Earth 61 Phase 2 Part 19

एकोनविंशती अध्याय- वीरगति

पचास हज़ार वर्ष पूर्व-

उस युद्ध की विभीषिका को झेल सकने का पर्याप्त साहस हर वीर में नहीं था, तामसिक शक्तियाँ अपने चरम पर थीं, जिसके कारण दिन के दूसरे पहर के समय दिखाई देने वाले स्वच्छ नीले आकाश की जगह भी काला स्याह अंधकार दिखायी दे रहा था। पृथ्वी पर रहने वाली सभी प्रजातियां एकजुट होकर लड़ रहीं थीं, चाहे वो स्वर्णनगरी में वास करने वाले देव हों, विकासनगर जैसे समृद्ध राज्य के सम्राट हों, अद्वितीय शक्तियों से परिपूर्ण इच्छाधारी सर्प हों, पृथ्वी पर रहने वाले विलक्षण महानायक हों या फिर सदियों की तपस्या से तपोबल अर्जित करने वाले ऋषि मुनि, सभी इन पाप शक्तियों से हो रहे युद्ध में अपना पूरा बल लगा रहे थे। इसके अलावा उनकी सहायता के लिए स्वयं देवराज इंद्र, अग्नि देव, वरुण देव, पवन देव और मृत्यु को अपने अधीन रखने वाले यमराज स्वर्गलोक को छोड़कर धरती पर आए थे। जहाँ उत्तरी दिशा में स्वर्णनगरी के देवों का नेतृत्व वैज्ञानिक प्रसेन कर रहे थे, वहीं दक्षिणी दिशा से हो रहे इच्छाधारी नागों के हमले का नेतृत्व महात्मा कालदूत के पास था, पूर्व दिशा की बागडोर संभाली थी नागा ऋषियों ने, जिनका नेतृत्व कर रहे थे श्वेत शक्तियों के सबसे बड़े साधक बाबा गोरखनाथ, पश्चिमी दिशा से बढ़ रहे थे अति विलक्षण मानव अतिक्रूर, सम्मोहन सम्राट शूतान, सप्तशक्तिधारक गोजो, अश्वराज और पंचतत्व शक्तिधारक प्रचंडा। यह ऐतिहासिक युद्ध बहुत बड़े स्तर पर लड़ा जा रहा था।

चारों ओर से पर्वतों से घिरी छोटी सी घाटी इस वृहद युद्ध का केन्द्र थी जहाँ पर महाराक्षस चंडकाल अपने बीस फुट के शरीर वाले सेनाध्यक्ष तपनासुर, पाप शक्तियों के प्रतिनिधि निशाचर और विलक्षण शक्ति वाले ग्रहणों के साथ आगे की युद्ध नीति पर विचार विमर्श कर रहा था। अभी पुण्य शक्तिधारियों को तामसिक शक्तियों ने आगे बढ़ने से रोक लिया था, चारों दिशाओं से आती एक भी सेना अभी उन तक नहीं पहुँच पायी थी।

तपनासुर- महाराक्षस चंडकाल! इन नराधम देवताओं ने भी पृथ्वीवासियों का साथ देने का निश्चय कर लिया है जिसके कारण हमारी जीत का संभावना न्यून प्रतीत हो रही है।
चंडकाल- हम पाप शक्तिधारियों का उद्देश्य है ब्रह्मांड से पुण्य शक्तिधारियों को नष्ट करके इस सृष्टि की अपने अनुसार रचना। तुमको क्या प्रतीत हो रहा था कि देवता हमारा मार्ग अवरुद्ध करने का कोई प्रयास नहीं करेंगे?
निशाचर- हमें पाप ऊर्जा में भी सबसे सर्वश्रेष्ठ पाप ऊर्जा अर्थात स्याह ऊर्जा के धारकों को युद्ध हेतु भेजना होगा। पापराज और उधेड़ी जैसे सेनानायक सक्षम अवश्य हैं लेकिन वे देवताओं और पृथ्वी व उसमें रहने वाले विलक्षण महानायकों के आगे नतमस्तक होने में अधिक समय नहीं लगाएंगे।
चंडकाल- तुम कदाचित उचित कह रहे हो किन्तु स्याह ऊर्जा को मेरे अतिरिक्त कुछ ही प्राणियों ने धारण किया हुआ है और वे सभी प्राणी अभी मेरे सम्मुख खड़े हैं। आखिरकार महाकाल छिद्र की कृपा हर पाप शक्तिधारक पर तो नहीं होती ना!

तभी पापराज तेजी से हवा में उड़ता हुआ आया और चंडकाल के चरणों के समीप गिर पड़ा, वह बहुत घायल हो चुका था। उसके इस तरह आने से उनकी मंत्रणा में भी विघ्न पड़ गया।

चंडकाल- पापराज! तुम्हारा ऐसा हश्र किसने किया?

पापराज शीघ्र उठा, वह व्याकुल हो गया था, उसने अधीर होकर शीघ्रता पूर्वक कहा- “अनर्थ हो गया महाराक्षस! देवताओं ने ऋषियों के तपोबल की सम्मिलित शक्ति से पाप क्षेत्र का द्वार खोल दिया है और एक के बाद एक तामसिक शक्तियों को उसमें कैद किया जा रहा है!”

चंडकाल के चेहरे पर आश्चर्य और अविश्वसनीयता के मिले जुले भाव उभर आये। वह पापराज की गर्दन पकड़कर बोला- “क्या अनर्गल वाच रहा है! सभी को भान है कि पाप क्षेत्र एक मिथ्या है, यदि वह सही में उपस्थित है और यदि हमारे आराध्य महाकाल छिद्र और स्याहविवर सही में बंधक हैं तो द्वार खुलने पर वे बाहर क्यों नहीं आये?”
पापराज- क्योंकि बहुत भारी मात्रा में ऊर्जा के उस द्वार से विसर्जित होने के लिए द्वार पूरी तरह खुला होना चाहिए लेकिन देवताओं ने धूर्तता कर दी, बस इतना ही द्वार खुला रखा है कि जिससे हम जैसे पाप शक्तिधारी उसमें प्रविष्ट हो सकें और पाप क्षेत्र जैसे आयाम के द्वार को उस आयाम के अंदर रहकर पूरी तरह खोलना स्याहविवर और महाकाल छिद्र के लिए भी असंभव है क्योंकि उस आयाम में जाकर हम पापशक्तिधारियों की शक्ति आधी से भी कम हो जाती है।
चंडकाल- मैं जब तक स्वयं से ना देख लूँ तब तक ऐसी मूर्खतापूर्ण कथनों पर विश्वास नहीं करता हूँ। इस वार्ता के विषय में किसी और से चर्चा मत करना क्योंकि मैं नहीं चाहता कि जब तक हम खुद इस तथ्य की पुष्टि न करें, तब तक ये विचार हमारी सेना तक पहुँचकर उन्हें भयभीत करे।
पापराज- जैसी आपकी आज्ञा महाराक्षस।
निशाचर- हमारी बाकी सेनाओं का प्रदर्शन कैसा है? पश्चिमी दिशा में उधेड़ी एक टुकड़ी लेकर महानायकों को रोकने गया था ना? क्या हुआ?
पापराज (हिचककर)- विशिष्ट शक्तियों वाले मानव पूरी टुकड़ी पर भारी पड़ रहे हैं। जहाँ प्रचंडा, अश्वराज, अतिक्रूर और शूतान ने पूरी सेना को संभाल रखा है वहीं सप्तशक्तिधारक गोजो उधेड़ी से भीषण मल्लयुद्ध कर रहा है। किसकी पराजय होगी इसका अनुमान लगाना संभव नहीं है।
चंडकाल- तो जाकर उसकी सहायता करो मूर्ख! यहाँ हमारे साथ वार्तालाप करके समय नष्ट मत करो।
पापराज- जो आज्ञा महाराक्षस!

इतना कहकर पापराज आकाश में उड़ता हुआ पश्चिमी दिशा की ओर बढ़ने लगा। उसके जाने के बाद ग्रहणों चंडकाल की ओर देखकर बोला “क्या लगता है महाराक्षस? क्या ये पाप क्षेत्र के विषय में सत्य कह रहा था?”

चंडकाल- पता नहीं ग्रहणों, अब तो इस बात की पुष्टि करने का एक ही तरीका है कि जल्द से जल्द हम स्वयं पुण्य शक्तियों को चुनौती देने के लिए मैदान में उतरें।

उस पहाड़ में बनी घाटी से कई कोस दूर सिर्फ चार महायोद्धाओं ने तामसिक शक्ति वाले प्राणियों की पूरी पलटन को पहाड़ के एक संकरे रास्ते पर रोक रखा था। अतिक्रूर ने पूरा का पूरा रथ उठाकर सेना पर फेंक दिया, उसका चमत्कारी अस्त्र दंतक वीभत्स प्राणियों के मस्तक फोड़ने के काम आ रहा था। सम्मोहन सम्राट शूतान ने भी अजब अनोखी चाल चली, उन प्राणियों को उनसे भी भयानक स्वरूप वाले जीव जटिल सम्मोहन द्वारा दिखाने आरम्भ किये जिसके कारण कई प्राणी तो पहाड़ के किनारे बनी बड़ी सी खाई में कूद गए और उनके प्राण पखेरू उड़ गए। प्रचंडा के तो इशारे मात्र पर भूमि से बड़े बड़े पत्थर से बने हाथ निकलकर राक्षसों को जकड़ने लगे लेकिन सबसे भीषण मल्लयुद्ध चल रहा था उस पलटन के सेनानायक उधेड़ी और सप्तशक्तिधारक गोजो के मध्य।

गोजो- संहारक मुझे अपनी शक्ति दो!
उधेड़ी- चाहे जिसकी शक्ति ले ले गोजो, उधेड़ी के हाथों से तुझे तेरी कोई शक्ति नहीं बचा पाएगी।

संहारक शक्ति के कारण गोजो का शरीर पाषाण का हो गया था इसलिए उधेड़ी के वारों से उसे कुछ हद तक सुरक्षा मिली थी, गोजो ने एक बार फिर अपनी एक शक्ति का आह्वान किया “मुझे अपनी शक्ति दो बिजालिका!”
इतना कहते ही उसके हाथों से बिजली का भीषण प्रवाह उधेड़ी के शरीर तक गया और उसे दूर उछाल फेंका।
सैकड़ों की तादाद में सेना को संभालते अतिक्रूर ने गोजो से पूछा- “महाबली भोकाल युद्ध भूमि में कब प्रविष्ट होंगे?”

गोजो- भोकाल विकासनगर में तामसिक शक्तियों के हमले के बाद अपनी गर्भवती पत्नी तुरीन को किसी सुरक्षित स्थान पर छोड़ने गया था, वह आता ही होगा।
शूतान- तो ये मनाओ की वो जल्द से जल्द आ जाये क्योंकि ये युद्ध क्षण प्रतिक्षण और अधिक विषम होता जा रहा है।

तभी उन्हें दूर आसमान में एक द्वार खुलता नज़र आया।

प्रचंडा- ओह, यानी कि ये सत्य था, पाप क्षेत्र का अस्तित्व मिथ्या नहीं है।
गोजो- तो फिर इससे अधिक प्रसन्नता की बात कुछ नहीं हो सकती, देवताओं की शक्ति से एक बार फिर पाप क्षेत्र का द्वार खुला है तो हमें अधिक से अधिक तामसिक शक्तियों को उस ओर भेजने का प्रयत्न करना चाहिए।

तभी गोजो ने देखा कि उधेड़ी एक बार फिर क्रोध में उसकी तरफ बढ़ रहा था परंतु इस बार वह सावधान था। वह चिल्लाकर बोला- “संहारक और शाकाल, दोनों मुझे अपनी शक्ति दो!”
इतना कहते ही उसका पूरा शरीर पाषाण में तो बदला ही लेकिन साथ ही उसकी पीठ पर दो विशाल पंख भी उग आए। इससे पहले की उधेड़ी कुछ समझ पाता, वह गोजो की शक्तिशाली भुजाओं में कैद था और उसे लेकर गोजो पंख फड़फड़ाता हुआ पाप क्षेत्र के द्वार की ओर बढ़ रहा था, उधेड़ी ने छूटने का बहुत प्रयास किया किन्तु उस समय गोजो की संहारक शक्ति की पकड़ से शायद मृत्यु भी स्वयं को ना छुड़ा पाती, पाप क्षेत्र के पास पहुँचते ही गोजो उधेड़ी से बोला-
“अब तू सदा के लिए एक ऐसे स्थान पर कैद होने जा रहा है जहाँ से वापसी का मार्ग संभव नहीं!”

गोजो पूरी शक्ति लगाकर उधेड़ी को पाप क्षेत्र के उस पर फेंक ही देता लेकिन तभी उससे कई सारे विशाल शरीर वाले भयानक प्राणी आकर लिपट गये, जिसके कारण उधेड़ी उसकी पकड़ से स्वतंत्र हो गया। गोजो ने देखा कि दूर आसमान में तैरता पापराज अपने वृहद मुख से उस पर विशालकाय प्राणियों की बौछार कर रहा था।

पापराज- मैं जानता था कि पाप क्षेत्र मिथ्या नहीं बल्कि सत्य है लेकिन महाराक्षस चंडकाल की प्रबल शक्तियों से तुम मूर्ख परिचित नहीं हो, तुमने पाप क्षेत्र का द्वार नाममात्र के लिए खोला है ताकि हम जैसे क्षीण पाप शक्ति वाले प्राणी तो उस ओर जा सकें लेकिन वहाँ पहले से कैद पाप ऊर्जा के भंडार महाकाल छिद्र और स्याह विवर इस ओर न आ सकें। महाराक्षस चंडकाल अपनी शक्तियों से इस द्वार को पूरी तरह खोल देंगे और फिर उन दो भीषण महाशक्तियों के स्वतंत्र होने पर यह युद्ध पूरी तरह से हमारे पक्ष में होगा।

तभी पापराज को भूमि से निकले एक वृहद हस्त ने जकड़ लिया, प्रचंडा गोजो की मदद करने पहुँच चुका था। प्रचंडा क्रोध में भरकर बोला- “तूने सही कहा, चंडकाल में पाप क्षेत्र के द्वार को पूरी तरह से खोलने योग्य पर्याप्त शक्ति है लेकिन उसे पाप क्षेत्र के बारे में बताएगा कौन जबकि तू स्वयं ही इसमें कैद होने जा रहा है!”

इतना कहकर प्रचंडा के एक संकेत पर भूमि से निकले उस विशाल हाथ ने पापराज को द्वार के उस पार फेंक दिया, इसके साथ ही गोजो ने भी अर्धमृत उधेड़ी को भूमि से उठाकर तेजी से पाप क्षेत्र के अंदर फेंक दिया। उसके बाद गोजो प्रचंडा के पास पहुँचा और बोला- “सहायता करने के लिए धन्यवाद मित्र!”

प्रचंडा- अभी इनका शरीर पाप क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुरूप नहीं हुआ होगा, कहते हैं कि उस स्थान पर जाकर बड़े से बड़े तामसिक प्राणी की शक्ति आधी रह जाती है लेकिन इनको पाप क्षेत्र का अभ्यस्त होने में समय नहीं लगेगा और ऐसा होते ही ये फिर से वापिस इस द्वार से बाहर आ जाएंगे इसलिए श्रेयस्कर यही होगा कि हम जल्द से जल्द बाकी तामसिक शक्तिधारकों को ढूँढकर पाप क्षेत्र में कैद करें और इस द्वार को सदैव के लिए बंद कर दें।
गोजो- मुख्य तामसिक शक्तियों में फिलहाल निशाचर, तपनासुर, ग्रहणों और इन सबका संचालक चंडकाल बचा हुआ है क्योंकि इनके पास सबसे भीषण पाप ऊर्जा है जिसे स्याह ऊर्जा कहा जाता है। जल्द से जल्द इन्हें इस पाप क्षेत्र में बंधक बनाने का कोई मार्ग ढूँढ़ना होगा।

तभी उन्होंने ध्यान दिया कि वे युद्ध करते करते उस घाटी के समीप आ गए थे जहाँ चंडकाल इत्यादि कुछ देर पहले अपनी योजना बना रहे थे। उस घाटी में जाने के लिए सीधी पहाड़ी ढलान थी, सभी महानायक वहीं रुक गए।

अतिक्रूर- क्या हमें देवताओं की प्रतीक्षा करनी चाहिए?
शूतान- देवताओं और सबसे विशुद्ध पुण्य ऊर्जा अर्थात श्वेत ऊर्जा के धारक बाबा गोरखनाथ की सम्मिलित शक्ति के कारण ही पाप क्षेत्र का द्वार अभी तक खुला हुआ है और उसमें हमारे द्वारा कैद किये गए प्राणी वापस बाहर नहीं आ पा रहे हैं। उनकी सारी ऊर्जा पाप क्षेत्र को खोले रखने में ही उपयोग हो रही है इसलिए वे हमारी मदद करने में फिलहाल सक्षम नहीं होंगे। महाबली भोकाल पता नहीं कब तक लौटें, हमें उत्तरी दिशा से आगे बढ़ते स्वर्णनगरी के देवों और इच्छाधारी नागों की बागडोर संभाले महात्मा कालदूत की प्रतीक्षा करनी चाहिए। ये स्याह ऊर्जाधारी बेहद खतरनाक हैं, चंडकाल को यदि पाप क्षेत्र के बारे में भनक भी लग गयी तो वह बहुत ही सावधानी से खोले गए पाप क्षेत्र के द्वार को पूरी तरह खोलने का प्रयास करेगा, और उसके ऐसा करते ही अंदर कैद भीषण पाप शक्तियां अनियंत्रित हो जाएंगी जिससे महाअनर्थ हो जाएगा इसीलिए जितनी जल्दी वे काबू में आ जायें, उतना ही उत्तम रहेगा और इन स्याह ऊर्जाधारियों को शीघ्र नियंत्रण में करने के लिए संयुक्त रूप से वार करना ही सबसे श्रेयस्कर रहेगा।

उनको ज़्यादा देर प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं हुई क्योंकि प्रसेन के नेतृत्व में स्वर्णनगरी की देव सेना और इच्छाधारी नाग सेना का नेतृत्व करते महात्मा कालदूत तामसिक शक्तियों से युक्त प्राणियों को नष्ट करके अथवा कुछ अति भयानक प्राणियों को पाप क्षेत्र में प्रविष्ट करवाकर वहाँ तक पहुँच चुके थे।

कालदूत- भोकाल इस क्षण भी यहाँ उपस्थित नहीं हुए?
प्रचंडा- नहीं महात्मन, आप ही कोई मार्ग बताइए कि हमारी आगे की रणनीति क्या होनी चाहिए।
कालदूत- आगे की रणनीति बस यही है कि घाटी में उतरकर स्याह उर्जाधारियों को चारों ओर से घेर लो और शीघ्रातिशीघ्र इन्हें पाप क्षेत्र में बाँधने का प्रयास करो।
अश्वराज- क्षमा कीजियेगा महात्मन परंतु क्या उनको यहीं नष्ट कर देना अधिक श्रेयस्कर नहीं होगा?
कालदूत- हम ऐसा कर सकते थे अश्वराज, अगर ये सभी अलग अलग होते तो। एक साथ इनकी शक्तियाँ बहुत अधिक विध्वंसकारी हो जाती हैं इसलिए बिना समय नष्ट किये इनको पाप क्षेत्र के उस पार भेजना होगा जहाँ सप्तर्षियों ने इस सृष्टि की सबसे भयानक विपदाओं महाकाल छिद्र और स्याह विवर को पहले से ही बंधक बनाकर रखा है।
प्रसेन (एक छोटा सा यंत्र निकालते हुए)- यह यंत्र किसी भी जीव के मस्तिष्क में प्रविष्ट होकर बेहद सूक्ष्म रूप में स्थित हो जाता है, यह प्राणी को ऐसा आभास कराता है जैसे उसे उसकी सारी इच्छाएं प्राप्त हो गयी हों। ऐसा होते ही उसका शरीर अनंतकाल तक के लिए निष्क्रिय हो जाता है।
कालदूत- इस यंत्र को आप हमें क्यों दिखा रहे हैं प्रसेन?
प्रसेन- निशाचर, तपनासुर या ग्रहणों जल्दी काबू में आ सकते हैं लेकिन चंडकाल पर महाकाल छिद्र की कुछ ज़्यादा ही कृपा है जिसके कारण उसके अंदर सबसे अधिक स्याह ऊर्जा है। वही इतना सक्षम है कि महाकाल छिद्र और स्याह विवर को वापस पाप क्षेत्र से स्वतंत्र करा सके लेकिन हम ऐसा होने नहीं दे सकते इसलिए चंडकाल के मस्तिष्क में ये यंत्र प्रविष्ट करवाकर उसे तुरंत निष्क्रिय करना होगा।
कालदूत- आपको लगता है कि हम उसे द्वंद्व में प्रत्यक्ष रूप से नहीं हरा सकते?
प्रसेन- स्थिति की नाजुकता को समझिए महात्मन, ये समय युद्ध के नियमों और सिद्धान्तों को कुछ क्षण के लिए भुलाकर तार्किक ढंग से सोचने का है। यदि सृष्टि पर स्याह ऊर्जा का प्रभाव फैल गया तो बचाने के लिए कुछ शेष नहीं रह जायेगा।
कालदूत (कुछ क्षण रुककर)- ठीक है, मैं सज्ज हूँ।
प्रसेन- अच्छा है, आप उसे द्वंद्व के लिए ललकारेंगे महात्मा कालदूत और जब वो आपसे भिड़ेगा तब प्रचंडा चुपके से उसके मष्तिष्क में यह यंत्र प्रविष्ट कर देगा। बाकी लोग निशाचर, तपनासुर और ग्रहणों को संभाल लेंगे।

इतना कहकर प्रसेन ने प्रचंडा को यंत्र दे दिया। फिर युद्ध की हुँकार भरती सभी सेनाएं घाटी की लगभग सीधी ढलान से तेजी से नीचे की ओर उतरने लगीं। चंडकाल, निशाचर, तपनासुर और ग्रहणों घाटी में ही थे जब उन्हें दूर से ये कोलाहल सुनाई दिया।

निशाचर- वे आ रहे हैं, हमारी इतनी बड़ी सेना को परास्त करके वे हम तक पहुँच रहे हैं।
चंडकाल (मुट्ठी भींचकर)- हम सभी स्याह शक्तिधारी हैं, इनकी पूरी सेना पर चंडकाल अकेला भारी पड़ेगा।

इतना कहकर चंडकाल ने अपने दोनों हाथ फैलाये और उनसे निकलती स्याह ऊर्जा की कालिमा ने आकाश को भी ढक लिया, तेजी से घाटी की तरफ बढ़ती विशाल सेना के कदम एकाएक रुक गए, सभी आकाश की तरफ देखने लगे। चंडकाल ने आकाश पर स्याह ऊर्जा की एक चादर फैला दी थी जो कि दिन के समय भी रात जैसा आभास दे रही थी, उस स्याह ऊर्जा में से एक एक करके भयानक राक्षस उत्पन्न होकर आकाश से धरती पर आने लगे। जल्द ही घाटी में उतरती सेना के सामने चुनौती के रूप में चंडकाल की राक्षस सेना खड़ी थी।

चंडकाल- हाहाहा! मैं महाराक्षस हूँ मूर्खों! जानते हो ये उपाधि किसे प्राप्त होती है? उसे जो महाकाल छिद्र का सबसे बड़ा भक्त होता है, सैकड़ों वर्षों की कठोर तपस्या के बाद इतनी शक्तियाँ मिली हैं मुझे, अब पाप की पताका तो मैं पूरे ब्रह्मांड में फहराकर ही दम लूंगा।
कालदूत- जिस तरह से तेरी पिछली सेना को परास्त किया था वैसे ही इस सेना की भी परास्त करके ही दम लेंगे हम!

