The Black Demon Part 2

●●●The black Demon●●●

अध्याय दो » ☆ काला महल ☆

{ वर्तमान समय }

आज प्रोफेसर कटघरे में खड़े थे। अदालत में बैठे हुए तमाम लोगों की निगाहें प्रोफेसर पर जमी हुई थीं । जज साहब अपने पूरे शानो शौकत के साथ अपनी ऊंची कुर्सी पर बैठे हुए थे। सामने न्याय की देवी हाथों में तराज़ू लिए और आंख पर पट्टी बांधे खड़ी थी। आज फैसले का दिन था। बाहर मीडिया वालों का तांता लगा हुआ था। प्रोफेसर की तरफ से केस लड़ने वाले वकील का आधे घण्टे से इंतज़ार हो रहा था पर वो अबतक नही आया था। आखिरकार जज ने कार्यवाही शुरू करने का हुक्म दिया। कार्यवाही शुरू हुई। प्रोफेसर से सवाल करने के लिए एक लम्बा चौड़ा नौजवान वकील जिसका नाम ‛उत्कर्ष पाल’ था आगे बढ़ा। कटघरे के पास पहुंचकर उसने प्रोफेसर की तरफ आंख उठाकर देखते हुए पूछा। “ हाँ तो जनाब, जावेद खान साहब। क्या आप हमें बताना चाहेंगे कि आपने वो गुप्त हथियार–जिसको तैयार करने के लिए तो आपने सरकार से पैसे और सुरक्षा ले लिए-लेकिन-वो खतरनाक हथियार जब आपने बना लिया तो किसी आतंकवादी गिरोह से लम्बा सौदा करके आपने उसे उनके हवाले कर दिया…..”
“ ये क्या बकवास कर रहे हैं आप ! ” प्रोफेसर भड़क उठे थे।
“ बकवास नही ये सच्चाई है । ” उत्कर्ष ने प्रोफेसर की आवाज़ से भी ऊंची आवाज में कहा। “सुबूत और गवाह दोनों हैं हमारे पास। ” उत्कर्ष जज की तरफ घूमा । “ माई लॉर्ड, मैं गवाह पेश करने की इजाज़त चाहता हूँ ।”

