Earth 61 Part – 3 (Prem Ankuran)

EARTH-61

PART 3.

(प्रेम अंकुरण )

दुनिया की नज़रों से दूर गुरुदेव की गुप्त प्रयोगशाला होती है।

नागपाशा- मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि हमने भतीजे को ढूंढ लिया है, आपकी ये मशीन तो कमाल की है जो ना सिर्फ देशभर के क्लोज सर्किट cameras से कनेक्टेड है, बल्कि अलग अलग लोगों द्वारा छोड़े जाने वाले रेडिएशन को डिटेक्ट करके लोगों को पहचानती भी है।

गुरुदेव- पर तूने ये कैसे जाना कि ये लड़का ही तक्षकराज का पुत्र है?

नागपाशा- ये देखिये, इसके साथ जो पांच लोग खड़े हैं वो इच्छाधारी नाग हैं क्योंकि मशीन ने उनके अंदर के विष को डिटेक्ट कर लिया है लेकिन इस लड़के के अंदर के विष को मशीन अनआइडेंटिफाइड बता रही है।

गुरुदेव- और ऐसा विष इस संसार का नहीं हो सकता, यानि इसके अंदर कालजयी का विष है और यही है तक्षकराज का पुत्र! शाबाश नागपाशा!

नागपाशा- लेकिन समय के हिसाब से तो इसे बहुत वृद्ध होना चाहिए था पर इसकी उम्र तो 18-19 के आसपास की लग रही है और ये इन इच्छाधारियों के साथ क्या कर रहा है?

गुरुदेव- बात तो तेरी सही है, हमारे सवालों के जवाब बस ये लड़का ही हमको दे सकता है।

नागपाशा- तो क्या मैं इसको उठा लाऊँ यहाँ?

गुरुदेव- नहीं! उसके साथ ये जो इच्छाधारी सर्प हैं, इनकी शक्ति का हमको कोई ज्ञान नहीं है। मैं एक दूसरा तरीका सोच रहा था।

नागपाशा- वो क्या?

गुरुदेव- आज हमारे लोग हर छोटी बड़ी पोस्ट पर हैं। चाहे वो राजनीति हो, मीडिया हो या दूसरी कोई नौकरी। आजकल इन इच्छाधारियों की छवि दुनिया में वैसे ही बहुत ख़राब है, हमको बस गरम लोहे पर हथौड़ा मारना है।

नागपाशा- क्या मतलब?

गुरुदेव- मतलब कि हम इन इच्छाधारियों की किसी ऐसी हरकत का इंतज़ार करेंगे जिससे इनका पर्दाफाश किया जा सके। जब मानवों को पता चलेगा कि इनके बीच ये लोग गुप्त रूप में रह रहे थे तो वैसे ही इन लोगों का यहाँ रहना मुश्किल हो जायेगा।

नागपाशा- फिर?

गुरुदेव- जब हम इस बालक को ढूंढ रहे थे तो अनायास ही मुझे एक रहस्यमय द्वीप के co-ordinates मिले जहाँ पर नागों का वास है पर मशीन पर सही लोकेशन नहीं पता चल पायी। शायद ये बालक इतने दिनों से वही पर था।

नागपाशा- तो?

गुरुदेव- तो जब लोग इन इच्छाधारियों का यहाँ पर रहना मुश्किल कर देंगे तो ये वापस अपने द्वीप की और भागेंगे..

नागपाशा- और हमको इस बालक के साथ साथ द्वीप का भी पता मिल जाएगा, पर हम द्वीप पर जाकर करेंगे क्या?

गुरुदेव- मुझे पता चला है कि जो त्रिफना मूर्ति हमको चाहिए वो किसी ऐसे ही द्वीप पर है।

नागपाशा- यानि कि एक तीर से दो शिकार, वो लड़का बरसों से कालजयी की सुरक्षा में पड़े ख़ज़ाने को खोलेगा और और हम ख़ज़ाने की तीन मणियों को त्रिफना पर स्थापित करके सभी समयधाराओं पर राज करेंगे। वाह! आपके दिमाग का भी जवाब नहीं गुरुदेव!

