Earth 61 Phase 2 Part 20 (First Stage)

विंशति अध्याय- महायुद्ध (प्रथम भाग)

प्रथम खंड- कैंसर

“सृष्टि के सृजन के समय स्वयं ब्रह्मदेव ने रचना की थी, स्याह विवर नामक प्राणी की, जिसका कार्य था ब्रह्मांड में व्याप्त अशुद्धियों और छोटे छोटे ग्रह तथा पिंडों का भक्षण करना। आरंभ में तो स्याह विवर ने अपना कार्य कुशलता से किया किन्तु जैसा कि हर अति शक्तिशाली जीव के साथ होता है वही स्याह विवर के साथ भी घटित हुआ और वह भ्रष्ट हो गया। वह जीवन की उत्पत्ति करने वाले हरे भरे ग्रहों का भी भक्षण करने लगा, न जाने कितने हरे भरे ग्रह उसकी क्षुधा के ग्रास बन गए। जब सप्तर्षियों तक उसके आतंक की धमक पहुँची, वे सचेत हो गए और स्याह विवर के मुख पर एक अंकुश लगाकर उसे एक अन्य आयाम में कैद कर दिया। उन्हें इसका भान नहीं था कि जल्द ही एक और महाशक्ति को भी कैद करने हेतु, उन्हें इस आयाम को पुनः खोलना पड़ेगा और वो घड़ी आयी सतयुग के समय जब विशुद्ध पुण्य ऊर्जा अर्थात श्वेत ऊर्जा और विशुद्ध पाप ऊर्जा अर्थात स्याह ऊर्जा अस्तित्व में आयीं, साथ ही अस्तित्व में आया स्याह ऊर्जा का जनक महाकाल छिद्र। कहा जाता है कि रावण के पास जो राक्षसी शक्तियाँ थीं वे महाकाल छिद्र की सहायता से उस तक पहुँची थीं, यह त्रिदेवों को भी ज्ञात था इसीलिए भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में और भगवान शिव ने हनुमान के रूप में धरती पर अवतार लिया था। उन्हें ज्ञात था कि महाकाल छिद्र की प्रचंड स्याह शक्तियों से भिड़ने के लिए मनुष्यों के बीच ईश्वर का रहना भी आवश्यक है, प्रचंड युद्ध हुआ था लंकापति रावण और श्रीराम के मध्य। ईश्वरीय शक्ति के सामने महाकाल छिद्र की स्याह शक्तियां नहीं टिक पायीं और उसे घुटने टेकने पड़े। रावण के पराजित होने के उपरांत महाकाल छिद्र भी पृथ्वी से कूच कर गया था परंतु उसका स्वतंत्र रहना ब्रह्मांड के हित में नहीं था इसलिए सप्तर्षियों ने उसे भी पकड़कर उसी आयाम में कैद कर दिया जहाँ स्याह विवर पहले से कैद था और उस आयाम को नाम दिया गया……पाप क्षेत्र! उन दो महाशक्तियों के अलावा पाप और पुण्य के अति भीषण युद्ध में पराजित हुए महाराक्षस चंडकाल और उसके साथियों को भी पाप क्षेत्र में कैद कर लिया गया लेकिन कठिन से कठिन अवरोध वाले आयाम द्वारों को खोलने के लिए भी सिर्फ एक कुंजी चाहिए होती है, सिर्फ एक कुंजी। पाप क्षेत्र को खोलने की कुंजी थी युगनायकों या पुण्य शक्तियों के पतन से उत्सर्जित होने वाली ऊर्जा, नैतिकता के पथ पर अडिग रहने वाले नायकों का पतन केवल नायक तिमिर योग द्वारा ही संभव था। ये महाज्योतिष काल कुंडली ने बहुत पहले ही पता कर लिया था, उसे पता था कि उसकी ये खोज बहुत भयानक है लेकिन अपनी मेहनत से निकाले गए निष्कर्ष को वह इतनी आसानी से नष्ट भी नहीं करना चाहता था। इतने वर्षों पश्चात सभी इससे संबंधित पत्र एवं सामग्री कलुषित हाथों में पड़ गए और महाअनर्थ हो गया, पाप क्षेत्र का द्वार सदियों बाद वापिस खुल गया और स्वतंत्र हो गयीं वो भयानक शक्तियाँ जो समस्त सृष्टि का विनाश करने में सक्षम हैं।” इतना कहते हुए बाबा गोरखनाथ के मुख पर चिंता के भावों को स्पष्ट रूप में देखा जा सकता था।
“उन शक्तियों पर अंकुश लगाये रखने का कोई तो उपाय होगा बाबा गोरखनाथ, आप ब्रह्मांड की श्वेत शक्तियों के प्रतिनिधि हैं। यदि आप स्वयं ही इन समस्याओं से भयभीत हो जाएंगे तो देवताओं को युद्ध करने का मनोबल कहाँ से प्राप्त होगा।” देवराज इंद्र चिंतित स्वर में बोले।

इससे पहले की बातचीत आगे बढ़ती, चारों ओर से कोलाहल का स्वर आने लगा।

देवराज इंद्र- यह शोर कैसा है?

तभी एक द्वारपाल दौड़ता हुआ आया और इंद्र को सूचना दी।
“असुरराज शंभूक ने गुरु शुक्राचार्य और समस्त राक्षससेना के साथ स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी है इंद्र देव! वे निरंतर इस ओर बढ़ते चले आ रहे हैं।”
बाबा गोरखनाथ देवराज इंद्र की ओर देखकर बोले- “अवश्य ही उनको महाकाल छिद्र की स्वतंत्रता का भान हुआ होगा अन्यथा वे इस प्रकार की धृष्टता करने का साहस कभी नहीं करते!”
देवराज इंद्र के चेहरे पर क्रोध स्पष्ट था, वे मुट्ठी भींचकर बोले- “इन असुरों का इतना दुस्साहस कि वे स्वर्गलोक पर चढ़ाई करने का स्वप्न भी देखें। उनको यह दिखाना होगा कि भले ही उनका आराध्य पाप क्षेत्र से स्वतंत्र हो गया हो लेकिन इसका अर्थ ये कदापि नहीं कि देवताओं की शक्ति क्षीण हो गयी है। क्षमा करिएगा गोरखनाथ, परंतु अब हम मानवों की सहायता करने पृथ्वीलोक पर नहीं जा सकते क्योंकि स्वर्ग की रक्षा करना हमारा प्रथम कर्तव्य है। प्रत्येक देवी देवता का यहाँ उपस्थित होना अनिवार्य है।”

गोरखनाथ (निराशा के भाव से)- मैं समझता हूँ देवराज इंद्र, आपको अपना समस्त बल लगाकर युद्ध करना होगा। इतनी सदियों बाद एक बार फिर देवासुर संग्राम होने वाला है, आपको अपनी समस्त शक्ति झोंक देनी होगी। मैं पृथ्वी पर जाकर वहाँ के विलक्षण रक्षकों से मिलकर महाकाल छिद्र और स्याह विवर को रोकने का उपाय करता हूँ, हालांकि उन सबकी शक्तियां भी इन दो महाशक्तियों के आगे नगण्य साबित होगी परंतु मुझे यह भी ज्ञात करना है कि आखिर वह कौन नराधम है जिसने पाप क्षेत्र को पुनः खोलने का साहस किया है।
देवराज इंद्र- जैसा आप उचित समझें बाबा गोरखनाथ, उम्मीद करता हूँ कि हम अपने अपने मोर्चे पर सफल रहें।

देखते ही देखते बाबा गोरखनाथ ने ध्यान लगाया और पलक झपकते ही स्वर्गलोक की भूमि से अंतर्ध्यान हो गए।

सामान्य नगरों की चहल पहल से दूर कहीं दूर दराज की पहाड़ियों पर दो आकृतियां किसी विशेष तंत्र क्रिया को सम्पन्न करने का प्रयास कर रही थीं। पत्थरों पर अजीब अजीब से चिन्ह बने हुए थे, अग्रज पूरी तरह से ध्यान में डूबा हुआ था इसलिए वेदाचार्य उससे कुछ भी पूछ पाने में अक्षम थे। उन्हें भी वातावरण में बढ़ती तामसिक शक्तियाँ महसूस हो रही थीं लेकिन इतनी दूर आकर अब वे पीछे लौटने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, उन्हें अपने कृत्यों पर भारी पश्चाताप हो रहा था कि आखिर क्यों भारती को जीवित करने के लिए उन्होंने समस्त ब्रह्मांड को जलती भट्टी में झोंक दिया लेकिन पश्चाताप के लिए बहुत देर हो चुकी थी। आसमान में सूरज दिखना बंद हो गया था, दिन में भी रात जैसी स्थिति हो गयी थी, स्याह ऊर्जा की कालिमा पूरे विश्व पर फैलती जा रही थी। तभी उन्होंने मानस तरंगों द्वारा महसूस किया कि एक 35-40 वर्ष का व्यक्ति उनकी ओर ही बढ़ता चला आ रहा है। वे चिल्लाकर अग्रज से बोले-
“अग्रज! कोई इस ओर तेज़ी से बढ़ रहा है!”

