Earth 61 Phase 2 Part 16

षोडश अध्याय- अग्रज

(जिन पाठकों ने earth 61 फेज 1 नहीं पढ़ा है उनकी जानकारी के लिए बताया जा रहा है कि नागद्वीप पर हरू प्राणी के विरुद्ध लड़े गये महायुद्ध के दौरान हरू ने नागराज को अपनी शक्ति से वश में कर लिया था। नागराज ने हरू के वश में अनजाने में भारती की हत्या कर दी। जिसका नागराज को बाद में बहुत पछतावा भी हुआ।)

एक वर्ष पहले-

दिल्ली की खून जमा देने वाली सर्दी में चंद लोग ही बाहर खड़े दिख रहे थे लेकिन वो लोग भी जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहते थे ताकि हीटर चालू करके इस सर्दी से निजात पा सकें, जहाँ-तहाँ कोहरे ने अपना साम्राज्य फैलाया हुआ था। सड़क पर इधर उधर व्यवस्थित ढंग से लगीं स्ट्रीटलाइट्स से निकलता मद्धम प्रकाश कोहरे को थोड़ा बहुत भंग कर पाने में कामयाब हो रहा था। ऐसी सर्दी में एक व्यक्ति सीना तानकर सड़क पर आगे बढ़ता जा रहा था जैसे कि उसे सर्दी की परवाह ही ना हो, हालांकि उसने एक मोटी सी जैकेट पहनी थी और हाथों में मोटे दस्ताने भी थे लेकिन वह ऐसी सर्दी के लिए नाकाफी लग रहे थे, वह 25 से 28 वर्ष के बीच का एक युवक लग रहा था। उस व्यक्ति के लंबे बाल उसके कंधे तक आ रहे थे, हृष्ट पुष्ट छः फुट के शरीर का मालिक था वह, उसके चेहरे पर बेहद हल्की-हल्की दाढ़ी थी लेकिन उसकी आँखों में बसा कौतूहल इस बात की गवाही दे रहा था कि कोई काम है जो उसे जल्द से जल्द पूरा करना है।
जल्द ही उस युवक ने कोहरे में भी अपनी मंजिल को ढूँढ लिया था, वह दिल्ली के सबसे बड़े और सबसे प्राचीन पुस्तकालय के सामने खड़ा था। बेहद पुराना होने के बावजूद वह पुस्तकालय काफी भव्य लग रहा था, वह व्यक्ति भी कुछ देर पुस्तकालय की बाहरी सुंदरता को ही निहारता रह गया लेकिन उसके बाद उसने विशाल लोहे के द्वार के बगल में लगी डोरबेल बजायी। डोरबेल के बजने के ठीक एक मिनट बाद किसी ने अंदर से दरवाज़े को खोला, दरवाज़ा खोलने वाला एक 35 से 40 वर्ष के बीच का व्यक्ति था जो कि पूरी तरह से गंजा था लेकिन उसकी मूँछें ऐसे तनी थीं जैसे किसी राजा या महाराजा की तनी होती हैं। उसने एक महंगा सूट पहन रखा था जो कि उसके धनाढ्य व्यक्ति होने की गवाही दे रहा था, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर भी वह बेहद कसरती शरीर का स्वामी था।
गंजे व्यक्ति ने अपने सामने खड़े व्यक्ति से पूछा “कहिये! क्या मदद कर सकता हूँ मैं आपकी?”
बदले में उस व्यक्ति ने ही सवाल दाग डाला- “क्या आपका नाम इतिहास है?”
सवाल सुनकर गंजा व्यक्ति बोला- “जी हां मैं ही हूँ इतिहास, क्या आपको मुझसे कोई काम था?”
“जी हाँ। दरअसल मैं धर्म ग्रंथों और भारतीय संस्कृति के विषय के ऊपर पीएचडी कर रहा हूँ और दिल्ली में विशेष रूप से आपकी इस प्राइवेट लाइब्रेरी को ही देखने आया हूँ। एक तो अंग्रेज़ों के जमाने में भारतीय संस्कृति को सुरक्षित करने के लिए आपके परिवार द्वारा बनाई गई इस लाइब्रेरी को देखने का उत्साह ही अलग है, दूसरा कारण है रिसर्च। जो कि आपकी लाइब्रेरी में रखे धर्म ग्रंथों और प्राचीन पांडुलिपियों के निरीक्षण द्वारा ही संभव है।”
यह उत्तर सुनकर इतिहास ने उस व्यक्ति को बड़े गौर से देखा और फिर बोला- “पहले अंदर आ जाइए आप, वरना सर्दी लग जायेगी!”
वह व्यक्ति अंदर आ गया, पुस्तकालय उसकी उम्मीद से कुछ ज़्यादा ही विशाल था और अंदर तक फैला हुआ था। पुस्तकालय में जगह-जगह चैम्बर से बने हुए थे जिनमें बड़ी-बड़ी अलमारियाँ थी जो विभिन्न पुस्तकों से भरी हुई थी। वहीं पुस्तकालय की दीवारों से सटकर विशाल लकड़ियों से बनी बड़ी-बड़ी अलमारियों में न जाने कितनी सदी पुरानी किताबें धूल खा रही थीं जिनमें कई अत्यंत पुरानी पुस्तकें रखी हुई थीं।
इतिहास ने उस व्यक्ति की तरफ गौर से देखा और कहा- “कमाल है, काफी समय बाद फिर किसी के पांव पड़े हैं इस पुस्तकालय में।”
वह व्यक्ति इतिहास की तरफ देख ही नहीं रहा था, उसका ध्यान इस वृहद स्थान पर चारों ओर फैली किताबों की तरफ था लेकिन इतिहास के प्रश्न पूछने पर वह उसकी तरफ मुड़ा।
उसने इतिहास से कहा- “आपको मैंने किसी न्यूज़ चैनल पर देखा है, बस याद नहीं आ रहा कि कहाँ?”
इस बात पर इतिहास हँस पड़ा और बोला- “ज़रूर देखा होगा और एक नहीं बल्कि सैकड़ों न्यूज़ चैनल पर देखा होगा लेकिन अभी नहीं, कुछ महीने पहले जब मैं अपने पिता के साथ प्राचीन ग्रंथों की खोज में निकला था। हमारा परिवार दिल्ली के नामचीन और रईस परिवारों में से एक है, मेरे पिता मानते थे कि यदि धन का व्यय अच्छे कार्यों के लिए ना किया जाए तो फिर वो धन व्यर्थ ही है इसलिए हम लोग प्राचीन और दुर्लभ वस्तुएं खोजते थे जो कि किसी न किसी प्रकार से भारतीय संस्कृति से जुड़ी हुई हैं और उन्हें भारत सरकार को सौंप देते थे। सरकार भी हमारे काम में हमारी मदद करती थी, फिर धीरे-धीरे हमारी रुचि हर प्राचीन वस्तु से हटकर सिर्फ प्राचीन धर्मग्रंथों और ताड़पत्रों, ताम्रपत्रों से लिखी हुई अति प्राचीन पांडुलिपियों तक सिमटकर रह गयी क्योंकि उनमें ऐसी विलक्षण जानकारियां हैं जो कि दुनिया बदलकर रख सकती हैं। पिताजी ने सरकार से आग्रह किया कि वे इन दुर्लभ ग्रंथों और पांडुलिपियों को अपने प्राचीन पुस्तकालय में रखवा लें, सभी जानते थे कि हमारा पैतृक पुस्तकालय अंग्रेजों के जमाने से यहाँ है इसलिए उन पांडुलिपियों को रखने की इजाज़त हमको मिल गयी। इसी वजह से कुछ समय पहले हम खबर में भी बने हुए थे, फिर अचानक पिताजी को दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु के बाद से ये अभियान भी ठप्प पड़ गया लेकिन तब तक हम भारतवर्ष के दुर्गम स्थानों से इतनी दुर्लभ पांडुलिपियां संचित कर चुके थे जिसमें छुपे ज्ञान की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता पर ये मॉडर्न भारत है, यहां लोगों अपने देश की ही असाधारण चीजों को भी नकार देते हैं और पागलों की तरह विदेशों की घटिया चीजों को भी स्वीकार कर लेते हैं। यही वजह है कि इस पुस्तकालय को आप एकदम वीरान देख रहे हैं, जबकि यहां रखी पांडुलिपियों में लिखी वैदिक संस्कृत का अनुवाद किया जाए तो न जाने हमें कितने विलक्षण ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।”
उस व्यक्ति ने इतिहास की बात का समर्थन किया।
“एकदम सही कह रहे हैं आप, यदि हम मूर्खों की तरह पाश्चात्य सभ्यता को छोड़कर अपनी ही संस्कृति को खंगालने की कोशिश करें तो न जाने ये देश कहाँ से कहाँ पहुंच जाए। वैसे बुरा मत मानियेगा लेकिन मुझे यहां किसी केयरटेकर के होने की उम्मीद थी, ना कि मालिक के।”
इतिहास उसकी बात पर हँस दिया- “हाहाहा, वैसे तो मैं यहाँ कम ही आता जाता हूं लेकिन आज कुछ खास काम नहीं था इसलिए मैं यहाँ आ गया। सोच रहा हूँ कि ये सब पांडुलिपियां भारत सरकार को सौंप दूं, अच्छा होगा कि ये मेरी प्राइवेट लाइब्रेरी की नहीं बल्कि किसी बड़े म्यूजियम की शोभा बढ़ाएं। अच्छा इन सब बातों में मैं तो आपसे आपका नाम और यहां आने का मकसद पूछना तो भूल ही गया।”
वह व्यक्ति कुछ खामोश रहा जैसे कि मन ही मन कुछ सोच रहा हो, उसके बाद इतिहास की तरफ मुड़कर बोला “मेरा नाम अग्रज है, मैंने सुना है कि ऐसे ही दुर्लभ पांडुलिपियों को खोजने के अभियान में आपके हाथ महान ज्योतिषी कालकुंडली द्वारा लिखी गयी एक बड़ी सी पोथी भी लगी है। मैं दरअसल अपनी पीएचडी के लिए पौराणिक काल के बड़े-बड़े ज्योतिषियों पर भी शोध कर रहा हूँ। यदि उनके द्वारा लिखी गयी पांडुलिपियाँ मेरी कुछ मदद कर सकें तो बड़ी मेहरबानी होगी।”
काल कुंडली का नाम सुनकर इतिहास के चेहरे के भाव कुछ बदल गए। वह अग्रज से बोला- “आओ मेरे साथ!”
वे लोग मोटी-मोटी चमड़ी लगी किताबों की कई अलमारियां पार करते हुए सबसे आखिरी बड़ी अलमारी के पास पहुंचे। अब तक जितनी अलमारियों के पास से वे गुजरे थे, सब एकदम खुली थीं, कोई भी उनमें रखी किताबें निकाल सकता था लेकिन ये अलमारी पूरी तरह से शीशे से सीलबंद थी और ऊपर लिखा हुआ था “छूना मना है।”
इतिहास और अग्रज दोनों ही उस अलमारी के पास जाकर खड़े हो गए।