………………………………..कल विषप्रिय से लड़ाई के बाद विसर्पी क्लास के बाद नागराज से मिलने आती है।

नागराज- तुम मुझसे मत बात किया करो विसर्पी, बेकार में ही इतना बवाल खड़ा हो रहा है।

विसर्पी- मैं विषप्रिय की तरफ से क्षमा चाहती हूँ, मुझे नहीं पता था कि वो ऐसी हरकत करेगा।

नागराज- पर तुम राजघराने से हो और मैं हूँ एक साधारण मानव नाग जिसे अपने अस्तित्व तक का नहीं पता और जिसे कालदूत ने रहम खाकर गोद ले लिया।

विसर्पी- ऐसा मत बोलो। तुम एक बहुत ही अच्छे लड़के हो नागराज।

नागराज- तुम भी एक बहुत ही अच्छे दिल की लड़की हो, तुम्हारे अंदर राजघराने का अहंकार लेशमात्र भी नहीं है।

………………………………..दोनों एक दुसरे की तरफ देखकर मुस्कुराने लगते हैं कि तभी पंचनाग आ जाते हैं।

नागप्रेती- अरे! तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो? आज तो हम लोगों का टूर जाना है।

नागराज- हाँ, आज टूर है! हमारे साथ टीचर भी जा रहे हैं क्या?

सिंहनाग- दो टीचर जा रहे हैं और खुद वेदाचार्य जी।

…………………………………..नागराज ने अपने मन में सोचा ” चलो अच्छा है, अब उनसे अपने सवालों के जवाब भी ले सकूंगा। ” सारे लड़के बस में बैठ जाते हैं, बस चल देती है। सभी गाना गाते हुए जा रहे होते हैं कि तभी बस एकदम से divider पर असंतुलित हो जाती है और पास के एक पोखरे में जा गिरती है। लोग एकदम से घबरा जाते हैं, इस अफरातफरी में सिर्फ भारती ध्यान जाता है कि नागराज बस में नहीं है। तभी बस को एक हल्का सा पुश मिलता है और वो पोखरे के बाहर आ जाती है, सब बच्चे नाचने गाने लगते हैं। बाकियों को लगता है कि ये ड्राईवर ने किया है लेकिन भारती देखती है कि इस हंगामे में जिस तरह राज(नागराज) गायब हुआ था, उसी प्रकार से प्रकट होकर अपनी सीट पर बैठा होता है। भारती की भौंहें तन जाती हैं।भारती ये कारनामा देखकर सोच में पड़ जाती है, उसको समझ में नहीं आता कि आखिर राज ने ये किया कैसे। बस अपने गंतव्य स्थान यानी कि महानगर के सबसे बड़े म्यूजियम में पहुँचती है, सभी लोग नीचे उतरकर अंदर प्रवेश करते हैं। नागराज देखता है कि वेदाचार्य इस वक्त अकेले हैं, वो मौका देखकर उनके पास पहुँचता है।

नागराज- नमस्कार वेदाचार्य जी!

वेदाचार्य- आओ राज! सामने ये तलवार देख रहे हो?

नागराज- मैं तो देख रहा हूँ, पर आप कैसे….

वेदाचार्य- शायद तुम भूल रहे हो कि मैं तिलिस्म का ज्ञानी हूँ और अपनी आँखों से नहीं, वस्तुओं की मानस तरंगों से उनके बारे में पता करता हूँ जैसे कि मैंने तुम्हारे बारे में पता किया।

नागराज- मैं उसी बारे में आपसे बात करने आया हूँ। वैसे आप तलवार के बारे में कुछ कह रहे थे?

वेदाचार्य- ये तलवार तक्षकनगर के आखिरी राजा तक्षकराज की है। मैं उनका राजज्योतिषी था।

नागराज- क्या! इस हिसाब से तो आपकी उम्र बहुत ही अधिक हुई!