अग्रज का ध्यान एकदम से भंग हुआ, उसने भी मुड़कर देखा, अब वह व्यक्ति बिल्कुल नज़दीक पहुँच चुका था। वह एकदम शालीन व्यक्ति था जिसने काला कोट पहन रखा था, उसके व्यक्तित्व में एक अजीब सी गंभीरता थी। वेदाचार्य के दिमाग को हल्का सा झटका लगा, उनकी मानस तरंगों ने इतनी तीव्र पाप शक्ति तरंगों को कभी ग्रहण नहीं किया था। अग्रज उठ खड़ा हुआ और उस व्यक्ति से क्रोधित होकर बोला-
“साधारण मनुष्यों का यहाँ कोई काम नहीं, अच्छा होगा कि जैसे आये हो वैसे ही यहाँ से चले जाओ।”
वह व्यक्ति आराम से बोला- “तो क्या तुम पाप क्षेत्र के पूर्ण खुलने के पश्चात वातावरण में प्रवाहित पाप शक्तियाँ सोखने का प्रयास कर रहे हो? अच्छा प्रयास है लेकिन मात्र तंत्र विद्या के बल पर तुम ऐसा करने में सफल नहीं हो पाओगे।”
वह व्यक्ति मुस्कुराया, मुस्कुराते वक्त उसकी दोनों आँखें एक पल के लिए पूर्णतः काली होकर फिर से सामान्य हो गयीं। ये देखकर अग्रज घबरा गया, उसने पूछा- “क…कौन हो तुम?”
वह व्यक्ति मुस्कुराते हुए एक गहरी आवाज़ में बोला- “मुझे स्वतंत्र करवाने के लिए तुमने इतना त्याग एवं परिश्रम किया वत्स और मैं सम्मुख हूँ तो मुझे ही पहचान नहीं पा रहे?”
ये सुनकर अग्रज की आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो गयीं। वह उस व्यक्ति के पैरों में पड़कर बोला- “म..मुझे क्षमा कर दीजिए महाकाल छिद्र, मुझे ज़रा सा भी भान नहीं था कि मनुष्य रूप में आप मेरे समक्ष खड़े हैं वरना ऐसा दुस्साहस कभी ना करता।”
अग्रज के सिर पर हाथ रखकर महाकाल छिद्र ने उत्तर – “मैं और स्याह विवर पाप क्षेत्र में कैद अवश्य थे लेकिन हमारी शक्तियाँ इतनी भी क्षीण नहीं कि बाहरी घटनाएँ पता ना कर सकें। मुझे अपने कैद होने से लेकर वर्तमान समय तक इस ब्रह्मांड में घटित प्रत्येक क्षण की जानकारी है। मुझे अपने परम भक्त चंडकाल के पतन के बारे में भी ज्ञात है और विलक्षण ब्रह्मांड रक्षकों के बारे में भी। तुमने मुझे स्वतंत्र करवाने हेतु बहुत परिश्रम की है वत्स, इसका पारितोषिक तो तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। तुम्हें तामसिक शक्तियाँ प्राप्त करने हेतु कोई तंत्र विद्या करने की आवश्यकता नहीं, मैं तुम्हें चंडकाल से भी अधिक स्याह शक्तियाँ दूँगा। इस संसार और इसके बाद ब्रह्मांड में स्याह शक्तियों का परचम लहराने के लिए तुम मेरे सेनानायक बनोगे, अब से चंडकाल का कार्यभार मैं तुम्हें सौंपता हूँ।”

महाकाल छिद्र का हाथ अभी भी अग्रज के मस्तक पर ही था जिसमें से स्याह ऊर्जा की लपटें निकलकर अग्रज के शरीर में समाने लगीं। अग्रज की नसों में तनाव पैदा होने लगा, साधारण मनुष्य के लिए ऐसे ऊर्जा प्रवाह को झेलना असंभव था लेकिन अग्रज तंत्र शक्तियों का विलक्षण साधक था जिसके कारण स्याह ऊर्जा उसके शरीर में समा तो रही थी पर उसे कोई क्षति नहीं पहुँचा पा रही थी। शीघ्र ही उसकी नसों में बढ़ता तनाव थम गया, महाकाल छिद्र ने उसके सिर से अपना हाथ हटा लिया था। अग्रज ने दर्द के कारण बंद अपनी आँखें खोलीं, वह स्याह ऊर्जा की अधिकता के कारण दहकने लगी थीं, उसके शरीर से जहाँ तहाँ स्याह ऊर्जा की लपटें उठ रही थीं।
महाकाल छिद्र ने मुस्कुराकर कहा- “तुम्हें मैंने चंडकाल से भी अधिक शक्तिशाली बना दिया है वत्स! अपनी स्याह ऊर्जा का बड़ा भाग मैंने तुम पर प्रवाहित कर दिया है, मैं शेष ऊर्जा का प्रयोग करके एक सेना का निर्माण करूँगा जिसके नेतृत्व से तुम्हें तीनों लोकों पर विजय हासिल करके पाप का परचम लहराना होगा।”

अग्रज- इतनी शक्ति का आभास मुझे कभी नहीं हुआ महाकाल छिद्र! मैं आपकी सेना का प्रतिनिधित्व करूँगा, अब ब्रह्मांड में सिर्फ स्याह ऊर्जा की कालिमा होगी, पुण्य का नामोनिशान मिटा दूँगा मैं! आपके आदेश पर तो मैं स्वर्गलोक पर भी हमला कर दूं।
महाकाल छिद्र- स्वर्गलोक पर आक्रमण हो चुका है, असुरराज शंभूक को मेरे स्वतंत्र होने का समाचार संभवतः मिल चुका है और इतनी सदियों पश्चात पुनः भीषण देवासुर संग्राम होने के आसार हैं लेकिन एक काम है जो तुम कर सकते हो। तुम्हारा सर्वप्रथम उद्देश्य जिससे हमारी विजय के आसार बढ़ जाएंगे।
अग्रज- ऐसा क्या कार्य है आराध्य? बस आप आदेश करें।
महाकाल छिद्र- तुम्हें “त्रिफना” को ढूँढ़ना है।
अग्रज- त्रिफना? ये क्या है?
महाकाल छिद्र- यह एक ऐसी वस्तु है जिसे प्राप्त करने के पश्चात हमारा पलड़ा और भारी हो जाएगा और पुण्य शक्तियों के विजय की संभावना पूरी तरह खत्म हो जाएगी। त्रिफना मेरी शक्तियों से भी छिपा हुआ है लेकिन इतना तय है कि वह पृथ्वी पर ही कहीं है।
अग्रज- यदि त्रिफना पृथ्वी पर ही है तो आप चिंतित ना हों महाकाल छिद्र, आपका भक्त आपके चरणों में लाकर रख देगा त्रिफना। भले ही उसके लिए पूरी दुनिया को ही क्यों ना खंगालना पड़े।
महाकाल छिद्र- अभी तो मैं जा रहा हूँ वत्स, परंतु तुम्हारी सहायता हेतु वापस अवश्य लौटूंगा।

अग्रज ने ध्यान नहीं दिया लेकिन महाकाल छिद्र से उसकी वार्तालाप के दौरान वेदाचार्य के चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे। महाकाल छिद्र एकदम से हवा में ही विलीन हो गए। महाकाल छिद्र के गायब होते ही वेदाचार्य ने तिलिस्मी शक्ति का भरपूर वार अग्रज के ऊपर किया जिससे अग्रज पीछे पड़ी विशाल चट्टान से भिड़ गया।

वेदाचार्य (क्रोधित होकर)- नराधम! अब मुझे तेरी मंशा समझ में आई, तेरा इरादा कभी भारती को पुनर्जीवित करने का था ही नहीं। मैं मूर्ख था जो तेरी बातों में आकर इतना बड़ा पाप कर बैठा, मैं तुझे जीवित नहीं छोडूँगा।
अग्रज (कुटिलता से मुस्कुराकर)- यदि आप ये धमकी मुझे कुछ समय पहले देते तो शायद मैं आपके चरणों में गिरकर प्राणों की भीख माँगने के लिए विवश हो जाता लेकिन अब मैं सिर्फ एक तांत्रिक नहीं रहा वेदाचार्य। अब तंत्र शक्तियों के साथ साथ मेरे शरीर में विलक्षण स्याह ऊर्जा का भी वास है। वैसे आपने सही कहा, भारती को पुनर्जीवित करने की इच्छा कभी मेरे मन में थी ही नहीं इसलिए मैं भारती को अपनी कैद से आज़ाद करता हूँ ताकि उसकी आत्मा मर्त्यलोक के बंधनों से आज़ाद होकर मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर हो जाये।

इतना कहकर अग्रज ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया और कुछ मंत्रोच्चारण करने लगा। उसके ऐसा करने से हवा में एक बहुत उज्ज्वल प्रकाशनुमा आकृति उत्पन्न हो गयी, वेदाचार्य की मानस तरंगों ने उस जानी पहचानी आकृति को महसूस कर लिया था। उनकी सफेद आँखें एकदम नम हो गयीं, वह भारती की आकृति थी। भारती ने एक क्षण के लिए वेदाचार्य की ओर देखा और तेज़ी से आकाश की ओर बढ़ चली, पीछे खड़े वेदाचार्य पूरी ताकत से चिल्लाये-
“नहीं! रुक जा मेरी बच्ची! अपने दादाजी को छोड़कर मत जा!”
लेकिन भारती की आत्मा का वह पारदर्शी रूप शीघ्र ही उनकी नज़रों से ओझल हो गया।
वेदाचार्य की आँखें अभी भी नम थीं लेकिन अब उनके चेहरे पर दुख की जगह क्रोध नज़र आ रहा था। वह अग्रज की ओर मुड़कर बोले-
“तूने अच्छा नहीं किया अग्रज! तूने विश्वासघात किया है मेरे साथ, मैं तुझे जीवित नहीं छोडूँगा।”

इतना कहते ही वेदाचार्य के हाथ आश्चर्यजनक तरीके से घूमे और हवा में ही तीन चार बड़े बड़े लौह चक्र प्रकट हो गए जो अग्रज के शरीर को काटने के लिए आगे बढ़े। अग्रज के हाथों से हल्की स्याह ऊर्जा के वार से ही सभी लौह चक्र नष्ट हो गए। फिर वेदाचार्य ने हवा में ही तीन चार द्वार बनाये, उन द्वारों से निकले विशालकाय हाथों ने अग्रज को बुरी तरह जकड़ लिया। एक हाथ ने अग्रज का दायाँ हाथ पकड़ लिया, एक हाथ ने उसका बायाँ हाथ पकड़ लिया, बाकी दोनों हाथों ने दायाँ और बायाँ पैर पकड़ लिया और उसके शरीर को अपनी अपनी तरफ खींचने लगे।

वेदाचार्य- अब ये हाथ तेरे शरीर को अलग अलग दिशा में खींचकर तेरे टुकड़े टुकड़े कर देंगे।
अग्रज- उफ्फ! मुझे पराजित करने के लिए आपको अपनी पूरी तिलिस्मी शक्ति का जोर लगाना पड़ रहा है दादा वेदाचार्य लेकिन मेरे लिए इस बंधन से मुक्त होना कोई बड़ी बात नहीं।

