Earth 61 Phase 2 Part 15

पंचादश अध्याय- ग्रहणों

(जिन पाठकों ने earth 61 फेज 1 नहीं पढ़ा है, उनकी जानकारी के लिए बताया जा रहा है कि “मुर्दों की दुनिया” का निर्माण तांत्रिक इरी और कालदूत ने धरती के खतरनाक पराशक्तिधारी कैदियों को कैद रखने के लिए किया था। इस आयाम में एंथोनी अपने गुलाम मुर्दों के साथ पृथ्वी से भेजे गए खूंखार कैदियों पर नज़र रखता है ताकि वे फिर से आज़ाद होकर उत्पात न मचाएं। फेज 1 के अंत में गुरुदेव, नागपाशा और नगीना को भी मुर्दों की दुनिया में कैद किया गया था।)
***************************************
न जाने कैसा अजीब स्थान था वह, आसमान रक्त से भी ज़्यादा लाल था, बादल बहुत तेज़ी से उमड़ घुमड़ रहे थे, रह रहकर बिजली कड़क रही थी लेकिन बारिश नहीं हो रही थी। ये तो हुआ आसमान का हाल, धरती भी एकदम वीरान, दूर दूर तक नज़र दौड़ाने पर भी सिर्फ कंकाल नज़र आ रहे थे। वे कंकाल भी किसी मनुष्य के नहीं लग रहे थे, ऐसा लग रहा था मानो बड़े बड़े राक्षसों की खोपड़ियां पड़ी हों, कहीं-कहीं पर कंकालों का पूरा ढेर जमा था तो कहीं पर सिर्फ बिखरे हुए कंकाल। लाल कंकालों के मध्य अचानक हवा में एक द्वार जैसा प्रकट हुआ और तीव्र प्रकाश के मध्य दो आकृतियां उस द्वार से बाहर निकलीं। वो आकृतियां और कोई नहीं जंगल का जल्लाद भेड़िया और जैकब की थीं। भेड़िया “मुर्दों की दुनिया” नामक इस आयाम में पहली बार आया था इसलिए यहां की भयावहता देखकर हतप्रभ रह गया था।

जैकब- ऐसे आंखें फाड़ फाड़कर क्या देख रहे हो भेड़िया?
भेड़िया- बड़ी ही अजीब जगह है।
जैकब- जब नाम ही “मुर्दों की दुनिया” है तो तुम क्या उम्मीद लेकर बैठे थे? वैसे यकीन मानो लेकिन यह जगह “पाप क्षेत्र” की तुलना में कुछ भी नहीं है जहां समूचे ब्रह्मांड तक को नष्ट कर देने वाली पाप शक्तियां कैद हैं। खैर, आओ एंथोनी को ढूंढते हैं, साथ ही साथ हमें यह भी देखना होगा कि पाप क्षेत्र की तामसिक ऊर्जा का असर केवल हमारे आयाम पर ही पड़ रहा है या फिर ये आयाम भी असुरक्षित है!
भेड़िया- ठीक है लेकिन हम एंथोनी को ढूँढेंगे कैसे?
जैकब- इस स्थान से कुछ दूरी पर प्रेत कारागार है जहां कालदूत और इरी की मेहरबानी से पृथ्वी के तामसिक प्रवृत्ति के कैदी बंद हैं, एंथोनी नहीं तो कम से कम उसके गुलाम मुर्दे अवश्य वहां मिलेंगे जिनसे हमें एंथोनी का पता मिल जाएगा। वैसे तो मुर्दे हर जगह घूमते रहते हैं लेकिन आज तो कोई दिख ही नहीं रहा। खैर, आओ चलें। वैसे वह आयामक यंत्र तुम्हारे पास ही है ना जिसकी मदद से हमें यहां से बाहर निकलना है?
भेड़िया- बेफिक्र रहो, यंत्र मेरे पास ही है।

जैकब भेड़िया को लेकर कुछ ही दूर स्थित प्रेत कारागार की तरफ लेकर आ गया, ये एक ऐसा विशाल क्षेत्र था जिसमें व्यवस्थित ढंग से हड्डियों से बने छोटे छोटे पिंजरे जैसे कारावास फैले हुए थे। हर कारावास में एक कैदी कैद था। भेड़िया ने नज़र दौड़ाई उसे जल्द ही अलग अलग कारावासों में कैद गुरुदेव, नगीना और नागपाशा दिख गये जो एकदम हताश निराश से अपने अपने कारावास में बैठे हुए थे। हालांकि आसपास और भी कैदी थे जिन्होंने कभी न कभी पृथ्वी पर तबाही मचाई थी लेकिन भेड़िया के कदम उनके एक साथ रखे गए कारावासों की तरफ बढ़ गए। वो तीनों भी भेड़िया को देखकर चौंक गए, कुछ पल पहले हताश निराश से बैठे हुए वो कैदी एकदम से चौंक कर खड़े हो गए।

नागपाशा- भ.. भेड़िया! तुम यहाँ?
भेड़िया- कैसे हो नागपाशा? सज़ा कट रही है ना अच्छे से ?
नागपाशा- ये सब बकवास छोड़ो और मेरी बात सुनो, आज एक बहुत ही अजीब बात हुई है।
भेड़िया- अच्छा? ऐसा क्या हुआ है?
गुरुदेव- मैं तुमको बताता हूँ, पाप क्षेत्र का द्वार…
जैकब- पाप क्षेत्र के बारे में हमें पता है गुरुदेव, आप उसके बारे में बताने का कष्ट ना उठाएं। हमें पता है कि आप जैसे ज्ञानी को पाप क्षेत्र के बारे में तो अवश्य ही पता होगा लेकिन हमें बस इतना बताइये कि पाप क्षेत्र की तामसिक शक्तियों का यहां मुर्दों की दुनिया पर कोई असर देखा या नहीं आप लोगों ने।
गुरुदेव- हाँ हमने उसे देखा, वह कैद से स्वतंत्र हो गया है, “ग्रहणों” वापिस आ गया है।

ग्रहणों के बारे में सुनते ही जैकब को तो जैसे झटका सा लगा।

भेड़िया- अरे? क्या हुआ जैकब?
जैकब- हमें …. हमें तुरंत यहां से निकलना होगा, जल्दी!

इतना कहकर जैकब भेड़िया का हाथ पकड़कर दौड़ने लगा।

पीछे से कैद में बंद गुरुदेव, नागपाशा और नगीना चिल्लाये “रुको! हमें भी ले चलो! हमें यहां मत छोड़ो!”

भेड़िया दौड़ते दौड़ते एकदम रुक गया, जैकब को भी उसकी वजह से रुकना पड़ा।

जैकब- क्या हुआ भेड़िया?
भेड़िया- हम कायरों की भांति भाग क्यों रहे हैं? आखिर कौन है ये ग्रहणों?
जैकब- ग्रहणों नामक तामसिक शक्ति से युक्त प्राणी को भी युगों पहले पाप क्षेत्र में अन्य सभी के साथ कैद कर दिया गया था लेकिन लगता है द्वार खुलने की वजह से वह छूट निकला है। वह बल का नहीं बल्कि छल का प्रयोग करने वाला प्राणी है भेड़िया, एक बार अगर उसने हमको अपने बस में कर लिया तो शायद हमारी आत्माएं भी उसके शिकंजे से ना छूटें। मैं इस आयाम से जल्दी इसलिए नहीं निकल रहा क्योंकि मैं ग्रहणों से डर गया बल्कि इसलिए निकल रहा हूँ क्योंकि यदि ग्रहणों हमारा इस्तेमाल करके धरती तक पहुंच गया तो न जाने क्या तबाही मचाएगा।
भेड़िया- चलो कम से कम इतना तो पता चला कि पाप क्षेत्र की तामसिक शक्तियों की समस्या केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं। बल्कि वे मुर्दों की दुनिया समेत हर आयाम में फैलती जा रही है।

“बिल्कुल सही कहा तुमने भेड़िया मानव! पाप क्षेत्र की तामसिक शक्तियों का विस्तार सिर्फ एक आयाम तक ही सीमित नहीं है। अब ये पूरी समयधारा बनेगी इन भीषण पाप शक्तियों का शिकार!”

इस अजीब झन्नाहट के साथ थरथराती आवाज ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा और वह आवाज़ जहां से गूंजी वहाँ भेड़िया और जैकब ने मुड़कर देखा, वहाँ एक अजीब वेशभूषा वाला व्यक्ति मुस्कुराता हुआ खड़ा था, उसका आधा चेहरा काली स्याही जैसा काला था।

जैकब- यही है ग्रहणों भेड़िया जो तामसिक स्याह ऊर्जा से सबके दिमाग को अपने वश में कर लेता है। फिर व्यक्ति लाख छटपटाता रहे लेकिन ग्रहणों के चंगुल से नहीं निकल पाता, ऐसा तभी हो सकता है जब ग्रहणों खुद उसे अपने चंगुल से निकालना चाहे या फिर ग्रहणों को खत्म कर दिया जाए।
भेड़िया- तो इसमें क्या बड़ी बात है, अभी गदा मारकर इसका सिर फोड़ता हूँ। हे भेड़िया देवता मदद!

इतना कहते ही भेड़िया के हाथों में उसकी चमत्कारी गदा प्रकट हो गयी, वह गदा लेकर ग्रहणों की तरफ बढ़ चला। तभी ग्रहणों के हाथों से एक स्याह काली ऊर्जा छूटकर भेड़िया के शरीर से टकराई और उसने जितने कदम आगे बढ़ाए थे, उससे कई कदम पीछे जाकर गिरा।

ग्रहणों- मूर्ख भेड़िया मानव! यदि मुझे नष्ट करना इतना ही आसान होता तो मुझे पाप क्षेत्र में कैद ही क्यों किया जाता?

अब भेड़िया को क्रोध आ गया, वह फिर से उठा और पूरी ताकत से गदा को धरती पर पटक दिया। धरती के कंपन ग्रहणों के पांवों तक भी पहुंचे और वह लड़खड़ा कर गिर गया, जैकब ने भी पूरी ताकत से तांत्रिक ऊर्जा का वार अपने हाथों से किया। ग्रहणों ने उसके वार को अपने हाथों से निकलती काली स्याह ऊर्जा द्वारा रोक लिया लेकिन इस चक्कर में उसका ध्यान भेड़िया से हट गया जिसने अपनी पूंछ लंबी करके ग्रहणों के शरीर को लपेट लिया था। जब तक वह ध्यान देता, भेड़िया की पूँछ का बंधन उसके शरीर पर कस गया और भेड़िया ने पूरी शक्ति से उसे पूँछ द्वारा उठाकर धरती पर पटक दिया।
ग्रहणों के मुँह से खून आने लगा था लेकिन वह हँसने लगा।

भेड़िया- कमाल है, इतनी मार खाने के बाद भी हँस रहे हो!
ग्रहणों- मैं ये सोचकर हँस रहा हूँ कि तुम लोगों के रूप में मुझे दो शक्तिशाली गुलाम मिल जाएंगे।
भेड़िया- तुम इतने शक्तिशाली नहीं ही कि भेड़िया को अपना गुलाम बना पाओ।
ग्रहणों- तुमने सही कहा भेड़िया मानव, मैं बाहुबल में शायद तुम्हारा मुकाबला ना कर पाऊं लेकिन ग्रहणों की तो विशेषता ही ये है कि उसे खुद को शक्तिशाली साबित करने की ज़रुरत नहीं पड़ी क्योंकि उसने शक्तिशाली ग़ुलाम बनाये हैं।

ग्रहणों के इतना कहते ही भेड़िया और जैकब को मानो अपने शरीर में झुरझुरी सी दौड़ती महसूस हुई। वह झुरझुरी, वह सर्द अहसास इतना बढ़ गया कि भेड़िया को अपनी पूंछ की पकड़ ढीली छोड़नी पड़ी और ग्रहणों आज़ाद हो गया। उन्होंने ध्यान दिया कि उनके शरीर को विशेष प्रकार की आग ने घेर लिया था जो उन्हें झुलसाने के बजाय जमाए जा रही थी, उन्होंने देखा कि आसमान में उड़ता हुआ एंथोनी उन पर ठंडी आग की लपटें छोड़ रहा था।

एंथोनी का चेहरा भी ग्रहणों की तरह आधा स्याह रंग का हो गया था, एंथोनी के तमाम गुलाम मुर्दे भी इधर उधर से निकल-निकल कर आ गए, उन सबका चेहरा आधा स्याह हो चुका था जिससे ये साफ पता चल रहा था कि ग्रहणों ने उनके पहुँचने से पहले ही ज़िंदा मुर्दा एंथोनी और उसकी मुर्दा फौज को अपने काबू में कर लिया है। जैकब तो ठंडी आग की यंत्रणा बिल्कुल भी नहीं झेल पा रहा था लेकिन भेड़िया ने भी लगभग घुटने टेक ही दिये थे। उसने मन ही मन सोचा “उफ्फ! इस आग की यंत्रणा मुझसे झेली नहीं जा रही, जैकब से भी मदद की उम्मीद करना बेकार है, अब एक ही तरीका समझ में आ रहा है लेकिन उसके लिए अपनी पूरी इच्छाशक्ति को सिंचित करना होगा।”
एंथोनी अभी तक आकाश में उड़ता हुआ जैकब और एंथोनी पर प्रचंड ठंडी आग बरसा रहा था, तभी उसने देखा कि भेड़िया सम्पूर्ण इच्छाशक्ति लगाकर उठ रहा है। भेड़िया के हाथ में अभी भी गदा थी जो उसने पूरी ताकत से एंथोनी की तरफ फेंककर मारी लेकिन एंथोनी वहां से टेलीपोर्ट होकर भेड़िया के पीछे आ गया और उसे एक जोरदार लात मारी। पहले से ही बुरी तरह अशक्त हो चुका भेड़िया धरती पर गिर पड़ा।
यही एक मात्र मौका जानकर एंथोनी और ग्रहणों ने अपनी पूरी ताकत लगाकर भेड़िया पर हमला कर दिया। एंथोनी की ठंडी आग और ग्रहणों के स्याह ऊर्जा के वारों को भेड़िया अधिक देर तक नहीं झेल पॉय और जल्द ही भेड़िया सूखे पत्ते की तरह गिर पड़ा। जब भेड़िया एकदम धराशायी हो गया तब उन्होंने अपने वार करना बंद कर दिए।

एंथोनी- तुम्हारे पास विलक्षण दैवीय शक्तियां मौजूद हैं भेड़िया इसलिए तुम इतनी देर हमारी संयुक्त शक्तियों के सामने टिक पाये लेकिन मेरे पास जो शक्तियां हैं वो ना दैवीय हैं और ना ही आसुरी, वे अलौकिक शक्तियां हैं। नरक के अग्नि कुंड से सीधे ऊर्जा मेरे शरीर के माध्यम से आगे “चैनल” होती है, इस ठंडी ऊर्जा के आगे तो बड़े बड़े सूरमा नहीं ठहर पाये, तुम भला कौन हो?

इतना बोलकर एंथोनी ने अपने दो हट्टे कट्टे गुलाम मुर्दों को बुलाया और अधमरे से भेड़िया और जैकब को सीधे खड़ा किया। ग्रहणों उनके पास आया और अपना एक एक हाथ उन दोनों के माथे पर रख दिया, उसके हाथों से एक विशेष प्रकार की स्याह ऊर्जा निकलकर उनके मस्तिष्क में जाने लगी। धीरे धीरे भेड़िया और जैकब का चेहरा भी एंथोनी की तरह हो गया….