इतना कहकर कालदूत ने एक बार फिर ऐसी हुँकार भरी की उनकी सेना के प्रत्येक व्यक्ति में पुनः एक स्फूर्ति का संचार हो गया और वे चंडकाल द्वारा निर्मित सेना का सामना करने के लिए आगे दौड़ पड़े। एक बार फिर से भीषण रक्तपात का आरंभ हो चुका था, पहले से ही काफी थकी सेना उतनी क्षमता से राक्षस सेना का सामना नहीं कर पा रही थी, मुकाबला बराबरी का नहीं था लेकिन फिर भी योद्धा अपनी पूरी जान लगाकर राक्षस सेना का मुकाबला कर रहे थे। कालदूत का चीरचला एक ही बार में छह सात राक्षस योद्धाओं का सीना चीरते हुए वापिस उनके हाथ में पहुँच जाता था। स्वर्णनगरी के देव अपने सबसे भयानक हथियार लेकर आये थे जो तकनीक के हिसाब से काफी आगे थे, उनके भीषण ऊर्जा छोड़ने वाले हथियारों के आगे राक्षस सेना टिक नहीं पा रही थी, सभी विलक्षण शक्तियों वाले महानायक भी स्याह उर्जाधारियों का सामना बहुत ही वीरता से कर रहे थे। राक्षस सेना भी बर्बर एवं क्रूर थी, जो इच्छाधारी नाग या स्वर्णनगरी का देव उनके सम्मुख आ रहा था, वे अपने नुकीले पंजे और धारदार नखों से उसे चीर कर के ही छोड़ रहे थे। निशाचर उड़ता हुआ अपने पाप ऊर्जा के वारों से इच्छाधारी नाग सेना में हड़कंप मचा रहा था। तपनासुर भी बहुत अधिक तबाही मचा रहा था लेकिन इन सबके बीच सबसे उत्तम चाल चली ग्रहणों ने, राक्षस सेना किसी भी इच्छाधारी नाग या देव को अशक्त करके उसके पास ले आती थी और वह उनके माथे पर हाथ रखकर उसे अपना दास बना लेता था जिससे वह पुण्य शक्तिधारियों को उनकी ही सेना के विरुद्ध कर रहा था। चंडकाल को अब तक एक उंगली तक हिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ी थी।

कालदूत (राक्षसों पर प्रहार करते हुए)- ये ग्रहणों तो हमारे ही सैनिकों को हमारे विरुद्ध कर रहा है, सर्वप्रथम इससे ही निपटना होगा।
शूतान (मुस्कुराकर)- आप चिंता न करें महात्मन, ग्रहणों अब आपके लिए चिंता का विषय नहीं रहेगा।

उधर ग्रहणों एक और सैनिक के माथे पर हाथ रखकर उसे अपने वश में करने में व्यस्त था कि तभी चंडकाल उसके समक्ष आकर बोला- “इन सैनिकों को अपना दास बनाने में समय नष्ट मत करो ग्रहणों, यहाँ से कुछ कोस दूर पूर्व दिशा में देवताओं और ऋषियों की सम्मिलित शक्ति द्वारा पाप क्षेत्र के द्वार में दरार डाली गई है जिससे वे हमें उसमें बंधक बना सकें। उन्हें जाकर अपनी शक्ति से वश में करो और पाप क्षेत्र के द्वार को पूरी तरह खोलने को बाध्य करो ताकि मेरे आराध्य महाकाल छिद्र और ग्रहों का भक्षण करने वाला स्याह विवर स्वतंत्र हो सकें।”

ग्रहणों (चौंककर)- लेकिन आपको यहाँ खड़े खड़े ये कैसे ज्ञात हुआ महाराक्षस?
चंडकाल (क्रोधित होकर)- तुम शायद भूल रहे हो कि मैं यहां सबसे अधिक स्याह ऊर्जा से युक्त प्राणी हूँ, मैं ध्यान केंद्रित करके ये तक बता सकता हूँ कि दुनिया के छोर पर क्या चल रहा है तो ये पता करना मेरे लिए कौन सी बड़ी बात है!
ग्रहणों (घबराकर)- आप क्रोधित ना होइए महाराक्षस, दरअसल मुझे आपकी सभी शक्तियों का ज्ञान नहीं है। मैं बिना एक क्षण गँवाए पूर्व दिशा के लिए निकलता हूँ।

ग्रहणों तेज़ी से उड़ता पूर्व दिशा में चला गया, उसके पीछे शूतान की सम्मोहन शक्ति द्वारा निर्मित नकली चंडकाल भी हवा में विलीन हो गया। चंडकाल, निशाचर और तपनासुर का सारा ध्यान उस अतिभीषण युद्ध की तरफ था इसलिए ग्रहणों के जाने की भनक भी उस समय किसी को नहीं लगी। युद्ध में दोनों तरफ के सैनिकों की संख्या तेजी से घट रही थी, तभी कालदूत ने प्रचंडा की ओर देखा जिसके हाथ में प्रसेन द्वारा दिया गया यंत्र था। चंडकाल उनसे कुछ ही गज दूर खड़ा था, कालदूत ने सिर हिलाकर प्रचंडा को कुछ संकेत किया, इसपर प्रचंडा ने भी सिर हिला दिया। फिर बहुत ही अप्रत्याशित रूप से कालदूत ने चंडकाल की ओर छलांग लगा दी, चंडकाल भी समझ नहीं पाया कि हुआ क्या जब तक कालदूत का भीषण मुष्टिप्रहार चंडकाल के जबड़े से जा टकराया। चंडकाल तो बस थोड़ा सा पीछे हुआ लेकिन कालदूत को लगा जैसे उन्होंने किसी पहाड़ पर मुक्का मारा हो। चंडकाल मुस्कुराकर बोला- “कालदूत, ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली इच्छाधारी नाग! तुमसे द्वंद्व करने में आनंद आएगा, तनिक मैं भी तो देखूँ कि ब्रह्मांड का सर्व शक्तिशाली इच्छाधारी नाग महाराक्षस चंडकाल के समक्ष कितने समय टिक पाता है।”

फिर ताकत के दो पहाड़ आपस में भिड़ गए। तपनासुर, अतिक्रूर एवं गोजो से जूझ रहा था और निशाचर अश्वराज से, शक्तिशाली प्रतिद्वंदियों के साथ फँसे होने के कारण वे चंडकाल की सहायता के लिए भी नहीं जा सकते थे। कालदूत ने चीरचला का प्रहार चंडकाल पर किया, चंडकाल चीरचला से हुई टक्कर के कारण अपने पीछे स्थित पाषाण की बड़ी सी चट्टान से टकरा गया जिससे वह चट्टान खील खील हो गयी।

कालदूत- आश्चर्य! घोर आश्चर्य! मुझे समस्त ब्रह्मांड में अब तक ऐसा प्राणी नहीं मिला था जिसके शरीर को मेरा चीरचला भेद न सके।
चंडकाल- मेरा शरीर वज्र से भी कठोर है कालदूत, इसे तो देवराज इंद्र का सबसे घातक अस्त्र वज्र भी नहीं भेद सकता फिर तुम्हारा चीरचला क्या है!
कालदूत- कोई बात नहीं महाराक्षस चंडकाल, तुमको भेदा नहीं जा सकता परंतु बंधक अवश्य बनाया जा सकता होगा।

इतना कहकर कालदूत ने तेजी से अपना कालसर्पी चंडकाल की ओर फेंका, कालसर्पी चंडकाल के शरीर से कुछ ही क्षण की दूरी पर था कि अचानक अतिक्रूर को जोरदार धक्का देकर तपनासुर का विशाल शरीर कालसर्पी और चंडकाल के बीच में आ गया। कालसर्पी ने भी विशाल होकर तपनासुर को मजबूती से जकड़ लिया।

चंडकाल (चीखकर)- नहीं! ये तुमने क्या किया तपनासुर!
तपनासुर- आपका सेनाध्यक्ष होने के नाते ये मेरा कर्तव्य था महाराक्षस चंडकाल, हमारे उद्देश्य की पूर्ति के लिए आपका स्वतंत्र रहना आवश्यक है।

तब चंडकाल ने ध्यान दिया कि विपक्ष के साथ साथ उसकी सेना भी तेज़ी से खत्म हो रही थी।

चंडकाल- ये ग्रहणों कहाँ है? वह इनके सैनिकों को अपने वश में क्यों नहीं कर रहा?

तभी उसके ऊपर तीव्र आग का भभका आया, उसे ऐसा लगा जैसे सूर्य की गर्मी से उसका शरीर झुलस रहा हो। ये सत्य भी था क्योंकि पंचतत्वों को अपने काबू में रखने वाला प्रचंडा सूर्य की ऊष्मा का इस्तेमाल उसके शरीर को झुलसाने के लिए कर रहा था। इससे पहले की चंडकाल कुछ समझ पाता, प्रचंडा ने अपना हाथ घुमाकर तीव्र वायुवेग पैदा किया और इससे पहले की चंडकाल का शरीर धरातल पर गिरता, प्रचंडा ने भूमि तत्व की सहायता से धरातल को ही एक शिलानुमा आकार देकर चंडकाल को उसमें कैद कर दिया।

कालदूत- तुम्हें ग्रहणों इसलिये नहीं दिख रहा क्योंकि सम्मोहन सम्राट शूतान ने उसे अपने तीव्र सम्मोहन में फँसाकर मूर्ख बना दिया है। वह अब तक पूर्व दिशा में उपस्थित बाबा गोरखनाथ और अन्य देवताओं की कैद में होगा, वह हमारी संख्या घटाकर तुम्हारी सेना की संख्या बढ़ा रहा था इसलिए ये कदम उठाना पड़ा।
चंडकाल- हाहाहा! तो तुम करना क्या चाहते हो कालदूत?
कालदूत- तुम सबको पापियों को सर्वनाश करना चाहता हूँ।

प्रचंडा धीरे धीरे चंडकाल की ओर कदम बढ़ा रहा था, उसके वह छोटा सा यंत्र अपने हाथ में कसकर पकड़ा हुआ था।

चंडकाल- पाप कभी खत्म नहीं होता कालदूत, प्रकाश एक झूठा दिलासा है जबकि अंधकार यथार्थ है। यथार्थवादी बनो कालदूत, आदर्शवादी बनकर कभी किसी को कुछ नहीं मिला।
कालदूत- असत्य है महाराक्षस चंडकाल, आदर्श कभी खोखले नहीं होते, खोखले तो तुम जैसे प्राणी होते हो जो नकारात्मकता को यथार्थ समझने की भूल कर बैठते हो।
चंडकाल- तुम्हारा अपना विश्वास है और मेरा अपना, तुम्हारे अपने सिद्धान्त हैं और मेरे अपने। सत्य तो ये है कि यह व्यर्थ की चर्चा कभी समाप्त हो ही नहीं सकती क्योंकि अंत में विजेता वही कहलाता है जो बलशाली है।

तब तक प्रचंडा चंडकाल के बिल्कुल समीप पहुंच चुका था परंतु चंडकाल ने जोर लगाकर उन चट्टानों को ही खील खील कर दिया जिसने उसे बांधा हुआ था। चट्टान के टुकड़े उछल उछलकर प्रचंडा और कालदूत को लग गए।

चंडकाल- इस मामूली पाषाण शिला की मदद से चंडकाल को कैद करने चले थे। तू खुद को पंचतत्व धारक कहता है ना प्रचंडा, तुझे मैं पंचतत्वों को शक्ति से ही पराजित करूँगा।

प्रचंडा के देखते ही देखते चंडकाल का शरीर जल, अग्नि, वायु, नभ और भूमि तत्वों में विभक्त हो गया।

भूमि रूप ने प्रचंडा पर भीषण प्रहार किया, प्रचंडा के संभलने से पहले ही वायु रूप ने दबाव बनाकर उसे धरातल पर पटक दिया, नभ रूप के इशारे पर बिजलियाँ कड़कीं और एक के बाद एक कड़कती बिजलियों का प्रहार प्रचंडा पर हुआ। प्रचंडा का अधमरा शरीर अब धरती पर पड़ा हुआ था। पंचतत्वों में विभक्त चंडकाल का शरीर फिर से एक हो गया, चंडकाल प्रचंडा की इहलीला समाप्त करने के लिए आगे बढ़ा। कालदूत उस पर प्रहार करने ही वाले थे लेकिन उससे पहले ही भीषण ज्वालाशक्ति का प्रहार चंडकाल के शरीर पर हुआ, ज्वालाशक्ति के धक्के से चंडकाल पीछे को तो गिरा ही लेकिन साथ ही उसका शरीर हल्का सा झुलस गया। कालदूत के साथ साथ सभी महानायकों में हर्ष की लहर दौड़ गई क्योंकि चंडकाल द्वारा निर्मित राक्षस सेना के बचे खुचे सैनिकों को गाजर मूली की तरह अपनी तलवार से काटता हुआ तूफानी गति से आगे बढ़ रहा था तंत्र और तलवार का धनी महाबली भोकाल!

भोकाल के आगमन के साथ ही बचे खुचे सैनिकों में जैसे नई प्राण ऊर्जा का संचार हो गया था। भोकाल तेजी से दौड़ता हुआ चंडकाल की तरफ ही बढ़ रहा था, निशाचर ने अपने प्रतिद्वंद्वी अश्वराज को झटककर भोकाल की तरफ बढ़ चला लेकिन भोकाल की तलवार से निकलती भीषण ज्वालाशक्ति ने उसे भी अपना शिकार बना लिया, ज्वालाशक्ति का वार होते ही वह जितनी तेजी से आया था उससे दुगुनी तेजी से पीछे जा गिरा।

निशाचर- आह! ये साधारण अग्नि नहीं है इसमें भीषण पुण्य ऊर्जा भरी हुई है, इसने एक साथ मेरी पाप ऊर्जा के बड़े अंश को नष्ट कर दिया है!

भोकाल एक बार फिर चंडकाल की ओर बढ़ा, अब तक चंडकाल भी संभल चुका था और भोकाल की ओर ही एकटक देख रहा था।

भोकाल- तो तू है महाराक्षस चंडकाल जिसके कारण समस्त पृथ्वी पर तामसिक शक्तियों का हमला हो रहा है, मैं अपनी पत्नी और विकासनगर के वासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में क्या लग गया, तूने तो पाप शक्तियों के साथ युद्ध ही छेड़ दिया।
चंडकाल- ओह, तो तू है महागुरु भोकाल की अद्वितीय शक्ति का धारक! जब प्रचंडा जैसा दिग्गज मेरे सामने नहीं ठहर पाया तो तू भला कितने क्षण टिक पायेगा!
भोकाल- सृष्टि के आरंभ से आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पुण्य शक्तियाँ पाप शक्तियों से पराजित हो गयी हों। यदि ऐसा होता तो स्वर्ग पर देवताओं के स्थान पर असुरों का राज होता और आज भी पाप शक्ति नहीं जीतेगी।

इतना कहकर भोकाल ने एक बार फिर उस पर जवालाशक्ति का प्रयोग किया लेकिन इस बार चंडकाल ने भी अपने हाथ से ऊर्जा तरंगें छोड़कर ज्वालाशक्ति को बीच में ही रोक दिया और अपने शरीर को और अधिक घायल होने से बचा लिया।

चंडकाल- तेरी शक्तियां विलक्षण हैं महाबली लेकिन मैं भी महाराक्षस हूँ, सैकड़ों वर्षों के तप के बाद ये पदवी प्राप्त हुई है मुझे, इतनी सरलता से परास्त नहीं कर पायेगा तू मुझे।

चंडकाल ने पूरी शक्ति लगाकर भोकाल पर ऊर्जा वार किया, वह वार इतना भीषण था कि भोकाल अपनी चमत्कारी ढाल आगे करने के बावजूद काफी पीछे जा गिरा। उसके बाद चंडकाल आकाश में ऊपर उठता गया, उसके नेत्र चमकने लगे थे, शीघ्र ही अपने नेत्रों से वह सभी पर बेहद तीक्ष्ण तीरों की वर्षा करने लगा। कालदूत उसके हर प्रहार को अपने चीरचला पर सोख ले रहे थे, भोकाल भी चमत्कारी ढाल के प्रयोग से बचा हुआ था लेकिन वह काफी घायल हो चुका था, तामसिक शक्ति से बने वे तीर उस ढाल को भी धीरे धीरे भेदने लगे थे।

गोजो ने संहारक शक्ति का प्रयोग कर अपने शरीर को अभेद्य बना लिया था और अश्वराज ने भी उसके शरीर को ही अपनी ढाल बना लिया था। प्रसेन और स्वर्णनगरी के बचे खुचे सैनिकों ने भी अपनी अपनी ढालों को आगे किया लेकिन कई सैनिकों की इहलीला इस विलक्षण तीर वर्षा ने तुरंत समाप्त कर दी। कालदूत हर तीर को चीरचला से निरस्त करते हुए आगे बढ़कर भोकाल तक पहुंचे।

कालदूत- चंडकाल ने अपनी सबसे भीषण शक्तियों का प्रयोग शुरू कर दिया है भोकाल, इसे शीघ्रताशीघ्र बँधनों में बाँधना होगा।
भोकाल- इसकी शक्तियाँ देखकर तो नहीं लग रहा कि ये शीघ्र पराजित होने की इच्छा रखता है महात्मन।
कालदूत- एक मार्ग तो है, घायल प्रचंडा का बेहोश शरीर कुछ दूर धरातल पर पड़ा है। चंडकाल की तीर वर्षा से स्वयं धरती कुछ ऊपर उठकर ढाल बनाकर उसकी सुरक्षा कर रही है, उसके हाथ में प्रसेन द्वारा दिया गया एक यंत्र है जो तुम्हें चंडकाल के मस्तक में आरोपित करना है, ऐसा होते ही वह तुरंत निष्क्रिय हो जाएगा। क्या तुम ये असंभव दिखने वाला कार्य कर सकोगे महाबली?
भोकाल- कभी कभी बाहुबल और तंत्र शक्तियों से परे भी एक शक्ति होती है महात्मन, एक सच्चे योद्धा की इच्छाशक्ति। जब सारी शक्तियां व्यर्थ लगने लगती हैं तब इच्छाशक्ति ही काम आती है, वह यंत्र मैं चंडकाल के मस्तक में पहुँचाकर ही रहूँगा।

प्रसेन दूर से तीरों से बचता हुआ चिल्लाकर बोला- “किसी भी तरह से चंडकाल के मस्तक का स्पर्श उस यंत्र के साथ करवा दीजियेगा महाबली, बाकी का काम इस यंत्र के अंदर स्थित देव ऊर्जा स्वयं ही कर लेगी।”