वेदाचार्य- हाँ, लेकिन उम्र का मेरे स्वास्थय पर बहुत अधिक असर नहीं पड़ा और इतने लंबे समय तक जीवित रहने का कारण है कि मैं एक योगी हूँ, कई वर्षों तक जी सकता हूँ।

नागराज- मेरे बारे में आप क्या जानते हैं।

वेदाचार्य- बहुत समय बाद कालजयी के आशीर्वाद से तक्षकराज को पुत्र होने वाला था, लेकिन तक्षकराज के भाई दुष्ट नागपाशा ने ऐसी चाल चली कि कालजयी ने क्रोध में अपना सारा विष रानी ललित पर उड़ेल दिया। कालजयी की उदारता से रानी तो बच गयी लेकिन बालक के शरीर में सारा विष केंद्रित हो गया और बालक को मृत समझकर नदी में डाल दिया गया। मुझे तुममे से उसी बालक की मानस तरंगों का आभास हो रहा है।

नागराज- क्या! यानी कि मैं वो बालक हूँ?

वेदाचार्य- लगता तो यही है, लेकिन मुझे ये नहीं समझ में आ रहा कि तुम्हारी उम्र इतनी कम कैसे है, जबकि तुम्हे तो काफी बूढा होना चाहिये था। तुम इतने समय से कहाँ रहे थे?

नागराज- इच्छाधारियों के बीच..उनके द्वीप पर।

वेदाचार्य- ये द्वीप कहाँ पर है?

नागराज- वो..मैं आपको नहीं बता सकता।

वेदाचार्य- कोई बात नहीं, लेकिन अब तुम बाहरी दुनिया में हो और इस कारण से तुम पर खतरा भी है।

नागराज- मुझ पर कैसा खतरा?

वेदाचार्य- नागपाशा भी अमृत के कारण अभी तक जीवित है, उसने अपने भाई यानी तुम्हारे पिता तक्षकराज और माता रानी ललिता की हत्या कर दी थी और मेरे अनुमान से वो तुमको ढूंढ रहा होगा।

नागराज- मेरे..मेरे माता पिता की हत्या की? नागपाशा ने? मैं उसको जीवित नहीं छोड़ूंगा!

वेदाचार्य- तैश में मत आओ राज! नागपाशा अमर है और शक्तिशाली भी, उसे अगर पता चल गया कि तुम जीवित हो तो वो तुम्हारे द्वारा ख़ज़ाने को पाने की कोशिश करेगा।

नागराज- कैसा खज़ाना?

वेदाचार्य- तुम्हारा पुश्तैनी खज़ाना, जिसकी रक्षा कई सदियों से देव कालजयी कर रहे हैं और जो तुम्हारे स्पर्श से ही खुलेगा। उसमे तीन मणियाँ हैं जो उसे बेहद शक्तिशाली बना सकती हैं। फिलहाल तुम इंसानों के बीच छिपकर रहो जैसे अभी तक रह रहे हो, अपनी शिक्षा पूरी करो उसके बाद सोचा जायेगा कि उससे कैसे निपटें।

नागराज- धन्यवाद् वेदाचार्य जी।

…………………………………….नागराज और वेदाचार्य की ये वार्तालाप भारती छिपकर सुन लेती है और उसके पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है, वो वहाँ से निकलने के लिए पीछे मुड़ती है पर नागराज सामने खड़ा होता है।

नागराज- तो तुमने सब सुन लिया?

भारती- ह..हाँ , तुम मुझे कुछ करोगे तो नहीं?

नागराज- हा..हा..पागल हो क्या भारती? मैं तो तुमको खुद ही सच्चाई बताने वाला था।

भारती- व..वो क्यों? नागराज- मेरे यहाँ पर बहुत दोस्त नहीं हैं भारती और तुम वेदाचार्य जी की पोती हो तो इस राज़ को राज़ रखने के लिए मैं तुम पर भरोसा कर सकता हूँ। मैं जानता हूँ कि तुम इच्छाधारी नागों को इतना पसंद नहीं करतीं पर मैं ये उम्मीद करूंगा कि हम लोगों के बारे में तुम्हारी धारणा बदल जाये, पूरी दुनिया की धारणा बदल जाये।

