Earth 61 Part – 2 (इच्छाधारियों का आतंक )

EARTH-61

PART 2.

(इच्छाधारियों का आतंक)

नागराज और बाकी के नागों को अब बाहरी दुनिया में एक हफ्ता हो गया था। सब कुछ सामान्य दिनचर्या के हिसाब से चल रहा था, क्लास ख़त्म होने के बाद भारती नागराज के पास आती है।

भारती- राज! तुमको पता है कि यहाँ पर ज्यूपिटर सर्कस लगने वाला है।

नागराज- वही सर्कस जिसमे वो लड़का स्टंट करता है..क्या नाम था उसका?

भारती- ध्रुव!

नागराज- हाँ! उसी के कारण तो इतना प्रसिद्ध है सर्कस।

भारती- तो क्या..तुम चलोगे मेरे साथ?

नागराज- हाँ, क्यों नहीं! एक बार उन पाँचों से भी बात कर लेने दो।

भारती- ओफ्फो! ज़रूरी है क्या कि हर समय तुम लोग साथ में ही रहो! तुम अपने निर्णय खुद नहीं ले सकते क्या?

नागराज- तो अगर वो भी साथ में चलें तो इसमें बुराई क्या है?

भारती- चलो ठीक है, पूछ लेना। अगर वो मना करते हैं तो तुम ज़रूर आना।

नागराज- ठीक है।

……………………………………..नागराज वापिस मुड़ता है तो विसर्पी खड़ी होती है।

विसर्पी- कैसे हो?

नागराज- मैं तो ठीक हूँ राजकुमारी जी, पर आपका इस तरह मुझसे बात करना ठीक नहीं है।

विसर्पी- तुम क्या विषप्रिय से डरते हो?

नागराज- नहीं, मैं अपने क्रोध से डरता हूँ। मैं नहीं चाहता कि मेरी और विषप्रिय की कोई अनबन हो और हम लोगों की पहचान मानवों के सामने आ जाये, वैसे भी हमारी छवि मानवों में कुछ अच्छी नहीं है।

विसर्पी- पर अपना नाम तो बताओ, पिछली बार मिले थे तो मैं तुम्हारा नाम तक नहीं पूछ पाई।

नागराज- राज! ये नाम मैंने यहाँ के लिए रखा और मेरा असली नाम है ….नागराज।

विसर्पी- तो तुमने नाम बदला?

नागराज- मैंने मतलब? आप लोग अपने ओरिजिनल नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं?

विसर्पी- हाँ! मैंने और विषप्रिय ने तो इस विषय में सोचा तक नहीं!

नागराज- ये खतरनाक हो सकता है, हमें किसी भी हाल में अपनी आइडेंटिटी को ज़ाहिर नहीं करना चाहिए।

विसर्पी- तुम बेकार में ही परेशान हो रहे हो, नाम से आखिर ये थोड़े ही पता लगेगा कि हम सच में कौन हैं। अच्छा अब मैं चलती हूँ, बाय।

……………………………………विसर्पी नागराज से विदा लेकर जाती है, तभी नागराज देखता है कि टीवी के पास लोगों की भीड़ लगी है। वो जाकर देखता है।

न्यूज़- “आज की ताज़ा खबर! देश के जाना माना सर्कस , ज्यूपिटर सर्कस हुआ भीषण आग का शिकार। सर्कस की इस आग में सभी कर्मचारी और जानवर जलकर मर गए, सिवाय एक लड़के के जिसका नाम है ध्रुव। ध्रुव ज्यूपिटर सर्कस का जाना माना चेहरा है, उसके बयान के अनुसार सर्कस में आग लगी नहीं बल्कि लगाई गयी है, उनके दुश्मन ग्लोबल सर्कस द्वारा। कुछ लोग इसको भी इच्छाधारी नागों की करतूत समझते है।”

……………………………………..खबर सुनते ही नागराज परेशान हो जाता है, तभी पंचनाग आते हैं।

नागदेव- तुमने सुना कि क्या हुआ?

