिंग के नीचे खड़ा साया अब चढ़कर रेलिंग पर ही खड़ा हो गया था और उनलोगों को अपनी लाल-लाल आंखों से घूर रहा था। उसके सिर के बिल्कुल पीछे काले बादलों का झुंड तैर रहा था और जगमग करता आधा चाँद उनके पीछे से झाँक रहा था– मानो वह भी उस प्रेतात्मा से डर कर छुप गया था।

अचानक साए ने रेलिंग पर से छलाँग लगा दी। उसकी इस अप्रत्याशित हरकत से तिरंगा का हृदय उछलकर गले तक आ गया– वह मरते-मरते बचा। 

‘धप्पssss’ 

अरे बाप रे! प्रेतात्मा के धरती पर कूदते ही भूकम्प का एक झटका सा आकर चला गया। 

नागराज के पागलपन को फिर भी कोई फर्क नही पड़ा और अब ध्रुव भी कहाँ पीछे रहने वाला था। दोनों आपस मे गुत्थम-गुत्था होकर गाँठ की तरह बन्ध गए थे। 

ध्रुव :- अबे हरीले प्राणी अब मुझे गुस्सा आ रहा है और गुस्सा प्रलय का कारण बनता है। 

नागराज :- अबे तेरे प्रलय की विनाशलीला मारूँ साले पोपट! 

प्रेतात्मा के इर्द-गिर्द एक रहस्मय धुवाँ उड़ रहा था और उस धुएँ के पार से उसकी लाल आँखें तिरंगा पर दृष्टिपात कर रही थीं। तिरंगा डर के मारे पसीने में नहा चुका था और ठंडा पड़ता जा रहा था। उसके मुंह से बोल भी न फूट रहे थे। 

नागराज ध्रुव को चांटा मारता हुआ उससे अलग हुआ। ध्रुव उसपर झपटा पर तब तक नागराज कूदकर तिरंगा तक पहुँच चुका था। 

नागराज :- अबे तिरंगा बता मैं कौनसा नागराज हूँ?

परन्तु तिरंगा तो गूंगा हो चुका था। 

नागराज :- अबे खड़े-खड़े टपक गया क्या? लगता है साला पहली फुर्सत में निकल लिया! 

“वह नही बोल पाएगा!” 

ऐं! यह कौन बोला? नागराज ने उचककर तिरंगा के कंधे के पीछे देखा। 

वहाँ कंपकंपाता हुआ एंथोनी खड़ा था। उसने भी उस प्रेतात्मा को देख लिया था। 

नागराज :- साले मुर्दे! तू कब से खड़ा है यहां? 

एंथोनी :- मैं तो कब से यहीं हूँ। बहूहू!

नागराज :- साले कल्लू। इतना काला हो चुका है कि अब अंधेरे में दिखता ही नही तू तो।

फिर नागराज उस पर भी झपट पड़ा। 

नागराज :- बोल मैं कौनसा नागराज हूँ? 

एंथोनी बेचारा काँपता हुआ नागराज के पीछे उस साए को घूर रहा था जो धुएँ के बीच तैरता हुआ उनलोगों की ओर बढ़ रहा था। 

नागराज :-  अबे इधर-उधर क्या टीप रहा है? मेरी आँखों मे देख और बता मैं कौनसा नागराज हूँ? 

एंथोनी :- भू…भूत! भूत! 

बेचारा एंथोनी डर के मारे बेहोश हो गया। 

नागराज :- ऐं! यह और तिरंगा तो एक ही कैटेगरी के निकले। जल्द ही दोनों की टू इन वन आनी चाहिए ‘फटफटिया मुर्दा और रंगीन मच्छर’।

नागराज वापस पलटा। उसके आस-पास धुएँ के बादल छाए हुए थे। हाथ को हाथ नही सूझ रहा था। 

नागराज एक-एक का नाम पुकारता हुआ आगे बढ़ा– “ध्रुव! कोबी! तिरंगा! परमाणु!” किसी की भी आवाज़ नही आ रही थी। मरघट सा सन्नाटा छा गया था। अचानक नागराज को एक साया अपने ठीक सामने खड़ा दिखा। वह पीछे की ओर घूम कर खड़ा था। 