भोकाल ढाल द्वारा तीरों से बच बचाकर अर्धमूर्छित अवस्था में पड़े प्रचंडा के पास जा पहुँचा और बेहद फुर्ती से उसके हाथ से वह यंत्र झटक लिया। अब उसने ढाल को कसकर पकड़ लिया और धीरे धीरे धरातल छोड़कर वायु में उठने लगा, अब ढाल उसे तीरों से बचाने के साथ साथ उड़ा भी रही थी। वह तीव्र गति से उड़ता आकाश में स्थित चंडकाल तक पहुंच रहा था। तीर अब तक ढाल को भेदकर उसके हाथों को छलनी कर रहे थे लेकिन उसने हार नहीं मानी और ढाल के सहारे उड़ता एकदम चंडकाल के समक्ष जा खड़ा हुआ।

भोकाल (चिल्लाकर)- बस कर महापापी, तेरा अंत अब समीप है।

चंडकाल ने नेत्रों से तीर छोड़ने बंद कर दिए और भोकाल की तरफ मुड़ा।

चंडकाल- वाह! मानना पड़ेगा तुझे भोकाल, तू वाकई महाबली कहलाने योग्य है जो साक्षात मृत्यु के समक्ष खड़ा होकर भी साहस का प्रदर्शन कर रहा है।

भोकाल ने अपनी तलवार से चंडकाल को घायल करना चाहा लेकिन उसकी तलवार चंडकाल के वज्र जैसे शरीर पर खरोंच तक ना मार पायी। इससे पहले की भोकाल प्रलयंकारी जवालाशक्ति का प्रयोग करता, चंडकाल के एक ही वार से उसकी तलवार उसके हाथ से अलग हो गयी। एक हाथ से ढाल को पकड़ा भोकाल तलवार थामे ना रख सका, चंडकाल ने उसकी ढाल को भी झटक दिया और अपने शक्तिशाली हाथों से उसकी गर्दन दबोच ली। चंडकाल के हाथों का कसाव भोकाल की गर्दन पर बढ़ता ही जा रहा था, चंडकाल के हाथों में इतनी शक्ति थी कि वह बड़े से बड़े पहाड़ को चूर कर दे, यह महागुरु भोकाल की शक्ति ही थी जिसके कारण भोकाल की गर्दन अभी तक सुरक्षित थी। अचानक भोकाल ने अपने मुँह में दबाकर रखा वह छोटा सा यंत्र निकाला और चंडकाल के मस्तक पर रख दिया। इससे पहले की चंडकाल वह अप्रत्याशित हरकत समझ पाता, यंत्र बेहद सूक्ष्म होकर उसके मास्तिष्क की गहराइयों में प्रविष्ट होता चला गया। भोकाल की गर्दन पर चंडकाल की पकड़ ढीली होती चली गयी, अब उसका निष्क्रिय शरीर “धम्म” से धरातल पर गिर चुका था। साथ ही भोकाल भी ढाल ना होने की वजह से तेज़ी से नीचे गिर पड़ा, उसे भी काफी चोटें आयीं लेकिन धरती के लिए सबसे बड़ा संकट, महाराक्षस चंडकाल अब निष्क्रिय हो चुका था। सभी लोगों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी, बहुत अधिक सैनिक तो नहीं बचे थे लेकिन जितने भी बचे थे वे भोकाल की जय जयकार के नारे लगने लगे। निशाचर और तपनासुर इत्यादि पहले ही काबू में आ चुके थे।

शीघ्र ही भोकाल, गोजो, प्रचंडा, शूतान, अतिक्रूर, अश्वराज, प्रसेन और कालदूत चंडकाल के निष्क्रिय शरीर के समीप जा खड़े हुए।

कालदूत- बहुत अच्छे महाबली भोकाल, अब इसको भी अन्य पाप शक्तियों के साथ “पाप क्षेत्र” में कैद कर दिया जाएगा। बाबा गोरखनाथ ने भी ऋषि मुनियों और देवताओं के साथ मिलकर कई खतरनाक पाप शक्तियों को पहले ही कैद कर लिया होगा।
भोकाल- एक बात बताइये महात्मन, क्या ये सत्य है? क्या वाकई महाकाल छिद्र और स्याह विवर पाप क्षेत्र में बंधक हैं?
कालदूत- हाँ, इनको तो सृष्टि के आरंभ में ही सप्तर्षियों की शक्तियों के द्वारा पाप क्षेत्र में कैद करवा दिया गया था अन्यथा धरती के वैसा स्वरूप होता ही नहीं जैसा आज है।
भोकाल- तो फिर हमें शीघ्र ही चंडकाल समेत सभी पाप शक्तियों को पाप क्षेत्र में भेजना चाहिए क्योंकि यदि अंदर मौजूद शक्तियां अनियंत्रित हो गईं तो न जाने कैसा विनाश मचेगा।
कालदूत- तुम ठीक कहते हो भोकाल, हमें शीघ्र ही इन्हें पाप क्षेत्र के उस पार भेज देना चाहिए और ये आशा करनी चाहिए कि ये द्वार फिर कभी ना खुले अन्यथा ये धरती ,ये ब्रह्मांड, ये समयधारा ….सब समाप्त हो जाएगा।

वर्तमान समय में-

चंडकाल को धीरे धीरे उस ऐतिहासिक युद्ध का एक एक दृश्य याद आने लगा। अग्रज और वेदाचार्य वहीं खड़े बस उसे देख रहे थे, काफी देर तक शांत रहने के बाद चंडकाल बोला- “तो तुम्हें अपनी अनुजा (छोटी बहन) को पुनर्जीवित करना है अग्रज और तुम समझते हो कि पाप क्षेत्र का द्वार यदि पूरी तरह खुल जायेगा तो तुम अपनी तंत्र क्रिया का प्रयोग करके अपने शरीर में पाप क्षेत्र की इतनी तामसिक ऊर्जा सोख लोगे जो तुम्हारी अनुजा को सशरीर वापिस लाने के लिए पर्याप्त होगी?”

अग्रज- मैंने बहुत समय तक तमाम पौराणिक दस्तावेजों के द्वारा पाप क्षेत्र का गहन अध्ययन किया है, मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि आयामद्वार खुलते ही जो भीषण तामसिक ऊर्जा वातावरण में प्रवाहित होगी उसे सोखकर मैं इतनी ऊर्जा तो संचित कर ही लूँगा जो भारती को वापस लाने के लिए पर्याप्त हो।
चंडकाल (शांत खड़े वेदाचार्य की ओर देखकर)- ये वृद्ध नेत्रहीन व्यक्ति कौन है?
अग्रज- ये इस संसार में तिलिस्म के सबसे बड़े ज्ञाता और मेरे दादा वेदाचार्य हैं, पाप क्षेत्र के द्वार में जो दरार आयी है जिससे सैकड़ों पाप शक्तियां स्वतंत्र हुई हैं, ये कठिन काम इनकी सहायता के बिना संभव नहीं था।
चंडकाल (वेदाचार्य के समीप जाकर)- तो तुम तिलिस्म रचना करते हो?
वेदाचार्य- मेरी सिद्धियां सिर्फ तिलिस्म रचनाओं तक ही सीमित नहीं हैं, यदि कोई उन तिलिस्म में फँस जाए तो उसके प्राण पखेरू उड़ने में समय नहीं लगता। भले ही वो कोई मनुष्य हो या फिर कोई राक्षस।
चंडकाल (भौंहें चढ़ाकर)- मुझे लगता है कि आप मेरी स्वतंत्रता से प्रसन्न नहीं हैं।
वेदाचार्य- मुझे किसी की स्वतंत्रता से कोई सरोकार नहीं है, मुझे बस मेरी पोती वापस चाहिए।
चंडकाल (कुटिलता से मुस्कुराकर)- अवश्य मिलेगी वेदाचार्य, बस मेरा साथ दीजिये और आपको आपकी पोती अवश्य वापस मिलेगी। बस एक बार मैं गहन साधना में जाकर पता कर लूँ कि किस स्थान पर पाप क्षेत्र का द्वार सबसे अधिक कमजोर है। जब तक मैं साधना कर रहा हूँ तब तक आप लोग आसपास देखें कि कहीं कोई खतरा तो नहीं।

इतना कहकर चंडकाल एक ऊँचे से टीले पर जाकर साधना की मुद्रा में बैठ गया। उसके साधना में जाते ही वेदाचार्य अग्रज के बगल में जा खड़े हुए और बोले- “इस राक्षस के उद्देश्य कुछ ठीक नहीं हैं, क्या तुम्हें वाकई लगता है कि भारती को सशरीर वापिस लाने में ये हमारी सहायता कर सकता है?”
अग्रज- बिल्कुल दादा वेदाचार्य, आप चिंता मत कीजिये, चंडकाल को पाप क्षेत्र का द्वार पूरा खोलना ही पड़ेगा और ऐसा होते ही मैं तामसिक शक्तियां सोखना आरम्भ कर दूंगा।

दादा वेदाचार्य भी पहाड़ी के एक कोने में जाकर बैठ गए। अग्रज वहीं खड़ा था, उसने चुपके से नेत्र बंद किये, नेत्र बंद होते ही उसे भारती की आवाज़ सुनाई पड़ी- “अग्रज! कितना बड़ा ढोंगी है तू! मेरी आत्मा को तूने इसलिए कैद नहीं किया ताकि तू मुझे सशरीर वापस ला सके बल्कि इसलिए किया है ताकि तू अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु मेरा इस्तेमाल कर सके, ताकि तू तामसिक शक्तियाँ सोखकर धरती का सबसे शक्तिशाली प्राणी बन सके।”
अग्रज हल्के से मुस्कुरा दिया और मन ही मन बोला- “तो तुम मेरी कुत्सित मंशाओं को जान गई हो बहना, पर तुम करोगी क्या? दादा वेदाचार्य को बताओगी? लेकिन कैसे? तुम्हारी आत्मा तो मेरे कब्जे में है!”
उसे भारती की क्रोध भरी आवाज़ सुनाई दी- “तुझे इस धरती के रक्षक कभी सफल नहीं होने देंगे!”
अग्रज की भौंहें और तन गयीं, वह क्रोधित होकर मन ही मन बोला- “जब मुझे तेरी आवश्यकता नहीं रहेगी तो तुझे भी आज़ाद कर दूँगा, तब तेरी आत्मा मुक्त हो जाएगी लेकिन फिलहाल तू मेरी बंधक है और तू कुछ नहीं कर सकती!”

कमांडो फ़ोर्स के हेडक्वार्टर में आज बहुत अधिक हलचल थी। सभी कैडेट्स एकदम व्यवस्थित होकर कतार बनाकर खड़े थे जैसे कि कोई समारोह चल रहा हो, ऐसा लग रहा था जैसे वह साँसें थामे किसी की राह देख रहे थे। तभी हेडक्वार्टर में प्रवेश किया धोती और अंगवस्त्र धारण किये हुए मठाधीश ध्रुव ने, उसके साथ वह युवक था जिसे सुपर इंडियन नाम दिया गया था, उसने अभी तक फटी हुई पैंट ही पहनी हुई थी। पीछे पीछे करीम, रेणु, पीटर और धनंजय ने भी प्रवेश किया। ध्रुव को देखकर तो मानो सबकी साँसें ही थम गयीं थीं, ध्रुव ने चारों तरफ देखा और फिर करीम की तरफ मुड़कर कहा- “वाह करीम, तुमने तो कुछ ही समय में कैडेट्स की संख्या काफी बढ़ा ली, मैं बेहद प्रभावित हुआ।”

करीम (मुस्कुराकर)- मैं तो दिन भर यहीं बैठा रहता था कैप्टेन, असली काम तो पीटर और रेणु ने किया है।
पीटर (कैडेट्स की तरफ देखकर)- कैडेट्स! आज आपके सामने वह व्यक्ति खड़ा है जिसने कमांडो फ़ोर्स नामक पैरेलल डिफेंस सिस्टम की शुरुआत की! वह व्यक्ति जिसने लोगों को ये यकीन दिलाया कि राजनगर पुलिस के समांतर एक और सुरक्षा व्यवस्था अस्तित्व में रह सकती है और आज एक बार फिर राजनगर की रक्षा करके उस व्यक्ति ने साबित कर दिया है कि वह है सच्चा राजनगर रक्षक। तो एक बार जोरदार तालियों से स्वागत करिए …….सुपर कमांडो ध्रुव का!

कैडेट्स उत्साहित होकर तालियां बजाने लगे, ध्रुव ने मुस्कुराकर सबकी ओर देखकर हाथ हिलाया और पीटर की तरफ देखकर कहा- “मुझे खुशी है कि मेरी अनुपस्थिति में भी कमांडो फ़ोर्स बहुत अच्छे तरीके से राजनगर की रक्षा में जुटी हुई है। मुझे गर्व है तुम तीनों पर पीटर, करीम और रेणु जिन्होंने मेरे जाने के बाद भी कमांडो फ़ोर्स के नाम को और आगे बढ़ाया लेकिन एक छोटा सा करेक्शन करना चाहूंगा पीटर, अब मैं सुपर कमांडो नहीं रहा, तुम मुझे सिर्फ ध्रुव कहकर भी संबोधित कर सकते हो।”

रेणु- आप हमारे लिए हमारे कैप्टेन ही रहेंगे कैप्टेन और इस हक से आप हमको वंचित नहीं कर सकते।

बातचीत गंभीर होती देखकर करीम ने इर्द गिर्द खड़े कैडेट्स को देखकर कहा- “आलराइट! सभी लोग अपने अपने काम पर लग जायें, यहाँ घेरा बनाकर ना खड़े रहें। एवरीवन डिसमिस्ड!”

ध्रुव को साक्षात सामने खड़ा देखकर मंत्रमुग्ध हुए कैडेट्स का तो जैसे सम्मोहन ही टूट गया, वे तुरंत अपने अपने काम में लग गए। फिर करीम ध्रुव की तरफ मुड़कर बोला- “आपको कुछ दिखाना है कैप्टेन, मेरे साथ आइए।”

करीम उनको एक विशेष चैम्बर में ले गया, वहां एक मेज थी जिसके ऊपर काँच के बॉक्स में ब्रेसलेट्स जैसा कुछ था।

ध्रुव- ये गैजेट्स क्या हैं करीम?
करीम (रुंधे गले से)- आपको याद है कि कैसे श्वेता ने आपके लिए वो ब्रेसलेट्स डिज़ाइन किये थे जो आपको स्टार लाइन और स्टार ब्लेड्स जैसी सुविधा देते थे? यह ब्रेसलेट्स उनका ही एडवांस्ड वर्जन है जिसे श्वेता ने डॉक्टर अनीस के साथ मिलकर बनाया था। इनकी मदद से आप किसी को स्पर्श मात्र से तगड़ा बिजली का झटका दे सकते हैं, नाइलो स्टील के तार से इमारतों पर झूल सकते हैं, कई मेगाहर्ट्ज की घातक फ्रीक्वेंसी वाली साउंड वेव्स पैदा कर सकते हैं, मिनी मिसाइल्स भी छोड़ सकते हैं लेकिन उनको बार बार लोड करना पड़ेगा। श्वेता आपको आपके जन्मदिन पर ये तोहफे के रूप में देने वाली थी लेकिन उससे पहले ही….

कहते कहते करीम का गला भर्रा गया, ध्रुव विस्फारित नेत्रों से उन ब्रेसलेट्स की तरफ देख रहा था। उसने काँच के बॉक्स को हटाकर एक तरफ रखा और उन ब्रेसलेट्स को उठा लिया, वह वहीं दीवार के सहारे बैठ गया और ब्रेसलेट्स को गौर से देखने लगा। पीटर, करीम और रेणु की आँखें भी नम हो चुकी थीं, इस घटना से पूरी तरह अनभिज्ञ धनंजय और सुपर इंडियन को भी अंदाज़ा लग गया था आखिर क्या अनहोनी घटी होगी। उन ब्रेसलेट्स को देखते देखते ध्रुव को कुछ समय पहले की अपने घर की मधुर स्मृतियां याद आने लगीं, कैसे उसका घर एक खुशहाल घर हुआ करता था। रोज रात की गश्त पूरी करके जब वह सुबह जागता था तो मम्मी रजनी नाश्ते के लिए आवाज़ लगाती थीं, कभी कभी ध्रुव देर से सोने के कारण सुबह नहीं उठ पाता था तो छोटी शरारती बहन उसके सिर पर पानी डाल दिया करती थी और जब ध्रुव उसे पकड़ने भागता था तो वह फर्राटे से दौड़कर अपने पिता राजन मेहरा के पीछे छिप जाती, फिर राजन मेहरा श्वेता को ध्रुव से बचा लेते थे। उसे अहसास हुआ कि अपनी बहन की चुलबुली हँसी को अब वह कभी नहीं सुन पायेगा, ना कभी उसके पिता राजन मेहरा उसे उसकी गलतियों के लिये कभी डांटेंगे और ना ही वो कभी दिन भर की थकान को मिटाने के लिए मम्मी की गोद में सर रखकर सो पायेगा। यादों का यह वेग इतना तीव्र था कि ध्रुव की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली, शायद अपने परिवार की मृत्यु के बाद यह पहली बार था जब ध्रुव रोया था। सब लोग एकदम शांत खड़े थे जैसे सबको सांप सूंघ गया हो, किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या प्रतिक्रिया दे।

ध्रुव की भारी आवाज़ ने ही सन्नाटा तोड़ा- “तुम्हें पता है करीम, रक्षाबंधन पर हमेशा उसकी सुरक्षा का वचन लिया करता था मैं लेकिन जब वाकई एक भीषण मुसीबत आयी तो किसी को नहीं बचा पाया मैं, ना उसको, ना मम्मी पापा को, ना राजनगर को। सबको बुरी तरह निराश कर दिया मैंने।”

धनंजय- लेकिन आज तुमने एक बार फिर राजनगर की रक्षा की है ध्रुव।
ध्रुव- बकवास, सब बकवास! सच्चाई तो ये है कि मैं नायक कहलाने के लायक नहीं रहा, अपनी बहन के इन ब्रेसलेट्स के भी लायक नहीं रहा। इनको पहनकर अपनी बहन की स्मृति को कलुषित नहीं करूंगा मैं लेकिन ये ब्रेसलेट्स अवश्य मानवता की रक्षा के काम आएंगे। इन्हें धारण करेगा सुपर इंडियन!
सुपर इंडियन (एकदम से चौंककर)- म..मैं?
ध्रुव- मना मत करना सुपर इंडियन, मैं ये ब्रेसलेट्स तुमको देता हूँ और उम्मीद करता हूं कि तुम इनका इस्तेमाल हमेशा मानवता की भलाई के लिए करोगे।

इतना कहकर ध्रुव खड़ा हुआ और ब्रेसलेट्स सुपर इंडियन की तरफ बढ़ाये। वह पहले तो हिचका लेकिन अंततः उसने वह ब्रेसलेट्स धारण कर ही लिए।

धनंजय- वाह! ये तो तुम पर बहुत जंच रहे हैं!
सुपर इंडियन- शुक्रिया, मैं पूरा प्रयास करूंगा कि जो भरोसा आपने मुझ पर दिखाया है, उस पर खरा उतर पाऊँ।
ध्रुव- मुझे तुम पर पूरा भरोसा है, तुम पापराज से बहुत बहादुरी से लड़े। तुम एक अच्छे क्राइम फाइटर साबित होगे लेकिन अभी भी तुम्हारी तेज़ी से बढ़ती उम्र एक मसला है। पहले तुम्हारी उम्र एक दिन में कुछ वर्ष बढ़ रही थी लेकिन अब तीन चार घंटों में ही एक एक वर्ष बढ़ती जा रही है। धनंजय, हमें आयामद्वार बनाकर मठ तक ले चलो, शायद हकीम कीमियादास जी इसकी बढ़ती उम्र को लेकर कुछ कर पाएं।
धनंजय- ठीक है ध्रुव, मैं अभी द्वार बनाये देता हूँ।

धनंजय ने हवा में स्वर्णपाश द्वारा एक गोलाकार द्वार बना दिया। करीम, रेणु और पीटर से विदा लेकर ध्रुव, सुपर इंडियन और धनंजय उस द्वार में प्रविष्ठ हो गए। उनके जाते ही द्वार एक तेज चमक के साथ बंद हो गया।

ब्रह्मांड रक्षक हेडक्वार्टर काफी समय के बाद एक बार फिर आबाद हुआ था। अब वहाँ सुनी पड़ी कुर्सियां और मकड़ी के जाले लगी दीवारें नहीं थी, ब्रह्मांड रक्षक एक बार फिर एकजुट हो रहे थे। निशाचर का खात्मा करने के बाद शक्ति अपनी तीव्र प्रकाश शक्ति के द्वारा नागराज, भेड़िया, डोगा और लोमड़ी को मुम्बई से ले आयी थी।

