Earth 61 Phase 2 Part 14

चतुर्दश अध्याय- जंगल का जल्लाद

“असम के घने जंगलों में अनगिनत ऐसे रहस्य छिपे हैं जिन्हें इंसानों ने देखा तो है लेकिन उनके अस्तित्व का पुख्ता सुबूत आज तक हमारे हाथ नहीं लगा है।”
फॉरेस्ट ऑफिसर अनिल कश्यप ने जीप दौड़ाते हुए कहा, जीप के पीछे वाली सीट पर बैठे थे- प्रोफेसर विक्रम अपने दो होनहार असिस्टेंट नवीन और सीमा के साथ। उनकी जीप असम के वन क्षेत्र से कुछ ही दूरी पर थी।
विक्रम अनिल की बात सुनकर बोले- “तो क्या तुमने इस जंगल के सबसे बड़े अजूबे को देखा है? वो भेड़िया मानव जो यहां विचरण करता है, जिसे जंगल का जल्लाद बताया जाता है।”
अनिल के कुछ उत्तर देने से पहले ही सीमा बोल पड़ी- “भेड़िया मानव हाहाहा, अब आप कहेंगे कि उस धुंध वाले राक्षस की बात भी सत्य है, क्या नाम बताते हैं उसका? हाँ दौदण्ड!”
अनिल मुस्कुराकर बोला- “कमाल है, आज हम ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां इच्छाधारी नागों से लेकर काली मां का रूप धारण की हुई एक स्त्री, सब मौजूद हैं लेकिन हमें एक भेड़िया मानव के अस्तित्व को मानने में समस्या हो रही है!”
प्रोफेसर विक्रम ने जिज्ञासावश अनिल से पूछा- “तो क्या तुमने देखा है उस भेड़िया मानव को?”

अनिल- देखा? अरे उसने मेरी जान बचाई है एक बार। मैं सफर करते करते जंगल में बहुत भीतर चला गया था और एक खतरनाक आदिवासी सभ्यता से मेरा पाला पड़ा, अगर “भेड़िया” उस वक्त मेरी मदद को ना आता तो शायद मैं आज जीप चलाते हुए आपको उसकी कहानियां नहीं सुना रहा होता।
नवीन- वाह! यानी कि उस वेयरवोल्फ ने आपकी जान बचाई?
अनिल- वो कोई वेयरवोल्फ नहीं है, बल्कि सदियों पहले लुप्त हो चुकी भेड़ियामानवों की एक बड़ी सभ्यता का इकलौता जीवित प्राणी है।
सीमा- आपको इतना कुछ कैसे पता?
अनिल- हाहाहा, क्योंकि मैं कहने को फॉरेस्ट ऑफिसर हूँ लेकिन जंगल में सामंजस्य बैठाने का असली काम भेड़िया ने ही किया है। भेड़िया के आने से पहले यहां आए दिन खतरनाक जंगली कबीले के लोग उत्पात मचाये रहते थे, वे कभी कभी शहर में भी घुसकर आतंक मचाया करते थे लेकिन अब सारी परिस्थिति काबू में है।
सीमा- आने से पहले? यानी वो कहीं और से आया है?
अनिल- वो पहले किसी श्राप के कारण पत्थर की प्रतिमा में बदल चुका था लेकिन कुछ वर्ष पहले उसे नागराज ने मुक्त कर दिया, कैसे किया वह मुझे नहीं पता।
नवीन- यूट्यूब पर ऐसी तमाम वीडियो पड़ी रहती हैं जिसमें दुर्गम स्थानों पर ऐसे विलक्षण प्राणियों के होने का ज़िक्र है लेकिन वे सब फर्जी होती हैं तो माफ कीजियेगा फारेस्ट ऑफिसर साहब अगर मैं आपकी बात पर यकीन करने से इंकार कर दूं तो। इच्छाधारी नाग हमारी आंखों के सामने कई बार आये हैं इसलिए हम उनके अस्तित्व पर यकीन कर पाते हैं लेकिन आपका ये भेड़िया कभी असम के शहरी इलाके में भी नहीं गया इसलिए उसके अस्तित्व पर यकीन करना मुश्किल है।
विक्रम- कहीं तुम हमको डराने के लिए कहानियां तो नहीं पका रहे अनिल? अगर ऐसा सच है तो भेड़िया क्या तुम पर क्रोध नहीं करेगा कि तुम शहरियों को उसके बारे में बता रहे हो?
अनिल- भेड़िया ने कभी खुद को छिपाने की कोशिश नहीं की है प्रोफेसर साहब लेकिन उसकी कहानी ही इतनी अविश्वसनीय है कि आपकी तरह मुझे भी यकीन नहीं हुआ था जब मैंने उसके बारे में पहली बार सुना था।
विक्रम- खैर, तुम पहले हमारा काम तो करवाओ। हमें साटी (साइंस एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट) ने यहां भेड़िया की कहानी सुनने के लिए नहीं बल्कि उस खास एनर्जी सिग्नेचर को ट्रेस करने भेजा है जो कि धीरे-धीरे पूरे वातावरण में फैल रही है। साटी के धुरंधर वैज्ञानिक भी पता नहीं लगा पा रहे हैं कि ये किस प्रकार की एनर्जी है लेकिन प्रोफेसर कमलकांत की मेहरबानी से अब हमारे पास ऐसा यंत्र है जो कि इस एनर्जी को ट्रेस कर सकता है, उस यंत्र से हमने जब ऊर्जा को ट्रेस करना शुरू किया तो पता चला कि ये विलक्षण ऊर्जा एक शहर या एक देश में नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैलती जा रही है। हालांकि इस ऊर्जा का कोई प्रत्यक्ष असर अब तक नहीं दिखा है लेकिन यंत्र के अनुसार सबसे सघन ऊर्जा क्षेत्र असम है, यानी कि स्त्रोत यही है। हम लोग असम में पता करने आये हैं कि इस ऊर्जा की उत्पत्ति का कारण क्या है और आने वाले समय में धरती पर इसका क्या असर होगा?
अनिल- ठीक है प्रोफेसर, मैं इस अभियान में आपके साथ हूँ लेकिन मैं जंगल में अधिक भीतर आपके साथ नहीं जाऊंगा, आपकी जान को खतरा हो सकता है।
विक्रम (मुस्कुराकर)- क्यों? आपका भेड़िया हमारी मदद को नहीं आएगा।
अनिल- असम के घने जंगलों में तो चप्पे चप्पे पर खतरा मौजूद है प्रोफेसर साहब, भेड़िया भी हर जगह एक साथ मौजूद नहीं हो सकता।
विक्रम- ओफ्फो, ठीक है भाई लेकिन थोड़ा अंदर तो चलो, तुमने तो प्रवेश करने से पहले ही हाथ खड़े कर दिए।

अनिल ने जीप को जंगल के अंदर घुसा दिया, जीप के कुछ दूर चलते ही उन्हें जंगल में मवेशी चराते कुछ लोग मिले जो कि उन्हें ही घूर रहे थे। उनकी जंगली वेशभूषा देखकर प्रोफेसर विक्रम, नवीन और सीमा घबरा गए।

अनिल- अरे घबराएं नहीं, ये तो कुड़म कबीले के लोग हैं, भोले-भाले और सीधे लोग हैं वरना कुछ कबीले के लोग तो लोगों को देखते ही मारने दौड़ते हैं।
नवीन- आप यहां क्या करने आये हैं?

नवीन के सवाल पूछने से पहले ही एक 14 वर्ष का कबीलाई लड़का जीप के पास आकर खड़ा हो गया।
अनिल- कैसे हो ताड़ी?
ताड़ी- बिल्कुल ठीक अनिल जी, आप बताइए।

लड़के को हिंदी में बात करते देख विक्रम, नवीन और सीमा चौंक गए।
विक्रम- अरे! ये कबीले में रहने वाला लड़का हिंदी जानता है?
अनिल- ताड़ी शहर में एक स्कूल में पढ़ता है, सरकार कबीलेवासियों के लिए समय समय पर कई योजनाएं चलाया करती है लेकिन इसका लाभ वही कबीले उठा पाते हैं जो प्रगति करना चाहते हैं और प्रगति वही कबीले कर पाते हैं जिन्हें भेड़िया अपना सुरक्षा चिन्ह प्रदान करता है।

इतना कहकर अनिल ने एक लकड़ी के मोटे से तख्त की ओर इशारा किया जिस पर बड़ा सा लाल निशान बना था जो किसी भेड़िया के मुख जैसा आभास दे रहा था। उस निशान को देखकर विक्रम, नवीन और सीमा को लगने लगा कि अनिल की बातों में कुछ सच्चाई तो है। अनिल फिर से उस जंगली लड़के से बात करने लगा।

अनिल- जंगल में कुछ गड़बड़ हुई है क्या? तुम लोग परेशान लग रहे हो?
ताड़ी- कल रात कुछ कबीलों से दस बारह लोग गायब हो गए और जब आज सुबह कुछ लोगों को पूरे जंगल में उनकी खोज करने भेजा गया तब जानते हैं उन सबकी लाशें कहाँ मिली?
अनिल- कहाँ?
ताड़ी- “प्रेतों की धरती” पर।

ये सुनकर अनिल चिंतित हो गया। उसे चिंतित देखकर विक्रम ने पूछा-
“क्या हुआ अनिल? ये प्रेतों की धरती क्या है?”