नागराज- हाँ! पर मुझको ये समझ में नहीं आ रहा कि आग ज्यूपिटर सर्कस में लगी, लगाने वाले शायद ग्लोबल सर्कस वाले हैं तो फिर इसमें इच्छाधारी नाग बीच में कहाँ से आ गए?

नागार्जुन- यानि की तुमको पूरी बात नहीं पता?

नागराज- नहीं तो!

नागार्जुन- ग्लोबल सर्कस का मालिक राघव एक इच्छाधारी नाग है!

नागराज- क्या! फिर तो ये पता करना होगा कि ये आग दुर्घटनावश लगी है या ग्लोबल सर्कस के लोगों ने लगाई है। आखिर ये हम सब लोगों की छवि का सवाल है।

नागप्रेती- यानि कि हम लोग उधर जाकर पता करें, बस अब यही काम रह गया है।

नागराज- तो इसमें हर्ज़ क्या है? ग्लोबल सर्कस ने भी ज्यूपिटर सर्कस की तरह अपना टेंट शहर के बाहर लगाया है। यहां से ज़्यादा दूर नहीं है। मैं बस वहां जाकर उस राघव को सम्मोहित कर दूंगा, फिर वो सारा सच अपने आप बक देगा।

नागार्जुन- तुम बात तो ठीक कह रहे हो, पर सब लोगों का एक साथ वहां जाना ठीक नहीं होगा।

नागराज- ठीक है, तो नागार्जुन और सिंहनाग , तुम लोग चलो मेरे साथ। बाकि लोग यहीं पर रुको।

…………………………………….दूसरी ओर एक पीली नीली पोशाक में एक किशोर मोटरसाइकिल को तेज़ गति से लेकर ग्लोबल सर्कस के तम्बू की तरफ बढ़ रहा होता है, उसकी आँखों में प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही होती है। ग्लोबल सर्कस के पहरेदार उस मोटरसाइकिल की आवाज़ सुनकर उस किशोर को रोकने का प्रयास करते हैं। लड़का अपनी मोटरसाइकिल से उतरकर उन सबसे भिड़ जाता है और आश्चर्यजनक गति से वार करके उनको बेहोश कर देता है। फिर वो राघव के कमरे की तरफ बढ़ता है, सामने राघव खड़ा होता है।

राघव- तुम अंदर तक कैसे आये? कौन हो तुम?

ध्रुव- मेरा नाम ध्रुव है और आज मैं तेरी वजह से अनाथ हुआ हूँ।

राघव- ध्रुव…ज्यूपिटर सर्कस का ध्रुव!

ध्रुव- हाँ, कमीने!

…………………………….ध्रुव बेहद फुर्ती से राघव पर वार करता है, पर राघव तेज़ी से बच जाता है। वो ध्रुव की गर्दन पकड़ लेता है।

राघव- तूने यहां पर आकर गलती कर दी लड़के!

………………………………..तभी दो सांप आते हैं और राघव पर वार करते हैं। राघव की पकड़ ध्रुव पर ढीली पड़ती है, मौके का फायदा उठाकर ध्रुव ज़ोरदार वार करता है और राघव पीछे हो जाता है। वो मुड़कर देखता है तो नागराज, सिंहनाग और नागार्जुन अपने असली रूप में खड़े होते हैं।

राघव- क..कौन हो तुम लोग?

नागराज- हम महात्मा कालदूत के पुत्र हैं, तूने हम इच्छाधारियों का नाम बहुत ख़राब किया है इसलिए तुझे सजा मिलेगी।

राघव- कैसी सजा?

नागार्जुन- चिंता मत कर! हम तुझे मारेंगे नहीं बल्कि अपाहिज करके छोड़ेंगे।

……………………………….नागार्जुन दो बाण चलाता है और राघव अँधा हो जाता है। ध्रुव के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता। ध्रुव- जान बचाने का शुक्रिया।

नागराज- हम लोग नहीं भी आते तो तुम कोई तरीका खोज ही लेते, हमने आते समय उन पहरेदारों को बेहोश पड़ा देखा था। तुम साधारण होते हुए भी साधारण नहीं हो।

ध्रुव- पर तुम लोग कौन हो?

