Bhediya Aatank Part 4

6 घण्टे पूर्व-

असम के जंगल में-

 

गुरुराज और नगीना अभी इस सोच में डूबे ही थे कि कहाँ से वो फिर से भेड़ियों की फौज खड़ी कर पाए क्योंकि भेड़िया भ्रूण जन्म तो ले रहे थे लेकिन तुरंत मर भी जा रहे थे।

गुरुराज इस बात से दुःखी थे कि भेड़िया देव क्रूराक्ष ने ही उसे धोखा दिया था। तभी-

 

एक आवाज आती है-

“क्या मैं कुछ सहायता करूँ”

 

गुरुराज और नगीना उस ओर नजर घुमाते हैं जहाँ से आवाज आयी थी।

हवा में ही एक द्वार खुला था और उस से नागपाशा और गुरुदेव दिखते हैं।

 

नगीना- तुम यहाँ?

 

भाटिकि- ये दोनों कौन हैं नगीना?

 

नगीना कुछ बोल पाती उससे पहले ही नागपाशा बोल पड़ा-

 

नागपाशा- हाहाहा मुझे नहीं पहचाना? मैं हूँ सर्वशक्तिमान अमर नागपाशा।

 

भाटिकि- तुम जो भी हो लेकिन यहाँ आने का प्रयोजन बताओ। नहीं तो आ तो गए हो लेकिन जा नहीं पाओगे।

 

नागपाशा- कदाचित आपको ये भान भी नही है कि मैं कौन हूँ। इसीलिए आप ये धृष्टता कर रहे हैं।

 

गुरुदेव- चुप रहो नागपाशा। (नगीना और गुरुराज से) हम तब से तुम लोगो पर नजर जमाये हुए हैं, जब से तुमने नगीना से संपर्क किया था।

 

नगीना- तुम लोग करने क्या आये हो यहाँ?

 

गुरुदेव- तुम्हारी सहायता करने।

 

भाटिकि- कैसी सहायता? हमें आवश्यकता नहीं है आपकी सहायता की आप लोग प्रस्थान कीजिये यहाँ से।

 

गुरुदेव- क्या आप इन भेड़िया शिशुओं को जीवित नहीं करना चाहते? क्या इन्हें ऐसे ही मरने देंगे?

 

भाटिकि- तुम चाहते क्या हो?

 

गुरुदेव- बताया तो केवल आपकी सहायता करना। और बदले में केवल मेरा थोड़ा सा  निजी स्वार्थ।

 

भाटिकि- कैसा स्वार्थ?

 

गुरुदेव- वो आपको बाद में बताऊंगा। आप अभी केवल अपनी सहायता करने दें।

 

नगीना- कैसे सहायता करेंगे आप?

 

गुरुदेव- एक ऐसा यंत्र का निर्माण करके जिसमें से सारी सेना जन्म ले सके और कोई मरे भी न।

 

भाटिकि- क्या ये संभव है? क्योंकि भेड़िया देवता ने मुझसे अभी छल किया है।

 

नगीना- गुरुदेव अगर कह रहा है तो अवश्य कर भी देगा।

 

भाटिकि- ठीक है तुम यंत्र लगाओ।

 

वर्तमान में-

 

रूपनगर-

एक मुर्दे का शहर।

जो मुर्दा कब्र में होकर भी अपराध को सह नही पाता और कब्र फाड़कर निकल पड़ता है वो मुर्दा एंथोनी, अपराध का नाश करने के लिए।

जिसे जगाता है प्रिंस एक कौवा।

लेकिन आज कोई और दिन था, आज प्रिंस उसकी कब्र के ऊपर कर्कशाया नही था और न ही आज कहीं और अपराध हो रहा था।

फिर भी आज किंग का शरीर सोने लग गया और इसे नींद आ गयी।

जाग रहा था अब मुर्दा एंथोनी।

जागना उसकी मजबूरी भी थी और रूपनगर की जरूरत भी।

आज कब्रिस्तान आम दिनों की तरह शांत नहीं था।

केवल एंथोनी की कब्र ही नही फट रही थी, केवल एंथोनी कब्र फोड़कर बाहर नहीं आ रहा था। आज कब्रिस्तान की हर कब्र फट रही थी और मुर्दे कब्र फोड़कर बाहर आ रहे थे।