अनिल- प्रेतों की धरती वह जगह है जहाँ असम के जंगल के किसी भी कबीले का कोई भी जंगली कभी नहीं जाता। इंसान तो छोड़िए वहां तो जानवर या परिंदे भी जाना पसंद नहीं करते।
विक्रम- लेकिन क्यों?
अनिल- कहते हैं कि वहां आत्माओं और प्रेतों का प्रबल असर है, वहां के पेड़ भी सूखकर ठूँठ हो चुके हैं, धरती भी बंजर है, हरियाली का नामोनिशान तक नहीं है।
विक्रम- क्या बकवास है? तुम इतने पढ़े लिखे होकर भी इन बकवास बातों को मानते हो?
अनिल- मानता नहीं हूँ लेकिन इस जंगल में चार साल गुज़ारकर मैंने ये सीखा है कि जैसे हम जल्दी ही किसी तरह विश्वास नहीं कर पाते, उसी तरह अविश्वास भी जल्दी नहीं करना चाहिए क्योंकि अविश्वास ही संकट को जन्म देता है।
नवीन- प्रोफेसर, कहीं ये प्रेतों की धरती ही तो नहीं है हमारा लक्ष्य? वह सघन ऊर्जा क्षेत्र?

नवीन का प्रश्न जायज था, इसलिये प्रोफेसर ने अपने पास सीट पर रखे काले बैग से एक विचित्र सा यंत्र निकाला। दिखने में यह यंत्र कैलकुलेटर जैसा था लेकिन इस पर कोई बटन नहीं था, सिर्फ कुछ बत्तियां बनीं हुई थीं।

अनिल- ये कैसा यंत्र है प्रोफेसर?
विक्रम- ये है साटी का ही एक अद्भुत अविष्कार, एनर्जी डिटेक्टर। ये उसी यंत्र का छोटा स्वरूप है जिसे प्रोफेसर कमलकांत ने बनाया है। इस पर जो तुम कई सारी बत्तियां देख रहे हो, ये अलग-अलग प्रकार की ऊर्जाओं को डिटेक्ट करके जलती हैं। अगर किसी स्थान पर कोई ऊर्जा एक विशेष स्तर से अधिक है तभी इस यंत्र का कोई बटन जलता है जैसे कि ये देखो, ये बटन है सोलर एनर्जी डिटेक्टर यानी कि यह सौर ऊर्जा को भांप सकता है। इसकी बत्ती अभी जल रही है क्योंकि हम फिलहाल जंगल के खुले क्षेत्र में हैं जहां सूर्य देवता अपना प्रकोप बरसा रहे हैं लेकिन यदि हम सघन वन क्षेत्र में जाएंगे जहां सूर्य की किरणें नहीं पहुंच पातीं, तो यह बत्ती जलना बंद हो जाएगी। उसी प्रकार से अगर हम इलेक्ट्रिक एनर्जी को डिटेक्ट करने वाली बत्ती तब जलेगी जब हम किसी ऐसी जगह होंगे जहां विद्युत का प्रवाह बहुत अधिक हो। काइनेटिक एनर्जी डिटेक्टर की बत्ती तब जलेगी जब कोई बेहद तीव्र गति को वस्तु इसके आसपास से निकलेगी।
अनिल- वो तो ठीक है लेकिन आप मुझे ये यंत्र क्यों दिखा रहे हैं?
विक्रम- इस यंत्र की विभिन्न बत्तियों में एक अलग बत्ती भी बनी हुई है, इसके नीचे लिखा है “Other energy detector”, अन्य ऊर्जा को डिटेक्ट करने वाला अर्थात ऐसी ऊर्जा को भांपने वाला जिसकी खोज विज्ञान ने अभी तक ना की हो, या जितनी प्रकार के ऊर्जा के स्वरूपों को हम जानते हैं उनसे हटकर कोई ऊर्जा।
अनिल- यानी आप इस यंत्र से उस ऊर्जा को भांपने का प्रयास करेंगे लेकिन जंगल तो बहुत बड़ा है प्रोफेसर, आखिर आप कहाँ-कहाँ भटकेंगे?
विक्रम- कहीं भटकने की ज़रूरत नहीं है अनिल, हम सीधे “प्रेतों की धरती” की तरफ बढ़ेंगे।
अनिल (चौंककर)- क्या? आपने सोच भी कैसे लिया कि मैं आपको उस हिस्से में जाने दूंगा?
विक्रम- तुमने सुना कि उस लड़के ने क्या कहा है अनिल, जंगल के उस हिस्से में निर्दोष जंगली लोगों की लाशें मिली हैं। क्या तुम चाहोगे की इस जंगल में तुम्हारे रहते किसी निर्दोष पर आंच आये? क्या पता कि इस ऊर्जा का कोई संबंध इन सभी हत्याओं से हो? बोलो क्या कहते हो फारेस्ट ऑफिसर अनिल?

विक्रम की बातों ने अनिल को सोचने पर मजबूर कर दिया था, वह दो मिनट रुककर बोला-
“ठीक है, हम उस हिस्से में चलेंगे लेकिन सिर्फ एक निश्चित सीमा तक, उसके बाद ना तो मैं खुद आगे बढूंगा और ना ही आप लोगों को बढ़ने दूंगा।”

नवीन (चहककर)- समझ गए अफसर साहब! अब जीप दौड़ाइये जरा!

अनिल ने दूसरी दिशा में जीप घुमा दी, वे लोग तेजी से प्रेतों की धरती की ओर बढ़ रहे थे लेकिन उन्होंने ध्यान दिया कि जैसे-जैसे वे आगे बढ़ रहे थे, हरियाली खत्म होती जा रही थी और सन्नाटा बढ़ता जा रहा था। अनिल के एक निश्चित स्थान पर ले जाकर जीप रोक दी, वहां ना पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ थी, ना किसी और जानवर के पदचापों की, एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था वातावरण में। उनके सामने ही शुरू हो रही थी प्रेतों की धरती की सीमा, उस धरती पर पेड़ सूखकर ठूँठ हो चुके थे, अनिल ने जीप कुछ फ़ीट पहले ही रोक दी थी।

विक्रम- तो ये है प्रेतों की धरती? इतना तो कुछ खास दिख नहीं रहा यहां?
अनिल- जल्द से जल्द अपना काम करके निकलिये यहां से, मैं भी न जाने क्यों आप लोगों की बात मान रहा हूँ लेकिन ये सब बिल्कुल भी ठीक नहीं है।
सीमा- आप कुछ ज़्यादा ही चिंता करते हैं, हमारा काम कुछ ही मिनट्स का है, हमें बस यहां रुककर उस खास एनर्जी सिग्नेचर को यंत्र द्वारा चेक करना है और साटी को रिपोर्ट भेजनी है।

“हर्ररर” ये दिल दहला देने वाली आवाज़ कहीं से गूंजी, गाड़ी में बैठे सभी लोग शांत हो गए। प्रोफेसर विक्रम में ध्यान दिया कि अन्य ऊर्जा को भांपने वाली बत्ती जल उठी है, यानी कि वे उस खास ऊर्जा के आसपास ही थे।
“हर्रर्रर्रर्रर” इस बार और तेज़ आवाज़ गूंजी, सभी लोग एकदम से सिहर गये, आसपास कोई और नहीं था लेकिन वह आवाज़ तेज़ी से उनके पास आती जा रही थी।

नवीन- अपनी बंदूक तैयार रखिये ऑफिसर अनिल, कोई जानवर इसी तरफ आ रहा है।
अनिल (नवीन को घूरते हुए)- ये तुमको किस जानवर की आवाज़ लग रही है? नहीं, ये कुछ और ही है।

इससे पहले की वे कोई और बात करते, “धम्म” का तेज धक्का जीप को लगा और गाड़ी बस पलटने से बाल बाल बची। जब उन्होंने सामने देखा तो उन्हें अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ, जीप के सामने अचानक से ही एक वीभत्स प्राणी आ खड़ा हुआ था जो कि देखने से ही नरक का प्राणी मालूम होता था। दस फ़ीट का वह लंबा चौड़ा हरी त्वचा और लाल नेत्रों वाला प्राणी अपनी लंबी जीभ लपलपाते हुए उन्हीं को एकटक देख रहा था, उसके नुकीले दांत और पंजे शेर का सीना फाड़ने के लिए भी पर्याप्त थे। किसी के कुछ सोचने समझने से पहले ही वह प्राणी जीप की छत पर चढ़ गया, प्रोफेसर उसकी मंशा भांप गये, वे तेज़ी से चीखकर बोले-
“अनिल, गाड़ी दौड़ाओ! ये गाड़ी की छत को फाड़ने की फिराक में है!”

अनिल ने इस जंगल में कई अजूबे देखे थे लेकिन ऐसी भयानक आकृति उसने भी पहले कभी नहीं देखी थी, प्रोफेसर का कहना मानते हुए उसने जीप को तेज़ी से रिवर्स गियर में लिया और फिर सन्न से आगे की तरफ दौड़ा दी, ये झटका वह प्राणी झेल नहीं पाया और जीप की छत से नीचे गिर गया। अनिल अब पूरी रफ्तार से जीप दौड़ाने के मूड में था, उसने क्लच पर पैर रखा लेकिन जीप आगे बढ़ी ही नहीं। नवीन ने पीछे मुड़कर देखा तो चिल्लाया-
“इस प्राणी ने जीप को पकड़ रखा है!”
लेकिन चेतावनी देने में उसे देर हो गयी थी, तब तक उस प्राणी ने अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग करते हुए जीप को सरकाकर एक पेड़ से टक्कर करा दी। जीप का आगे वाला शीशा टूट गया और अनिल को इतना तेज झटका लगा कि वह उसी टूटे हुए शीशे से बाहर निकल गया। प्राणी ने एक ही झटके से गाड़ी का दरवाजा खोलकर प्रोफेसर को अपने विशाल पंजे की गिरफ्त में ले लिया, नवीन ने प्रोफेसर को बचाना चाहा लेकिन सीमा उसे पकड़कर दूसरे दरवाज़े से बाहर कूद गई। अनिल तुरंत उठ खड़ा हुआ और अपनी बंदूक से उस भयानक प्राणी पर गोलियों की बौछार कर दी लेकिन प्रोफेसर की गर्दन को अपने विशाल पंजे में पकड़े उस प्राणी पर गोलियों का कोई असर नहीं हुआ और ना ही उसने उस तरफ ध्यान देने की कोई ज़रूरत समझी।
उसने अपना विशाल जबड़ा खोला जिससे लार टपक रही थी नुकीले नुकीले तिकोने जैसे दाँतों से उसने चीखते हुए प्रोफेसर के मुँह को गर्दन तक जकड़ लिया। कड़च की आवाज के साथ उसने विक्रम की गर्दन तोड़ दी और तुरंत ही अपने हाथों से उसके धड़ को झिंझोड़कर गर्दन से अलग कर दिया। यह सब इतना अप्रत्याशित हुआ कि प्रॉफेसर विक्रम चिल्ला भी नहीं पाया। धड़ को उसने दूर फेंक दिया और सर उसके मुँह में ही रह गया जिसे वह आराम से चबा चबाकर खाने लगा, खोपड़ी की हड्डी चरमराने की आवाज़ उस प्राणी के मुंह से आई लेकिन उस प्राणी को कोई फर्क नहीं पड़ा, वह प्रोफेसर विक्रम का सिर सख्त खोपड़ी समेत चबा चबाकर खा चुका था। अचानक अलग किये जाने की वजह से धड़ से खून का फव्वारा छूट पड़ा था और कई छटपटाहटों के बाद धड़ भी शांत पड़ चुका था। अब उस प्राणी का ध्यान गया अनिल, नवीन और सीमा की ओर जो प्रोफेसर की वीभत्स मौत देखने के बाद स्तब्ध खड़े थे, वह धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ने लगा। मौत सामने देख नवीन ने सीमा का हाथ पकड़ लिया, वो समझ चुके थे कि भागने का कोई मतलब नहीं, अब अंत निश्चित है।

