Bhediya Aatank Part 5

भेड़िया आतंक पार्ट- 5

 

असम में-

 

वुल्फानो के महल का दृश्य-

 

सांय सांय की आवाज के साथ बहुत तेज हवाएं चल रही थी भेड़िया घुटनों के बल जमीन पर बैठा हुआ था। हवाओं के थपेड़ों से उसके बाल उड़ रहे थे और साथ ही उसके अश्रु भी लगातार बह रहे थे।

भेड़िया के अश्रु जैसे ही जमीन की ओर गिरते हवा के साथ वो उड़ जाते ।

भेड़िया कुछ बोलना चाह रहा था लेकिन उसके कांपते होंठ उसका साथ देने को राजी नहीं थे।

 

आखिर इतने वर्षों बाद उसने अपने पिता को देखा था।

 

सामने वुल्फा हाथ बांधे हुए खड़ा था, उससे कुछ ही दूर सुवर्या भी खड़ी थी। जो भेड़िया को निहार रही थी।

 

वुल्फा- कौन हो तुम? और किस उद्देश्य से वुल्फानो की धरा पर पैर रखने की चेष्टा की है तुमने?

 

भेड़िया कुछ जवाब नहीं देता उसकी आँखों से आंसू अनवरत बह रहे थे। उसकी नजर एक पल के लिए भी अपने माता और पिता के चेहरे से हट नहीं रही थी।

 

वुल्फा- कौन हो तुम?

 

भेड़िया-💭(मन में) कितना सुंदर स्वप्न है। मेरी माता मेरे पिता दोनों एक साथ एक ही जगह पर खड़े हैं। माता की आंखों में पिता के लिए प्रेम मैं साफ देख सकता हूँ। क्या हुआ तो जो मुझे मेरे प्रेम नही मिला! लेकिन आज भी प्रेम को दूर से ही पहचान सकता हूँ।💭

 

वुल्फा- जवाब दो भेड़िया मानव। ये आखिरी चेतावनी है तुम्हारे लिए।

 

भेड़िया- 💭(मन में) मेरे पिता की गर्जाती आवाज आज भी याद है मुझे। बलिष्ठ शरीर के साथ साथ भारी आवाज और उनकी बलिष्ठ भुजाएँ, जिन पर अधिक तो नहीं किंतु कुछ समय अवश्य मेरा बचपन बीता है। कैसे रोकूँ इस पल को कैसे थाम लूं इस स्वप्न को💭

 

वुल्फा- बस बहुत हुआ।

 

वुल्फा अपनी कमर में बंधी तलवार को म्यान से बाहर निकालने ही वाला होता है कि..

 

सुवर्या- रुक जाइये महाराज। न जाने क्यों ये मुझे कोई अपना लग रहा है।

 

वुल्फा- नहीं ऐसा होता तो ये अवश्य ही कुछ बोलता।

 

भेड़िया की आंखों से आंसू अभी भी लगातार निकल रहे थे। सुवर्या भेड़िया की आँखों से बहते हुए आँसुओं को देखकर खुद भी रोने लगी थी। उसकी आँखें भी नम हो गयी थीं। तेज हवाएं अभी भी चल रही थी हर जगह पत्ते उड़ रहे थे और अनायास ही सुवर्या वुल्फा और भेड़िया से टकरा रहे थे।

 

भेड़िया- 💭 माता का मुख आज भी मुझे याद है जब पहली बार मैं और मेरे पिता यानी वुल्फानो सम्राट वुल्फा मोरागढ़ को रौंदते हुए माता के कक्ष में पहुंचे थे और माता ने मुझे पत्थर बन जाने का शाप दिया था। किंतु मैं अपनी माता का मुख कभी नही भूल सकता। इतने वर्षों के पश्चात आज फिर से अपनी माता को देख रहा हूँ।💭

 

वुल्फा भेड़िया के जवाब न दिये जाने से क्षुब्ध हो गया और म्यान से तलवार निकाल कर एक वार भेड़िया पर करता है।

भेड़िया के सीने को छूती हुई तलवार निकल जाती है।

 

भेड़िया की छाती से खून बहने लगे जाता है। जिसे देखकर सुवर्या की आँखे भर आती हैं।

 