नागराज- मेरा नाम नागराज है, मेरे साथ ये हैं सिंहनाग और नागार्जुन। हम लोगों को देखकर तो तुम समझ ही गए होंगे कि हम इच्छाधारी नाग हैं।हम यहां पर राघव को सम्मोहित करके सच पता करने आये थे पर जब यहां की स्थिति देखी तो सम्मोहन की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।

ध्रुव- यकीन नहीं होता कि मैं इच्छाधारी नाग से मिल रहा हूँ।

नागराज- तुम्हारे बारे में न्यूज़ में सुना था, ये तुम्हारा मुश्किल वक्त है पर तुमको संयम से काम लेना होगा।

ध्रुव- धन्यवाद, ओह सायरन की आवाज़! लगता है कि पुलिस आ रही है।

नागराज- तो फिर हम लोग भी चलते हैं, एक एहसान करना कि पुलिस को हमारे बारे में कुछ मत बताना।

ध्रुव- तुम लोगों के बारे में बाकि लोग बहुत गलत सोचते हैं।

नागराज- मुझे यकीन है कि ये सोच एक दिन बदल जायेगी, अब हम चलते हैं।

…………………………………फिर नागराज, सिंहनाग और नागार्जुन वापस अपने मानव रूप में आ जाते हैं। अगले दिन टीवी पर न्यूज़ आ रही होती है।

न्यूज़- अनाथ हुए ज्यूपिटर सर्कस के सितारे ध्रुव को पुलिस कमिश्नर राजन मेहरा ने गोद ले लिया है। अब वो उनकी देख रेख में रहेगा। …………………………….न्यूज़ सुनकर नागराज मुस्कुरा देता है।  नागराज जब राज के रूप में क्लास के लिए जाता है तो देखता है कि क्लास में तो कोई भी नहीं है तभी उसको भारती दिखती है।

नागराज- अरे सुनो भारती!

भारती- अरे तुम यहाँ क्या कर रहे हो? तुमको पता नहीं कि आज सारे छात्र रैली निकाल रहे हैं।

नागराज- किस बात की रैली?

भारती- पुलिस का बयान आया है कि ज्यूपिटर सर्कस में आग लगाने का दोषी ग्लोबल सर्कस का मालिक राघव है और वो एक इच्छाधारी सर्प है। तुम पूछ रहा थे ना कि हमको इन लोगों से क्या खतरा है? लो देख लो।

नागराज- यानि कि ये रैली इच्छाधारी नागों के विरुद्ध निकाली जा रहा है!

भारती- हाँ, सभी छात्र इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए इच्छाधारी नागों के खिलाफ रैली निकाल रहे हैं। चलो, जल्दी!

नागराज- नहीं, म..मेरी तबियत कुछ ठीक नही है, तुम जाओ।

भारती- तुम भी कभी कभी बड़ी अजीब हरकतें करते हो!

……………………………………तभी नागराज को मान सिंह(सिंहनाग) आता दिखाई देता है।

नागराज- कहाँ थे तुम? और बाकी के लोग कहाँ पर हैं?

सिंहनाग- इधर उधर होंगे, तभी मैंने कहा था कि हॉस्टल में डबल सीटर ले लो ताकि सब साथ में रहें, लेकिन सबको कॉमिक हवेली ने सर चढ़ा रखा है ,सभी को सिंगल सीटर चाहिए था।

नागराज- अभी ये सब सोचने का वक्त नहीं है। एक काम करते हैं , जल्दी इधर से निकलते हैं। आज का तो दिन ही ख़राब है।

…………………………………….शाम के वक्त नागराज और पंचनाग ग्राउंड में फुटबॉल खेल रहे होते हैं कि तभी भारती उनको बुलाती है। नागराज आता है।

नागराज- क्या हुआ?

