Earth 61 Phase 2 Part 13

त्रयोदश अध्याय- पतन

तीन वर्ष पहले-

इंस्पेक्टर विनय रात की गश्त लगाकर अपनी जीप से वापिस आ रहा था। सर्दी का मौसम होने की वजह से रास्ते पर भीड़ कम थी, रात के नौ बज रहे थे लेकिन रास्ते पर बहुत शांति थी। विनय ने जीप काली मां के बड़े से मंदिर के ठीक सामने रोक दी, वह जीप में ही जूते उतारकर नंगे पांव मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। विनय नियम से रविवार के दिन काली मां के मंदिर ज़रूर जाता था, उसके मामा प्रोफेसर कमलकांत पूजा अर्चना में विश्वास रखने वाले व्यक्ति नहीं थे लेकिन विनय को उस मंदिर में जाकर अजीब सा सुकून मिलता था। विनय सीढियां चढ़ते हुए ऊपर आ ही रहा था कि मंदिर के पुजारी बाबा की चीख सुनाई दी।
“अरे कोई है? मदद करो!”
विनय अब तक आराम-आराम से सीढियां चढ़ रहा था लेकिन वह आवाज़ आते ही उसने हिरण की तरह कुलांचे भरना शुरू कर दिया और शीघ्र ही उसने देखा कि काली मां की मूर्ति के सामने पुजारी बाबा किसी घायल लड़की को गोद में लिए बैठे थे। विनय पुजारी बाबा के पास पहुंचा और पूछा-
“इसे क्या हुआ है?”
पुजारी बाबा के चेहरे पर भी घबराहट के भाव थे। वे बोले-
“मैं आम दिनों की तरह आज भी पूजा में मग्न था कि तभी मैंने देखा कि एक जीप मंदिर के पास रुकी और इसे बाहर फेंककर चली गयी, शायद उन्हें लगा होगा कि ये मर गयी है लेकिन इस लड़की में इतनी शक्ति थी कि ये खुद उठकर लड़खड़ाती हुई सी सीढ़ियों पर चढ़ने लगी लेकिन आधे रास्ते में ही इस पर बेहोशी छाने लगी और ये गिर पड़ी। मैं इसे ऊपर तक ले आया।”
विनय ने ध्यान दिया कि लड़की के पेट से रक्त का रिसना रुक नहीं रहा था। वो बोला-
“इसे अस्पताल पहुंचाना होगा।”
इतना कहकर विनय ने उस लड़की को अपनी मजबूत बांहों में उठा लिया। पुजारी बाबा घबराकर बोले-
“ल..लेकिन पुलिस को भी तो खबर करनी होगी।”
विनय मुड़कर बोला- “मैं खुद पुलिस हूँ!”
फिर उस लड़की को लेकर विनय सीढ़ियों से उतरा। उसके बेहोश शरीर को जीप के पीछे वाले हिस्से में रखा और तेज़ी से जीप अस्पताल की तरफ दौड़ा दी। विनय को पंद्रह मिनट लगे थे निकटवर्ती अस्पताल पहुंचने में और वहां से लड़की को स्ट्रेचर वार्ड में ले जाकर इमरजेंसी वार्ड में शिफ्ट करने में भी ज़्यादा समय नहीं लगा, कुछ वर्दी का रुआब भी था और हॉस्पिटल में काम करने वाला डॉक्टर तरुण विनय का दोस्त था। फिर वह वहीं एक कुर्सी पर बैठ गया, घड़ी का कांटा दस बजा दिया और डॉक्टर तरुण विनय के पास जा पहुंचा। डॉक्टर तरुण को देखते ही विनय झट से उठ खड़ा हुआ और बोला-
“क्या हुआ तरुण कैसी है वो लड़की?”
तरुण विनय के कंधे पर हाथ रखकर बोला-
“चिंता की कोई बात नहीं है, वह लड़की अब खतरे से बाहर है, हालांकि ये किसी चमत्कार से कम नहीं है लेकिन…”
विनय में आगे बढ़कर पूछा- “लेकिन क्या तरुण?”
तरुण गहरी सांस लेकर बोला-
“लेकिन इसकी अभी-अभी एक बड़े आपरेशन के बाद डिलीवरी हुई थी। यह मुझे इसके पेट पर लगे टांकों से पता चला। जिन्हें किसी ने बेरहमी से घूंसा मारकर खोल दिया। टांके खुलने से भीषण रक्तस्त्राव होने लगा जिससे इस लड़की को काफी ब्लड लॉस हुआ इसलिए कायदे से तो इसे यहां लाने से पहले ही दम तोड़ देना चाहिए था लेकिन इसका बचना एक चमत्कार से कम नहीं है।”
इतना सुनते ही विनय के चेहरे पर क्रोध के भाव आ गए। वह बोला-
“ऐसा कौन दरिंदा हो सकता है जिसने इस लड़की के साथ ऐसा किया हो? मुझे मिल जाये तो मैं…”
विनय की बात पूरी होने से पहले तरुण बोल पड़ा- “मैंने तुमको कितनी बार समझाया है कि गुस्से को काबू में रखा करो। माना कि बचपन में घटी कुछ घटनाओं के कारण तुम्हारा गुस्सा कभी-कभी ज्वालामुखी की तरह फटकर बाहर आता है लेकिन अगर इसपर नियंत्रण नहीं रखोगे तो तुम्हारा ही नुकसान है क्योंकि तुम जिस प्रोफेशन में हो उसमें क्या पता कि गुस्से के कारण तुम किसी की जान ले लो, तुम कानून का रखवाला होने के नाते ये रिस्क अफोर्ड नहीं कर सकते।”
विनय को बात समझ में आई और वह कुछ शांत होकर वार्ड के अंदर उस लड़की का बयान लेने चला गया, उसने अंदर जाकर देखा कि वह लड़की एकदम शांत बैठी थी, उसकी आंखें पथराई हुई थीं जैसे उसे अपने जिंदा होने का यकीन ना हो। विनय ने जब उसकी ये हालत देखी तो शांत हुआ गुस्सा फिर से उबलने लगा। वह एक कुर्सी खींचकर उस लड़की के पास बैठ गया और शांत भाव से बोला-
“मेरा नाम इंस्पेक्टर विनय है, आपका नाम क्या है?”
वह सहमी सी लड़की विनय की तरफ देखकर बोली- “चंदा।”
विनय ने आगे पूछना शुरू किया।
“देखो मैं समझ सकता हूँ कि तुम घबराई हुई हो चंदा, क्या तुम बता सकती हो कि तुम उस मंदिर तक कैसे पहुंची?”
चंदा जो अभी तक सहमी हुई थी, उसकी आँखों से आंसू बह निकले और वह फफक फफक कर रोने लगी।

विनय- देखो चंदा, तुम्हें अगर संभलने का समय चाहिए तो मैं समझ सकता हूँ।
चंदा (रोते हुए)- मुझे समय नहीं चाहिए, मैं उन लोगों को जल्द से जल्द फांसी के तख्ते पर लटकता हुआ देखना चाहती हूं।
विनय- तो मुझे शुरू से बताओ कि क्या हुआ तुम्हारे साथ?
चंदा- बचपन से लेकर आज तक कभी मेरे पिता ने मेरी मर्ज़ी नहीं पूछी, कॉलेज अकेले नहीं जाने दिया, लड़कों से बात तक नहीं करने दी और शादी भी अपनी बिरादरी में करवाने के चक्कर में एक ऐसे अमीर बाप की बिगड़ैल औलाद से करवा दी, जिसके लिए नारी भोग की वस्तु से ज़्यादा और कुछ नहीं थी, दिनेश नाम था उस हैवान का। हमेशा घर रात तक दारू पीकर आता था और कुछ पूछने पर मारने लगता था। पिता की बिजनेस था इसलिए कमाई की भी दिक्कत नहीं थी, बाद में वह कुछ बुरे लोगों की संगत में भी लग गया था और ड्रग्स का गैरकानूनी धंधा करने लगा था। वह फोन पर लगा रहता था जिससे मुझे उसके इस गुप्त धंधे की जानकारी थी लेकिन मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी, कभी इतनी हिम्मत ही नहीं हुई कि किसी का विरोध कर सकूं, ना पिता का कभी विरोध कर पाई ना पति का। आज मेरी बच्ची की डिलीवरी हुई थी लेकिन दिनेश ने डॉक्टर के साथ मिलकर मेरी बच्ची को मारने का षड्यंत्र रचा। मुझे भी ऑपेरशन से पहले बेहोशी की दवाई दे दी थी लेकिन उस समय मुझे होश आ गया जब मैंने देखा कि मेरी नवजात बच्ची के शरीर में डॉक्टर एक दवा इंजेक्शन के रूप में पेवस्त कर रहा है। मैं दौड़कर अपनी बच्ची की तरफ भागी लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, मेरी बच्ची की सांसें थम चुकी थी और वो हैवान दिनेश मुझे चेतावनी दे रहा था कि मैं किसी को इस बारे में न बताऊं। उसे औलाद के रूप में सिर्फ लड़का चाहिए था इसलिए मेरी बच्ची को मार दिया था उसने। आज तक मैं दिनेश की हर बात मानकर चुप रह गयी थी, उसकी पिटाई खाकर चुप रही, उसके धंधे के बारे में सब कुछ पता चलने के बाद भी चुप रही लेकिन अब दरिंदगी की इंतिहा हो गयी थी। मैंने आव देखा न ताव और सीधा दिनेश पर छलांग लगा दी, लेकिन उसने मेरे पेट पर एक ऐसा जोरदार घूंसा मारा कि मेरे ताजे टांके खुल गए, ऐसा होने पर डॉक्टर ने उसे तुरंत गाड़ी से मुझे दूर छोड़ आने की सलाह दी क्योंकि उसके अनुसार मैं ज़्यादा देर की मेहमान नहीं थी। दिनेश ने भी हड़बड़ी की और मुझे गाड़ी में डालकर मंदिर के पास छोड़ आया, तब तक मैं भी मरणासन्न हो चुकी थी इसलिए उसे भी लगा होगा कि अब मेरा बचना नामुमकिन है। मैं मंदिर के ठीक सामने पड़ी अपनी मौत का इंतज़ार कर रही थी लेकिन न जाने मुझमें कैसी ऊर्जा आ गयी कि मैं खड़े होकर मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगी लेकिन ऊपर तक पहुंचे बगैर ही मुझ पर बेहोशी छाने लगी थी, फिर क्या हुआ मुझे नहीं पता।”