नवीन- सीमा मुझे तुमसे एक बात कहनी थी।
सीमा- कहो।
नवीन- आई लव यू।

ये सुनते ही सीमा रो पड़ी, फफक कर वह बोली- “पहले नहीं कह सकते थे?”

नवीन (मुस्कुराते हुए)- पहले मौका ही नहीं मिला लेकिन मौत को सामने देखकर हिम्मत आ गयी। मैं तुम्हारे साथ पूरी ज़िंदगी गुज़ारना चाहता था लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

अब तक वह प्राणी अनिल, नवीन और सीमा के एकदम पास पहुंच चुका था। उनके शरीर ने कोई भी हरकत करना बंद कर दिया था, पसीने की बूंदे सबके माथे पर चुहचुहा रही थीं और दिल की धड़कने तेज़ होती जा रही थीं, पास खड़ी मौत को देखकर सबने आंखें बंद कर ली थीं, अब उनके और मौत के बीच में कुछ ही पलों का फासला था। आंखें बंद करने के कुछ क्षण बाद तक जब कुछ नहीं हुआ तो सबसे पहले नवीन ने आंखें खोलीं, फिर सीमा ने और फिर अनिल ने। नवीन और सीमा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि उस प्राणी के विशाल शरीर पर एक मोटी सी पूँछ लिपटी हुई है और वह प्राणी लाख कोशिश करने के बाद भी उस पूँछ से छूट नहीं पा रहा है। अब उस पूँछ ने प्राणी को खींचना शुरू किया, वह उतना ही लाचार नज़र आ रहा था जितना कुछ देर पहले प्रोफेसर उसकी जकड़ में नज़र आ रहे थे। उस प्राणी ने अपने पैर धरती पर जमाये रखने की लाखों कोशिशें की लेकिन उसके पैर और हाथ के नुकीले पंजे धरती पर खरोंच छोड़ने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे थे, पूंछ उसे लगातार खींच रहे थे। अनिल मुस्कुराने लगा था, उसे पता था कि उसका दोस्त उसकी मदद को आ गया है, नवीन और सीमा बेहद हैरान दिख रहे थे जैसे कि उन्हें पता ही ना हो कि चल क्या रहा है। उनकी नज़रें उस पूँछ के धारक पर गयी जो कि कुछ ही दूर एक बड़ी सी शिला पर खड़ा था। ये वही भेड़िया मानव था जिसके बारे में अनिल ने उन्हें बताया था, भेड़िया जैसा स्वरूप, आठ फ़ीट लंबा तरह तरह के आभूषणों में लिपटा हृष्ट पुष्ट शरीर, लहराते हुए बाल उसके व्यक्तित्व को बेहद प्रभावशाली बना रहे थे। चट्टान पर खड़ा जब वह उस प्राणी को अपनी पूंछ से खींच रहा था तो उसके चेहरे पर एक क्रोध था, उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं। एक जानवर जैसा स्वरूप होने के बावजूद भेड़िया एक आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक था। वह प्राणी अब बेहद क्रोध में नज़र आ रहा था, उसने अपनी विशाल भुजाओं का पूरा जोर लगाया और भेड़िया की पूंछ को तोड़कर आज़ाद हो गया। अब उसने भेड़िया की तरफ देखा।

भेड़िया- मेरी पूंछ तो कुछ देर में वापिस आ जायेगी लेकिन तेरे प्राण वापिस कैसे आएंगे?

इतना कहकर भेड़िया ने शिला से छलांग लगा दी जिसपर वह अभी तक खड़ा था, वह प्राणी भी उसकी तरफ दौड़ा। भेड़िया ने हवा में रहते हुए ही उस प्राणी के सिर पर एक खरोंच मारी और दूसरी तरफ कूद गया, प्राणी दर्द से चीखा और वापिस भेड़िया की तरफ भागा। भेड़िया आकार में उस भयानक प्राणी से कुछ कम अवश्य था लेकिन उसकी चपलता और अमानवीय पाशविक शक्ति का सामना करने में उस प्राणी को लोहे के चने चबाने पड़ रहे थे। भेड़िया और वो प्राणी तेज़ी से एक दूसरे की तरफ बढ़े और दोनों ने ही हवा में ऊंची छलांगें लगा दी, भेड़िया ने हवा में ही अपने शरीर के कोण को इस प्रकार से बदला कि उसकी लात सीधे उस प्राणी के जबड़े पर जाकर लगी और उसके कुछ नुकीले दांत जबड़े से अलग होकर हवा में तैरते चले गए। भेड़िया ने कुशलता से वापिस धरती पर पांव जमा दिए जबकि वह प्राणी औंधे मुंह गिरा। भेड़िया की नज़र प्रोफेसर विक्रम की क्षत विक्षत लाश पर पड़ी, वह क्रोधित होकर बोला-
“एक बेगुनाह को इतनी बेदर्दी से मारने का जो निकृष्ट कृत्य तूने किया है उसके लिए मैं भी तुझे तड़पा तड़पा कर मारूँगा, मेरा खुद से वादा है कि तुझे तो मैं मात्र गुरुराज भाटिकी द्वारा सिखाई गयी युद्धकलाओं से ही हराऊंगा। यदि अपनी दैवीय गदा इस्तेमाल करनी पड़े तो लानत है मुझपर!”

अनिल, नवीन और सीमा भौचक्के होकर उस विलक्षण युद्ध को देख रहे थे। नवीन और सीमा ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस व्यक्ति के अस्तित्व पर वे कुछ समय पहले प्रश्नचिन्ह लगा रहे थे, वही आकर उनके प्राणों की रक्षा करेगा। भेड़िया और वो विशाल भयावह प्राणी एक बार फिर आपस में गुत्थमगुत्था हो गए, भेड़िया और उसके पंजे आपस में गुथ गये, अब मुकाबला शारीरिक शक्ति का था। वह प्राणी अद्भुत शक्ति का मालिक था, जल्द ही भेड़िया अपने घुटनों पर आ गया लेकिन उनके हाथ अब भी आपस में गुँथे हुए थे, भुजाएं दोनों की ही फड़कने लगी थीं, उस प्राणी को भी भेड़िया पर हावी होने के लिए अपना पूरा जोर लगाना पड़ रहा था। भेड़िया के मन में एक पल को विचार आया कि काश उसने गदा के प्रयोग के लिए मना न किया होता लेकिन अगले ही पल एक और विचार उसके ज़ेहन में कौंधा-
“तू वुल्फानो का युवराज है, तुझे सबसे अच्छे गुरु का प्रशिक्षण प्राप्त है, तेरी शक्ति तेरा शारीरिक बल नहीं बल्कि आत्मबल है, आत्मबल को सुदृढ कर और दिखा दे इस प्राणी को कि भेड़िया किस मिट्टी का बना पुतला है!”
ये विचार ज़ेहन में कौंधते ही बाजी एकदम से पलट गई अब भेड़िया ने अपने हाथ की कसावट ना सिर्फ बढ़ा दी पर उस प्राणी के बाजुओं को मोड़ दिया, ये गजब का शक्ति प्रदर्शन देखकर अनिल भी भौचक्का रह गया जो भेड़िया को इतने समय से जानता था। भेड़िया के चेहरे पर अब क्रूरता नज़र आ रही थी और वह प्राणी उसके आगे एकदम लाचार, फिर भेड़िया ने अपने शरीर में बसे अमानवीय बल के एक-एक कतरे को इकट्ठा किया और पहले उस प्राणी की उंगलियों को हाथ से ही कडक़दकर तोड़ दिया। एक भयंकर रूह तक को कंपा देने वाली चीख ने वातावरण को भयभीत कर दिया। अभी ये दर्द खत्म भी नहीं हुआ था कि अचानक भेड़िया ने अद्भुत ताक़त का परिचय देते हुए उस प्राणी के दोनों हाथों को उसके शरीर से अलग कर दिया। एक और ऐसा रूह को कंपा देने वाला रुदन गूंजा की अनिल, नवीन और सीमा को अपने कान बंद कर लेने पड़े। भेड़िया उसके हाथों को एक तरफ फेंकने के बाद भेड़िया विजयी मुस्कान लिए उस प्राणी के नजदीक पहुँचा और भेड़िया ने अपने नुकीले पैने नाखूनों से एक झटके से उस प्राणी की गर्दन पर सुराख बना दिया और उसकी गले की हड्डी एक झटके में शरीर से आज़ाद कर दी। इससे रक्त का एक फव्वारा छूट पड़ा जो धरती पर फैल गया और वह भयानक प्राणी कुछ ही समय में धरती पर ढेर हो गया। उसके ढेर होने के बाद भी भेड़िया ने अपने पैरों से उसके शरीर को टटोलकर उसमें जीवन के अंश ढूंढने का प्रयास किया लेकिन वह प्राणी मर चुका था। फिर भेड़िया अनिल की तरफ पलटा।