भारती- दरअसल, आज मेरा जन्मदिन है। उस वक्त रैली निकल रही थी तो मैं तुमको बता नहीं पायी थी।

नागराज- ओह! हैप्पी बर्थडे।

भारती- थैंक्स! लेकिन तुम सब लोगों को मेरे घर पर आना पड़ेगा!

नागराज- तुम्हारे घर?

भारती- हाँ, तैयार होकर पहुँच जाना।

……………………………….नागराज और पंचनाग तैयार होकर पार्टी में पहुँचते हैं। पार्टी में ज़्यादा लोग नहीं होते। तभी एक आवाज़ गूंजती है”आप सबका स्वागत है” नागराज मुड़कर देखता है कि उनके मेज़बान खुद वेदाचार्य हैं।

वेदाचार्य- आओ! सब लोग पहले खाना खा लो!

नागप्रेती- वाह खाना!

नागराज- जाइये भुक्खड़ महाराज! पेटपूजा कीजिये!

विसर्पी- अरे! तुम यहाँ!

नागराज- तुम! मेरा मतलब आप राजकुमारी जी!

भारती- अरे राज! तुम मेरी दोस्त से मिले? ये है विसर्पी। इसने पढाई में मेरी बहुत मदद की है।

विसर्पी- हम दोनों एक दूसरे को जानते हैं, हम एक ही जगह से हैं।

भारती- ओह! ये तो अच्छी बात है, आप लोग पार्टी एन्जॉय करें, मैं अभी आई।

विसर्पी- तुम मुझे “आप” से संबोधित क्यों करते हो?

नागराज- क्योंकि आप राजघराने से हैं।

विसर्पी- ठीक है! तो फिर मेरा आदेश है कि आज से तुम मुझे “तुम” से ही संबोधित करोगे।

नागराज- ये..चलो जैसी आपकी मेरा मतलब तुम्हारी मर्ज़ी।

विसर्पी- तुमने आज की रैली देखी?

नागराज- मत पूछो! मैं तो क्लास करने गया था, ये भारती मिल गयी और मुझे ज़बरदस्ती रैली में लेकर जाने लगी।

विसर्पी- मुझे तो आश्चर्य होता है कि लोग हमसे इतनी नफरत करते हैं।

नागराज- उनका डरना गलत नहीं है विसर्पी। हमारे पास उनसे ज़्यादा शक्ति है, और कुछ राघव जैसे इच्छाधारी सांप भी होते हैं जिनकी वजह से पूरा समुदाय बदनाम होता है।

विसर्पी- तुम बहुत ही सुलझे हुए व्यक्ति हो, नागराज। तुम कभी नागद्वीप में तो नहीं दिखे?

नागराज- अब आप लोग बड़े महल में रहने वाले लोग, और हम हैं आम प्रजा। आखिर कैसे मिलते?

विसर्पी(प्रेम भरे स्वर में)- मुझे ख़ुशी है कि तुम मुझे यहाँ मिले।

……………………………………नागराज को भी विसर्पी की आँखों में कुछ महसूस होता है। वो सोचता है” ये कितनी सुन्दर है, शायद पूरे नागद्वीप की सबसे सुन्दर लड़की”, पर तभी विषप्रिय एकदम से बीच में आ जाता है।

विषप्रिय- मैंने तुमसे मना किया था ना?

विसर्पी- मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ विषप्रिय, मुझे मत सिखाया करो कि किससे मिलना है और किससे नहीं।

…………………………विषप्रिय चुपचाप नागराज को कनखियों से देखता हुआ चला जाता है।

नागराज- इसकी समस्या क्या है?

विसर्पी- कोई समस्या नहीं है, बस मुझे लड़कों से बात नहीं करने देता।

……………………………तभी नागराज की पीठ पर कोई हाथ रखता है, नागराज पीछे मुड़कर देखता है।

नागराज- वेदाचार्य जी! आप!