इतिहास- इसी अलमारी में कैद हैं ज्योतिषी काल कुंडली के अमूल्य ज्ञान से भरे पौराणिक दस्तावेज।
अग्रज- लेकिन ये पूरी तरह सीलबंद क्यों है?
इतिहास (अग्रज की तरफ मुड़कर)- मैंने और पिताजी ने मिलकर इन पौराणिक दस्तावेजों का हिंदी अनुवाद किया था और जानते हो कि हमें क्या पता लगा? इन दस्तावेजों में कुछ ऐसी जानकारी कैद है जो गलत हाथों में पड़ जाए तो तबाही मचा सकती है और सबसे आश्चर्य की बात तो ये है कि मैंने या पिताजी में से किसी ने काल कुंडली के दस्तावेजों के मिलने का जिक्र किसी से नहीं किया था लेकिन फिर भी तुम यहाँ तक पहुंच गए। अब या तो तुम मुझे अपनी असलियत बताओगे या फिर जान से जाओगे।

इतना कहकर इतिहास ने छोटी सी पिस्टल अपनी जेब से निकालकर अग्रज पर तान दी। अग्रज मुस्कुराते हुए बोला- “खिलौनों से बच्चों को डराना, अग्रज को नहीं। मैं भी इन पांडुलिपियों की तलाश में एकदम सही स्थान पर जा पहुंचा था लेकिन तब तक तू और तेरे पिता वहां से सारा पोथी पत्रा समेटकर निकल चुके थे।”
अचानक ही अग्रज का एक हाथ बिजली की तेजी से घूमा और पिस्टल इतिहास के हाथ से छिटककर दूर जा गिरी। इससे पहले की इतिहास कुछ समझ पाता, अग्रज ने पास ही मेज पर रखी पुरानी सी छोटी मूर्ति उठायी और पूरी ताकत से उसके सिर पर दे मारी। इतिहास बुरी तरह ज़मीन पर गिरा, कुछ समय के लिए तो उसे लगा कि उसका दिमाग सुन्न हो गया है, उसके सिर से खून बहने लगा था। अग्रज ने उस सीलबंद अलमारी के काँच पर एक जोरदार मुक्का मारा। काँच पर कोई असर नहीं हुआ, उल्टा अग्रज के हाथ पर बुरी तरह लग गयी। चिढ़कर उसने इतिहास की पिस्टल उठा ली और काँच पर दो गोलियां चला दीं, गोलियां काँच से टकराकर इधर उधर चली गईं लेकिन काँच को बस हल्की सी खरोंच आकर रह गयी। इतिहास जमीन पर पड़े पड़े मुस्कुराकर बोला- “ये बुलेटप्रूफ काँच है अग्रज, इस पर गोलियों तक का असर नहीं होगा।”

अग्रज ने एक नज़र इतिहास की तरफ देखा और फिर से काँच से सीलबंद अलमारी की तरफ एकटक देखने लगा, उसकी आँखें बंद हो गईं, अनायास ही उसके हाथ हवा में उठ गए। तभी इतिहास ने अपनी ज़िंदगी का सबसे विलक्षण दृश्य देखा, अग्रज के हाथ से कोई ऊर्जा निकली जिसके स्पर्श से अलमारी पर लगा बुलेटप्रूफ काँच पाउडर में परिवर्तित होकर भुरभुराकर गिर गया।

अग्रज ने आगे बढ़कर काल कुंडली के कई दस्तावेजों में से अपने मतलब की चीज़ खोजना शुरू किया। इतिहास अब तक समझ गया था कि वह इस विलक्षण मानव से नहीं भिड़ सकता। वह खड़ा होकर चीखा- “तुम आखिर हो कौन? चाहते क्या हो?”

अग्रज बिना उस पर ध्यान दिए अपनी खोजबीन में लगा रहा, तभी उसकी आँखें चमक उठीं। उसने एक पतली सी चमड़ी की किताब उठायी जिसके अंदर ताड़पत्रों द्वारा निर्मित तरह-तरह के पौराणिक दस्तावेज मौजूद थे।

उस किताब को हाथ में उठाकर अग्रज बोला- “वाह! एक एक पृष्ठ अभी तक सलामत है, न जाने किस रसायन का लेप लगाकर संरक्षण करते थे लोग इन ताड़पत्रों का जो हज़ार वर्षों बाद भी लिखाई मिटी नहीं है। जानते हो यह किताब क्या है इतिहास?”