आधा स्याह।

ग्रहणों- हाहाहा, वाह! इतनी प्रलयंकारी शक्ति वाले सेवकों के साथ तो मैं तीनों लोक जीत सकता हूँ लेकिन इसके लिए मुझे पृथ्वीलोक के आयाम में प्रवेश करना होगा, मैं तो अपना दुर्भाग्य समझ रहा था कि पाप क्षेत्र से निकलकर आया भी तो एक ऐसे आयाम में जहां मुर्दे ही मुर्दे हैं लेकिन मेरी किस्मत देखो की मेरे आने के कुछ ही समय बाद इन दोनों ने ज़िंदा लोगों की धरती से यहां प्रवेश किया है। मुझे बताओ सेवक भेड़िया कि तुम दोनों इस आयाम में कैसे आये?

भेड़िया ने छोटा सा यंत्र ग्रहणों को दिखाते हुए कहा- “यह आयामक है जो तंत्रशक्ति साधक इरी ने हमको दिया है, इसी की मदद से हम इस आयाम में आये हैं।”

ग्रहणों- हाहाहा! वाह, यानी इसी यंत्र द्वारा हम वापस भी जा सकते हैं, अब मैं यहां के सभी कैदियों को अपने वश में करूँगा और फिर ब्रह्मांड पर विजय पाने निकलूंगा।

वहां से कुछ ही मील दूर कैद कैदियों तक भी उस ज़ोरदार युद्ध की गूँज पहुँच चुकी थी जिनमें नागपाशा, गुरुदेव और नगीना भी शामिल थे।

नागपाशा- ग..गुरुदेव, अब क्या होगा?
नगीना- तुम ये पाप क्षेत्र के बारे में उनको क्या बात रहे थे गुरुदेव? क्या हम किसी खतरे में हैं?

गुरुदेव के चेहरे पर तो खौफ का साम्राज्य था, पसीने की बूंदे उसके माथे पर चुहचुहा रही थी, वह डरी सहमी आवाज़ में बोला-
“खतरा बहुत छोटा शब्द है नगीना, ग्रहणों के यहाँ होने का यही अर्थ है कि पाप क्षेत्र का द्वार खुल चुका है। पाप क्षेत्र का द्वार खुलने का अर्थ समझते हो तुम लोग? हम इंसानों के लिए तो क्या इस पूरे ब्रह्मांड के लिए आशा की कोई किरण बाकी नहीं रह गयी है!’

समुद्र के नीचे बसी देवों की एक अनोखी नगरी स्वर्णनगरी, जिनका विज्ञान मानवों के विज्ञान से लाखों करोड़ों गुना ज्यादा उन्नत है। आज उस नगरी के “निरीक्षण कक्ष” में हलचल मची हुई थी। निरीक्षण कक्ष में चारों तरफ बड़े बड़े मॉनिटर लगे हुए थे, कक्ष के अंदर बेहद चिंता की मुद्रा में खड़ा था स्वर्णनगरी का मुख्य वैज्ञानिक प्रसेन। एक कवचधारी सैनिक दौड़ता हुआ प्रसेन के पास आया और घबराता हुआ बोला-

“तामसिक शक्तियों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है श्रीमान प्रसेन! अब हम क्या करेंगे?”
प्रसेन क्रोध से सैनिक की तरफ देखकर बोला- “माना कि अति विषम परिस्थिति है लेकिन क्या इस प्रकार से सूखे पत्ते की तरह काँपना स्वर्णनगरी के एक सैनिक को शोभा देता है?”
सैनिक कुछ बोला नहीं, बस उसका सिर शर्मिंदगी से झुक गया। प्रसेन आगे बोला-
“हमारा सबसे काबिल योद्धा कहाँ हैं? मैंने तुम्हें उसे लाने के लिए भेजा था ना? कहाँ है वो?”
“मैं यहाँ हूँ प्रसेन!”
धनंजय ने तेज तेज कदम बढ़ाते हुए कहा- “देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ, अब तुम जा सकते हो सैनिक! मुझे प्रसेन से ज़रूरी बात करनी है।”

सैनिक वहां से चला गया, धनंजय और प्रसेन ने निरीक्षण कक्ष के अंदर प्रवेश किया जहाँ पहले से ही कई और वैज्ञानिक अलग-अलग संगणक यंत्रों पर मौजूद थे।

धनंजय- कह दो कि ये झूठ है प्रसेन, कह दो कि जिस तामसिक शक्ति के संकेत हमें मिले हैं वह पाप क्षेत्र से नहीं आ रहे हैं।
प्रसेन- मुझे खेद है धनंजय लेकिन इतनी भीषण तामसिक ऊर्जा का प्रवाह किसी और स्थान से आ ही नहीं सकता। जब कुछ दिन पहले निरीक्षण कक्ष के यंत्रों ने वातावरण में हल्की तामसिक ऊर्जा का संकेत पकड़ा था तभी हमको सतर्क हो जाना चाहिए था लेकिन हमने भी खूब लापरवाही कर दी।
धनंजय- उफ्फ! क्या हम कुछ कर सकते हैं? क्या हम इस धरती को बचा सकते हैं? तुम तो उस युद्ध में थे ना, जब पाप क्षेत्र का पहली बार निर्माण किया गया था? तुम्हीं ने तो वह यंत्र बनाया था जिसकी मदद से महाबली भोकाल ने चंडकाल जैसी भीषण राक्षसी शक्ति को काबू में किया गया था। क्या तुम फिर से पाप क्षेत्र को फिर से बंद करने का उपाय नहीं कर सकते?

प्रसेन- मैं किसी तरह वापिस पाप क्षेत्र को बन्द करने का उपाय करता हूँ, इतना तय है कि द्वार अभी पूरी तरह से नहीं खुला है वरना तो न जाने क्या अनर्थ हो गया होता अभी तक लेकिन जितना द्वार खुला है उसी में से भीषण तामसिक शक्तियों का प्रवाह धरती में जगह जगह पर हो चुका है। सबसे पहले मुझे वह कारण जानना होगा जिसकी वजह से पाप क्षेत्र वापिस खुला है।
धनंजय- ठीक है प्रसेन तुम पता करो कि पाप क्षेत्र के खुलने का कारण क्या है। मेरा स्वर्णपाश ना सिर्फ इस खास प्रकार की पाप ऊर्जा को भांप सकता है बल्कि जहां जहां ये तामसिक ऊर्जा है वहां आयामद्वार के जरिये मुझे पहुंचा भी सकता है। मैं धरती पर जाकर इन पाप शक्तियों को रोकने का प्रयास करता हूँ।

इतना कहकर धनंजय ने अपने दाएं हाथ में स्वर्णपाश लिया और उसको आगे करते हुए बोला- “हे स्वर्णपाश! धरती पर भीषण पाप शक्तियों का बोलबाला होने वाला है, इस पाप ऊर्जा को भांपो और मुझे इन पापियों तक पहुंचाओ ताकि मैं उनका संहार अपने हाथों से कर सकूँ!”

इतना कहते ही धनंजय का स्वर्णपाश एकदम से चमकने लगा, और धनंजय के हाथ से छूटकर तेज़ी से हवा में गोल गोल घूमने लगा जिसके कारण हवा में गोलाकार द्वार प्रकट हो गया। द्वार के प्रकट होते ही धनंजय का स्वर्णपाश वापिस उसके हाथ में आ गया।

प्रसेन- पिछली बार तुमने मानवों की धरती पर कदम तब रखा था जब हरू प्राणी का आतंक छा गया था लेकिन इस बार के संकट के सामने हरू प्राणी वाली समस्या कुछ भी नहीं है। मैं बस उम्मीद करता हूँ कि ऊपरी दुनिया में तुम सुरक्षित रहो।
धनंजय- मैं भी खुद से यही उम्मीद करता हूँ।

इतना कहकर धनंजय ने बिना वक्त गंवाये उस हवा में निर्मित गोलाकार द्वार में प्रवेश किया, बिना ये जाने की ये आयामद्वार उसे कहाँ ले जाएगा। उसके जाते ही द्वार भी एक भीषण चमक के साथ गायब हो गया।

ध्रुव ज़्यादातर समय राजकीय कार्यों के निपटारे में लगाता था। फिर अभय के साथ शस्त्रागार में जाकर नए नए शस्त्रों की जानकारी जुटाता, नताशा भी स्त्री योद्धा विभाग में चली गयी थी और नई लड़कियों को बाकी स्त्री योद्धाओं के साथ प्रशिक्षण देने का काम करती थी, उसे ध्रुव के करीब मठ में रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था वरना स्त्री पुरुष के संबंधों पर कोई भी समाज सवाल उठाने में दो पल भी नहीं लगाता। फिर वो और ध्रुव शाम को किसी ऊंचे टीले पर बैठकर अस्त होते सूर्य को देखते और अपने दिनभर के कार्यों की चर्चा करते। कभी-कभी ध्रुव अभय के साथ मठ के दौरे पर होता तो नताशा के साथ समय भी नहीं बिता पाता था, इस दिनचर्या को जुम्मा जुम्मा चार पांच दिन ही हुए थे।
ध्रुव इस वक्त अभय के साथ हकीम कीमियादास के चिकित्सालय में था और उनके अद्भुत विलयनों का चमत्कार देख रहा था।
कीमियादास (एक बोतल हाथ में लेकर)- ये बलवर्धक काढ़ा है मठाधीश, इससे व्यक्ति की शारीरिक शक्ति दुगुनी हो जाती है। इसके बगल में है संजीवनी काढ़ा जिससे घाव जल्दी भर जाते हैं। इन काढ़ों को एक बार पीने पर असर कई महीनों तक रहता है, इसके अलावा असाधारण शक्ति देने वाले कई काढ़े हैं जिसे हन्टर्स पर आजमाया जाता है लेकिन समस्या ये है कि हर हंटर का शरीर इस प्रकार के काढ़ों को स्वीकार नहीं कर पाता और ऐसी स्थिति में वह बहुत भयानक मौत मरता है इसलिए पहले से ही उनको बता दिया जाता है कि शक्तिवर्धक काढ़ों को पीने में कितना खतरा है ताकि वो अपनी ज़िम्मेदारी पर इनका इस्तेमाल करें।
ध्रुव- कमाल की बात है ना हकीम जी, कुछ ही समय पहले आप मुझे मारने का प्रयास कर रहे थे लेकिन आज आप मुझे इन काढ़ों का ज्ञान दे रहे हैं।
कीमियादास- मैं या कोई भी हंटर सिंहासन का गुलाम है मठाधीश, यदि कल को कोई आपको मृत्युद्वंद्व में चुनौती देकर जीत जाता है तो हम उसका आदेश मानने को बाध्य होंगे। मठ के कुछ नियम कोई नहीं तोड़ सकता, ना आप, ना मैं और ना ही कोई और हंटर।

अभय दूर खड़ा हाथ में ढाल लिए उनकी बहस सुन ही रहा था कि उसे धक्का देते हुए एक हंटर गिरता पड़ता चिकित्सालय में घुस आया, वह बुरी तरह हांफ रहा था।

कीमियादास (क्रोधित होकर)- ये क्या हरकत है! जानते नहीं हो कि मेरी या मठाधीश की मर्ज़ी के बिना कोई भी हंटर यहां नहीं आ सकता!

हंटर बहुत घबराया हुआ था, वह हांफते हुए बोला- “यदि मठ पर संकट नहीं आता तो मैं कभी ऐसा दुस्साहस करने की सोचता भी नहीं हकीम जी! एक बेहद भयानक प्राणी न जाने कैसे हवा में से प्रकट हो गया और साधारण जनता पर हमला करना शुरू कर दिया, विलक्षण शक्ति वाले ग्रेड A हन्टर्स की सम्मिलित शक्ति भी उसे रोक नहीं पा रही! जब मुझे पता चला कि मठाधीश चिकित्सालय में हैं तो उनको खबर सुनाने चला आया, उस प्राणी को रोकना हमारे वश से बाहर की बात लग रही है मठाधीश!”

इतना सुनते ही ध्रुव बोला- “मुझे बताओ कि वह राक्षस कहाँ हैं? अभय तुम इस हंटर को लेकर शस्त्रागार जाओ और कुछ खतरनाक हथियारों का इंतज़ाम करो!”

अभय- माफ करना ध्रु.. मेरा मतलब मठाधीश लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि मुझे आपकी सुरक्षा के लिए आपके साथ होना चाहिए?
ध्रुव- मैं अपनी सुरक्षा स्वयं कर लूंगा, तुम तब तक हथियारों का इंतज़ाम करो। यदि वो प्राणी उतना ही खतरनाक है जितना कि ये बता रहा है, तो मेरा घटनास्थल पर जल्द से जल्द पहुँचना बेहद ज़रूरी है।

“अरे…अरे मठाधीश सुनिए तो!” -कीमियादास पीछे से पुकारता रह गया लेकिन ध्रुव तब तक आँधी की गति से चिकित्सालय से बाहर निकल चुका था।

कीमियादास- कमाल है, मठाधीश तो बिना किसी हथियार के ही चले गए।
अभय (मुस्कुराकर)- आप शायद भूल रहे हैं कि आपका मठाधीश बनने से पहले ये व्यक्ति सुपर कमांडो ध्रुव था और ध्रुव का सबसे बड़ा हथियार हमेशा से उसका दिमाग रहा है। खैर, अब मुझे भी बिना देर किए शस्त्रागार से खतरनाक हथियार लेने के लिए निकलना चाहिए।

दूसरी ओर हकीम कीमियादास के चिकित्सालय से कुछ ही कदम दूर एक भयंकर हरा जीव तबाही फैला रहा था, उसकी एक बड़ी सी पूंछ थी जिससे वह हन्टर्स को कोड़े की तरह मार रहा था। उसके आसपास घायल बेहोश हन्टर्स का अंबार लगता जा रहा था, वह अजीब सी हंसी हंसता हुआ बोला- “हाहाहा, मेरा नाम उधेड़ी है मानवों! जानते हो कि यह नाम कैसे पड़ा? क्योंकि मैं खाल उधेड़ने में माहिर हूँ! मुझे नहीं पता कि पाप क्षेत्र का द्वार कैसे खुला और मैं वापिस आज़ाद कैसे हुआ लेकिन जब आज़ाद हो ही गया हूँ तो तुम मुझे वापिस कैद करने में सफल नहीं हो पाओगे!”