हर तरफ मुर्दे ही मुर्दे थे।

 

एंथोनी कब्र फोड़कर बाहर निकला। तब तक प्रिंस भी आ चुका था।

 

आते ही प्रिंस ने कर्कशाना शुरू कर दिया।

पूरा कब्रिस्तान कांव कांव की आवाज से गूंज गया था।

 

एंथोनी- क्या कह रहा है प्रिंस!

 

एंथोनी ने सभी मुर्दो को वापस कब्र में जाने का हुक्म दिया लेकिन मुर्दे कब किसका हुक्म मानते हैं।

 

एंथोनी- ये क्या हो रहा है प्रिंस क्यों आये हैं सभी मुर्दे आज बाहर?

 

प्रिंट का कर्कशाना अभी भी जारी था।

 

एंथोनी- समझ गया प्रिंस। तुझे भी नहीं पता। लेकिन ये जो भी हो रहा है अच्छा नही हो रहा है। सबको एक बार फिर से कब्र में बंद करना जरूरी है।

 

एंथोनी उड़ता हुआ काफी ऊपर आसमान तक आ गया था, और जब उसने नीचे देखा तो वहां केवल मुर्दे ही मुर्दे नजर आ रहे थे।

 

एंथोनी- होली क्राइस्ट। ये क्या हो गया है! सभी कब्रिस्तानों से मुर्दे क्यों उठ रहे हैं आज!

 

एंथोनी अब नीचे वापस जमीन पर आ जाता है।

 

एंथोनी- इन सबको कब्र में वापस भेजना ही होगा मुझे प्रिंस। वो भी बहुत जल्दी।

 

 

मुम्बई-

डोगा की मुम्बई-

 

पूरी मुम्बई को अपने हाथों से बदलने वाला डोगा, जिसके नाम से ही लोगों में डर बैठ जाता है। आज उसको देख कर भी कुछ लोग डर नहीं रहे थे और डोगा एक ओर पड़ा था।

उसके सामने खड़ा था तो अजीब से लोगो का झुंड।

जिनके आंखों में डोगा का डर नहीं था। हाथों में बंदूकें नहीं थी, थे तो सिर्फ भाले और धनुष बाण।

 

डोगा- कौन हो तुम लोग? ये अजीब से पत्ते और जानवरों की खाल पहने क्यों पहने हुए हो?

 

एक आदमी बोल पड़ता है।

 

आदमी- जिंग भूंग से टेंग तो होर।

 

डोगा- ये क्या कह रहा है? कुछ समझ तो नही आया लेकिन जिस अकड़ के साथ कह रहा है और लोग देख सुर सुन रहे हैं इसे ये पक्का इनका लीडर होगा।

 

डोगा चिल्लाते हुए उनसे बोला।

 

डोगा- कौन हो तुम लोग? बोलो नही तो मेरी बंदूक की हर एक गोली तुम से सवाल करेगी।

 

लेकिन लगता है उन जंगलियों पर उसकी बात का कोई असर नहीं पड़ा। वो बस एक दूसरे को ताक रहे थे। उनका लीडर एक बार और चिल्लाया।

 

आदमी-जिंग भूंग से टेंग तो होर।

 

इसी के साथ कई भाले और धनुष डोगा की ओर मुड़ गए।

डोगा- लगता है ये मुझे समझ नहीं पा रहे हैं। इनसे अब बचने का बस एक ही रास्ता है इन सबकी मौत।

डोगा अब तन के खड़ा हो चुका था और उसके हाथों में थी उसकी बंदूक।

कई तीर और भालो से बचता हुआ वो गोली चला रहा था।

आज उसकी एक भी गोली खाली नहीं जा रही थी।

लेकिन एक एक गोली उन जंगलियों को खूंखार बना रही थी।

कई सारे जंगलियों को मौत के द्वार पहुंचा चुका था डोगा।

कई की हड्डियां भी तोड़ चुका था।

लेकिन गोलियां अब खगम हो चुकी थी। लेकिन उनका सामना डोगा से था।

डोगा- गोलियों को भी अभी खत्म होना था। अब कुछ बम ही बचे हैं। लगता है अब डोगा के हाथ ही इनके लिए काल बनेंगे।