विनय चंदा की कहानी सुनकर दहल गया था, आज उसे यकीन नहीं हो रहा था कि समाज में ऐसे दरिंदे भी हो सकते हैं। उसने बड़ी मुश्किल से चंदा से कहा-
“उसके बाद पुजारी बाबा तुम्हें मंदिर के ऊपर तक ले गए जहां से मैं तुमको यहां ले आया। क्या तुम मुझे बता सकती हो कि ये दिनेश मुझे कहाँ मिलेगा?”

चंदा- दिनेश मेरी डिलीवरी के बाद ड्रग्स का धंधा देखने के लिए पीतमपुरा में स्थित अपने गोदाम पर जाने वाला था, मैं आपको पता बता सकती हूँ कि वो इस समय कहाँ होगा।

चंदा से पता लेकर विनय वार्ड से बाहर निकल आया, बाहर खड़े तरुण से बोला-
“मैंने पूछताछ कर ली है, अभी मैं इसके पति को दबोचने जा रहा हूँ, तुम इसका ध्यान रखना।”

तरुण जानता था कि विनय को रोकने का अब कोई फायदा नहीं है। हॉस्पिटल के बाहर पहुंचकर विनय ने इधर उधर देखा, किसी को आसपास ना पाकर उसने अपनी पुलिस वाली वर्दी त्यागी, अब इंस्पेक्टर विनय अपनी जीप वहीं छोड़कर परमाणु बनकर आकाश में उड़ चला था।

दिनेश बहुत ही घबराया हुआ था, गोदाम में घुसा तो उसके चेलों ने उसे हमेशा की तरह सलाम किया लेकिन दिनेश ने जवाब नहीं दिया, उसके मन में बहुत सी चिंताएं चल रहीं थीं। वह मन ही मन सोच रहा था।
“मैं चंदा को मंदिर के पास जल्दबाजी में छोड़ तो आया लेकिन अब तक वह मर गयी होगी? अगर वह बच गयी तो मेरा काम तमाम हो जाएगा।”
इन्हीं सब परेशानियों के बीच में दिनेश के पास उसका एक आदमी कुछ बात करने आया।
“भाऊ, कल सागर दादा को माल की डिलीवरी करनी है, कौन जाएगा?”
दिनेश के कान में जैसे आवाज़ ही नहीं पड़ी, तो वह फिर से बोला- “अरे सागर दादा के यहां….”
“ऐ चुप!”
दिनेश उसका कॉलर पकड़कर बोला- “एक तो माथा वैसे ही गरम है ऊपर से तुम लोग की चिक-चिक खत्म नहीं होती!”
एक आवाज गूंजी- “बीवी का गुस्सा इन लोगों पर क्यों निकाल रहे हो दिनेश?”
सबने घबराकर देखा कि परमाणु ट्रांसमिट होकर गोदाम के अंदर आ गया था, उन लोगों ने एक पल भी नहीं लगाया परमाणु को अपनी-अपनी बंदूकों का निशाना बनाने के लिए परमाणु के लिये ट्रांसमिट होकर बचना बहुत मामूली बात थी। फिर परमाणु ने बिना कोई मौका दिए अपनी परमाणु रस्सी एक्टिवेट की और सबको बांध दिया, फिर बस एक-एक लात में ही गुंडों के होश गुम हो गए। सभी गुंडों को बेहोश करके परमाणु दिनेश की तरफ मुड़ा।

परमाणु- तेरे जैसा दरिंदा कभी पैदा नहीं हुआ होगा दिनेश जिसने अपनी छोटी-सी बच्ची की जान ले ली।
दिनेश- यानी कि चंदा बच गयी और उसने तुझे सब कुछ बता दिया? ज़रूर उसी ने बताया होगा, वरना मेरे गुप्त अड्डे तक नहीं पहुंच पाता तू।
परमाणु- हाँ, तेरे सारे काले कारनामे बता दिए उसने मुझे।

तभी अचानक ही वातावरण में सबको कंपन जैसा महसूस हुआ, हवा में ही एक तेज़ रोशनी पैदा हुई जो सबको चकाचौंध करने लगी, परमाणु और दिनेश को भी। जब वह चकाचौंध कर देने वाली रोशनी थमी तब “वह” सबके सामने खड़ी थी, उसके मस्तक पर विराजमान थी तीसरी आंख, हाथ में मौजूद खड्ग और अजीबोगरीब वेशभूषा देखकर दिनेश के तो प्राण सूख गए थे। उसने क्रोध से दिनेश की तरफ देखा और बोली-
“तेरे पापों का हिसाब होने जा रहा है अत्याचारी पुरुष! शक्ति अब तेरी छाती फाड़कर रक्तपान करेगी।”
इतना कहकर शक्ति ने अपनी खड्ग दिनेश की तरफ फेंकी लेकिन परमाणु के सीने से निकले जबरदस्त परमाणु ब्लास्ट ने उस खड्ग को उसके शिकार तक पहुंचने से पहले ही दूसरी तरफ गिरा दिया।

परमाणु- रुक जाओ! तुमको रक्तपात नहीं मचाने देगा परमाणु!
शक्ति- मेरे रास्ते से हट जा, यदि तेरे अंदर से मुझे जबरदस्त पुण्य शक्ति का आभास नहीं हुआ होता तो तू अब तक काल का ग्रास बन गया होता।
परमाणु- मुझे नहीं पता तुम कौन हो लेकिन दिनेश और इसके साथियों को सज़ा कानून देगा, तुम या मैं नहीं।
शक्ति- तुझसे टकराव की इच्छा तो नहीं थी लेकिन तू ऐसे नहीं मानेगा। तुझे क्या लगता है? मेरा खड्ग मुझसे अलग करके तू मेरे शिकार को मुझसे छीन लेगा? अरे मूर्ख, शक्ति नारी की पीड़ा का प्रचंड रूप है, जिस धातु को छू ले, वही उसकी गुलाम हो जाती है।

इतना कहकर शक्ति ने बस अपने हाथ का इशारा मात्र किया और सभी परमाणु रस्सी से बंधे बेहोश गुंडों की जेबों से बंदूकें निकलकर उसके पास आ गईं जिनको ऊष्मा से पिघलाकर एक बड़े भाले का रूप तैयार करने में उसे एक मिनट से ज़्यादा समय नहीं लगा। ये देखकर परमाणु उड़ता हुआ तेज़ी शक्ति के पास गया और भाले पर अपने हाथ जमा दिए लेकिन उसे भीषण आश्चर्य तब हुआ जब उसने देखा कि शक्ति ने भाले पर हाथ जमाये रखे और उल्टा उसे ही झटककर भाले से दूर कर दिया, वह ऐसे बाहुबल की उम्मीद नहीं कर रहा था।

फिर परमाणु ने ब्रेसलेट से छल्ले छोड़े जिससे वह भाला भी शक्ति के हाथों से छूटकर गिर गया, अब शक्ति का क्रोध परमाणु पर केंद्रित हो गया। उसने अपने दोनों हाथों से प्रचंड ऊष्मा पैदा की और परमाणु की ओर निशाना साधा, परमाणु ट्रांसमिट होकर बच गया लेकिन उसके एकदम पीछे दीवार नहीं बच पायी और उसमें बड़ा सा छेद हो गया। परमाणु को ये देखकर आश्चर्य हुआ, उसने मन ही मन कहा-
“इसके हाथ से निकलने वाली आग कोई साधारण आग नहीं है वरना दीवार को गलाते हुए नहीं निकल जाती। आखिर ये है कौन और दिनेश को क्यों मारना चाहती है?”