भेड़िया- वाह! मेरा सुझाव मानकर तुम लोगों ने इस जगह की साफ सफाई भी करवा दी।
डोगा- हाँ, गंदगी तो मुझे भी पसंद नहीं लेकिन मुझे तो ये आश्चर्य हो रहा है कि इतने समय जंगल में रहकर भी तुम इतने सफाई पसंद हो।
भेड़िया- हाहाहा, जंगल से अधिक स्वच्छ हवा भला इन शहरों की कहाँ है डोगा? जंगल तो सबसे स्वच्छ हैं और नागराज के खजाने की रक्षा करना भेड़िया वंश की ज़िम्मेदारी है जो कि जंगल में है इसलिए भी मेरा जंगल में रहना आवश्यक है।
डोगा (नागराज की तरफ मुड़कर)- तो तुम्हारा खजाना भी है?
नागराज- तुमको क्या लगता है? महानगर स्थित स्नेक पार्क कैसे बना था?
डोगा- स्नेक पार्क की फंडिंग तुमने की थी?
नागराज- बिल्कुल, तरह तरह की दुर्लभ प्रजाति के सर्पों की रक्षा में मेरी विशेष दिलचस्पी थी जिसके कारण डॉक्टर करुणाकरण के सुझाव पर मैंने स्नेक पार्क की नींव रखी थी।
डोगा- “थी”का क्या अर्थ?
नागराज (लंबी सांस लेकर)- डॉक्टर करुणाकरण ने स्टील के साथ मिलकर मेरे शरीर में हलाहल प्रविष्ट किया और उसके बाद स्टील ने मुझे बदनाम करने की योजना बनाई। तुम वाकई उम्मीद करते हो कि उसके बाद मैं करुणाकरण से संपर्क करना चाहूँगा?
डोगा- लेकिन तुम्हीं ने तो बताया था कि करुणाकरण ने अपने परिवार को बचाने के लिए स्टील का कहना माना और स्टील तुम्हारी तरह नायक तिमिर योग का शिकार हो गया था तो आखिर गलती किसकी थी?
नागराज- हर बार नायक तिमिर योग का सहारा लेकर हम पिछले दिनों हुए अपने कृत्यों को सही साबित नहीं कर सकते। एक दरिंदा शायद हम सबके अंदर छिपा होता है, उस योग ने सिर्फ उस दरिंदे को बाहर निकाला लेकिन वह घिनौने कृत्य हमारे हाथों ही हुए थे।
शक्ति- ठीक है लेकिन मैं तुममें से किसी को दोषी नहीं ठहरा सकती नागराज, ये जानने के बाद तो बिल्कुल नहीं कि नायक तिमिर योग को अग्रज द्वारा नायकों को भ्रमित करने के लिए सक्रिय किया गया था।

सभी नायक आपस में चर्चा कर रहे थे तभी डोगा अपने बगल में बैठी लोमड़ी से फुफुसाकर बोला- “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था, जानती भी हो कि तुम खुद को कितने बड़े खतरे में डाल रही हो? तुम्हें चीता और बाकी चारों चाचाओं के साथ मुम्बई ही रुक जाना चाहिए था।”
लोमड़ी भी हल्की आवाज़ में बोली- “अब इस बात पर बहस करके कोई लाभ नहीं सूरज, मुम्बई में रुकती तो हमेशा तुम्हारी चिंता सताती रहती इसलिए मुझे तो यहाँ आना ही था।”

डोगा शांत हो गया, वह जानता था कि लोमड़ी से बहस करके कोई फायदा नहीं, वह हमेशा अपने मन मुताबिक ही सारी चीज़ें करती थी।

एंथोनी, जैकब, अभय, परमाणु और कमलकांत अभी तक लैब में ही मौजूद थे। अभय की हालत में मरहमपट्टी से काफी फर्क पड़ा था, उसने विनय को पूरी तरह से अपने सफर के बारे में बताया कि कैसे शेर खान उसे अरावली की पहाड़ियों पर ले गया था, कैसे उसे काले डकैत और हन्टर्स मिले लेकिन उसने सूरज उर्फ डोगा के व्यक्तिगत जीवन का सम्मान करते हुए उसका ज़िक्र छुपा लिया था।

विनय (भौचक्का होकर)- तो..तो तुम इतने वर्ष मठ में प्रशिक्षण ले रहे थे? उसी मठ में जहां अब ध्रुव मठाधीश बन बैठा है?
अभय- ध्रुव और मेरा अतीत कहीं न कहीं मठ से जुड़ा हुआ है, पूर्व मठाधीश वक्र के कारण ध्रुव का पूरा परिवार ही समाप्त हो गया, उसके बाद से मैंने एक बार फिर अंगरक्षक पद संभाला। मैं जानता था कि ध्रुव एक कठिन दौर से गुज़र रहा था और उसे एक दोस्त की ज़रूरत थी इसलिए मैंने तिरंगा को अलविदा कह दिया।
कमलकांत- वाह! ये तो किसी फिल्म की कहानी लगती है और अजीब बात देखो कि तुम दोनों ही इतने समय से दिल्ली के रक्षक थे लेकिन फिर भी कभी तुम्हें पता नहीं चला।
अभय- ऐसा शायद इसलिए हो सकता है क्योंकि मैं और परमाणु दिल्ली के बेहद अलग अलग हिस्सों में ऑपरेट करते थे। दिल्ली पर किसी बड़ी मुसीबत के आने के बाद ही हमारा मिलना हो पाता था वरना हम अपनी अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते थे। मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि मेरे बचपन का दोस्त परमाणु निकलेगा।
विनय (एंथोनी और जैकब की तरफ घूमकर)- अब मेरा राज़ इन दोनों को भी पता है।
एंथोनी- मैं मुर्दों की दुनिया का रक्षक हूँ और जैकब एक प्रेत, हमें भला तुम्हारे राज़ से क्या सरोकार?

तभी कमलकांत ने लैब के दूसरे कमरे में सबको बुलाया जहाँ से वे लैब के अधिकांश हिस्सों पर नज़र रखते थे। विनय ने भी वापस अपने चेहरे पर मास्क लगा लिया था। वहाँ मॉनिटर पर एक अजीब सा दृश्य उभर रहा था, एक विशाल हरी राक्षसी आकृति स्क्रीन पर उभर रही थी, उसे देखकर जैकब चौंक पड़ा “ये क्या! ये तो नारकी है !”
एंथोनी भी उन दो प्राणियों को देखकर चिंता की मुद्रा में आ गया था।

परमाणु- ये नारकी कौन है? क्या ये भी पाप क्षेत्र से स्वतंत्र हुआ शैतान है?
जैकब- नहीं परमाणु, नारकी और पातकी राक्षसलोक के दो ऐसे शैतान हैं जो कि अपने जीवन का अधिकांश समय सुप्तावस्था में व्यतीत करते हैं और तभी जाग्रत होते हैं जब कोई महाराक्षस की पदवी वाला प्राणी इनका आह्वान करता है। इनको जगाने के बाद सिर्फ एक काम दिया जा सकता है, उस काम को पूरा करके ये वापस चले जाते हैं। मैंने महातांत्रिक इरी के साथ इस लोक और दूसरे लोकों की तामसिक शक्तियों के बारे में गहन अध्ययन किया है इसलिए मुझे इनके बारे में पता है। यदि नारकी यहाँ है तो पातकी भी ज़रूर आया होगा।
परमाणु- महाराक्षस? हे भगवान, इसका…इसका मतलब चंडकाल पाप क्षेत्र से आज़ाद हो चुका है।
अभय- ये चंडकाल कौन है?
परमाणु- ये पाप क्षेत्र में कैद बेहद खतरनाक प्राणी था जो कि सब शायद बाहर आ गया है, मुझे शक्ति ने इसकी पूरी जानकारी दी थी। यदि कोई महाराक्षस ही इनका आह्वान कर सकता है तो इसका मतलब चंडकाल आज़ाद हो चुका है लेकिन ये नारकी इधर उधर देख रहा है, कुछ कर नहीं रहा यानी कि इसे तबाही फैलाने के लिए नहीं जगाया गया है।
अभय- जो भी हो, इसका उद्देश्य कोई नेक काम करना तो नहीं हो सकता। हमको जाकर ही पता करना पड़ेगा कि आखिर इसका उद्देश्य क्या है।

सभी लोग लैब से निकलने ही वाले थे कि कमलकांत बोल उठे – “ज़रा ठहरो! तुम्हारे लिए मेरे पास कुछ है अभय।”
अभय ने जिज्ञासावश पूछा- “क्या?”

प्रोफेसर मुस्कुराए और एक स्विच दबा दिया, सामने से एक शीशे का चैम्बर बाहर आ गया, उसके अंदर तिरंगा की पोशाक थी लेकिन वो साधारण सिली हुई पोशाक से काफी बेहतर लग रही थी। उसे देखकर अभय की आँखें फटी की फटी रह गईं।

कमलकांत- ऐसे आँखें फाड़ फाड़कर मत देखो अभय, अपने खाली समय में मैं अलग अलग सुपरहीरोज की पोशाकों के एडवांस्ड वर्जन पर काम करता रहता हूँ। इसी तरह से मैंने डोगा, परमाणु और ध्रुव की मॉडिफाइड पोशाकें भी बनाई हैं लेकिन अफसोस ध्रुव ने पोशाक पहनना ही छोड़ दिया, परमाणु के लिए मैं मॉडिफाई करता ही रहता हूँ और डोगा कानून के दायरे से बाहर काम करता है जिसके कारण उसे मैं डायरेक्टली पोशाक नहीं दे सकता लेकिन क्या पता किसी दिन वो इस पोशाक को “चुरा” ले जाए? ये वाली पोशाक दिखने में भले ही तुम्हारी पिछली पोशाक जैसी हो लेकिन ये बुलेटप्रूफ, फायरप्रूफ और इलेक्ट्रिसिटी प्रूफ है, तेज़ गिरने के बाद भी तुमको कम चोट लगेगी और इस पोशाक से अटैच्ड लबादे पर एसिड तक का असर नहीं होता। मुझे लगता है कि फिलहाल दुनिया को मठाधीश ध्रुव के अंगरक्षक की नहीं बल्कि वापिस देशभक्ति के जुनून वाले तिरंगा की ज़रूरत है इसलिए मैं तुमको ये पोशाक दिखा रहा हूँ।

अभय कमलकांत को गले लगाता हुआ बोला- “वाह प्रोफेसर साहब! आपने तो एकदम कमाल ही कर दिया।”

कमलकांत- ठीक है ठीक है, इमोशनल सीन बहुत हो गया, अब जाकर एक्शन करो।

ध्रुव, धनंजय और सुपर इंडियन के साथ मठ में हकीम कीमियादास के चिकित्सालय में मौजूद था। कीमियादास सुपर इंडियन का रक्त लेकर कुछ गहन जांच कर रहे थे, कुछ समय बाद वह ध्रुव से बोले- “क्षमा कीजियेगा मठाधीश पर मुझे नहीं लगता कि मैं इस युवक की उम्र को किसी प्रकार से रोक सकता हूँ, इसके ग्रोथ हार्मोन बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। वैसे भी मेरे काढ़े मानव शरीर पर कारगर हैं, किसी कृत्रिम शरीर पर नहीं।”

धनंजय- मैंने तो पहले ही कहा था ध्रुव, ऐसी तकनीक तो हम स्वर्णनगरीवासियों के पास भी नहीं है जिससे इस कृत्रिम मानव की उम्र रुक जाए। इसके अंदर आत्मा का अंश नहीं है और वो अंश मैं या तुम उपलब्ध नहीं करवा सकते।
ध्रुव (कीमियादास की ओर देखकर)- ठीक है हकीम जी लेकिन वो उम्र बढ़ाने वाला काढ़ा तो दे दीजिए ताकि तेजी से बढ़ती उम्र पर थोड़ा अंकुश तो लग जाये। अब तक सुपर इंडियन की उम्र एक वर्ष और बढ़ गयी होगी।
कीमियादास- ठीक है मठाधीश, मैं उम्र बढ़ाने वाला काढ़ा दे देता हूँ हालांकि ये स्थायी हल नहीं है लेकिन तेजी से बढ़ती उम्र पर कुछ अंकुश तो लग ही सकता है।

कीमियादास ने सुपर इंडियन को काढ़ा बनाकर दे दिया।

सुपर इंडियन- धन्यवाद ध्रुव, तुम मुझसे कुछ समय पहले ही मिले हो और मेरी उम्र की रोकथाम के लिए तुम इतने प्रयास कर रहे हो, ये वाकई सराहनीय है।
ध्रुव- अब ज़्यादा भावुक मत हो जाओ, तुम्हारी उम्र के लिए कोई स्थायी हल निकालना अभी बाकी है। कीमियादास जी, किसी से कहकर मठ का पारंपरिक वस्त्र अर्थात धोती मंगवा दीजिये, हमारा मेहमान फटी चिथड़ी पैंट में बैठा है ये देखकर अच्छा नहीं लग रहा।

तभी एक दास अंदर आया “मठाधीश ध्रुव! आपसे मिलने स्त्री विभाग की प्रमुख आयी हैं!”

ये सुनकर ध्रुव तूफान की तेजी से चिकित्सालय से बाहर भागा, ये देखकर धनंजय चौंक गया, उसने कीमियादास से पूछा- “ध्रुव इतनी तेजी से बाहर क्यों भागा? क्या कोई आपातकालीन परिस्थिति है?”

कीमियादास (मुस्कुराकर)- जब प्रेमी बहुत दिनों तक अपनी प्रेमिका से ना मिले तो ये उसके लिए आपातकालीन परिस्थिति ही हो जाती है।

चिकित्सालय के बाहर नताशा खड़ी थी जो ध्रुव को देखते ही दौड़कर उसके गले जा लगी, दोनों को ये परवाह भी नहीं थी कि कितनी नज़रें उनको देख रही हैं।
नताशा ध्रुव को और जोर से बाहों में भींच लिया और बोली- “इतने समय तक मुझसे दूर कैसे रह गए तुम?”

ध्रुव- जी तो यही चाहता है कि हमेशा तुम्हारे पास रहूँ लेकिन क्या करूँ, ज़िम्मेदारियाँ ही इतनी अधिक हैं कि तुम्हारे लिए बहुत समय नहीं निकाल पाता।
नताशा- कोई बात नहीं, हम साथ हैं बस यही काफी है। इससे अधिक मुझे तुमसे और कुछ नहीं चाहिए।

तभी “धम्म” की आवाज़ से सभी चौंक गए, आकाश से धरती पर कोई तेजी से उतरा था, उसकी वजह से धूल का गुबार उड़ गया था। जैसे जैसे धूल का गुबार छटा, वह आकृति और अधिक स्पष्ट होती गयी, मठ की धरती पर आ चुका था पातकी!

ध्रुव- उफ्फ, उधेड़ी के बाद मठ में प्रवेश करने वाला पाप क्षेत्र का ये दूसरा शैतान है।
नताशा- ये पाप क्षेत्र क्या है ध्रुव?
ध्रुव- सब समझाऊँगा, पहले इससे निपटा जाए।

हन्टर्स पातकी को घेरकर हमले की मुद्रा में खड़े थे, पातकी ने कुछ क्षण उनको देखा और फिर हाथ को आगे की ओर बढ़ाया, उसके हाथ से निकली किरण हवा में ही एक जगह ठहर गयी और एक द्वार जैसा कुछ धीरे धीरे हवा में बनने लगा। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मंशा क्या है, आखिरकार ध्रुव ने पूछ ही लिया- “तुम्हारा यहाँ मठ की धरती पर आने का उद्देश्य बताओ पाप क्षेत्र के राक्षस! वरना हमें हमला करने पर मजबूर होना पड़ेगा!”

पातकी ध्रुव की तरफ घूमा, उसका हाथ अभी भी किरण छोड़ रहा था जिससे हवा में द्वार जैसा कुछ उत्पन्न हो रहा था। वह बेहद गंभीर स्वर में बोला- “मेरा नाम पातकी है मानव! मैं पाप क्षेत्र से नहीं बल्कि राक्षसलोक से महाराक्षस चंडकाल के आह्वान पर यहां आया हूँ। मैं और मेरा भाई नारकी सदैव सुप्तावस्था में ही रहते हैं जब तक कोई महाराक्षस हमारा आह्वान नहीं करता, हमारा आह्वान करके वह अपना मनचाहा कोई भी एक काम हमसे करवा सकता है, उसके पश्चात हम लौट जाते हैं।”

ध्रुव- तुम दोनों को इस बार किस काम के लिए बुलाया गया है?
पातकी- गहन साधना करके महाराक्षस चंडकाल ने पता किया है कि इस धरती पर ऐसे दो स्थान हैं जहाँ पर पाप क्षेत्र का द्वार थोड़ा कमज़ोर है। उनमें से एक स्थान है ये और दूसरे स्थान पर मेरा भ्राता नारकी गया हुआ है, हम अपनी शक्तियों के सम्मिलित प्रयोग से पाप क्षेत्र का द्वार पूरी तरह खोल सकते हैं। पाप क्षेत्र में पहले से ही दरार पड़ चुकी है जिसके बाद उसे पूर्णतयः खोलना कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए।

ये सुनकर ध्रुव की मुट्ठी भिंच गयी, वह आक्रोश से बोला- “पाप क्षेत्र का द्वार तो मैं नहीं खुलने दूंगा, भले ही मुझे इसके लिए कुछ भी करना पड़े!”

पातकी- मैं यहाँ किसी से युद्ध करने नहीं आया हूँ पर यदि तुमने मेरे कार्य में बाधा बनने का प्रयास किया तो मुझे भी प्रत्युत्तर देना होगा।
ध्रुव- पाप क्षेत्र को खोलने की बात करके तुम खुद को हमारा शत्रु साबित कर चुके हो।

धनंजय ने देव ऊर्जा से भरा एक शक्तिशाली वार अपने कलाईबन्द के जरिये पातकी पर किया, पातकी थोड़ा विचलित अवश्य हुआ लेकिन उससे ज़्यादा उस पर कोई खास असर नहीं हुआ। पातकी ने क्रोध से धनंजय की ओर देखा, उसके नेत्रों से किरणें छूट पड़ीं लेकिन धनंजय पहले से ही उसकी मंशा भांपकर फुर्ती से वह स्थान छोड़ चुका था। किरणों ने धरती में एक बड़ा सा छेद कर दिया, इन सबके दौरान भी पातकी एक हाथ से किरणें छोड़कर द्वार खोलना बंद नहीं किया था।

धनंजय- उफ्फ, इसकी किरणों का ताप वाकई असहनीय है, यदि मैं अपने स्थान से न हटा होता तो कवच के बावजूद राख बन गया होता।

तब तक सुपर इंडियन भी घटनास्थल पर पहुँच चुका था, उसकी फटी चिथड़ी पैंट को धोती से बदल दिया गया था जो कि उस पर जंच भी रही थी।

सुपर इंडियन- हमें इस पर सम्मिलित वार करना होगा तभी कुछ काम बनेगा, इन ब्रेसलेट्स के परीक्षण का समय भी आ गया है।
धनंजय- ठीक है, तुम ब्रेसलेट्स का वार करो और मैं अपने ऊर्जा वार करता हूँ।
ध्रुव (तेज़ आवाज़ में)- सभी असाधारण शक्ति वाले हन्टर्स तुरंत यहाँ आएं और इस शैतान से निपटने में हमारा साथ दें। बाकी हन्टर्स मठ की जनता की सुरक्षा का ध्यान रखें।

सभी असाधारण शक्ति वाले हन्टर्स आगे आ गए और अपनी अपनी शक्तियों से पातकी को काबू करने की चेष्टा करने लगे लेकिन कोई भी उसके नज़दीक जाकर वार करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। पातकी भी उनके वारों पर ध्यान दिए बिना अपना कार्य कर रहा था, तभी सुपर इंडियन ने बेहद साहस भरा कदम उठाया और एक ऊँची छलांग लगाकर पातकी के कँधों पर जा बैठा। अपने ब्रेसलेट्स की तीव्र ध्वनि तरंगों से उसने पातकी के सिर को निशाना बनाया, अचानक ही इतनी तीव्र ध्वनि तरंगों के वेग को पातकी झेल नहीं पाया, वह लड़खड़ा गया और इतनी ही देर में धनंजय ने भीषण देव ऊर्जा का ब्लास्ट उसकी छाती पर किया जिससे उसके पांव एकदम उखड़ गए। सुपर इंडियन ने ध्वनि तरंगों की लगातार मार करके पातकी को संभलने का मौका नहीं देना चाहता था, धनंजय ने मौके का लाभ उठाकर असहाय पातकी को स्वर्णपाश से बांधना चाहा लेकिन पातकी ने स्वर्णपाश को थाम लिया और झटके से खींचा। उसके साथ एकदम से खिंचा धनंजय उड़ता हुआ आया और सुपर इंडियन से टकरा गया जिससे वे दोनों गिर पड़े और पातकी को संभलने का मौका मिल गया।

पातकी- ओह, अब कुछ चैन पड़ा। लगता है कि तुम सबको समाप्त किये बिना मैं अपना कार्य नहीं कर सकता इसलिए पहले मुझे तुम सबको समाप्त करना होगा और उसके बाद मैं पाप क्षेत्र के द्वार की ओर ध्यान दूंगा।

इससे पहले की पातकी कुछ कर पाता, वातावरण में एक आवाज़ गूंजी- “तू भला किसी को क्या समाप्त करेगा दुष्ट! तेरा अंत समय तो आ ही चुका है!”