भारती- मैंने जितना वक्त तुम्हारे और उन पाँचों के साथ बिताया, कभी ऐसा नहीं लगा कि तुमसे अच्छा कोई इंसान भी हो सकता है। चिंता मत करो, ये राज़ मैं किसी को नहीं बताने वाली पर अभी जो भी हुआ वो बहुत शॉकिंग था मेरे लिए, मुझे सँभलने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए।

नागराज- यही बात तुम मेरे बारे में भी कह सकती हो। खैर, मेरी बात समझने का शुक्रिया।

…………………………………नागराज ये बोलकर चला जाता है और भारती उसे जाता हुआ देख रही होती है। देखते ही देखते तीन साल निकल जाते हैं, तीन सालों तक दिनचर्या सामान्य रहती है। फिर कॉलेज का आखिरी साल शुरू होता है।

नागप्रेती- समय पंख लगाकर उड़ता है, इतना समय निकल गया, पता ही नहीं चला।

सिंहनाग- चलो अच्छा है, नागद्वीप वापस लौटने का समय भी आ रहा है।

………………………………तभी टीवी पर न्यूज़ आती है कि कुछ अपहरणकर्ताओं ने महानगर के एक प्राइवेट बैंक में घुसकर लोगों को बंधक बना लिया है।

नागराज- ओह! ये क्या हुआ?

नागदेव- कुछ भी हो! अपने को क्या?

नागराज- कैसी बात कर रहे हो? लोग भारी मुसीबत हैं और …एक मिनट आज भारती बैंक गयी थी ना?

नागार्जुन- हाँ, वो किसी काम से बैंक गयी थी लेकिन वो तो काफी देर पहले की बात है।

नागराज- मुझे जाकर देखना होगा।

सिंहनाग- सोचना भी मत! हम लोगों ने तीन साल आराम से निकले हैं, ये साल भी निकल जाने दो। लुटेरों को पुलिस संभाल लेगी।

नागराज- उफ़..समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाये।

…………………………………..तभी सामने से विसर्पी आ रही होती है, उसकी आँखों में आंसू होते हैं।

नागराज- क्या हुआ विसर्पी?

विसर्पी- नागराज, वो भारती..वो लुटेरों की कैद में है। मुझे बहुत घबराहट हो रही है।

……………………………….वो एकदम से नागराज से लिपटकर रोने लगती है, नागराज हकबका जाता है। पंचनाग एक दुसरे का मुंह देखने लगते हैं।

नागराज(विसर्पी को अपने से अलग करते हुए)- वि..विसर्पी तुम चिंता मत करो। पुलिस कुछ न कुछ ज़रूर करेगी।

विसर्पी- भारती तुम्हारी भी तो दोस्त है, तुमको चिंता नहीं हो रही?

नागराज- मुझे बहुत चिंता है, पर क्या किया जा सकता है?

विसर्पी- कमाल की बात है ना, कि हम लोग इच्छाधारी नाग हैं और इतनी शक्ति है हमारे पास। फिर भी हम कुछ निर्दोषों की मदद नहीं कर सकते।

…………………………..ये बात सुनकर नागराज के अंदर एक अजीब सी ऊर्जा आ जाती है। वो तुरंत अपने कमरे में जाकर राज वाला रूप बदलता है और खिड़की से पहली बार नागरस्सी पर लहराता हुआ नागराज निकलता है। जो भी लोग ये दृश्य देखते हैं, वो एकदम हक्के बक्के रह जाते हैं , नागराज तुरंत बैंक के पास पहुँचता है। दो लुटेरे बाहर ही खड़े होते हैं जिनको वो हल्की सी विषफुंकार से बेहोश कर देता है। फिर इच्छाधारी कणों में बदलकर अंदर जाता है जहां पर तीन लुटेरे और हाथों में गन लिए तैनात होते हैं। वो वापिस अपने रूप में आकर साँपों का प्रयोग करके उनकी गन छीन लेता है। लुटेरे एकदम हक्के बक्के रह जाते हैं, फिर उनको हल्की विषफुंकार से बेहोश कर देता है। जितने लोग बंदी होते हैं, वो भी इस दृश्य को देखकर हैरान होते हैं।