सुवर्या- आह महाराज ये आपने क्या कर दिया सुबुक। देखिये इसका रक्त बहने लगा है।

 

सुवर्या भेड़िया के पास आती है और उसके सिर पर हाथ फेरने लग जाती है।

 

भेड़िया का ध्यान सुवर्या के छूने से टूट जाता है और वो खड़ा हो जाता है।

 

भेड़िया के मुख से अचानक ही माता निकल पड़ता है।

वुल्फा सुवर्या को अपनी ओर खींचता है।

 

वुल्फा- हट जाओ सुवर्या।

 

सुवर्या- महाराज रुकिए!

 

वुल्फा बिना क्षण गंवाए तलवार को तीव्र वेग से घुमाता है और तलवार भेड़िया की गर्दन को काटने के लिए बढ़ती है।

भेड़िया घुटनों के बल बैठ जाता है।

तलवार हवा में ही घुमकर रह जाती है।

वुल्फा इससे कुपित हो जाता है और पुनः तलवार को पूरी ताकत से भेड़िया की गर्दन काटने के लिए घुमाता है।

तलवार जैसे ही भेड़िया की गर्दन के नजदीक पहुंचती है नेपथ्य से एक आवाज आती है।

 

“रुक जाओ वुल्फा। ये क्या मूर्खता कर रहे हो?”

 

यहाँ भेड़िया मुसीबत में था तो उससे कहीं दूर मुम्बई में डोगा भी मुसीबत से दो चार हो रहा था।

 

मुम्बई-

 

डोगा जंगलियों से घिरा हुआ था और लोमड़ी ने आकर डोगा को हमेशा की तरह मुसीबत से बाहर निकाला था।

 

डोगा- लोमड़ी तू यहाँ?

 

लोमड़ी- क्यों नहीं आना चाहिए था?

 

डोगा- मेरा मतलब ये नहीं था।

 

लोमड़ी- बातें बाद में करना । ये ले पकड़ अपनी बंदूक।

 

लोमड़ी डोगा के वफादार कुत्ताफौज़ द्वारा लायी गयी बंदूक में से एक बंदूक डोगा की तरफ उछालती है। जिसे डोगा जंगलियों के बीच निकलता हुआ जैसे तैसे पकड़ लेता है।

अब बंदूक थी और बंदूक के ट्रिगर पर डोगा की उंगलियां।

एक एक गोली अब जंगलियों को सीने को चीरती हुई जा रही थी।

लेकिन जंगली इतनी जल्दी हार मानने वालों में से नहीं थे।

और न ही शांत बैठने वाला था उनका मुखिया।

 

मुखिया चिल्लाता हुआ डोगा की ओर गया और एक ही घूँसे में उसने दिखा दिया कि वो क्यों इन जंगलियों का मुखिया था।

लोमड़ी पूरी ताकत से जंगलियों से लड़ रही थी।

काफी जंगली अब तक डोगा के हाथों मारे जा चुके थे लेकिन अब भी ताक़त का पहाड़ जंगलियों का मुखिया खड़ा था।

 

एक टकराव होने वाला था जिसमें एक कि मौत निश्चित थी।

डोगा? मुम्बई का रखवाला या फिर जंगलियों का मुखिया जो डीलडौल में डोगा से ज्यादा ही था कम नहीं।

 

डोगा और मुखिया टकरा पड़े।

डोगा और मुखिया में एक भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया।

 

डोगा का हर एक घूँसे में आज किसी आम इंसान को बेहोश करने की ताकत नहीं थी बल्कि आज उसके हर एक वार में पूरी जान लगी थी।

उसके कई घुसे मुखिया पर पड़ रहे थे लेकिन मुखिया पर अधिक असर नहीं डाल पा रहे थे।

अब बारी मानो मुखिया की थी। मुखिया के एक एक घूंसे और लात ने आज डोगा को अंदर तक हिला डाला था।

डोगा पहले से ही थका हुआ था और उसके हर वार में शिथिलता साफ दिखायी दे रही थी।

और ऐसा लग रहा था कि जैसे डोगा का आज अंतिम दिन था।

 