इतिहास घबराता हुआ- “ह..हाँ, एक भीषण ऐतिहासिक जंग के बाद अतिप्रबल पाप शक्तियों को कैद करने के लिए एक अलग आयाम की रचना की गई जिसको नाम दिया गया “पाप क्षेत्र”, काल कुंडली उस समय का जाना माना भविष्यवक्ता था। कुछ लोगों का तो ये भी मानना था कि वह पलभर में ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति बदलकर बड़े-बड़े युद्धों के पासे पलट देता था। एक बार तो अपनी कुंडली में राजयोग रचकर प्रसिद्ध साम्राज्य विकासनगर का राजा बन गया था लेकिन महाबली भोकाल ने उसकी सारी योजनाएं निरस्त कर दीं और नगर से बहिष्कृत करवा दिया। भोकाल जैसे शक्तिशाली योद्धा को भी काल कुंडली का सामना करने में अत्यंत कठिनाई हुई, उसका वध भी वो नहीं कर सकता था क्योंकि काल कुंडली ने बड़ी ही शातिरता से अपने और भोकाल के मृत्यु योग को एक कर दिया जिसका अर्थ ये था कि यदि काल कुंडली प्राकृतिक मृत्यु के बजाय किसी और तरीके से मरता तो भोकाल का जीवन भी समाप्त हो जाता। भोकाल भी यदि मरता तो काल कुंडली उसके साथ मर जाता। कुछ समय बाद काल कुंडली का मन सांसारिक मोह माया से हट गया और विकासनगर के बाहर कुटिया बनाकर वहीं आराम से रहने लगा लेकिन ऐसा कुटिल मस्तिष्क व्यक्ति अधिक दिन तक खाली नहीं बैठ सकता इसलिए उसी कुटिया में उसने अपनी असीमित जानकारी को ताड़पत्रों पर उतारना शुरू किया लेकिन इन सबमें सबसे अधिक खतरनाक जानकारी थी पाप क्षेत्र के द्वार को खोलने वाली कुंजी की जानकारी। पाप क्षेत्र के निर्माण के बाद से ही काल कुंडली को ये कौतूहल था कि उसकी योग विद्या, इतने शक्तिशाली आयामद्वार को खोल पाने के काबिल है या नहीं। अक्सर बड़े बड़े आयामद्वारों को खोलने के लिए एक कुंजी चाहिए होती है वरना दुनियाभर की ताकत आपके किसी काम की नहीं, हालांकि इस कुंजी की जानकारी उसे झट से नहीं मिल गयी। उस जैसे विद्वान को भी कई पापड़ बेलने पड़े। पहले उसे लगा कि पाप और पुण्य शक्तियों के भीषण टकराव से उत्पन्न ऊर्जा से पाप क्षेत्र का द्वार खोला जा सकता है, कुछ संभावनाएं ये भी थी कि दो पाप अथवा दो पुण्य शक्तियों के टकराव के कारण भी पाप क्षेत्र का द्वार खुल सकता है लेकिन इन सभी संभावनाओं के बीच आखिर उसे वह कुंजी मिल ही गयी जिसकी उसे तलाश थी, और वह कुंजी थी……पुण्य शक्ति का पाप शक्ति में परिवर्तित होना। ये ग्रहों के एक विशेष संरेखण (alignment) से ही संभव था, जिसके लिए नायक तिमिर योग का सक्रिय होना आवश्यक है। नायक तिमिर योग एक ऐसा योग है जिससे कुछ विशेष युगनायकों के सामने ऐसे हालात प्रकट कर दिए जाते हैं जिनके कारण नायक कुछ अनैतिक कार्य कर बैठते हैं और सच्चाई के मार्ग से डिगकर भ्रष्ट हो जाते हैं। जब काल कुंडली को पता चला कि उसकी खोज कितनी भयानक हो सकती है और गलत हाथों में पड़कर क्या तबाही ला सकती है तो उसने अपनी मिट्टी की कुटिया के भीतर ही अपने सारे लिखित दस्तावेजों को छोड़ दिया और कुटिया छोड़कर कैलाश पर बसने चला गया। उन दस्तावेजों को नष्ट करने की हिम्मत उसमें नहीं थी क्योंकि उनकी रचना में उसका भी काफी समय गया था इसलिए उन्हें वहीं छोड़ दिया, जहां वर्तमान समय में ये हमारे हाथ लग गए।”

अग्रज (तालियां बजाता हुआ)- वाह इतिहास वाह! तुम्हारी जानकारी वाकई विलक्षण है!
इतिहास- काल कुंडली ने खुद ये सब अपनी जीवनी में दर्ज किया है, जब मैं दस्तावेजों का संस्कृत से हिंदी में अनुवाद कर रहा था तब मुझे पता चला ये सब लेकिन तुमने उसकी जीवनी और अन्य लेख वहीं अलमारी में छोड़ दिये हैं और उस पतली सी किताब को उठा लिया जिसमें उसने पाप क्षेत्र और नायक तिमिर योग का जिक्र किया है। तुम्हारे इरादे भयानक हैं अग्रज।

इतना कहकर इतिहास ने अप्रत्याशित रूप से अग्रज पर छलांग लगा दी लेकिन अग्रज ने आगे बढ़ते इतिहास को एक लात मारी। उस लात के वेग से इतिहास को ऐसा धक्का लगा कि पीछे खड़ी सैनिक मूर्ति के हाथ में थमा मोटा सा भाला उसकी पीठ में घुसकर पेट से बाहर निकल आया। इतिहास की तुरंत मृत्यु हो गयी, अग्रज उसकी भाले पर टंगी लाश के पास जाकर बोला- “अगर तू चुपचाप मुझे मेरे मतलब की चीज सौंप देता तो मैं शायद तुझे छोड़ भी देता, अपनी मृत्यु का जिम्मेदार तू खुद है इतिहास। इस किताब के लिए शुक्रिया।”

मूर्ति पर टंगी इतिहास की लाश को छोड़कर अग्रज पुस्तकालय से बाहर निकल आया और उसी घने कोहरे में गुम हो गया जहाँ से वह आया था।

वर्तमान समय में-

उस पुरानी खंडहरनुमा गुफा में खड़े सभी लोग स्तब्ध रह गए थे जब उन्होंने जाना कि नायक तिमिर योग को सक्रिय करने में वेदाचार्य का हाथ है। भेड़िया और अभय वहीं सीढ़ियों पर बैठ गये, वह समझ गये कि बातचीत लंबी जाने वाली है जबकि ध्रुव, जैकब, एंथोनी, धनंजय और नागराज खड़े होकर वेदाचार्य की बातें ध्यान से सुन रहे थे।

नागराज (क्रोध से)- यदि अग्रज भारती का बड़ा भाई है तो उसका कभी मुझसे ज़िक्र क्यों नहीं किया गया?
वेदाचार्य- ये कहानी बहुत लंबी है नागराज, इसकी शुरुआत होती है कई वर्ष पहले, जब मैं तुम्हारे पिता तक्षकराज का राज्य छिन्न भिन्न हो जाने के बाद से अपने पुत्र शिलादित्य के साथ नदी किनारे बसे गांव में दिन काट रहा था, तब मैं भी नेत्रहीन नहीं था। शिलादित्य अक्सर नदी किनारे पानी भरने जाता था, ऐसे ही उसकी मुलाकात एक युवती से हो गयी, वो भी वहां पानी भरने आती थी। शिलादित्य और उस युवती का प्रेम परवान चढ़ने लगा, कुछ दिन बाद उसने मुझे उस कन्या के विषय में बताया। मैंने जब उस कन्या का पता लगाया तो मुझे बड़ी ही चौंकाने वाली जानकारी हासिल हुई, वह चंद्रकलंका थी, तांत्रिकसम्राट तंत्रता की पुत्री।