इतना कहते ही अग्रज ने थोड़ा जोर लगाया और उसको पकड़े रखने वाले चारों विशालकाय हाथ विभक्त हो गए। वेदाचार्य ने एक चट्टान को हाथ लगाया और चट्टान कई छोटे छोटे टुकड़ों में बंट गयीं, उन सभी छोटे टुकड़ों ने नुकीले शूलों का रूप ले लिया और तेज़ी से अग्रज के शरीर की तरफ बढ़ चले। सभी शूल उसके शरीर से जहाँ तहाँ टकराकर छिन्न भिन्न हो गए लेकिन एक शूल को अग्रज ने हाथ में पकड़ा और तेज़ी से वेदाचार्य की ओर उछाल दिया। शूल का पिछला हिस्सा बहुत जोर से उनके मस्तक पर लगा और वे धीरे धीरे चेतना खोने लगे, वे धरती पर गिरकर बेहोश हो गए। अग्रज धीरे धीरे उनके पास पहुंचकर बोला-
“चाहूँ तो मैं आपको अभी समाप्त कर दूँ दादा वेदाचार्य लेकिन धरती का अंत देखने के लिए मुझे आपको जीवित रखना है।”

इतना कहकर अग्रज ने वेदाचार्य के बेहोश शरीर को वहीं छोड़ दिया और वहाँ से चला गया।

अनीस की लैब में अब अधिकतर समय अंधकार ही रहता था, अपने सबसे प्रिय मित्र अमर की मृत्यु का गम उसे अंदर तक खोखला कर चुका था। इस दुख से बचने के लिए वह नए नए वैज्ञानिक प्रयोग करता रहता था और जब करने को कुछ नहीं होता था तो पूरी लैब में अँधेरा करके एक कोने में पड़ा रहता था। आज भी वह खाली बैठा अमर उर्फ इंस्पेक्टर स्टील की मृत्यु के बारे में सोच रहा था कि तभी लैब की सारी लाइट्स एकाएक अपने आप जल उठीं। अनीस की तंद्रा एकदम से भंग हुई, उसने मुड़कर पीछे देखा तो वही 35-40 वर्ष के मानव के रूप में उसके ठीक पीछे खड़े थे ……. महाकाल छिद्र।

महाकाल छिद्र- इससे पहले की तुम निराधार प्रश्न करके मेरा समय व्यर्थ करो, मैं स्वयं ही अपना परिचय दे देता हूँ कि मेरा नाम महाकाल छिद्र है और मेरे पास ऐसी शक्तियाँ हैं जिनकी सहायता से तुम अपने मित्र की मृत्यु का प्रतिशोध ले सकते हो उनसे जो खुद को रक्षक कहते हैं।
अनीस- त…तुम्हें मेरे मित्र के बारे में क्या पता है?
महाकाल छिद्र- मैं इस धरती के किसी भी प्राणी के मनोभावों को ज्ञात कर सकता हूँ तो तुम्हारे मित्र के बारे में जानना कोई बड़ी बात नहीं थी। अब तुम बताओ कि क्या तुम प्रतिशोध लेना चाहते हो या नहीं?

न जाने क्या प्रभाव था महाकाल छिद्र की वाणी में कि अनीस का दिलोदिमाग सिर्फ प्रतिशोध के बारे में सोचने लगा था। उसे याद आने लगा कि किस प्रकार से खुद को रक्षक कहने वाले नागराज ने बड़ी ही बेदर्दी से उसके दोस्त की हत्या कर दी थी, वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि वह नागराज के कुछ काले कारनामे दुनिया के सामने उजागर करना चाहता था।
इतना सब सोचकर उसके मुख से अनायास ही निकल गया- “हाँ, मैं प्रतिशोध चाहता हूँ!”
महाकाल छिद्र आगे बढ़कर बोले- “अगर तुम्हें प्रतिशोध चाहिए तो तुम्हें किसी भी प्रकार के ईश्वर की भक्ति को छोड़ना होगा, आज से तुम्हारा सिर्फ एक ही आराध्य होगा और वह होगा महाकाल छिद्र।”
अनीस तो जैसे अब तक महाकाल छिद्र के वश में हो चुका था, वह बोल पड़ा- “आज से मेरे आराध्य सिर्फ आप हैं महाकाल छिद्र!”

ये सुनकर महाकाल छिद्र मुस्कुराए, उन्होंने अनीस के सिर पर हाथ रख दिया, उस हाथ से निकलने वाला चमकता द्रव्य तेज़ी से अनीस के शरीर को ढकने लगा, ये देखकर अनीस एकदम घबरा गया।

महाकाल छिद्र- भयभीत न हो वत्स! ये गर्भीरा धातु का कवच है, ब्रह्मांड की सर्वाधिक भारी धातु। मैं स्याह ऊर्जा द्वारा तुम्हारी देह को गर्भीरा धातु के इस कवच को पहनने लायक बना दूँगा, फिर तुम मेरी स्याह ऊर्जा द्वारा निर्मित सेना के साथ मिलकर रक्षकों से प्रतिशोध ले सकते हो लेकिन उससे पहले तुम्हें मेरा एक कार्य सम्पन्न करना होगा।”

पिघलती धातु में तेज़ी से ढकता हुआ अनीस बोला- “क्या काम महाकाल छिद्र?”

महाकाल छिद्र- तुम्हें “त्रिफना” को लाकर मुझे सौंपना होगा। त्रिफना इस धरती के किसी भी कोने में हो सकता है, ये कहाँ है वह ज्ञात करना तुम्हारा कार्य है। मेरी शक्तियाँ ये ज्ञात कर पाने में असमर्थ हैं किन्तु त्रिफना को ढूँढो भले ही उसके लिए पूरी पृथ्वी को ही समतल क्यों ना करना पड़े।

महाकाल छिद्र का ये वाक्य पूरा होते ही अनीस का शरीर पूरी तरह से गर्भीरा के खोल में ढक चुका था, वह पुरातन काल के किसी लौह कवच धारण किये सैनिक जैसा लग रहा था। अंतर बस यह था कि वह अपने शरीर पर जमी धातु को स्याह ऊर्जा की सहायता से मनचाहा आकार दे सकता था।

अनीस- बहुत बहुत धन्यवाद महाकाल छिद्र! अब सर्वप्रथम मैं आपका ही कार्य करूँगा, इस त्रिफना को ढूँढूँगा, भले ही इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े।

महाकाल छिद्र मुस्कुराकर बोले- “विजयी भवः वत्स!”
और फिर वहाँ से भी देखते ही देखते गायब हो गए।

महाकाल छिद्र पृथ्वी से दूर अंतरिक्ष में प्रकट हुए जहाँ बीस फुट के विशालकाय शरीर वाला स्याह विवर पहले से ही उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। अब महाकाल छिद्र अपने मानव रूप में नहीं बल्कि असली स्वरूप में थे, चार भुजाओं वाले एक ऐसे हरे शैतान प्राणी के रूप में जिसे देखकर देवताओं के हृदय में भी भय का संचार हो जाये।

स्याह विवर- आ गए तुम महाकाल छिद्र! अब मुझे कारण बताओ कि किस प्रयोजन हेतु तुमने क्यों मुझे पृथ्वी का भक्षण करने से अभी तक रोका हुआ है? मुझे वृहदाकार लेकर पृथ्वी का भक्षण करने दो।
महाकाल छिद्र- मैं जानता हूँ कि तुम सदियों की क्षुधा से ग्रसित हो परन्तु तुम्हें कैद करने वाले सप्तर्षियों से सही प्रतिशोध लेना है तो पृथ्वी के विनाश के विषय में नहीं बल्कि उसको भ्रष्ट करने के विषय में सोचो। सोचो क्या होगा जब सभी मनुष्यों की आस्था हम दोनों के साथ जुड़ जाएगी, हम बनेंगे अंधकार के देवता। तब तक तुम हाल ही में मिली स्वतंत्रता का उपयोग करो और अनगिनत जीवन रहित ग्रहों को खाकर अपनी क्षुधा शांत कर सकते हो परंतु असली विजय तो तभी प्राप्त होगी जब समस्त ब्रह्मांड की भक्ति हमें प्राप्त होगी और ऐसा होने में समय नहीं है। शीघ्र ही त्रिफना को प्राप्त करके मैं पुण्य शक्तियों की विजय की रही सही संभावना को भी समाप्त कर दूँगा। फिलहाल मुझे स्वर्ग में आरम्भ होने वाले देवासुर संग्राम की ओर भी ध्यान केंद्रित करना होगा।

ब्रह्मांड रक्षक हैडक्वार्टर में चुप्पी छाई हुई थी। अभय उर्फ तिरंगा की मृत्यु का दुख सभी के चेहरे पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था, परमाणु सबसे अधिक दुखी नज़र आ रहा था। सभी मीटिंग हॉल की बड़ी सी मेज के इर्द गिर्द बैठे थे जबकि नागराज बेचैनी से इधर उधर टहल रहा था। उसके चेहरे पर दुख के साथ चिंता भी दिख रही थी, वह अपने में ही बड़बड़ाते हुए बोला-
“आखिर ऐसा क्या काम हो सकता है जिसकी वजह से ध्रुव को ऐसे मौके पर भी धनंजय के साथ राजनगर जाना पड़ा?”

शक्ति- कोई ज़रूरी काम ही होगा नागराज वरना ध्रुव इस प्रकार से राजनगर नहीं जाता।
नागराज- हमें आगे की योजना भी बनानी है शक्ति। अगर महाकाल छिद्र और स्याह विवर वाकई में स्वतंत्र हो चुके हैं तो हम सीधे उनसे नहीं भिड़ सकते।

उनकी बातचीत में खलल पड़ा जब हवा में अचानक बने गोलाकार द्वार से ध्रुव और धनंजय वापिस आ गए लेकिन इस बार ध्रुव मठाधीश की पारंपरिक पोशाक में नहीं बल्कि अपनी नीली पीली कमांडो पोशाक में वापिस आ चुका था। ये देखकर सभी लोग हैरान रह गए। नागराज भी फटी फटी आंखों से ध्रुव को देखकर बोला “ध्रुव ये तुम…..”