परमाणु को और कुछ सोचने का वक्त नहीं मिला क्योंकि जो भाला उसने शक्ति के हाथों से गिराया । उसी भाले को पिघलाकर उसने कई छोटे छोटे नुकीले शूलों का निर्माण करके परमाणु को निशाना बनाया लेकिन परमाणु हवा में ही फुर्ती दिखाते हुए हर एक शूल से बच गया। परमाणु ने बिना मौका गंवाये छाती से परमाणु छल्लों का प्रचंड वार शक्ति पर किया, शक्ति उस वार के धक्के से गिर गयी लेकिन तभी उसने ध्यान दिया कि उनकी लड़ाई का फायदा उठाकर दिनेश वहां से भागने की फिराक में है। उसने तीव्र ऊष्मा का एक वार दिनेश को निशाना बनाते हुए किया लेकिन तभी परमाणु एकदम से उस वार और दिनेश के सामने आ गया। वो प्रचंड वार परमाणु अपने सीने पर झेल गया, ये देखकर शक्ति बेहद विचलित हो गयी, परमाणु को एक पल के लिए शक्ति के चेहरे पर चंदा का अक्स दिखाई दिया लेकिन उसे ध्यान देने का मौका नहीं मिला क्योंकि अब शक्ति के हाथ में उसकी खड्ग वापस आ गयी थी और उसने तेज़ी से वो खड्ग दिनेश की तरफ फेंकी, परमाणु से ज़रा सी दूरी से निकलते हुए खड्ग दिनेश की ओर गयी और “खच्च” से उसकी एक टांग को काटते हुए फिर से शक्ति के हाथ में आ गयी, दिनेश की चीख पूरे वातावरण में गूँज गयी।

परमाणु ने एस्बेस्टस की पोशाक के कारण वह वार अपनी छाती पर झेल तो लिया लेकिन उष्मा का ताप इतना प्रचंड था कि वो कुछ समय के लिए बेबस होकर ज़मीन पर बैठ गया था। अब शक्ति एक ही पल में दिनेश के पास जा खड़ी हुई और उसकी गर्दन पकड़कर उसे हवा में उठा दिया। उसके चेहरे की तरफ देखती शक्ति बोली-
“तेरा पाप अक्षम्य है, नवजात बच्ची की जान ली है तूने, अब तू भुगतेगा।”
परमाणु दूर से ही चिल्लाकर बोला- “तुम्हें उसे मारना है तो मार दो लेकिन ऐसा करना इंसाफ नहीं होगा बल्कि सज़ा देना होगा!”
परमाणु की बात सुनकर शक्ति एक क्षण के लिए रुक गयी।

परमाणु उठकर बोला-
“समाज में नियम कानून इसलिए बनाये गए हैं ताकि इस जैसे दोषियों को जलील होकर सजा मिले, फांसी का प्रावधान इसलिए है ताकि लोग इसके हश्र से सबक लें और अपराध करने से तौबा करें। अगर तुम इसे आज ऐसी गुमनाम मौत मार दोगी तक क्या अपराध रुक जाएंगे? नवजात बच्चियां भयानक मौत से बच जाएंगी? औरतों पर जुल्म नहीं होगा? बोलो, जवाब दो!”
शक्ति के चेहरे पर आ रहा तनाव बता रहा था कि उसे निर्णय लेने में मुश्किल हो रही थी, कानून की बेड़ियां उसे अपना प्रतिशोध पूरा करने से रोक रही थीं। जब भी वह दिनेश के चेहरे की ओर देखती तो एक ही पल में उसकी ईहलीला खत्म करने का विचार उसके ज़ेहन में कौंध जाता लेकिन कुछ तो खास था परमाणु की बात में जो उसे रोक रहा था।
“आह!” शक्ति ने पूरे ज़ोर से चीखा और दिनेश को दूर फेंक दिया, दिनेश गिरकर बेहोश हो गया। उधर शक्ति ज़मीन पर बैठकर चीख-चीख कर रोने लगी, परमाणु ने देखा कि शक्ति के शरीर में आश्चर्यजनक रूप से परिवर्तन आ रहा है, तीव्र रोशनी से पूरा कमरा भर गया और परमाणु को भी अपनी आंखें एक पल के लिए बंद करनी पड़ीं लेकिन जब रोशनी कम हुई तब उसने देखा कि शक्ति की जगह चंदा बैठी है और रो रही है।
“उफ्फ, मैं क्या करने जा रही थी? एक हत्यारी बनने जा रही थी मैं भी।” चंदा रोते हुए बोली
“ये..ये मुझे क्या हो गया है? आखिर क्या बन गयी हूँ मैं?”
परमाणु को उतना आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उसके ज़ेहन में कहीं न कहीं चंदा के शक्ति होने वाली बात शक के तौर पर घर कर गयी थी, किसी और के मन में दिनेश के लिये इतनी नफरत नहीं हो सकती थी। चंदा हतप्रभ थी। वह परमाणु की तरफ देखकर बोली-
“ये..ये मुझे हुआ क्या है?”
परमाणु ने कुछ सोचकर उत्तर दिया।
“वैसे तो मैं विज्ञान को मानने वाला व्यक्ति हूँ लेकिन कभी-कभी हमारे सामने कुछ ऐसी चीजें हो जाती हैं जिसके कारण हमें अलौकिक शक्तियों पर यकीन होने लगता है। तुम्हारे मामले में मुझे किसी ईश्वरीय शक्ति का हाथ लगता है, तुम जब शक्ति बनी थीं तो तुम्हारा स्वरूप काफी हद तक काली मां जैसा हो गया था तो क्या पता कि काली मां ने अपनी शक्ति का अंश तुम्हारे अंदर स्थानांतरित कर दिया हो।”

चंदा को अभी भी समझ में नहीं आ रहा था, चौबीस घंटे के भीतर उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गयी थी, वह परमाणु को देखकर बोली-
“लेकिन मैं इन शक्तियों का क्या करूंगी? मुझे नहीं चाहिए ये शक्तियां, इनसे मेरी बच्ची मुझे वापिस नहीं मिल पाएगी।”

परमाणु (हल्का सा मुस्कुराकर)- नहीं लेकिन सोचो कि तुम कितनी बच्चियों को बचा पाओगी, तुम अकेली स्त्री नहीं हो जिसपर ज़ुल्म हुए हैं, ज़ुल्म पहले भी हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे। अब तुम्हारे पास शक्ति है ज़ुल्म को रोकने की, ये निर्णय भी तुम्हारा है।
चंदा- मुझे….मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।
परमाणु (चंदा के कंधे पर हाथ रखकर)- तुम्हारी घबराहट मैं समझ सकता हूँ लेकिन एक बात का वादा तुमसे करता हूँ कि जब तक तुम्हारा ये भाई ज़िंदा है तब तक तुम पर किसी भी तरह की आंच नहीं आएगी।

परमाणु ने इधर उधर देखा, सभी गुंडे बेहोश थे। उसने झट से अपना मास्क उतार दिया, विनय की जानी पहचानी शक्ल देखकर चंदा की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। इन चौबीस घंटों ने उसे क्या-क्या दे दिया था, बच्ची की मौत का गम, प्रलयंकारी शक्तियां और एक मुंहबोला भाई।

वर्तमान समय में-

न्यूज़फ़्लैश- अभी अभी एक दुखद खबर मिली है कि राजनगर के कर्तव्यनिष्ठ पुलिस ऑफिसर और ब्रह्मांड रक्षक दल के सदस्य इंस्पेक्टर स्टील की नागराज ने हत्या कर दी है। जी हाँ, कल रात दिल्ली के कनॉट प्लेस पर एक रक्षक के हाथों दूसरे रक्षक को मौत के घाट उतारा गया। सूत्रों की मानें तो नागराज ने स्टील को मारने के बाद वहां आसपास खड़े लोगों को भी धमकाने की कोशिश की लेकिन एक साल से गायब महानायिका शक्ति स्थिति को संभालने मौके पर पहुंच गईं। इस खबर से पहले एक अनजान व्यक्ति द्वारा हमारे स्टूडियो को एक वीडियो फुटेज भी भेजी गई जिसमें नागराज दो लोगों को मौत के घाट उतार रहा है, बैकग्राउंड देखकर लग रहा है कि ये डॉक्टर करुणाकरण के विश्वप्रसिद्ध स्नेक पार्क की फुटेज है। तो क्या अब रक्षक नागराज बन चुका है भक्षक नागराज? स्टील की मौत के बाद से ब्रह्मांड रक्षकों के अस्तित्व पर सवालिया निशान खड़े हो जायेंगे, हमने स्टील के निर्माता डॉक्टर अनीस से भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने किसी भी प्रकार का बयान देने से मना कर दिया है। ये जगजाहिर था कि इंस्पेक्टर स्टील उर्फ अमर और अनीस बहुत अच्छे दोस्त थे और दोस्त की मृत्यु ने उनपर बहुत गहरा प्रभाव डाला है। इस समय हमारे साथ स्टूडियो में मौजूद हैं राजनगर के पुलिस कमिश्नर रमन त्रिपाठी जी, स्वागत है आपका त्रिपाठी जी, क्या आप हमें बताएंगे कि स्टील ने ऐसा क्या किया जिसकी नागराज ने उसे इतनी बड़ी सज़ा दी?
त्रिपाठी- व्हाट नॉनसेंस? स्टील की कर्तव्यनिष्ठता की मिसाल पूरा देश देता है, उसने कभी अपना फर्ज पूरा करने में कोताही नहीं बरती बल्कि जब शरीर खत्म हुआ तो मशीन बनकर रक्षा की उसने राजनगर की। जहां तक बात है नागराज की तो मैं आपके न्यूज़चैनल के माध्यम से विश्व की सभी सरकारों से ये अपील करना चाहूंगा कि नागराज के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया जाए, उस नकली रक्षक को तो सज़ा-ए-मौत मिलनी चाहिए।
रिपोर्टर- माफ कीजियेगा कमिश्नर साहब लेकिन जिस तरह की शक्तियां नागराज के पास अब हैं, क्या आपको लगता है कि पूरे विश्व की सेनाएं मिलकर भी उसका कुछ बिगाड़ पाएंगी?
त्रिपाठी- हमें कोई न कोई हल तो निकालना ही होगा वरना हमेशा इन इच्छाधारियों के डर के साये तले ही जीना होगा।
रिपोर्टर- तो ये थे राजनगर कमिश्नर त्रिपाठी जी के विचार इंस्पेक्टर स्टील की मृत्यु पर, अगर आप भी अपने सुझाव हमें भेजना चाहते हैं तो ईमेल करिए नीचे दिए हुए पते पर। मिलते हैं एक ब्रेक के बाद।