डोगा- जंगलियों का मुखिया अगर मर जाये तो खेल खत्म समझो उनका। इनके मुखिया को ही खत्म करना होगा।

डोगा भालों और तीरों से बचता हुआ और एक एक जंगली से जूझता हुआ आखिर कार कई चोटों के बाद मुखिया तंक पहुंच ही गया।

डोगा ने एक घूँसा मुखिया के पेट पर मार दिया। मुखिया रोड के किनारे खड़े खम्भे को तोड़ता हुआ रोड के दूसरी तरफ जा गिरा।

लेकिन आश्चर्यजनक रूप से जंगली खड़ा हो गया और बहुत ही फुर्ती से डोगा तंक पहुंच भी गया।

अब बारी थी जंगली की। उसका एक मुक्का डोगा के पेट और लात डोगा के सिर पर पड़ गयी।

डोगा- ओह्ह। ये जंगली काफी ताक़तवर है। मैंने इसे कमजोर समझने की कोशिश कर दी।

डोगा के मुँह से खून रिस रहा था और जंगलियों ने उसे घेर दिया था।

मुखिया डोगा के पास खड़ा हुआ लेकिन एक लात मुखिया के मुँह पर पड़ी और मुख्य कुछ दूर हट गया।

“मेरे बगैर शायद तुमसे कुछ हो नहीं सकता डोगा”

 

5 घण्टे पहले असम में-

 

गुरुराज भाटिकि, गुरुदेव, नागपाशा और नगीना खड़े थे और उनके बीच बात हो रही थी।

वहीं पर किरिगी और महात्मा कालदूत थे जो अब तक बेहोश पड़े हुए थे।

गुरुदेव- लीजिये गुरुराज तैयार है ऐसा यंत्र जो अब आपकी सेना को मरने नही देगा। बल्कि साथ में इसके अंदर यंत्रो से ही सभी प्रकार की आवश्यक पोषण तत्व भी भ्रूण को मिलने लगेंगे  जिससे बच्चा तीव्र गति से बढ़ेगा भी।

भाटिकि- कितना समय लगेगा सेना के लगभग तैयार होने में?

गुरुदेव- कुछ ही महीने।

भाटिकि- इतना समय नही है हमारे पास।

नगीना- इतने समय तक सबसे नहीं छुपा जा सकता है।

नागपाशा- तब तक कोई न कोई उपाय अवश्य निकल आएगा।

नगीना- (किरिगी और कालदूत की ओर इशारा करती हुई) इनका क्या करना है अब?

भाटिकि- इन दोनों को दूर ही रखो और इन्हें कैद कर दो कहीं।

गुरुदेव- ठीक है इन दोनों के लिए एक अद्भुत कैद बनाऊंगा अभी।

भाटिकि- वो सब रहने दो गुरुदेव और अब जब यंत्र तैयार है तो अब आगे काम बढ़ाओ।

यंत्र पिछले यंत्र की भांति ही था लेकिन अब अमिनियोटिक फ्लूइड के साथ ही उसे चारों ओर से एक कांच से ढक दिया गया था और कुछ रॉड उसमे लगा दी गयी थी जो विद्युत ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए लगाई गई थी।

कृत्रिम सूर्य के प्रकाश की तीव्रता को बढ़ाकर केंद्रित करने के लिए एक बड़ा सा उत्तल लेंस भी लगाया गया था।

गुरुदेव- गुरुराज आप फिर से एक कृत्रिम सूर्य का निर्माण कीजिये और उसका प्रकाश फिर से जीवक मणि पर डालिये।

भाटिकि- ठीक है किंतु एक प्रश्न है गुरुदेव की क्या अब भी बच पाएंगे भेड़िया भ्रूण?