“इजाज़त है।” जज ने कहा।
“Mr. अरविंद कुमार । सामने कटघरे में आइये।”
प्रोफेसर सन्न रह गए इस नाम को सुनकर। उनका खास दोस्त A.K. । वो कौनसा सुबूत पेश करने वाला है? वो भी अपने दोस्त के खिलाफ!
प्रोफेसर जावेद को एक हट्टा-कट्टा उन्ही की उम्र का शख्स सामने वाले कटघरे की ओर बढ़ता दिखाई दिया। और प्रोफेसर का दिल धाड़-धाड़ करने लगा।
A.K. अब प्रोफेसर जावेद के बिल्कुल सामने कटघरे में खड़ा था। दोनों की नज़रे एक पल को मिली और फिर तुरन्त ही A.K. ने अपनी नज़रें प्रोफेसर पर से हटा ली।
“ हाँ तो मिस्टर अरविंद कुमार। क्या आप हमें बताना चाहेंगे कि आपने प्रोफेसर को कहां और किन लोगों के साथ देखा!” उत्कर्ष अरविंद की तरह मुखातिब होता हुआ बोला।
“ उस शाम मैं अपनी बाइक से शहर के बाहर जंगल वाले हाईवे पे चलता चला जा रहा था ” अरविंद याद करते हुए बोला “ कि तभी मैंने प्रोफेसर जावेद को देखा। वे जंगल के किनारे पर खड़े थे और कुछ ही दूरी पर उनकी कार खड़ी थी। मैंने सोचा लाओ पूछूं कहीं प्रोफेसर जावेद की कार तो नही खराब हो गई है। ये यहाँ क्यों खड़े हैं। लेकिन जैसे ही मैंने अपनी बाइक इनकी तरफ मोड़ी, मैंने देखा कि एक ब्लैक कलर की कार प्रोफेसर की कार के पास आकर रुकी-और-उसमे से चार पांच नकाबपोश उतरे जो देखने से ही सन्दिग्ध लग रहे थे, उनमे से एक के हाथ मे सूटकेस था। मैंने अपनी बाइक फौरन एक किनारे पर रोक दी और छुप कर देखने लगा।” A.K. ने लम्बी सांस खींची और फिर बोलने लगा। “काफी देर तक जावेद और नकाबपोशों के बीच बातचीत होती रही और फिर सूटकेस वाले नकाबपोश ने प्रोफेसर को सूटकेस थमाते हुए कान में कुछ कहा और फिर वे अपनी कार में बैठकर निकल लिए । प्रोफेसर ने भी अपनी कार में सूटकेस रखा और रवाना हो गए।” अरविंद खामोश हो गया। दो तीन पल इसी तरह खामोशी रही कि तभी उत्कर्ष जावेद से बोला। “हाँ तो अब आप कुछ कहना चाहेंगे प्रोफेसर ? या मैं वो फोटोज भी दिखाऊँ।” कहने के साथ ही उत्कर्ष पाल ने एक लिफाफा जज की तरफ बढाया । “ माई लार्ड यही हैं वो फोटोज़ जो अरविंद ने अपनी मोबाइल से खींचे थे। जज ने उस लिफाफे को खोला और फोटोग्राफ्स निकालकर देखने लगे। सारे फोटोज़ देखने के बाद जज ने प्रोफेसर की तरफ नज़रें उठाई। “ इन फोटोज में तो आप साफ साफ नजर आ रहे हैं चार पांच नकाबपोशों के साथ। ” जज साहब रौबीली आवाज़ में बोले।
उत्कर्ष पाल के चेहरे पर इस वक़्त गर्वीली मुस्कान थी।
“ क्या ये सच है?” जज साहब एक बार फिर प्रोफेसर जावेद से बोले। “ क्या ये सच है कि उस शाम आपने किसी आतंकवादी गिरोह से मुलाकात की थी?” प्रोफेसर कुछ बोलने के लिए अपना मुंह खोलना ही चाह रहे थे कि उन्हें बोलने की ज़रूरत ही नही पड़ी । क्योंकि किसी और ने बोल दिया…
“ नही ये झूठ है। वे आतंकवादी नही थे। और इसके जीते जागते सुबूत भी है मेरे पास। ” सबकी नजर फौरन अदालत में एंट्री मारने वाले दरवाज़े की तरफ घूम गई। प्रोफेसर का वकील दिव्यांशु त्रिपाठी चार पांच लोगों के साथ कटघरे की ओर चलता चला आ रहा था।