इस न्यूज़ को सुनने के बाद चंदा ने रिमोट से टीवी को ऑफ कर दिया, विनय काफी देर से तरुण और चंदा के साथ सोफे पर बैठा टीवी देख रहा था, विनय ने सिर्फ अपना मास्क उतारा था लेकिन परमाणु कॉस्ट्यूम नहीं। उसके चेहरे के भाव देखकर ही पता लग रहा था कि इस खबर ने उसे कितनी बुरी तरह झकझोर कर रख दिया है, विनय को कुछ न बोलते देख चंदा ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोली-
“मुझे बहुत अफसोस है विनय, अगर मैं कुछ समय पहले पहुंच जाती तो शायद इस अनहोनी को टाल सकती थी।”
विनय थोड़ा सा आगे को झुककर बैठा था, उसका एक हाथ उसकी ठोढ़ी को सहारा दे रहा था, वह दुखी लेकिन विचारमग्न दिखाई दे रहा था। चंदा की तरफ देखकर वह बोला-
“तुम्हें देखना चाहिए था चंदा की वहां क्या हुआ, नागराज के स्टील को मारने से पहले मैंने उनकी बातचीत सुनी थी। स्टील भी नागराज को पूरी तरह से खत्म कर देना चाहता था, वह उस स्टील जैसा लग ही नहीं रहा था जिसे हम ब्रह्मांड रक्षक, राजनगर रक्षक और फर्ज की मशीन कहते हैं। इतनी निराशा मुझे कभी नहीं हुई, क्या यही आदर्श सिखाना चाहते थे हम अपनी आने वाली पीढ़ी को? क्या नायकों का अपना एजेंडा समाज हित से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है? तुम्हें पता है कि मुझसे स्टील के निर्माता अनीस ने अभी संपर्क किया था। ये जानने के लिए की वाकई में हुआ क्या था, उस बेचारे की क्या गलती थी जो उसे अपना सबसे अच्छा, या यूं कहें कि एकलौता दोस्त खोना पड़ा।”
तब तक किचन से तरुण पानी लेकर आ गया और विनय को पकड़ा दिया।

या।
विनय- मेरी वजह से तुम लोगों को भी कितनी परेशानी झेलनी पड़ी।
तरुण- बकवास मत करो विनय, तुम हमारे फैमिली फ्रेंड नहीं बल्कि फैमिली मेंबर ही हो।
विनय (चंदा की तरफ मुड़कर)- लेकिन तुम एक वर्ष से कहाँ गायब थी चंदा? इस दौरान मेरा तरुण से भी ज़्यादा मिलना नहीं हो पाया। देखा जाए तो उस हरु प्राणी से हुए ब्रह्मांड रक्षकों टकराव के बाद तुम हरु ऊर्जा से भरी चट्टान को लेकर ब्रह्मांड के किसी दुर्गम स्थान पर चली गईं थीं लेकिन उसके बाद क्या हुआ?
तरुण- ये सवाल तो मुझे भी इससे पूछना है, जानती भी हो कि कैसे काटा है मैंने एक साल तुम्हारे बिना?
चंदा- आप लोगों की चिंता जायज़ है लेकिन आप जानते हैं कि शक्ति अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा किये बिना वापिस नहीं आ सकती।
तरुण- लेकिन तुम ज़्यादा से ज़्यादा चार या पांच महीने गायब रही हो लेकिन एक वर्ष बहुत लंबा समय होता है। वो तो मुझे परमाणु उर्फ विनय ने बताया कि तुम हरु ऊर्जा से भरी चट्टान को छोड़ने ब्रह्मांड के दूसरे कोने में गयी हो लेकिन प्रकाश की गति से उड़ने वाली स्त्री के लिए ये काम इतना लंबा नहीं होना चाहिए था।
चंदा- मैं उस हरू ऊर्जा से भरी चट्टान को अंतरिक्ष के एक अलग ही छोर पर छोड़ आयी थी, ब्रह्मांड का एक अलग ही कोना जिसे आज तक कोई नाम नहीं दिया गया लेकिन मुझे पता था कि यदि मैंने चट्टान को वहां छोड़ दिया तो हरू अधिक उत्पात नहीं मचा पायेगा क्योंकि वहां का वातावरण इतना प्रगाढ़ है कि वहां किसी भी प्रकार की प्रचंड ऊर्जा का प्रवाह हो पाना एकदम मुश्किल है, इस बात का अंदाज़ा आप लोग इसी बात से लगा लीजिये कि मेरी प्रकाश की गति होने के बावजूद मुझे उस क्षेत्र से निकलने में चार महीने लगे लेकिन जैसे ही मैं उस क्षेत्र से निकली तभी मुझे भीषण पाप ऊर्जा के संकेत मिले, काली मां की ऊर्जा का अंश होने के कारण शक्ति को पता था कि क्या हो रहा है, उसे पता था कि “पाप क्षेत्र” का द्वार कमजोर पड़ रहा है।
विनय- पाप क्षेत्र? अब ये क्या बला है?
चंदा- महाभारत काल के महाविनाशकारी युद्ध के बाद धरती पर तामसिक शक्तियों का प्रभाव बढ़ गया था, राक्षसों का अत्याचार चरम सीमा पर था और उन राक्षसों का नेतृत्व कर रहा था भीषण महाशक्तियों का स्वामी …….. महाराक्षस चंडकाल। चंडकाल के पास ऐसी-ऐसी शक्तियां थीं जिनका सामना कर पाना बड़े बड़े ऋषि मुनियों के भी वश में नहीं था, जिस ओर से चंडकाल गुज़रता था वहां बस दुख, दर्द और मातम की आवाज़ें सुनाई देती थीं। चंडकाल ने अमृत नहीं पिया था लेकिन फिर भी वर्षों की साधना से उसने ऐसी-ऐसी शक्तियां ग्रहण कर ली थीं कि उसे मारना लगभग असंभव ही था, बड़े से बड़ा अस्त्र उसके वज्र जैसे अभेद्य शरीर को भेद नहीं पाता था। फिर कुछ समय बाद बड़े विद्वान पंडितों की मंत्रणा से ये तय हुआ कि चंडकाल को मारने की नहीं बल्कि कैद करने की कोशिश करनी चाहिए लेकिन आखिर कैद कहाँ किया जाए? इसके लिये देवताओं से मंत्रणा की गई, वैसे तो देवता पृथ्वी पर अधिक आते जाते नहीं थे लेकिन तामसिक शक्तियों की इतनी बढ़ोतरी के कारण देवताओं का उस वक्त पृथ्वी पर आवागमन बहुत अधिक बढ़ गया था। राक्षसों के हमले से स्वर्ग भी अछूता नहीं था। देवताओं और बड़े बड़े ऋषियों के तपोबल से निर्माण हुआ “पाप क्षेत्र” का। शुरुआत में इसकी रचना केवल राक्षस जाति के आखिरी वंशज चंडकाल को कैद करने के लिए की गई लेकिन फिर सबने सोचा कि सिर्फ चंडकाल ही क्यों, इसकी रचना सभी दुष्ट अथवा आसुरी शक्तियों को कैद करने के लिये किया जाना चाहिए। फिर एक-एक करके सभी अतृप्त दुष्ट आत्माओं और राक्षसों को इस पाप क्षेत्र में कैद किया जाने लगा लेकिन चंडकाल कोई साधारण राक्षस नहीं था, उसके पास ग्रहों तक को हिला देने वाला बल तो था ही लेकिन कई वर्षों की साधना से प्राप्त की हुई काली शक्तियां भी थीं इसलिए देवताओं और ऋषि मुनियों के साथ साथ प्राचीन काल के महानायक जैसे भोकाल, गोजो, अश्वराज, प्रचंडा इत्यादि की विलक्षण शक्तियों के सम्मिलित प्रभाव से चंडकाल को काबू करने का प्रयास किया जाने लगा लेकिन उसकी तरफ उस वक्त धरती की सारी भीषण तामसिक शक्तियां थीं जिससे ये काम बिल्कुल आसान नहीं था। तब पृथ्वी की स्वर्णनगरी पर बसने वाली देव जाति तकनीकी कौशल में किसी और जाति से बहुत अधिक आगे थी, उनके एक महान वैज्ञानिक प्रसेन ने ऐसा यंत्र बनाया जिसको यदि कोई जंतु पहन ले तो उसके दिमाग में ये विचार घर कर जाएगा कि उसने सब कुछ जीत लिया है, उसे कुछ पाने की इच्छा नहीं रह जायेगी और उसका मस्तिष्क निष्क्रिय हो जाएगा, उन्होंने चंडकाल के मास्तिष्क के भीतर उस यंत्र का रोपण (plantation) करने की योजना बनाई गई। यंत्र को मस्तिष्क में रोपित करने का बीड़ा उठाया महाबली भोकाल ने, वह चंडकाल के हर भीषण वार से बचता हुआ उसकी तरफ तेज़ी से बढ़ा, उस गजब के साहसी महाबली ने प्रसेन के दिशा निर्देशन का पालन करते हुए यंत्र को सिर्फ चंडकाल के सिर से स्पर्श करा दिया, बाकी का काम उस छोटे से यंत्र में मौजूद देव ऊर्जा ने कर दिया। यंत्र बेहद सूक्ष्म होते-होते चंडकाल के मस्तिष्क के भीतर चला गया और फिर चंडकाल चला गया सपनों के संसार में जहाँ उसने सब कुछ जीत लिया था। फिर पाप क्षेत्र को पहली बार धरती पर खोला गया और महाराक्षस चंडकाल के निष्क्रिय शरीर को बगैर किसी देरी के उस आयामद्वार में फेंक दिया गया। उसके बाद पलड़ा काफी हद तक पुण्य शक्तियों की तरफ हो गया। फिर चुन चुन कर अतिभीषण तामसिक शक्तिधारियों को उस आयाम के पार भेज दिया गया। पाप क्षेत्र का द्वार बड़ी मुश्किल से बंद किया गया। उसमें ऐसी चंडकाल के अलावा भी ऐसी अतिभीषण शक्तियां कैद थीं जो आज़ाद रहते समूचे ब्रह्मांड के लिए खतरा बन जातीं इसलिए पाप क्षेत्र को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। उसके बाद कई दुष्टात्माओं ने इस क्षेत्र को खोलने का प्रयास किया लेकिन विफल रहे क्योंकि किसी को इस क्षेत्र में जाने की कुंजी नहीं पता थी, अभी तक।
विनय- अभी तक? इसका मतलब अब फिर से उस द्वार को खोलने की चेष्टा की जा रही है?
चंदा (गहरी सांस लेकर)- चेष्टा नहीं की जा रही है विनय, बल्कि पाप क्षेत्र में जाने वाले आयामद्वार में हल्की दरारें पड़ना शुरू हो गयी हैं। मैं अंतरिक्ष भर में घूमी, अलग-अलग सभ्यताओं से जाकर मिली, उनसे इस बात का कारण जानने का प्रयास किया लेकिन हर जगह विफलता हाथ लगी। चूंकि पौराणिक काल से पृथ्वी सबसे अधिक देव दानव युद्ध की साक्षी रह चुकी है इसलिए मैंने आखिरकार पृथ्वी पर आकर इस कारण का पता लगाने का सोचा लेकिन जब मैं यहां आयी तो देखती हूँ कि एक ब्रह्मांड रक्षक ने ही दूसरे ब्रह्मांड रक्षक की जान ले ली तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि वाकई तामसिक शक्तियों का केंद्र फिर से पृथ्वी ही बनने वाली है। पाप क्षेत्र को खुलने से हर हाल में रोकना ही होगा वरना अनर्थ हो जाएगा।
विनय- इतने सारे अनर्थ तो पहले ही हो चुके हैं शक्ति, अब भला क्या अनर्थ होगा।
चंदा- तुम कहना क्या चाहते हो विनय?
विनय- तुम्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला तुम्हारा भाई खुद एक हत्यारा बन चुका है, मेरे हाथों सुप्रीमो अहंकारी की हत्या हो चुकी है।