नागराज- घबराने की ज़रुरत नहीं है, आप सब लोग अब सुरक्षित हैं।

……………….भारती भी उन लोगों में शामिल होती है, वो राज के रूप में ना होते हुए भी नागराज को पहचान लेती है। लोग नागराज के लिए अपना आभार प्रकट करते हैं। पहली बार नागराज को एहसास होता है कि वो सिर्फ एक मानव नाग नहीं है, वो उससे कहीं ज़्यादा है, वो एक हीरो है। ये सारा दृश्य कहीं और भी देखा जा रहा होता है, गुरुदेव की प्रयोगशाला में।

नागपाशा- आखिरकार अपने असली रूप में सामने आ ही गया, जी तो करता है कि अभी जाकर गाला घोंट दूं संपोले का!

गुरुदेव- उसका वक्त भी आएगा, पर फिलहाल हमको उस द्वीप का पता चाहिए ताकि त्रिफना मूर्ति को हासिल किया जा सके।

नागपाशा- तो उसके लिए इतना इंतज़ार करने की क्या ज़रुरत है गुरुदेव, मैं अभी उठा लाता हूँ इसे।

गुरुदेव- पहले तो हमें इसे हीरो बनने से रोकना है, मीडिया इसके बारे में ही न्यूज़ दिखा रहा है।मैं कुछ करता हूँ।

……………………………कुछ समय बाद एक न्यूज़ चैनल पर नागराज की खबर आई।

रिपोर्टर- तो आख़िरकार एक बार फिर इच्छाधारियों का अस्तित्व दुनिया के सामने आ गया। इस बार अपनी छवि सुधारने के लिए उन्होंने लुटेरों को पकड़ा। ये दिखाना चाहते हैं कि जो काम पुलिस और प्रशासन नहीं कर पाये वो हम करके दिखाएंगे। इस बारे में जाने माने नेता पहलेजा जी कुछ कहना चाहेंगे।

पहलेजा- देखिये! ये इच्छाधारी नाग अब सिस्टम के काम में दखल दे रहे हैं। यही काम पुलिस डिपार्टमेंट भी कर सकता था लेकिन इन लोगों को तो हीरो बनना है।

रिपोर्टर- पर इस बार इच्छाधारी नागों के दखल की कुछ ख़ास वजह हो सकती है क्या?

पहलेजा- हो सकती नहीं, वजह है।

रिपोर्टर- क्या वजह है?

पहलेजा- वो जो पांच लुटेरे थे, उनमे से दो इच्छाधारी नाग थे। अपने ही भाई बंधुओं के पाप ढकने के लिए ये सारा तमाशा किया गया। आप खुद ही सोचिये, लोगों को बचाने के बाद वो लड़का मीडिया के सामने क्यों नहीं आया, क्योंकि इन लोगों का निजी स्वार्थ इसमें जुड़ा हुआ था।

……………………………………….ये न्यूज़ सुनकर नागराज समेत सभी लोग चौंक जाते हैं।

नागप्रेती- इन लोगों की तो मदद करना ही बेकार है!

नागार्जुन- क्या दो लुटेरे वाकई में इच्छाधारी नाग थे?

नागराज- मैंने..इतना ध्यान नहीं दिया!

…………………तभी विसर्पी वहाँ पर आती है।

विसर्पी- तुमसे दो मिनट अकेले में बात करनी है नागराज।

नागराज- अ..ठीक है चलो!

विसर्पी- तुमने वाकई में मेरे कहने पर चले गए, एक बार भी अपने बारे में नहीं सोचा।

नागराज- मैं ये उम्मीद लेकर नहीं गया था कि लोग मुझे फूलों का हार पहनाएंगे। इतना तो दिमाग में था कि ये भी हो सकता है। वैसे भी भारती भी वहां थी, तो जाना तो ज़रूरी था ही।और..तुम भी तो बहुत चिंतित थीं, ये मुझसे नहीं देखा जा रहा था।

विसर्पी- जो दिल में है वो बोल दो नागराज! आखिर क्यों अंदर रखा हुआ है?