【 15 माह पहले 】

प्रोफेसर जावेद लंबे लम्बे कदम बढ़ाते हुए भागते चले जा रहे थे । शायद उन्हें इस बात का डर था कि पेड़ों ने इधर उधर हट कर उनके लिए जो रास्ता बनाया है कहीं वो फिरसे उसे बंद न कर दें । अब्दुल बेचारा– उसे तो प्रोफेसर के साथ-साथ चलने के लिए लगभग दौड़ना पड़ रहा था। वो दोनों चलते चले जा रहे थे। रास्ता एकदम सीधा, कहीं कोई मोड़ नही दिख रहा था। अब वो दोनों चलते हुए बहुत दूर आ गए थे परंतु रास्ता खत्म होने का नाम नही ले रहा था। तभी अचानक उन्हें कुछ दूरी पर कोई बहुत विशालकाय काली आकृति दिखी। प्रोफेसर के कदम और तेज़ भागने लगे। अब्दुल हांफता हुआ उनके पीछे दौड़ने लगा। कुछ करीब पहुंचकर जब प्रोफेसर ने विशाल आकृति पर टॉर्च मारा तब उन्हें दिखा एक विशालकाय काला किला। जो अब खण्डहर हो चुका था। “ वाह! लगता है लॉटरी लग गई। ” प्रोफेसर लार चुआते हुए बोले।
“ और मेरी तो वाट लग गई। ” अब्दुल मन ही मन बोलता जा रहा था। जल्द ही वो दोनों उस किले के टूटे फूटे बड़े से द्वार के सामने खड़े थे। अंदर एकदम स्याह अंधेरा था । अब्दुल की तो अंदर झांकने की भी हिम्मत नही हो रही थी। प्रोफेसर ने हौले से अपना बायां कदम द्वार के उस पार किया । कुछ नही हुआ-बस एक हल्की सी हवा उनके पैरों को छूती हुई निकल गई। और फिर तुरन्त ही प्रोफेसर किले के अंदर दाखिल हो गए। अब्दुल उनके पीछे पीछे था। अंदर वो एक लंबे गलियारे में पहुंचे जो अंधेरे से भरा हुआ था । टॉर्च की रौशनी में उस गलियारे में धुवां सा उड़ता हुआ दिख रहा था। प्रोफेसर ने दीवारों पर रौशनी मारी । उनपर अजीबो गरीब कलाकृतयां बनी हुई थीं। आखिरकार प्रोफेसर और अब्दुल गलियारे को पार करते हुए एक विशालकाय हॉल में पहुंचे । जो कि खण्डहर हो चुका था और उसका छत भी आधा गायब था, लेकिन फिर भी उस हॉल में रौशनी नाम की चीज़ नही थी-क्योंकि सूरज तो इस जंगल के लिए निकलता ही नही था। हॉल इतना बड़ा था कि प्रोफेसर को समझ मे ही नही आ रहा था कि वो किस तरफ से खोज बीन शुरू करें । उस हॉल में अजीबो गरीब चीजें मौजूद थीं। जैसे › गोल आकार के बड़े बड़े पत्थर जो हॉल में हर स्थान पर यहां वहां रखे हुए थे। हॉल के बीचोबीच एक बहुत ही बड़ा पत्थर का अजीब सा सिंहासन भी रखा हुआ था और टॉर्च की रौशनी में एकदम साफ दिख रहा था। प्रोफेसर ने ऊपर टॉर्च की रौशनी की तो उन्हें एक भयानक दृश्य देखने को मिला। जो आधी छत अब भी बची हुई थी उस से ढेर सारे आधे अधूरे कंकाल लटक रहे थे । “राक्षसों के ज़माने का फानूस। ” अब्दुल डर के मारे काँपता हुआ बोला।
प्रोफेसर इसी तरह टॉर्च की रौशनी यहां वहां मारते रहे, तभी उन्हें दिखा वो दरवाज़ा जो हॉल के दूसरे छोर पर एकदम कोने पर बना हुआ था। “वहां क्या होगा?” प्रोफेसर फौरन उस दरवाज़े की ओर बढ़ते हुए बोले।
प्रोफेसर और अब्दुल दोनों उस द्वार तक पहुंचे। द्वार भी अजीब डिज़ाइन का था और उसमें पत्थर का एक बड़ा सा कुंडा लटक रहा था। प्रोफेसर ने सावधानी से उस कुंडे को पकड़ कर खींचा। अब्दुल ने अपनी आंखें बंद कर लीं । प्रोफेसर ने थोड़ा और ज़ोर लगाया और दरवाज़ा घरघराहट की आवाज़ के साथ खुलता चला गया। दरवाज़े के पूरा खुलते ही धूल का गुबार तेज़ी के साथ बाहर निकला और दोनों की आंखों में जा घुसा । अब्दुल अपनी आंखें मलने लगा। “ नही आंखें मत मलना वरना और प्रॉब्लम हो जाएगी। ” प्रोफेसर अपनी आंखों को खुला रखने की भरपूर कोशिश करते हुए बोले।
“ क्या करूं ? जलन हो रही है आंख में। ” अब्दुल बोला।
“ और अगर तुमने अपनी आंखों को मल लिया तो जलन और खतरनाक होने लगेगी । ” प्रोफेसर अब्दुल को समझाते हुए बोले। अबतक गुबार का उड़ना कम हो चुका था। प्रोफेसर ने अब्दुल को अंदर चलने का इशारा किया, और दोनों भीतर दाखिल हो गए। वो एक बड़ा कमरा लग रहा था जिसमे टूटे फूटे हुए राक्षसों के अजीब और भयानक हथियार यहाँ वहाँ पड़े हुए थे तथा एक तरफ एक बड़ा पत्थर का सन्दूक जैसा कुछ रखा हुआ था । प्रोफेसर फौरन उस सन्दूक की ओर बढ़े। पास पहुंच कर उन्होंने सन्दूक के चारों तरफ टटोला। उन्हें कुंडी कहीं नही मिली। प्रोफेसर को समझ नही आया क्या किया जाए। तभी प्रोफेसर उस पत्थर के सन्दूक के भारी ढक्कन को सरकाने की कोशिश करने लगे, अब्दुल भी प्रोफेसर की देखा-देखी एक ओर से उस ढक्कन को सरकाने लगा-आखिरकार-ढक्कन पीछे की ओर सरक ही गया। प्रोफेसर की आंखें चमक उठीं । “ इसीलिए तो मैं सोच रहा था इसमें कुंडी क्यों नही लगी हुई है। ”