ध्रुव (बात बीच में काटकर)- मैंने अपने परिवार की मृत्यु के बाद मन ही मन तय किया था कि इस पोशाक को वापिस धारण नहीं करूँगा लेकिन तिरंगा की मृत्यु ने मुझे एक चीज़ सिखाई की नायक को कभी अपनी किसी भी असफलता या कमज़ोरी से भागने का प्रयास नहीं करना चाहिए बल्कि डटकर परिस्थिति का सामना करना चाहिए। मठाधीश मैं अब भी हूँ लेकिन कुछ समय के लिए मैं वापस बन चुका हूँ ……….सुपर कमांडो ध्रुव।
नागराज (ध्रुव के कंधे पर हाथ रखकर)- मुझे खुशी है कि तुमने वापस इस पोशाक को धारण किया है, भले ही कम समय के लिए ही सही। अब आगे की हमारी योजना क्या होनी चाहिए?
ध्रुव- हमें बाबा गोरखनाथ के लौटने की प्रतीक्षा करनी होगी, वे इन स्याह शक्तियों को हमसे बेहतर समझते हैं इसलिए उनका मार्गदर्शन आवश्यक है लेकिन तब तक हम हाथ पर हाथ धरकर बैठे नहीं रह सकते। हमें हाल ही में मिले अपने पदों का इस्तेमाल करके अपनी एक सेना बनानी होगी। नागराज नागसम्राट है जिसके इशारे पर जल, थल पर वास करने वाली सभी इच्छाधारी नाग प्रजातियाँ युद्ध के लिए एकदम तैयार हो जाएंगी। मैं मठाधीश हूँ जिसके पास असाधारण शक्ति वाले हन्टर्स की फौज है, नताशा से संपर्क करके मैं ग्रैंड मास्टर रोबो और उसकी रोबो आर्मी को भी इस योजना में सम्मिलित कर सकता हूँ। धनंजय स्वर्णनगरी के देवों का प्रतिनिधत्व करेगा।

अचानक से ही डोगा के मास्क में लगे इयरपीस पर अदरक चाचा की आवाज़ गूँजी- “सूरज, तुम्हें फौरन मुम्बई लौटना होगा!”
अदरक चाचा की घबराई हुई आवाज़ सुनकर डोगा के माथे पर भी चिंता की लकीरें आ गयीं, वह चौंककर बोला- “आप इस वक्त कहाँ हैं चाचा?”

अदरक- मैं हमारे मॉनिटर कक्ष में ही हूँ। मुम्बई पर किसी अजीबोगरीब पुरातन काल के सैनिक जैसे किसी व्यक्ति ने हमला कर दिया है, उसके साथ तीन चार भयानक राक्षस भी हैं जो भीषण तबाही मचा रहे हैं। पुलिस उन्हें रोकने में पूरी तरह असफल हो रही है, उनके ऊपर बड़े से बड़ा हथियार भी काम नहीं कर रहा, हम लोग भी कोशिश करेंगे उन्हें रोकने की लेकिन तुम्हें अपने साथियों के साथ फौरन आना होगा।
डोगा- आप चिंता ना करें, हम जल्द से जल्द वहाँ पहुँचने की कोशिश करेंगे।

इतना कहकर डोगा ने अदरक से संपर्क काट दिया था लेकिन तब तक सारी निगाहें उसे ही घूरने लगी थीं। वह बोला-
“लगता है स्याह शक्तियों का अगला हमला हो चुका है और मुम्बई निशाना बनी है, मुझे फौरन जाना होगा।”

नागराज- ठीक है, मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा।

तभी नागराज को महानगर में मौजूद अपने जासूस सर्पों के तीव्र मानसिक संकेत प्राप्त हुए, वह बोला- “उफ्फ! लगता है महानगर में भी कोई भीषण गड़बड़ चल रही है। मेरे सर्प किसी प्रकार के रहस्यमयी व्यक्ति को वहाँ तबाही मचाता देख रहे हैं।”

ध्रुव- हमारे पास दो लोग हैं जो पलक झपकते ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकते हैं, धनंजय और शक्ति। डोगा, लोमड़ी, नागराज, परमाणु और मैं धनंजय के साथ मुम्बई चले जायेंगे जबकि सुपर इंडियन, भेड़िया, एंथोनी और जैकब शक्ति के साथ महानगर में चल रही गड़बड़ी का पता करेंगे।
भेड़िया- वैसे हमेशा ब्रह्मांड रक्षक की टीम के चयन का काम तुम क्यों करते हो?
ध्रुव- तुम करना चाहोगे?
भेड़िया- नहीं, धन्यवाद।
ध्रुव- तो फिर तय रहा, चंडकाल की मृत्यु के बाद से और पाप क्षेत्र के पूरी तरह खुलने के बाद से हमारा सामना किस तरह की शक्तियों से होगा ये कहना अत्यंत कठिन है इसलिए मैं सुझाव दूँगा कि सब लोग अपनी क्षमता का श्रेष्ठतम उपयोग करें क्योंकि मैं नहीं चाहता कि हमें एक और साथी खोना पड़े।

धनंजय ने स्वर्णपाश द्वारा मुम्बई तक का द्वार बनाया और पहली टीम को लेकर रवाना हो गया, उसके बाद शक्ति बाकी सबको लेकर एक ही पल में महानगर की तरफ रवाना हो गयी।

मुम्बई में अपने मॉनिटर कक्ष में नज़रें गड़ाए अदरक, काली, धनिया, हल्दी और चीता के दिलों की धड़कनें पल प्रतिपल बढ़ती ही जा रही थीं। वे गौर से उस धातुई आवरण से पूरी तरह ढके व्यक्ति को देख रहे थे जिसके साथ आये राक्षस प्राणियों को पुलिस फ़ोर्स बिल्कुल भी रोक नहीं पा रही थी। उस व्यक्ति के धातुई हाथ कभी बड़े से हथौड़े का आकार लेकर तो कभी लंबी सी तलवार का आकार लेकर लोगों पर आक्रमण कर रहे थे।

चीता- ये भला कैसा हथियार है? मैं मठ में पला बढ़ा हूँ और तमाम प्रकार के अस्त्र शस्त्र देखे हैं पर ऐसी धातु का ज़िक्र कहीं नहीं सुना जो पलभर में सड़क से लेकर मोटे मोटे खंभों तक सभी वस्तुओं को इतनी तेजी से और इतनी सरलता से काट सके।
अदरक- हमारा पाला कभी तंत्र, मंत्र, परग्रहियों, राक्षसों या अन्य विचित्र शक्तिधारियों से नहीं पड़ा है और ना इन्हें काबू करने का हमें अनुभव है इसीलिए तो डोगा के साथ मैंने अन्य ब्रह्मांड रक्षकों को बुलाया है। ये समस्या हमारे बस से बाहर की है।
काली- लेकिन उनके आने तक क्या हम हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहें?
हल्दी- तो तुम क्या चाहते हो काली? हम ऐसे शत्रुओं से भिड़ जाएं जो हमें मारने में दो मिनट का भी वक्त नहीं लगाएंगे? ये हन्टर्स या CNN नहीं हैं, ये तामसिक शक्तियाँ हैं जिनसे भिड़ने का सीधा सा अर्थ है मृत्यु।
काली- ज़रा देखो की वे मुम्बई को किस प्रकार से तबाह कर रहे हैं हल्दी, क्या हम काले डकैत नहीं हैं? क्या मुम्बई को बचाना हमारा कर्तव्य नहीं है?
अदरक- तुम ठीक कहते हो काली, हम रक्षकों का इंतज़ार करते नहीं रह सकते। काले डकैतों को खुद भी कुछ करना होगा।
हल्दी- लेकिन अदरक….
अदरक (बात बीच में काटकर)- मठ के बाद मुम्बई ने हमें आश्रय दिया है हल्दी, तो फिर हम इस पर ऐसी समस्या आने पर छिपे कैसे रह सकते हैं? मैं तो काले डकैतों वाली अपनी पोशाक धारण करने जा रहा हूँ, बाकी आप लोगों की मर्ज़ी, वैसे भी घटनास्थल यहाँ से निकट ही है।
धनिया- आपने सोच भी कैसे लिया हम आपको अकेले जाने देंगे बड़े भाई, जायेंगे तो चारों भाई साथ जायेंगे रण में। आखिर इन राक्षसों को भी पता चले कि मुम्बई पर हमला करने का अंजाम क्या होता है।

अदरक ने हल्दी की तरफ देखा, उसने भी हल्के से मुस्कुराकर सहमति में सिर हिला दिया था।

धातुई पोशाक पहने व्यक्ति के साथ आये राक्षस गाड़ियाँ उठा उठाकर फेंक रहे थे और वह व्यक्ति आराम से पुलिसवालों की लाशों के बीच में से चलता हुआ जा रहा था जो कि उसने ही कुछ देर पहले बिछायीं थीं। वह व्यक्ति तबाही फैलाते राक्षसों से बोला-
“त्रिफना इस पूरी दुनिया में कहीं भी हो सकता है साथियों, मानवों के हृदय में महाकाल छिद्र का इतना भय पैदा कर दो कि ये स्वयं हमको त्रिफना देने पर मजबूर हो जायें।”

उन मृत पुलिसवालों में से एक कि साँसे अभी भी चल रही थीं लेकिन वह किसी शांत मुर्दे की तरह लेटा था, वह जानता था कि उसकी ज़रा सी भी हरकत पर उसका हाल औरों की तरह हो सकता है। किसी तरह उसका हाथ सड़क पर पड़े अपने वायरलेस तक पहुंचा, धीरे से वायरलेस को उठाकर वह अपने मुँह तक लाया और धीरे से बोला-
“पूरी टीम खत्म हो चुकी है, हमें और बैकअप चाहिए, क्या कोई सुन रहा है? हमें और बैकअप चाहिए।”

तभी उसके हाथ से वायरलेस उसके हाथ से तेज़ी से निकल गया, उसी धातुई वेशभूषा वाले व्यक्ति ने उसका वायरलेस छीना और मुट्ठी से भींचकर तोड़ डाला। पुलिसवाले के दिलोदिमाग में दहशत घर कर गयी, वह घबराकर बोला- “आखिर तुम हो कौन? हमसे चाहते क्या हो?”