राजनगर जेनेटिक रिसर्च लैब में करीम और रेणु ने प्रवेश किया।

रेणु- एक बात बताओ करीम, क्या कैप्टेन के जाने के बाद तुम्हारा मन कमांडो हेडक्वार्टर के काम में लग जाए रहा है?
करीम- बात मन लगने की नहीं है रेणु, कैप्टेन बहुत भरोसा करके हम पर ऐसी ज़िम्मेदारी छोड़कर गये हैं। हमें किसी भी कीमत पर इसे निभाना ही होगा, एक तो वैसे ही स्टील की मौत के बाद राजनगर पूरी तरह से अनाथ हो चुका है इसलिए सारी जिम्मेदारी हमारे ही कंधों पर है। पुलिस के लोग वैसे ही इस पैरेलल डिफेंस सिस्टम के इतना खिलाफत में रहते हैं, अब हमें उनको कुछ बकवास करने का मौका नहीं देना चाहिए।
रेणु- खैर, इस बच्चे का हालचाल लिया जाए जिसे तुमने करुणाकरण की लैब से उठाया है।
करीम- इस बच्चे की भी बड़ी लंबी कहानी है, नागमणि ने इसे सुप्रीमो के उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया था। अब ना सुप्रीमो रहा और ना नागमणि, देखते हैं कि ऐसे में इस बच्चे का क्या भविष्य हो सकता है।

बातचीत करते करते दोनों लैब के एक बड़े से कमरे के पास आ पहुंचे, सभी बड़े बड़े साइंटिस्ट्स वहीं पर इकट्ठा थे। ये देखकर रेणु बोली-
“कमाल है, यहां इतनी भीड़ क्यों लगी हुई है?”

लेकिन जो उन्होंने देखा उसके बाद उनकी भी आंखें फटी की फटी रह गईं, जिस ढाई साल के अबोध बच्चे को वो लेकर आये थे वो अब छह साल का चलने फिरने वाला बच्चा बन गया था। वह इस वक्त बैठा हुआ चित्रकारी कर रहा था। तभी वहां के मुख्य वैज्ञानिक इब्रित विकराल की नज़र करीम और रेणु पर पड़ी।

इब्रित- अरे करीम, रेणु! ये क्या अजूबा छोड़कर गये हो तुम यहाँ पर?
करीम- हमें तो खुद समझ में नहीं आ रहा कि ये इतनी जल्दी-जल्दी बड़ा कैसे हो रहा है?
इब्रित- ये हमारी तुम्हारी तरह प्राकृतिक पैदाइश वाला बच्चा नहीं है, एक कृत्रिम बालक है लेकिन इसकी जेनेटिक संरचना की मैं दाद देता हूँ। जिस हिसाब से ये बड़ा होता जा रहा है वैसे-वैसे इसकी सोच और समझ भी विकसित होते जा रहे हैं या ये कहना ज़्यादा ठीक रहेगा कि इसका मास्तिष्क कुछ ज़्यादा ही तेज़ी से विकसित हो रहा है। ये अपने आप अंग्रेज़ी और हिंदी की वर्णमाला सीख गया और अब संस्कृत भी लिखना शुरू कर चुका है।
रेणु- लेकिन इसकी उम्र पर अंकुश कैसे लगाया जाए?
इब्रित- हम लोग इसी पर काम कर रहे हैं क्योंकि हम खुद ये नहीं चाहते कि विज्ञान के इस नमूने की मृत्यु इतनी जल्दी हो जाये लेकिन जब तक हम टेस्ट रन कर रहे हैं, इसे लगातार प्रशिक्षण देना होगा। जो कुछ ये सीख सकता है वो सब सिखाना होगा।
करीम- हाहाहा, तो क्या अब आप कल से इसकी जुडो कराटे की ट्रेनिंग भी शुरू करवा देंगे।
इब्रित (तीखी नज़रों से करीम की तरफ देखकर)- वैसे ये बुरा आईडिया नहीं है।
करीम- अरे मैं तो मजाक कर रहा था, आप तो गंभीरता से ले गए इस बात को।
इब्रित- गंभीरता से लेना जरूरी है इस बात को क्योंकि इस बच्चे के अंदर न जाने कितना पोटेंशियल है, अगर इसकी उम्र तेज़ी से बढ़ रही है तो इसे सीख भी तेजी से रहा है। ये एक विलक्षण बालक है जिसकी ख्याति बहुत दूर दूर तक फैलेगी।

अनीस अपने कमरे में अंधेरा करके बैठा हुआ था, पुलिस महकमे के कई लोग आज उससे मिलने आये थे लेकिन उसे अपने लिए कुछ समय का एकांत चाहिए था जो अब जाकर उसे मिला था, तभी उसकी बहन सलमा आयी और उसके बगल में जाकर बैठ गयी। अनीस ने ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह अपने विचारों में खोया हुआ था।

सलमा- क्या सोच रहे हैं भैया? अब जो हो गया उसे तो हम बदल नहीं सकते लेकिन ज़िन्दगी में आगे तो बढ़ना ही होगा।
अनीस- सही कहा तुमने सलमा लेकिन अमर की मौत से ज़्यादा मुझे उस बात की हैरानी है जो परमाणु ने मुझे बताई।
सलमा- आपने परमाणु से संपर्क किया था?
अनीस- कुछ ही समय पहले।
सलमा- क्या बोला उसने?
अनीस- यही कि नागराज के रक्षक से भक्षक बनने में स्टील का हाथ है, उसने करुणाकरण को ब्लैकमेल करके नागराज के शरीर में कुछ ऐसा पहुंचा दिया जिससे नागराज की शक्तियां बहुत अधिक बढ़ गईं और उसका अपने दिमाग पर काबू नहीं रहा।
सलमा- क्या? ये..ये क्या कह रहे हैं आप भैया?
अनीस- मुझे समझ में नहीं आ रहा है सलमा की अमर भला ऐसा क्यों करेगा? मतलब ये तो जगजाहिर था कि नागराज ने उसके शरीर को क्षतिग्रस्त किया जिसकी वजह से उसे स्टील बनना पड़ा लेकिन अगर नागराज ऐसा नहीं करता तो उसकी बीमारी उसे समय से पहले लील जाती और ये बात उसे पता थी। तो आखिर ऐसी क्या बात हो गयी कि स्टील के अंदर नागराज से प्रतिशोध लेने की भावना जाग उठी? अमर जिसने कभी हमेशा कानून का पालन किया और कानून की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली, उसने ऐसा किया ये मुझे हजम नहीं हो रहा है।

अनीस के सवाल का सलमा के पास कोई जवाब नहीं था, इसका जवाब खुद स्टील दे सकता था लेकिन अब वो इस दुनिया में नहीं था।