“ मगर ये तो खाली है ! ” अब्दुल आंखें चौड़ी करके उस सन्दूक में झांक रहा था। “ इसमें तो सिर्फ अंधेरा भरा हुआ है। ”

“क्या कहा !” कहते हुए प्रोफेसर भी आगे की ओर झुके । सन्दूक के अंदर सच मे अंधेरा था, टॉर्च की रौशनी करने पर भी अंधेरा ही दिख रहा था। कुछ पल तक प्रोफेसर सन्दूक में भरे अंधेरे को निहारते रहे-और-तभी-उन्होंने अपना एक पैर सन्दूक के अंदर डाल दिया।

“ ये क्या कर रहे हैं आप ! सन्दूक में आराम करने का इरादा है क्या ! ” अब्दुल ने परेशानी भरी आवाज़ में पूछा।
प्रोफेसर पूरी तरह सन्दूक में उतर चुके और अब सिर्फ आधे नज़र आ रहे थे। “ ये सन्दूक नही, एक खुफिया रास्ता है । ” प्रोफेसर के इतना बोलते ही उनकी आवाज़ सन्दूक में गूंज गई और कहीं दूर से आती हुई प्रतीत हुई। “ देखा ! ” प्रोफेसर एक बार फिर बोले और उनकी आवाज़ एक बार फिर गूंज गई। “ ये कोई सन्दूक नही। बल्कि तहखाने तक ले जाने वाला खुफिया रास्ता है। अभी मैं तहखाना तक जाने वाली पहली सीढ़ी पर खड़ा हूँ। ”

“ क्या सच मे ! ” अब्दुल भी इस बार आश्चर्यचकित होकर बोला।

“ हाँ । राक्षस भी कम दिमागदार नही थे। ” प्रोफेसर राक्षसो की तारीफ करते हुए बोले। “ उन्होंने इस खुफिया रास्ते को सन्दूक का शक्ल इसलिए दिया होगा ताकि कोई ये न समझ पाए कि ये कोई खुफिया रास्ता हो सकता है। ”