पातकी, ध्रुव, धनंजय, सुपर इंडियन और अन्य लोगों ने देखा कि हवा में एक आकृति प्रकट हो रही थी। एक तीव्र चमक वातावरण में फैल गयी, जैसे ही वह चमक कम हुई तो श्वेत वस्त्र पहने एक सफेद दाढ़ी वाले तपस्वी प्रकट हुए जिनके मुख पर विलक्षण तेज था। उनके कँधे पर एक छोटा सा नेवला बैठा हुआ था।

पातकी- कौन है तू तपस्वी?

उस तपस्वी के चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट खेल गयी, वह एकदम शांत मुद्रा में बोले- “क्या तुम राक्षसों को राक्षसलोक में विशुद्ध पुण्य ऊर्जा अर्थात श्वेत ऊर्जा के एकमात्र साधक के बारे में नहीं बताया जाता?”
पातकी की आंखें चौड़ी हो गईं, वह घबराते हुए बोला- “श्वेत ऊर्जा का प्रतिपालक तो बस एक है, य..यानी कि तू गोरखनाथ है! पाप क्षेत्र में तामसिक शक्तियों को कैद करने में देवताओं की सहायता करने वाला गोरखनाथ?”

गोरखनाथ- एकदम सही समझा तूने, मुझे भी तुम दो राक्षस बंधुओं के बारे में ज्ञात है। तुम लोग अधिकतर समय निद्रा में व्यतीत न करते तो शायद तुम भी पाप क्षेत्र में कैद होते।
पातकी- तो जिनको तूने पाप क्षेत्र में कैद किया था वे भी तो एक एक करके स्वतंत्र हो ही रहे हैं, तो भला क्या लाभ हुआ?
गोरखनाथ- हाहाहा, वे स्वतंत्र हुए और वर्तमान नायकों के हाथों मृत्यु के घाट उतारे गए। जिस महाराक्षस ने तुम्हारा आह्वान किया है वो भी ऐसे ही मृत्यु को प्राप्त होगा और तुम लोग भी, यदि तुम वापस राक्षसलोक की तरफ रवाना ना हुए।
पातकी- हम राक्षसलोक की तरफ पूरा कार्य करके ही रवाना होऊँगा, अब इस प्रकरण में यदि ब्रह्मांड के इकलौते श्वेत शक्ति साधक के प्राण लेने पड़ें तो वो भी करूँगा।
गोरखनाथ- जैसा तुमको उचित लगे, मैंने तुमको चेतावनी दी थी लेकिन यदि तुम्हें ही अपने प्राणों से मोह नहीं है तो मैं कुछ नहीं कर सकता।

पातकी ने पूरी शक्ति के साथ दोनों हाथों से किरणें छोड़ना शुरू किया, बाबा गोरखनाथ के नेत्र चमकने लगे, उनके शरीर के आसपास एक अदृश्य घेरा बन गया जिससे पातकी का वह वार उन्हें लेशमात्र भी हानि नहीं पहुंचा पाया।

पातकी- ओह! तो तूने अपने शरीर के आसपास ऊर्जा कवच का घेरा बना लिया है परंतु फिर भी तू मेरे हाथों से बच नहीं पायेगा।

इतना कहकर पातकी उस गोल घेरे को अपने हाथों से तोड़ने को आगे बढ़ा लेकिन जैसे ही उस घेरे से उसका हाथ स्पर्श हुआ, पातकी भीषण झटका खाकर पीछे गिरा। इसी के साथ गोरखनाथ ने वह अदृश्य घेरा हटाया और धीरे धीरे कदम बढ़ाते धरती पर गिरते तड़पते पातकी तक पहुंचे। पातकी तो झटका खाने के बाद कुछ भी बोलने की हालत में नहीं लग रहा था, गोरखनाथ बोले- “यही होता है जब कोई पाप शक्ति प्रत्यक्ष रूप से पुण्य शक्ति से भिड़ती है।”

इतना कहकर गोरखनाथ ने हाथ आगे बढ़ाया, उनके हाथ में एक त्रिशूल प्रकट हो गया, ये देखकर ज़मीन पर पड़ा पातकी मुस्कुराता हुआ बोला- “तू मुझे मार सकता है गोरखनाथ लेकिन मैंने पहले से ही कमज़ोर पड़े पाप क्षेत्र के द्वार को और अधिक कमज़ोर कर दिया है, अब द्वार को पूरी तरह खुलने में वक्त नहीं लगेगा।”

ये सुनकर गोरखनाथ के चेहरे पर क्रोध और चिंता की लहरें एक साथ आ गयीं, उन्होंने त्रिशूल को मजबूती से पकड़ा और पातकी के सीने में पेवस्त कर दिया। ऐसा होते ही पातकी का शरीर काले धुएं में परिवर्तित होकर वातावरण में विलीन हो गया। ध्रुव, धनंजय और सुपर इंडियन गोरखनाथ के पास पहुँचे।

ध्रुव- बहुत धन्यवाद बाबाजी, यदि आप इस राक्षस का खात्मा न करते तो ये पाप क्षेत्र का द्वार खोलने में सफल हो जाता।
गोरखनाथ- सफल तो ये अब भी होगा ध्रुव क्योंकि यदि ये यहाँ है तो इसका भाई भी पृथ्वी पर कहीं न कहीं इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आया होगा। वैसे भी पाप क्षेत्र के द्वार पर नायक तिमिर योग द्वारा डाली गई दरार दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है, पिछले दिनों इतनी तादाद में पाप शक्तियों का स्वतंत्र होना इस बात का सुबूत है।
ध्रुव- आपको मेरा नाम कैसे पता? और आप नायक तिमिर योग के सक्रिय होने के विषय में कैसे जानते हैं?
गोरखनाथ (मुस्कुराकर)- जैसे स्याह ऊर्जा को सबसे उत्तम दर्जे की पाप ऊर्जा की श्रेणी में रखा जाता है वैसे ही श्वेत ऊर्जा सबसे अधिक विशुद्ध पुण्य ऊर्जा है। श्वेत ऊर्जा को देवताओं के अलावा आज तक सिर्फ एक व्यक्ति साध पाया है और वो तुम्हारे सामने खड़ा है। इतने वर्षों से मैं केवल साधना में लीन था लेकिन मेरी मस्तिष्क की तरंगें मुझे हर छोटे से छोटे और बड़े से बड़े पाप और पुण्य के टकराव से अवगत कराती रहती थीं इसलिए मुझे अभी तक घटित सभी घटनाएं याद हैं।
धनंजय (गोरखनाथ के पांव छूकर)- हम स्वर्णनगरी के देवों में आपका बड़ा गुणगान है, प्रसेन ने बताया था कि कैसे आप सभी शक्तियां ने एकजुट होकर इन तामसिक शक्तियों के विरुद्ध भीषण युद्ध छेड़ दिया था। आपसे मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।
गोरखनाथ- नहीं पुत्र, बल्कि मेरे लिए तुम नायकों से मिलना सौभाग्य की बात है। कलियुग के इस आधुनिक समय में भी तुम जैसे नायक अस्तित्व में हैं, ये विचार ही हृदय को सुकून देता है। हालांकि नायक तिमिर योग ने नायकों को पथभ्रष्ट किया था लेकिन उससे उबर पाना भी बहुत मजबूत इच्छाशक्ति वालों का काम है, मुझे अच्छा लगा कि आप लोग उससे उबर पाये।

फिर गोरखनाथ की नज़र मौन खड़े सुपर इंडियन पर गयी, वे उसे गौर से देखकर बोले- “तुम्हारे अंदर से मुझे आत्मिक ऊर्जा का आभास नहीं हो रहा, तुम कौन हो पुत्र?”

सुपर इंडियन- मैं एक आतंकवादी द्वारा निर्मित कृत्रिम बालक हूँ बाबा। हालांकि आत्माविहीन होना मुझे उतना नहीं कचोट रहा जितनी कि ये बात की पुण्य और पाप के इस महायुद्ध में मैं शायद अधिक योगदान ना दे पाऊँ क्योंकि हर तीन चार घंटे में मेरी उम्र एक वर्ष बढ़ रही है।
गोरखनाथ- पुण्य का साथ देने वालों के लिये कोई न कोई रास्ता अवश्य ही निकल आता है, तुम्हारी इस समस्या का हल भी शायद मेरे पास है।
ध्रुव- कैसा हल बाबा? मैंने भी इसकी उम्र पर अवरोध लगाने की हर संभव कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाया।
गोरखनाथ- विज्ञान के पास हर सवाल का उत्तर हो ये आवश्यक नहीं, कभी कभी विज्ञान से आगे सोचना पड़ता है। इसके कृत्रिम शरीर में मैं आत्मा का प्रवेश तो नहीं करा सकता क्योंकि वह परमपिता परमेश्वर का काम है लेकिन आत्मा हर मनुष्य के अंदर एक स्थिर ऊर्जा की भाँति कार्य करती है। बिजली, अग्नि, पानी में उठता ज्वार, गुरुत्वाकर्षण आदि आत्मा की तरह ही ऊर्जा के भिन्न भिन्न रूप हैं जिनका स्वरूप आपस में बदला जा सकता है जैसे पवन चक्की वायु से प्राप्त ऊर्जा को घूर्णी ऊर्जा में परिवर्तित करने का कार्य करती है । इस वक्त पाप क्षेत्र में पड़ी दरार के कारण वातावरण में भी बहुत सी तामसिक ऊर्जा है, इस ऊर्जा को नष्ट नहीं किया जा सकता परंतु एक स्वरूप से दूसरे स्वरूप में परिवर्तित अवश्य किया जा सकता है। मैं इस ऊर्जा को पुण्य ऊर्जा में परिवर्तित करके इस बालक के शरीर में स्थिर ऊर्जा की भांति प्रविष्ट कराने का प्रयास करूँगा, जिससे इसकी तेजी से बढ़ती उम्र की समस्या समाप्त हो जाएगी।
ध्रुव- यह तो बहुत अच्छा रहेगा बाबाजी।
गोरखनाथ- हालांकि इस प्रकार का कार्य सम्पन्न करना मेरे लिए भी दुष्कर है परंतु यदि मेरे कारण इस बालक के प्राण बचते हैं तो मैं क्षणिक तकलीफ भी सहन करने को तैयार हूँ।

फिर गोरखनाथ वहीं ज़मीन पर साधना की मुद्रा में बैठ गए, उन्होंने आंखें मूंद लीं और ध्यान केंद्रित करने लगे। सभी लोग उनके आसपास ही खड़े थे, उन्होंने देखा कि गोरखनाथ के शरीर के आसपास वातावरण से खिंचकर ऊर्जा संचित हो रही है। गोरखनाथ के माथे पर पड़ते बल से ये स्पष्ट था कि ये कार्य उनके लिए काफी कठिन था। अचानक गोरखनाथ का शरीर हवा में कुछ इंच ऊपर उठ गया, उन्होंने अपने नेत्र खोले और उससे निकलती ऊर्जा सुपर इंडियन के शरीर में समाने लगी। उस ऊर्जा के कारण सुपर इंडियन को भी काफी तकलीफ हो रही थी लेकिन वह जैसे तैसे सहन कर रहा था, अचानक ही उसका शरीर हल्का नीला पड़ने लगा। सभी लोग भौचक्के होकर इस प्रक्रिया को देख रहे थे, जब उसका शरीर पूरी तरह से नीला पड़ गया तभी अचानक ही ऊर्जा का प्रवाह थम गया। गोरखनाथ भी वापस धरातल पर आ गए, दोनों सुपर इंडियन और गोरखनाथ बुरी तरह हांफ रहे थे।
ध्रुव दौड़कर सुपर इंडियन के पास पहुंचा और उसे संभालते हुए बोला- “तुम ठीक तो हो?”

सुपर इंडियन ने सिर हिलाकर स्वीकृति दी, फिर वह धीरे धीरे खड़ा हुआ। उसकी पूरी देह नीली पड़ चुकी थी।
गोरखनाथ भी खड़े हो गए, वे अब सामान्य हो चुके थे, वे मुस्कुराकर बोले- “बहुत दुष्कर कार्य था लेकिन अब तुम्हें अपनी उम्र को लेकर फिक्र करने की कोई आवश्यकता नहीं। मैंने तामसिक ऊर्जा को पुण्य ऊर्जा में बदलकर तुम्हारे शरीर में प्रविष्ट करवाया है लेकिन उस ऊर्जा में भी तामसी शक्ति के कुछ अंश थे जिसके कारण तुम्हारा शरीर नीला पड़ गया है।”
उसने गोरखनाथ की तरफ देखा और हाथ जोड़कर कहा- “धन्यवाद बाबा, मैं तो उम्मीद ही खो चुका था लेकिन आपने फिर से मेरे अंदर एक नई उम्मीद जगाई।”

गोरखनाथ ने अपने त्रिशूल से एक किरण छोड़ी जिससे सुपर इंडियन की नीली छाती पर भी एक बड़ा सा त्रिशूल का चिन्ह बन गया, वे बोले- “हालांकि तामसी शक्ति के तत्व इतने कम हैं कि वे तुम्हारे लिए परेशानी का विषय नहीं बनेंगे लेकिन फिर भी कभी अगर इन तत्वों ने तुम्हारे ऊपर हावी होने का प्रयास किया तो ये त्रिशूल का चिन्ह उनको रोकेगा।”

ध्रुव- वाह! यानी कि तुम अब बेफिक्री के साथ अपना क्राइम फाइटिंग करियर शुरू कर सकते हो सुपर इंडियन।
सुपर इंडियन- बिल्कुल! अब मैं पूरी कोशिश करूँगा कि जो जीवन बाबा ने मुझे दान दिया है उसको पुण्य की रक्षा के लिए इस्तेमाल में ला सकूँ।
गोरखनाथ- अच्छा अब मैं चलता हूँ, मुझे देवताओं को चेतावनी देने जाना होगा।
धनंजय- क्या आप यहाँ रुककर हमारी सहायता नहीं करेंगे बाबा?
गोरखनाथ- इस विकट परिस्थिति को समझो देव धनंजय, पाप क्षेत्र का द्वार खोलने का अगला प्रयास में शायद इतनी सक्षमता के साथ ना रोक पाऊँ क्योंकि सुपर इंडियन की उम्र की रोकथाम की प्रक्रिया में मेरी काफी ऊर्जा नष्ट हो गयी है। अब अपनी बची ऊर्जा से मैं दो में से एक काम कर सकता हूँ, या तो स्वर्ग जाकर देवताओं को सूचित करके उनकी मदद लूँ ताकि पाप क्षेत्र के खुलने के बाद भी हमारी विजय की कुछ संभावना बाकी रहे या फिर यहाँ रुककर पाप क्षेत्र को खुलने से रोकने का निरर्थक प्रयास करूँ। मुझे पहला विकल्प अधिक उचित लग रहा है कि मैं बिना समय नष्ट किये स्वर्ग की ओर रवाना हो जाऊँ क्योंकि वहाँ तक जाने में भी अत्यधिक ऊर्जा वहन होगी। नारकी को आप सभी नायक मिलकर भी रोक सकते हैं।
धनंजय- आप ठीक कहते हैं बाबा, आपको बिना समय नष्ट किये देवताओं से सहायता लेने जाना चाहिए।

फिर सबके देखते ही देखते बाबा गोरखनाथ जैसे एक तीव्र चमक के साथ प्रकट हुए थे, वैसे ही वापिस हवा में विलीन हो गए।

नारकी भी पातकी की तरह दिल्ली में अपने हाथों से एक किरण निकालकर पाप क्षेत्र के द्वार में पड़ी दरार को और चौड़ा करने का प्रयास कर रहा था कि तभी उस पर भीषण परमाणु ब्लास्ट और ठंडी ऊर्जा का वार एक साथ हुआ। उसने मुड़कर देखा तो पाया कि परमाणु, एंथोनी, जैकब और नई पोशाक में तिरंगा उसके समक्ष खड़े थे।

नारकी- तुम ज़रूर इस धरती के रक्षकों में से हो लेकिन मेरी सलाह मानो तो यहाँ से चले जाओ, नारकी को रोकना साधारण मनुष्यों के बस की बात नहीं। पाप क्षेत्र का द्वार तो खुलकर रहेगा।
परमाणु- तो फिर हम भी देखते हैं कि तू आखिर कैसे खोलता है पाप क्षेत्र का द्वार।
नारकी- हाहाहा, मुझसे भिड़ने से पहले ज़रा मेरे राक्षस दासों को तो पराजित करो।

इतना कहते ही नारकी ने अपने दोनों नेत्रों से किरणें छोड़ीं और दोनों किरणें हवा में स्थिर होकर दो अलग अलग आकृतियां बनाने लगीं। दोनों आकृतियां एक जैसी थीं, दो भयानक नीले दस फुट के प्राणी जिनके शरीर पर जहाँ तहाँ शूल आरोपित थे।

नारकी- हाहाहा, ये शूलक बंधु हैं। जिसको अपने शरीर पर लगे शूलों से भेदने की ठान लेते हैं उसे भेदकर ही रहते हैं, देखते हैं कि तुम इनसे कैसे बच पाते हो। तुम इनसे मुकाबला करो और तब तक मैं अपना कार्य सम्पन्न कर लेता हूँ।

शूलक बंधु एंथोनी, जैकब, तिरंगा और परमाणु की तरफ बढ़े।

परमाणु- जैकब अपना भयानक प्रेत रूप धारण करके इनसे निपटो, तब तक मैं नारकी को रोकने की कोशिश करता हूँ।
जैकब- तपनासुर से भिड़ंत के बाद फिलहाल मेरे पास प्रेत रूप में आने लायक पर्याप्त तंत्र ऊर्जा नहीं है, हमें पहले इनसे ही निपटना होगा।
एंथोनी- तो फिर ठीक है इनसे निपटकर ही आगे बढ़ा जाएगा।

एंथोनी ने ठंडी आग और जैकब ने तंत्र ऊर्जा का वार करना शुरू किया, इससे शूलक बंधु बुरी तरह विचलित हो उठे। उन्होंने अपने शरीर से तीव्र गति से तीक्ष्ण शूलों को उन पर फेंकना आरम्भ किया। एंथोनी जैकब को लेकर टेलीपोर्ट हो गया, परमाणु भी ट्रांसमिट हो गया और तिरंगा ने ढाल द्वारा खुद को उन तीक्ष्ण शूलों से बचाया लेकिन दुर्भाग्यवश आसपास खड़ी गाड़ियों और इमारतों को वे इन शूलों का शिकार होने से ना बचा सके।

एंथोनी- उफ्फ! ये राक्षस तो आम नागरिकों को भी निशाना बना रहे हैं।
तिरंगा- उनकी सुरक्षा मैं सुनिश्चित करता हूँ, तब तक तुम लोग इन दोनों को संभालो। बाकी ब्रह्मांड रक्षकों से भी संपर्क करो ताकि वे आकर नारकी को रोकें।

परमाणु ने उड़कर शूलों से बचते हुए ब्रह्मांड रक्षक फ्रीक्वेंसी पर शक्ति से संपर्क किया जो नागराज, भेड़िया, डोगा और लोमड़ी के साथ हेडक्वार्टर में बैठी थी।

परमाणु- शक्ति! क्या तुम मुझे सुन सकती हो?
शक्ति- हाँ परमाणु, बोलो क्या हुआ?
परमाणु- चंडकाल ने पाप क्षेत्र को पूरी तरह खोलने की कोशिश शुरू कर दी है और यहाँ दिल्ली में हम भारी मुसीबत से जूझ रहे हैं, जितनी जल्दी हो सके यहाँ आ जाओ।
शक्ति- ठीक है परमाणु, मैं बाकी रक्षकों को लेकर जल्दी ही वहाँ पहुँचती हूँ।

शूलक बंधुओं के शरीर से निकले अनगिनत शूलों में से कुछ ने एक गाड़ी को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया था। शूलों की मार के कारण गाड़ी का आगे वाला दरवाजा लगभग लटक चुका था जिसे तिरंगा ने उखाड़ फेंका, गाड़ी के अंदर चार जन का एक छोटा सा परिवार था- पति, पत्नी, पुत्र और पुत्री। वे लोग शूलों से घायल तो नहीं हुए थे लेकिन इस घटना के कारण बुरी तरह से घबरा गए थे।

तिरंगा- घबराइए मत, आप लोगों मैं एक एक करके यहाँ से निकालूंगा, बस संयम बनाये रखिये।

सबसे पहले तिरंगा ने ड्राइवर सीट पर बैठे घर के मुखिया को बाहर निकाला और शूलों की बौछार से ढाल की ओट लेकर बचते बचाते एक इमारत के पीछे के गया जो अभी तक सुरक्षित थी।

तिरंगा- आप यहाँ छिपे रहिए मैं आपके बाकी के परिवार को इसी तरह लेकर आता हूँ।

एक एक करके तिरंगा ने घर के हर सदस्य को उस सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया। परमाणु, एंथोनी और जैकब ने शूलक बंधुओं से भिड़ने में अपनी शक्ति का एक एक कतरा लगा दिया था जिसके कारण शूलक बंधु आम नागरिकों पर शूल वर्षा नहीं कर पा रहे थे। तिरंगा उस परिवार से बोला- “अब आओ यहाँ से सुरक्षित निकल जाइये, मैं देखता हूँ कि इस इलाके में और कितने निर्दोष फँसे हुए हैं।”