लोमड़ी भी अपनी लड़ाई में व्यस्त थी जंगलियों को मारते हुए यकायक उसकी नजर डोगा ओर पड़ी।

जो मुखिया के हाथों की जकड़ में फंसा हुआ था और उसकी सारी ड्रेस जगह जगह से फट चुकी थी और खून रिस रहा था ।

मुँह से खून लगातार बह रहा था। लोमड़ी डोगा का ये हाल देख नही पायी।

 

लोमड़ी- हे भगवान! मैं यहाँ इन जंगलियों मे ही उलझी रही तो न जाने डोगा का क्या होगा! मुझे बहुत जल्दी इनसे पीछा छुड़ाना होगा।

 

लोमड़ी को पास ही एक बंदूक दिखती है।

 

लोमड़ी- हे भगवान किस दो राहे पर आकर खड़ी हो गयी हूँ आज अगर हथियार नहीं उठाती हूँ तो सूरज को खो दूंगी और अगर उठाती हूँ तो खुद से किया हुआ वादा तोड़ दूँगी।

 

लोमड़ी अपने अंतर्मन से लड़ रही थी और डोगा अपनी सांसों से।

लोमड़ी की एक एक पल की देरी डोगा के लिए मौत की तरफ पल पल बढ़ते कदम बनती जा रही थी।

 

लोमड़ी- मुझे आज ये करना ही होगा, मुम्बई को डोगा हमेशा से चाहिए था। डोगा मुम्बई की धड़कन है, धड़कन तो सूरज मेरी भी है। मुम्बई में अगर डोगा नहीं तो मुम्बई, मुम्बई नहीं रह पाएगा और न ही मोनिका मोनिका राह पाएगी फिर लोमड़ी का भी अस्तित्व ही क्या रह जायेगा?

 

लोमड़ी पूरी ताकत से जंगलियों से लड़ रही थी और अपने मन मे खुद से।

 

लोमड़ी ने बंदूक तक पहुंचने में पूरी ताकत झोंक दी थी और वो जल्द ही बंदूक तक पहुंचने भी वाली थी।

 

डोगा अब भी जंगली मुखिया की हाथों की मजबूत पकड़ में फंस हुआ था।

 

डोगा- उफ़्फ़ जल्द ही इसकी पकड़ ढ़ीली करनी होगी वरना आज सच मे डोगा खत्म हो जाएगा।

 

डोगा को ऐसे ही डोगा नहीं कहते, अदम्य साहस, अदम्य इच्छाशक्ति और अद्भुत शक्ति थी डोगा में। उसने अपनी सारी ताक़त बटोरकर जंगली के सिर को पकड़ा और सीधा जमीन पर पटक दिया।

 

डोगा ने अधिक समय नष्ट नहीं किया और एक के बाद एक लात और घूँसे से मुखिया को धूल चटा दी।

 

जंगलियों से हुई लड़ाई में पास में ही गिरे उसकी ग्रेनेड बेल्ट से एक ग्रेनेड निकालकर डोगा ने जंगली के मुँह में ग्रेनेड रखकर डोगा ने पिन खींच दी।

 

फिर एक धमाके के साथ मुखिया के सिर के चिथड़े उड़ गए।

 

लोमड़ी अपने ख्यालों में इस कदर खोयी हुई थी कि उसे कुछ भी सुनायी नही दिया।

उसके दिलो दिमाग मे अब भी बस यही ख्याल था कि डोगा को बचाना है।

 

जंगलियों को बेहोश करके जैसे ही उसने बंदूक उठायी डोगा ने उसके हाथ रोक दिए।

 

डोगा- रुक जाओ लोमड़ी। तुम्हे ऐसा नही करना चाहिए।

 

लोमड़ी को जैसे ही डोगा का एहसास हुआ वो अपने आँसू नही रोक पायी और बिना समय गंवाए डोगा के गले लग गयी।

 

यहाँ डोगा एक मुसीबत से बच गया था तो दूसरी जगह मुसीबत दस्तक दे रही थी।

 

3 घण्टे पूर्व दिल्ली-

 

भारत का दिल दिल्ली।

 