अनिल- अच्छा हुआ तुम आ गए भेड़िया वरना हमारा हश्र भी प्रोफेसर विक्रम जैसा होता।
भेड़िया- उफ्फ, अगर कुछ देर पहले मैं आ गया होता तो शायद एक भीषण दुर्घटना घटने से बचा लेता।
अनिल- लेकिन तुम्हें कैसे पता चला भेड़िया कि हम प्रेतों को धरती के पास हैं?
भेड़िया- कुड़म कबीले के लोगों ने मुझ तक नगाड़ा बजवाकर ये संदेश पहुंचाया कि कुछ शहरी लोग प्रेतों की धरती का पता पूछ रहे थे। मुझे कुछ ठीक नहीं लगा तो तुरंत इस ओर चला आया।
अनिल- गलती मेरी ही है, मुझे कभी इन लोगों को प्रेतों की धरती पर लेकर ही नहीं आना चाहिए था।
भेड़िया- लेकिन आप लोग यहां करने क्या आये हैं?

नवीन और सीमा जो अभी तक आंखें फाड़ फाड़कर भेड़िया को देख रहे थे, उन्होंने तुरंत अपने मिशन के बारे में जल्दी-जल्दी भेड़िया को बता दिया।

भेड़िया- ओह! यानी कि आप लोग एक विशेष ऊर्जा के पीछे यहाँ असम तक आये और यहाँ प्रेतों की धरती पर आपका-सामना इस जीव से हो गया। ये संयोग तो नहीं हो सकता, अवश्य इन घटनाओं का आपस में कुछ संबंध है, ये प्राणी भी कोई जंगल में मिलने वाला साधारण प्राणी तो था नहीं। ये कल जंगल में हाल ही में हुई हत्याओं का ज़िम्मेदार था, यानी कि ये भी किसी दूसरे स्थान से जंगल में आया है और इसे आये हुए ज़्यादा वक्त नहीं हुआ वरना ऐसा खूंखार प्राणी तो जंगल में तहलका मचा देता।
नवीन- हमें तुरंत साटी जाकर रिपोर्ट करना होगा। उफ्फ, मुझे अब तक यकीन नहीं हो रहा है कि प्रोफेसर विक्रम इतनी भयानक मौत मरे हैं।
अनिल (जीप के पास जाकर)- जीप तो फिलहाल चलने की हालत में लग रही है। मुझे तो लग रहा था कि इसका बोलो राम हो गया लेकिन आगे वाला कांच फूटने और दरवाजा टूटने के अलावा इसके चलने में कोई दिक्कत नहीं है।
भेड़िया- हाँ अनिल, इन्हें जंगल से बाहर ले जाओ, ये जगह फिलहाल खतरे से खाली नहीं…

भेड़िया का वाक्य पूरा होने से पहले ही एक साथ कई खून सूखा देने वाली आवाज़ें गूंजी “हर्रर्रर्रर्रर”, सभी ने मुड़कर देखा तो उस प्राणी जैसे दिखने वाले लगभग चार पांच प्राणी उनकी ओर ही बढ़ते चले आ रहे थे। उन्हें देखकर भेड़िया बोला-
“अनिल, तुरंत इन लोगों को जीप में बैठाओ और यहां से निकलो, मैं इन्हें संभालता हूँ।”

अनिल- लेकिन भेड़िया, तुम्हें छोड़कर…..
भेड़िया (बात बीच में काटकर)- जैसा कहा गया वैसा करो अनिल, इन दो निर्दोष लोगों को बचाना भी ज़रूरी है।

अनिल भी समझ चुका था कि उसके करने लायक ज़्यादा कुछ बचा नहीं था इसलिए वह नवीन और सीमा को लेकर जीप की तरफ भागा। वे विचित्र प्राणी अब तक भेड़िया के काफी पास आ चुके थे, भेड़िया एक दीवार की तरह उनके सामने खड़ा था, वह मुस्कुराया और बोला-
“अब आएगा असली मजा, हे भेड़िया देवता मदद!”
इतना बोलते ही उसके हाथ में चमत्कारी ढंग से गदा प्रकट हो गयी, वह प्रलयंकारी गदा को लेकर उन प्राणियों से भिड़ गया। भेड़िया ने उनके पास आते ही इतनी तीव्रता से गदा को घुमाया की गदा उन दो प्राणियों के शरीर पर पड़ते ही वो दूर जा गिरे। गदा के सामने उन खूंखार प्राणियों की कोई बिसात ही नहीं लग रही थी, गदा के प्रचंड वार से भेड़िया ने एक साथ दो प्राणियों की खोपड़ी चटका दी। एक प्राणी ने उसपर पीछे से वार करने की सोची लेकिन वह भेड़िया की पूंछ की गिरफ्त में आ गया और एक झटके से वो प्राणी भेड़िया के सामने था जिसे भेड़िया ने गदा के एक वार से ही उसके पेट मे सुराख कर दिया और फच्चाक कि आवाज से खून का फव्वारा छूट पड़ा और प्राणी के प्राण पखेरू उड़ गए। दो प्राणी और बचे थे, अब तक अनिल जीप लेकर काफी दूर निकल गया था लेकिन भेड़िया का उस तरफ ध्यान नहीं था, वह उन दो प्राणियों का हश्र भी उनके साथियों जैसा करने के लिए आगे बढ़ा को तभी उसने देखा कि दोनों प्राणियों की गर्दन किसी तंत्र ऊर्जा के घेरे में जकड़ी जा रही थीं। भेड़िया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उसने देखा कि वे तंत्र किरणें तांत्रिक इरी और प्रेत जैकब के हाथों से निकल रही थीं। उन्होंने अपने हाथों को ज़रा सा झटका दिया और उन जीवों का सिर धड़ से ही अलग हो गया, अब उन विचित्र जीवों की लाशें धरती पर पड़ी हुई थीं। भेड़िया अपने मददगारों की तरफ बढ़ गया।

भेड़िया- तांत्रिक इरी और प्रेत जैकब? आप लोग यहां असम के जंगलों में? ओह, यानी कि इस पूरे मामले को मैं जितना साधारण समझ रहा हूँ ये इतना साधारण है नहीं।
इरी- असम के जंगलों में तो हमें एक वर्ष पूरा होने वाला है, हमारा निवास स्थल ये प्रेतों की धरती ही तो है इतने समय से।
भेड़िया (हैरानी से)- क्या? आप इतने लंबे समय से यहां हैं? लेकिन क्यों?
जैकब- बहुत बड़ा अनर्थ होने वाला है भेड़िया, इस बार पूरे ब्रह्मांड का अस्तित्व खतरे में है।
भेड़िया- क्या? भला ऐसा क्या होने वाला है?
इरी- अभी जिन प्राणियों से तुम भिड़े हो, जानते हो कि वे कहां से आये हैं? “पाप क्षेत्र” से। ये तो बेहद निम्न कोटि की तामसिक शक्तियों वाले प्राणी थे लेकिन पाप क्षेत्र के द्वार को बंद न किया गया तो उसमें कैद अतिभीषण शक्तियों को आजाद होने में समय नहीं लगेगा और फिर उन्हें मैं और तुम तो क्या, समस्त देवतागण मिलकर भी नहीं रोक पाएंगे।

इधर नागद्वीप में-

नागद्वीप का राजमहल वाकई बहुत भव्य था, सबसे पहले तो तीन सौ सीढियां पार करके एक विशाल बरामदा आता था जहां मनमोहक बाग बगीचे और फव्वारे लगे हुए थे। इसी स्थान पर सबसे अधिक सुरक्षा प्रहरी भी तैनात किए गए थे। फिर आता था महल का मुख्य द्वार जो कि लोहे का बना था, जिसपर सुंदर नक्काशियों से बने दो नाग थे जो कि एक-एक द्वार पर बने थे और द्वार के नीचे से होकर ऊपर तक लहराकर बने हुए थे। द्वार के भीतर एक बड़ा सा सभागार था जहां पहले सम्राट मणिराज और उनके निधन के बाद साम्राज्ञी विसर्पी ने शासन की बागडोर सँभालकर नागद्वीप के हितों के बेहतरीन योजनाएं बनाई थीं, सभागार के पीछे वाले हिस्से में था- पूजागृह और दूसरी मंजिल पर था राजपरिवार का निवास स्थल जहां बड़े-बड़े शयन कक्ष बनाये गए थे। निवास स्थल के बाद तीसरी मंजिल पर एक विशाल छत थी जहां से समस्त नागद्वीप को देखा जा सकता था। राजमहल नागद्वीप के एकदम बीचों-बीच बना हुआ था और पूरे नागद्वीप के सबसे अधिक क्षेत्रफल (एरिया) में विस्तृत और सबसे अधिक ऊंची इमारत का दर्जा भी इसी को प्राप्त था। विसर्पी और नागराज छत पर ही खड़े थे, तेज़ हवाएं चल रही थीं जिससे विसर्पी के लंबे केश लहरा रहे थे।

नागराज- अब मैं नायक नहीं रहा विसर्पी, मेरे बारे में इतना सब कुछ सुनने के बाद अगर तुम भी मुझसे रिश्ता खत्म करना चाहती हो तो मैं समझ सकता हूँ।

विसर्पी ने नागराज के गाल पर प्यार से हाथ फेरकर कहा-
“तुमने सोच भी कैसे लिया कि इतने मुश्किल वक्त में मैं तुम्हारा साथ छोड़कर तुमसे मुँह मोड़ लूंगी? तुम मेरी नज़रों में एक नायक थे और वही रहोगे।”