उनके छोटे बेटे ने तिरंगा से पूछा- “तिरंगा भैया, ये सब राक्षस कहाँ से आ रहे हैं?”
तिरंगा ने उसकी तरफ देखा और जवाब दिया- “बहुत बुरी जगह से बेटे लेकिन चिंता मत करो, मैं किसी को नुकसान नहीं पहुँचने दूँगा”
घबराए हुए पिता ने तिरंगा से पूछा- “लेकिन तुम भी तक हमारी तरह एक आम इंसान हो, तुम कब तक हमें इन राक्षसों से बचा पाओगे?”
तिरंगा मुस्कुराकर बोला- “अगर सिर्फ शक्तियां पाने से कोई सुपरहीरो बन जाता तो जिन राक्षसों से हम लड़ रहे हैं वे भी सुपरहीरो होते। खैर, आप लोग यहाँ से दूर निकल जाइये ताकि मुझे आपकी सुरक्षा की चिंता ना करनी पड़े।”

तभी ब्रह्मांड रक्षक फ्रीक्वेंसी पर ध्रुव ने तिरंगा से संपर्क किया।

ध्रुव- अंगरक्षक अभय तुम……
तिरंगा (बात बीच में काटकर)- अंगरक्षक अभय नहीं ध्रुव फिलहाल मैं तिरंगा हूँ।
ध्रुव- अरे, ये कब हुआ?
तिरंगा- बस पोशाक का अंतर है, तुमने संपर्क क्यों किया?
ध्रुव- हम लोग यहां पातकी नाम के एक राक्षस से भिड़ गए थे, वो…..
तिरंगा (फिर से बात काटकर)- नारकी का भाई पातकी?
ध्रुव- तुम्हें कैसे पता?
तिरंगा- फिलहाल मैं, परमाणु, एंथोनी और जैकब उसी से भिड़े हुए हैं लेकिन रोकने का प्रयास कुछ खास सफल होता नहीं दिख रहा है। तुमने पातकी को कैसे रोका?
ध्रुव- तुम्हें कैसे पता कि मैंने पातकी को रोक दिया?
तिरंगा- तुम्हारी आवाज़ की निश्चिंतता से।
ध्रुव- वाह, यानी तुम्हारे अंदर का डिटेक्टिव अभी भी जिंदा है। वैसे पातकी को हमने नहीं रोका, हम तो उसका सामना तक कर पाने में भी असमर्थ हो रहे थे लेकिन तभी न जाने कहाँ से बाबा गोरखनाथ नाम के एक साधक आये और उन्होंने उसे खत्म कर दिया लेकिन फिलहाल बाबा देवताओं की सहायता लेने के लिए स्वर्ग रवाना हुए हैं।
तिरंगा- तो फिर हम इस आफत को कैसे रोकें?
ध्रुव- मैं, धनंजय और सुपर इंडियन वहाँ पहुँच रहे हैं, तब विचार विमर्श करेंगे।
तिरंगा- ये सुपर इंडियन कौन है?
ध्रुव- आकर बताता हूँ।

ध्रुव से संपर्क काटते ही तिरंगा ने देखा कि शूलों के कारण जिस इमारत की हालत पहले से खस्ता थी, उसकी तरफ कुछ और शूल उड़ते हुए आये जिनसे वह लगभग ढहने के कगार पर पहुँच गई थी। वह तुरंत उस तरफ भागा। इमारत के अंदर जाना ही बेहद दुष्कर कार्य था क्योंकि मलबे से गेट ब्लॉक हो गया था लेकिन तिरंगा का लचीला बदन जरा सी जगह से पार हो गया। अंदर धूल धक्कड़ और मिट्टी कंकड़ के पार किसी इंसानी जान को तलाशने नामुमकिन सा कार्य था लेकिन तिरंगा ने भी ठान लिया था कि किसी भी कीमत पर इमारत के ढहने से पहले वह जितनी हो सके उतनी जानें बचाएगा।

उधर शूलक बंधुओं से भिड़े रहने के कारण एंथोनी, परमाणु या जैकब में से किसी को भी नारकी से जूझने का वक्त नहीं मिल पा रहा था। अब हवा में धीरे धीरे चौड़ी होती दरार साफ नजर आ रही थी जिसका अर्थ था कि नारकी अपने कार्य में सफल हो रहा था।

नारकी- हाहाहा! अब पाप क्षेत्र का द्वार पूरी तरह खुल जायेगा और दो महाशक्तियाँ स्वतंत्र हो जायेंगी।

तभी उसके चेहरे पर एक प्रचंड घूंसा पड़ा, घूंसे का वेग इतना तेज था कि नारकी जैसा बलिष्ठ राक्षस भी हवा में उड़ता हुआ एक इमारत से जा टकराया। उसने उठकर आश्चर्य से देखा कि आखिर धरती पर इतना अधिक शक्तिवान कौन पैदा हो गया। सामने नागराज खड़ा था, उसके साथ थे शक्ति, भेड़िया, डोगा और लोमड़ी जो परमाणु का संदेश मिलते ही तुरंत घटनास्थल पर आ पहुँचे थे।

नारकी- असंभव! आखिर एक मानव में इतना बल कैसे है?
नागराज- तूने अभी बल देखा ही कहाँ है नीच राक्षस? बल तो तुझे मैं अब दिखाऊँगा!

इतना कहकर नागराज तीव्र गति से उड़ता हुआ उस तक पहुँचा और उसे लेकर ऊपर आकाश की ओर बढ़ने लगा, नागराज की रफ्तार इतनी अधिक थी कि आसपास की इमारतों का काँच हवा के तीव्र वेग के कारण बुरी तरह से टूट गया। नागराज ने नारकी को अपने शिकंजे में बुरी तरह फँसा रखा था जिससे नारकी सम्पूर्ण बल लगाकर भी स्वतंत्र नहीं हो पा रहा था।

नागराज- अब तुझे अंतरिक्ष में सूर्य की भीषण उष्मा में ले जाकर फेंक दूँगा, वहाँ तेरे शरीर की राख तक नहीं मिलेगी।

नागराज ऐसा कर भी लेता यदि उसे एक भीषण ऊर्जा प्रहार ना लगता, उस प्रहार के कारण नारकी उसकी कैद से आज़ाद हो गया।

नागराज (क्रोधित होकर)- किसने ये नीच हरकत की? सामने आओ!

तभी तेज़ी से आकर उड़ते चंडकाल ने नागराज को एक भीषण मुक्का मारा जिससे वह काफी दूर जाकर गिरा।

नारकी- अच्छा हुआ आप आ गए महाराक्षस, वरना ये मनुष्य मेरा अंत ही कर देता।
चंडकाल- बातों में समय व्यर्थ मत करो मूर्ख! जो काम दिया है वो जाकर करो, एक जगह हम वैसे ही असफल हो चुके हैं क्योंकि पातकी का अंत हो चुका है।
नारकी- क्या? पातकी का अंत? लेकिन कैसे?
चंडकाल- यह तो नहीं पता लेकिन उससे मेरा मानसिक संपर्क अचानक कट गया जिसका सीधा सा अर्थ ये है कि उसकी मृत्यु हो चुकी है।
नारकी (क्रोधित होकर)- आप चिंता ना करिए महाराक्षस! हमारे उद्देश्य की पूर्ति होकर रहेगी, पाप क्षेत्र का द्वार अवश्य खुलेगा।

तभी चंडकाल ने देखा कि नागराज उड़ता हुआ वापिस आ रहा था, वह नारकी से बोला- “तुम जाओ नारकी और द्वार खोलने का प्रयास करो, तब तक मैं इस विलक्षण मानव को महाराक्षस से भिड़ने का अर्थ समझाता हूँ।”

नारकी तुरंत नीचे धरती की ओर रवाना हो गया। चंडकाल और नागराज अब एक दूसरे के आमने सामने थे।

नागराज- तो तू है महाराक्षस चंडकाल जिसके विषय में इतनी बड़ी बड़ी बातें सुनने को मिली हैं।
चंडकाल- जल्द ही तुझे पता चल जाएगा मानव कि चंडकाल इतना प्रसिद्ध क्यों है?

फिर दो पहाड़ आपस में गुत्थमगुत्था हो गए। नागराज ने चंडकाल पर दो चार मुक्के ही बरसाए थे कि चंडकाल ने उसके दोनों हाथों को मजबूती से पकड़कर उसे घुमाकर फेंक दिया। नागराज कुछ दूर हवा में तैरने के बाद स्थिर हो गया लेकिन अब उसे चंडकाल की शारीरिक शक्ति का आभास हो गया था, उसने मन ही मन सोचा- “यह शारीरिक शक्ति में मुझसे उन्नीस नहीं बल्कि बीस ही होगा इसलिए मुझे अन्य शक्तियों का प्रयोग करते हुए इसे काबू में करने का प्रयास करना होगा।”

चंडकाल वापिस प्रहार करने के लिए नागराज की तरफ बढ़ा लेकिन तब तक नागराज इच्छाधारी कणों में बदलकर चंडकाल के पीछे पहुंच चुका था, इससे पहले की चंडकाल कुछ समझ पाता, एक जोरदार लात उसके चेहरे पर पड़ी। वह अपनी ठोढ़ी सहलाता हुआ बोला- “वाह! तू तो वाकई बहुत शक्तिशाली है, महाबली भोकाल से भी अधिक शक्तिशाली, तुझसे युद्ध करने में आनंद आएगा।”

एक बार फिर नागराज और चंडकाल के बीच द्वंद शुरू हो गया लेकिन आकाश में चल रहे इस द्वंद के अलावा धरातल पर चल रहा युद्ध भी रोमांचक होता जा रहा था। जहाँ डोगा, भेड़िया, जैकब, परमाणु और लोमड़ी शूलक बंधुओं से निपटने का प्रयास कर रहे थे वहीं शक्ति और एंथोनी अभी अभी नागराज के चंगुल से छूटकर वापिस आये नारकी से भिड़ गए थे। शक्ति और एंथोनी लगातार नारकी पर उष्मा और ठंडी आग का प्रहार कर रहे थे, नारकी क्रोधित होकर बोला- “कितने भी प्रयास कर लो तुम सब मिलकर लेकिन पाप क्षेत्र के द्वार को खुलने से नहीं रोक पाओगे!”

एंथोनी- तुम अपने तीसरे नेत्र का प्रयोग करके इसे खत्म क्यों नहीं कर देतीं शक्ति?
शक्ति- अगर ये इतना ही आसान होता तो हर राक्षस के साथ मैं ऐसा ही करती। दरअसल, मैंने कुछ ही देर पहले निशाचर नामक शैतान के शरीर को तीसरे नेत्र के प्रयोग से खत्म करने किया है और मैं एक के बाद एक लगातार तीसरे नेत्र का प्रयोग नहीं कर सकती। मॉडर्न भाषा में कहूँ तो इसको “रीचार्ज” करना आवश्यक होता है क्योंकि मैं काली माँ की शक्ति का एक अंश हूँ, साक्षात काली माँ नहीं।
एंथोनी- कोई बात नहीं, इसे हम अपनी बाकी शक्तियों से खत्म कर देंगे।

तभी नारकी ने नेत्रों से बेहद भीषण तरंगें छोड़ीं जिन्होंने एंथोनी और शक्ति से टकराकर उन्हें बेहद विचलित कर दिया। उन्हें ऐसा लगा जैसे वे किसी बुलडोज़र के नीचे आ गए हों, वे दोनों घुटने के बल बैठ गए थे जैसे किसी ने उनकी सारी शक्ति निचोड़ ली है। नारकी भयानक स्वर में बोला- “तुम मानवों की वजह से मैंने अपना भाई खो दिया, लेकिन उसका अधूरा काम मैं पूरा करूँगा। पाप क्षेत्र अवश्य खुलेगा।”

उसके बाद वह फिर अपनी शक्ति द्वारा पाप क्षेत्र का द्वार खोलने में जुट गया, अशक्त पड़े शक्ति और एंथोनी उसको देखने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रहे थे। उनसे कुछ ही फ़ीट दूर रक्षक लड़ रहे थे शूलक बंधुओं से जिनके अभेद्य शरीर पर उनके वार सिर्फ खरोंच डाल पा रहे थे।

डोगा- उफ्फ, मेरी मैगज़ीन खाली होने वाली है, परमाणु भी ब्लास्ट मार मारकर थक गया, जैकब के तंत्र वार भी उतने असरदार नहीं हैं, भेड़िया की दिव्य गदा के प्रचंड वार ही कुछ असर कर रहे हैं लेकिन वह कितनी देर तक इनसे भिड़ पायेगा ये कह नहीं सकते।
लोमड़ी- हमें इनसे जल्द से जल्द निपटना होगा, शायद तुमने ध्यान ना दिया हो लेकिन इनके शरीर से निकलने वाले शूल बहुत अधिक “कोलेटरल डैमेज” कर रहे हैं।
डोगा- कोई योजना बनानी होगी, मुझे नहीं लगता कि हम इनसे सीधी टक्कर ले पाएंगे।

उस लगभग ढहती इमारत के अंदर तिरंगा आगे बढ़ता चला जा रहा था, उसके आसपास बस मलबा गिरने से दबी कुचली लाशें ही पड़ी थीं, वह भी धीरे धीरे उम्मीद खोने लगा था कि उसे कोई आगे मिलेगा लेकिन तभी उसे किसी छोटी बच्ची की सिसकारी सुनाई दी। आसपास बहुत अधिक धूल और मलबे की वजह से वह दिशा का अनुमान नहीं लगा पा रहा था। उसने आँखें बंद करके गये से सिसकने की आवाज़ को सुना, ये जानकर वह और अधिक चौकन्ना हो गया था कि इस इमारत में कोई जीवित व्यक्ति है। शीघ्र ही आवाज़ का अंदाज़ा लगाते हुए वह आगे बढ़ा, एक छोटे से दरवाज़े को टूटे मलबे ने बुरी तरह जाम करके रखा था, तिरंगा चिल्लाया- “अगर कोई इस इमारत में फँसा है तो आवाज़ दे!”

कुछ देर तक उसे कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली लेकिन अचानक एक मासूम सी आवाज़ उस कमरे के अंदर से गूँजी- “अंकल मैं इस रूम में हूँ, प्लीज मुझे बचा लीजिये।”
आवाज़ से बच्ची की उम्र सात-आठ साल से अधिक नहीं लग रही थी। तिरंगा बोला- “तुम फिक्र मत करो बच्ची, बस अगर दरवाज़े के एकदम सामने खड़ी हो तो थोड़ा पीछे हट जाओ क्योंकि मलबा हटाये बगैर कमरे मैं कमरे के अंदर नहीं आ सकता और मलबा हटाने पर वह अंदर की तरफ गिरेगा।”
“ठीक है अंकल, प्लीज जल्दी करिए।” बच्ची की आवाज़ से ही लग रहा था कि वह काफी घबराई हुई थी, तिरंगा ने ढाल को मजबूती से अपने हाथों में पकड़ा, उसके कटर्स एक्टिवेट किये और पूरी शक्ति से मलबे को धक्का देने लगा। हालांकि मलबे ने बुरी तरह दरवाज़े को जाम कर रखा था लेकिन तिरंगा के लगातार तीव्र वारों के कारण वह धीरे धीरे हट रहा था। तिरंगा के लगातार प्रयासों के कारण मलबे में इतनी जगह बन गयी कि वह अंदर जा सके, वह अंदर गया लेकिन अंदर का दृश्य देखकर बुरी तरह हिल गया। एक छोटी सी बच्ची सिसकारी भरती अपने माता पिता के मृत शवों के पास बैठी थी, उसके पिता के पेट में बड़ा सा लोहे का सरिया घुसा हुआ था और माता के सिर पर शायद मलबे के बड़ा टुकड़ा लगा था जिसके कारण उनकी तुरंत मृत्यु हो गयी थी। चारों तरफ मलबे की धूल में सने रक्त के बीच बच्ची को देखकर तिरंगा का हृदय रोने लगा। तिरंगा को देखकर वह बच्ची तुरंत उसके गले जा लगी, तिरंगा बोला- “घबराओ नहीं बेटा, सब ठीक हो जाएगा।”

तभी उसने देखा कि छत से छोटा सा मलबे के छोटे छोटे टुकड़े टूटकर उनकी तरफ बढ़ रहे थे, उसने तुरंत बच्ची के ऊपर अपनी ढाल रख दी और खुद भी झुक गया। बच्ची तो मलबे के टुकड़ों से बच गयी लेकिन तिरंगा के ऊपर एक बड़ा टुकड़ा गिरा, उस वक्त यदि प्रोफेसर कमलकांत की बनाई पोशाक उसके शरीर पर ना होती तो वह बहुत अधिक घायल हो सकता था लेकिन फिर भी थोड़ा बहुत घायल तो हुआ ही। उसने बच्ची को उस कमरे से बाहर निकाला और फिर खुद निकला, वे लोग जल्द ही इमारत के बाहर आ चुके थे। तिरंगा उससे बोला- “तुम मेरे साथ ही रहना, आसपास खतरा है।”
बच्ची ने स्वीकृति में सिर हिला दिया, तिरंगा उससे कुछ उम्मीद भी नहीं कर रहा था क्योंकि वह जानता था कि माँ बाप को खोने का दुख क्या होता है।

तभी उसने देखा कि हवा में एक द्वार बन रहा है और उसमें से ध्रुव, धनंजय और सुपर इंडियन बाहर आ रहे हैं। ध्रुव आते ही तिरंगी पोशाक में अभय को देखकर चौंक पड़ा, वह बोला-“वाह! ये पोशाक जंच रही है तुम्हारे ऊपर।”

तिरंगा- देखो ध्रुव मैं जानता हूँ कि मुझे अंगरक्षक के परिधान में होना चाहिए लेकिन….
ध्रुव- नहीं दोस्त, तुम एकदम सही परिधान में हो। अंगरक्षक बनना तुम्हारा व्यक्तिगत निर्णय था लेकिन पता नहीं क्यों मुझे कहीं न कहीं अंदर से लगता था कि एक दिन तुम वापिस इस देश की मिट्टी की रक्षा के लिए तिरंगा ज़रूर बनोगे, मैं बहुत खुश हूँ दोस्त। वैसे यह छोटी बच्ची कौन है?
तिरंगा- एक ढहती इमारत से बचाकर लाया हूँ इसे, बस यही एक जीवित बची थी।

यह बोलते हुए तिरंगा की आँखों में खून उतर आया था, फिर उसका ध्यान सुपर इंडियन की तरफ चला गया, वह बोला- “तो तुम हो सुपर इंडियन।”

सुपर इंडियन- जी सर, आपसे मिलकर खुशी हुई।
तिरंगा- ब्रह्मांड रक्षक दल में स्वागत है सुपर इंडियन, उम्मीद है कि तुम एक अच्छे क्राइम फाइटर साबित होगे।
धनंजय- यदि मेल मिलाप हो गया हो तो ज़रा मुसीबत पर भी गौर फरमा लें?
तिरंगा- मुसीबत बड़ी विकट है धनंजय, एक तरफ अभेद्य शरीर वाले शूलक बंधु हैं और दूसरी तरफ नारकी जो पाप क्षेत्र को खोलने पर आमादा है। इन दोनों से ही निबटने का कोई रास्ता समझ में नहीं आ रहा है।
ध्रुव- तुम और मैं इस टीम के थिंक टैंक हैं, जब तक वो लोग भिड़ रहे हैं तब तक हमें कोई योजना सोचनी चाहिए।

भेड़िया का बेहद प्रलयंकारी रूप देखने को मिल रहा था वह दोनों शूलक बंधुओं से बेहद कुशलतापूर्वक लड़ रहा था, ना सिर्फ वह चीते सी चपलता से सारे वार बचा जा रहा था बल्कि प्रलयंकारी गदा के ताबड़तोड़ वार भी उन दोनों पर बरसा रहा था।

भेड़िया- तुम्हारा शरीर बशर्ते वज्र का बना हो लेकिन मेरी चमत्कारी गदा तुम्हारे शूलों को तुम्हारे ही शरीर के भीतर घुसा देगी।