“ लेकिन फिर भी वे उल्लू के पट्ठे ही थे। ” अब्दुल बोला।
“ कैसे ? ” प्रोफेसर ने पूछा।
“ क्योंकि उन्होंने इस सन्दूक में कुंडी तो लगाई ही नही थी। ”
“ हा हा हा। चलो आ जाओ अब तुम भी भीतर। ” प्रोफेसर अपनी हंसी रोकते हुए बोले।
अब्दुल भी उस सन्दूक में घुस गया । उसे अहसास हुआ कि वो किसी सीढ़ी पर उतरा था। “ अजीब बात है । सीढ़ी तो नज़र ही नही आ रही है ! ” अब्दुल ने प्रोफेसर के साथ नीचे उतरते हुए कहा।
“ हाँ सही कहा। टॉर्च की रौशनी में भी सीढ़ियां नज़र नही आ रही हैं। यहाँ तक कि जिस सीढ़ी पर हम हैं वो भी नज़र नही आ रही । ” प्रोफेसर अपने पैरों के आस पास टॉर्च की रौशनी नचाने लगे-लेकिन-उन्हें सिर्फ उनका पैर ही दिखा। सीढ़ी नज़र ही नही आई।
“ ऐसा लग रहा है जैसे मैं हवा पर खड़ा हूँ। ” अब्दुल आश्चर्यचकित होकर बोला।
दोनों सावधानी से कदम बढ़ाते हुए सीढ़ियों से उतरने लगे । उनके क़दमों की धीमी आवाज़ भी उस सुनसान खण्डहर में बहुत ही भयानक तरीके से गूंज रही थी। प्रोफेसर ने टॉर्च सामने की ओर कर रखा था। आखिरकार– उन्हें दिखा वो दरवाज़ा जिसके अलावा और कुछ वहाँ था ही नही। प्रोफेसर जल्दी-जल्दी सीढ़ी उतरने लगे, अब्दुल ने भी रफ्तार बढ़ाई। और दोनों द्वार के पास पहुंच कर रुक गए । टॉर्च की रौशनी में दरवाज़ा हल्का सा खुला दिखा। प्रोफेसर ने बड़े ही सावधानी से अपना हाथ बढ़ाया और दरवाजे को धकाने की कोशिश की। एक चरचराहट की आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुलता चला गया । ये एक बहुत ही बड़े और गोल छत वाले हॉल का दरवाजा था । प्रोफेसर और अब्दुल ने अपने कदम बढ़ाए। तभी प्रोफेसर रुक गए और उन्होंने अब्दुल को पीछे की ओर धका दिया। अब्दुल चीखा “ प्रोफेसर ये क्या कर रहे हैं आप! ” प्रोफेसर ने शांत स्वर में जवाब दिया। “ अभी तुम लुढ़कते हुए सीधा नीचे जाते अगर मैंने तुम्हें पीछे की ओर न धकेला होता तो। क्योंकी ये देखो यहाँ पर फर्श नही है बल्कि सीढियां बनी हुई हैं। ” प्रोफेसर ने नीचे रौशनी की । सच मे वहां पर फर्श की जगह नीचे जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई थीं और ये सीढ़ियाँ नज़र भी आ रही थीं। “ o my god ” अब्दुल के मुंह से निकला “ सर अच्छा हुआ आपने मुझे बचा लिया वर्ना मैं तो सीधा नीचे जाता। ये राक्षस सच मे चालू रहे होंगे। दरवाज़े खोलते ही सीढ़ी ! ”
प्रोफेसर अब्दुल की इस बात पे एक बार फिर हंस दिए।

दोनों एक बार फिरसे सीढ़ियाँ उतरने लगे। ये सीढ़ी उन्हें नीचे बने विशालकाय गोल गड्ढे में ले जा रही थी । ऊपर छत भी गोल था और उसी गोलाई में नीचे गड्ढा बनाया गया था । प्रोफेसर और अब्दुल जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ उतर रहे थे। साथ ही प्रोफेसर टॉर्च की रौशनी इधर उधर करके देख रहे थे । उन्हें दिखे वो काले पत्थर के खम्बे जो छत को सहारा दिए हुए थे। पूरे तहखाने में अजीब सी खामोशी और उदासी भरी हुई थी। अचानक प्रोफेसर को टॉर्च की रौशनी में दिखा वो दृश्य। “ अरे ! वो क्या है ! ” प्रोफेसर अचंभित होकर बोले ।
अब्दुल ने उस ओर भरपूर देखने की पूरी कोशिश की और उसे भी नज़र आया नीचे विशालकाय गड्ढे में बना वो तिकोन टीला जो किसी ‘मक़बरे’ की तरह लग रहा था।

« क्रमशः »

आखिरकार प्रोफेसर और अब्दुल पहुंच ही गए एक मकबरे तक।
अब आगे क्या होगा ?
क्या निकलेगा उस मकबरे से ?
प्रोफेसर पर लगा इल्जाम कैसे हटेगा ?
आखिर प्रोफेसर वो कौनसा प्रयोग कर रहे थे जिसको लेकर इतना बखेड़ा खड़ा हुआ है ?