नागराज :- साले ध्रुव! तू यहां खड़ा है? अब तुझे बताना ही होगा कि मैं तेरे बाप वाला नागराज हूँ कि नही। 

कहते हुए नागराज ने साए के कंधे पर हाथ रख दिया। कुछ क्षण तक चर्र-चर्र की एक आवाज़ वातावरण में सुनाई पड़ती रही–जैसे किसी मकान की टूटी हुई खिड़की हवा चलने पर झूल रही हो। 

और फिर! एक झटके से नागराज की ओर घूम गया साए का चेहरा और नागराज हड़बड़ा गया। उसकी आँखें चौंककर चौकोर होती चली गई थीं। 

एक दिन पहले राजनगर में– 

एक अलग ही कहानी चालू थी यहां तो। 

नताशा दुल्हन बनी हुई थी। चंडिका और ब्लैक कैट सड़ी बण्डी को पीट कर पटरा कर चुकी थीं। 

राजन मेहरा, रजनी के साथ खड़े थे और रोबो भी एक कोने में खड़ा था। 

सभी की आँखें कटोरा हुई पड़ी थीं। 

उनके सामने ध्रुव जो खड़ा था। 

नताशा :- ध्रुव तुम आ गए? 

चंडिका :- कहाँ चले गए थे भ…भ…बे! म मेरा मतलब बेटा…राजन मेहरा के बेटा!

ब्लैक कैट :- जानू तुम्हारी बहुत याद आ रही थी। 

सभी पलट कर ब्लैक कैट को घूरने लगे। 

ब्लैक कैट(सकपकाते हुए) :- अरे पूरी बात तो सुनिए। (फिर ध्रुव की तरफ पलटकर) जानू तुम्हारी बहुत याद आ रही थी नताशा को को।💭गुर्र💭

रोबो :- देखो बे राजन मेहरा! तुम्हारा नामुराद, कमबख्त, कमीना, कुत्ता लौंडा वापस आ गया। अब फौरन मेरी बेटी की शादी कराओ इससे वरना खुदको शूट कर लूँगा💭हीहीही। वैसे भी अनुपम सिन्हा मुझे दुबारा जिंदा कर देंगे।💭 और फंस जाओगे तुम।

रजनी :- अरे रोबो भइया! पर मेरे बेटे की भी तो राय ले लो(ध्रुव की तरफ बढ़ते हुए) हाय मेरा लाल किधर चला गया था। 

राजन मेहरा कसमसा कर बुदबुदाए–“कहीं पर खुदको लाल-पीला करवा रहा होगा कमबख्त।”

रजनी ध्रुव का गाल सहलाने लगी। मौका देखकर ब्लैक कैट एक खम्भे के पीछे कूदी और दो सेकेंड बाद उसके दूसरे ओर से सामने आई– ऋचा के रूप में। 

नताशा दौड़कर ध्रुव तक पहुँची। 

नताशा (आस भरी निगाहों से!) :- तुम मुझसे शादी तो करोगे न? 

ऋचा :- नही मुझसे करेगा! 

नताशा :- अबे तू कहाँ से आ गई(फिर राजन और रजनी द्वारा खुदको को घूरता पाकर) मतलब तुम कहाँ से आ गई यार(मुस्कराते हुए–पर अंदर ही अंदर जलकर कोयला होते हुए।) और ब्लैक कैट किधर है। 

ऋचा ने उसे देखकर मुँह बनाया। 

ऋचा हुंह करती हुई ध्रुव के बगल में खड़ी हो गई। 

ऋचा :- तुम मुझसे शादी करोगे या नही?

नताशा जंगली बिल्ली की तरह झपट पड़ी(ध्रुव पर। हीहीही) 

नताशा :- नही मुझसे करेगा। 

उन दोनों की छीना झपटी देखकर ध्रुव ने अपने हाथ ऊपर किये– “शांत हो जाओ मेरी जंगली बिल्लियों! मैं तुम दोनों से ही शादी करूँगा।” 

“ऐं!!!!!” सब के सब हैरान होकर एक दूसरे का मुँह देखने लगे। 

राजन :- 💭साला। बाप सामने खड़ा है फिर भी दो शादियों की बात कर रहा है…नामुराद!💭

जबकि ध्रुव पीछे घूमकर खड़ा हो चुका था और मन ही मन कुटिलता से मुस्करा रहा था। 

ध्रुव :- 💭सिर्फ नताशा और ऋचा ही नही….मैं तो श्वेता से भी शादी करूँगा। हीहीही।💭 

ओह्ह! अब यह तो पक्का हो गया कि यह ध्रुव नही है। पर यह है कौन? क्या नक्षत्र? कॉमेट? एक्स? 