इस पर वह व्यक्ति बोला- “तुम्हारा सवाल अच्छा है, ये मेरे सुपरविलन करियर की शुरुआत है और मैंने अच्छा सा नाम तक नहीं सोचा लेकिन भला ऐसा क्या नाम हो सकता है जिसे सुनकर ही व्यक्ति को बेहद मौत और निराशा याद आने लगे। उसे पता चल जाये कि काल के पंजों से उसका छूट पाना मुमकिन नहीं है….
..कैंसर! हाँ “कैंसर” बढ़िया रहेगा, अब कैंसर तुम्हें बताएगा कि तुम कितने असहाय हो जो तुम्हारा ईश्वर भी तुमको बचाने नहीं आ सकता जबकि हमारे आराध्य हमारी पुकार सदैव सुनते हैं।”

कैंसर के धातुई हाथ ने आरी का रूप ले लिया था, उस पुलिसवाले ने अंत निकट जानकर अपनी आँखें दहशत से बंद कर ली थीं, उसका दिल पूरे जीवन में इतने जोरों से नहीं धड़का था जितना आज धड़क रहा था लेकिन तभी भारी मशीनगन की आवाज़ से सब चौंक गए। कैंसर और उसके राक्षस साथियों को हेलीकॉप्टर से दागी मशीनगन ने पीछे की ओर धकेल दिया था, हालांकि उनमें से किसी के शरीर पर खरोंच तक नहीं आयी थी लेकिन तीव्र गति से चलती गोलियों के धक्के पीछे अवश्य धकेल रहे थे। मोहर सिंह ने हेलीकॉप्टर को स्थिर कर रखा था जबकि अदरक अपने मजबूत हाथों से मशीनगन को साधकर निशाने लगाते जा रहे थे। कैंसर ने अपनी धातुई पोशाक के से तीक्ष्ण कटारों जैसे अस्त्र पैदा किये और तेज़ी से हेलीकॉप्टर की ओर फेंक दिए, एक कटार तो सीधा हेलीकॉप्टर के फ्यूल टैंक को चीरती चली गयी।

मोहर सिंह- फ्यूल तेज़ी से खत्म हो रहा है, हम सबको नीचे कूदना होगा! हेलीकॉप्टर भी असंतुलित हो रहा है!

मोहर सिंह की बात सुनकर हेलीकॉप्टर में बैठे अदरक, हल्दी, काली, धनिया और चीता नीचे कूद पड़े। ज़मीन पास होने की वजह से सब लोग सही सलामत ज़मीन तक पहुंच गए, मोहर सिंह भी सबसे बाद में हेलीकॉप्टर से कूदा, उसके कूदते ही हेलीकॉप्टर की तेज़ घूमती पंखुड़ियां ज़मीन से टकराकर तेज़ी से इधर उधर बिखर गयीं। अब उनके सामने था कैंसर और उसके राक्षस साथी। दोनों पक्ष एक दूसरे की तरफ तेज़ी से बढ़ने लगे, अदरक सबसे आगे खड़े राक्षस से भिड़ गए, उसके मुँह पर मुक्का मारकर उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी सख्त दीवार पर मुक्का मार दिया हो पर राक्षस टस से मस ना हुआ। उल्टा राक्षस के हाथ के एक वार से वह पीछे खड़ी गाड़ी से जा भिड़े।

अदरक- ये हमारी ताकत से काबू में नहीं आने वाले, भारी हथियारों का इस्तेमाल करना होगा।
कैंसर- हम भारी हथियारों से भी काबू में नहीं आने वाले, तुम खुद को बहुत बड़े मसीहा समझते हो, तुम्हारी मृत्यु से ये बात साबित हो जाएगी कि महाकाल छिद्र की सेना के साथ टकराव का एक ही अर्थ है…….मौत!

इतना कहते ही कैंसर के हाथ में कई सारे धारदार हथियार आ गए जिनके स्पर्श मात्र से किसी की भी जीवनलीला समाप्त हो जाती लेकिन तभी हवा में एक द्वार प्रकट हुआ, सबका ध्यान उस तरफ चला गया। उस द्वार में से निकले नागराज, ध्रुव, डोगा, लोमड़ी, परमाणु और धनंजय।

नागराज को देखकर कैंसर अत्यंत क्रोधित होकर बोला-
“आ जा नागराज! तेरा ही इंतज़ार था मुझे ढोंगी नायक! खुद को नायक बताकर नायकों का कत्ल करने वाले राक्षस, कैंसर तुझे जीवित नहीं छोड़ेगा!”

नागराज के प्रति कैंसर का ऐसा क्रोध देखकर नागराज के साथ साथ वहाँ खड़े बाकी लोग भी भौचक्के रह गए थे।

नागराज- तुम कोई तामसिक शक्ति से निर्मित प्राणी नहीं हो, मेरे प्रति तुम्हारा ये द्वेष बताता है कि तुम पृथ्वी के ही वासी हो। आखिर तुम हो कौन?
कैंसर- मैं तेरी मृत्यु हूँ!

इतना कहते ही कैंसर के शरीर से तीक्ष्ण कटारें निकलकर रक्षकों की तरफ बढ़ीं, कई कटारें नागराज के शरीर को बेधती हुई चली गयीं, एक कटार परमाणु की तरफ भी लपकी, वह ट्रांसमिट होने के बजाय थोड़ा सा झुककर बच तो गया लेकिन फिर भी कटार का स्पर्श उसकी एस्बेस्टस की पोशाक को हल्का सा चीरता हुआ चला गया। डोगा ब्लैकपिपर आर्ट का प्रयोग करता हुआ कटारों से बचा लेकिन उसके पीछे मौजूद मोटी सी दीवार को वह कटार चीरते हुए निकल गयी। धनंजय ने लोमड़ी को धक्का दिया ताकि वह कटारों की बौछार से बच सके लेकिन वह खुद ना बच सका और तेज़ी से आती एक कटार उसकी जांघ में प्रविष्ट हो गयी।

धनंजय- आह! ये कैसी कटार है जिसने मेरी स्वर्ण पोशाक को काटते हुए मेरी जांघ को घायल कर दिया! आखिर ये कैसी धातु है?

नागराज के घाव भी अब तक सूक्ष्म सर्प भरने लगे थे, उसने अपने शरीर को बेधकर गयी एक कटार को ज़मीन से उठाया और गौर से देखकर बोला-
“ये कोई साधारण धातु नहीं है वरना मेरा शरीर कभी ना भेद पाती, इसका भार भी अन्य धातुओं से बेहद अधिक प्रतीत होता है। एक मिनट! इस धातु को मैं पहचानता हूँ, नागाधीश का हथौड़ा भी इसी धातु का बना था, ये तो गर्भीरा है, ब्रह्मांड की सबसे भारी धातु लेकिन यह तेरे पास कैसे आयी?”

कैंसर- जिसकी साँसें ही गिनती की हों वह ये जानकर क्या करेगा? आक्रमण करो मेरे राक्षस साथियों!

कैंसर के आदेश पर राक्षस रक्षकों से भिड़ने चल दिये। सभी रक्षक भी तेज कदमों से उन राक्षसों की तरफ बढ़े और देखते ही देखते जंग छिड़ गई। परमाणु एक राक्षस के ऊपर तीव्र गति से परमाणु छल्ले छोड़ रहा था, छल्लों से उत्पन्न गर्मी के कारण राक्षस विचलित भी हो रहा था लेकिन तभी उसने हवा में स्थिर परमाणु की ओर एक ऊँची छलांग मारी और अपने विशाल पंजों में दबोचकर उसे धरती पर ले आया। इससे पहले की वह परमाणु पर आक्रमण करता, अपने कलाईबन्द के भीषण ऊर्जा वार से धनंजय ने उसे परमाणु से अलग कर दिया। डोगा ने भी भारी भरकम लांचर से दनादन एक राक्षस पर रॉकेट दागे, रॉकेट के तीव्र वार के कारण राक्षस थोड़े घायल अवश्य हुए लेकिन ये वार उन पर जानलेवा साबित नहीं हुए। एक राक्षस भारी भारी कदमों से दौड़ता हुआ ध्रुव की ओर बढ़ रहा था, ध्रुव काफी समय तक एक ही स्थान पर खड़ा रहा लेकिन जैसे ही राक्षस एकदम पास आया, उसने ऊँची छलांग भरी और राक्षस के सिर के ऊपर से निकल गया, राक्षस अपनी गति को काबू में न कर पाया और उसका पैर सड़क पर फैले पानी में थोड़े से डूबे हाई टेंशन केबल के नंगे सिरे को छू गया जो ध्रुव ने ही स्टार ब्लेड से काटा था जिसके कारण उसे ज़ोरदार झटका लगा। उस तगड़े झटके से साधारण मनुष्य के प्राण पखेरू उड़ जाते लेकिन वह राक्षस अपने होश कायम रखने में सफल था, वह क्रोधित होकर वापस ध्रुव की ओर मुड़ा, ध्रुव ठीक उसके पीछे खड़ा मुस्कुरा रहा था। इससे पहले कि राक्षस कुछ समझ पाता, ध्रुव ने बेहद सावधानी से लकड़ी के फट्टे के द्वारा कटी हुई हाई टेंशन वायर के दूसरे सिरे को उठाकर तेज़ी से उसके खुले हुए मुँह की तरफ फेंक दिया। सटीक निशाने के कारण वायर राक्षस के मुँह में जा घुसा और उसके चेहरे को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया, उसके रहे सहे प्राण पखेरू भी उड़ गए और उसका निर्जीव शरीर ज़मीन पर “धम्म” से जा गिरा।
नागराज उड़ता हुआ कैंसर के पास जा पहुंचा।

नागराज- मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मैं तुमको जानता हूँ?
कैंसर- मौत को सामने देखकर ऐसा ही लगता है नागराज, तुझसे बदला लेने की जो तम्मना मेरे दिल में थी वो अब पूरी होगी।

नागराज को उससे और ज़्यादा सवाल जवाब करने का मौका नहीं मिला क्योंकि कैंसर ने अपने दोनों हाथों को बड़ी बड़ी तलवारों में बदलकर उस पर हमला कर दिया था। नागराज तेज़ी से इच्छाधारी कणों में बदलकर उन वारों से बचा, उसने मन ही मन सोचा- “गर्भीरा धातु मेरे शरीर को काट सकती है, इससे बचते रहना होगा वरना मेरे टुकड़े भी नहीं मिलेंगे, साथ ही इस पर वार भी करते रहना होगा।”