नागराज- तुमको पता है कि मेरे दिल में क्या है विसर्पी!

………………………………विसर्पी शरमाकर वहाँ से चली जाती है। शाम के वक्त वो भारती के घर जाती है।

विसर्पी- तो आज तो बच गयी तुम!

भारती- हाँ! नागराज की वजह से!

विसर्पी- तुमको पता है कि आज क्या हुआ? आज मेरी ज़िन्दगी का सबसे अच्छा दिन है!

भारती- अरे! ऐसा क्या हुआ?

विसर्पी- आज नागराज और मैंने आपस में अपने प्रेम का इज़हार किया।

……………………भारती कांच का फूलदान साफ़ कर रही होती है जो उसके हाथ से एकदम से छूट जाता है।

विसर्पी- अरे क्या हुआ?

भारती- क..कुछ नहीं, तुमने खबर ही इतनी अच्छी दी क़ि एकदम से झटका लगा।

विसर्पी- ओह! समय बहुत हो गया अब चलती हूँ।

भारती- हाँ, वाकई बहुत समय हो गया।

………………………..विसर्पी चली जाती है, पीछे आंसुओं में डूबी हुई भारती को छोड़कर।

To be continued…

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Written By – Samvart Harshit for Comic Haveli 

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9 Comments on “Earth 61 Part – 3 (Prem Ankuran)”

  1. Bhai zabardast movie ki tarah sara scene aankho k samne chal rha tha ek ache writter ki yahi quality hoti hai ki wo sab kch imagine kara de….ab mujhse next part ka intezar nhi ho rha hai

  2. सबसे पहले संवर्त हर्षित जी को मेरा सलाम हीहीही।

    ● और अब आता हूँ इस स्टोरी पर ।
    ● मुझे यह वाला पार्ट इतना अच्छा लगा इतना अच्छा लगा की मैं बयां नही कर सकता पहली बार अपने fevorite हीरो की इतनी अच्छी सिरीज़ पढ़ने को मिल रही है, दिल गार्डेन गार्डेन हो गिया हीही।
    ● नागराज विसर्पी के बीच प्रेम का सिलसिला शुरू हो चुकी है, पर बेचारी भारती भी नागराज के प्यार में गिरफ्तार हो गयी है ।
    ● लेकिन इस पार्ट में सुपर कमांडो ध्रुव देखने को नही मिला, आशा है नेक्स्ट पार्ट में ज़रूर सामना होगा हम पाठकों का काढ़ा पुरूष से हीहीही।

  3. kahani me kaafi achha twist aa raha hai aur ek alag hi drishtikon se Nagraj ka udgam dekhne ko mil raha hai dekhte hain aage kahan kis mod par jati hai kahani

  4. Ye story mujhe bahut pasand aayi
    Part dar part story achhi hoti ja rahi hai
    But visarpi se to nagraj ne kuch specific nahi kaha na hi usne nagraj se
    Fir kyun bharati ko aise bol gayi?
    Ek aur baat, nagraj ko apni sari shaktiya pahle se hi pata h jaise ichchhadhari kano me badal jana?
    I hope writer next part me clarify karenge
    Nagpasha kya chal chalega pta nahi
    Aakhiri saal guzar jane k bad nagraj aur uske sathi kya karenge
    Kya wo nagdweep wapas laut jayenge
    Ya mahanagar ko nagraj k roop me rakshak mil jayega
    Kafi sawal man me umad rahe hain
    Waiting for the next part

    1. Reviews ke liye aap sabhi ka bahut dhanyawad….aur pradip ji aapke prashn ka uttar ye hai ki nagraj ko bachpan se mahatma kaldoot ne train kiya jis karan vo apni shaktiyon ke bare me pehle se hi avgat hai. Aage ke parts me aapki expectations se zyada hi hoga….keep reading.

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