नागराज- यह तंत्रता कौन था?
वेदाचार्य- उस समय का बहुत ही खतरनाक तांत्रिक था तंत्रता, उसकी शक्तियां मेरी तिलिस्मी शक्तियों के टक्कर की थी। उसी ने नागपाशा को तंत्र विद्या सिखाई थी। उधर तंत्रता को भी पता चल चुका था कि उसकी पुत्री और मेरा पुत्र प्यार में पड़ चुके हैं तो वह याचना करता हुआ मेरे दरवाज़े पर आया ताकि मैं ये रिश्ता स्वीकार लूँ लेकिन मुझे पता था कि तंत्रता जैसे आस्तीन के सांप को मौका देना खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था इसलिए मैंने उसे बेइज्जत करके घर से बाहर निकाल दिया। मैं समझ चुका था कि वह शिलादित्य को अपने घर का दामाद बनाकर उसकी तिलिस्मी शक्तियों का उपयोग बुरे कामों के लिए करेगा। उस दिन तंत्रता तो चुपचाप चला गया लेकिन समस्या वहीं खत्म नहीं हुई, शिलादित्य को लाख समझाने के बावजूद वह चंद्रकलंका का साथ छोड़ने के लिए नहीं माना और एक दिन तो हद ही हो गयी जब मेरी इच्छा के विरुद्ध जाकर वह चंद्रकलंका से विवाह करके उसे मेरी चौखट पर ले आया। उस दिन मैं बहुत अधिक क्रोधित हो गया और शिलादित्य को बुरा भला कहकर उसे घर के अंदर भी घुसने नहीं दिया, शिलादित्य भी मुझसे रुष्ट होकर तंत्रता के घर रहने चला गया। समय बीता और चंद्रकलंका ने दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया, एक पुत्र और एक पुत्री। पुत्र के एक पल पहले पैदा होने के कारण उसका नाम रखा गया अग्रज जिसका अर्थ होता है बड़ा भाई और पुत्री का नाम रखा गया भारती। संतानों के जन्म के बाद तंत्रता और चंद्रकलंका ने शिलादित्य को अपना असली रंग दिखाना शुरू किया, वे बार बार उसपर तिलिस्मी राज जानने के लिए दबाव डालने लगे। एक रात बड़ी भीषण वर्षा हो रही थी, तब मेरे दरवाज़े पर खटखटाने की आवाज़ आई, जब मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने मेरा पुत्र शिलादित्य बुरी तरह घायल खड़ा था, उसके हाथ में उसकी नवजात बच्ची थी। शिलादित्य की आँखों में पश्चाताप के आँसू थे, उसने मुझसे क्षमा माँगी और बताया कि तंत्रता के घर का माहौल बच्चों के लिए एकदम ठीक नहीं है। वह पुत्री को लाने में तो सफल हो गया था लेकिन पुत्र अभी भी दुष्ट तंत्रता के चंगुल में था, उसे लाने के लिए वह वापिस भागा, मेरे हाथ में नवजात भारती को सौंपकर। जब दो दिन तक शिलादित्य की कोई खबर ना आयी तो मैं स्वयं उसकी खोज में चल पड़ा, भारती को मैंने एक तिलिस्म में सुरक्षित कर दिया था ताकि कोई बुरी शक्ति उसके आसपास भी ना फटके। जब मैं तंत्रता के घर पहुंचा तो अपने जीवन का सबसे दुखद दृश्य देखने को मिला, शिलादित्य की क्षत विक्षत लाश वहीं पड़ी थी और चंद्रकलंका भी मरने के कगार पर थी। मारने से पहले उसकी आँखों में पश्चाताप के भाव थे। उसने अपने कृत्यों के लिए क्षमा माँगी, उसने बताया कि कुछ समय बाद उसका मोह शिलादित्य और बच्चों के लिए बढ़ गया था, क्रोध में उसने अपने ही पिता से बगावत कर दी जिसका ये परिणाम हुआ कि तंत्रता ने अपनी ही पुत्री और दामाद को मौत के कगार पर पहुंचा दिया और नवजात बच्चे के साथ भाग निकला। इतना बताने के बाद चंद्रकलंका के प्राण पखेरू भी उड़ गए, उस दिन मुझे पुत्र और पुत्रवधु दोनों का दाह संस्कार करना पड़ा।

सबने ध्यान दिया कि वेदाचार्य की अंधी आँखों में हल्की नमी आ गयी थी लेकिन कोई कुछ नहीं बोला। वेदाचार्य ही कहानी को आगे बढ़ाते हुए बोले-
“फिर मैं शहर आकर बस गया, तक्षकराज का राजज्योतिषी होने के कारण धन मेरे पास पर्याप्त से भी अधिक था। मेरी ख्याति भी विश्व के सबसे बड़े ज्योतिष के रूप में दूर दूर तक फैलने लगी, मैंने वेदाचार्य धाम का निर्माण किया जहाँ बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकें, वहीं से किसी ज़माने में तुम और तुम्हारे नागद्वीप के मित्र भी पढ़े थे। वेदाचार्य चिकित्सालय का निर्माण किया जहाँ गरीब लोगों को मुफ्त दवाइयां मिलतीं और भी कई व्यवसायों एवं लोक कल्याण के कार्यों में हाथ आजमाने के कारण मैं व्यस्त होता गया और भारती भी बड़ी होती गयी। कभी-कभी दिल में तंत्रता को ढूंढकर उसे भयानक मौत मारने की टीस तो उठती थी लेकिन जैसे तैसे मैं अपने मन को शांत कर लेता था, तंत्रता भी भीषण तंत्र शक्तियों का स्वामी था इसलिए अपनी सारी तिलिस्मी शक्तियों के बावजूद मैं उसे ढूंढ नहीं सकता था।”

ध्रुव- लेकिन इन सबके बीच में हम कहाँ से आ गए?

वेदाचार्य- वही मैं बताने जा रहा हूँ ध्रुव, दरअसल कई वर्ष बीत जाने के बाद अग्रज ने एक दिन मुझसे संपर्क किया। यह छह सात वर्ष पहले की बात है जब नागराज, भारती, विसर्पी वगैरह वेदाचार्य धाम में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। मैं तल्लीनता से अपनी साधना में लगा हुआ था कि अचानक अग्रज ने मुझसे मानसिक संपर्क स्थापित करने की चेष्टा की, मैं अत्यंत प्रसन्न हुआ कि इतने वर्ष बीत जाने के बाद अग्रज ने मुझसे संपर्क किया, उसने मुझे बताया कि तंत्रता उसके हाथों गलती से मारा गया। मैंने तुरंत उससे पूछा कि इस वक्त वो कहाँ है, तो उसने एक खंडहर का पता बताया …….इसी खंडहर का जहां अभी हम लोग खड़े हैं। उसने बताया कि तंत्रता ने उसे बहुत छोटी उम्र से ही तंत्र विद्याओं में पारंगत कर दिया था। मैं बिना कुछ सोचे समझे उससे मिलने इस खंडहर में चला आया, अग्रज मुझसे मिला, मैं इतने वर्षों बाद अपने पोते का चेहरा देखकर बहुत भावुक हो गया। मैंने उससे घर चलने को कहा लेकिन उसने मना कर दिया, मेरे बहुत जोर देने पर उसने बताया कि दरअसल जब वह किशोरावस्था में पहुंचकर तंत्र विद्या का माहिर खिलाड़ी बन चुका था तब तंत्रता ने उसे मेरे यानी उसके दादा के बारे में बताया, अपने परिवार के बारे में बताया। वह अग्रज को मुझसे चुपके से तिलिस्मी शक्ति के गहन रहस्य जानने के लिए भेजना चाहता था लेकिन अग्रज ने साफ मना कर दिया कि वह मेरे साथ किसी प्रकार का धोखा नहीं करेगा। तंत्रता को क्रोध आ गया और उसने अग्रज को धमकाया कि यदि वह मुझसे तिलिस्मी शक्ति के रहस्य हासिल करने नहीं जाएगा तो उसका और अग्रज का भीषण टकराव हो जाएगा। अग्रज फिर भी नहीं माना, तंत्रता के सब्र का बांध टूट गया, वह अग्रज से भिड़ गया।