जहाँ आमतौर पर सड़कों पर काफी भीड़ देखी जाती थी आज का दिन भी बाकी दिनों जैसा ही था।

 

सड़कें लोगों से भरी हुई थी लेकिन पहले गाड़ियां चला करती थी आज लोग पैदल चल रहे थे।

 

पहले लोग निहत्थे चला करते थे आज लोग हथियारों के साथ चल रहे थे।

 

पहले लोग शांत चला करते थे तो आज लोग नारे लगाते हुए चल रहे थे।

पहले रंग बिरंगे कपड़े पहने लोग घूमते थे आज सफेद कपड़ो में लोग रंग उड़ाते हुए घूम रहे थे।

ये मार्च कोई खुशी का नहीं, ये मार्च किसी की हत्या का नहीं, ये मार्च न ही किसी की शोभा यात्रा का नहीं। ये मार्च था आज़ादी का, इंक़लाब के नारों का ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपनी आजादी का।

 

लेकिन देखते देखते कुछ ही देर में कुछ पुलिस के कपड़ो में हथियार बंद लोग आए और उन्होंने बिना कुछ सोचे समझे लाठियां चला दी।

भीड़ में से चल रहे हथियार बंद लोगो ने बंदूकें निकाल ली और फायर झोंक दिए।

 

जब कुछ ही देर में गोलियों का शोर खत्म हुआ तो वहां केवल पुलिस वालों की लाशों का ही ढेर बचा हुआ था।

 

अब आजादी के नारे जोश में और तेज होने लगे।

 

लेकिन फिर एक आश्चर्यजनक घटना हुई जो पुलिस वाले मर रहे थे वो दोबारा उठने लगे।

 

हर तरफ नारो का शोर चीत्कार में बदल रहा था और हथियार चलाने वाले डर के मारे कांप रहे थे।

 

एक पुलिस भेषधारी जो देखने से उन सभी सैनिको का लीडर लग रहा था, ने अपने सैनिकों को आदेश दिया-

 

“कोई रहम मत करो कोई बच कर जाना नही चाहिए”

“हमला करो”

“इनकी ऐसी गत बना दो की ये दोबारा सिर न उठा पाएं।”

 

अपने अफसर की बात सुनकर सभी पुलिसवाले लाठी लेकर भीड़ को मारने के लिए आगे बढ़े।

 

लेकिन एक ऊर्जा के झटके से सभी गिर पड़ते हैं।

 

ये देख सैनिको का लीडर भड़क उठता है-

“कौन है ये जो सार्जेंट किलर के रास्ते मे आ रहा है”

 

तिरंगा- ये हो क्या रहा है ये भारत प्राचीन काल का भारत कैसे बन रहा है? इन्हें आज़ादी क्यों चाहिए? ये सैनिक और ये अंग्रेज कौन है?

 

सार्जेंट- कौन हो तुम? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुयी मेरे आदमियों पर हमला करने की?

 

तिरंगा- ये सवाल केवल मैं पूछता हूँ और जवाब सबको देना होता है या तो अपनी मर्जी से या फिर मेरी मर्जी से।

 

सार्जेंट- हाहाहा हाहाहा। अब तू नहीं तेरी लाश जवाब देगी मेरे सवाल का। (सैनिकों से) मार दो इस मरदूत को।

 

सैनिको का सारा ध्यान अब तिरंगा पर था। सभी एक साथ तिरंगा पर टूट पड़े।

तिरंगा उन सबसे उलझ तो रहा था लेकिन जल्द ही उसे भी एहसास हो गया था कि आज वो इंसानो से नही बल्कि शैतानों से लड़ बैठा था।

तिरंगा सैनिको को जितने भी घाव दे रहा था वो सब तुरंत भर भी जा रहे थे और उनके हमले भी तेज होते जा रहे थे।

 

तिरंगा- इनसे ऐसा जीतना मुश्किल है। कोई तो रास्ता होगा जो इनसे छुटकारा दिला सके।

 