तभी उसके कान के पास एक हैंडग्रेनेड आकर लगा, वह थोड़ा सा लड़खड़ाया लेकिन फिर वापस संयत हो गया, उसकी वज्र जैसी खाल पर हैंडग्रेनेड ने असर नहीं किया था। उसका ध्यान उसी दिशा में गया जहां से हैंडग्रेनेड आया था, वहां नताशा स्त्री योद्धा विभाग की स्त्रियों को साथ लेकर खड़ी थी। सबने एक जैसा कवच पहना हुआ था।
उधेड़ी ये देखकर जोरों से हँसा- “हाहाहा, जब पुरूषों में दम नहीं रहा तो उन्होंने स्त्रियों को आगे कर दिया! कोई बात नहीं, उधेड़ी भेदभाव नहीं करता, सबकी खाल उधेड़ डालूंगा मैं!”
इतना कहकर उधेड़ी ने अपनी पूँछ का जोरदार वार किया लेकिन एक भी स्त्री के शरीर को इसकी पूंछ स्पर्श तक नहीं कर पाई, सभी बेहद फुर्ती से हवा में कलाबाजियां खाते हुए उधेड़ी की पूँछ से बच गयीं। नताशा ने हवा में कलाबाजी खाते हुए एक और विस्फोटक उधेड़ी के मुँह पर मार दिया। उधेड़ी थोड़ा सा डगमगाया, इसी बात का फायदा उठाते हुए हुए बाकी स्त्री योद्धाओं ने धनुष लेकर विष बुझे तीर उसके हरे विशाल शरीर पर चलाने आरम्भ किये लेकिन सख्त खाल से टकरा टकराकर तीर टूट गए।

उधेड़ी- हाहाहा! अच्छी कोशिश थी लेकिन विस्फोटक हों या तीर कमान, उधेड़ी की खाल को कुछ नहीं भेद सकता। अब तुम सब मरने के लिए तैयार हो जाओ!

इतना कहते ही उधेड़ी की बाहों से बड़े बड़े शूल निकलने लगे, नताशा किसी अनिष्ट की आशंका से चीख उठी- “सभी उससे दूर चले जाओ! ये ज़रूर कोई खतरनाक हमला करने वाला है!”
लेकिन चेतावनी के लिए बहुत देर हो चुकी थी, उधेड़ी की बाहों से गोली जैसी तीव्र रफ्तार से शूल निकले और पास खड़ी महिला योद्धाओं के शरीर को बींधते चले गए। नताशा महिला योद्धाओं का ये हश्र देखकर स्तब्ध रह गयी, दो चार शूल तेज़ रफ़्तार से उसकी तरफ भी बढ़ चले, शूल नताशा के शरीर से मात्र कुछ ही इंच की दूरी पर थे कि तूफानी रफ्तार से आते ध्रुव ने नताशा को वहां से हटा दिया। इस चक्कर में एक शूल ध्रुव की टांग को रगड़ता हुआ चला गया। नताशा बच तो गयी लेकिन ध्रुव द्वारा तेज़ी से धक्का दिए जाने के कारण उसका सिर धरती से टकरा गया और वह बेहोश हो गयी। ध्रुव ने मुड़कर क्रोध से उधेड़ी की ओर देखा।

उधेड़ी- ओफ्फो, अब एक और मानव! अब तू कौन है?
ध्रुव- मैं हूँ मठाधीश ध्रुव और तूने मेरे मठ में घुसकर जो तबाही फैलायी है उसका हर्जाना तुझे अपनी जान देकर चुकाना होगा।
उधेड़ी- हाहाहा, अब एक अदना सा मानव उधेड़ी की जान लेगा! ज़रा अपने आसपास फैला तबाही का मंजर देख, लाशों के ढेर देख! तू अब भी यही सोचता है कि तू उधेड़ी पर विजय पा सकता है?
ध्रुव- ये तबाही सिर्फ मेरे क्रोध की आग में घी डालने का काम कर रही है, तू न जाने नर्क के किस कोने से आया है लेकिन इतना मैं वादा करता हूँ कि इस मठ से तेरी लाश भी नहीं निकल पाएगी।

ध्रुव की भड़काऊ बातें सुनकर अब तक उधेड़ी को भी क्रोध आ चुका था। ध्रुव ने उछलकर उधेड़ी की छाती पर लात मारी लेकिन उधेड़ी के वज्र जैसे शरीर पर उसकी लात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, फिर उधेड़ी ने अपना विशाल हाथ तेज़ी से घुमा कर ध्रुव पर वार किया लेकिन ध्रुव बला की फुर्ती दिखाते हुए अपने शरीर को पीछे ले गया जिससे उधेड़ी का हाथ उसके पेट से बस स्पर्श सा करता हुआ निकल गया। ध्रुव ने मन ही मन सोचा-
“बाल बाल बचा वरना ये सचमुच मेरी खाल उधेड़ देता लेकिन यह विचित्र राक्षस आखिर मठ में आया कहाँ से? ये सब मैं बाद में सोचूंगा, पहले तो इसे किसी तरह से काबू किया जाए।”

अब तक उधेड़ी के हाथों पर फिर से शूल उग आए थे, उसने गोली की तरह शूलों को ध्रुव के शरीर के ऊपर चलाना शुरू किया लेकिन ध्रुव बिजली को भी मात कर देने वाली फुर्ती से बचता हुआ इधर उधर हवा में छलांगें लगाने लगा।

उधेड़ी- तू बहुत फुर्तीला है मानव लेकिन तेरी फुर्ती भी तुझे उधेड़ी से ज़्यादा देर तक नहीं बचा पाएगी।
ध्रुव गलती से शूलों से बचते बचाते उधेड़ी की पूँछ के पास पहुँच गया और उधेड़ी ने बिना मौका गंवाये ध्रुव के सिर पर पूँछ की फटकार लगा दी, ध्रुव का दिमाग कुछ पलों के लिए अंधेरे में चला गया। इतना समय काफी था उधेड़ी के लिए, उसका विशाल हाथ ध्रुव की गर्दन के इर्द गिर्द जम गया और उसने ध्रुव को हवा में उठा लिया। एक तरफ बेहोश पड़ी नताशा को देखकर ध्रुव का गुस्सा चरम पर आ चुका था।

उधेड़ी- हाहाहा! तू तो बड़ी बड़ी डींगें हांक रहा था! मेरी लाश को मठ से बाहर नहीं जाने देगा, अब मैं अपने हाथों को जरा सा ज़ोर दूंगा और तेरी गर्दन टूट जाएगी।
ध्रुव- मैं डींगे नहीं हांक रहा था, सच बता रहा था।

इतना कहते ही ध्रुव ने बिजली की तेजी हाथ घुमाया और वह विषबुझा तीर उधेड़ी की आंखों में जा लगा जो स्त्री योद्धाओं ने उधेड़ी के वज्र जैसे शरीर पर चलाकर बर्बाद कर दिए थे, ध्रुव ने शूलों से बचते हुए ज़मीन से एक विषबुझा तीर उठा लिया था जिसका इस्तेमाल उसने अब जाकर किया। उधेड़ी ध्रुव के छोड़कर दोनों हाथों से तीर निकालने में व्यस्त हो गया, वह दर्द से चीख उठा- “आह! ये तूने क्या किया मानव? ये कैसा तीर है जिसके आघात से मेरा मास्तिष्क हल्का हल्का सुन्न हो रहा है!”

ध्रुव- यह विषबुझा तीर है उधेड़ी, अफसोस तुम्हारे शरीर की तरह तुम्हारी आंखें इतनी कठोर नहीं हैं। अब यह तीर तुम्हें काल का ग्रास बनाएगा।
उधेड़ी- काल का ग्रास? हाहाहा! ये जरा सा विष मुझे थोड़ा आलसी अवश्य बना सकता है लेकिन मार नहीं सकता लेकिन तेरी दाद देनी पड़ेगी, उधेड़ी पर वार करने का साहस किसी मानव में भी हो सकता है, ये विचार ही काबिले तारीफ है। तू एक बेहतरीन योद्धा है और उधेड़ी तुझे मौत भी बेहतरीन देगा।

अब उधेड़ी ध्रुव को मारने के किये दौड़ता हुआ उसकी तरफ बढ़ा, ध्रुव भी उसके वारों से बचने के लिए एकदम तैयार था लेकिन तभी उधेड़ी को बिजली का झटका लगा जिससे वह धरती पर गिर पड़ा। पीछे से अभय एक बेहद विचित्र सा भाला लेकर खड़ा था जिसे उसने उधेड़ी की पूँछ से स्पर्श करा दिया था।
लेकिम अद्भुत! इतने तीव्र विद्युत आघात के बाद भी उधेड़ी ने खड़े होने में वक्त नहीं लगाया।

उधेड़ी- ओह तो तू भी जान की बाजी लगाने आ गया! एक बात तो माननी पड़ेगी, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मानव योद्धा इतना बेहतर लड़ सकते हैं कि मेरे सम्मुख कुछ क्षण भी टिक सकें। पिछली बार मुझे पाप क्षेत्र में भेजने का कार्य भी उस युग के विलक्षण योद्धा सप्तशक्तिधारक गोजो ने किया था लेकिन मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि साधारण मानव मुझे इतना परेशान कर सकते हैं।
अभय- हम “तुच्छ” मानवों ने ठान लिया है कि तुझे परेशान नहीं करना बल्कि खत्म करना है।

अभय के हाथ में दो लंबे भाले थे जिसमें से उसने एक भाला ध्रुव की ओर उछाल दिया, ध्रुव ने भाले को हवा में ही पकड़ लिया।
अभय- संभलकर मठाधीश, इस भाले की नोक के स्पर्श से तीव्र विद्युत प्रवाहित होती है। मुझे शस्त्रागार में एक यही काम की चीज़ दिखी।
ध्रुव- लेकिन ये काम तो तुम्हारी ढाल भी कर सकती थी।
अभय- हाँ लेकिन ढाल की रेंज बहुत सीमित होती और इस भाले में मेरी ढाल से कई गुना अधिक विद्युत प्रवाह तो है ही लेकिन साथ ही साथ इसकी लंबाई के कारण हम एक निश्चित दूरी से इस जीव पर वार कर सकते हैं। ताकि ये हम पर पलटवार ना कर सके।
उधेड़ी- वाह योद्धाओं ने बुद्धि का प्रयोग करके क्या अच्छा तालमेल बैठाया है! लेकिन मैं एक असुर हूँ मूर्खों, कोई जंगली पशु नहीं जिस पर तुम्हारी ये युक्ति काम कर जाएगी।

उधेड़ी ने फुर्ती से ध्रुव को दबोचने की कोशिश की लेकिन ध्रुव ने सावधानी से भाला उसकी गर्दन से स्पर्श कर दिया जिससे उसके पूरे शरीर में एक तगड़ी झुनझुनी दौड़ गयी, पीछे से अभय ने भी पीठ पर भाले का स्पर्श कराया। उधेड़ी को तीव्र झटकों के कारण सोचने समझने का मौका नहीं मिल पा रहा था। तब तक कीमियादास और बाकी हन्टर्स भी उस जगह पहुंच गए थे, बाकी हन्टर्स ने जैसे ही आगे बढ़ने की कोशिश की, मगर तभी ध्रुव की गरजती आवाज़ उनके कानों में पड़ी- “कोई भी इस युद्ध में मेरे लिए अपनी जान की बाजी लगाने नहीं आएगा वरना वो इस राक्षस से पहले मेरे कोप का भाजन बनेगा।”
इतना कहकर वह फिर से अभय के साथ उधेड़ी को भाले से कोचने लगा, किसी हंटर की हिम्मत नहीं पड़ी की एक कदम आगे बढ़ाकर ध्रुव के आदेश की अवहेलना कर सकें।

अभय- ये बहुत शक्तिशाली है मठाधीश वरना इतने समय में आम मानव जलकर राख हो जाता। ये विक्षिप्तों से भी चार गुना ज़्यादा शक्तिशाली लग रहा है।
उधेड़ी (दर्द से चीखकर)- बस बहुत हुआ!

इतना कहकर उसने अपनी शक्तिशाली पूँछ को धरती पर पटका, धरती में ऐसे तीव्र कंपन उत्पन्न हुए कि अभय और ध्रुव लड़खड़ाकर गिर पड़े और उनके भाले छूटकर उनसे दूर जा गिरे। अब उधेड़ी ने उनको मौका देने की भूल नहीं की, पहले उसका प्रचंड घूंसा अभय से टकराया और वह कई फ़ीट दूर जाकर गिरा, फिर उधेड़ी ध्रुव की तरफ मुड़ा, ध्रुव ज़मीन से उठकर क्रोध से उधेड़ी की तरफ भागा, उसके पास कोई हथियार नहीं था ये उधेड़ी के लिए भी हैरान कर देने वाली बात थी। उधेड़ी ने मन ही मन सोचा- “यह मानव मेरे वार खाकर अपना मानसिक संतुलन खो बैठा है, भला कोई मानव हाथ पैरों की लड़ाई में मुझसे कैसे जीतेगा?”

अब तक ध्रुव उधेड़ी के एकदम करीब पहुंच गया था और उसने एक लात उधेड़ी के सीने पर जमा भी दी लेकिन उधेड़ी टस से मस नहीं हुआ, फिर उधेड़ी ने अपनी पूंछ से ध्रुव को एक फटकार लगाई जिससे ध्रुव मुँह के बल गिरा लेकिन वह फिर से उठा और उधेड़ी की छाती पर एक मुक्का जमा दिया, उधेड़ी को कुछ असर नहीं हुआ। उधेड़ी ने उसे जकड़ने की कोशिश की लेकिन ध्रुव बिजली की रफ्तार से कलाबाजी खाकर उसके कंधे पर बैठ गया था, बिना वक्त खोये वह अभय की ओर देखकर चिल्लाया- “अपनी ढाल मुझे दो!”
अभय ने ढाल ध्रुव की तरफ फेंकी। ध्रुव के हाथ में अब अभय की ढाल थी। इससे पहले कि उधेड़ी कुछ समझ पाता, ढाल में से तीखे कटर्स निकल आये और ध्रुव ने तेज़ी से ढाल को उसके सिर में घुसा दिया, ढाल ने उधेड़ी का मस्तक फाड़ दिया। ध्रुव निर्जीव उधेड़ी के साथ ही ज़मीन पर “धम्म” से गिरा लेकिन बाद में उसने ढाल को उसके मस्तक से बाहर निकाल लिया और अभय को दे दिया।

अभय- वाह! मुझे लग नहीं रहा था कि ढाल इसके शरीर को भेद पाएगी।
ध्रुव- तुम्हारी ढाल साधारण नहीं है अभय, मुझे शस्त्रागार से इसके इतिहास के बारे में जानकारी हासिल हुई। ये देवताओं द्वारा राजा तक्षकराज के पूर्वजों को दी गयी ढाल है, तक्षकराज जो कि नागराज के पिता हैं।
अभय- क्या? यानी मेरे पास नागराज के परिवार की अमानत है?
ध्रुव- हाँ और इसीलिए ये एकमात्र अस्त्र था जो इस असुर की मोटी चमड़ी को भेद सकता था। तुम जो भाले लेकर आये थे वे विद्युत प्रवाह अवश्य करते थे लेकिन इसके शरीर में पेवस्त होने लायक नहीं थे, तुम्हारी ढाल का कमाल मैं पहले राजनगर के युद्ध में देख चुका हूँ, इसीलिए मुझे लगा कि ढाल से काम बन सकता है।
अभय- वाह, मुझे तो लगा था कि ढाल भी इसका शरीर नहीं भेद पाएगी।
ध्रुव- इस ढाल की क्षमता पर कभी संदेह मत करना अभय, इसकी रेंज सीमित भले ही होगी लेकिन ये आगामी लड़ाइयों में बहुत काम आएगी।

फिर ध्रुव उधेड़ी की लाश के पास पहुंचा और बोला- “मैंने अपना वादा पूरा किया उधेड़ी, तेरी लाश को भी मठ के बाहर ना जाने दिया।”

बेहोश नताशा भी धीरे-धीरे होश में आने लगी, उसने जब हर तरफ फैली तबाही और बर्बादी देखी तो वह बहुत विचलित हुई। ध्रुव उसके पास पहुंचा और उसे सहारा देकर खड़ा किया।

ध्रुव- तुम कैसी हो नताशा?
नताशा- उफ्फ! सिर अभी भी घूम रहा है।
ध्रुव- इतनी जोर से धक्का देने के लिए माफी चाहता हूँ लेकिन तुम्हें बचाने के लिए ज़रूरी था।
नताशा- ये..ये भयानक राक्षस कौन था ध्रुव? जो आया और इतनी तबाही मचाकर चला गया?
ध्रुव- इस सवाल का जवाब तो मेरे पास भी नहीं है।

तभी उन्होंने देखा कि अचानक से हवा के बीचोंबीच एक गोलाकार द्वार खुल रहा है और उसमें से एक आकृति बाहर आ रही है।

नताशा- य..ये क्या एक और समस्या?
ध्रुव (बुलंद आवाज़ में)- सब लोग तैयार रहो, लगता है कोई और मुसीबत आ रही है।

सभी लोग हमले की मुद्रा में खड़े थे, कि तभी उस द्वार से निकला देव धनंजय। उसे देखकर ध्रुव चौंक गया।

ध्रुव- धनंजय तुम! इतने समय बाद वापिस धरती पर?