नागराज ने कैंसर के ऊपर ध्वंसक सर्प छोड़े लेकिन विस्फोट से भी उसे कोई क्षति नहीं पहुंची। कैंसर ने अपने हाथ को बड़े से हथौड़े में परिवर्तित करके नागराज के ऊपर प्रहार किया, प्रहार बेहद प्रचंड था जिससे नागराज जैसे शक्तिशाली का दिमाग भी चकरा गया। फिर हथौड़े के दूसरे वार से उसने नागराज काफी दूर जा गिरा।
कैंसर के राक्षस साथियों का पलड़ा हल्का पड़ता जा रहा था, डोगा एक के बाद एक लांचर मारकर एक राक्षस को घायल कर दिया था लेकिन फिर भी वह आगे की ओर बढ़ता चला जा रहा था। उसने डोगा के समीप आकर उसकी गर्दन को जकड़ लिया, डोगा ने अपना सम्पूर्ण बल लगाकर छूटने की कोशिश की लेकिन उसकी सारी कोशिशें बेकार जा रही थीं, लोमड़ी उसे बचाने के लिए आगे बढ़ी लेकिन राक्षस के एक ही वार ने उसे बुरी तरह पीछे उछाल दिया। ये देखकर डोगा की आँखों में खून उतर आया, उसने तुरंत बेल्ट से नर्व गैस के कई कैप्सूल निकाले और राक्षस की नाक के आगे फोड़ दिए जिससे राक्षस की खोपड़ी बुरी तरह चकरा गयी। डोगा पर उसकी पकड़ ढीली पड़ गयी जिसका फायदा उठाकर डोगा ने अपने दोनों हाथों को एक साथ कसा और एक भरपूर वार राक्षस पर किया, राक्षस तो पीछे को उछला ही लेकिन साथ ही डोगा को भी ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने किसी दीवार पर हाथ दे मारा हो। वह राक्षस किसी मदमस्त हाथी की तरह झूमने लगा, तभी ध्रुव चिल्लाकर डोगा से बोला- “डोगा इन राक्षसों के अंदरूनी भाग बाहरी भागों जितने सख्त नहीं हैं!”
इतनी बात सुनकर ही डोगा समझ गया कि उसका अगला कदम क्या होना चाहिए, वह दौड़ता हुआ राक्षस के पीछे पहुंचा और पूरी ताकत से उसके घुटने पर लात मारी, राक्षस घुटने के बल बैठ गया, नर्व गैस का उस पर बहुत भयंकर असर हुआ था जिसके कारण वह अपनी पूरी क्षमता से विरोध नहीं कर पा रहा था। डोगा ने उसका मुँह खोला, तीन चार हैंडग्रेनेड मुँह के अंदर डाल दिये और फिर एक हाथ से उसका सिर और दूसरे से उसकी ठोढ़ी को पकड़कर मुँह को कसकर बंद कर दिया। धमाकों की तेज आवाज राक्षस के गले में ही घुटकर रह गयी, उसकी ऊपरी खाल सख्त होने के कारण डोगा को बम धमाकों से कोई नुकसान भी नहीं पहुंचा। राक्षस के कान और नाक से धुआं निकलने लगा और वह “धड़ाम” से धरती पर जा गिरा।
ध्रुव की ही योजना को अमल में लाते हुए परमाणु श्रिंक होकर आखिरी बचे राक्षस के मुँह में घुस गया और सिर के पिछले हिस्से को भेदकर बाहर निकल आया। कैंसर के सभी राक्षस साथियों पर काबू पा लिया गया था, केवल नागराज और कैंसर अभी तक जूझ रहे थे।

डोगा और लोमड़ी अदरक , हल्दी, धनिया, काली और चीता के पास पहुँचा और बोला- “आप सब लोग ठीक हैं?”

अदरक- हम सब लोग तो ठीक हैं लेकिन ये राक्षस कहाँ से आये? क्या ये भी उसी पाप क्षेत्र से आये हैं?
डोगा- बात अब हद से आगे बढ़ चुकी है चाचा, इस कैंसर से निपटकर मैं आपको सब समझाता हूँ।
अदरक- वैसे ये सब खत्म हो जाने पर सोच रहा हूँ कि अभय को भी काले डकैतों में आने का निमंत्रण दे ही दूँ। वो अगर ध्रुव का अंगरक्षक बनने के लिए तैयार हो सकता है तो हमारे लिए काम करने के लिए भी राजी हो सकता है। आखिर मेरे लिए उसमें और तुममें कोई ज़्यादा फर्क तो है नहीं।

ये सुनकर डोगा एकदम शांत हो गया, वह भारी आवाज़ में बोला- “चाचा, कुछ ऐसा है जो आपको अभी जान लेना चाहिए। मैं तो आपको पहले ही बता देने वाला था लेकिन तब तक इस कैंसर ने मुम्बई पर हमला कर दिया।”

अदरक- हाँ कहो, क्या बताना चाहते हो?
डोगा- अभय नहीं रहा चाचा, दिल्ली की धरती की प्राणरक्षा करते हुए वह वीरगति को प्राप्त हो गया।

ये सुनकर चारों चाचाओं के चेहरे के भाव हल्के से बदले, अदरक ने फिर पूछा- “क्या….क्या कहा तूने?”

डोगा- यही की अभय……

इससे पहले की डोगा इस वाक्य को पूरा कर पाता, अदरक का प्रचंड घूँसा उसके चेहरे पर पड़ा जिसके कारण वह धरती पर गिर पड़ा। डोगा ने अदरक की तरफ देखा, उनका ऐसा प्रलयंकारी रूप उसने कभी नहीं देखा था, आँखों से बहते आँसू थम नहीं रहे थे, चेहरे पर एक अलग ही किस्म की क्रूरता जिसके कारण उनका पूरा चेहरा लाल हो गया था।

अदरक- अभय मर गया? और तू तमाशा देखता रहा? कोशिश भी नहीं की उसे बचाने की?

डोगा फिर से उठते हुए बोला- “ऐसी बात नहीं है चाचा, मैंने उसे बचाने की पूरी कोशिश की थी लेकिन उस वक्त हम सभी बेबस थे।”

अदरक ने फिर से एक लात डोगा के पेट पर धर दी जिससे डोगा उछलकर पीछे जा गिरा।

अदरक- कोशिश की थी? क्या कोशिश की थी? तू तो उसे भाई मानता था ना, अपने भाई को नहीं बचा पाया? धिक्कार है तुझ पर सूरज! धिक्कार है!

बाकी चाचा , चीता, लोमड़ी, ध्रुव, धनंजय, परमाणु अदरक को रोकने आगे आये लेकिन अदरक उस वक्त कुछ भी कहने सुनने के मूड में नहीं लग रहे थे।

ध्रुव- हम सबने उसे बचाने की पूरी कोशिश की थी लेकिन उस वक्त हालात ही ऐसे थे कि हम उसे नहीं बचा पाये।
अदरक- तुम तो रहने ही दो गौरांगीपुत्र, गौरांगी हमारे मठ की सबसे अद्वितीय योद्धा थी, मुझे शर्म आती है तुमको उसका पुत्र कहते हुए। कैसे मठाधीश हो तुम, जो अपने ही अंगरक्षक की रक्षा न कर सका? दिमाग का धनी कहते हैं न तुम्हें, क्यों ये विलक्षण दिमाग मेरे अभय को नहीं बचा पाया!

डोगा फिर से उठा और बोला- “हम अपने आपको ऐसे दिलासा नहीं दे सकते ध्रुव, आप ठीक कहते हैं अदरक चाचा, हम अपने ही एक प्रिय साथी को बचाने में पूरी तरह से नाकाम रहे लेकिन क्या आप ये जानना नहीं चाहेंगे कि मिट्टी का वह वीर सपूत कैसे धराशायी हुआ? वह धरती की रक्षा करते हुए मारा गया, मरते वक्त उसके चेहरे पर किसी प्रकार का दुख नहीं था बल्कि प्रसन्नता के भाव थे क्योंकि वह मरा नहीं बल्कि माटी की रक्षा करते हुए शहीद हो गया। धरती का लाल, धरती में ही जा मिला और शायद ऐसा ही अंत हम सबका भी हो क्योंकि जिन महाशक्तियों के विरुद्ध हम लड़ रहे हैं उनसे तो शायद देवता भी ना जीत पाएं लेकिन हम कोशिश करेंगे जैसी की हर नायक करता है, अपनी धरती को बचाने की कोशिश, तिरंगा की तरह।”
परमाणु भी आगे आकर बोला- “मेरा बचपन का साथी था वह, आपको मिलने से पहले मेरा दोस्त था अभय लेकिन विडंबना देखिए कि बचपन में मैं उसे शेरखान के चंगुल से नहीं बचा पाया था और इस बार उसे मौत के चंगुल से नहीं बचा पाया लेकिन हम दो में से एक काम कर सकते हैं। या तो अभय को न बचा पाने के दुख में खुद को शोकग्रस्त कर सकते हैं या इन तामसिक शक्तियों का खात्मा करके उसे सच्ची श्रद्धांजलि दी सकते हैं ताकि उसकी कुर्बानी व्यर्थ न जाए।”

अदरक घुटनों के बल बैठ गए और फफक फफक कर रोने लगे, उनको इतना कमजोर शायद ही किसी ने कभी देखा होगा। उनके दिमाग में कई साल पहले की वही स्मृति ताज़ा हो गयी जब शेर खान के चंगुल से उन्होंने एक मासूम बालक को स्वतंत्र करवाया था, अभय का वही चेहरा उनके दिमाग में बार बार घूम रहा था। बाकी तीनों चाचा भी अपने आँसू काबू में नहीं कर पा रहे थे। चीता भी बुरी तरह हिल गया था, उसे यकीन नहीं हो रहा था कि मठ का उसका इकलौता मित्र अब इस दुनिया में नहीं है। डोगा ने अदरक के कंधे पर हाथ रखा, अदरक थोड़ा शांत होकर बोले- “अपने चाचा को माफ कर दे बच्चे, मैं गुस्से में कुछ ज़्यादा ही बोल गया।”

डोगा के मास्क के नीचे सूरज की आँखें भी नम हो गई थीं, वह बोला- “कैसी बातें कर रहे हैं चाचा? मैं तो आप ही का बच्चा हूँ, थोड़ा डांट दिया, थोड़ा मार दिया तो क्या सह नहीं पाऊँगा?”

अब अदरक की आँखों में दुख के सागर की जगह फिर से क्रोध के शोले नज़र आने लगे, वो बोले- “जिन तामसिक शक्तियों ने अभय की जान ली, उनसे आखिरी साँस तक लड़ूंगा मैं। अब या तो वे शक्तियाँ रहेंगी या फिर मैं!”