भयानक तंत्र युद्ध चला, तंत्रता अग्रज से अधिक अनुभवी था लेकिन उसके बूढ़े शरीर ने एक समय के बाद उसका साथ छोड़ दिया, अग्रज का भीषण तांत्रिक वार उसके शरीर से टकराया और वह राख में बदल गया। ये कहानी सुनाते हुए अग्रज की आँखों में पश्चाताप के आँसू आ गए थे। उसके हाथों गलती से एक व्यक्ति का कत्ल हो चुका था। उसने मुझसे वादा लिया कि मैं कभी भारती को उसके बारे में ना बताऊँ, वह नहीं चाहता था कि उसकी बहन एक खूनी तांत्रिक की बहन कहलाये। उसने कहा कि अब वह तभी सामने आएगा जब भारती के ऊपर कोई बड़ा संकट मंडराएगा, वरना वह कभी हमसे संपर्क नहीं करेगा। मैं भी उस दिन भारी मन से वहाँ से चला आया, कम से कम दिल में एक तसल्ली थी कि पोता ठीक है। फिर समय बीतता गया, अग्रज की कोई खबर नहीं आयी। फिर मानवता के इतिहास में एक भयानक दिन आया जब हरू प्राणी धरती पर कोहराम मचाने आया था। नागद्वीप पर हुए भीषण युद्ध में वह हरू प्राणी तो पराजित हो गया लेकिन मैंने अपनी पोती खो दी और अग्रज ने अपनी बहन। इतना भीषण दुख तो मैं खुद नहीं झेल पा रहा था तो भला अग्रज को क्या बताता। पुत्र, पुत्रवधु और अब पोती को मृत्यु ने मुझे अंदर से हिला दिया था, मैं अपना ज़्यादा से ज़्यादा समय साधना में गुज़ारने लगा। एक दिन अचानक मुझे घर में किसी की मानस तरंगें महसूस हुयीं, कोई मामूली व्यक्ति तिलिस्म द्वारा सुरक्षित इस घर में इस तरह नहीं घुस सकता था लेकिन यह व्यक्ति तो हर अवरोध को पार करता हुआ मेरे सामने आ पहुंचा, वह था अग्रज। मैं पहली नज़र में तो उसे बिल्कुल नहीं पहचान पाया, उसके चेहरे पर शैतानियत काबिज थी, तांत्रिकों जैसी अजीब सी वेशभूषा और पहले से कहीं अधिक बलिष्ठ शरीर के साथ वह मेरे सामने खड़ा था। वह भारती की मृत्यु के लिए मुझे और नागराज को दोषी ठहराने लगा, मैंने उसे समझाने की लाख कोशिश की लेकिन वह भारती की अकस्मात मृत्यु को स्वीकारने के लिए राजी ही नहीं हुआ। फिर उसने मुझे जो बात बताई वह सुनकर मेरे होश उड़ गए, उसने मुझसे कहा कि तंत्र विद्या का प्रयोग करके उसने भारती की आत्मा को इस मृत्युलोक में ही कैद कर लिया है जिसका अर्थ था कि उसकी आत्मा मृत्युलोक छोड़कर मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकती…….. उसका इरादा था भारती को सशरीर इस दुनिया में वापस लाना।

ये सुनकर नागराज, ध्रुव, एंथोनी, धनंजय और जैकब के साथ सीढ़ियों पर आराम से बैठे भेड़िया और अभय के भी होश उड़ गए। एंथोनी बोला- “इस प्रकार जीवन मृत्यु से छेड़खानी करने की शक्ति आम मनुष्यों के पास नहीं होती है, अग्रज किसी गलतफहमी में जी रहा था कि वह मामूली तंत्र विद्या के बल पर भारती को वापिस ज़िंदा कर सकता है। इसके लिए प्रचुर मात्रा में ऊर्जा चाहिए, जैसे कि मेरी आत्मा को मेरे मुर्दा शरीर में रखने मात्र के लिए नरकाग्नि की ऊर्जा लगती है। उसी ऊर्जा के कारण मेरी असाधारण शक्तियाँ भी कार्य करती हैं और यहाँ हम अतृप्त आत्मा को एक मुर्दा शरीर में रखने की बात नहीं कर रहे बल्कि एक आत्मा को वापिस शरीर देकर ज़िंदा करने की बात कर रहे हैं और वो भी तब जब उसका दाह संस्कार हो चुका हो। क्षमा करना लेकिन मुझे ये संभव नहीं लगता।”

वेदाचार्य- ब्रह्मांड में और ब्रह्मांड के परे ऐसी कई बातें हैं जो एक आम मनुष्य का दिमाग अक्सर नहीं समझ पाता। किसी साधारण मनुष्य के लिए तुम्हारे जैसे ज़िंदा मुर्दे के अस्तित्व पर यकीन करना मुश्किल है जो अपने हाथों से ठंडी आग छोड़ता हो क्योंकि उसने अपनी आम ज़िन्दगी में कभी तुम्हारे जैसा प्राणी नहीं देखा। ठीक उसी प्रकार से तुम्हारे लिए किसी की मृत व्यक्ति को पुनर्जीवित करना एक असाधारण विचार है लेकिन यदि तुम गौर से सोचो तो पुनर्जन्म क्या होता है? उसमें भी तो एक आत्मा बार-बार शरीर बदलकर पुनर्जीवित होने की प्रक्रिया को दोहराती है।
एंथोनी- लेकिन पुनर्जन्म एक अच्छा खासा समय लेने वाली प्रक्रिया है, कई-कई आत्माएं हजारों लाखों वर्ष तक भटकती रहती हैं लेकिन फिर भी उनका पुनर्जन्म नहीं हो पाता क्योंकि इस प्रक्रिया के लिए जो प्रचुर मात्रा में अलौकिक ऊर्जा चाहिए वह हर वक्त हर आत्मा के लिए उपलब्ध नहीं होती।
वेदाचार्य- बिल्कुल सही कहा तुमने, अब जरा सोचो कि यदि किसी व्यक्ति के हाथ ऊर्जा का एक ऐसा अति विलक्षण और प्रचुर भंडार हाथ लग जाये तो उसके लिए एक आत्मा को वापिस जीवन दे पाना क्या बड़ी बात होगी?
ध्रुव- हे भगवान, अब मुझे समझ आया ये पूरा चक्कर। अग्रज पाप क्षेत्र का द्वार खोलना चाहता है ताकि उसमें मौजूद प्रचंड तामसिक ऊर्जा का प्रयोग भारती को फिर से जीवित करने के लिए कर सके।
जैकब- सही कह रहे हो ध्रुव क्योंकि पाप क्षेत्र में कैद अतिप्रचंड तामसिक ऊर्जा के अलावा इस प्रकार का नामुमकिन सा लगने वाला काम करने की क्षमता किसी और मौजूदा ऊर्जा स्रोत में नहीं।
वेदाचार्य (सिर झुकाकर)- सच बताऊँ तो मैं भी इसमें बराबर का दोषी हूँ क्योंकि अपने बेटे को खोने के बाद अपनी पोती को खोने का साहस मैं नहीं कर पाया इसलिए जब ये प्रलोभन मुझे अग्रज ने दिया तो मैं अच्छा बुरा सब भूल चुका था। वो न जाने कहाँ से महाज्योतिषी काल कुंडली द्वारा लिखित कुछ प्राचीन पांडुलिपियां ले आया था जिसमें पाप क्षेत्र को खोलने की कुञ्जी बताया गया था “नायक तिमिर योग” को। मुझे लगता था कि नागराज भारती की सुरक्षा कर लेगा लेकिन हरू ने नागराज के ही माध्यम से भारती का कत्ल करवा दिया, न तो नागराज ही भारती को बचा पाया और न ही अन्य कोई विशिष्ट शक्ति वाले लोग जो रक्षक होने का दावा करते हैं। आखिर क्या फायदा ऐसा ब्रह्मांड रक्षक होने का जो किसी की रक्षा ही न कर पाए? यदि ऐसे रक्षक भ्रष्ट हो भी जाते हैं तो क्या मुझे फर्क पड़ना चाहिए क्योंकि मेरी दुनिया तो उजड़ चुकी थी। मेरे दिमाग में उस वक्त यही सब विचार चल रहे थे, मेरे सोचने समझने की क्षमता काम नहीं कर रही थी, दिमाग पर बस एक ही धुन सवार थी कि किसी भी प्रकार से भारती को वापिस लाना है। अग्रज मात्र तंत्र शक्ति के बल पर नायक तिमिर योग को सम्पन्न नहीं कर सकता था इसीलिये वह मेरे पास काल कुंडली की लिखी हुई पांडुलिपियाँ लेकर आया था, कुछ महीने के अथक प्रयासों और तंत्र एवं तिलिस्म की सम्मिलित शक्ति के कारण आखिरकार नायक तिमिर योग सम्पन्न हुआ और उसका पहला शिकार बना इंस्पेक्टर स्टील। स्टील जानता था कि यदि नागराज के वार के कारण उसके शरीर को क्षति नहीं पहुँचती और उसके मानव अंगों को मशीनी अंगों से नहीं बदला जाता तो शायद वह जानलेवा बीमारी से मर जाता लेकिन फिर भी कहीं न कहीं मन में एक दबा हुआ गुस्सा और प्रतिशोध लेने की एक दमित इच्छा तो थी ही जिसे उभारा नायक तिमिर योग ने। स्टील ने नागराज के खिलाफ षड्यंत्र बुना और उसके शरीर में हलाहल के रूप में सुपरवेनम पहुंचाया, उस वक्त यदि नायक तिमिर योग सक्रिय न होता तो शायद नागराज नागदंत और नागमणि को जीवित छोड़ देता लेकिन उसके अंदर की क्रूरता की भावना ने उसे भी भ्रष्ट कर दिया। परमाणु ने भी नायक तिमिर योग का शिकार होकर सुप्रीमो अहंकारी की हत्या कर डाली जिसके कारण कानून उसका दुश्मन बन गया। ध्रुव जैसा प्रबल इच्छाशक्ति वाला मानव भी बहुत दिन तक इस योग के प्रभाव से नहीं बच पाया और जल्द ही उसके सामने भी ऐसे हालात खड़े हो गये जिनके चलते उसे एक हत्या करनी पड़ी। इन सभी युगनायकों के पतन के कारण उत्सर्जित हुई ऊर्जा से पाप क्षेत्र का द्वार काफी कमजोर हो गया लेकिन उसमें दरार डालने का काम किया नागराज ने ……..अपने ही हाथों से एक नायक की हत्या करके। बस फिर क्या था, पाप क्षेत्र का द्वार खुल गया और परिणाम आज तुम्हारे सामने है। हालांकि अब नायक तिमिर योग का प्रभाव बेहद क्षीण हो चुका है लेकिन अब उसके सक्रिय रहने की ज़रूरत भी नहीं क्योंकि द्वार तो खुल ही चुका है।