नागराज- कैसा नायक हूँ मैं जिसने एक नायक की जान ले ली?
विसर्पी- तो क्या स्टील की गलती नहीं थी? क्या वो तुम्हारी इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार नहीं है? उसे सिर्फ उसके कर्मों की सज़ा मिली है नागराज लेकिन सबसे खुशी की बात ये है कि अब तुम हमेशा के लिए नागों के बीच आ गए हो, अपनों के बीच आ गए हो।
नागराज- लेकिन अब मेरे जीवन का क्या उद्देश्य होगा विसर्पी? आखिर क्या करूँगा मैं यहाँ?
विसर्पी- वही जो मैं हमेशा से चाहती थी, मुझसे विवाह करो और नागद्वीप का सिंहासन संभालो।
नागराज- क्या? नहीं विसर्पी, सिंहासन पर विषप्रिय के बाद सिर्फ तुम्हारा ही हक है, मैं इस सिंहासन को स्वीकार नहीं कर सकता।
विसर्पी- ये मैं तुम पर किसी प्रकार का उपकार नहीं कर रही बल्कि एक साम्राज्ञी की हैसियत से ही कह रही हूँ। तुम्हारी प्रचंड शक्ति का नमूना सभी नाग न्यायालय में देख चुके हैं, तुम्हारे जैसी महाशक्ति अगर हमारी तरफ़ होगी तो नागद्वीप पर किसी की भी बुरी नज़र नहीं उठेगी। अगर तुम वाकई नागद्वीप का कुछ उद्धार करना चाहते हो तो मेरी बात मान लो नागराज, बन जाओ नागद्वीप के नागसम्राट।
नागराज- ठीक है, यदि इच्छाधारी नागों की भलाई इसी में निहित है तो मैं ये कदम भी उठाने को तैयार हूं।

वो वार्तालाप कर ही रहे थे कि छत पर पंचनाग आ पहुंचे। नागराज ने हैरानी से विसर्पी की तरफ देखा।

विसर्पी (मुस्कुराकर)- इन्हें मैंने बुलाया है, मुझे लगा मुसीबत के इस वक्त में तुम्हें दोस्तों की ज़रूरत होगी।

नागराज तुरंत अपने बचपन के मित्रों के गले जा लगा।

सिंहनाग- सँभलकर मित्र, सुना है काफी बलशाली हो गए हो, नागाधीश का गर्भीरा धातु द्वारा निर्मित हथौड़ा भी उठा लिया।
नागप्रेती- काश वो दृश्य हम अपनी आंखों के सामने देख पाते, न जाने कहाँ व्यस्त थे हम भी।
सर्पराज- हमें खुशी है नागराज कि तुम नागद्वीप में बसने के लिए आ गए हो।
नागदेव- बाहरी दुनिया में जाकर तो तुम हमें भूल ही गये मित्र।
नागराज- मैं बता नहीं सकता कि तुम लोगों को देखकर मैं कितना खुश हूं, पिछले कुछ दिन मेरे जीवन के सबसे मुश्किल दिन साबित हुए हैं।
नागार्जुन (विसर्पी की तरफ देखकर)- जैसा कि आपका आदेश था, सारे अधिपतियों को सभागार में बुला लिया गया है नाग साम्राज्ञी।

ये सुनकर नागराज ने कौतूहल से विसर्पी की तरफ देखा-“सभी नाग प्रजातियों के अधिपति? अधिपति तो तुम्हारे यानी नागद्वीप के सम्राट अथवा साम्राज्ञी के नीचे रहकर अपनी-अपनी प्रजातियों का नेतृत्व करते हैं लेकिन सभी अधिपति एक साथ बहुत कम बार देखे गए हैं, ऐसी क्या परिस्थिति आ गयी?”
विसर्पी चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाकर बोली- “सोचा कि तुम्हें सम्राट घोषित करने के लिए राज्याभिषेक करने का इससे अच्छा अवसर भला क्या होगा?”
ये सुनकर नागराज की आंखें चौड़ी हो गयीं, वह बोला- “अभी? ये कुछ ज़्यादा ही जल्दी नहीं है विसर्पी?”

विसर्पी- जल्दी? ये काम तो जितनी जल्दी हो जाये उतना बेहतर, नागद्वीप को तुम्हारे शासन की ज़रूरत है नागराज।
नागार्जुन- साम्राज्ञी ठीक ही कह रही हैं नागराज, पिछले दिनों तुमने खुद देखा कि इच्छाधारियों का रोष कितना अधिक बढ़ गया था, हम पंचनाग खुद नागद्वीप में कई जगह दंगे जैसी स्थिति काबू करके आये हैं। तुम अगर यहां रहोगे तो वो सब अराजकतत्व काबू में रहेंगे।

नागराज कुछ बोला नहीं, वह पंचनागों और विसर्पी के साथ सभागार की तरफ बढ़ गया। विशाल सभागार में सभी अधिपति अपनी अपनी आलीशान कुर्सियों पर विराजमान थे, नागसाम्राज्ञी विसर्पी का विशाल सिंहासन इधर उधर बैठे अधिपतियों के एकदम सामने था और साम्राज्ञी के साथ वाले तख्त पर बैठे थे महात्मा कालदूत। पंचनाग और नागराज विसर्पी के सिंहासन से कुछ ही दूरी पर खड़े थे।

विसर्पी- जैसा कि आप सभी को ज्ञात है कि एक मानव ने कुछ समय पहले एक इच्छाधारी नाग अपराधी की हत्या कर दी थी जिसके कारण कुछ अराजकतत्वों ने अशांति फैला दी थी। नागाधीश को भी कुछ सख्त कदम उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा और नागराज को यहां बुलाना पड़ा लेकिन फिर स्थिति और खराब होती गयी और इस मामले में मेरे हस्तक्षेप की आवश्यकता बढ़ती गयी। हालात कुछ सुधरे हैं लेकिन प्रश्न ये है कि ऐसी घटना क्या आगे नहीं दोहराई जा सकती? क्या एक बार फिर नागद्वीप के चंद असामाजिक तत्व शांति में व्यवधान नहीं डाल सकते? बिल्कुल, ऐसा होकर ही रहेगा क्योंकि शायद मेरा शासन इतना सक्षम नहीं है कि उनकी बढ़ती निरंकुशता को रोक सके।

विसर्पी की बात सुनकर शांत सभागार में खुसुर-पुसुर शुरु हो गयी, तभी महात्मा कालदूत की आवाज़ ।

“शांत हो जाइए!”
फिर उन्होंने विसर्पी की ओर देखकर कहा- “तुम कहना क्या चाहती हो पुत्री? थोड़ा साफ शब्दों में कहो।”

विसर्पी कुछ क्षण खामोश रही, सब लोग सांस थामे उसके बोलने का इंतज़ार कर रहे थे। फिर वह चुप्पी तोड़ते हुए बोली- “नागराज ने अब मानवों की दुनिया का त्याग पूरी तरह से कर दिया है और वह हमारे साथ ही रहने की इच्छा रखता है। ये कोई छुपी बात नहीं है कि मैं नागराज की मंगेतर हूँ लेकिन अभी तक मानवता की रक्षा औए ब्रह्मांड रक्षकों को लेकर वह इतना व्यस्त था कि हम कभी विवाह के बंधन में बंधने का विचार ही नहीं कर पाए लेकिन आज मैं आप सबके सामने विश्वरक्षक नागराज के सामने विवाह का प्रस्ताव फिर से रखती हूं।”

एक पल को सभी खामोश रहे लेकिन उसके अगले ही पल तालियों की गड़गड़ाहट और हर्षोल्लास से पूरा सभागार गूंज उठा, सबसे अधिक प्रसन्न थे महात्मा कालदूत क्योंकि जैसा वो वर्षों से चाहते थे वैसा ही हो रहा था। हालांकि उनमें से कुछ चेहरे ऐसे भी थे जो इस अप्रत्याशित निर्णय से चकित नज़र आ रहे थे, ऐसा ही एक चेहरा था जल में रहने वाले अतिप्राचीन जलसर्प प्रजाति नीरनागों के अधिपति महाव्याल का, उन्होंने अपना हाथ उठाया जिसका अर्थ था कि उन्हें इस निर्णय से आपत्ति है। सारी नज़रें महाव्याल की तरफ घूम गयीं।

विसर्पी- हाँ कहिये महाव्याल, क्या आपत्ति है आपको?
महाव्याल- नागसाम्राज्ञी, मेरी आपत्ति बस इतनी है कि जो व्यक्ति मानवों के लिए एक बार नागद्वीप को छोड़ चुका हो और दोबारा भी ऐसा कर सकता हो, क्या उसे सम्राट बनाना सही है?
विसर्पी- मैंने सम्राट बनाने की बात तो की ही नहीं श्रीमान।
महाव्याल- नहीं की क्योंकि ये तो पहले से ही सर्वविदित है कि साम्राज्ञी जिससे विवाह करेगी उसके हाथ में अपने आप आपके समान राजकीय अधिकार आ जाएंगे लेकिन मैं ये कहना चाहता हूँ कि नागराज के सम्राट बनने के बाद यदि उनका झुकाव फिर से मानवजाति की ओर बढ़ा तो क्या होगा?