कैंसर अभी भी अपने धातुई हाथों द्वारा निर्मित हथौड़ों की तीव्र गति की मार से नागराज को बुरी तरह घायल कर रहा था।

कैंसर- किस मिट्टी का बना है तू नागराज? इतने तीव्र प्रहारों से तो पूरा माउंट एवरेस्ट ढेर हो जाता लेकिन मैं तेरी जान लेकर रहूंगा।

कैंसर ने अपने हाथों को हथौड़े से बड़ी तलवारों में परिवर्तित कर दिया लेकिन इससे पहले की वह नागराज पर कोई भी वार कर पाता। तीव्र परमाणु छल्लों का वार उसके शरीर से जा टकराया जिसके धक्के से वो पीछे हटा, उन वारों में धनंजय की कलाईबंद के ऊर्जा ब्लास्ट भी सम्मिलित हो गये, फिर डोगा, अदरक, हल्दी, धनिया, काली, चीता, ध्रुव और लोमड़ी भी भारी भरकम हथियारों द्वारा कैंसर पर प्रहार करने लगे। इतने अधिक वारों से विचलित होकर कैंसर ने अपने धातुई शरीर में जगह जगह लोहे के तंतु उगा लिये, उन तंतुओं ने आगे बढ़कर सभी रक्षकों की गर्दनों को जकड़ लिया।

कैंसर- बहुत शौक है ना धरती के लिए कुर्बान होने का, अभी तुम सबका शौक पूरा किये देता हूँ।

उसका ध्यान नागराज पर नहीं था जो धीरे धीरे उसके वारों के प्रभाव से संभल चुका था, नागराज इच्छाधारी कणों में बदलकर कैंसर के पास पहुँचा। कणों में बदले होने के कारण, उसका हाथ कैंसर के शरीर पर चढ़े धातुई आवरण के अंदर आराम से घुस गया था और जैसे ही तीन पलों बाद वह अपने ठोस रूप में आया, उसने शरीर पर चढ़े गर्भीरा के उस खोल को पूरी ताकत से फाड़ दिया। कैंसर के शरीर पर चढ़े खोल के फटते ही उसके धातुई तंतुओं द्वारा जकड़े सभी लोग भी आज़ाद हो गए।
नागराज ने जब खोल के अंदर छिपे व्यक्ति को खींचकर निकाला तो वह बुरी तरह चौंका, उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह अपने सामने इस व्यक्ति को देख रहा है।
वह बड़ी मुश्किल से बोल पाया- “अनीस…..स्टील के निर्माता, तुम थे कैंसर?”

अनीस के चेहरे पर क्रोध और कुटिलता के भाव थे, वह हँसकर बोला- “हां मैं ही था कैंसर! मेरे आराध्य महाकाल छिद्र ने मुझे ये रूप दिया ताकि मैं तुम सबसे प्रतिशोध ले सकूं! मेरे मित्र स्टील को मार दिया था तूने हैवान और अब मसीहा बनने का ढोंग कर रहा है? कैंसर का रूप इसीलिए था ताकि मैं तुझे मौत के घाट उतार सकूँ।”

नागराज ने उसके गिरेबान को और अधिक कसकर पकड़ लिया- “तुझे अंदेशा भी है कि तूने कितनी तबाही मचाई है? स्टील और मैं दोनों नायक तिमिर योग के प्रभाव के शिकार थे मूर्ख और तू होशोहवास में लोगों की जान ले रहा है? तुझे जीने का कोई हक नहीं।”

अनीस- कितना अच्छा लगता है ना इतनी शक्ति का होना? वैसे तेरी गलती नहीं है इतनी शक्ति जितनी तेरे पास है वो किसी को भी भ्रष्ट कर सकती है, फिर मैं तो एक तुच्छ इंसान हूँ जिसे हाल ही में इतनी शक्ति मिली।
नागराज- तेरी शक्ति तुझसे छिन चुकी है, अब तुझे निर्दोषों की हत्या का दंड भुगतना होगा।
अनीस- हाहाहा, गलतफहमी है तेरी नागराज अगर तू सोचता है मेरा कवच मेरी शक्ति थी। महाकाल छिद्र ने मेरे शरीर में स्याह ऊर्जा को प्रवाहित किया है, गर्भीरा धातु मेरे इशारे पर नाचती है!

तभी नागराज ने देखा कि जिस गर्भीरा द्वारा निर्मित कवच को उसने अनीस के शरीर से अलग किया था, उसके टुकड़े मोटे मोटे भालों का रूप धारण करके अपने आप हवा में ऊपर उठ रहे हैं। अनीस के हाथों के हल्के से इशारे से उड़ते हुए भालों में से एक भाला नागराज की तरफ तेज़ी से बढ़ा और उसके पेट के बेधता हुआ उसे उड़ाकर अनीस से दूर ले गया।
नागराज चीखा- “सभी लोग अपना अपना बचाव करो!”

कई सारे गर्भीरा धातु द्वारा निर्मित भाले बाकी लोगों की तरफ बढ़े। धनंजय ने अपने स्वर्णपाश द्वारा भालों को कैद करने की कोशिश की लेकिन वो कोशिश बेकार गयी, ध्रुव ने हल्दी और धनिया को तेजी से आते भालों के रास्ते से हटाया, चीता और लोमड़ी बेहद चपलता से अपने पास से गुजरते दो भालों से बचे, परमाणु सही मौके पर ट्रांसमिट होकर भालों का शिकार होने से बच गया, डोगा भी फुर्ती से बच गया लेकिन तभी उसकी नज़र क्रोध से अनीस की ओर भागते अदरक चाचा पर पड़ी। वो समझ गया कि अदरक चाचा को अभय की मौत की खबर ने बुरी तरह हिला दिया था और अपने सामने एक भीषण तामसिक शक्ति को देखकर वह आपा खो बैठे थे। अनीस ने नागराज को कई सारे भालों से बींध दिया था, नागराज भी अपनी पूरी शक्ति का इस्तेमाल करके छूटने के प्रयास कर रहा था लेकिन असहनीय पीड़ा उसे न तो इच्छाधारी कणों में बदलने दे रही थी और ना ही नाग रूप में।

अनीस- हाहाहा, अब मेरे दोस्त अमर की आत्मा को शांति मिलेगी जब तेरे शरीर के टुकड़े करूँगा मैं।

पूरा ध्यान नागराज पर केंद्रित होने के कारण अनीस को अपने आसपास ध्यान देने का मौका नहीं मिला, एक जोरदार घूंसा उसके थोबड़े से जा टकराया जिसने उसे ज़मीन सूँघने पर मजबूर कर दिया। उसने देखा कि अदरक मौत बनकर उसके सिर पर खड़े हुए थे, प्रचंड घूँसे के कारण उसके मुँह से हल्का हल्का खून रिसने लगा था। उसने उठने की कोशिश की लेकिन अदरक ने उसकी छाती पर अपनी भारी भरकम लात रख दी और दाँत भींचकर बोले-
“तुम लोगों की वजह से भारत माँ को अपना एक सच्चा सपूत खोना पड़ा, तुममें से किसी भी पाप शक्ति को नहीं छोडूंगा मैं!”

तभी अनीस ने ज़मीन पर लेटे लेटे ही हल्का सा इशारा किया और एक भाला “खच्च” से अदरक के पेट में जा धँसा वातावरण में अजीब सी शांति फैल गयी, बाकी तीनों चाचा, चीता, लोमड़ी, ध्रुव, डोगा, परमाणु, धनंजय उस ओर भागे, नागराज को भी अनीस का ध्यान बंटने से भालों से आज़ाद होने का मौका मिल गया लेकिन लगातार हुए बेहद घातक वारों के कारण उसके शरीर के घाव भरने में समय लग रहा था जिसके कारण उसका उठना भी दूभर हो गया था। सबसे तेज भाग रहा था डोगा, अदरक का शरीर धीरे धीरे ठंडा पड़ता जा रहा था लेकिन धरती पर गिरने से पहले ही उसे डोगा के मजबूत बाजुओं ने थाम लिया था। अदरक चाचा अब डोगा की गोद में थे, डोगा ने अपना मास्क उतार दिया, अब उसे बिल्कुल परवाह नहीं थी कि उसका राज़ राज़ रहता है है नहीं। सूरज का चेहरा एकदम लाल हो चुका था, वह अदरक से बोला- “च..चाचा, लंबी लंबी साँसें लीजिये, कुछ नहीं होगा। आप बिलकुल ठीक हो जाएंगे।”
तब तक बाकी लोग भी उनके पास पहुँच चुके थे, सूरज सबसे पास खड़ी लोमड़ी से बोला “म..मोनिका, चाचा को कुछ देर के लिए तुम संभालो, मैं इन्हें हॉस्पिटल लेकर जाऊंगा, सब ठीक हो जाएगा।”

लोमड़ी ने भी अपना मास्क उतार दिया, वह धीरे धीरे सुबक रही थी , ये देखकर सूरज बोला- “तुम रो क्यों रही हो? चाचा को कुछ नहीं होगा, चिंता मत करो। तुम इनको संभालो, मैं अभी आता हूँ।”

इतना कहकर सूरज ने अनीस की तरफ देखा, जो कि हवा में एक जगह स्थिर होकर फिर से अपने शरीर पर गर्भीरा का कवच चढ़ा रहा था। उसके शरीर पर धीरे धीरे फिर से गर्भीरा धातु की परत चढ़ती जा रही थी, उसने ध्रुव की ओर देखकर पूछा- “अभय की ढाल कहाँ है?”

ध्रुव- मैंने अभय की ढाल नागराज को सौंप दी थी जिसे उसने ब्रह्मांड रक्षक हेडक्वार्टर के मीटिंग हॉल में रखवा दिया था।
सूरज (धनंजय की तरफ देखकर)- ब्रह्मांड रक्षक हेडक्वार्टर तक जाने का द्वार बनाओ, फौरन!