अभय- लेकिन नायक तिमिर योग ने बाकी नायकों पर असर क्यों नहीं किया?

वेदाचार्य- यह योग केवल चार से पांच सीमित युगनायकों पर ही असर करता है। वो नायक जिनके पतन से समाज पर भी एक दुष्प्रभाव पड़े। दूसरी बात ये की ब्रह्मांड रक्षक दल का नया नया गठन हुआ था और नागराज, ध्रुव, स्टील, परमाणु और तिरंगा यही लोग सदस्य बने हुए थे, यदि नायक आपस में संपर्क में हैं तो योग का असर बहुत जल्दी फैलता है।

वेदाचार्य ने मानस तरंगों द्वारा ध्यान दिया कि नागराज की कलाइयों से सर्प निकलकर उनके करीब पहुँच रहे थे।

नागराज- हम आपको बिल्कुल नुकसान नहीं पहुंचाएंगे, आपको बस हमें अग्रज का पता बताना है। इस वक्त अग्रज कहाँ पर है वेदाचार्य?
वेदाचार्य- कभी नहीं नागराज, जब तक अग्रज के कब्जे में भारती की आत्मा है। यदि अग्रज को यकीन है कि भारती को वह पुनर्जीवित कर सकता है तो उसे मैं एक मौका देना चाहूंगा।

धनंजय के हाथ में थमा स्वर्णपाश चमक उठा था, वह वेदाचार्य से बोला- “हम आपकी भावनाएं समझते हैं वेदाचार्य जी लेकिन आपको अंदाजा भी नहीं है कि पाप क्षेत्र में कितनी भीषण पाप शक्तियां कैद हैं। वे इस दुनिया को नरक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी इसलिए आपसे आग्रह है कि हमें अग्रज का पता बता दीजिए।”

वेदाचार्य- ओह, तो अब तुम सब मिलकर एक लाचार नेत्रहीन वृद्ध व्यक्ति से लड़ना चाहते हो? वैसे मैं जानकारी के लिए बता दूं कि दुनिया में सिर्फ तुम ही नहीं हो देव धनंजय जो हवा में द्वार प्रकट करके कहीं आ जा सकता है, तुम लोगों के साथ हुई बातचीत ने मुझे इतना समय दे दिया है कि मैं तिलिस्मी शक्ति संचित करके इस स्थान को छोड़ दूं।

वेदाचार्य का शरीर अचानक चमकने लगा, नागराज के सर्प और धनंजय का स्वर्णपाश एक साथ लपके लेकिन उसी वक्त वेदाचार्य का शरीर हवा में घुलकर गायब हो गया। सांप भी बेकार हो गए और स्वर्णपाश के शिकंजे में भी सिवाय हवा के कुछ न आया।

नागराज को तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो व्यक्ति उसके सामने खड़ा है वे वेदाचार्य ही हैं, वो वेदाचार्य जिन्होंने कभी उसके पिता के साथ मिलकर तक्षकनगर के कल्याण के लिए काम किया था।

ध्रुव (नागराज की तरफ देखकर)- तुम ठीक हो नागराज?
नागराज – थक गया हूँ ध्रुव, बार-बार अपने ही लोगों से मिलने वाले विश्वासघात से थक गया हूँ मैं। आख़िर कितना और सहन करना पड़ेगा मुझे? अब तो मैं एक हत्यारा भी बन चुका हूँ।
ध्रुव (नागराज के कंधे पर हाथ रखकर)- अब हमें पता है कि हमारे हाथों हत्यायें क्यों हुई हैं नागराज? हम इन हत्याओं के लिए दोषी नहीं हैं।
नागराज- ऐसा कहकर खुद को दिलासा देने से कुछ नहीं होगा ध्रुव, आज भी जब मैं रात को सोता हूँ तो मुझे नागदंत, नागमणि और स्टील के चलते फिरते मुर्दे शरीर दिखाई देते हैं जो मुझसे गुहार लगा रहे हैं कि मैं उन्हें जान से ना मारूँ। नायक तिमिर योग हो या कुछ और सच्चाई अब यही है कि हमारे हाथों ही खून हुए हैं और हम नायक कहलाने के लायक नहीं हैं।
ध्रुव- शायद तुमने सही कहा, हम नायक कहलाने के लायक नहीं रहे लेकिन फिर भी इन प्रचंड तामसिक शक्तियों को रोकना अब हमारे ज़िम्मे है।
भेड़िया- ध्रुव ठीक कह रहा है मित्र नागराज, ग्रहणों से पार पाने में हम तभी सफल हो पाए थे जब साथ मिलकर काम किया था वरना वो हम सबको वश में कर लेता। अब अगर इन शक्तियों से लोहा लेने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है तो ये काम भी हम विलक्षण शक्ति वालों को मिलकर ही करना होगा।
एंथोनी- माना कि ब्रह्मांड रक्षक दल बिखर गया है, माना कि कुछ युगनायकों के हाथों भीषण अनैतिक कृत्य हो चुके हैं लेकिन अब दो ही रास्ते हैं हमारे पास- पहला ये की भूतकाल की घटनाओं पर विलाप करते रहें या फिर दूसरा ये कि एक बार फिर सीना तानकर उन तामसिक शक्तियों के आगे खड़े हो जाएं जो दुनिया के लिए खतरा बनने जा रही हैं। तुमने कहा कि तुम नायक नहीं रहे नागराज, तुमने कहा कि तुम भक्षक बन गए हो तो फिर आज हमें इस भक्षक नागराज की ही ज़रूरत है ताकि वो उन तामसिक शक्तियों को मुँहतोड़ जवाब दे सके।
नागराज- ठीक है, हम सब साथ मिलकर काम करेंगे। अन्य विशिष्ट शक्ति वालों को भी अपने साथ मिलाने का प्रयास करेंगे लेकिन कोई भी है गलतफहमी ना पाल ले कि ये दल वापिस ब्रह्मांड रक्षक दल बन सकता है। ब्रह्मांड रक्षक दल स्टील की मौत के साथ ही खत्म हो चुका है, अब हम सिर्फ कुछ लोग हैं जो अपनी शक्ति का प्रयोग पाप क्षेत्र की शक्तियों के खिलाफ करना चाहते हैं। मैं अब नागद्वीप का सम्राट हूँ, ध्रुव भी मठाधीश बन चुका है इसलिए हमारे पास अपनी अपनी प्रजाओं की भी ज़िम्मेदारी है इसलिए हमें जल्द से जल्द ये कार्य खत्म करने अपनी-अपनी जिंदगियों में वापिस भी लौटना है।