सभागार में मौजूद अधिपति फिर से एक दूसरे का मुंह ताकते रह गए, महाव्याल की बात में दम था। विसर्पी कुछ बोलना चाह ही रही थी कि इस बार नागराज ने सामने आकर जवाब दिया- “मैं यहां उपस्थित सभी अधिपतियों, महात्मा कालदूत, नागसम्राज्ञी विसर्पी और अपने मित्र पंचनागों के सामने ये शपथ लेता हूँ कि यदि आने वाले समय में मैंने यदि इच्छाधारियों के अलावा किसी और के हित की सोची भी तो आप लोगों को पूरा हक है मुझे सम्राट के पद से ही नहीं बल्कि अपने समाज से भी पूरी तरह निष्कासित करने का! अब मैं नहीं समझता कि मैं इससे बड़ी बात कह सकता हूँ।”

महाव्याल- ठीक है नागराज, यदि ऐसा है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन साम्राज्ञी विसर्पी से विवाह करने से पहले आपका राज्याभिषेक हो जाये तो बेहतर रहेगा। हमें भी उत्सुकता है रक्षक नागराज को नागसम्राट के रूप में देखने की लेकिन उससे पहले आपको एक छोटा सा नियम याद दिलाना चाहूंगा। यदि राज परिवार के सदस्यों के अलावा कोई और व्यक्ति सम्राट बनने की इच्छा जाहिर करता है तो कोई आपत्ति नहीं है, बस उसे ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली इच्छाधारी सर्प से युद्ध करके उसे पराजित करना होगा, और काफी समय आए ये तमगा महात्मा कालदूत के पास है।

ये सुनकर सभी चौंक गए लेकिन यही सत्य था, राज परिवार से बाहरी व्यक्ति को सम्राट बनाने की यही प्रक्रिया थी, एक बार फिर सभागार में खुसुर-पुसुर शुरू हो गयी। नागराज ने क्रोधित होकर बुलन्द आवाज़ में कहा-
“यदि ऐसा है तो नहीं चाहिए मुझे राजसिंहासन जो मुझे मेरे पिता समान व्यक्ति को पराजित करके मिले!”
कालदूत एकदम से चौंक गए, उन्हें वर्षों से संजोया सपना टूटता सा दिखा, वे उठकर नागराज से बोले- “नहीं नागराज, अगर नियम ये है तो फिर यही सही, मैं तुमसे लड़ूंगा और पूरी ताकत से लड़ूंगा और कसम है तुम्हें अगर तुमने मुझे सामने देखकर अपने वारों में कोई कमी आने दी तो। महात्मा कालदूत अब अपना योद्धा रूप धारण करेगा और महात्मा कालदूत से तुम एक बार को रहम की उम्मीद कर सकते हो लेकिन योद्धा कालदूत से नहीं।”

इतना कहते ही कालदूत के शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन आने लगे, उनके शरीर का तेज बढ़ता ही चला गया, वहां उपस्थित सभी लोगों को अपनी आंखें बंद कर लेनी पड़ीं और जब कुछ क्षण बाद तेज कम हुआ तो कालदूत की वेशभूषा पूरी तरह से बदल चुकी थी। कालदूत के तीनों शरीरों पर स्वर्ण कवच आ चुके थे और तीनों रूप बेहद खूंखार दिख रहे थे। नागराज ने भी अपनी मुट्ठियाँ कस ली थीं, वह विशाल सभागार अब द्वंद का मैदान नज़र आ रहा था। सभी लोग एकदम दूर दूर हट गए थे ताकि इस द्वंद से उन्हें कोई शारीरिक क्षति न पहुंचे। महाव्याल चीखकर बोले-
“अब शक्ति परीक्षण आरंभ किया जाए!”
नागराज और कालदूत की नज़रें एक दूसरे पर टिकी थीं, दोनों धीरे-धीरे एक गोलाकार परिधि में इर्द गिर्द घूमने लगे, दोनों ही इंतज़ार में थे कि पहला वार कौन करेगा। अचानक ही कालदूत ने अपने शक्तिशाली दुम से नागराज के शरीर पर वार किया, नागराज उछलकर एक बड़े से खंबे से जा टकराया और धरती पर गिर पड़ा लेकिन फिर उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गयी। वह हाथों की धूल झाड़कर उठ खड़ा हुआ और बोला-
“बहुत समय बाद किसी से अच्छे द्वंद की उम्मीद है वरना इन नई शक्तियों के बाद लड़ाई में आनंद आना बंद हो गया था।”
अब नागराज तेजी से उड़ता हुआ गया और कालदूत को जाकर एक जोरदार टक्कर जड़ दी, कालदूत जमीन पर घिसटते चले गए। ये देखकर बाकी लोग काफी हैरान हो गए, उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कालदूत को टक्कर देने वाली शक्ति पृथ्वी पर मौजूद हो सकती है लेकिन पहले कभी किसी ने गर्भीरा धातु से निर्मित हथौड़ा भी नहीं उठाया था इसलिए कुछ भी संभव था। नागराज कालदूत के संभलने से पहले ही उनकी तरफ तेज़ी से बढ़ा लेकिन कालदूत ने बिना समय गंवाये तेज़ी से कालसर्पी को नागराज की ओर फेंका, कालसर्पी ने नागराज के पास जाकर उसके शरीर को बुरी तरह जकड़ लिया, तेज़ी से आगे बढ़ता नागराज धरती पर औंधे मुंह गिर पड़ा।

कालदूत- तुम अब कालसर्पी की कैद में हो नागराज, इस कैद से तो देवताओं तक का छूटना असंभव है, तुम भला कैसे छूटोगे?

नागराज को कालदूत की बात सही लग रही थी क्योंकि पूरी ताकत लगाने कर बाद भी वह उस कैद से छूट नहीं पा रहा था।

नागराज- उफ्फ! ये भला कैसे संभव है? ये पतला सा अस्थियों से निर्मित सर्प मुझे बांधे कैसे रख पा रहा है?
कालदूत- तुम बाहुबल का प्रयोग करके कालसर्पी से छुटकारा नहीं पा पाओगे नागराज क्योंकि इसे भीषण तंत्र मंत्र की शक्तियों से बनाया गया, तुम बाहुबल में शायद मुझसे भी दुगुने हो चुके हो लेकिन ऐसे जटिल तंत्र बंधन से मात्र बाहुबल का प्रयोग करके नहीं निकला जा सकता।
नागराज- ठीक है महात्मन, अब मैं इच्छाधारी कणों में बदलकर यहां से निकलूंगा।

नागराज इच्छाधारी कणों में बदल गया लेकिन फिर भी कालसर्पी के बंधन से नहीं छूटा, मजबूरन उसे जल्द ही अपने सामान्य रूप में वापिस आना पड़ा।

कालदूत- इच्छाधारी कणों में बदलने की कोशिश व्यर्थ है नागराज, जब तक कालसर्पी का स्पर्श तुम्हारे शरीर से है, तुम इससे नहीं छूट पाओगे। कालसर्पी को ऐसे ही ब्रह्मांड के सबसे जटिल तंत्र बंधनों में से एक नहीं माना जाता, सदियों पहले बड़े बड़े मायावी असुरों को मैंने इसके द्वारा कैद किया है। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई इसकी जकड़ से छूट गया हो।

विसर्पी के साथ साथ सबकी सांसें थम गई थीं, नागराज के उस बंधन से निकलने की उम्मीद न के बराबर लग रही थी। नागराज भी मन ही मन सोच रहा था- “लगता है मुझे हार माननी ही होगी, लेकिन…. एक मिनट! महात्मा कालदूत ने अभी कहा कि जब तक मेरे शरीर का संपर्क कालसर्पी से है, मैं इस कैद से स्वतंत्र नहीं हो सकता लेकिन यदि संपर्क खत्म कर दिया जाए तो? लेकिन कैसे? इस कालसर्पी ने इतनी मजबूती से मेरे शरीर को जकड़कर रखा है कि मैं केंचुली भी नहीं छोड़ सकता और पूरा ध्यान केंद्रित करने के बाद नागरूप में भी नहीं बदल पा रहा।”
“तो विचार तरंगों का प्रयोग करो नागराज!”
नागराज के मास्तिष्क में एक आवाज़ गूंजी।
नागराज ने भी मन ही मन बोला- “अरे! कौन है जो मेरे विचारों को भी पढ़ पा रहा है?”
नागराज के मस्तिष्क में फिर एक आवाज़ गूंजी- “हम देव कालजयी द्वारा दिये गए विशेष नागफनी सर्प हैं नागराज, हम तुमसे मानसिक संपर्क द्वारा बात कर रहे हैं।”
नागराज अब ध्यान से नागफनी सर्पों की बातें सुन रहा था- “तुम क्या सुझाव देना चाहते हो नागफनी सर्प?”
नागफनी सर्प बोले- “तुम हमारी एक शक्ति ध्वंसक सर्पों से अभी तक परिचित हो लेकिन अब वक्त आ गया है कि तुम हमारी दूसरी विशेष शक्ति से भी परिचित हो जाओ। हम तुमको विशेष तिष्क सर्प से परिचित करवाना चाहते हैं।”
नागराज चौंक गया, उसने मन ही मन पूछा- “ये तिष्क सर्प क्या है?”
नागफनी सर्पों ने जवाब दिया- “तिष्क सर्प तुम्हारे मास्तिष्क से लिपटकर तुम्हारी मानसिक ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देगा, इस प्रकार से तुम्हारा शरीर तो कैद रहेगा लेकिन तुम्हारा मानस रूप आज़ाद हो जाएगा। उसके लिए तुमको पहले हमें अपने शरीर से बाहर निकालना होगा।”
नागराज ने अपनी कलाई सीधी की जिसमें से एक नागफनी सर्प बाहर आ गया, उसे देखकर कालदूत बोले- “कोई फायदा नहीं है नागराज! देव कालजयी के नागफनी सर्प भी इस बंधन को काट नहीं पाएंगे।”
नागफनी सर्प नागराज के सिर की ओर गया और अपना मुँह खोलकर छोटे से तिष्क सर्प को बाहर निकाला, वह तिष्क सर्प नागराज के माथे से जाकर लिपट गया और पलक झपकते ही नागराज का मानस रूप अपने शरीर से बाहर निकल आया, सब लोग ये देखकर एकदम भौचक्के रह गए। नागराज का मानस रूप बोला- “आपने सही कहा था कालदूत कि लाख कोशिश के बाद भी मेरा शरीर उस विलक्षण बंधन से आज़ाद नहीं हो पाता इसलिये मैंने अपने मानस रूप को बाहर निकाल दिया।”