ध्रुव के इस कथन से पता चल गया था कि आने वाला व्यक्ति शत्रु नहीं बल्कि मित्र था इसलिए हमले की मुद्रा में खड़े सब लोग शांत हो गए थे। धनंजय भी ध्रुव की वेशभूषा देखकर चौंक गया था।

धनंजय- ध्रुव! तुम अपनी पोशाक में क्यों नहीं हो? और ये कैसा स्थान है?
“ये एक मठ है, तुम ज़रूर इसके पीछे आये हो।” ध्रुव ने उधेड़ी की लाश की ओर इशारा करके बोला। धनंजय की आँखें उस लाश को देखकर फ़टी की फटी रह गयीं। वह चिंतित मुद्रा में बोला-
“हे ईश्वर! पाप क्षेत्र का प्रकोप पूरे विश्व में फैल रहा है!”

ध्रुव- पाप क्षेत्र? ये पाप क्षेत्र क्या है?
धनंजय- एक ऐसा स्थान हैं जहां इस जीव से भी हज़ारों गुना शक्तिशाली भीषण पाप शक्तियां कैद हैं। किसी कारण से पाप क्षेत्र का द्वार युगों बाद खुल गया है और हम देव उस कारण को पता करने की चेष्टा कर रहे हैं।

तभी धनंजय का स्वर्णपाश चमकने लगा, जिसे देखकर धनंजय चौंका- “ओह! मेरे पाश ने किसी और स्थान पर एक भीषण पाप ऊर्जा को भांप लिया है, मुझे जाना होगा!”

ध्रुव- रुको धनंजय! मुझे पाप क्षेत्र के बारे में विस्तार से बताओ, उसके बाद मैं भी तुम्हारे साथ इन पाप शक्तियों को खत्म करने चलूँगा। ये शक्तियां मेरे मठ के लिए भी बड़ा खतरा साबित हो सकती हैं।
धनंजय- तुम्हारा मठ? आखिर तुम बन क्या गये हो ध्रुव?
ध्रुव (गहरी सांस लेकर)- बीते कुछ दिनों में बहुत कुछ हो गया है धनंजय, ब्रह्मांड रक्षक पूरी तरह से छिन्न भिन्न हो चुके हैं।
धनंजय- ब्रह्मांड रक्षक छिन्न भिन्न हो गए हैं? आखिर ये सब चल क्या रहा है? मुझे पूरी बात शुरू से बताओ, फिर मैं भी तुम्हें पाप क्षेत्र के बारे में बताऊंगा और उसके बाद हम साथ में इस प्रबल पाप शक्ति से भिड़ेंगे।

नागराज राजमहल के बाहर बने विशाल बरामदे में विसर्पी, पंचनाग, कालदूत इत्यादि के साथ नाग पुरोहित द्वारा आयोजित किये गए यज्ञ में हवन कुंड के पास बैठा हुआ था, आसपास नाग प्रहरी थे जिनके कारण अवांछित लोग वहां नहीं आ सकते थे। नाग पुरोहित ने नागराज से कहा- “अब यज्ञ में आखिरी आहुति डालो नागराज, अपने रक्त की आहुति।”
नाग पुरोहित के इतना कहते ही महात्मा कालदूत आगे आ गए, वे जानते थे कि साधारण अस्त्रों ने नागराज के शरीर पर असर करना बंद कर दिया था। उन्होंने अपना दैवीय अस्त्र चीरचला निकाला, नागराज ने अपना हाथ आगे कर दिया और कालदूत ने चीरचला के तीव्र प्रहार से उसके हाथ पर हल्का सा चीरा लगा दिया, उसमें से बहते रक्त की एक बूंद जब हवन कुंड में गिरी तो आग बहुत जोर से भभकी, अग्नि में से हरी लपटें उठीं और फिर एकदम से सारी आग बुझ गयी, अब हवन कुंड में काली राख के अलावा कुछ नहीं बचा था।

कालदूत (मुस्कुराकर)- ये तो होना ही था, हलाहल और कालजयी मिश्रित विष जब किसी की रगों में दौड़ रहा हो तो ऐसी स्थिति के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
नाग पुरोहित- लेकिन चिंता की कोई बात नहीं है महात्मन, यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है। अब आप नागराज को अपने कालकूट विष का टीका लगाइए, आपके आशीर्वाद के बिना कोई भी नागद्वीप सम्राट बने यह संभव नहीं है।

कालदूत बेहद प्रसन्नता से आगे बढ़े और एक छोटी सी डिबिया निकालकर नागराज के माथे पर कालकूट विष का टीका लगाया दिया।

नाग पुरोहित- अब एक आखिरी प्रक्रिया और बची है, तुमको राजदंड से स्वीकृति लेनी होगी नागराज। स्वीकृति लेने का अर्थ है राजदंड को उठा पाना और तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि राजदंड नागाधीश का गर्भीरा द्वारा निर्मित हथौड़ा नहीं है जिसे तुम बलपूर्वक उठा पाओगे। यह विशुद्ध ऊर्जा का ठोस रूप है, यदि यह नहीं चाहेगा तो देवता भी इसको नहीं उठा पाएंगे।
नागराज- ठीक है, पुरोहित जी। मुझे उम्मीद है कि राजदंड मुझे स्वीकृति दे देगा।

नागराज और विसर्पी दोनों हवनकुंड के पास से उठ गए और आमने सामने जाकर खड़े हो गए। विसर्पी के हाथ में राजदंड था और नागराज उससे कुछ फ़ीट दूर खड़ा था। कालदूत, पंचनाग और नाग पुरोहित समेत वहां खड़े होकर रक्षा करने वाले प्रहरियों की सांसें भी हलक में अटक गयीं कि यदि राजदंड ने नागराज को स्वीकृति ना दी तो क्या होगा। विसर्पी ने धीमे से कहा- “तुम कर सकते हो नागराज।”
नागराज को इस एक वाक्य से काफी हौसला मिला। वह जानता था कि यह ऐसी परीक्षा थी जिसमें उसके शरीर में विद्यमान असीमित ताकत भी उसके काम नहीं आने वाली थी। उसने हाथ जोड़कर आंखें बंद कर लीं और मन ही मन राजदंड से निवेदन किया- “हे राजदंड! मैं जानता हूँ कि अब मैं पहले वाला सुलझा हुआ नायक नहीं रहा, नायक हूँ भी या नहीं मुझे ये भी नहीं पता क्योंकि मेरे हाथों से ऐसे भयानक कृत्य हो चुके हैं जिसके लिए शायद मैं भी अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाऊँगा लेकिन एक बात का वचन आप मुझसे ले सकते हैं कि अब मानवों की दुनिया में मैं वापस नहीं जाऊंगा और हर भरसक प्रयत्न करूँगा कि इच्छाधारियों पर कोई आंच ना आये। मेरे रहते इच्छाधारियों पर कोई मुसीबत नहीं आएगी, अब इसके लिए मुझे चाहे रक्षक बनना पड़े या भक्षक, मुझे अब फर्क नहीं पड़ता।”
अचानक विसर्पी के हाथ में थमा राजदंड हिलने लगा, नागराज ने अपनी आंखें खोलीं और हाथ आगे किया। सब लोग आँखें फाड़े इस प्रकरण को देख रहे थे, अचानक ही राजदंड विसर्पी के हाथ से छूटकर “सन्न” की आवाज़ करता हुआ तीव्र गति से नागराज की तरफ बढ़ा और अचानक ही नागराज के हाथ में पहुंच गया। सब लोग बेहद प्रसन्न हुए, विसर्पी की आंखों से तो खुशी के आंसू ही निकल पड़े।

नाग पुरोहित (प्रसन्न होकर)- और इसी के साथ रक्षक नागराज को घोषित किया जाता है नागसम्राट नागराज!

नागराज प्रहरियों को पार करता हुआ महल की सीढ़ियों के पास आ गया, नीचे खड़ी जनता राज्याभिषेक के पूरा होने की राह देख रही थी। नागराज ने अपना एक हाथ विजय की मुद्रा में उठाया जिसमें उसने राजदंड को थाम रखा था, ये देखते ही लोगों में खुशी की लहर दौड़ गयी- “नागसम्राट नागराज की जय!” के नारे लगने लगे। नागराज कालदूत की तरफ बढ़ा, कालदूत अपने पुत्र समान नागराज की इस सफलता पर गर्व से फूले नहीं समा रहे थे। वे आगे बढ़कर बोले-

“तुमने कर दिखाया नागराज, तुमने वाकई कर दिखाया!”
नागराज ने ध्यान दिया कि कालदूत के तीनों रूप विष्या, महाविष्या और परमविष्या के नेत्रों से समान रूप से अश्रुधारा बह रही थी।

नागराज- आप प्रसन्न हैं महात्मन?
कालदूत- प्रसन्न? प्रसन्न बहुत ही छोटा शब्द होगा, मेरी बरसों पुरानी तमन्ना पूरी हुई है, मैं प्रसन्नता के सातवें आसमान पर हूँ इस समय लेकिन अब तुम्हारी ज़िम्मेदारी बढ़ गयी है नागराज। विसर्पी के इतने वर्ष बेहद कुशलता से शासन किया है, रणनीति बनाने में उसका कोई सानी नहीं है और ना ही प्रजा की रक्षा की योजना बनाने में इसलिए तुमसे उम्मीदें और अधिक बढ़ जाती हैं।
नागराज- मैं जानता हूँ महात्मन, विसर्पी से अधिक सुचारू ढंग से नहीं तो कम से कम उसके जैसा शासन चलाने का प्रयास करूंगा। वैसे भी नागद्वीप में सम्राट और साम्राज्ञी के अधिकार एक ही जैसे होते हैं, विसर्पी का शासन अब भी कायम है, बस अंतर ये है कि उसका हाथ बंटाने के लिए मैं भी आ गया हूँ।
नाग पुरोहित- लेकिन जिस कारण के लिए तुम सम्राट बने वह तो रह ही गया।

उस वक्त विसर्पी भी वहीं खड़ी चुपचाप उन सबकी बातें सुन रही थी, पुरोहित जी की बात सुनकर वह शर्मीली हंसी हंस दी। नाग पुरोहित आगे बोले- “आज से तीन दिन बाद का मुहूर्त तुम दोनों के विवाह के लिए बहुत शुभ है, तुम कहो तो मैं….”

नागराज- बिल्कुल पुरोहित जी, भला ये भी कोई पूछने वाली बात हुई।
नाग पुरोहित- ठीक है, फिर मैं अभी से तैयारियों में जुट जाता हूँ।

विसर्पी शर्माते हुए सबसे दूर चली गयी, नागराज भी उसके पीछे पीछे आ गया।

नागराज- अरे विसर्पी रुको तो! कहां जा रही हो?
विसर्पी- ये..ये सब एक सपने जैसा लग रहा है नागराज, यकीन नहीं होता कि आखिरकार वह घड़ी आ ही गयी जिसका हमें इतने समय से इंतज़ार था। आज तुम नागद्वीप के सम्राट बन गए , इसी के साथ मैं और तुम विवाह के बंधन में बंधने जा रहे हैं।
नागराज (राजदंड विसर्पी की ओर बढ़ाते हुए)- इसे तुम ही रखो विसर्पी।
विसर्पी- लेकिन नागराज….
नागराज- कोई लेकिन वेकिन नहीं विसर्पी, तुम राजदंड के लिए अपनी काबिलियत मुझसे काफी पहले साबित कर चुकी हो तो यही न्यायसंगत होगा कि ये तुम्हारे पास रहे।

नागराज विसर्पी के दोनों हाथों को अपने हाथों में लेकर बोला- “अब बुरा वक्त खत्म होने जा रहा है विसर्पी, हम दोनों हँसी खुशी इसी तरह साथ रहेंगे, हमेशा हमेशा के लिए!”

अचानक तभी आकाश में एक गोलाकार द्वार खुला, नागराज, विसर्पी, कालदूत, पंचनाग, नागपुरोहित समेत वहां मौजूद साधारण जनमानस का ध्यान भी उस बड़े से गोलाकार द्वार की तरफ चला गया जो कि दूर आकाश में खुला था। तभी उसमें से भेड़िया, एंथोनी, जैकब, मुर्दों की दुनिया में बसे गुलाम मुर्दे और साथ ही साथ नागपाशा, गुरुदेव और नगीना जैसे खतरनाक कैदी बाहर निकल आये। सबके अर्धस्याह चेहरे देखकर नागराज चकित हो गया, साधारण जनता में आतंक मच गया क्योंकि हवा में प्रकट उस आयामद्वार से निकले इतने सारे लोग तेज़ी से धरातल की तरफ ही बढ़ रहे थे। नागराज को समझ में नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है। तभी हवा में आराम से उड़ता हुआ उन सबके बाद उस द्वार से बाहर आया ग्रहणों जिसे देखकर कालदूत बुरी तरह चौंक गए।

“ग्रहणों, ये तो ग्रहणों है! ये तो सदियों से पाप क्षेत्र में कैद था लेकिन ये यहां क्या कर रहा है?”