मुम्बई के एक आलीशान मकान के बड़े से हॉल में अदरक, काली, धनिया और हल्दी बैठे हुए थे। सभी के शरीर पर सूरज और चीता मरहम पट्टी कर चुके थे, मोनिका एक कोने में बैठी हुई थी। सभी लोग गहन चिंता में थे। सबको शांत देखकर अदरक ने ही सूरज से पूछ लिया-
“आखिर तुमको डॉक्टर करुणाकरण के लैब के बाहर वाली फुटेज मीडिया में रिलीज़ करवाने की क्या ज़रूरत थी? अब नागराज हाथ धोकर हम लोगों के पीछे पड़ जायेगा।”

सूरज- जब तक हम इस आलीशान घर में छिपे हैं तब तक तो नहीं ढूंढ पायेगा।
काली- छिपे हैं? अरे हमारा ही घर है भाई। काले डकैतों की मेहनत की कमाई से बना घर है ये।
सूरज- फिलहाल तो हममें से कोई सुरक्षित नहीं है इसलिए खुद को छुपा हुआ ही समझिए, जिस नागराज ने स्टील को मारने से पहले कुछ नहीं सोचा वो हमको मारने से पहले भला क्या सोचेगा? वह भी तब जब उसे पता है कि वीडियो फुटेज काले डकैतों के ही पास थी, जब वो मीडिया में ये फुटेज देखेगा तो हमें ढूंढने के प्रयास अवश्य करेगा ताकि स्टील की तरह हमको मारकर समाज के सामने एक उदाहरण पेश कर सके कि जो उसके खिलाफ जाएगा उसका क्या हाल होगा।
मोनिका- तो क्या हमें हमेशा दौड़ते छिपते ही जिंदगी जीनी होगी?
सूरज- हम बागी तो वैसे भी बंजारे जैसा जीवन जीते हैं मोनिका, मठ से बगावत की तो मुम्बई आ गए, अब अगर लगा कि हमारी वजह से मुम्बई परेशान हो रही है तो मुम्बई भी छोड़ देंगे।
धनिया- हहै हब तक हकीह्न हहिं हो यह कि हिस्टील हंर हह।
चीता- आप थोड़ा गले को आराम दीजिये, नागराज ने जब से आपकी गर्दन पकड़ी है तब से आवाज़ से ज़्यादा हवा बाहर आ रही है गले से।
काली- वो कह रहा है कि उसे अब तक यकीन नहीं हो रहा कि स्टील मर चुका है।

कमरे के हॉल में एक बार फिर खामोशी छा चुकी थी, सब के चेहरे पर एक उदासी नज़र आ रही थी जिसे सूरज ने यह कहकर तोड़ दिया कि-
“घर जल्दी ही छोड़ना होगा, कुछ समय के लिए मुम्बई से बाहर रहना ही श्रेयस्कर है। नागराज ज़रूर मुम्बई आकर डोगा के बारे में जांच पड़ताल करेगा लेकिन डोगा उसे तभी मिलेगा जब डोगा चाहेगा।”

रोबो आर्मी एक आलीशान बंगले के बाहर खड़ी थी जहां अंदर से तेज़ तेज़ लड़ने की आवाज़ें आ रही थीं। अंदर नताशा और रोबो आपस में बहस कर रहे थे।

रोबो- नहीं नताशा! अब तुम ध्रुव से मिलने नहीं जाओगी, वह मठ एक बहुत ही खतरनाक जगह है और हन्टर्स बहुत ही खतरनाक लोग हैं।
नताशा- ओफ्फो, डैड! हम सिर्फ दोस्त हैं और इस वक्त ध्रुव को सहारे की सख्त जरूरत है।
रोबो- अच्छा? क्या वाकई? क्या वाकई तुम लोग दोस्त हो या प्यार करते हो आपस में?
नताशा- ये..ये आप क्या कह रहे हैं?
रोबो- भोली मत बनो नताशा, राजनगर के युद्ध के दौरान तुम दोनों का नैन मटक्का देखा था मैंने। तुम खुद से झूठ बोल सकती हो लेकिन मुझसे नहीं, आधा मशीनी शरीर ज़रूर है मेरा लेकिन तुम्हारा पिता हूँ और तुम्हारी रग-रग से वाकिफ हूँ।

नताशा से अब अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रखा गया जो आंसुओं का सैलाब बनकर उमड़ पड़ीं। वह चिल्लाकर बोली-
“हाँ मैं प्यार करती हूँ ध्रुव से! पता है क्यों डैड? क्योंकि उसने मुझे समझने की कोशिश की, पहली बार किसी ने कमांडर नताशा को डर या हिकारत की दृष्टि से नहीं बल्कि प्यार की दृष्टि से देखा और अब जब उसे प्यार और अपनेपन की ज़रूरत है तो मैं उसका साथ छोड़कर चली जाऊं? कभी नहीं! मैं कमांडर पद से हटने की घोषणा करती हूँ, आज से आपकी दुनिया से मेरा कोई वास्ता नहीं। मैं जा रही हूँ अपने ध्रुव की दुनिया में!”

रोबो अवाक खड़ा रह गया, उसके मुंह से शब्द नहीं फूटे और इतना कहकर नताशा भी किसी आंधी की तरह वहां से निकल गयी, वह बिना किसी देरी के बाहर खड़े हेलीकॉप्टर में बैठ गयी। रोबो आर्मी हथियार लेकर दौड़ती हुई हेलीकॉप्टर के पास आई लेकिन रोबो ने बाहर आकर उन्हें एक इशारे से रोक दिया, उसने मुस्कुराते हुए हेलीकॉप्टर में बैठी नताशा की ओर देखा, नताशा भी रोबो को देखकर मुस्कुरा दी और हेलीकॉप्टर ने उड़ान भरनी शुरू की। रोबो आर्मी का एक सिपाही रोबो के पास आकर बोला
“ग्रैंडमास्टर! अगर आप चाहें तो हम अभी भी नताशा को रोक सकते हैं!”
रोबो उसकी तरफ देखकर बोला-
“मगर मैं नहीं चाहता कि तुम उसे रोको, अपराध की दुनिया में मैं इतना व्यस्त हो गया कि कभी अपनी बेटी से इतना भी ना पूछ सका कि वो कैसी है। उसके मन की कोई इच्छा नहीं समझी और ना ही समझने का प्रयास किया, माना कि मैं एक बहुत अच्छा बाप नहीं हूँ लेकिन इतना बुरा भी नहीं कि अपने स्वार्थ की खातिर अपनी बेटी की हर खुशी को मार दूं। अगर उसकी खुशी ध्रुव के साथ है तो फिर यही सही। हालांकि उससे बिछड़ने का गम तो होगा लेकिन उसकी खुशी के लिए ये मंज़ूर है मुझे, अगर तुम कुछ करना ही चाहते हो तो मेरे साथ मिलकर रोबो आर्मी के नए कमांडर के चुनाव पर ध्यान लगाओ।”

नागराज उड़ता हुआ मठ की तरफ बढ़ रहा था, बीते दिनों में वह अपनी ही परेशानियों से इतना परेशान था कि बाकी किसी तरफ ध्यान ही नहीं दिया। जब से स्टील की हत्या की खबर और नागमणि और नागदंत की हत्या की वीडियो फुटेज लोगों तक पहुंची थी तब से वह काले डकैतों और डोगा की तलाश में था लेकिन कहीं भी सफलता हाथ नहीं लग रही थी, आखिर ऐसी संस्था को कैसे ढूंढा जाए जिसकी महारत ही खुद को अदृश्य रखना था। आज वह अफसोस कर रहा था कि उसने मौका रहते डोगा इत्यादि को वहीं आइसक्रीम स्टोरेज में क्यों नहीं मार डाला। जिसका फल वह आज भुगत रहा था, सारे न्यूज़ चैनल्स पर उसके खिलाफ बोला जा रहा था, लोगों की नज़रों में वह पूरी तरह भक्षक बन गया था लेकिन यह बात उसे इतना परेशान नहीं कर रही थी क्योंकि करुणाकरण और स्टील से मिले धोखे के बाद उसका मन मानवों से एकदम उचट गया था। आज वह उस शख्स से मिलने जा रहा था जिसे कभी वह अपना दोस्त कहता था, उसे ध्रुव के बारे में पता चल गया था क्योंकि मठ का अरावली में स्थित होना एक राज़ की बात नहीं रह गयी थी। मठ के ऊपर तैरते अम्लीय बादलों को पार करता हुआ जब वह नीचे उतरा तो कस्बे के लोगों के साथ साथ वहां मौजूद हन्टर्स भी आश्चर्यचकित रह गए थे। सभी की नजरें नागराज पर गड़ी हुई थीं। उसने बस एक बार कहा-
“मुझे ध्रुव से मिलना है।”
कुछ ही समय में नागराज दरबार में ध्रुव के समक्ष खड़ा था, उसे दरबार तक लाने वाले हन्टर्स दरवाजे के बाहर ही रुक गये थे। नागराज ने गौर से ध्रुव को देखा, नीला अंगवस्त्र उसे किसी सम्राट सा आभास दे रहा था लेकिन नागराज को देखकर भी उसके चेहरे के भाव बदले नहीं थे, आंखों की भावहीनता अभी तक बरकरार थी। उसके बगल में नीली धोती और नीले नकाब में अपनी ढाल लिए एकदम सतर्कता से खड़ा था अभय जिसने ध्रुव के साथ मठ की शक्तियों को मठ के अंदर ही रखने का बीड़ा उठाया था लेकिन इसके लिए उसे तिरंगा के व्यक्तित्व को कुर्बान करना पड़ा था।

नागराज- मुझे पता चला तुम्हारे परिवार के बारे में, माफ करना कि मैं वहां नहीं था। तुम्हारे बारे में पता किया तो मालूम पड़ा कि तुम यहाँ हो।
ध्रुव- काम क्या है नागराज? माफ करना लेकिन आज मेरे शेड्यूल में एक ब्रह्मांड रक्षक के कातिल से मिलना नहीं लिखा था, मुझे और भी काम हैं।

ये जवाब सुनकर नागराज की मुट्ठियाँ भिंच गयीं लेकिन उसने अपना संयम खोने नहीं दिया, उसने आराम से पूछा-
“तुमने राजनगर की रक्षा से सन्यास क्यों ले लिया है?”