इन सवालों के जवाब मिलेंगे आगे आने वाले पार्ट { काला मकबरा } में ।

अगर आपके मन मे इन सवालों के कोई जवाब आ रहे हैं तो कृपया रिव्यु में बताना न भूलें ।

तब तक के लिए गुड बाई।

धन्यवाद

Written By – Talha Faran for Comic Haveli

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6 Comments on “The Black Demon Part 2”

  1. बहुत बढ़िया तल्हा भाई।
    राक्षसों की काली दुनिया को बहुत अच्छे ढँग से बताया है।
    जावेद और अब्दुल की खोज रहस्यमय है।
    उनकी खोज वर्तमान और भविष्य को कैसे प्रभावित करेगी यह देखना रोचक रहेगा।

  2. वाह तल्हा जी बहुत सुंदर।
    एक एक वस्तु और स्थान का क्या बेहतरीन उल्लेख किया है आपने पढ़कर मजा आ गया।
    प्रोफेसर खान के केस में क्या होने वाला है कोई आईडिया नहीं सस्पेंस बना हुआ है।
    ये पार्ट अपेक्षाकृत छोटा था।
    घटनाएं भी अधिक नहीं घटी हैं तो कहानी अभी तक समझ भी नही आयी।
    क्या ये हॉरर है? क्या ये सस्पेंस थ्रिलर है? या फिर सुपरहीरो? कोई आईडिया नहीं।
    राक्षसों की दुनिया और उनके क्रियाकलाप क्या हैं और क्या रहे होंगे? ये पढ़ने का अलग ही मजा होगा।
    कहानी काफी अच्छी जा रही है आशा करता हूँ आप हमारे मनोरंजन ऐसे ही बढ़िया बढ़िया कहानियों और इस कहानी से चकित करके, करते रहेगें।
    All the best

  3. phli baat tho yeh hy ki ..aapki kahaniyaa behtreen sy bi jayada behtreen hoti hy ….aur aap comics hevli m a level ky writero m sy aaty ho…..tho iss baat ky tho chance hi nhi hoty ki aapki story m gltiyaa nikali ja saky ….aur bina gltiyaa ky mjaa nhi aata…kyunki tarif tho hr koi karta hy par galti koi nhi btaata ……mene kahani ko teen baar ki shaayd koi glti nikl jaaye …par koi glti nhi nikli …at last kqfi vichaar vimarash ky baat yeh baat mind m aayi…ki aap horror story likh rhy hy par story m dr nhi lg raha ….becuse m sb good going joke…jo hsny ko.mjbur karty hy ….kept it up…next part jaldi laayiye..becuse intzaar vali chij hy nhi hmaary pass

    1. Aman aj भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया but आप कुछ ज़्यादा ही तारीफ कर गए। कॉमिक हवेली में A लेवल का लेखक मैं नही बल्कि आप और आकाश भाई हैं।हमारे सम्वर्त भाई और देवेन्द्र भैया भी गज्जब के लेखक हैं । उन्होंने तो एक सुपर हीरो भी हवेली को दे दिया । आप ने भी सुपर हीरो दिया है कॉमिक हवेली को और सम्वर्त भाई ने तो सबसे पहले दिया था।
      और आपने जो दूसरी बात कही की मैं ये हॉरर स्टोरी लिख रहा हूँ । जी नही ये हॉरर स्टोरी नही है बल्कि एक्शन टाइप की स्टोरी है जल्द ही इस स्टोरी में दो हीरोज़ आने वाले हैं। और रहा बात बात पर हंसने का सवाल तो मैंने जानबूझकर अब्दुल को ऐसा रोल दिया है कि लोग उसे बेवकूफ समझें।

  4. Dekhiye mn ko bhut kuchh khne ka h,
    Pr sayad shbdo se tarif mumkin nhi h ,
    Yh ek behd romanchak,thriller story h,

    Isme kayi sare suspense bne huye h,

    अनत: मै यही कहुंगा कि, बेहद शानदार कहानी है

    Aur hme intezar rhega next part ka

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