ग्रहणों- हाहाहा, ये तो कमाल हो गया! इस आयामक यंत्र द्वारा मैं आया भी तो सीधे इच्छाधारी नागों के इलाके में, अब इन सब पर काबू करके मैं ऐसी सेना बनाऊंगा जिससे पार पाना किसी के बस की बात नहीं होगी।
नागराज (कालदूत की तरफ मुड़कर)- ये ग्रहणों कौन है महात्मन? इसे देखकर आप बुरी तरह क्यों चौंक गए?
कालदूत- ग्रहणों एक बेहद प्रबल पाप शक्ति है जिसे सदियों पहले पाप क्षेत्र नामक आयाम में अन्य भीषण शक्तियों के साथ कैद कर दिया गया था लेकिन ये आज़ाद कैसे हुआ इसका मुझे भी कोई अंदाज़ा नहीं है। इसकी विशेषता है कि यह बड़ी ही आसानी से देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, मनुष्य किसी के भी दिमाग पर अपनी स्याह ऊर्जा द्वारा कब्ज़ा कर सकता है।
नागराज (मुट्ठी भींचकर)- ओह, तो यही वजह है कि इसने भेड़िया, एंथोनी जैसे नायकों समेत मुर्दों की दुनिया के खूंखार कैदियों जैसे नागपाशा इत्यादि को भी वश में कर लिया है। इसे तुरंत रोकना होगा।
कालदूत- संभलकर नागराज! यदि ग्रहणों तुमपर काबू करने में सफल हो गया तो आधी लड़ाई तो वैसे ही खत्म हो जाएगी।
नागराज- आप चिंता मत कीजिये महात्मन, अपनी प्रजा को कुछ नहीं होने देगा नागराज।

फिर नागराज ने पंचनागों और नाग प्रहरियों की तरफ मुड़कर कहा- “साधारण जनमानस का बाल भी बांका नहीं होना चाहिए! अपनी जान लगा दो इनसे भिड़ने में, मैं जानता हूँ कि मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं, ये तुम्हारे नागसम्राट नागराज का प्रथम आदेश है!”
नागराज का आदेश मिलते ही पंचनाग और बाकी नाग प्रहरी ग्रहणों के बाशिंदों पर टूट पड़े। नागराज ने ऊपर आसमान की ओर देखा, आयामद्वार अब तक बंद हो चुका था लेकिन ग्रहणों वहीं उड़ता हुआ मुस्कुरा रहा था जैसे कि ये सब उसके लिए खेल तमाशे से अधिक कुछ ना हो। नागराज ने धरती छोड़ी और तेज़ वेग से उड़ता हुआ ग्रहणों के समीप जाने लगा, ग्रहणों के हाथ से प्रचंड स्याह ऊर्जा निकली जो उसके शरीर से टकराई, उसे बेहद तीव्र झटका लगा लेकिन फिर तुरंत संभलकर गोली की रफ्तार से ग्रहणों तक पहुंच गया। इससे पहले की ग्रहणों कुछ समझ पाता, उसकी गर्दन नागराज के मजबूत हाथ की गिरफ्त में थी। नागराज अब भी तेजी से उड़ रहा था, ग्रहणों अपने दोनों हाथों का प्रयोग करके भी नागराज की गिरफ्त से छूट नहीं पा रहा था, ऊपर से हवा के इतने तीव्र वेग के कारण उसे स्याह ऊर्जा छोड़ने का मौका भी नहीं मिल रहा था।

नागराज- कालदूत तो तेरी बड़ी तारीफ कर रहे थे? तो बड़ी प्रबल पाप शक्ति है अलाना फलाना। तू तो मेरे आगे टिक ही नहीं पा रहा।
ग्रहणों- हाहाहा, मैं उतना शक्तिशाली नहीं हूँ जितने शक्तिशाली मैं गुलाम बनाता हूँ।

ग्रहणों के इतना बोलते ही नागराज को पूरे शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ती महसूस हुई, इस सर्द अहसास के कारण उसे ग्रहणों को छोड़ना पड़ा। उसने मुड़कर देखा कि एंथोनी उस पर प्रचंड ठंडी आग का इस्तेमाल कर रहा था, नागराज ने मन ही मन सोचा- “उफ्फ! एक तो इसकी ठंडी आग कोई साधारण आग तो है नहीं, ऊपर से अत्यधिक ठंड वैसे ही नागों की चिर शत्रु होती है, मुझे जल्द ही इससे पार पाना होगा।”
नागराज ठंडी आग के लगातार वार के बावजूद उड़ता हुआ एंथोनी तक गया लेकिन तब तक एंथोनी वहां से टेलीपोर्ट होकर नागराज के पीछे पैदा हो गया और ठंडी आग का वार फिर से करने लगा। नागराज एंथोनी की तरफ घूमा, उसकी आँखें दहक उठी थीं, उसने नेत्रों से भीषण हरी अग्नि की लपटों का वार एंथोनी पर किया। वार इतना अप्रत्याशित था कि एंथोनी को इससे बचने का समय नहीं मिला और वह किसी परकटे पक्षी की तरह नीचे गिरने लगा। नागराज भी उसके पीछे पीछे धरातल की तरफ बढ़ने लगा लेकिन तभी एक साथ दो काम हुए, एंथोनी के तेज़ी से गिरते शरीर को एक लंबी पूंछ ने थाम लिया और नागराज के शरीर से एक प्रलयंकारी गदा आकर टकराई जिससे वह अलग ही जाकर गिरा। नागराज ने देखा कि एंथोनी को सुरक्षित धरातल पर उतारने के बाद भेड़िया अपनी गदा लिए उसकी तरफ बढ़ रहा था।

नागराज- भेड़िया! मैं तो तुम्हारा मित्र हूँ, ग्रहणों के वश से बाहर निकलने की कोशिश करो भेड़िया।

भेड़िया ने तो जैसे उसकी बात ही अनसुनी कर दी थी, उसने गदा को तेज़ी से घुमाया और अपनी बाहों का पूरा जोर लगाकर गदा का वार नागराज पर किया लेकिन इस बार गदा के भीषण वार को नागराज ने अपने हाथों पर ही रोक लिया। हालांकि इस चक्कर में नागराज के पैरों के दबाव से आसपास की धरती कुछ अंदर हो गयी थी, नागराज ने बिना समय व्यर्थ किये एक जोरदार लात भेड़िया के पेट पर लगाई जिससे वह उड़ता हुआ दूर जा गिरा। नागराज उसके पास आता हुआ बोला- “तुम चिंता मत करो मित्र, मैं तुम्हें ग्रहणों के चंगुल से बाहर निकालूंगा।”
अब तक एंथोनी भी पूरी तरह संभल चुका था, अब नागराज के सामने दो प्रलयंकारी समस्याएं थीं ….भेड़िया और एंथोनी।

दूसरी तरफ वहां से कुछ मील दूर पंचनाग, विसर्पी और कालदूत मुर्दों की दुनिया के कैदी यानी नागपाशा, गुरुदेव और नगीना के भीषण तंत्र वारों का सामना करने में लगे थे। बाकी नाग प्रहरियों ने मुर्दों की दुनिया के खतरनाक मुर्दों को संभालने का बीड़ा उठा लिया था, साधारण जनमानस को वहां से सुरक्षित निकाला जा चुका था। कुछ समय पहले जिस स्थान पर खुशियों का अंबार लग गया था, वह अब एक भीषण जंग का मैदान बना हुआ था। कालदूत अपने चीरचला नगीना का तंत्र वार रोकते हुए बोले- “सोचा नहीं था कि अपने चिर परिचित शत्रुओं से ऐसे मुलाकात होगी। ग्रहणों के वश में आते ही ये लोग और खूंखार हो गए हैं, मुझे तो ये समझ में नहीं आ रहा कि ग्रहणों पाप क्षेत्र से आज़ाद कैसे हुआ? और हो भी गया तो मुर्दों की दुनिया में कैसे पहुंचा? इसे यह आयामक यंत्र कहाँ से मिला जिसका इस्तेमाल नागद्वीप के कुछ विशिष्ट इच्छाधारियों के अलावा तांत्रिक इरी ही करता है?”

विसर्पी राजदंड से नागपाशा के भीषण तांत्रिक वार रोकते हुए बोली-
“ये सब इनको काबू करने के बाद सोचेंगे महात्मन! पहले इनको काबू करना होगा, इनको ग्रहणों के वश से स्वतंत्र करने का क्या उपाय है?”

कालदूत- ग्रहणों की कैद से व्यक्ति मरने के बाद ही छूट पाता है, इनको ग्रहणों के वश से आज़ाद सिर्फ ग्रहणों की मृत्यु ही करवा सकती है। इसके अलावा कोई और उपाय नहीं है।
विसर्पी- तो फिर यही सही, लगता है कि ग्रहणों की किस्मत में आज ही मरना लिखा है।

इतना कहकर विसर्पी ने राजदंड द्वारा तीव्र ऊर्जा वार नगीना के ऊपर किया, नगीना की सीमित तंत्र शक्ति राजदंड का भीषण वार झेल नहीं पाई और वह बेहोश हो गयी। उधर गुरुदेव को बेहोश करने के लिए कालदूत की शक्तिशाली दुम का एक वार ही काफी था। नागपाशा और पंचनागों की टक्कर बहुत भीषण चल रही थी, अपने सटीक तांत्रिक वारों से नागप्रेती को वह पहले ही बेहोश कर चुका था। नागदेव ने उसे दाढ़ी में जकड़ने की चेष्टा की तो उसकी दाढ़ी को पकड़कर उसके नन्हे से शरीर को इतनी जोर से घुमाया की वह पास खड़े सिंहनाग से जाकर तेज़ी से जाकर भिड़ गया, भीषण टक्कर के कारण दोनों बेहोश हो गए। अब केवल नागार्जुन और सर्पराज ही बचे थे। नागार्जुन नागपाशा पर लगातार बाणवर्षा कर रहा था लेकिन नागपाशा हर बाण को अपनी विशाल तंत्र ढाल से निरस्त कर दे रहा था।

नागार्जुन- अब क्या करें सिंहनाग? इसकी तंत्र शक्तियां तो खतरनाक हैं और सिर्फ हम दो ही बचे हैं।
सर्पराज- बस बहुत हुआ, देखता हूँ कि इसकी तंत्र ऊर्जा से बनी ढाल कब तक इसको भूमंडा के प्रचंड वारों से बचा पाती है।

सर्पराज अपने स्थान से उछला और हवा में कई फ़ीट ऊंची कलाबाजी खाई। उसके हाथ भारी भरकम भूमंडा पर कसे हुए थे, नीचे आते आते उसने नागपाशा की तंत्र ढाल पर भूमंडा का जोरदार प्रहार किया, तंत्र ऊर्जा से बनी ढाल वह वार झेल नहीं पाई और छिन्न भिन्न हो गयी। फिर बिना समय दिए सर्पराज ने तेज़ी से अपना भूमंडा घुमाकर नागपाशा का सिर फोड़ दिया। नागपाशा ज़मीन पर गिर पड़ा। सर्पराज नागार्जुन की तरफ देखता हुआ बोला- “भूमंडा की शक्ति के सामने ऐसे पापी ठहर नहीं पाते।”
अचानक सर्पराज ने देखा कि नागार्जुन के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी हैं।
सर्पराज- “अरे क्या हुआ?”
सर्पराज के पीछे नागपाशा वापिस अपने पैरों पर खड़ा हो रहा था और साथ ही साथ उसका विभक्त सिर भी जुड़ रहा था। नागार्जुन चीखा- “सर्पराज पीछे देखो!”
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, नागपाशा के भीषण तांत्रिक वार ने सर्पराज को भी उछाल कर कई फ़ीट दूर फेंक दिया, वह बेहोश हो गया। नागार्जुन पर भी नागपाशा ने कई तंत्र वार किए लेकिन नागार्जुन गजब का धनुर्धर होने के साथ साथ गजब का फुर्तीला भी था, वह हर तंत्र वार को थोड़े थोड़े इंच की दूरी से बचाता हुआ नागपाशा के एकदम पास पहुंच गया। नागार्जुन ने बेहद फुर्ती से धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई थी लेकिन नागपाशा के एक सटीक तंत्र वार ने उसका धनुष ही तोड़ दिया। अब नागार्जुन एकदम खाली हाथ था, वह चीखता हुआ नागपाशा से बोला- “तुझे फाड़ने के लिए तो मेरे हाथ ही काफी हैं!”
उसने तेजी से नागपाशा पर मुष्टि प्रहार करने की सोची लेकिन नागपाशा ने उसके घूंसे को बीच हवा में ही रोक दिया, वह बोला- “अमृत ने मुझे सिर्फ अमरता ही नहीं ऐसी शारीरिक शक्ति भी प्रदान की है जिसका सामना तुझ जैसे तुच्छ नाग नहीं कर सकते!”
फिर उसने नागार्जुन के जिस हाथ को पकड़ा था उसे अपनी हथेली से भींच दिया, हड्डियां कड़कड़ाने के दर्द के कारण नागार्जुन वहीं बैठ गया। नागपाशा ने एक और ज़ोरदार मुष्टि प्रहार नागार्जुन के जबड़े पर किया जिससे उसने खून फेंक दिया। नागार्जुन पूरी तरह ज़मीन पर बेबस पड़ा था, नागपाशा के हाथ फिर से तंत्र ऊर्जा के कारण चमकने लगे।

“ग्रहणों के आदेश का पालन हर हाल में होगा, उसी के हाथ में होगी हर आयाम की सत्ता!”
तंत्र ऊर्जा नागार्जुन की जान ले लेती लेकिन न जाने किस दिशा से उड़ता हुआ कालसर्पी हवा के वेग को चीरता हुआ आया और नागपाशा को अपने आगोश में के लिया। नागपाशा कालसर्पी से बंधा हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा। महात्मा कालदूत नगीना और गुरुदेव को ठिकाने लगाकर वहां आ पहुंचे थे, वे बोले- “कोशिश भी मत करना नागपाशा! पहला और आखिरी इंसान जो इस कालसर्पी की कैद से निकला था वो तुमसे कई गुना अधिक शक्तिशाली है, तुमको इस कैद से मैं ही आज़ाद कर सकता हूँ और मैं ऐसा तब करूँगा जब तुम ग्रहणों के प्रभाव से निकलकर वापिस मुर्दों की दुनिया में कैद होने के लायक नहीं हो जाते।”
अब तक विसर्पी भी वहां पहुंच चुकी थी, वह कालदूत से बोली “महात्मन! पंचनागों को नागपाशा ने बुरी तरह घायल कर दिया है और गुरुदेव, नगीना और नागपाशा को हराने के बाद भी मुर्दों की दुनिया के बाकी खूंखार कैदी बचते हैं, साथ ही ग्रहणों ने वहां के रक्षक मुर्दों, एंथोनी, जैकब और भेड़िया पर भी कब्ज़ा कर लिया है। इतने लोगों से हम कैसे निपटेंगे?”