ध्रुव- तीन कारण हैं, पहला ये की रक्षक होकर भी मेरे कारण राजनगर को विक्षिप्तों की मार झेलनी पड़ी और एक भयानक घटनाक्रम का हिस्सा बनना पड़ा इसलिए रक्षक होने का खिताब तो मैं उसी वक्त खो चुका था।
दूसरा ये कि मठ में वक्र के मरने के बाद अराजकतत्व सक्रिय हो जाते और यहां अव्यवस्था फैल जाती, शायद पहले से भी अधिक निरंकुश शासक निकलकर हमारे सामने आता इसलिए मैं मठ के लोगों की सर्वसम्मति से इस गद्दी पर विराजमान हो गया।
तीसरा ये की राजनगर अब हमेशा मुझे मेरे परिवार की याद दिलाता रहेगा, यहां रहूंगा तो उन यादों से बचा रहूंगा।
वैसे भी मैं राजनगर को स्टील और कमांडो फ़ोर्स के काबिल हाथों में छोड़कर आया था जिनमें से एक तो तुम्हारे हाथों मर ही गया। खैर, छोड़ो ये सब बातें और मेरे प्रश्न का जवाब दो कि तुम आखिर यहां आए क्यों हो?
नागराज- आश्चर्य है कि जो खुद अपने हाथ खून से रंगकर गद्दी पर बैठा है वो मेरी नैतिकता पर सवाल खड़े कर रहा है। स्टील को उसके कर्मों की सज़ा मिली है, माना कि मैं एक राक्षस बन गया हूँ लेकिन इस राक्षस को बनाने में स्टील का भी बहुत बड़ा हाथ है। मैं तुमसे इन सब मामलों पर बहस करने नहीं आया, मुझे तो बस इतना बता दो कि डोगा कहाँ है?
ध्रुव- बस दो सवालों के जवाब दे दो, पहला ये कि क्यों चाहिए तुमको डोगा का पता और दूसरा ये कि तुम्हें क्यों लगता है कि मैं डोगा का पर्सनल असिस्टेंट हूँ और उसकी हर जानकारी रखता हूँ?
नागराज- अब तक तो तुम्हें पता लग ही गया होगा कि स्टील वो पहला शख्स नहीं है जिसकी मैंने हत्या की है, उससे पहले जो दो खून हुए थे वो भी डोगा की मेहरबानी से पूरी दुनिया के सामने आ चुके हैं। उसके पास ही स्टील की भेजी वीडियो फुटेज थी जो उसने मीडिया को दे दी।
ध्रुव (मुस्कुराकर)- यानी अब डोगा का भी स्टील जैसा हश्र होने वाला है?
नागराज- तुम्हें इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए, उसने नागराज के खिलाफ जंग छेड़ी है तो उसकी सजा भी नागराज ही तय करेगा। तुम्हें पता मालूम है तो दो।
ध्रुव- अफसोस, डोगा काले डकैत नाम की एक संस्था का हिस्सा है जो कि गायब होने में माहिर है, वरना उनको ढूंढना तुम्हारे लिए तो चुटकियों का खेल था। हन्टर्स बहुत कुछ मालूम रखते हैं लेकिन सब कुछ नहीं।

नागराज ने ध्रुव की और भौंहें तानकर देखा और कहा-
“उम्मीद है कि तुम सच कह रहे हो, अपनी और अपने मठ की भलाई की खातिर।”
इतना कहकर नागराज किसी तेज़ हवा के झोंके के समान जैसे आया था, वैसे ही चला गया। नागराज के जाते ही ध्रुव के बगल में खड़ा अभय बोल उठा।
“हमें काले डकैतों को खबर कर देनी चाहिए।”

ध्रुव- नहीं अभय, हमें इस मामले में फिलहाल नहीं पड़ना चाहिए।
अभय- लेकिन क्यों मठाधीश?
ध्रुव- तुमने सुना ना कि नागराज का आखिरी वाक्य क्या था? अगर उसे भनक लगी कि हम काले डकैतों की मदद कर रहे हैं तो जिस मठ की रक्षा के लिए मैं मठाधीश बना हूँ, वह उस मठ को ही पल भर में भस्म कर देगा। ये नई शक्तियों वाला नागराज किसी की भी जान लेने से हिचक नहीं रहा है। फिलहाल काले डकैतों को अपनी मदद खुद ही करनी होगी।

अभय गौर से ध्रुव को देख रहा था, वह देख रहा था कि जिस व्यक्ति को कभी पूरा विश्व प्यारा हुआ करता था, जो दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी बच्चे का रुदन सुनकर द्रवित हो उठता था, आज वो भी अपना एक एजेंडा बनाकर चल रहा था लेकिन उसे इस बारे में अधिक सोचने का मौका नहीं मिला क्योंकि एक दास दरबार के अंदर आया।

“मठाधीश ध्रुव की जय!”

ध्रुव- क्या बात है दास?
दास- आपने यहां के शस्त्रागार को देखने की इच्छा जाहिर की थी, यदि आप चाहें तो अभी चल सकते हैं।
ध्रुव- अरे हाँ, सुना है कि वहां बेहद प्राचीन लेकिन प्रभावी शस्त्रों का अंबार लगा हुआ है। मठ के कार्यों से आज थोड़ा मुक्त हूँ तो एक नज़र मार ही लेता हूँ, चलो अभय।

अभय, ध्रुव और दास दरबार के बाहर निकले ही थे कि उन्होंने देखा कि सामने से रोबो आर्मी का हेलीकॉप्टर उड़ता चला आ रहा है।

अभय- ये तो रोबो आर्मी का हेलीकॉप्टर है, रोबो का भला हमसे क्या काम है?
ध्रुव- क्या पता? नागराज के जाने के बाद अब ये न जाने क्या मुसीबत आ गयी।

हेलीकॉप्टर ठीक दरबार के सामने उतरा और उसमें से उतरी नताशा, नताशा का देखकर ध्रुव के भावहीन चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कुराहट आ गयी। न जाने नताशा और ध्रुव दोनों के मन में भावना का कैसा ज्वार उठा, वे दोनों पूरी शक्ति से एक दूसरे की तरफ भागे और दौड़कर एक दूसरे को गले लगा लिया, दोनों की ही आंखों से अश्रुधारा बहना शुरू हो गया था।

ध्रुव- मैंने कहा था न कि मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।
नताशा- मैं बस तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं अब, मैंने रोबो आर्मी को छोड़ दिया है। आई लव यू ध्रुव।
ध्रुव- तुम नहीं जानतीं कि तुमने मुझसे ये क्या कह दिया है नताशा, मेरे अंधकारमय जीवन को अब अगर कोई प्रकाश की डोर से बांधे रख सकता है तो वो सिर्फ तुम हो। मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।

अभय दूर से ही खड़ा मुस्कुरा रहा था, वह जानता था कि जब इंसान अपने सारे अपने खो देता है तो उसे जीवन में किसी के प्यार की ज़रूरत पड़ती है वरना उसका पतन होना निश्चित है, चाहे वो एक साधारण इंसान हो या एक महानायक। ध्रुव को भी सच्चा प्यार मिल गया था, उसके लिये अभी भी उम्मीद बाकी थी।

विसर्पी अपनी सुबह की पूजा नागमन्दिर में करके वापिस महल लौट रही थी, वह नागराज से बहुत नाराज़ थी और कारण स्पष्ट था कि नागराज दो बार नागद्वीप आया लेकिन दोनों बार उससे बिना मिले चला गया। हालांकि इसमें कुछ गलती उसकी भी थी क्योंकि वह तंत्र साधना में इतना व्यस्त थी कि उसे अपने आसपास का ही कुछ ख्याल नहीं था और राज एक प्रकार से महात्मा कालदूत ही चला रहे थे, नागराज की नई शक्तियों का उसे पता लगा था और इसके कारण वह कुछ चिंतित भी थी क्योंकि डोगा के न आने और नाग न्यायालय में जो कुछ भी हुआ उसके बाद से इच्छाधारियों का रोष अब और स्पष्ट रूप से दिख रहा था। यह सब ख्याल मन में लिए विसर्पी महल की सीढ़ियों पर चढ़ ही रही थी कि अचानक उसने कुछ ऐसा देखा कि पूजा की थाली उसकी हाथों से छूट कर नीचे गिर गयी, नागराज महल की सीढ़ियों पर निराश हताश बैठा हुआ था, उसकी आंखों से लगातार आंसू गिर रहे थे। विसर्पी ने नागराज के इस रूप की कभी कल्पना भी नहीं कि थी क्योंकि उसके ही नहीं बल्कि नागद्वीप के बच्चे के मन में नागराज की छवि थी प्रलयंकारी, दुष्टों का नाश करने वाला, विनम्रहृदयी और ऐसा व्यक्ति जिसे देखकर लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते थे लेकिन आज नागराज से ज़्यादा कमजोर और मानसिक तनाव से ग्रस्त व्यक्ति और कोई लग नहीं रहा था। विसर्पी दौड़कर गयी और नागराज को अपनी बांहों में भर लिया।