शूलक बंधु भेड़िया पर गोली की गति से अपने शूल बरसा रहे थे लेकिन बिजली सी रफ्तार से गदा चलाकर वह उन शूलों को हवा में ध्वस्त कर दे रहा था। भेड़िया पर उनका ध्यान केंद्रित होने से एक फायदा ये भी था कि उन्हें आसपास तबाही फैलाने का मौका कम मिल पा रहा था। जैकब, परमाणु और डोगा भी उसका बराबर साथ दे रहे थे। अचानक ही शूलकों के शरीर से और अधिक मात्रा में छोटे छोटे शूल गोलियों की रफ्तार से निकलने लगे, डोगा एक इमारत के पास ही खड़ा था, उसने और लोमड़ी ने उस इमारत की ओट ले ली लेकिन बाकी लोग खुद को उन तीक्ष्ण नुकीले शूलों के दायरे में आने से नहीं बचा पाए। भेड़िया ने गदा के वारों से लगातार शूलों को छितराने की कोशिश की लेकिन उसके बाद भी कई शूल उसके शरीर को जगह जगह से बेधते हुए निकल गये। जैकब के प्रेत शरीर को उतनी हानि नहीं हुई, परमाणु ने वक्त पर ट्रांसमिट होने की कोशिश की लेकिन फिर भी कुछ शूल उसके शरीर को स्पर्श करते हुए निकल ही गये जिसके कारण उसकी पोशाक जगह जगह से कट फट गई और खून भी रिसने लगा। अचानक ही जोर शोर से चलता युद्ध एकदम से थमता सा प्रतीत हुआ, भेड़िया धराशायी हो चुका था, जैकब की शक्ति खत्म हो रही थी, शक्ति और एंथोनी नारकी के वार के कारण अशक्त पड़े हुए थे। परमाणु वापिस ठोस रूप में आ गया था लेकिन वह मुश्किल से खड़ा हो पा रहा था, उसकी पोशाक बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गयी थी लेकिन वह अपनी दिल्ली को बचाने के लिए अट्टहास लगाते दोनों शैतानों के सामने किसी अडिग चट्टान की तरह आँखों में क्रोध का लावा लिए खड़ा था।

शूलक बंधु हँसते हुए बोले- “दाद देनी पड़ेगी तेरी मानव, साहस तो कूट कूटकर भरा होता है तुम्हारी प्रजाति में लेकिन शक्ति के संदर्भ में तुम असुरों से हमेशा पीछे रहोगे और मसले जाओगे। तेरे साथी तो बेसुध हो गए, अब तेरी बारी है।”

परमाणु बुरी तरह हांफ रहा था, वह क्रोधित होकर बोला- “भले ही मेरे साथियों में उतनी शक्ति ना रही हो लेकिन अपनी धरती की रक्षा के लिए परमाणु अकेला ही काफी है।”

“ऐसे कैसे शक्ति नहीं रही बे?” डोगा चिल्लाता हुआ बाहर आया, उसके साथ लोमड़ी भी थी- “अबे टपोरी राक्षसों, मानवों के पास एक चीज़ है जो तुम्हारे पास कभी नहीं होगी और वो है बुरी से बुरी परिस्थिति में अडिग रहने का जज्बा। इस जज्बे के लिए जैसा जिगर चाहिए, वही तुम्हारे पास नहीं है, तुमसे लड़ते हुए हम मृत्यु को प्राप्त हो सकते हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम जीत जाओगे। इतिहास उठाकर देख लो, जीत अंत में हमेशा पुण्य की होती है।”

शूलक बंधु डोगा के तीखे कटाक्षों से क्रोधित होकर बोले- “ठीक है, यदि तुमको वीरगति प्राप्त करने की इतनी शीघ्रता है तो हमें भी तुम्हारा वध करने में कोई आपत्ति नहीं।”

परमाणु, डोगा और लोमड़ी ने मुट्ठियाँ भींच लीं, वे जानते थे कि इन शक्तिशाली राक्षसों के आगे उनकी जीत की कोई संभावना नहीं है लेकिन न जाने क्यों फिर भी उनका सामना करने की एक इच्छा थी जो बहादुरी के साथ साथ कुछ मूर्खतापूर्ण भी थी लेकिन ऐसे फैसले लेना सिर्फ एक नायक के ही बस की बात होती है, हर कोई ऐसे फैसले नहीं ले पाता लेकिन इससे पहले की शूलक उन पर हमला करते एक ढाल सरसराती हुई आयी और एक शूलक के सिर पर लगी। उसने देखा कि तिरंगा, ध्रुव और सुपर इंडियन भी जंग में शामिल होने पहुंच चुके थे। सुपर इंडियन ने बिना वक्त गंवाये एक ऊँची छलांग भरी और ब्रेसलेट्स से तीव्र इलेक्ट्रिक शॉक का वार शूलकों पर किया, शूलक थोड़े असहज हुए लेकिन कोई खास फर्क नज़र नहीं आया। तिरंगा के वार भी शूलकों पर कुछ खास असर नहीं डाल पा रहे थे लेकिन उनके आने से पराजित होती टीम में हौसला वापस आ गया।
ध्रुव जैकब, डोगा और परमाणु से बोला- “फटाफट घायल रक्षकों को लेकर यहाँ से निकालो, हम इनको कुछ ही देर तक उलझा सकते हैं, उसके बाद अपनी योजना पर भी अमल करना है।”

डोगा- क.. क्या कैसी योजना?
ध्रुव- वह तो तुम्हें पता चल ही जायेगा लेकिन यहाँ से एक निश्चित दूरी पर चले जाओ ताकि योजना को क्रियान्वित करने में आसानी हो। जल्दी जाओ।

उसके बाद डोगा ने कोई सवाल नहीं किया। शूलक बंधु बुरी तरह बिफर चुके थे और लगातार शूलों के वार कर रहे थे। तिरंगा अपनी ढाल और सारी फुर्ती के बावजूद उनके सभी वार बचाने में असमर्थ हो रहा था लेकिन प्रोफेसर द्वारा दी गयी पोशाक के कारण उसके पास अतिरिक्त सुरक्षा भी थी। ध्रुव हर प्रकार की कलाबाजियां खाकर भी खुद को शूलों से पूरी तरह सुरक्षित करने में असमर्थ था। सुपर इंडियन ने अब ब्रेसलेट्स से तीव्र ध्वनि तरंगें निकालनी शुरू कर दी थीं जिससे शूल हवा में ही नष्ट हो जा रहे थे , बचने का सबसे कारगर तरीका उसी के पास था इसलिए ध्रुव भी उसी के आसपास रहकर खुद को बचा रहा था। शक्ति और एंथोनी को अशक्त करने के बाद नारकी पूरी तल्लीनता से पाप क्षेत्र के द्वार को खोलने में जुटा हुआ था, वह अपने आसपास का सबकुछ भुला चुका था। उसे ये भी नहीं दिखा की लोमड़ी कब चुपके से आकर अशक्त शक्ति को कंधे का सहारा देकर एक कोने में ले गयी, डोगा भी एंथोनी को ले गया। शूलक बंधु भी तिरंगा, ध्रुव और सुपर इंडियन पर वार करते करते बेसुध पड़े भेड़िया से दूर निकल गए जिसे जैकब और परमाणु उठाकर वहां से दूर ले गए।
ध्रुव, तिरंगा और सुपर इंडियन के लिए भी अब बचना मुश्किल हो रहा था, तभी अचानक ध्रुव चिल्लाया “धनंजय! अब!”

ध्रुव के इतना बोलते ही दूर खड़े धनंजय के हाथ में मौजूद स्वर्णपाश हवा में लहराया और एकदम नारकी और शूलक बंधुओं के बीचोंबीच जाकर द्वार बनाना शुरू कर दिया। जल्द ही एक बड़ा सा गोलाकार द्वार हवा में एकदम बीचोंबीच स्थित हो गया जो कि सीधे सूर्य तक जाता था। अंतरिक्ष के निर्वात नारकी पर कोई असर नहीं डाला पर शूलक बंधुओं को अपनी ओर खींचने लगा लेकिन उसके साथ साथ पास ही खड़े ध्रुव, तिरंगा और सुपर इंडियन भी निर्वात की चपेट में आ गए और खिंचने लगे। दोनों शूलकों ने अपने शरीर पर भारी भारी शूल पैदा कर लिया जिसकी सहायता से उन्होंने अपने पैरों को धरती में गाड़ दिया।

ध्रुव- उफ्फ! लगता है इनकी जगह हम ही खिंच जाएंगे निर्वात में।
सुपर इंडियन- ऐसा नहीं होगा, मुझे पातकी पर आजमाया तरीका यहाँ भी आजमाना होगा।

सुपर इंडियन ने ब्रेसलेट से एक नाइलो स्टील के पतले तार की लाइन छोड़ी जो एक खंभे से जाकर बँध गयी, फिर धीरे धीरे उस तार के सहारे सुपर इंडियन एक शूलक तक पहुँचा और तीव्र ध्वनि तरंगें छोड़ना आरम्भ किया। एक तो निर्वात का खिंचाव और ऊपर से तीव्र ध्वनि तरंगों ने उस शूलक को ऐसा धकेला कि धरती से उसके पांव उखड़ गए और वह अंतरिक्ष के निर्वात में जाकर गायब हो गया। ये देखकर दूसरा शूलक बेहद क्रोधित हुआ और एक लंबे शूल का निर्माण कर सुपर इंडियन की बांह में घोंप दिया, सुपर इंडियन चीखा- “आह!”
उसने विशाल हाथ बढ़ाकर सुपर इंडियन को अपने शिकंजे में ले लिया। ध्रुव ने बहुत देर से निर्वात से बचने के लिए एक खंभे को पकड़ा हुआ था लेकिन जब वह खंभा टूटा तो वह भी खिंचकर बचे हुए शूलक की तरफ बढ़ने लगा। अब शूलक ने सुपर इंडियन और ध्रुव दोनों को शिकंजे में लिया था और धीरे धीरे उसकी पकड़ कसती ही जा रही थी।

द्वार को बड़ी मुश्किल से ध्यान केंद्रित रखकर खोलता धनंजय चौंक उठा, वह बोला- “यह योजना का हिस्सा नहीं था! ये ध्रुव और सुपर इंडियन को लेकर निर्वात में जायेगा, मुझे द्वार बंद करना होगा!”

तिरंगा जो इतनी देर से ढाल को ज़मीन में गड़ाकर निर्वात से बचा हुआ था, वह चीख उठा – “नहीं धनंजय! द्वार को कुछ देर और खोले रखो, मैं कुछ करता हूँ!”

धनंजय- पागल मत बनो तिरंगा! तुम क्या करोगे?
तिरंगा (मुस्कुराकर)- सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बाजू ए कातिल में है।

इससे पहले की धनंजय तिरंगा की बात समझ पाता, तिरंगा ने पूरी शक्ति के साथ सड़क में गाड़ी अपनी ढाल निकाल ली और निर्वात द्वारा खिंचते हुए शूलक की तरफ बढ़ चला। तिरंगा ने मन ही मन ठान लिया था कि उसे उसकी पूरी शक्ति लगा देनी है, उसने ढाल को कसकर पकड़ा और उनमें उभरे कटर्स को पूरी शक्ति के साथ शूलक के सीने में गाड़ दिया, शूलक ने सुपर इंडियन और ध्रुव को छोड़ दिया। सुपर इंडियन ने ध्रुव का हाथ थामा और नाइलो स्टील के तार को एक दूर इमारत बांधकर एक ऊंची छलांग मारी, अब वह निर्वात के खिंचाव क्षेत्र से बाहर था। उसके दायरे में थे बस शूलक और देशभक्ति का वह पुतला जो अपनी धरती को बचाने के लिए जान देने से भी पीछे नहीं हटता था। उसने ढाल को और गहरे से शूलक की छाती में उतार दिया, इस समय तिरंगा अपना पूरा ज़ोर लगा रहा था, ढाल के कारण उसके भी हाथ छिल रहे थे लेकिन केवल इच्छाशक्ति के दम पर वह ये असंभव सा दिखने वाला काम करने का प्रयत्न कर रहा था। तभी अचानक शूलक के हाथ में छोटा सा शूल उभरा जो उसने तिरंगा के पेट में घुसा दिया, उस समय देखने वालों की साँसें थम गयीं, ध्रुव, सुपर इंडियन, धनंजय, डोगा, लोमड़ी, परमाणु, जैकब आदि सभी एकदम भौचक्के रह गए थे। किसी प्रकार से दर्द को सहन करता तिरंगा बोला “हे भारत माँ! मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं मांगा लेकिन आज तेरा लाल तुझसे कुछ मांगना चाहता है, मुझे बस इतनी शक्ति दे दे कि आज के दिन तेरी लाज रख लूँ! भले ही ये मेरा आखिरी दिन ही क्यों न हो!”

फिर पता नहीं अचानक क्या हुआ, तिरंगा के भीतर न जाने कैसा जुनून आ गया था कि उसने पूरी शक्ति से शूलक को धक्का मारा, वह अपना संतुलन नहीं बना पाया और निर्वात में सूर्य की भीषण उष्मा में भस्म होने चला गया लेकिन जिस शूलक के शरीर का सहारा लेकर तिरंगा अब तक निर्वात से बच रहा था, वह शरीर ना रहने पर वह तेजी से खिंचने लगा। यह देखकर बुरी तरह घायल परमाणु से ना रहा गया, वह आगे बढ़ने लगा तो जैकब उसका हाथ थामकर बोला “पागल मत बनो। परमाणु, द्वार के उस तरफ सूर्य है। धनंजय भी अभी द्वार बंद नहीं कर सकता क्योंकि नारकी को इसमें भेजने का और पाप क्षेत्र को खुलने से रोकने का ये हमारे पास आखिरी विकल्प है लेकिन कहीं ऐसा ना हो कि तिरंगा को बचाते बचाते कहीं तुम खुद निर्वात की चपेट में आ जाओ।”

परमाणु ने जैकब का हाथ झटका और उड़कर अपने दोस्त को बचाने चल दिया, तिरंगा के पैर जमीन से उखड़ चुके थे और वह कुछ ही पल में द्वार के उस पार होता लेकिन तब तक परमाणु उड़कर तेजी से आया और तिरंगा के निर्वात की चपेट में आते शरीर को बचाकर द्वार से दूर ले गया। अब तक शक्ति और एंथोनी भी नारकी के वार से उबरने लगे थे, भेड़िया की कमर पट्टिका भी उसके घाव भरने लगी थी। परमाणु उड़कर तिरंगा को ले तो आया था लेकिन तब तक उसका रक्त काफी रिस चुका था, वह मुश्किल से साँस ले पा रहा था। परमाणु ये देखकर बहुत घबरा गया, वह बोला- “हे भगवान! इसकी सांसें रुकती जा रही हैं, मुझे इसे हॉस्पिटल…..”

तिरंगा (परमाणु की बात बीच में काटकर)- कोई फायदा नहीं दोस्तज़ जितने समय में मैं अस्पताल पहुचूँगा तब तक वैसे भी बहुत देर हो जाएगी। कहते हैं जब इंसान का आखिरी वक्त आता है तब उसे पता चल जाता है, कुछ ऐसा ही अपने साथ हुआ है यारों।

परमाणु की आँखों से आँसू गिरने लगे थे, वह बोला- “ऐसा मत बोल यार, इतने समय बाद तो मुझे मेरा बचपन का साथी मिला और तू अभी से मरने की बातें करने लगा।”

तिरंगा (बुरी तरह हांफते हुए)- अरे तू इसकी चीज़ का अच्छा पक्ष देख ना दोस्त, शायद मेरी किस्मत में मौत से पहले बचपन के साथी से मिलना लिखा होगा।

तब तक शक्ति को भी पूरी तरह होश आया गया था, जैसे ही उसने तिरंगा की हालत देखी, वह बुरी तरह क्रोधित हो गयी। काली माँ का असल रूप अब उस पर हावी हुआ था, उसने नारकी की ओर क्रोध से देखा जो अभी तक पाप क्षेत्र का द्वार खोलने में ही व्यस्त था। वह तीव्र वेग से उड़कर गयी और इससे पहले कि नारकी कुछ समझ पाता, वह हवा में बने द्वार के दूसरी तरफ था जहाँ शक्ति ने पूरी ताकत के साथ उसे उठाकर सूर्य की ओर फेंक दिया, नारकी को भस्म होने से पहले चीखने तक का मौका नहीं मिला। शक्ति द्वार से ही वापिस आ गयी और इसी के साथ इतनी देर तक द्वार को बनाये रख सकने वाले धनंजय ने एकदम से द्वार बंद कर दिया। शक्ति और धनंजय भी वहाँ पहुँचे जहाँ सभी ने आखिरी साँसें लेते तिरंगा को घेर रखा था। सबसे अधिक भावुक थे डोगा और परमाणु क्योंकि वह दोनों का ही बहुत अच्छा दोस्त रह चुका था।

डोगा- इतनी जल्दी हमें छोड़कर चले जाओगे दोस्त?
तिरंगा- हम्फ…. मैं तो चाहता था कि मुझे मेरी धरती की रक्षा करने का और मौक़ा मिले लेकिन शायद ये संभव नहीं है। इतना भावुक क्यों हो रहे हो दोस्तों? एक देशभक्त को उसकी धरती पर उस धरती के लिए लड़कर मरने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है।
ध्रुव- तुमने अंगरक्षक का कार्यभार भी बहुत अच्छे से संभाला, मेरे सबसे बुरे वक्त में मेरा साथ दिया, ये मैं कभी नहीं भुला पाऊँगा दोस्त।
तिरंगा- आ..अच्छा दोस्तों, अब जाने का वक्त हो गया है, मेरी धरती माँ मुझे पुकार रही है। जीवन भर तिरंगा बनकर जिस माटी के लिए लड़ा, अब उसी में मिल जाने का वक्त आ गया है।

इसी के साथ तिरंगा ने आखिरी साँस ली, उसकी आँखें खुली की खुली रह गयी थीं जिसे परमाणु ने बंद कर दिया। डोगा आमतौर पर अपने भावों को अपने अंदर ही रखता था लेकिन आज दोस्त को बचा ना पाने के कारण क्रोध का ऐसा सैलाब उसके अंदर आया कि उसने दीवार पर प्रचंड मुक्का मारा, दीवार थोड़ी सी ही चटकी लेकिन उसका हाथ घायल हो गया लेकिन फिर भी वह लगातार तब तक मुक्के मारता रहा जब तक लोमड़ी ने उसे शांत ना कर दिया। वह घुटनों के बल बैठकर अपने घायल हाथों को देखकर बोला- “जो बचपन में इकलौता दोस्त था मेरा, आज वह भी चला गया मोनिका। नहीं बचा पाया मैं उसे।”

लोमड़ी को समझ में नहीं आ रहा था कि इस पर क्या प्रतिक्रिया दे लेकिन वह महसूस कर पा रही थी कि डोगा के मास्क के नीचे सूरज की आँखें नम हो चुकी थीं। परमाणु भी विस्फारित नेत्रों से तिरंगा के निर्जीव शरीर को देख रहा था, प्रोफेसर कमलकांत की आवाज़ उसके मास्क में लगे इयरपीस में गूँज रही थी लेकिन उसे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था, वह बस गौर से तिरंगा को देखे जा रहा था। तभी वह छोटी सी बच्ची आँखों में आँसू भरकर वहाँ आयी जिसे तिरंगा ने ढहती इमारत से बचाया था, वह तिरंगा के निर्जीव शरीर के पास पहुँची, हल्की सी झुकी और उसका माथा चूम लिया।

इन सभी घटनाओं से दूर नागराज और चंडकाल अभी तक आकाश में एक दूसरे से भिड़े हुए थे। नई शक्तियाँ प्राप्त होने के बाद से नागराज को कभी ऐसा प्रतिद्वंदी नहीं मिला था जो हर चीज में उससे समान टक्कर ले सके लेकिन चंडकाल उसे काँटे की टक्कर दे रहा था। नागराज के मुक्के से चंडकाल तेजी से एक इमारत को भेदता हुआ धरती पर जा गिरा। तभी ब्रह्मांड रक्षक फ्रीक्वेंसी पर नागराज को शक्ति का मैसेज आया।

नागराज- हाँ, कहो शक्ति।
शक्ति- एक बहुत बुरी खबर है नागराज।
नागराज- अभी थोड़ा व्यस्त हूँ शक्ति, मैं साक्षात चंड..
शक्ति (बात बीच में काटकर)- तिरंगा अब नहीं रहा नागराज।

नागराज को लगा जैसे उसने कुछ गलत सुन लिया हो इसलिए उसने वापिस पूछा- “क्या…क्या कहा तुमने?”