कालदूत- पंचनागों के घायल होने से नागद्वीप का सिर्फ एक शक्ति स्तम्भ गिरा है विसर्पी, कालदूत के रहते किसी के नापाक कदम नागद्वीप की धरती पर नहीं पड़ सकते। भले ही वह ग्रहणों जैसी प्रबल पाप शक्ति ही क्यों न हो, हमें जल्दी ही ग्रहणों का वध करना होगा। ऐसा करते ही ये सब स्वतः ही उसके प्रभाव से स्वतंत्र हो जाएंगे।

इस पूरे युद्ध से कुछ मील दूर, नागराज के सामने खड़े थे तीन प्रलयंकारी योद्धा भेड़िया, एंथोनी और जैकब। ग्रहणों के प्रभाव से तीनों का चेहरा आधा स्याह तो था ही लेकिन चेहरे पर क्रूरता के भाव भी स्पष्ट नज़र आ रहे थे।

नागराज- मैं तुम तीनों पर जानलेवा प्रहार नहीं करना चाहता क्योंकि तुम लोग फिलहाल किसी और के वश में हो लेकिन यदि नागद्वीप की रक्षा के लिए मुझे तुम्हारी जान भी लेनी पड़ी तो मुझे मंज़ूर है।

भेड़िया ने पूरे वेग से अपनी प्रलयंकारी गदा नागराज की ओर फेंकी, नागराज अब तक इस दैवीय गदा की मारक क्षमता से परिचित हो चुका था इसलिए वह तुरंत इच्छाधारी कणों में बदल गया, गदा ने पीछे धरती में बड़ा सा गड्ढा कर दिया। ठीक उसी वक्त जैकब ने अपने हाथों से कुछ तंत्र तरंगें छोड़ीं जिससे नागराज के इच्छाधारी कणों को आपस में जुड़ने में कठिनाई होने लगी।

जैकब- हाहाहा, मेरी तंत्र ऊर्जा अब तेरे इच्छाधारी कणों को आपस में जुड़ने नहीं देगी।

जैकब सही कह रहा था, तंत्र ऊर्जा के कारण इच्छाधारी कणों को जुड़ने में समस्या आ रही थी, कुछ देर जूझने के बाद देखते ही देखते नागराज के इच्छाधारी कण हवा में विलीन हो गए।

जैकब- अरे, ये तो बुरा हुआ। महान ग्रहणों एक अच्छे गुलाम से वंचित रह गए।

तभी जैकब की पीठ पर एक प्रचंड लात पड़ी और वह मुंह के बल गिर पड़ा, उसने पलटकर देखा कि नागराज सही सलामत उसके सामने खड़ा था।

नागराज- मेरे शरीर की प्रचंड दैवीय ऊर्जा के सामने किसी मामूली तंत्र ऊर्जा की कोई बिसात नहीं है प्रेत! तूने नागराज पर वार करने की धृष्टता की है, अब मैं तुझे समझाऊंगा कि मरने के बाद एक और बार मरना क्या होता है!

इतना कहकर नागराज से नेत्रों से प्रचंड हरी अग्नि की लपट उठी और प्रेत जैकब तड़प उठा। भेड़िया ने अपनी पूँछ लंबी करके नागराज को बांधने की कोशिश की लेकिन नागराज ने उसकी पूँछ पकड़कर उसे एक झटके से अपने पास घसीटा और फिर एक मुक्का रसीद करके दूर भेज दिया, इस प्रकरण के दौरान उसके नेत्रों से प्रचंड अग्नि लहर का निकलना नहीं रुका जो जैकब को बुरी तरह तड़पा रही थी लेकिन तभी उसे रुक जाना पड़ा क्योंकि एंथोनी ने फिर से प्रचंड ठंडी आग का इस्तेमाल शुरू कर दिया था।

एंथोनी- इस बार अपनी शक्ति का एक एक कतरा ही क्यों न खर्च करना पड़े लेकिन तुझे वापिस उठने नहीं दूंगा।
भेड़िया- संभलकर एंथोनी, इसके करीब मत जाना, इसकी शारीरिक शक्ति असीमित है, इसे दूर से ही बेबस करो।
एंथोनी- यह अकेले मेरा काम नहीं है, महान ग्रहणों के आदेशानुसार हम तीनों को इसे रोकना है। तुम दोनों भी मेरा हाथ बँटाओ।

अब नागराज को संभलने का मौका नहीं दिया गया, एक तो पहले से ही ठंडी आग की प्रचंड लपटें उसे सोचने समझने का अवसर नहीं दे रही थीं। ऊपर से भेड़िया ने भी पूरी ताकत से अपनी दैवीय गदा के ताबड़तोड़ वार उसके शरीर पर करने शुरू किए, जब नागराज ठंडी आग और गदा के वारों से अशक्त होता दिखा तो जैकब ने भी तीव्र तांत्रिक प्रहार करने शुरू किए। नागराज इस संयुक्त वार प्रणाली से अपने घुटनों पर आ गया था लेकिन उसमें अब भी जान बाकी थी, वह बड़ी मुश्किल से बोला- “त..तुम लोग क्या समझते हो! तुम ऐसे नागराज को बेबस कर पाओगे? मैं कुछ ही पलों में तुम सबको धूल चटा दूंगा!”

एंथोनी- हम जानते हैं कि तू ऐसा कर भी सकता है लेकिन अब हम तुझे हराने के प्रयास करने खतरा मोल नहीं लेंगे, तू कुछ क्षण के किये हमारे काबू में आया है और यही कुछ क्षण काफी हैं महान ग्रहणों के लिए। तैयार हो जा उनका दास बनने के लिए।

एंथोनी के इतना कहते ही आकाश से धीरे-धीरे धरातल पर उतर आया स्वयं ग्रहणों! वह बेबस नागराज की ओर बढ़ा और उसके माथे पर अपना हाथ रखकर बोला- “मेरा विरोध कोई नहीं कर सका, न कोई आगे कर पाएगा और तेरे जैसा शक्तिशाली मेरी तरफ हुआ तो मेरा ब्रह्मांड विजय का अभियान बहुत जल्दी पूरा हो जाएगा!”
जल्द ही ग्रहणों के हाथ से स्याह ऊर्जा निकलकर नागराज के माथे में समाने लगी लेकिन अचानक ही ग्रहणों को रुक जाना पड़ा क्योंकि एक प्रचंड ऊर्जा तरंग ने उसे उछालकर नागराज से दूर फेंक दिया था। इसी ऊर्जा तरंग ने बहुत तेज़ी से असावधान जैकब, एंथोनी और भेड़िया को भी अपना शिकार बना लिया। ऊर्जा तरंग अपने हाथों से छोड़ने वाला था धनंजय, जो कि अभी-अभी घटनास्थल पर हवा में बने द्वार से ध्रुव और अभय के साथ पहुंचा था। ग्रहणों धनंजय को देखकर चौंक उठा, वह बोला- “यह पहनावा तो देव जाति के योद्धाओं का है, यानी कि स्वर्णनगरी अभी तक अस्तित्व में है? मुझे लगा था कि इतनी सदियों में पृथ्वी पर रहने वाली देवजाति कहीं और बसने चली गयी होगी।”

धनंजय- पृथ्वी हमारा घर है, हम इस पर आंच नहीं आने देंगे। जल्दी ही ये भी पता लग जायेगा कि पाप क्षेत्र के खुलने की वजह क्या है जिसके कारण तेरे जैसी पाप शक्तियां बाहर निकल निकलकर आ रही हैं।
ध्रुव- तुम्हारे स्वर्णपाश ने तो हमें नागद्वीप पहुंचा दिया है धनंजय, इसका मतलब तुम सही थे, पाप शक्तियों का विस्तार ब्रह्मांड के कोने कोने में हो रहा है।
ग्रहणों- हाहाहा, सिर्फ इस ब्रह्मांड में ही नहीं बल्कि कई आयामों में भी पाप शक्तियों का विस्तार हो रहा है। मैं खुद एक भिन्न आयाम से बाहर निकलकर पृथ्वी पर आया हूँ।
धनंजय- तुझे पाप क्षेत्र में ही रहना चाहिए था दुष्ट, कैद में ही सही पर कम से कम जीवित तो रहता।
ग्रहणों- ग्रहणों को मृत्यु के घाट उतारने की बाद में सोचना देव योद्धा, पहले मेरे दासों से तो निपट लो।

धनंजय ने ध्यान दिया कि उसके वार के कारण चकित हुए भेड़िया, जैकब और एंथोनी फिर से संभल चुके थे। नागराज अभी भी धरती पर बैठा लंबी लंबी साँसे ले रहा था, उसने अपनी आँखें कसकर भींच रखी थीं, उसका शरीर ग्रहणों की स्याह ऊर्जा को नकारने की चेष्टा कर रहा था।
ध्रुव नागराज की ओर देखकर चिल्लाया- “खुद को संभालो नागराज! हमें तुम्हारी ज़रूरत पड़ेगी!”

ग्रहणों- हाहाहा, वह मेरी स्याह ऊर्जा से लड़ने का प्रयास कर रहा है लेकिन उससे कुछ लाभ नहीं होने वाला, तू मेरा दास बनकर रहेगा।

ध्रुव समझ गया था कि फिलहाल नागराज से कोई मदद नहीं मिलने वाली। वह, धनंजय और अभय ही थे जो फिलहाल जैकब, एंथोनी और भेड़िया के विरुद्ध खड़े थे।
भेड़िया गदा लेकर आगे बढ़ा लेकिन उसके सामने अभय आ गया, उसने गदा का तीव्र वार किया लेकिन अभय ने सही समय पर अपनी ढाल सामने कर दी। गदा और ढाल के टकराने से उत्पन्न ध्वनि ने सबके कान गुंजा दिए लेकिन तब तक बाकी सब भी आपस में भिड़ चुके थे।
एंथोनी ने धनंजय पर अपने हाथों से तीव्र ठंडी आग की लहर छोड़ी जिससे धनंजय कूदकर बच गया, धनंजय ने फुर्ती से एंथोनी को अपने स्वर्णपाश में कैद करने की सोची लेकिन तब तक एंथोनी वहां से टेलीपोर्ट होकर एकदम धनंजय के सामने आ गया। धनंजय एकदम हड़बड़ा गया और इसका फायदा उठाकर एंथोनी ने उस पर अपने मुक्के का तेज़ प्रहार किया, धनंजय उस प्रहार से धरती पर गिर पड़ा और एक बार फिर एंथोनी ने अपने हाथ से ठंडी आग छोड़ी जिसकी चपेट में आकर वह तड़पते हुए बोला-
“उफ्फ, ये कैसी आग है जिससे पूरा शरीर अकड़ा जा रहा है! मैं अगर अपना कवच न पहना होता तो न जाने मेरा क्या हश्र होता!”
ध्रुव भी अपनी कलाबाजियों के कारण जैकब के तंत्र वारों से बचता जा रहा था कि तभी उसके दिमाग में एक योजना ने जन्म लिया। ध्रुव ने भेड़िया की गदा से अपनी ढाल द्वारा बचते अभय को सिर हिलाकर कुछ इशारा किया, अभय उसका इशारा समझ गया और भेड़िया के वारों से बचते हुए अपने कदमों को धीरे धीरे पीछे बढ़ाता गया जहां जैकब ध्रुव से जूझ रहा था। भेड़िया को लगा कि अभय उसके तीव्र गदा वारों के चलते ही अपने कदम पीछे हटा रहा है इससे उसे हौसला मिला और गदा के वार और तेज़ हो गए। अभय के पास अभेद्य ढाल तो थी लेकिन उसका शरीर तो सामान्य इंसान का ही था जो गदा के तेज बढ़ते वारों और भेड़िया की पाशविक शक्ति के आगे क्षीण पड़ता जा रहा था। वो धीरे धीरे उस स्थान के एकदम पास आ गया जहां ध्रुव के ऊपर जैकब बेहिसाब तंत्र वारों की वर्षा कर रहा था, वहां पहुंचते ही उसने अपनी ढाल पीछे की और तीव्र कलाबाजी खाते हुए भेड़िया के सिर के ऊपर तक उछला और अपनी टांगों से भेड़िया की पीठ को जोरदार धक्का दिया जिससे भेड़िया जैकब के शक्तिशाली तंत्र वारों के बीच में आ गया। किसी सामान्य व्यक्ति के लिए वह तंत्र वार जानलेवा साबित हो सकते थे लेकिन अमानवीय शक्ति वाला भेड़िया सिर्फ बेहोश होकर रह गया। धनंजय एंथोनी की ठंडी आग के आगे बेबस होता जा रहा था, उसका जिस्म अकड़ता जा रहा था और आंखों के आगे अंधेरा छाता जा रहा था लेकिन तभी एंथोनी पर एक भीषण तंत्र वार हुआ, उसे तुरंत “तंत्र जंजीरों” द्वारा बांध लिया गया, ठीक वैसा ही तंत्र वार जैकब पर हुआ और वह भी तंत्र जंजीरों में कैद हो गया। धनंजय, ध्रुव और अभय ने मुड़कर अपने मददगार की ओर देखा…… तंत्र साधक इरी अब युद्धक्षेत्र में आ चुका था। मामला थोड़ा थमने के बाद ध्रुव धनंजय के पास पहुंचा।

ध्रुव- तुम ठीक हो धनंजय?
धनंजय- उफ्फ, कवच के कारण ज़िंदा बचा हुआ हूँ, वरना उस मुर्दे ने तो मुझे जमा ही डाला था।

फिर ध्रुव का ध्यान इरी की तरफ गया।

ध्रुव- तंत्र साधक इरी? आप यहां?
इरी- हाँ ध्रुव! मैंने ही भेड़िया और जैकब को आयामक यंत्र देकर मुर्दों की दुनिया की पड़ताल करने भेजा था, जब बहुत समय बीत गया तो मुझे चिंता होने लगी। मैंने ध्यान लगाया तो मुझे एंथोनी, भेड़िया और जैकब के साथ मुर्दों की दुनिया के हर कैदी और और रक्षक मुर्दे की मानस तरंगें नागद्वीप से प्राप्त होने लगीं और साथ ही एक भीषण पाप शक्ति के संकेत भी। मैं अपनी तंत्र शक्तियों के ज़रिए इस दुनिया में कहीं भी चुटकियों में पहुंच सकता हूँ, इस मुसीबत का पता लगते ही मुझसे रहा ना गया और मैं यहां आ गया। ज़रूर भेड़िया, जैकब, एंथोनी और अन्य लोगों को इस पाप शक्ति ने मुर्दों की दुनिया में अपने वश में कर लिया होगा और फिर तबाही मचाने सब आयामक यंत्र द्वारा इस आयाम में आ गए।

ग्रहणों दूर खड़ा मुस्कुराते हुए बोला- “चाहे जितनी कोशिश कर लो, लेकिन ग्रहणों से नहीं बच पाओगे।”

ध्रुव- क्या वाकई? क्योंकि जिन प्रलयंकारी शक्तियों को तुमने अपना दास बनाया था, वो सब अब हमारे काबू में आ चुकी हैं।
ग्रहणों- ग्रहणों के सबसे बड़े दास से तुम्हारा लड़ना तो अभी बाकी है लेकिन मुझे शक है कि उसके सामने तुम लोग एक क्षण भी टिक पाओगे!
अभय- कौन है तुम्हारा वो दास?