गुरुदेव- अवश्य बचेंगे। आप बस इस बार एक बड़ा सूर्य का निर्माण कीजिये।

भाटिकि- कोशिश करूँगा।

गुरुराज भाटिकि के हाथों से एक बार फिर ऊर्जा निकलती है और एक सूर्य का निर्माण होने लगता है लेकिन सूर्य अधिक बड़ा नही हो पाता।

भाटिकि- मैं इससे बड़ा सूर्य नही बना पा रहा हूँ।

गुरुदेव- नागपाशा और नगीना तुम भी सहायता करो।

नागपाशा और नगीना के हाथ से ऊर्जा किरणें निकलती हैं और भाटिकि को ऊर्जा से सम्मिलित हो जाती हैं और एक बड़े सूर्य का निर्माण होने लग जाता है।

अब एक किरण जीवक मणि की तरफ केंद्रित होती है जिसकी तीव्रता काफी ज्यादा हो गयी थी।

चारों तरफ प्रकाश फैल चुका था और इसी के साथ यंत्र में मौजूद अमिनियोटिक फ्लूइड के अंदर ही भ्रूणों का निर्माण होने लगा। जिसे देखकर सभी प्रसन्न थे।

भाटिकि- अंततः सफलता प्राप्त हुई। अब कोई भ्रूण मर नही रहा है।

गुरुदेव- ये तो होना ही था गुरुराज।

नागपाशा-(गुरुदेव से फुसफुसाते हुए) गुरुदेव यदि ये सारी भेड़िया फौज खड़ी कर देगा तो हमें क्यों पूछेगा?

गुरुदेव-(फुसफुसाते हुए नागपाशा से) व्यर्थ की चिंता मत करो नागपाशा।

जल्द ही सबकी खुशी दूर हो जाने वाली थी।

देखते ही देखते अब सूर्य का बढ़ना और उसकी तीव्रता कम होने का नाम नही ले रही थी।

नागपाशा- गुरुदेव कुछ करो मैं ऊर्जा का प्रवाह रोक नही पा रहा हूँ।

भाटिकि- यही हाल मेरा भी है।

नगीना- कुछ तो करो गुरुदेव। आह।

गुरुदेव यंत्र को सही करने का प्रयत्न करते हैं लेकिन कुछ बदलाव हो नही पाता।

गुरुदेव- ये नही हो सकता बिल्कुल भी नहीं।

भाटिकि- क्या हुआ गुरुदेव?

गुरुदेव- जीवक मणि आप लोगो की ऊर्जा सोख रही है। और मैं ऐसा रोक नही या रहा हूँ।

नगीना- अब क्या होगा गुरुदेव आह।

नागपाशा भी दर्द से अब चीखने लगा।

जीवक मणि अब प्रकाश से भर गई थी और वो दिखनी भी बंद हो गयी थी।

प्रकाश से सभी की आंखे बंद हो गयी अब एक भीषण आवाज के साथ प्रकाश सभी जगह फैल गया।

जब प्रकाश कुछ कम हुआ तो वहाँ सभी बेहोश पड़े हुए थे।

एक अज्ञात स्थान पर-

चारों तरफ देखने पर स्थान किसी नरक की भांति लग रहा था।

चारों तरफ आग ही आग नजर आ रही थी और कोई दो पक्ष युद्ध कर रहे थे।

रक्तपात से सारी धरा का रंग लाल हो चुका था।

बाणों के इधर उधर गिरने और भयंकर चीखों ने वातावरण को भयानक बना दिया था।

कुछ ही दूरी पर दो लोग भूमि पर बेहोश पड़े हुए थे।

जो किरिगी और महात्मा कालदूत थे। किरिगी को अब धीरे धीरे होश आने लगा था।

किरिगी अपना सिर को दोनों हाथों से पकड़े हुआ था। अभी भी उसकी आंखे अधखुली अवस्था में थी।

किरिगी- आह। ये कैसा शोर हो रहा है!