तिरंगा इनसे बचने के तरीके ही ढूंढ रहा था लेकिन साथ ही उनसे लड़ भी रहा था।

तिरंगा के एक जोरदार मुक्के से एक सैनिक आंदोलनकारियों की भगदड़ में रह गए कुछ रंग के पैकेट्स में से किसी पर गिर गया और वो रंग उसके मुंह मे चला गया। कुछ देर छटपटाहट के बाद वो सैनिक शान्त हो गया।

ये बात तिरंगा ने देख ली थी।

 

तिरंगा- ओह्ह अभी अभी ये क्या हुआ? ये कैसा रंग है जो इसके मुँह में जाते ही इसे सामान्य मुर्दा बना गया? लगता है शायद ये एक तरह की एलर्जी बन रही है जो इनके मुँह में जाते ही इनके शरीर को जो ऐसा अजेय बना रहा है उस पदार्थ का प्रतिरोधक का कार्य कर रहा है। इसीलिए ये पहले की तरह मुर्दा बन जा रहे हैं।

 

तिरंगा अब बिना समय गंवाए रंग के पैकेट्स उठाये उनपर फैंकने लगा और सैनिक सामान्य मुर्दे में भी बदल जाने लगे थे।

लेकिन सार्जेंट ने ये देख लिया और वो भन्नाता हुआ तिरंगा की ओर झपटा।

तिरंगा ने रंग को सार्जेंट पर भी फेंका लेकिन कुछ नही हुआ।

सार्जेंट इससे हंसने लगा।

 

सार्जेंट- हाहाहा। अजीब से रंगीन दिखने वाले लड़के तू क्या सोचता है? मैं भी इनकी तरह हूँ? हाहाहा। ये बस मेरे प्यादे हैं प्यादे।

सार्जेंट दांत भींचता हुआ तिरंगा को एक मुक्का जमकर मारता है और तिरंगा दूर गिर जाता है।

 

तिरंगा- आह। अब ये क्या बला है! इनसे तो जैसे तैसे मैं निपट लेता लेकिन अब ये क्या बला है?

 

तिरंगा जब तक कुछ सोच पाता उससे पहले ही सार्जेंट उस तक पहुंच चुका था।

सार्जेंट ने अपने एक ही हाथ से तिरंगा को हवा में उठा दिया और जोर से सड़क पर पटक दिया।

 

तिरंगा- आह। आज ये क्या दिन आ गया है! कौन सी मुसीबत गले पड गयी है ये! कैसे पीछा छुड़ाऊं इस मनहूस से। है भी तो ये ताक़त का पहाड़।

 

तिरंगा को पैरो से खींचते हुए सार्जेंट ने एक बार फिर हवा में उठा दिया था। अब इस बार तिरंगा अगर जमीन पर पटक जाता तो अवश्य ही तिरंगा के प्राण निकल जाने थे।

लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। एक रस्सी आयी और तिरंगा को लपेटते हुए उसे सार्जेंट से दूर कर गयी।

और हर कोई जानता था कि तिरंगा के अलावा और कौन है जो दिल्ली की मुसीबत के समय काम आता है।

परमाणु।

 

 

एक अज्ञात स्थान-

 

किरीगी और महात्मा कालदूत आकृति के सम्मुख लड़ने के लिए तैयार थे।

किरीगी की खड्ग आज कहर ढाने को बेताब थी तो वहीं कालदूत का कालसर्पी  भी सबको सुखाने को बेताब था। चिरचला सबकुछ भेदने तो तत्पर था।

 

उनके सामने आकृति तलवार हाथ मे लिए खड़ी थी।

 

आकृति- संभालो।

 

आकृति ने इतना कहते ही अपनी तलवार उनकी तरफ चला दी जो विभक्त होकर दो अलग अलग तलवारों के रूप में उनसे आ टकरायी लेकिन दिव्य खडग और चिरचला ने उन्हें बेबस कर दिया।

 

आकृति के मुंह से अकस्मात निकला- “असम्भव”

 

किरिगी ने अपना दिव्य खडग आकृति को मारने के लिए चलाया

और महात्मा कालदूत ने अपना चिरचला उस आकृति की तरफ चला दिया।

 

ठीक उसी समय दूर हो रहे संग्राम से दो रोशनियों के टकराने से एक तीव्र प्रकाश उत्पन्न हुआ जिससे आकृति स्पष्ट नजर आने लगी थी।