ग्रहणों बस मुस्कुराया, बड़ी देर से तड़पता नागराज अब खड़ा हो चुका था और उसके चेहरे को देखते ही सबकी सांसें थम चुकी थीं क्योंकि उसका चेहरा आधा स्याह हो चुका था।

अभय- यह बहुत बुरा हुआ, अब तो बचना मुश्किल है।

सब लोग हमले के लिए एकदम तैयार खड़े थे, धनंजय के हाथ में स्वर्णपाश चमक रहा था, इरी तंत्र ऊर्जा का वार करने को मचल रहा था, अभय ने भी ढाल कसकर पकड़ रखी थी हालांकि उसे पता था कि इसका कोई फायदा नहीं है। तभी ध्रुव ने सबको हमला ना करने का इशारा किया और धीरे-धीरे नागराज की तरफ बढ़ने लगा।

इरी- ध्रुव! ये क्या पागलपन है!
ध्रुव (नागराज की तरफ बढ़ते हुए)- पागलपन तब होगा इरी जब हम सीधी लड़ाई में नागराज से जीतने की कोशिश करेंगे। इसकी बढ़ी हुई ताकत का नमूना मैं देख चुका हूँ और यकीन मानो, हमें जान से मारने में इसे पांच मिनट भी नहीं लगेंगे।

नागराज शांत खड़ा था, ध्रुव अब तक उसके एकदम पास पहुंच चुका था। वह नागराज की आँखों में आँखें डालकर बोला- “नागराज! मैं कभी तुम्हारा दोस्त हुआ करता था, क्या तुमको याद है?”
नागराज ने कोई जवाब नहीं दिया तो ध्रुव फिर से बोला- “तुम हममें से एक थे नागराज, ब्रह्मांड रक्षकों में से एक। ये हमको क्या हुआ नागराज? आखिर क्यों हुआ ब्रह्मांड रक्षकों का पतन?”
ग्रहणों नागराज के पास जाकर उसके कान में फुसफुसाया “खत्म कर दो इसे।”
नागराज आगे बढ़ा और ध्रुव की गर्दन थामकर उसे हवा में उठा लिया, यह देखकर इरी एकदम से आगे बढ़ा लेकिन धनंजय ने उसे रोक लिया, उसे भरोसा था कि ध्रुव अब भी कुछ न कुछ कर सकता है। ध्रुव फिर से बोला- “तो क्या तुम मुझे मार डालोगे? जैसे तुमने नागदंत को मार डाला? जैसे तुमने नागमणि को मार डाला? जैसे तुमने हमारे ही एक साथी को मार डाला?”
नागराज के चेहरे पर एक साथ कई भाव आ जा रहे थे। वह उसी क्षण ध्रुव की गर्दन भींचकर उसे मार सकता था लेकिन अंदर से उसे कुछ रोक रहा था। ध्रुव ने फिर से बोला- “क्या तुम मुझे वैसे ही मार डालोगे जैसे एक साल पहले भारती को मार डाला था?”
( जिन पाठकों ने फेज 1 नहीं पढ़ा है उनकी जानकारी के लिए बता दूँ कि नागराज ने हरू ऊर्जा के वश में भारती की हत्या कर दी थी.)
भारती का जिक्र होते ही नागराज ने ध्रुव को एकदम से छोड़ दिया और अपने माथे को पकड़ लिया, कहीं न कहीं उसके अंदर की भीषण दैवीय शक्ति और ध्रुव के सवालों से मास्तिष्क में उठता भावनाओं का बवंडर ग्रहणों की स्याह शक्ति को कमज़ोर कर रहे थे।
ग्रहणों चीखा- “ऐ तू मेरा दास है! आज तक किसी में भी इतनी इच्छाशक्ति नहीं रही कि ग्रहणों के वश में सीधे आदेश की अवहेलना कर सके! तू भी ज़्यादा देर तक ऐसा नहीं कर पायेगा!”
नागराज बेहद तीव्र गति से ग्रहणों के एकदम पास पहुंचकर बोला- “मैं जानता हूँ कि मैं अधिक देर तक तेरी शक्ति विरोध नहीं कर पाऊंगा लेकिन तेरी मृत्यु के बाद मुझे विरोध करने की आवश्यकता ही नहीं होगी!”
इतना कहकर नागराज का शक्तिशाली हाथ ग्रहणों के सीने में पेवस्त होता चला गया और जब हाथ दूसरी तरफ से निकला तो उसमें ग्रहणों का स्याह काला दिल था, जिसमें से काला धुआं निकल रहा था। ग्रहणों की आँखें अविश्वास से फैलती चली गयीं क्योंकि किसी ने पहली बार उसकी स्याह शक्ति का विरोध किया था, और ऐसी ही फटी फटी आँखों के साथ वह मृत्यु को प्राप्त हो गया। ग्रहणों के मरते ही एंथोनी, जैकब और भेड़िया के चेहरों से आधी कलिमा गायब हो गयी। महल में कैद गुरुदेव, नगीना और नागपाशा भी सामान्य हो गए। अब तक नाग प्रहरियों से लड़ते मुर्दे भी एकदम समान्य हो गए थे।

मुर्दों की दुनिया के कैदियों को कालदूत और इरी की मदद से एंथोनी ने अपने गुलाम मुर्दों के साथ वापिस भेज दिया लेकिन वह खुद रुक गया। इतने भीषण युद्ध के बाद पूरे द्वीप पर अजीब सी शांति छा चुकी थी लेकिन आम जनता को क्षति नहीं पहुंची थी, ये सबसे अच्छी बात थी, पंचनागों को उपचार के लिए नागवैद्य के पास भेज दिया गया था। नाग प्रहरी घायल हुए थे लेकिन किसी की जान नहीं गयी थी, यह सब ग्रहणों पर जल्दी काबू पाने का परिणाम था वरना न जाने कितनी ही खून की नदियों बह जातीं। ध्रुव, अभय, एंथोनी, भेड़िया, जैकब, धनंजय, इरी, कालदूत, विसर्पी और नागराज राजमहल के सभागार में पहुंच चुके थे। पाप क्षेत्र के बारे में कालदूत और इरी सभी को पहले ही बता चुके थे।

कालदूत- ये बहुत चिंता का विषय है कि पाप क्षेत्र का द्वार फिर से खुल गया है, मैं खुद उस भीषण ऐतिहासिक महायुद्ध में शामिल था जब बड़े बड़े योद्धा, देवता और ऋषि मुनि एकजुट होकर अतिभीषण पाप शक्तियों के खिलाफ लड़े थे। मुझे लगता था कि वापिस इस आयाम का द्वार खोलना बेहद मुश्किल होगा लेकिन द्वार ना सिर्फ खुला है बल्कि उसमें मौजूद पाप शक्तियां ब्रह्मांड के हर कोने में जाकर तबाही मचा रही हैं, उन्होंने तो मुर्दों की दुनिया तक को नहीं छोड़ा। इसका मतलब यही है कि पाप शक्तियों का प्रवाह केवल एक आयाम तक सीमित नहीं है बल्कि हर आयाम में उनका विस्तार हो रहा है।
इरी- मैंने तंत्र साधना से पता किया है मित्र कालदूत, आज से ठीक छः महीने पहले ग्रहों और नक्षत्रों की दिशा को बदलकर “नायक तिमिर योग” को सक्रिय किया गया है।

इस योग का नाम सुनकर कालदूत के माथे पर बनी चिंता की लकीरें और गहरी हो गईं।

नागराज- आप चिंतित क्यों है महात्मन? ये नायक तिमिर योग क्या है?
कालदूत- नायक तिमिर योग ऐसा विकट योग है जिसके सक्रिय होने पर कई युगनायकों का दमन एक साथ होना निश्चित है।
नागराज- क्या आप ये कहना चाहते हैं कि मेरे हाथों हुई हत्याएं और ब्रह्मांड रक्षकों के पतन का कारण ये नायक तिमिर योग है? नहीं, मैं नहीं मान सकता महात्मन।
ध्रुव (कुछ क्षण सोचकर)- मुझे महात्मा कालदूत के विचारों से सहमत होना पड़ रहा है नागराज, अब जब मैं पिछले दिनों हुई घटनाओं के बारे में सोच रहा हूँ तो ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ एक बहुत बड़ी योजना का हिस्सा था। परमाणु द्वारा सुप्रीमो की हत्या होना, स्टील का तुम्हारे खिलाफ जाकर योजना बनाना, तुम्हारे हाथों हुई हत्याएं, मेरे हाथों हुई वक्र की हत्या, क्या ये सब मात्र एक संयोग हो सकता है? मुझे ऐसा नहीं लगता।

ध्रुव की बातें सुनकर पूरे सभागार में खामोशी छा गयी, नागराज बुरी तरह हिल चुका था, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि किस बात को सच माने और किसे झूठ। नागराज के मन में चल रही कशमकश उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी। जिसे देखकर ध्रुव बोला-
“मैं जानता हूँ कि ये मानना कठिन होगा नागराज लेकिन ब्रह्मांड रक्षकों के पतन के पीछे ज़रूर किसी का हाथ है। कोई जानता था कि पाप क्षेत्र को वापिस खोलने की कुंजी है एक साथ कई युगनायकों के पतन से प्राप्त होने वाली ऊर्जा, शायद इसीलिए नायक तिमिर योग को सक्रिय किया गया ताकि नायक नैतिकता की राह से डिगकर भ्रष्ट हो जाएं।”
नागराज की मुट्ठियाँ भिंच गयी थीं, वह क्रोध से बोला- “अगर वाकई पिछले दिनों हुई घटनाओं के पीछे किसी एक व्यक्ति का हाथ है तो उसे मैं बहुत भयानक मौत दूंगा!”

कालदूत नागराज के क्रोध को जानते थे इसीलिए विषय को बदलने के उद्देश्य से वे धनंजय की तरफ मुड़कर बोले- “स्वर्णनगरी को अवश्य ही पाप ऊर्जा की भनक मिली होगी इसीलिए तुम आज यहां हो देव धनंजय, क्या तुम बता सकते हो कि इसके पीछे किसका हाथ है?”

धनंजय- स्वर्णनगरी के सबसे काबिल वैज्ञानिक प्रसेन इसी खोजबीन में लगे हुए हैं महात्मन।
कालदूत- प्रसेन? वो तो तामसिक शक्तियों के विरोध में हुए महायुद्ध में हमारे साथ लड़ा था, उसी के दिए हुए यंत्र के कारण भोकाल चंडकाल जैसी महाशक्ति को कैद कर पाया था। वो अभी तक जीवित है? मुझे नहीं पता था कि देवों की उम्र इतनी अधिक होती है।
धनंजय- नहीं महात्मन, हम देवों की उम्र लंबी अवश्य है लेकिन इतनी भी नहीं, ना ही हम स्वर्ग में बसे देवताओं की तरह अमर हैं, हमारी औसत उम्र एक हज़ार से दो हज़ार वर्ष तक ही होती है। प्रसेन जैसे काबिल दिमाग की आवश्यकता हमेशा स्वर्णनगरी को पड़नी ही थी इसीलिए उनके शरीर की मृत्यु के समय उनके मस्तिष्क को सुरक्षित करके एक कृत्रिम शरीर में प्रवेश करवा दिया गया। बहुत कम देव होते हैं जिनका मस्तिष्क नए कृत्रिम शरीर को स्वीकार कर पाता है, प्रसेन के मामले में हम भाग्यशाली थे। अभी उनका मस्तिष्क एक कृत्रिम शरीर के अंदर कैद है, इंस्पेक्टर स्टील की तरह।

धनंजय ने ध्यान दिया कि स्टील का जिक्र आते ही नागराज के चेहरे पर हल्के पश्चाताप के भाव आ गए थे लेकिन उन्हें बातचीत का अधिक मौका नहीं मिला क्योंकि तभी धनंजय के कलाईबंद से “बीप बीप” की आवाज़ आने लगी। धनंजय ने एक बटन दबाया और प्रसेन का त्रिआयामी (3D) प्रोजेक्टेड स्वरूप उसके सामने प्रकट हो गया।

धनंजय- कहिये प्रसेन, क्या जानकारी हासिल हुई?
प्रसेन- तुम यकीन नहीं मानोगे धनंजय, किसी ने नायक तिमिर योग को सक्रिय किया था।
धनंजय- मुझे उस योग के बारे में पता चल चुका है प्रसेन लेकिन ऐसा किसने किया था? कौन है इसका जिम्मेदार?
प्रसेन- इतना तो तय है ग्रहों और नक्षत्रों के स्थान को बदलने में किसी बाहरी शक्ति का हाथ है। मैंने अपना खुद का अविष्कार, एक छोटा सा यंत्र अंतरिक्ष में भेजा था जिसकी गति प्रकाश के समान है। उस यंत्र की विशेषता ये है कि वह न सिर्फ किसी भी स्थान से किसी प्रकार की ऊर्जा को डिटेक्ट कर पाता है, बल्कि उस ऊर्जा का स्त्रोत भी बता पाता है। उस यंत्र ने उन ग्रहों को स्थिति का जायजा लिया और उसे वहां से एक विशेष प्रकार की प्रबल तिलिस्मी शक्ति के संकेत प्राप्त हुए, हालांकि इसमें कोई आर्श्चय नहीं है क्योंकि इतने विकट योग को सक्रिय करने के लिए जो भारी मात्रा में ऊर्जा चाहिए वो या तो तिलिस्मी शक्ति की ऊर्जा दे सकती है या फिर यांत्रिक शक्ति की। किसी और तंत्र मंत्र की ऊर्जा इस काबिल नहीं कि ग्रहों की स्थिति को ही बदल दे। खैर, वो सारे ग्रह अब अपनी सामान्य स्थिति में आ रहे हैं यानी कि नायक तिमिर योग का प्रभाव धीरे धीरे खत्म हो रहा है, ये तो होना ही था क्योंकि इतने विकट योग का प्रभाव कुछ महीनों के लिए ही रहता है। बड़ी से बड़ी शक्ति भी इतने विकट योग को हमेशा के लिए सक्रिय नहीं रख सकती लेकिन इस योग को बनाये रखने वाली तिलिस्मी शक्ति का असर भले ही क्षीण पड़ गया हो लेकिन मेरा यंत्र उसे भांप चुका है और मुझे स्त्रोत का पता लग गया है। यहीं पृथ्वी पर महानगर नामक स्थान पर है उस तिलिस्मी शक्ति का स्त्रोत!
धनंजय- मुझे तुरंत उस स्थान के अक्षांश और देशांतर (Latitude and Longitude) की जानकारी भेजो, वो दुष्ट बचना नहीं चाहिए।

प्रसेन का त्रिआयामी स्वरूप गायब हो गया और धनंजय के कलाईबंद पर उस स्थान के अक्षांश और देशांतर की जानकारी उभरकर आ गयी।

धनंजय- मुझे उसका पता लग चुका है, मुझे जल्दी जाना होगा वरना वह हाथ से निकल जायेगा।
नागराज- रुको मैं भी चलता हूँ, नायकों से खिलवाड़ करने वाले से मैं रूबरू होना चाहता हूँ।
ध्रुव- ठीक है फिर, मैं और अभय भी साथ चलते हैं।
भेड़िया- मैं भी चलूंगा मित्र नागराज।
धनंजय- अरे अरे रुक जाओ भाई, इतने सारे लोगों का एक साथ जाना आवश्यक नहीं है।
कालदूत- हमें नहीं पता कि उस स्थान पर कितने खतरे हो सकते हैं धनंजय। मेरी मानो तो नागराज, ध्रुव, अभय, एंथोनी और भेड़िया को लेते जाओ।
धनंजय- जैसा आप उचित समझें महात्मन।

धनंजय ने ध्यान लगाया, उसका स्वर्णपाश फिर से चमकने लगा था।

महानगर के एक पुराने से खंडहरनुमा स्थान पर एक व्यक्ति जल्दी जल्दी कुछ पुरानी ताम्रपत्र से निर्मित पांडुलिपियां एकत्रित कर रहा था जैसे कि वह किसी जल्दी में हो, उसने एक काला चोगा पहन रखा था जिससे उसका चेहरा भी ढका हुआ था। उस अंधेरे स्थान पर जगह जगह मोमबत्तियां जल रही थीं, दीवार और ज़मीन पर कुंडलियों के चित्र बने हुए थे। जल्दी से पांडुलिपियां इकट्ठा करता वह व्यक्ति एकदम से थम गया जब उसके सामने भीषण चकाचौंध कर देने वाला प्रकाश हुआ, यह प्रकाश था स्वर्णपाश के ज़रिए हवा में बने द्वार का जिससे धनंजय, नागराज, ध्रुव, अभय, भेड़िया और एंथोनी उस स्थान पर आ चुके थे। उनके आते ही द्वार बंद हो गया और गुफा में एक बार फिर अंधेरा छा गया। धनंजय ने उस व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा- “यही है इन सभी घटनाओं का जिम्मेदार! इसे बचकर जाने नहीं देंगे!”