किरिगी चारों ओर देखता है और युद्ध को देखकर आश्चर्यचकित हो जाता है। उससे कुछ दूरी पर महात्मा कालदूत अभी भी बेहोश पड़े थे।

किरिगी लड़खड़ाते हुए महात्मा कालदूत के पास जाता है और उन्हें होश में लाने का प्रयास करता है।

किरिगी- उठिए महात्मा कालदूत। देखिये ये सब क्या हो रहा है!

महात्मा कालदूत अपना सिर पकड़ते हुए धीरे धीरे आँखे खोलते हैं।

कालदूत- आह! ये कैसा दर्द है जो सिर फटा जा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे ये दर्द जन्मों से हो रहा हो।

किरिगी- यही हाल मेरे भी हैं महात्मा कालदूत। देखिये यहाँ युद्धभो रहा है।

कालदूत- हम कहाँ है अभी?

किरिगी- ये तो मैं भी नही जानता हूँ।

तभी एक भयावह आकृति उनके सामने प्रस्तुत होती है, जिसका चेहरा प्रकाश पीछे की ओर से होने के कारण दिखाई नही पड़ रहा था।

आकृति- कौन हो तुम दोनों?

महात्मा कालदूत और किरिगी अभी तक ये समझ भी नही पाए थे कि वो इस समय कहाँ हैं, सहसा आयी इस बड़ी सी आकृति को देखकर वो बोल भी नही पाए थे कि इतने में ही वो आकृति फिर बोल पड़ी।

आकृति- (कालदूत की तरफ इशारा करते हुए) तुम एक नाग लगते हो। किस ओर से युद्ध हेतु आये हो तुम?

महात्मा कालदूत अभी तक हतप्रभ थे तो जवाब नही दे पाए।

किरिगी- (आकृति से) कौन हो तुम?

आकृति- मुझसे मत पूछो कौन हूँ मैं। तुम बोलो तुम कौन हो और किस ओर से युद्ध करने के लिए आये हो?

कालदूत- तुम कौन हो? हमें किसी ओर से युद्ध नही लड़ना है।

आकृति- तो फिर सज्ज हो जाओ मृत्यु के लिये!

कालदूत- अवश्य। यदि तुम इसमे समर्थ हो तो।

आकृति के हाथ में हवा में ही एक दिव्य तलवार प्रकट हो जाती है।

कालदूत भी उठ खड़े होते हैं और किरिगी भी अपना खड्ग निकाल के खड़ा हो जाता है।

 

वर्तमान समय नागद्वीप में-

सभी नाग जाति के सैनिकों को हराकर नागराज विसर्पी और विशांक के पास पहुँचा।

विशांक अब पूरी तरह ठीक हो चुका था।

नागराज- विसर्पी जो भी जिंदा बच गए हैं इन सभी को बंदी बना लो।

विसर्पी- ये क्या हो रहा है नागराज। महात्मा कालदूत भी यहाँ नही हैं और ये विपत्ति भी आ गयी

विशांक- दीदी नागराज आ तो गया है अब किस बात का भय।

विसर्पी नागराज के गले एक बार फिर लग जाती है।

विसर्पी- नागराज। तुम्हारी जरूरत है नागद्वीप को तुम अब कहीं मत जाना। (मन में- और मुझे भी)

नागराज- विसर्पी.. वो तो ठीक है लेकिन मुझे जाना होगा यदि कोई मुसीबत पड़ती है तो नागू और सौडांगी को यहाँ छोड़ जाऊँगा। वैसे भी विशांक अब यहाँ सब संभाल सकता है।

विसर्पी- लेकिन नागराज….

इतने में नागराज को ब्रह्मांड फ्रीक्वेंसी पर परमाणु की कॉल आ जाती है।

परमाणु- नागराज तुम कहाँ हो?

नागराज- क्या हुआ परमाणु?

परमाणु- अगर तुम्हारा काम हो गया हो तो जल्दी से दिल्ली के लिए निकल जाओ।

नागराज- आखिर बात क्या है परमाणु? क्या हो रहा है दिल्ली में?