इसके बाद कोई कुछ नहीं बोला, नागराज ने सच ही कहा था, अब कुछ भी पहले जैसा नहीं रह गया था।

वेदाचार्य एक बड़ी सी पहाड़ी पर आँखें चौंधिया देने वाले प्रकाश के साथ प्रकट हुए, उन्होंने देखा कि अग्रज के सामने एक बलिष्ठ परंतु भयानक आकृति बेहोश पड़ी हुई है। अग्रज वेदाचार्य को देखकर बोला- “मुझे पता नहीं था कि तिलिस्मी शक्तियां एक स्थान से दूसरे स्थान पर इतनी आसानी से पहुंचा देती हैं।”

वेदाचार्य (क्रोधित होकर)- बकवास मत करो! तुम्हें पता है कि उस खंडहर से काल कुंडली की पांडुलिपियां समेटते वक्त क्या हुआ? नागराज अपने साथियों के साथ आ गया, वहाँ से बाहर निकलने का यही एकमात्र रास्ता था लेकिन इसमें मैंने अपनी तिलिस्मी शक्ति का एक बड़ा हिस्सा व्यय करना पड़ा। ये तुम्हारे सामने बेहोश पड़ी आकृति कैसी है? इस आकृति से मुझसे तीव्र राक्षसी ऊर्जा की तरंगें प्राप्त हो रही हैं।
अग्रज- सही समझे आप दादा वेदाचार्य, ये राक्षस ही है ……”महाराक्षस चंडकाल” है ये। आपको इसके बारे में उतना नहीं पता होगा क्योंकि आपने मेरी तरह पाप क्षेत्र के इतिहास पर गहन रिसर्च नहीं की है। इसे महायोद्धा भोकाल ने स्वर्णनगरी के देव प्रसेन द्वारा बनाये गए एक यंत्र द्वारा पराजित किया था जो कि सूक्ष्म रूप में इसके मस्तिष्क में कहीं तैर रहा है। मुझे उस यंत्र को निकालकर इसे वापिस सक्रिय करना है।
वेदाचार्य- तुम्हें इसका निष्क्रिय शरीर मिला कहाँ?
अग्रज- इसे आप मेरी किस्मत कह सकते हैं। मैं तंत्र साधना में लीन होकर पाप क्षेत्र से निकलने वाली हर पाप शक्ति का पता कर रहा था कि तभी मुझे अपने आसपास ही किसी अत्यंत तीव्र पाप शक्ति के संकेत प्राप्त हुए। तभी हवा में एक चमक सी उठी और चंडकाल का निष्क्रिय शरीर यहां इस सुनसान पहाड़ी पर आ गिरा। मैंने पाप क्षेत्र के बारे में ग्रंथों में इतना पढ़ा है कि मैं इसकी शक्ल देखकर ही इसे पहचान गया। पाप क्षेत्र से अति तीव्र तामसिक शक्ति निकली तो सही लेकिन निष्क्रिय शक्ति हमारे किसी काम की नहीं इसलिए इसे सक्रिय तो करना ही पड़ेगा।
वेदाचार्य- इस बारे में हमारी कोई बात नहीं हुई थी अग्रज, पाप क्षेत्र खुल चुका है, तुम प्रचंड तामसिक शक्तियां सोखोगे और भारती को ज़िंदा करोगे, बस यही बात हुई थी।
अग्रज- भारती अवश्य जिंदा होगी दादाजी, भले ही उसके लिए मुझे पूरी सृष्टि को ही तबाह क्यों न करना पड़े। चंडकाल को सक्रिय करना आवश्यक है क्योंकि फिलहाल पाप क्षेत्र की सभी तामसिक शक्तियाँ बाहर नहीं आ पाई हैं और नायक तिमिर योग का प्रभाव खत्म होने के कारण द्वार पूरी तरह नहीं खुल पाया है। चंडकाल के पास ऐसी भीषण काली शक्तियाँ हैं जिनसे पहले से ही कमज़ोर पड़ गये द्वार को पूरी तरह से खोला जा सकता है। द्वार पूरी तरह से खुलने पर ही वातावरण में ऐसी प्रचंड पाप ऊर्जा का प्रवाह होगा जिसे मैं अपनी तंत्र ऊर्जा द्वारा सोखकर महाशक्तिशाली बन जाऊंगा और उन शक्तियों की मदद से अपनी बहन को एक बार फिर जीवित करूँगा।

तभी वेदाचार्य का ध्यान अग्रज की बातों से हट गया, उन्होंने इधर उधर देखना शुरू कर दिया।

अग्रज- क्या हुआ दादा वेदाचार्य?
वेदाचार्य- समीकरण वापस बदल रहे हैं अग्रज, जो नायक भ्रष्ट हो चुके थे, स्वार्थी हो चुके थे वे वापिस नैतिकता का मूल्य सीख रहे हैं। नायक इतनी बुरी तरह से टूटने के बावजूद, अपना सब कुछ खोने के बावजूद, एकजुट होंगे और लड़ेंगे पृथ्वी पर आई सबसे भीषण आपदा के खिलाफ। एक बार फिर से अपनी ही राख से फीनिक्स की तरह जन्म लेंगे……. ब्रह्मांड रक्षक।
अग्रज (गुस्से से)- असंभव! आपकी ये भविष्यवाणी गलत है! नायक तिमिर योग ने उन्हें बुरी तरह अशक्त कर दिया था, पथभ्रष्ट कर दिया था, नायक शासक बन चुके थे एक विशिष्ट दायरे में सिमटकर रह गये थे। फिर आखिर कैसे वे इतनी शक्ति जुटा पाये कि वापिस एक साथ खड़े हो सके?
वेदाचार्य (गहरी साँस लेकर)- तुम “नायक” शब्द का गलत अर्थ निकाल रहे हो अग्रज। जानते हो एक नायक होने का सबसे बड़ा लक्षण क्या है? बड़ी बड़ी मुसीबतों से बाहर निकलना या हरदम दुनिया की रक्षा करना एक नायक का कर्तव्य है लेकिन उसके नायक होने की असल परीक्षा तब होती है जब उसे बुरी तरह से तोड़ दिया जाए, सारे हालात उसके विरुद्ध हो जायें। वो कोई ऐसी गलती कर बैठें, जिसका पश्चाताप तक संभव न हो और वह पूरी तरह से बदल जाये। अक्सर ऐसी परिस्थिति में नायक खलनायक बन जाते हैं, वो आसान रास्ता अपना लेते हैं, तबाही का रास्ता लेकिन जो व्यक्ति इस विषम परिस्थितियों में भी आत्मबोध करके अपने सच्चे स्वरूप को पहचान ले, वह है नायक। नायक इन तामसिक शक्तियों से लोहा लेने आ रहे हैं अग्रज ……. वो जल्द आ रहे हैं!