कालदूत ने नागराज के मानस रूप पर मुष्टि प्रहार करने की कोशिश की लेकिन उनका हाथ आरपार निकल गया लेकिन मानस नागराज के स्पर्श मात्र ने कालदूत की बांह को बुरी तरह जला दिया। कालदूत ने तीनों रूपों ने एक साथ प्रचंड तांत्रिक ऊर्जा का वार किया लेकिन वह ऊर्जा वार नागराज के मानस रूप के आरपार चला गया। मानस रूप ने अपने सिर से कालदूत के सिर पर वार किया, दिमाग पर किया वार कालदूत झेल नहीं पाए और नीचे गिर पड़े। मानस नागराज ये देखकर विचलित हो उठा, वह चिल्लाया- “महात्मन! आप ठीक तो हैं?”
कालदूत गिरे हुए ही मुस्कुराकर बोले- “बिल्कुल मेरे बच्चे, मेरी दिली तमन्ना थी कि तू मुझे हराये, तूने साबित कर दिया कि तू नागसम्राट बनने के पूर्णतयः योग्य है, मैं तेरे शरीर को कालसर्पी की कैद से आज़ाद करता हूँ।”
इतना कहकर कालदूत ने कालसर्पी नागराज के शरीर से हटा लिया और मानस रूप तेजी से नागराज के शरीर में प्रवेश कर गया। नागराज दौड़कर कालदूत के गले मिला और सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। विसर्पी के चेहरे की खुशी अलग से ही दिख रही थी।

नागराज- आप पर वार करने के लिए क्षमा चाहता हूँ।
कालदूत- नहीं नागराज, तुम नहीं जानते कि तुमने कितने मुँह एक साथ बंद कर दिए हैं। मेरी वर्षों की तमन्ना आज पूरी हो गई।

उन तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कुछ शोर भी शामिल हो गया जो कि सभागार के बाहर से आ रहा था। सबने देखा कि नाग प्रहरियों से धक्का मुक्की करते हुए लंगारा जाति के इच्छाधारी सर्प अपने अधिपति महाबली युद्धक के नेतृत्व में अंदर घुसते चले आ रहे थे। उनको देखकर बाकी सभी अधिपतियों की सांसें तेज हो गईं क्योंकि लंगारा जाति को कई प्रकार के अपराधों में लिप्त होने के कारण समाज से अलग थलग ही रखा जाता था। अंदर घुसते ही युद्धक चीखा- “ठहरो इस मानव से विसर्पी की शादी नहीं हो सकती! हम इसके विरुद्ध हैं!”

कालदूत ने आगे आकर पूछा- “क्या हुआ महाबली युद्धक? तुम्हें भला नागराज के नागसम्राट बनने से क्या आपत्ति है? इसने मुझसे लड़कर अपने आपको सम्राट पद के सर्वथा योग्य सुनिश्चित कर लिया है।”

युद्धक- इसने ऐसा किया होगा महात्मन! मैं मानता हूँ कि राज परिवार के अतिरक्त कोई भी बाहरी इच्छाधारी सर्प इस प्रक्रिया से गुजरकर नागद्वीप का सम्राट बन सकता है लेकिन नागराज कोई इच्छाधारी सर्प नहीं बल्कि एक मानव है जिसके पास सर्प शक्तियां हैं, इस पर इच्छाधारियों का कोई भी नियम लागू नहीं हो सकता। तुम क्यों चुप हो महाव्याल! यहां पर आने से पहले तो बड़ी डींगे हांक रहे थे कि नागराज को किसी भी कीमत पर सम्राट नहीं बनने दोगे, अब क्या हुआ?

युद्धक की बात सुनकर पीछे खड़े महाव्याल बगलें झांकने लगे। युद्धक आगे बोला- “खैर, कोई बात नहीं। मैं और सम्पूर्ण लंगारा जाति इस फैसले के सख्त खिलाफ हैं और यदि नागराज सम्राट बनता है तो नागद्वीप में खून की नदियां बह जाएंगी, इसे मेरी चेतावनी समझो!”

अब नागराज से नहीं रहा गया, वह तुरंत युद्धक के पास पहुंचा और उसे एक घूंसा रसीद किया। युद्धक कई फ़ीट पीछे सरक गया, उसके मुंह से खून निकलने लगा था। वो क्रोध से भरकर अपनी पीठ पर टिका एक गंडासा हाथ में लेकर नागराज की तरफ बढ़ा, वह क्रोध से भरकर बोला- “निकृष्ट मानव! तेरी इतनी हिम्मत की तू युद्धक पर वार करे! तुझे तो मैं अभी मजा चखाता हूँ!”
उसने गंडासे का भरपूर वार नागराज पर किया लेकिन नागराज के शरीर पर खरोंच तक नहीं आयी, नागराज ने उसके हाथ में थमा गंडासा छीना और अपने हाथों से टुकड़े टुकड़े कर दूर फेंक दिया। फिर उसने युद्धक को एक प्रचंड लात मारी जिससे वह दूर जाकर गिरा, धरती पर गिरते ही युद्धक की कई हड्डियां चटकने की आवाज़ सुनाई दी, लंगारा प्रजाति के बाकी सर्पों में दहशत फैल गई।
नागराज उनकी तरफ मुड़कर बोला- “किसी और को मुझसे भिड़ने की कोशिश करनी है? नहीं? तो मेरी बात ध्यान से सुनो, मैं राज्याभिषेक के बाद नागद्वीप का सम्राट बन जाऊंगा। यदि किसी को आपत्ति नहीं है तो अच्छा है और यदि किसी को आपत्ति है तो मुझे उससे फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर मेरे सम्राट बनने के बाद किसी भी इच्छाधारी प्रजाति ने विद्रोह की आड़ में अशांति फैलाने की कोशिश की तो उस प्रजाति का नाम नागद्वीप तो क्या इस विश्व के नक्शे से ही मिटा देगा नागराज। उम्मीद है कि मेरी बात सबको समझ में आ गयी होगी।”

नागराज की घोषणा सुनकर अधिपतियों में सबसे पीछे खड़ा महाव्याल बुलंद आवाज़ में बोला- “भावी नागसम्राट नागराज की जय!”
उसके बाद सभी बोले- “भावी नागसम्राट नागराज की जय!”
विसर्पी और कालदूत के चेहरे पर अलग ही खुशी थी, विसर्पी को अपना प्यार मिल गया था और नागद्वीप को एक ऐसी महाशक्ति जिसके रहते किसी इच्छाधारी नागों पर आंच नहीं आ सकती थी, विद्रोह की संभावना भी पूरी तरह से खत्म कर दी गई थी।

असम की “प्रेतों की धरती” नाम के उस क्षेत्र में स्थित तांत्रिक इरी की विशाल गुफा में अब भेड़िया और जैकब भी मौजूद थे। भेड़िया प्रेतों की धरती से पूरी तरह अपरिचित था इसलिये गुफा को आंखें फाड़ फाड़कर देख रहा था।