परमाणु- अभी समझाने का समय नहीं है। जल्द से दिल्ली के लिए निकल जाओ।

परमाणु का फ़ोन कट जाता है।

नागराज- विसर्पी मुझे जाना होगा। विशांक तुम ख्याल रखना यहाँ।

नागराज सौडांगी और नागु को शरीर से बाहर निकलने का आदेश देता है।

नागराज- सौडांगी और नागू तुम ध्यान रखना की नागद्वीप को कोई भी हानि ना होने पाए।

सौडांगी- अवश्य नागराज। तुम बेफिक्र रहो।

नागराज- यदि कुछ भी विपरीत घटता है तो तुम मुझे सूचित कर देना।

सौडांगी- ठीक है।

नागराज सभी को अलविदा कहकर दिल्ली के लिए निकल पड़ता है।

असम का क्षेत्र-

नागराज से अलग होकर भेड़िया असम के जंगल की ओर निकल पड़ता है।

जंगल पहुंचकर भेड़िया के आश्चर्य का ठिकाना नही था।

भेड़िया- हे भेड़िया देव। ये कैसी माया है मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे मैं वुल्फानो पहुँच चुका हूँ।

💭 ये वही जगह है जहाँ मेरा बचपन बीता था। मेरे पिता वुल्फा और मेरी माता सुवर्या ने सबसे पहले जब मुझे अपनी गोद मे लिया था तो वो यही जगह थी।💭

भेड़िया जैसे जैसे आगे बढ़ रहा था वैसे वैसे वो अपनी यादों में खो रहा था।

💭 वही स्थान जहाँ मैं कभी शरारत किया करता था लेकिन गुरुराज भाटिकि ने मुझे इस काबिल बनाया जो मैं आज हूँ।💭

💭भले ही मेरा बचपन मुझसे छीन लिया गया और मुझे मेरी माता का स्नेह और पिता की डांट नहीं मिली। ये सब हुआ वो भी मेरी माता के ही कारण💭

💭लेकिन वो भी मजबूर थी आखिर कौन ऐसे व्यक्ति को स्वीकार करता है जो जबरदस्ती विवाह करता है, वो भी मनुष्य नही बल्कि मानव जाति से अलग एक भेड़िया!💭

💭वुल्फा जो प्रेम तो करता था लेकिन स्वार्थ से भरा प्रेम। जिसमे मेरी माता की कोई इच्छा का सम्मान नहीं था, मेरे नाना श्री को आज्ञा नहीं थी। था तो केवल एक छल कपट।💭

भेड़िया अभी अपने ख्यालो में मग्न ही था कि एक आवाज ने उसका ध्यान अपनी ओर खींचा।

आवाज- रुक जाओ वहीं अन्यथा मृत्यु को प्राप्त करोगे।

भेड़िया ने जैसे ही उस ओर नजर दौड़ाई तो उसकी आँखों मे अश्रु धारा बहने लगी। वो कुछ बोल नहीं पाया बस एक टक अश्रु बहाते हुए निहारे जा रहा था।

 

 

………………क्रमशः

 

Written By – Devendra Gamthiyal for Comic Haveli

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14 Comments on “Bhediya Aatank Part 4”

  1. Bahut badhiya ja rhi hai kahani….End dekhke lag rha hai ki bhediya apni maa se milega. Aage ki story ka intzaar rhega.

  2. कहानी की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है कहानी में कोई भी गलती निकालना खुद की बेजती करने के समान है और कहानी अच्छी है यह तो बताने की कोई जरूरत ही नहीं है । आप वैसे भी बहुत अच्छा लिखते हैं ।बस थोड़ा कहानी घटनाएं काफी तेजी से घटित हो रही थी । और कहानी छोटी सी लगी । कहानी बड़ी है इसलिए कहानी के लोगों के साथ क्या हुआ यह बता पाना भी मुश्किल है इसलिए आपके अगले हिस्से का इंतजार रहेगा

  3. Badiya story Anthony ki bhi entry ho gyi, but dhruv kahan h 🙁 interest badta ja raha h but tiranga ko bhi lana aur shakti ko bhi kyuki parmanu ne kaha ki delhi me bhi kuch ghatit ho raha h

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