कौन है आखिर यह???

ध्रुव :- मैं हूँ श्रुव! हीहीही। श्रिंकलोक का सम्राट श्रुव! साले ध्रुव! तूने मेरा सब कुछ छीन लिया। मेरा परिवार, मेरे लोग…..तूने मेरा पूरा ग्रह नष्ट किया न साले अब मैं तेरे नक्षत्रों में आग लगाऊंगा। गुर्रर्रर हीहीहीही। 

~~~प्रथम अध्याय समाप्त~~~~

क्रमश: 

 

Written By – Talha for Comic Haveli

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4 Comments on “Apradh Unmoolan Ke Baad Part 9”

  1. वाह तल्हा भाई, मजा आ गया। एक एक लाइन बहुत सही लगी, खासकर कि परमाणु का सबकी चड्डी के पीछे पड़े रहन, उस पर टिक टॉक बनने का इल्जाम लगाना, तिरंगा का डरपोक स्वभाव और नागराज तो एन्ड में पगला ही गया। सभी पर चढ़ा जा रहा था, अब वह दुरात्मा कौतूहल पैदा कर रही है, उसकी वजह से एक आध जगह कहानी को हॉरर टच भी मिला है। कोबी बड़ा unhygenic सा लगा इस कहानी में, बाकी सुपर हीरोज भी घिना गए उससे। RC को हास्य हिंडोला लिखने का काम तुमको सौंप देना चाहिए, अगर RC से संबंधित कॉमेडी कोई बेस्ट तरीके से लिख सकता है तो वो तुम्ही हो। (ज्यादा उड़ने ना लग जाना रिव्यु के बाद ,हीहीही)

  2. अबे यार का लफड़ा किये हो
    उम्मीद से भी ज्यादा तगड़ा किये
    पकड़ पकड़कर सब गुथमगुत्था होई गवा है
    हमरे दिमाग का धतूरा किये हो

    कसम से यार हर लाइन में हँसा दिए, ऐसा लग रहा जैसे हँसा हँसा कर मर देने का इरादा हो, वैसे लभेड़पन्ति बहुत भयंकर वाला किये हो,इसलिए तो
    intzaar था इसका हद से ज्यादा
    पूरा कई दिए तुम हँसाने का वाला
    हद हो गयी है लभेड़पन्ति की
    समझे में दिमाग होई गवा आधा

    वैसे हम का तारीफ करें भाई गजब शानदार जानदार हँसा हँसा के जान निकाल दे लिख दिए हो, अब ये श्रुव कौन है ससुर

    अगला भाग जल्दी लाना, ये टिक टकिया परमाणु, तिरंगा
    और मुर्दे का डर, ध्रुव की कैप्टेनगीरी, होशियारपन्ति, नागराज का भाषनगिरी और खुद के अस्तित्व को खोजना, हर पंच बहुत ही शानदार, पढ़ के मजा आ गया, अब जल्दी से इसे दोबारा पढूंगा बस तुम ये सीरीज पूरा लिख दो, ज्यादा बड़ा रिव्यु नही दे पाऊंगा

    टाइम कम है हीही

    वैसे बीच मे खुद को लाने का मस्त तरीका था, अवेंजर्स को भी घुसा दिया, हेरोइनो के नाम का मंत्र जाप करवा दिया गजब क…क……क…किरण
    पूरी कहानी ऑसम रही, सिर्फ यही कहानी नही हर कहानी सीरीज बहुत मस्त है, उम्मीद है अगला भाग जल्दी ही मिलेगा पढ़ने को

  3. भाई सबसे पहले तो ये ध्रुव और काढ़े का चक्कर क्या है ये बताइये

    कहानी मस्त है, बार बार पढ़ रहा हूँ और हंस रहा हूँ

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