भेड़िया- ये तो अद्भुत जगह है लेकिन मैंने तो सुना था कि यहां प्रेतात्माओं का निवास है, तो क्या वो सब अफवाहें थीं?
इरी- मैंने ऐसा कब कहा?
भेड़िया- मतलब?
इरी- मतलब कि प्रेतात्माएं काफी मात्रा में मौजूद हैं यहां, अच्छी बुरी हर प्रकार की लेकिन सब मेरे वश में हैं।
भेड़िया- फिर भी ये खतरनाक जगह है इरी।
जैकब- खतरे से क्या डरना, मैं एक प्रेत हूँ और इरी एक तांत्रिक, हम अपना निवास ही ऐसे स्थानों को बनाते हैं जहां आम इंसानों की आवाजाही कम से कम हो।
भेड़िया- तो तुम मुझे क्या बताने वाले थे इरी? ये “पाप क्षेत्र” आखिर क्या बला है?
इरी- पाप क्षेत्र एक ऐसा आयाम है जहां भीषण तामसिक शक्तियों को कैद करके रखा गया है।
भेड़िया- यानी कि “मुर्दों की दुनिया” की तरह? जहां बुरी प्रवृत्ति वाले लोगों को कैद में रखता है ज़िंदा मुर्दा एंथोनी गुंजालवेज?
जैकब- बिल्कुल नहीं, मुर्दों की दुनिया में नागपाशा और गुरुदेव जैसे लोग कैद हैं जिनसे खतरा तो है लेकिन उस दर्जे का नहीं जिसकी हम बात कर रहे हैं। मुर्दों की दुनिया का आयामद्वार बार-बार कैदियों को कैद करने के लिए खोला और बंद किया जा सकता है लेकिन पाप क्षेत्र का द्वार एक बार पूरी तरह खुल गया तो ऐसी भीषण तामसिक शक्तियां इस आयाम में आ जाएंगी जिनसे भिड़ना किसी भी प्राणी के लिए संभव नहीं है। स्वयं त्रिदेव आ जाएं तो अलग बात है।
भेड़िया- क्या? और ऐसी भीषण शक्तियों को कैद रखने वाला द्वार खुल चुका है?
इरी- पूरी तरह नहीं खुला है लेकिन अभी धीरे-धीरे खुल रहा है जिसकी वजह से पाप ऊर्जा पूरे वातावरण में फैल रही है।
भेड़िया- ओह, अब समझ में आया। वे वैज्ञानिक जिस ऊर्जा की खोज में यहां तक आये थे वो पाप क्षेत्र की पाप ऊर्जा है।
इरी- हाँ, और वो प्राणी पाप क्षेत्र की ही देन थे, हालांकि वे बेहद निम्न तामसिक ऊर्जा वाले प्राणी थे लेकिन अब तुम्हें समझ में आ गया होगा कि हम यहां कैसे खतरे की बात कर रहे हैं।
भेड़िया- लेकिन आखिर आयामद्वार खुलने की वजह क्या थी? आखिर इतनी भीषण तामसिक शक्तियों को कैद रखने वाला द्वार एकदम से कैसे खुल गया?
इरी- एकदम से नहीं भेड़िया, एकदम से नहीं। मैंने बेहद गहन तंत्र साधना करके कारण का पता कर लिया है। द्वार को सुनियोजित योजना के साथ खोला गया है, किसी ने ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति बदली है, कुछ दिनों से “नायक तिमिर योग” बहुत विकट रहा है। हालांकि अब उसका असर धीरे-धीरे खत्म हो रहा है लेकिन नुकसान तो हो ही चुका है।
भेड़िया- ये नायक तिमिर योग क्या है?
इरी- नायक तिमिर योग ऐसा प्रबल योग है जिसके अंतर्गत एक युग के चार से पांच महानायक जिन्हें लोगों का आदर्श कहा जाता है, वे नैतिकता के रास्ते से हटकर पथभ्रष्ट हो जाते हैं, उनका भीषण पतन हो जाता है। नायक पश्चाताप और ग्लानि की आग में जलकर अपना मूल स्वभाव भूल जाते हैं और सबसे आवश्यक बात ये की ज़रूरी नहीं है कि योग का असर खत्म होने के बाद भी वो वापस अपने कर्तव्यों का पालन करने की स्थिति में आ पाएं, हो सकता है कि वे मात्र चंद स्वार्थी मनुष्य बनकर रह जाएं जो अपने व्यक्तिगत लक्ष्य की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, भले ही उसका समाज कल्याण से कोई लेना देना हो या ना हो।
भेड़िया- इसका मतलब अब तक कई युगनायकों का पतन हो चुका है? लेकिन इससे पाप क्षेत्र के आयामद्वार का क्या लेना देना?
इरी- कोई भी आयामद्वार कितना भी मजबूत क्यों ना हो, उसको खोलने की कोई न कोई कुंजी अवश्य होती है और इस द्वार के संदर्भ में कुंजी थी नायकों के पतन से प्राप्त होने वाली ऊर्जा।
भेड़िया- लेकिन वह कौन व्यक्ति हो सकता है जो पाप क्षेत्र को खोलना चाहता हो?
इरी- वह तो नहीं पता लेकिन वह अवश्य ही ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति का जानकार होने के साथ साथ पाप क्षेत्र की भी जानकारी है। वैसे भी ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति को बदल सकने की काबिलियत रखने वाला व्यक्ति किसी मायने में साधारण तो नहीं होगा। मैं तंत्र ज्ञाता हूँ लेकिन इतना जटिल कार्य मेरे बस के भी बाहर की बात है। खैर, मैं चाहता हूँ कि तुम और जैकब “मुर्दों की दुनिया” में जाओ भेड़िया।
भेड़िया- मैं? लेकिन क्यों?
इरी- मुझे लगता नहीं कि तामसिक ऊर्जा का असर केवल इस आयाम तक सीमित है, यदि उस आयाम में कुछ गड़बड़ होगी तो तुम दोनों निपट लोगे। दूसरी बात ये कि अब वक्त आ गया है कि ज़िंदा मुर्दा एंथोनी एक बार फिर ज़िंदा लोगों की दुनिया में कदम रखे, तुम्हें उसे वापिस लाना होगा।

To be continued….
Written by- Samvart Harshit for Comic Haveli

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15 Comments on “Earth 61 Phase 2 Part 14”

  1. Bahut badiya Bhai. Me chalata tha ki kahani Esi hi chalti rahe aur khatam hi nahi ho. Nagadeep ko bahut hi sarvsshakti shali nayak milage wala hai. Badiya ki bhi jordar entry ho chuki hai. Paap dwar ko kolane me hi abhi 14 part ho chuke hai. Lagata hai ki y series khafi badi hone wali hai. Maja aayaga Bhai bahut. Lagata hai ki tantra Ka koi bahut bada gatya aane wala hai. Shyad tantra. Pahale laga ki kahi vedarcharya hi to nahi ker rahe hai y sab. Per nahi koi aur hi hai. Next part Ka intajer rahegi.

  2. पिछले भाग की तरह ही ये भाग भी उत्तम था। शानदार था।
    मुझे शानदार लगने का कारण भी है भेड़िया का आगमन। जैसा आगमन मैं चाहता था वैसा ही रहा।
    एकदम से आकर उसने बिना कोई पसीना बहाए आराम से उन राक्षसों को मारा। मजा आ गया।
    अब एंथोनी भी आने वाला है तो अब तो चार चाँद लगने वाले हैं कहानी में।
    इस पार्ट से परमाणु, ध्रुव और डोगा नदारद थे। तिरंगा ध्रुव में समाहित है।
    नागराज का कालदूत को हराना बहुत हाई लेवल पर था मतलब अब तक कालसर्पि से उसका बचना मुश्किल लग रहा था तो बढ़िया रहा। कालदूत ने चीरचला का प्रयोग नहीं किया ये थोड़ा समझ नहीं आया। खैर शायद नागराज को मारना नहीं चाहता हो।
    वैसे कालसर्पि को भी नागराज तोड़ देता तो मजा आ जाता।
    इस पार्ट में वैसे बस भेड़िया पर ही मेरा ध्यान अटक गया था। अब अगले पार्ट असली होगा जहाँ एंथोनी और भेड़िया का मिलाप होगा और दो शासक कैसे इस युद्ध में कैसे आगमन करते हैं और किस ओर लड़ते हैं ये देखना होगा।

  3. Ye part bhut hi interesting tha lag rha tha ki part ka end na ho next part thoda jaldi lana please sir ji.. Bhediya ki entry mast thi next part to bahut interesting hoga……

  4. Ek baar se aapki congrats bro

    10th part k baad 14th part me dubara waisa hi maza aaya mujhe
    Kya likh diya h yar zabardast shandar amazing…

    Shuru se lekar aakhir tak ekdm hila dala

    Bhediya ki entry lajwab thi…kash bhediya thoda pahle aajata to shayd professor zinda rahta bada afsos hua mujhe uske liye…

    Idhar nagraj ko phr se bhakshak se rakshak bante hue dekhna bhi acha feel kra rha hai…jis tarah usne kaaldoot ko haraya aur virodhi dal k naag ki kutai ki to lagne laga h ki ab uski takkar ka koi nhi…shayd shakti bhi nhi…shayd anthony ho sakta hai qki aapne anthony ko phase 1 me bohat hi zyada powerful dikhaya tha isiliye wo paap kshetra ka rakhwala hai qki waha to nagraj se zyada powerful villain hai wo bhi lakho ki tadaad me jisko anthony ne rok rakha hai…..bhediya iri k sath mil gya hai ab lagta hai Anthony ki entry hone wali hai..story baht hi zyada interesting hoti ja rhi h…

    Thoda sa kami mahsus hui hamare aur heroes ki jinko aapne pahle dikhaya hai like doga parmanu scd etc.

    Kahani me ek do chiz ki kami thi but it’s ok
    Next part jaldi lao

  5. Earth 61 part 14

    Review thoda late dene k liye khasma chahunga,
    Is part me bhediya ki long awaited entry hui jo dekh k maja aa gaya, preto ki dharti ka concept pasand aaya, is baar bhi aapne pap urja wale jeev se poora bhanayak katal karvaya jaise vibhataso se karvaye the, gada na use karne k scene me poora herogiri dikha raha tha bhediya, nagdweep ka description gajab ka tha, ye thoda ajeeb laga ki pehle hi visarpi ne kyu nahi bola ki samrat banne k liye pehle nagraj ko kaldoot ko harana padega ye to pata hona cahiye tha samragi ko, nagraj ne jis tarah se apne vidrohi naag ko dara kar chup karaya aur jaise ab tak baki logo k sath kiya h injustice k superman ki yaad aa jati h, nagraj aur kaldoot ki ladai me phir haar gaya kaldoot (ye aaj tak kisi se jeeta bhi h ki bus gapp marta h) , tishk sarp ki entry mast lagi but harne ka tarika samajh nahi aaya kaldoot ka girne se khali ve kaise hare kyuki vo behosh to na huye the na nagraj ne unhe bandi banaya, bhediya jis tarah se antony ko vapas lane jacob k sath dusre aayam me ja raha to lag raha in logo ki ladai ab ek alag direction me chalegi aur baki Brahmand rakshak to ab h hi alag direction me,
    Vaise ye nayak khasti yog se kal kundali k aane ka andesha ho raha aur agar vo aaya to kya bhokal bhi aayega

    Waiting for the next part

  6. वाह आखिर भेड़िया की एक जोरदार एंट्री हो ही गयी, साटी का भी अच्छा उपयोग किया जा रहा है, इसमें भेड़िया वैसा ही है जैसा उसे होना चाहिए, बहुत कूल लगा, और इन सब घटनाओं (जो अब तक हुए है) के पीछे भी वही हो सकता है जो पाप क्षेत्र से निकलना चाहता है, शायद सधम या chandkaal , इरी और जैकब का आना भी अच्छा लग रहा है, कहानी एक बार फिर नए मोड़ पर है, उधर नागद्वीप में अपने प्यार को पाकर विसर्पी भी बहुत खुश है, नागराज ने महात्मा कालदूत से लड़ अपने बाहुबल को सिद्ध किया, पर अब नागराज वो बिल्कुल नही रहा जो वो था, उसे कोई कुछ भी ऐसा बोल दे जो वो सुनना न चाहता हो भले ही वो सत्य क्यों ना हो, वो लड़ने झगड़ने लगता है।

    पर इस आयाम में सब अपने इच्छित चीज को प्राप्त कर रहे हैं, और नैतिकता का दमन हो रहा है।

    देखते हैं मुर्दो की धरती में क्या हो रहा है, intzaar है ज़िंदा मुर्दा एंथोनी गुंजालवेज का।

    धन्यवाद

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