विसर्पी- क..क्या हुआ नागराज? तुमको इस तरह निराश मैंने कभी नहीं देखा।
नागराज (भारी गले से)- मैं थक गया हूँ विसर्पी, जिनकी रक्षा करने का वचन मैंने लिया था जब वही मेरे विरुद्ध हो गए तो अब मुझे समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूँ? भारती की मृत्यु के पश्चात उसके लिए जो मैंने मानवों की रक्षा करने की प्रतिज्ञा ली थी, वो आज मुझे मिथ्या लगने लगी है। मेरे हाथों एक भयानक पाप हो गया है।
विसर्पी- य..ये तुम क्या कह रहे हो नागराज?
नागराज- हाँ विसर्पी, अब मैं मानवों की नज़रों में भक्षक हूँ क्योंकि मैंने एक नायक को जान से मार दिया है।

चंदा को अभी तक यकीन नहीं हो रहा था कि उसने विनय के मुंह से क्या सुन लिया था, वह कांपते होंठों से बोली-
“य..ये क्या कह रहे हो विनय?”

विनय- तुमने बिल्कुल सही सुना शक्ति, मेरा भी पतन हो चुका है, मैंने एक व्यक्ति की हत्या कर दी है। स्टील मेरी ही गिरफ्तारी के लिये आया था लेकिन फिर तुम जानती ही हो कि क्या हुआ।
चंदा- ये..ये सब हो क्या रहा है? ध्रुव के हाथों भी एक हत्या हो गयी, तुम्हारे और नागराज के हाथों भी हत्याएं हो गयीं, स्टील ने भी ऐसा षड्यंत्र रचा जिसकी उससे उम्मीद भी नहीं की जा सकती। नहीं ये मात्र एक संयोग नहीं हो सकता, इसके पीछे ज़रूर किसी का हाथ है।
विनय- मैं मानता हूँ कि तुमको ये विश्वास करने में मुश्किल हो रही है शक्ति कि नायकों का पतन हो चुका है लेकिन ज़रूरी नहीं कि इस बार कोई कारण हो। तुम्हारी तरह मैं भी मानना चाहता हूँ कि हर बार की तरह इस बार भी सभी घटनाओं के पीछे कोई सुपरविलेन हो जिस पर ये सारे दोष मढ़े जा सकें लेकिन कभी-कभी नायक ही सबसे बड़े खलनायक बन जाते हैं। वैसे भी ये सारी घटनाएं इतनी अलग-अलग हैं कि किसी एक व्यक्ति का उनको अंजाम देना संभव नहीं लगता है।
चंदा- तुम मानो या ना मानो विनय लेकिन मैं ये मानती हूँ कि इतने नायकों का पतन एक साथ होना कोई संयोग नहीं हो सकता। ये ज़रूर किसी की साजिश है, और जब वो शख्स मेरे सामने आएगा, वह मेरी तीसरी आंख का शिकार बनेगा।

वेदाचार्य के कमरे में अंधेरा था जहां वे पालती मारकर बैठे थे, उनके सामने कई प्राचीन ताड़पत्र खुले हुए थे जिनपर संस्कृत में कुछ लिखा हुआ था, वे सिर्फ स्पर्श से उनका अध्ययन कर रहे थे। वो चिंतित मुद्रा में बोल उठे।

“आखिरकार जिसका डर था वही हुआ, ब्रह्मांड रक्षक बिखर गए, नायकों का पतन हो गया, अच्छाई और बुराई के बीच का फर्क खत्म हो गया। अब आने वाले समय में पृथ्वी पर अतिभीषण तामसिक शक्तियों के आने आसार हैं, कई युगों के सोई हुई ये तामसिक शक्तियां जागने वाली हैं।”

To be continued….
Written by- Samvart Harshit for Comic Haveli

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11 Comments on “Earth 61 Phase 2 Part 13”

  1. शानदार लिखा है कहानी के प्रारम्भ से ही आपने मनमोहक अंदाज़ में कहानी को आगे बढ़ाया।
    परमाणु और शक्ति के बीच ये भाई बहन का नया रिश्ता लेकर आये।
    आपने तो पूरे एक ही कुनबे के लोग बना दिये हैं superheroes चंदा का शक्ति बनना नहीं पता चला लेकिन मतलब कैसे आयी उसके पास शक्ति की ताक़त?
    नागराज का ऐसे पागलों की तरह घूमना और हर गजह लोगों का उसकी ओर विमुख हो जाना बहुत निराशाजनक है।
    उसे अपनो ने(ब्रह्मांड रक्षक) तो छोड़ा ही बल्कि लोगों ने तक उसका साथ छोड़ दिया।
    उसको बस दोषी ही समझ रहे हैं सब। डोगा ध्रुव तिरंगा भी।
    इस पार्ट को मैं शब्दो मे बयान नहीं कर सकता। अंतिम पंक्तियों पर आते समय नागराज का और विसर्पी का मिलान बहुत भावुक कर गया।
    बहुत बढ़िया सीरीज गयी है ये अभी तक।

    मुझे बस एक बात बुरी लगी कि एंथोनी और भेड़िया नदारद हैं। इतनी विभीषिका के बाद भी!

    खैर अब देखते हैं डोगा कब तक नागराज से बचेगा और ध्रुव कैसे मठ के लोगों को बचा पता है नागराज से सबसे महत्वपूर्ण बात नागराज इस विषाद से निकल कैसे पायेगा!

  2. Bhai kahani baht shandar hai…

    Iss part ko read krke lag rha tha jaise koi mahayufha shuru hone wala hai…chandkaal ko baht powerful bana diya hai aapne…parmanu aur chanda ko bhai bahen bana kr alag hi image bana diya hai mind me…ab lagnr laga hai ki parmanu bhi story me involve hai… Doga ka underground hona sahi nhi laga…qki doga ki jo image hai mind me wo maut ko gale lagana pasand karega lekin chupna nhi isliye ye thoda thik nhi laga…nagraj ko doga aur kaale dakait ka dhund kar maarna ye bhi ajeeb laga…qki steel ko mara ye samajh me aata hai lekin doga ko marna ye logical nhi lag rha…doga ki jagah koi reporter hota to wo bhi yahi karta nagraj ka asli roop duniya k samne laana…doga ne uske khilaf koi planing nhi ki like steel…to ye ajeeb laga…

    Robo army ko chhorh kr natasha scd k pas aagyi hai shayd ab scd phr se pahle jaisa ban paye lekin nagraj se hui baat cheet ko dekh kr lag rha h ki scd aaj bhi jurm ko panapne nhi dega…

    Idhar nagraj ka nagdweep me jakar kar rona aur afsos karna baht hi perfect tha qki superhero hai wo use kabhi na kabhi to ehsas hona hi tha apni ghalti ka…
    Ab aage na jane kya hoga wait hai next part ka

  3. Fantastic story bro

    Story kafi jyada intresting hoti ja rhi h
    Bs yahi kahana chahata hoon ki jald se jald
    Next part aani chahiye
    Mai per day iss chek karta hoon ki kb publish hogi story

    Waiting for next part…..

  4. This part has a whole different impact on the storyline
    Kuch itna action vagairah nhi tha
    Kuch tha to har nayak k man me chalti kashmakash
    Sadham hi lag raha in sabke pichhe jisne itne kathor ichha shaktiyon wale mahanayakon ka bhi patan kar diya hai
    Ek line padhi hai hum sabne hi
    Man k haare haar hai, man k jeete jeet
    Aadmi agar apne man ko vash me kar le to kuch bhi mushkil nhi
    Parantu kya ho agar kisi aur ne hi aapke man ko vash me kar liya ho to
    In sab brahmand rakshakon k sath yahi hua hai
    Is bar lekhani mujhe kamzor lagi
    Pata nhi kyun, I’m not an expert but the quality of writing is a little diminished in this particular part
    But story hi itni dhansu hai k kuch kahna nhi
    Upar ek bande ka comment padha
    Raj comics ka bhavishya
    Agar raj comics sach me apna bhavishya aise lekhak k hath me de de to usko bahut jyada aage badhne se koi nhi rok sakta
    Asha hai aise hi kahaniyan milti rahengi
    Time to read the next part

  5. Bahut hi shandar likha hai aapne, har ek ghatana koma achhe se vistrit rup se varnan kiya hai, pap kshetra ke bare me bhi pata chl gya, pr ye part bhi kayi sawalo ko chhodakar ja rha hai, aur sabse bada saval aaj bhi yahi hai kya hoga is aayam ka bhavishya?
    Kaun hai in nayi ka patan ka kaaran, kyu sabke adarsh kahe jane wale nayak khud ke aadarshon ki raksha krne me samarth nhi ho pa rhe hai ,

    Dhruva aur Natasha ka proposal dekhkar achha laga, aur sabse achhi bat isme Robo ek bap ki tarah dikhaya gya hai, sasur ki tarah nhi

    Bs detailing se baki log review kr chuke hain to bar bar kya dohrana

    Pr agar ye kahani rc padhne ko deti to bahut maza aa jata

    Dhnywad

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