आकृति को देखकर कालदूत आश्चर्यचकित हो गए और उन्होंने अपना चिरचला आधे रास्ते से ही वापस बुला लिया।

 

 

……………..क्रमशः

Written By- Devendra Gamthiyal

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8 Comments on “Bhediya Aatank Part 5”

  1. सबसे पहले तो गुर्र गुर्र। इतने युगों के बाद ये पार्ट पढ़ने को मिला। स्टोरी ही भूल गया था मैं। भैंssss।
    खैर। अब स्टोरी फिरसर याद आ गई है। हीहीही। और ये पार्ट मुझे बहुत ही अच्छा लगा बहुत ही ज़बरदस्त। शुरुआत वाले सीन में पूरा इमोशनल कर डाला बुहुहु। लेकिन वो किसकी आवाज़ थी जिसने वुल्फा को रोक दिया। अगले पार्ट में पता चलेगा।।
    उसके बाद डोगा का सीन भी ज़बरदस्त लिखा गया। लोमड़ी को दुविधा में डाल दिया था। बेचारी गन न उठाती तो सूरज को खो देती और अगर उठाती खुद से किया हुआ वादा तोड़ देती।
    पर, उसे गन उठाने की नौबत ही नही आई। अरे अभी अपना डोगा ज़िन्दा है। गन और बम उठाने का ठेका उसी ने ले रखा है। उसके होते हुए लोमड़ी कैसे गन उठा लेती ।
    और एक बात। मुझे डोगा का वो वाला बड़ा गजब लगा जब उसने ग्रेनेड उठाकर मुखिया के मुंह में घुसेड़ दिया। हीहीही। मुझे वो डॉयलॉग याद आ गया, “ मुंह दे विच्च ग्रेनेड घुसेड़ दूंगा, पिन खींच के ”।
    और फिर दिल्ली का सीन भी गजब लगा। कौन हैं वो आंदोलन कारी और वो अंग्रेज रुपी शैतान जो मरकर जीवित हो जा रहे हैं । कैसे लड़ेगा परमाणु उनसे? ये जानने की जल्दी है।
    कालदूत और किरीगी किस रहस्मय आकृति से लड़ रहे हैं?
    चीरचला जब निकलता है तो चीर कर ही वापस आता है। लेकिन कालदूत ने उस आकृति को देखने के बाद चीरचला को वापस क्यों बुला लिया। कौन है वो आकृति?
    इतने सारे सवाल फिर खड़े हो गए।
    जिनका अगले पार्ट में ही मिलेगा, और फिर कई सवाल खड़े हो जायेंगे, हीहीही। मज़ा आया , बहुत मज़ा आया।

    1. Dhnyawad talha ji… Ab part jaldi aaya karenge… Sabhi sawalo ke sath aur naye sawalo ko lekar aayega agla part…
      Bahut bahut dhnyawad itne lambe review ke liye

  2. बहुत बढ़िया देवेंद्र जी।
    शुरुआत में भेड़िया और उसके माता पिता वाला दृश्य सचमुच रोचक और भावुक कर देने वाला है।
    कहानी के आधार पर मुझे ऐसा लग रहा है कि timelines में गड़बड़ हो गयी है।
    और क्या बाकी हीरोज भी आएंगे?
    और सबसे बड़ी बाद भेड़िया आतंक कहाँ फैलाएगा?
    उम्मीद है अगला पार्ट भी जल्द ही आएगा।

  3. Majedar story thi but thodi choti thi, bhediya wala scene bahut Hi sunder likha h, lomdi ki duvidha bhi ache se dikhayi h sath hi Doga ka junun bhi, tiranga k liye sahi opponent chuna h, aur akriti wale suspense ka wait rahega, dhruv ka abhi bhi intezaar h

    1. Dhnyawad abhilash bhai…
      Hero sabse last me entry marta hai…
      Hope uske liye bhi aapko opponent pasand aaye…

  4. Wah
    Bht badhiya .
    Bhediya aur doga wala part bht jabarjast hai
    Ye ab kaun si aakriti hai
    Waiting for next part
    Mahine bhar mat laga dena

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