वेदाचार्य- मुझे तुमसे दो मिनट अकेले में बात करनी है।

…………………………………..इशारा समझकर विसर्पी चली जाती है। वेदाचार्य- मैं अंधा होने के कारण मानस तरंगों से लोगों की पहचान करता हूँ, और तुममे से मुझे किसी ऐसे व्यक्ति की मानस तरंग का आभास हो रहा है जिसे मैं बरसों से मरा हुआ समझ रहा था।

नागराज- अ..आपको ज़रूर कोई ग़लतफहमी हुई है।

वेदाचार्य- तो ज़रा मुझे बताओ की क्या ये भी मेरी गलतफहमी है कि तुम एक मानव नाग हो?

नागराज(चौंककर)- मैं..नहीं जानता कि आप क्या बोल रहे हैं।

वेदाचार्य- तुम अच्छी तरह जानते हो मैं क्या बोल रहा हूँ। तुम अपने अस्तित्व से पूरी तरह अनजान हो।

……………………….नागराज ये बात सुनकर बुरी तरह से चौंक जाता है और उसी वक्त पार्टी छोड़कर चल देता है। शाम के वक्त घर के बाहर लोग नहीं होते, नागराज और पंचनाग ही सड़क पर जा रहे होते हैं। यह कथा श्रंखला कॉमिक हवेली के लिए लिखी गयी है बिना अनुमति कहीं और पोस्ट करना हवेली के कॉपीराइट  का हनन होगा | 

नागप्रेती- इतनी जल्दी क्या थी! मैं तो सही से खाना भी नहीं खा पाया।

सिंहनाग- तुम काफी परेशान लग रहे हो नागराज!

नागराज- मैंने कभी अपने अस्तित्व के बारे में सोचा ही नहीं।

सिंहनाग- ये तुम क्या कह रहे हो?

नागराज- आज मैं वेदाचार्य से मिला, उनको मुझे देखते ही पता चल गया कि मैं एक मानव नाग हूँ।

नागदेव- क्या? फिर उन्होंने शोर क्यों नहीं मचाया?

नागराज- पता नहीं! पर उनको देखकर लग रहा था कि उनके लिए ये कोई आश्चर्य की बात थी ही नहीं, बल्कि उन्होंने तो मुझको चिंता में डाल दिया।

नागार्जुन- कैसे?

नागराज- उन्होंने कहा कि उनको मेरे अस्तित्व का पूरा पता है।

……………………………………..तभी सामने एकदम से विषप्रिय आ जाता है, वो नागराज के बिना सोचे समझे एक घूँसा जड़ देता है।

विषप्रिय- बहुत बात कर रहा है मेरी बहन से, थोड़ी मुक्का लात मेरे साथ भी कर ले।

नागराज- मुझे तुमसे नहीं लड़ना विषप्रिय, विसर्पी और मेरे बीच ऐसा कुछ नहीं जो तुम समझ रहे हो।

विषप्रिय- अब तू मुझे समझायेगा, तुच्छ नाग!

……………………………..पंचनाग बीच में पड़ने की कोशिश करते हैं पर नागराज रोक देता है।

नागराज- ठीक है विषप्रिय! तुमसे बहस करने का कोई अर्थ नहीं। तुम अगर शारीरिक द्वन्द चाहते हो तो वही होगा।

………………………………….विषप्रिय नागराज पर फिर से मुक्के से वर करता है पर नागराज उसका हाथ पकड़कर उसे हवा में घुमाकर फेंक देता है। विषप्रिय नागराज की शक्ति पर बेहद आश्चर्यचकित रह जाता है। वो फिर से खड़े होकर वार करता है, पर नागराज आश्चर्यजनक फुर्ती का प्रदर्शन देते हुए बचकर फिर से वार कर देता है।

नागराज- मुझसे लड़ने का क्या अर्थ है विषप्रिय, जब परिणाम तुमको पता है।

विषप्रिय- ये..हम्फ..कैसे संभव है, कोई भी इच्छाधारी नाग इतना शक्तिशाली नहीं कि मुझे हरा सके।

नागराज- तो ये जान लो कि मैं इच्छाधारी नाग नहीं बल्कि मानव नाग हूँ और मेरे अंदर असंख्य सर्पों का बल है।