To be continued….
Written by- Samvart Harshit for Comic Haveli

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7 Comments on “Earth 61 Phase 2 Part 16”

  1. अत्यधिक मनोहारी।
    कहानी जिस गति और आधार पर आगे बढ़ी है तो इसने विभिन्न पहलुओं को छुआ है और सफलता एक नया अध्याय रचती हुई इस लक्ष्य तक पहुँची है।
    कह पाना अधिक सरल लगता है किंतु यह आपके लिए सरल हुआ नहीं होगा इतनी महीनता से इस कथा को सोचना और उसे लेखनी से इस उत्तम रूप में ढालना।
    नायकों के पतन से लेकर अब नायकों के उदय तक कहानी आ चुकी है। जहाँ नायकों ने अपने मूल रूप खोया है तो एक ओर नागराज है जिसने अपनों को खोया है।
    उसका प्रिय ही विश्वासघाती हुआ और उसकी मृत्यु के इतने निकट लाने का उत्तरदायी भी! भले नागराज एक असंभव से मार्ग पर जीवित होकर आया हो किन्तु उसे इस विश्वास घात की आशा नहीं थी।

    भारती जिसे नागराज स्वयं ही जीवित देखने को लालायित होता किन्तु इस मूल्य पर? कदापि नहीं।

    अग्रज एक नया कोण लेकर आया है कथा में जो अब चंडकाल को पुनः सक्रिय कर पृथ्वी पर प्रलय लाएगा।
    किन्तु इस बार सभी नायक पूर्व की भाँति व्यवस्थित नहीं हैं तो क्या रोक पायेंगे इस तांडव को?

    डोगा सभी दृश्यों से अभी तक दूर है उसका आगमन कैसा होगा देखना है।

    जिस प्रकार से आपने काल कुंडली, इतिहास और अग्रज को नायक तिमिर योग से जोड़ा है वो अद्भुत है अविश्वसनीय है।
    भोकाल का नाम अब तक अत्यधिक कहानी में प्रयुक्त हुआ है किंतु वह कहानी से नदारद है यह कचोटता है किंतु यही कथा की माँग भी है।

    आने वाले भाग के लिए शुभकामनाएं।

  2. हर्षित भाई एक अविस्मिर्णय कहानी का एक अविस्मरणीय अध्याय।

    कहानी के तौर पर अति उत्तम

    पर नागराज की उम्र वेदाचार्य के अनुसार 27 वर्ष?

    वो तो हाइबरनेशन में था?

    तक्षकराज कहानी से बस 27 वर्ष पहले?

    ये एक अनसुलझा प्रश्न है।

    नायकों के पतन के बाद उत्थान की कभी न भूल सकने वाली कहानी है ये

    गलतियां हुई यहाँ

    पर कहानी श्रेष्टय है

  3. Kahani k shuru me agraj jab itihas k paas pahucha to vo scene Acha laga
    But itihas ko jab agraj pe shak ho hi gaya tha to use vo kaalkundali k likhe pandulipi k paas kyu lekar gaya
    Aur itihas ka marna thoda unnecessary laga

    Uske baad Raaj khula ki kyu paap khestra ko kholna cahta h agraj, jab paap khestra ka naam aaya tha to mujhe sadham ki entry hogi laga tha par ye twist Acha laga, phase 1 me bharti k marne se is poore phase 2 ki mahagatha ka aadhar rakha gaya, ye connection badiya kiya

    Bhokal aaya to nahi par uska mention kahani me aata raha h(us bechare ko isi se kaam cahalna padega, itihas bhi mar gaya varna le aata use Bhoot kaal se… oops par is itihas k paas to vo power hi nahi thi)

    Nayako k vapas ekjut hone wale scene k dialogues bahut ache the, poora hero jab buri tarah villain se pitkar reentry marta h us type, ab to hoga mahasangram

    Thanks for the entertainment

  4. Bahut Dhanyawad Rajat ji, Abhilash ji, Dev ji aur Gaurav ji. Aap log apna bahumulya samay dekr kahaniya padh rhe hain wahi bahut hai, ye part thoda chhota rakhna pada ummed hai ki aage ane wale bade bhag ko bhi aap utna hi pasand karenge. Samapan bus hone hi wala hai.

  5. प्रिय हर्षित जी,
    यह भाग छोटा था, पर अब तक की घटनाओं का आधार था। अग्रज का खलनायक व हत्यारा होना, कालकुंडली का इतिहास, इतिहास के पुस्तकालय में ज्योतिष की पोथी आदि बहुत बढ़िया प्रयोग थे।
    अग्रज का पापक्षेत्र खोलने का उद्देश्य मुझे संदिग्ध लग रहा है। संभवतः तंत्रता ने अग्रज के शरीर पर कब्जा कर लिया हो।
    वेदाचार्य अब चंडकाल को जिंदा करेंगे। पर मुझे इसमें संदेह लग रहा है। शायद तंत्रता अग्रज के सहारे दुनिया जीतना चाहता है।अस्तु, यह सब तो आगे पता चलना है ।
    अब यह देखना है कि क्या सचमुच नायक दुबारा ब्रह्मांड रक्षक बनेंगे या केवल सम्राट/मठाधीश आदि ही रहेंगे और स्टील का क्या होगा?

    कहानी में सधम और अधम भी आ सकते हैं,यह भी देखना है।

    कुछ बातें कहानी में दोषपूर्ण लगी-

    १- वेदाचार्य २७ साल पहले की बात कर रहे हैं। पर बीच में तो ४० वर्ष नागराज मृतावस्था में था उस समय काल का क्या हुआ? इससे बेहतर आप कितने साल हुये, ये लिखते ही नहीं । ‘अग्रज’ कॉमिक की तरह।

    २- वैदिक संस्कृत हर पुस्तक में नहीं है। केवल चार वेदों की भाषा वैदिक संस्कृत है।बाकी जितने भी ब्राह्मण ग्रंथ,स्मृति ग्रंथ, वेदांग,दर्शन,इतिहास आदि है- वे लौकिक संस्कृत में हैं, वैदिक में नहीं। अतः आप कह सकते थे कि इन ग्रंथों की गूढ़ संस्कृत भाषा का अनुवाद करके हमें कई बातें पता चल सकती हैं।वैसे ये बहुत बड़ा दोष नहीं है। लोग कम ही जानते हैं वैदिक साहित्य के बारे में।

    हाँ, उत्तरोत्तर भागों में आपकी शाब्दिक त्रुटियां न के बराबर हो रही हैं।
    बाकी अगले भाग का इंतजार रहेगा।

    – कार्तिक अय्यर

  6. वाह
    इस कहानी में कुछ conculusion देखने को मिले, इतिहास का छोटा सा ही पर अच्छा रूप देखने को मिला, हो सकता है इसके बाद उसे अपनी शक्तियों का ज्ञान हो,

    वेदाचार्य का फ्लैशबैक और उन्होंने जो किया उसके पीछे की कहानी भी अच्छी थी, इंसान प्रेमवश में स्वार्थी ही हो जाता है चाहे ये उसकी मजबूरी हो या चाहत

    पर इतना सब हो जाने के बाद भी सब नायक मिलकर इस आफत से निबटना चाहते है, अब उम्मीद की एक किरण मिली है, पर अग्रज के ख्यालात इन सबसे कही आगे हैं, वो भारती को जरिया बनाकर वेदाचार्य से अपना काम निकलवा रहा है, वरना सारी दुनिया तबाह होने के शर्त पर ज़िंदा करना, ये कुछ ठीक मंशा नही लगी उसकी

    और अब तो चंडकाल भी आ चुका है

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