शक्ति- तिरंगा वीरगति को प्राप्त हो चुका है।

इतना कहकर शक्ति ने संपर्क काट दिया, नागराज को सदमें जैसी हालत में छोड़कर। चंडकाल वापिस उड़ता हुआ नागराज की तरफ तेज़ी से आया लेकिन नागराज के चेहरे के भाव तब तक बदल चुके थे, उसने अपनी आँखों से भीषण विष दाह की लहर चंडकाल पर छोड़ दी। चंडकाल को हवा में ही रुक जाना पड़ा। फिर नागराज तेजी से बढ़ा और बेहद तीव्र विषफुंकार छोड़ी जिससे चंडकाल का माथा थोड़ा सा चकराया और फिर एक के बाद एक नागराज के ताबड़तोड़ वार चंडकाल के शरीर पर पड़ने लगे। चंडकाल ने भी नेत्रों से तीव्र किरणों का वार नागराज पर किया जिससे नागराज के पेट में एक बहुत बड़ा घाव हो गया लेकिन उसके जल्द ही उसके सूक्ष्म सर्प वह घाव भरने लगे।

चंडकाल (आश्चर्य से)- ये..ये क्या?
नागराज- मेरे सूक्ष्म सर्प तो मेरे घावों को भर देंगे लेकिन जो घाव मैं तुझे दूँगा वो कैसे भरेंगे?
चंडकाल- तूने महाराक्षस चंडकाल को बहुत कमतर आंक लिया है नागराज, अब मैं तुझे ऐसे घाव दूँगा जिनसे तू कभी उबर नहीं पायेगा।

इतना कहते ही चंडकाल हवा में हल्का सा उठा, उसकी आँखें चमकने लगी थीं और इससे पहले कि नागराज कुछ समझ पाता, उस पर ताबड़तोड़ तीर वर्षा शुरू हो गयी थी। वे विलक्षण तीर नागराज के शरीर को हर तरफ से बेध रहे थे, उसके हाथ, पैर, इत्यादि उन तीरों से बुरी तरह बिंध चुके थे। नागराज संतुलन ना बनाये रख सका और ज़मीन पर गिर पड़ा, महाभारत के भीष्म पितामह की तरह चंडकाल ने उसे भी तीरों से बनी सेज पर लिटा दिया था। नागराज पूरी ताकत लगाकर भी अपने शरीर का एक इंच नहीं हिला पा रहा था और ना ही इच्छाधारी कणों में परिवर्तित हो पा रहा था।

चंडकाल- हाहाहा, बहुत शक्ति प्रदर्शन कर रहा था। भूल गया कि अपनी सारी शक्तियों के बावजूद तू एक मानव है और मैं हूँ महाराक्षस चंडकाल।
नागराज- यही तो मुझे नहीं भूलना है कि मैं एक मानव हूँ और तू बस एक तुच्छ राक्षस।
चंडकाल- अब भी बहुत तीखे कटाक्ष कर रहा है तुझ लगता है कि तेरे ये कटाक्ष तेरी मृत्यु के साथ ही बंद होंगे।

इतना कहकर चंडकाल नागराज की तरफ आगे बढ़ा लेकिन तभी भीषण ताप ने उसे काफी पीछे सरका दिया। शक्ति मैदान में उतर चुकी थी, उसकी तीसरी आँख बुरी तरह फड़क रही थी। चंडकाल ने भी अपने दोनों हाथों से प्रचंड स्याह ऊर्जा का वार शक्ति पर किया लेकिन तब तक उसके लिए देर हो चुकी थी, शक्ति की तीसरी आँख खुल चुकी थी। तीसरी आंख की शक्ति चंडकाल के हाथों से निकली स्याह ऊर्जा को धकेलने लगी, चंडकाल ने उस शक्ति का सामना करने का भरसक प्रयत्न किया लेकिन आखिरकार उसका शरीर भी बुरी तरह झुलसने लगा। उसके चीत्कारों से पूरा वातावरण गुंजायमान होने लगा।
उसके बाद शक्ति ने नागराज को विलक्षण तीर शैय्या से मुक्त करवाया लेकिन तभी उन्होंने देखा कि तीसरी आँख से प्रहार किये जाने के बावजूद चंडकाल में कुछ साँसें बाकी थीं।

शक्ति- आश्चर्य! ये अभी तक जीवित कैसे है?
नागराज- इसके शरीर में स्याह ऊर्जा की अधिकता है, शायद इसलिए ये तीसरी आंख का वार भी झेल गया लेकिन अब यह बुरी तरह अशक्त हो चुका है।

शक्ति और नागराज चंडकाल के पास पहुँचे, बुरी तरह धराशायी होने के बावजूद भी चंडकाल मंद मंद मुस्कुरा रहा था।

नागराज- लगता है तुम मृत्यु को हँसकर गले लगाना चाहते हो।
चंडकाल- तुमको लगता है कि मेरी मृत्यु के साथ ये खेल खत्म हो जाएगा? अरे मूर्खों, तुम्हारा विनाश समीप है।
शक्ति- सब खत्म हो गया चंडकाल, नारकी को भी हमने पाप क्षेत्र का द्वार खोलने से पहले ही नष्ट कर दिया।
चंडकाल- क्या वाकई? मुझे लगता है कि नारकी मरने से पहले अपना काम कर चुका था।

तभी नागराज और शक्ति ने आसमान की ओर ध्यान दिया, दिन के समय भी आसमान स्याह काला हो चुका था। उसमें राक्षसों और पिशाचों की अजीब अजीब आकृतियां बन रही थीं।

चंडकाल- ग्रहों का भक्षण करने वाला स्याह विवर और मेरे आराध्य महाकाल छिद्र स्वतंत्र हो चुके हैं, अब ब्रह्मांड में स्याह शक्तियों का विस्तार होगा। सृष्टि की रचना नए ढंग से होगी और उस सृष्टि के ईश्वर होंगे महाकाल छिद्र।

नागराज ने अपना पैर चंडकाल की गर्दन पर रख दिया और बोला- “भले ही हम पाप क्षेत्र को खुलने से ना रोक पाए हों लेकिन सृष्टि पर स्याह शक्तियों का राज नहीं होने देंगे।”

“कड़ाक” की आवाज़ के साथ चंडकाल की गर्दन की हड्डी टूटने की आवाज़ हुई, महाराक्षस चंडकाल काल के गर्त में समा चुका था।

उधर स्वर्ग में बाबा गोरखनाथ देवताओं से मंत्रणा कर ही रहे थे कि अचानक पूरा स्वर्ग बुरी तरह से हिलने लगा।

देवराज इंद्र- ये क्या ही रहा है? क्या असुरों ने हम पर फिर आक्रमण कर दिया है।
गोरखनाथ- ये असुरों का हमला नहीं है देवराज, ब्रह्मांड में कालिमा का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है। पाप क्षेत्र का द्वार पूरी तरह खुल चुका है और उसमें कैद दो महाशक्तियाँ बाहर आ गयी हैं।
देवराज इंद्र- यदि यही सत्य है बाबा गोरखनाथ तो फिर इस सृष्टि को बचा पाना मुमकिन नहीं है।

उधर अग्रज बुरी तरह अट्टहास कर रहा था।

वेदाचार्य- पाप क्षेत्र का द्वार खुल चुका है, अब शक्तियाँ सोखना आरम्भ करो अग्रज।
अग्रज- जल्दी का काम शैतान का होता है दादा वेदाचार्य, पहले आप अपनी मानस तरंगों को काम में लाइये और वो अनुपम नज़ारा देखिए जो मैं देख रहा हूँ।

वेदाचार्य ने अपनी मानस तरंगों का विस्तार किया और बुरी तरह चौंक पड़े – “उफ्फ! इतनी खतरनाक शक्तियाँ, इतनी खतरनाक पाप शक्तियाँ! तुमने इस धरती पर प्रलय ले आये हो अग्रज!”

अग्रज- अब भारती को वापिस लाने के लिए इतना तो करना पड़ेगा, अब मैं उचित तांत्रिक विधि विधान द्वारा वातावरण में समाहित पाप शक्तियाँ सोखना शुरू करता हूँ, उसके बाद मैं इस धरती का सबसे शक्तिशाली प्राणी बन जाऊंगा, शायद चंडकाल से भी अधिक शक्तिशाली।

नागराज भी शक्ति के साथ वहाँ पहुँच चुका था जहाँ तिरंगा के अंतिम संस्कार की तैयारी की जा रही थी, उस वक्त उसकी पोशाक को शरीर से हटा दिया गया था वरना वह दाह संस्कार में बाधा बनती, अभय का निर्जीव शरीर लकड़ियों के ढेर पर रखा हुआ था। एक देशभक्त को वीरगति प्राप्त होते देखकर सभी की आँखों में आँसू आ गए थे। सभी ब्रह्मांड रक्षक वहाँ पर मौजूद थे और सभी एकदम शांत थे, कोई किसी से कुछ नहीं बोल रहा था। तभी पुजारी ने पूछा- “इनके परिवार का कोई सदस्य यहाँ मौजूद है जो शरीर को आग दे सके?”

“मैं दूँगा इसके शरीर को आग।” परमाणु बोला, इस पर किसी ने आपत्ति भी नहीं जताई। परमाणु ने सम्पूर्ण विधि विधान के साथ अपने मित्र के शरीर को अग्नि के सुपुर्द किया। आग से उठती लपटों में उसे स्कूल के अपने दिन याद आने लगे, जब अभय से उसकी पहली बार मुलाकात हुई थी, वे सबसे अच्छे दोस्त बन गए थे। उसके बाद उसे वह भयावह दिन भी याद आया जब शेर खान अभय को लेकर जाने लगा था, उसे लगा था कि वह अपने दोस्त को फिर कभी वापिस देख नहीं पाएगा, बस वही भावना आज एक बार फिर उसके मन में घर कर गयी थी।
डोगा को भी उसके और अभय के मठ के दिन याद आने लगे। उनका प्रशिक्षण, फिर काले डकैतों के मतभेद के कारण उसका मठ से चले जाना और फिर अभय का तिरंगा के रूप में वापिस उससे मिलना। उसके दिल में रह रहकर यही टीस उठ रही थी कि वह अपने दोस्त को बचा नहीं पाया।

ध्रुव अभय की ढाल लेकर नागराज के पास आया और बोला- “यह तुम्हारी अमानत है, इसे तुम ही रखो।”

नागराज- मेरी अमानत? मैं कुछ समझा नहीं?
ध्रुव- यह तक्षकनगर के राजा और तुम्हारे पिता तक्षकराज को ढाल है, इतनी घटनाएं एक साथ हो गयीं कि कभी बताने का मौका नहीं मिला। अभय को जब पहली बार अंगरक्षक पद के लिए चुना गया था तब उसने यह ढाल शस्त्रागार से अपने लिए चुनी थी। अब जब वही नहीं रहा तो सोचा कि इस ढाल को उसके सही मालिक को दे दूँ, बस अब इसका ठीक ढंग से इस्तेमाल करना क्योंकि अब इसके साथ तुम्हारे पिता ही नहीं बल्कि एक असाधारण योद्धा का भी नाम जुड़ गया है।
नागराज (ढाल की ओर देखते हुए)- मैं पूरी कोशिश करूँगा, धन्यवाद।
ध्रुव (आसमान की ओर देखते हुए)- हम पाप क्षेत्र को खुलने से नहीं रोक सके, शीघ्र ही पूरा ब्रह्मांड स्याह शक्ति की कालिमा में ढक जाएगा लेकिन चाहे कुछ भी हो जाये हमें अपना जज्बा नहीं छोड़ना है क्योंकि हमारा जज्बा ही हमें इस जंग में जीत दिला सकता है। स्याह शक्ति हर शक्ति पर भारी पड़ सकती है लेकिन मानवीय भावनाएं इतनी प्रबल होती हैं कि उन पर भारी पड़ पाना किसी भी शक्ति के लिए नामुमकिन है। याद रखो, हम एक जंग भले ही हार गए हों लेकिन महायुद्ध हमें ही जीतना है।

To be continued….
Written by- Samvart Harshit for Comic Haveli

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11 Comments on “Earth 61 Phase 2 Part 19”

  1. प्रशंसा हेतु शब्द नहीं मेरे पास इस समय।
    भावनाओं के ज्वार में उठते हुए मेघों से निर्मित एक अविरल कहानी को आपने लिखा है। प्राचीन समय में चल रहा युद्ध हो या फिर वर्तमान समय में भाषा का प्रयोग सुंदर है। मुझे आपसे रोष रहता था कि आप युद्ध को उचित माध्यम में नहीं लिख पाते किन्तु इस भाग को पढ़कर नहीं लगता कि आपकी अब इसमें कोई दुर्बलता शेष है।
    कहानी एक निश्चित गति से बढ़ी है जिसने मंत्रमुग्ध कर दिया है। इसके पश्चात आने वाला भाग अंतिम है ये सोचकर ही अच्छा नहीं लग रहा है। चाहता हूँ ये कथा अविरल रूप से चलती रहे किन्तु हर अच्छी या बुरी कहानी का अंत आता है इसका भी आएगा लेकिन क्या होगा आगे इसको जानने की चाह भी है।

    हमारा इस प्रकार मनोरंजन करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Bahut bahut Dhanywad Devendra bhai, Kahani ka ant aane wala hai, bhari man se earth 61 ko vida kahna hoga lekin aage aur achi kahaniya dene ka prayas kiya jayega, RC ke bad ab Non RC me bhi hath saaf kiya jayega.

  2. भाई आप क्या चाहते हैं दिन भर रोता फिरुं मै
    इतना शानदार लिखा आपने की हलीवुड और बॉलीवुड सब पीछे रह गए मै इसका प्रिंट ज़रूर कराऊंगा खुद के लिए वेरी इमोशनल

  3. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
    देखना अब ज़ोर कितना बाजुएं कातिल में है

    ऐसे ही कितने वीर वीरगति को प्राप्त हो गए मेरे अंदर जुनून सा छा गया तिरंगा जैसा देशभक्त शायद ही हो राज कॉमिक्स यूनिवर्स में लेकिन शायद राज कॉमिक्स वाले भी इतने अच्छे से नहीं दिखा पाए जितना अच्छे से आपने दिखाया है भाई मेरे पास शब्द नहीं है अगला भाग जल्दी देने की कोशिश करिएगा

  4. Bahut Dhanywad Mohit bhai aur Adil bhai. Itne support ke liye. Agla bhag aakhiri hai isliye ise behtar se bhi behtar banane ki taiyari hai thodi si deri awashya hogi lekin around diwali lane ka prayas karunga.

  5. Wah Bhai bahut khub kya lika hai. Action, emotional Ka bahut hi badiya combination hai. Aur story bhi bahut lambi likhi hai. Pata hi nahi Chal kab katam ho gai. Esa laga ki bas padta hi rahu aur y kahi khatam na ho. Story ki starting hi aap ne ethasik portain se ki. Ki kis tarah aadikal ke heros, devo, nago aur devato NE milker ek maharakha Ka aatank ko katam kiya. Pichale sabhi part me aaye rakhso ko Yaha bataya gaya. Phir kahani aai vartaman Kal per jaha naraki pataki jese rakhso dekhane ko mile. Super Indian ko bhi puri pachan mili. Aur Phir ham NE ek aur nayak ko kho diya. Muze bahut bura laga. Tiranga ke liye. Earth 61 phase me pahale Bharti Mari gai aur Ab Tiranga Ka anth. Mere to aasu likal aaya ghala bhar aaya. Kya her bar kisi na kisi nayak Ka marana jarrui hai. Aaj to ham ne her nayak ko hamesha se jittate hi paya hai. Is series me me kisi bhi nayak ko khaona nahi Chahata tha. Muze laga tha ki kisi tarah bharti shyad wapas aane wali hai. Per us se pahale hi trinaga chala gaya. Is series me sabhi heroes ki story dil ko chu gai hai. Ham apani zinagi me in sabhi ko Jane lage hai. Koi ek bhi heroes agar chala jata hai to kuch adhurapan sa Lagata hai. Tiranga ki veergati per Doga parmanu Anthony jckab dhurav aur dhanjay ke Sath hi Hum sabhi bhaio ke aakho se bhi aasu aa gaye. Esa laga ki Y sab Hum sabhi life me hi ghat raha hai. Jis tarah aap ne AGRAJ ko leker Y story banai hai us se Muze yahi aasha hai ki shyad bharti to shyad wapas lot hi aayegi. Earth 61 phase ke last part ko padker Esa laga tha ki Ab shyad hi Esi badiya series wapas padane ko mil payegi. Per aap ne Earth 61 phase 2 laker hamari life me wapas ronak LA di. Per aaj Phir Y series apani samapti ki aur aa gai hai. To Phir bechani si hone lagi hai. Per her story Ka ant to hona hi hai. Ab last part is intajer hai. Jaha ek mahayadhu Lada Jana baki hai. Ummaid karata hu ki Ab koi aur nayak veergati ko prapta na ho. Aap Non RC me bhale hi apana hath aajmaye per Earth 61 Ka ant kabhi na hone Dena. Is per bhi nai nai series late rahana.Kyki Earth 61 to Muze Apane life ki sabse badiya series lagi hai aur me Ise aage bhi continue dekhata Chahata hu. Kyki Y series hi sab se hat ker hai is Ka concept bhi Alag Hai ‘EARTH-61’ A PARALLEL EARTH. Aap ko bahut bahut badhaiya aur shubhkamnaye. Aap aage bhi Isi tarah aur bhi story late rahe. Earth 61 phase 2 ke last part Ka intajer me…….

    1. Bahut Dhanywad Vijay bhai, mujhe khushi hai ki aap sabko is kahani se satisfy kar paya. Har kahani ka ant hota hai, iska bhi hoga lekin vaada hai aapse ki aane wale samay me isse bhi badhiya kahaniya dene ka prayas karunga aap logo ko.

  6. Veergati….ye shabd parhte hi zehan me ajeeb si machne lagi…puri kahani me darr sa bana tha ki kab kya ho jaye aur har reader ko yahi chahiye ki wo jo kahani read kr rha hai wo usko bandhe rakhe aur aapko ye bohat ache se aata hai…feelings ko shabdo me bayan karna koi aapse seekhe…once again congratulation Mr. Srivastava for this epic part..

    Ab aate hain kahani pe..

    Kahani ki shuruaat Se fight scene rakha aapne….jaha aapne puratan kaal ke heroes ko cover kr liya aakhir ye intezar bhi khatam hua ki hame bhokal gojo jaise heroes ko iss kahani me parhte hue maza aaya…jis tarah chandkal ko kabu kiya wo bhi lajwab laga qki sabhi heroes chandakal ke tik nhi paye the…

    Aur present time baba gorakhnath ke zariye super indian ki umar pe kabu pa liya ye to socha bhi nhi hoga kisi ne….aur uske chest pe triton ka mark wo bhi baba ne diya kya connect kiya hai yar….

    Idhar delhi me narki ne jo aatank faila rakha the apne chamcho k zariye waha to sab kuch bekabu sa lag rha tha aur narki ko koi kharonch tk daal parha tha…lekin achanak hi usko hawa me uda dena wala ghoonsa jo pada usko aye haye…nagraj ki ye entry to awesome thi bhai narki ka khel to wahi khtam tha agar chandakal na aata lekin kahani ko dil chasp banana koi aapnse seekhe…. chandakal k entry hote kahani romanch se bhar gayi….aur yahi wo turn tha kahani me jo apne title ki taraf jane lagi yani ki VEERGATI 🙁

    iss kahani ka sabse mushkil lamha jisko comment likhte waqt bhi meri aankhe nan ho gayi hain…

    Hamara pyara hero jiske andar siwaye deshbhakti k kuch nhi hai…wo bharat maa ka sapoot veergati ko prapt hua..ek SALUTE uss sache hero k liye…

    Ab gate bhi pura open ho gaya hai yani ki chandakal se bhi powerful uske bhagwan usse takkar hogi…ab pta nhi kya hoga kahi ye earth 61 dusre earth yani ki main earth ki tarah bach payegi ya ho jayegi tabah…mujhe janna hai…baht hi emotional part tha ye…koi professional bhi iss level ki kahani nhi likh payega itna to sure hu

  7. अगर मैं पूरे दिल से कहना चाहूंगा तो भी बस यही कह पाऊंगा कि कोई ऐसा कैसे लिख सकता है, ऐसे इमोशनल सीन्स जो रोने पर मजबूर कर दें, और फाइटिंग सीन जो दांतो तले उंगली चबाने को मजबूर कर दें, आज तक ऐसी फैन मेड स्टोरी नही पढ़ी जिसमे इतना रोमांच इतनी परिकल्पना शक्ति का प्रयोग किया गया हो।

    कहानी की बात करें, तो कहानी अतीत से शुरू होती है जब सभी पुण्य शक्तियां मिलकर महाराक्षस चंडकाल और सभी पापियों से लड़ रहे हैं, इसमे एक बात अच्छी लगी कि नायकों की तरह खलनायकों को भी उचित और शक्ति के अनुसार क्रम से पद मिला है।

    ध्रुव का कमांडो कैटेडस से मिलना, सुपर इंडियन का बिना आत्मा के भी सत्य के लिए लड़ना, हर जगह ऐसी घटनाएं हुई जिसे मेंशन कर पाना असंभव सा है।

    बाबा गोरखनाथ का आगमन और सुपर इंडियन को असली में सुपर इंडियन बनाना, और पातकी को हराना,

    तिरंगा का पुनः तिरंगा बनना, और एक एक क्षण कलेजे को चीर जाने वाली घटनाएं, हालाँकि नागराज की पावर्स को देखने को मिला, सच्चाई और दुनिया के लिए अपना सब कुछ त्याग देने का जज्बा दिखा, तिरंगा का सैक्रिफाइज़ सच मे भावनाओं में विभोर कर रुला देने वाला था, अभी बहुत कुछ बाकी है।

    छोटी समीक्षा के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ परन्तु मैं इस कहानी पर ऐसी कोई समीक्षा नही लिख पाऊंगा जो इसके समानान्तर हो, ये एक अलग आयाम की नही अलग आयाम में पहुँचा देने वाली कहानी है,

    सचमुच मैं निशब्द हूँ।

    इतनी अच्छी कहानी के लिए हज़ार बार शुक्रिया।

    सप्रेम–
    — आपका छोटा भाई…

  8. Bahut Dhanyawad Tarique bhai aur Manoj bhai bahut hi shandar sameeksha ki aap dono ne. Ummed hai ki jitna aapko is series ne prabhavit kiya, antim bhag bhi utna prabhavit ka paye.

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