विषप्रिय- तुम शक्तिशाली हो, पर मुझसे तुम्हारी दुश्मनी की शुरुआत तुमने कर दी है, राजपरिवार के लोगों से लड़ने का अंजाम तुमको आगे जाकर पता चलेगा।

…………………………विषप्रिय क्रोध में आकर वहा से निकल जाता है, पीछे पंचनाग और नागराज और ज़्यादा चिंतित हो जाते हैं। उनको ये नही पता होता क़ि किसी की उनपर नज़र है, एक व्यक्ति ये सब अपनी प्रयोगशाला में बैठकर देख रहा होता है। जो की अति उत्साहित होकर कहता है –  पता चल गया! भतीजे का पता चल गया गुरुदेव!”

  • क्या होगा अब विसर्पी और नागराज के प्रेम  का? 
  • क्या विषप्रिय अपने अपमान का बदला ले पायेगा ?
  • गुरुदेव के साथ अब कौन सी योजना बनाएगा नागराज का चाचा ?
  • कैसी लगी आपको यह कहानी ?
  • कहानी में कौन सी लाइन्स आपको सबसे ज्यादा अच्छी लगी ?
  • आपके हिसाब से लेखक को किस किरदार को और अधिक स्पेस देना चाहिए ?
  • कमेंट करके अपने रिव्यु अवश्य दें 

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Written By – Samvart Harshit for Comic Haveli 

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13 Comments on “Earth 61 Part – 2 (इच्छाधारियों का आतंक )”

  1. Bahut maza as gaya padhke.

    Natasha ka character thora different hona chahiy comic ki character se. Different home se story me aur maza aayega eesa mujhe lagta hai..

    Waiting for next part.

  2. वाह
    यह स्टोरी भी दिल को छू गयी और चूंकि मैं नागराज का बहुत बड़ा फेन हूँ इस नाते, मुझे तो बहुत अच्छा लगा भाई संवर्त जी बहुत ही अच्छा लिखते हैं उनके जैसा लिखने के लिए तो अभी मुझे 10 साल जायेंगे हीही। जहां तक कहानी का सवाल है तो मुझे ऐसा कुछ नही दिखा जिसकी शिकायत कर सकूं संवर्त जी ने सभी किरदारों को पूरी जगह है, और हाँ विसर्पी और नागराज के बीच प्यार का बीज पनपना शुरू हो चूका है, हीही, अब मजा आएगी

  3. Bhai ek professional writter hain aap kahani puri aankho k samne chal rhi thi lag rha tha jaise 70mm ke parde pe dekh rha hu sab ise kahte hai actual me dil chasp story waah

  4. What to say
    Maine already first part me hi itna lamba review de diya tha
    Writer k bare me jitne bhi shabd kahe jaye kam hain
    Story k bare me bolna tha kuch
    Parantu pahle hi talha bhai ne sab kuch likh diya
    Bas mujhe yahi samjh me aa raha h k ye story kafi lambi aur interesting hone wali hai
    Visarpi, bharti aur nagraj ka love triangle abhi se start ho chuka h
    Dhruv ka bhi ansh dekhne mila
    Mujhe bas vedacharya aur nagraj ki agli mulakat ka intezaar hai
    Nagpasha to khair chal chalega hi
    College life daal k ek alag hi mod dala gya h story me
    Vishpriy bekar character lag raha mujhe to
    Khair wo side role hi h
    Ha nagu ko main dekhna chahunga bade character k roop me
    Kyun ki wo waise bhi best character hai nagraj ki storylines me
    Waiting for next part.
    Ye kafi udasin sa review hai mera
    But the reason is k main abhi bhi storyline me ghusa hua hu.
    Jab tak main imagination me duba hua hu tab tak shayd next part aa jaye

    1. Bahut dhanyawad pradip ji, aur Raaghav ichchadhari saanp hai vijay ji, ye to panchnaago ne hi clear kar diya tha. Aage aapko baki characters ke role me aur bhi bahut kuch dekhne ko milega, zyada nahi bataunga….spoiler alert!

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