आश्चर्य की बात ये थी कि ना तो उस व्यक्ति ने अपने बचाव में प्रहार किया और ना ही वहां से भागने की कोशिश की, वह बस अंधेरे कोने में चुपचाप खड़ा रहा।

नागराज- हमें अपना चेहरा दिखा नीच इंसान! आखिर क्या दुश्मनी थी ब्रह्मांड रक्षकों से जो हमें तूने अपनी घटिया चालों का शिकार बनाया।

नागराज की बात सुनकर भी वह व्यक्ति टस से मस न हुआ।

ध्रुव- ये तुम्हारा आखिरी मौका है, हमें पता है कि तुम तिलिस्मी शक्तियों के मालिक हो लेकिन शायद इतने प्रलयंकारी शक्तिधारियों के सामने तुम भी अधिक देर न टिक पाओ।

वह व्यक्ति धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा, अब वह पर्याप्त रोशनी में आ चुका था जहां उसका चेहरा साफ दिख सकता था। उसने अपना अपने सिर से काले चोगे का उतना हिस्सा हटा दिया जितने ने उसके चेहरे को ढक रखा था। सामने वाले व्यक्ति का चेहरा देखकर सबकी आँखें फटी की फटी रह गयीं, नागराज के चेहरे के भाव देखकर तो ऐसा लग रहा था जैसे न जाने उसके हृदय पर कितना बड़ा आघात हुआ है। वह बड़ी मुश्किल से बोल पाया- “द..दादा वेदाचार्य आप?”

ध्रुव- मैं कभी भी नहीं सोच सकता था कि आप नागराज का या हममें से किसी का अहित चाह सकते हैं वेदाचार्य। उफ्फ, ये सब किसी बुरे सपने जैसा लग रहा है। आखिर क्यों किया आपने ऐसा हमारे साथ? क्यों बर्बाद कर दीं हमारी जिंदगियां? मैं इस मूड से आया था कि जो भी इसका उत्तरदायी होगा उसे तुरंत मौत के घाट उतार दूंगा लेकिन आप… अब मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ।

सामने काले चोगे में खड़े वेदाचार्य के चेहरे के भावों में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया था। वह सिर्फ इतना बोले- “मैंने ये सब जानबूझकर नहीं किया है नागराज, मुझसे उसने करवाया है। उसके कब्जे में भारती की आत्मा है जिसके कारण मुझे उसकी बात माननी पड़ी, मैं जानता हूँ कि मेरा अपराध अक्षम्य है लेकिन तुम भी मेरी स्थिति समझो।”

नागराज- किसके कब्जे में है भारती की आत्मा?
वेदाचार्य- भारती के बड़े भाई “अग्रज” के कब्जे में। मुझे अग्रज ने ही नायक तिमिर योग को सक्रिय करने के लिए मजबूर किया था।
ध्रुव- क्या? भारती का बड़ा भाई भी था? आखिर इस अग्रज का पाप क्षेत्र से क्या संबंध है?
वेदाचार्य- अग्रज भारती और मेरे अतीत का वो भयानक हिस्सा था जिसे हम दोनों ही भुलाकर आगे बढ़ चुके थे लेकिन एक वर्ष पहले ही, भारती की मृत्यु के तुरंत बाद वह वापिस आ गया ……हमारी जिंदगियों में तबाही मचाने के लिए।

To be continued….
Written by- Samvart Harshit for Comic Haveli

Disclaimer- These stories are written and published only for entertainment. Comic Haveli writers have no intent to hurt feelings of any person, community or group. If you find anything which hurt you or should not be posted here, please highlight to us so we can review it and take necessary action. Comic Haveli doesn’t want to violate any copyright and these contents are written and created by writers themselves. The content doesn’t carry any commercial profit as they are fan made dedications to the comic industry. If any, name, place or details matches with anyone then it will only be a coincidence.

14 Comments on “Earth 61 Phase 2 Part 15”

  1. इस भाग की जितनी प्रशंसा की जाए उतना कम। ये भाग मेरा अब तक का सबसे प्रिय भाग रहा है। हर एक संवाद और घटना हृदय में नवीन तरंगे उत्पन्न कर रही थी।
    भेड़िया और ज़िंदा मुर्दा के बीच द्वंद में तो हृदय उद्वेलित ही कर दिया।
    भेड़िया को असल भेड़िया जैसा आप दिखा रहे हैं जो नागराज के इतने शक्तिशाली वार को भी झेल गया और एंथोनी की वारों का भी सहज सामना कर रहा था।
    एंथोनी की शक्ति को भी आपने उत्तम रूप में प्रस्तुत किया है। हरु शक्ति की तरह ही ग्रहणों से भी पार पा गया नागराज बहुत अद्भुत।
    उधेड़ी से युद्ध करते हुए तिरंगा की ढाल का एक नया अध्याय बना दिया आपने और दैवीय धातु से बना बताया है उसे। उधेड़ी के साथ हुयी मुठभेड़ बहुत आकर्षक रही ध्रुव का तिरंगा के साथ उधेड़ी से युद्ध अद्भुत रहा।
    बहुत समय से किन्तु परमाणु का धरातल से अदृश्य रहना अखर रहा है। परमाणु को तो तुरंत पहुँच जाना चाहिए था मठ।
    नागद्वीप में नागराज का युद्ध एंथोनी, भेड़िया और जैकब के साथ अतिसुन्दर था।
    आपने ना जाने कितने रहस्य अभी भी अपने लेखनी में छुपाए हुए हैं लेकिन एक रहस्य आज इस भाग के माध्यम से स्वतंत्र हो गया।

    वेदाचार्य का सच।

    अब देखते हैं ये सच किसको कितनी हानि या लाभ पहुँचाता है?

    1. Ekbaar phr se aapne sabit kardiya ki aap best ho…

      Ab tareef bhi karna chhota shabd lagega mere pas word nhi hai….

      Sach kahu to mujhe pahle se pta tha dada vedacharya hi wo jisne ye kaam kiya hai but maine kabhi zahir nhi kiya qki mujhe sirf doubt tha…mujhe ye laga tha ki Bharti ko khone k gum me aisa kar rhe honge but agraj ko lakar story phr se question mark ban gyi….sahi khel gye bhai manna padega…

      Khair…sabse pahle to mujhe ek chiz janni hai aur wo ye hai ki bhediya ka samajh aata hai ki wo anthony ke aage tik nhi paya aur grahno ne usko gulam bana liya….but anthony ko kaise banaya hoga?? Sabse bada sawal tha…

      Ek baat aur tiranga (Abahy) hamesha se apni dhaal ka use karta tha aur usko pta tha ki uski dhaal har chiz ko kaat sakti hai aur wo itna bewakuf bhi nhi qki wo ye sab notice na kare qki jaha tak mai janta hu wo scd se kisi bhi mamle kam nhi hai mind me aakhir wo jusus hai bhai ek tarah se…..to scd ne hi gaur q kiya ki udheri ko dhaal se mara ja sakta hai…i knw ki scd ko pta tha ki ye devtav ne banaya tha ye dhaal but ye baat abhay ko bhi pta thi qki jab usne hathiyar ka chunav kiya tha tab usko bataya gya tha to mujhe yaha thodi si kami lagi. I hope aap samajh gaye honge….

      Waise scd ne apna bhaukal kam nhi hone diya after all he is SCD…my fav

      Nagraj ki power ka samajh hi nhi aarha h ki koi limit bhi hogi bada ho maza aata hai jab wo apni power use karta hai…kaldoot k treev war se bhi usko halki si cut lagi….lag rha tha man of steel read kr rha hu wow maza aagya….

      Anthony bhediya aur jacob ne baht acha team work kiya….manna padega un logo ne nagraaj ko kabu karliya tha…waise mujhe lag rha tha ki Anthony kahi na kahi nagraj ko rok sakta hai uaki thandi aag k aage koi nhi tik sakta aakhir wo narak ki aag hai jo….

      Ab lagta hai phr se nagraj ki shadi nhi ho payegi jaise rc me nhi hui bada afsos hua…bechara sanpola..

      Yar sach kahu to mann kar rha tha parhta hi jau aur khatam na story line itni behtreen chal rhi hai…aur har chiz aapne itni detail me btayai hai aur har baat ka connection kahi na ho rha hai iske liye bohat dimag chahiye bhai…clap for you..

      Jis tarah dhananjay ne kaha ki prasen steel ki tatah hai aur nagraj ko pachtawa hua…ye sab bas feel kro to lagta hai ki ekdm real chal rha h…aur old heroes ko aap kisi na asur se connect kr rhe hain wo bhi kabile tareef hai ki aap kisi bhi character ko bhulne wale nhi hain sab ko cover kr rhe hai…

      Next part ka besabri se wait hai jaldi lana

  2. Ye part bahut interesting tha jitni tareef ki jaye kam hai . Sabhi Nayko ki miss understanding khatam ho rahi hai ye padkar sahi lag raha hai nahi to sare Nayak hi ek dusre ke shatru ho gaye the.. Kul milakar vary nice Story Sir Ji Aapse ek request hai ki Next part thoda jaldi lana please bahut intjaar karna padta hai. Aap aise hi likhte rahiye humari Duaaye hamesha aapke saath hai….

    1. Bahut Dhanywad Dev bhai aur Jitendra bhai, darasal kahani likhte vakt har pahlu ko jaanchna parakhna padta hai aur puri hone ke bad kuch plus minus bhi karna padta hai isliye kuch samay lag jata hai. Lekin fir bhi mai pryas karunga ki agla bhaag jald se jald release ho.

  3. बहुत ही शानदार कहानी लिखी है भाई आपने मै तो पूरा फैन हो गया आपका आखिरकार एंथोनी की इंट्री हो ही गई अब तो मुझे डोगा और परमाणु की याद आरही है आखिर वो कहा होंगे बहुत दिनों से उनके बारे में कुछ नहीं लिखा आपने

    अगले भाग का इंतेज़ार है

    1. Bahut Dhanyawad Mohit ji aur Vishnu ji, Doga, Parmanu aur Shakti bhi agle bhag me dikhayi denge. Mai koshish karunga ki agla bhag jald se jald aaye

  4. Bahut badiya Bhai her bar ki tarah ek bahut hi badiya raomanchak story lane ke liye. Aap ki story Ka her part pahale se admit jordar hota jata hai. Wajan Scd ki Tarah hi aap Ka bhi dimag hai. Jo aap itane sare heroes, villans her kisi cractor ko leker itani badi Sarina yak ki tarah Maha ghata likh rahe hai. Wakai aap dimag ke dhani hai. Esa likh pana her kisi ke bas ki bat nahi. Agar in sab per comics ban Jaye to maja aa Jaye. Is ke liye aap ki jitani tarif ki Jaye kam hi hai.
    Ab story ki bat kare to pichale part me hi muze bhi in sab ki peeche Dada vedacharya Ka hi kiya dhara laga hai. Aakhir wo tilasim ke sab se badhe ghatya Jo hai. Laga tha ki Ab story Ka end aane hi wala hai, per AGRAJ ke aane se Ab aur bhi Raj khulane wale hai.
    Ab next part Ka intajer hai. Aap Pura samay le Kyki ek aachi story ke liye time to Lagata hi hai. Aaj ke itane biji time me aap hum phatako ki liya apana bahumulay samay Nihal ker itana kuch ker rahe hai jis se hame itani badiya 2 series padane ko mil rahi hai. Wo koi choti bat nahi hai. Aap ne Apane junoon Ka Ab tak jinda rakha hai. Jis Karan hum sab Ka comics se lagav Bana hua hai aur wo kabhi bhi khatam nahi hoga.
    Aap ko bahut bahut dhanwad aur shubhkamnay.

    1. बहुत धन्यवाद विजय जी, अत्यंत हर्ष का विषय है कि आपको मेरा प्रयास इस लायक लगा कि आप उसे सराह रहे हैं। अग्रज इत्यादि के बारे में अगले भाग में और विस्तार से बताने का प्रयास करूंगा ताकि अगला भाग और अधिक रोमांचक बन सके। कथा समापन की ओर है, बस कुछ ही अध्याय बाकी हैं।

  5. Bahut Jabardast story hai. Bheriya aur Anthony ki ladai, bheriya ki grahno se ladai bahut khoob thi. Dhruv ka udheri se samna va abhay ka role mast laga, nagraj ki samrat banne ki prakriya bahut Sundarta se dikhaii hai, jab woh rajdand se prarthna karta hai toh Mann mein ek utsukta thi, nagraj jaisi Shakti bhi anthoni , bheriya v Jacob se ladi v anthoni kinthandi aag ka Kya kehna, in sabke bavjood nagraj grahno ke vash mein aa Gaya phir jab dhruv kehta hai ki hum sab mil Kar bhi nagraj ka samna nahi Kar payenge toh somehow kahi laga ki yahi hai apna best super hero. Dhruv ne his tarah se nagraj ko normal Kiya va nagraj ne his tarah se grahno ko khatm Kiya woh prashanshniya hai. Last but not the least.. vedacharya ka haath in sabke peeche hai.. is baat se pura dimaag ghum Gaya aur aapke dimaag ki daad diye Bina nahi reh paya. Ab bharti ki Atma agraz ke kabze mein hai toh lagta hai ki bharti bhi vapas aa sakti hai.
    Seriously aapki kahani ke bare mein kuch bhi kehna mere samarthya ke Bahar hai. Atulniya, Avishvashniya, Kahani likhi hai aapne. Bahut bahut shubhkamnaye.
    Eagerly Waiting for next part

    1. Bahut dhanywad Pradyumn ji, aage ke bhag me khulne wala hai ek bada rahasya, aasha karta hu ki apko jarur pasand aayega.

  6. Waah is bhag me ग्रहणों damdar entry hui, aur uski taqat ka bahut achhe se prayog dikhaya gya

    उसका यह कथन वह शक्तिशाली नही बल्कि गुलाम शक्तिशाली बनाता है, बहुत मस्त था

    ध्रुव की उस दानव से लड़ाई दमदार थी, अभी अभय को उसके ढाल की ढेर सारी खूबियों के बारे में जानना बाकी है, जो शायद आगे कभी पता चले, नायक तिमिर योग को जागृत करने के पीछे दादा वेदाचार्य थे, उफ्फ
    किसी एक कि भलाई के लिए संसार को एक पाप की अग्नि में झोंक दिया उन्होंने, पर क्या कर सकते हैं, वो भी अपनी जगह गलत नही थे।

    नागद्वीप में जो युद्ध हुए वो काफी दमदार थे, इसमे भेड़िया एंथोनी और जैकब बनाम नागराज देखने को मिला, जो कि भले ही एक निर्णायक युद्ध न हुआ हो पर बहुत शानदार था

    अब अग्रज भी आ चुका है, आगे आगे क्या होता है
    इंतज़ार है

    धन्यवाद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.