उसके चेहरे की क्रूरता देखकर कोई भी उसका विरोध करने का साहस नहीं कर पा रहा था, धनंजय ने तुरंत स्वर्णपाश से हेडक्वार्टर तक का द्वार बना दिया और डोगा उसके भीतर जाते हुए धनंजय के कान में कुछ कहा, धनंजय ने भी स्वीकृति में सिर हिला दिया।

अनीस के शरीर पर एक बार फिर गर्भीरा की परत चढ़ गई थी, उसकी क्रूर हंसी पूरे वातावरण में फैल गयी “हाहाहा! तुम में से कोई खुद को नायक कहलाने के काबिल नहीं है क्योंकि सबके हाथ खून से रंगे हैं, तुम सबका संहार करूँगा मैं।”

तभी “धम्म” से उसके शरीर से एक घूँसा आ टकराया और वह हवा में ही कई फ़ीट पीछे चला गया, नागराज के घाव उसके सूक्ष्म सर्प पूरी तरह भर चुके थे और अदरक की हालत देखकर उसका पारा सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। कैंसर फिर से नागराज की तरफ बढ़ा लेकिन इस बार नागराज सतर्क था, वह बेहद फुर्ती से हवा में घूम गया और कैंसर कर पास पहुंचते ही उसका सिर पकड़कर उसे पूरी ताकत से एक इमारत के ऊपर फेंक दिया। कैंसर और नागराज आपस में गुत्थमगुत्था हो गए थे, धनंजय का स्वर्णपाश चुपके से ठीक कैंसर के पीछे पहुंचा और हवा में गोल गोल घूमकर द्वार बनाने लगा। कैंसर की पीठ उस तरफ थी इसलिए वह तो नहीं देख पाया लेकिन नागराज ने वह द्वार देख लिया था, उसने धनंजय की मंशा समझकर एक जोरदार घूंसा रसीद करके कैंसर को द्वार के पास पहुँचाया। तभी उस हवा में बने द्वार से चीखता हुआ सूरज बाहर कूदा जिसके हाथ में तिरंगा की दैवीय धातु से बनी ढाल थी, उसने बाजू कसे और पूरी ताकत से ठीक आगे खड़े कैंसर के सीने में ढाल पेवस्त कर दी। ढाल गर्भीरा की मोटी परत को चीरते हुए अनीस के सीने को भेद गयी, अनीस सूरज समेत धरती पर गिर पड़ा। गर्भीरा के कवच के भार के कारण आसपास की धरती पर हल्की दरारें पड़ गयी थीं, सूरज ने खून सनी ढाल उसके सीने से निकाल ली, धीरे धीरे गर्भीरा की परत हटती चली गयी और कुछ बचा तो सिर्फ अनीस का मृत शरीर।
सूरज ने ढाल एक तरफ फेंक दी और वापिस अदरक चाचा की तरफ दौड़ चला जिनका सिर अभी तक मोनिका की गोदी में था। मोनिका के साथ साथ तीनों चाचा और चीता भी धीरे धीरे सुबक रहे थे। सूरज ने अदरक के पास पहुंचकर उनका हाथ थामा और बोला- “उस शैतान को मैंने खत्म कर दिया चाचा, अब आप उठिए ताकि आपको अस्पताल पहुँचाया जा सके।”

अदरक- नहीं बच्चे, तेरे चाचा का समय पूरा हो चुका है, अब मुझे जाने दे।

सूरज की आंखें नम हो गईं, वह भर्राए गले से बोला- “नहीं चाचा, अभय के बाद अब आप भी मुझे छोड़कर नहीं जा सकते, मैं आपको नहीं जाने दूँगा।”

अदरक की साँसें उखड़ने लगी थीं, वे बोले- “मैं तुझसे दूर तो कभी जा ही नहीं सकता सूरज, तुझे जब भी मेरे मार्गदर्शन की ज़रूरत पड़े, बस मुझे दिल से याद कर लेना और मैं हाज़िर हो जाऊंगा। मोनिका का साथ कभी मत छोड़ना, उसे हमेशा खुश रखना।”
फिर उन्होंने अपने भाइयों की तरफ देखा जिनके मुँह से कोई बोल ही नहीं फूट रहे थे, उन्हें देखकर वह मुस्कुराकर बोले- “रोते क्यों हो भाइयों, मेरे जाने के बाद भी आपस में प्यार से रहना। धनिया और हल्दी दोनों आपस में झगड़ा मत करना और काली की बात मानना, वो तुम दोनों से ज़्यादा समझदार है।”
सबसे आखिर में वे ध्रुव की तरफ मुड़े और बोले- “गौरांगी से मैं एकतरफा प्रेम करता था इसलिए जब वक्र ने तुम पर हमला किया तो बिना सोचे समझे तुम्हें बचाने के लिए जंग में कूद गया था। मगर गौरांगी से भी अधिक प्रेम मैं मठ की उस धरती से करता हूँ जिसने मुझे काले डकैत का खिताब दिया, मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम ये सुनिश्चित करोगे कि मेरे शरीर को मठ की धरती पर ही दफनाया जाए।”

ध्रुव (भारी मन से)- आप चिंता मत कीजिये, जैसा आप चाहेंगे वैसा ही होगा।
अदरक (मुस्कुराकर)- अब मैं चलता हूँ, उम्मीद है कि जब ऊपर पहुँचूँगा तो अभय से माफी माँगने का मौका मिल सकेगा।

इतना कहते ही अदरक की गर्दन एक ओर लुढ़क गयी, सूरज अदरक की छाती पर सिर रखकर रोने लगा- “नहीं चाचा! अपने सूरज को छोड़कर आप ऐसे नहीं जा सकते!”

सूरज जानता था कि अब उसके चाचा कभी उसकी पुकार नहीं सुनने वाले थे, अभय की तरह वह भी उसे छोड़कर जा चुके थे लेकिन उसका मन यह मानने को तैयार नहीं था।

द्वितीय खंड- तांडव

शक्ति प्रकाश की गति से शीघ्र ही सुपर इंडियन, भेड़िया, एंथोनी और जैकब को लेकर महानगर पहुँची लेकिन वहाँ का तो नज़ारा ही बदला हुआ था। स्याह काले रंग के दुबले पतले नुकीले कानों वाले प्राणी इधर उधर उछल कूद कर तबाही मचा रहे थे।

शक्ति- जल्दी करो, इन पर शीघ्र ही काबू पाना होगा।

सारे रक्षक उन अजीब प्राणियों से भिड़ गए। सुपर इंडियन अपने ब्रेसलेट्स से बिजली का भयानक शॉक देकर या फिर तीव्र ध्वनि तरंगों की मदद से प्राणियों को इधर उधर फेंकने लगा। भेड़िया ने दो चार प्राणियों को एक साथ अपनी पूँछ में लपेटा और गदा के प्रचंड वार से उनके शरीर को खील खील कर दिया। एंथोनी अपनी ठंडी आग और जैकब अपनी तंत्र ऊर्जा द्वारा प्राणियों को ठिकाने लगा रहे थे। शक्ति भी लोहे के खंभों को पिघलाकर नुकीले अस्त्रों में बदलकर उन शैतानों पर कहर बरसा रही थी लेकिन तभी सबने एक आश्चर्यजनक दृश्य देखा। जितने प्राणियों को भी उन्होंने अभी तक मारा था, उनके घाव वापस भर गए थे, वे फिर से उठ खड़े हुए और उन पर हमला करने लगे। पश्चिमी दिशा से नए प्राणी भी भागते हुए उनकी सहायता करने के लिए आगे बढ़े, अब उनकी संख्या दोगुनी हो चुकी थी लेकिन नायक डटकर उनका सामना करने लगे थे।
भेड़िया दो चार प्राणियों को अपनी गदा मारकर हवा की सैर कराता हुआ बोला “उफ्फ! ये तो मर भी नहीं रहे, ऊपर से इनकी संख्या में भी वृद्धि हो रही है। आखिर ये किस प्रकार के प्राणी हैं?”

जैकब- मैं पहले तो इन्हें नहीं पहचान पाया था लेकिन अब मुझे समझ में आ रहा है कि ये कौन हैं। ये अविनाशी प्रेत हैं, जिनका विनाश संभव नहीं। इनको बेहद विशिष्ट तंत्र क्रिया द्वारा बुलाया जाता है, इनका आह्वान करने के लिए बहुत जटिल तांत्रिक सिद्धियों की आवश्यकता पड़ती है जो कि बहुत उच्च कोटि के तांत्रिक के पास होती हैं।
शक्ति- क्या वह तांत्रिक आसपास ही होगा?
जैकब- हाँ, इनको बहुत दूर से काबू नहीं किया जा सकता इसलिए उसका आसपास रहना आवश्यक है। तांत्रिक का ध्यान भंग होते ही ये अपने आप खत्म हो जाएंगे।
शक्ति- ये प्राणी पश्चिमी दिशा से भारी तादाद में आये थे, ज़रूर इनका आह्वान करने वाला तांत्रिक उसी दिशा में होगा। तुम इन प्राणियों को संभालो, मैं उस तांत्रिक को देखती हूँ।

शक्ति बाकी लोगों को अविनाशी प्रेतों से जूझता छोड़कर तेज़ी से पश्चिमी दिशा की ओर बढ़ी, वहाँ उसने देखा वह विलक्षण दृश्य- अग्रज आँख मूँदकर ध्यान की मुद्रा में खड़ा था, उसने दोंनो हाथ हवा में फैलाये हुए थे, दोनों हाथों से प्रस्फुटित होते रोशनी के चक्रों से ही अविनाशी प्रेत उत्पन्न होकर इधर उधर तबाही मचाने जा रहे थे। शक्ति ने भीषण ऊष्मा वार आँख मूँदकर खड़े अग्रज पर किया लेकिन उसके आसपास गोलाकार अदृश्य कवच होने के कारण ऊष्मा इधर उधर छितरा गयी। शक्ति ने तीव्र गति से उड़ते हुए पूरी ताकत से कवच पर वार किया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ, उसने मन ही मन सोचा “मैं तीसरी आँख का प्रयोग करके इस कवच को नष्ट कर सकती हूँ पर यह वार मैं किसी भीषण परिस्थिति के लिए बचाकर रखना चाहती हूँ, अभी तीसरी आँख का प्रयोग करने पर मुझे कुछ समय तक इस क्षमता से वंचित रहना पड़ेगा।”

तभी उसके दिमाग में एक योजना आयी, वह तेज़ी से सड़क को गलाती हुई नीचे चली गयी और सीधे अग्रज के पांवों के नीचे की सड़क के हिस्से को तोड़ते हुए ऊपर आ गयी। अग्रज का ध्यान एकाएक भंग हो गया जिस कारण ना सिर्फ उसका अदृश्य कवच खत्म हो गया बल्कि रक्षकों से जूझते अविनाशी प्रेत भी धुएं में बदल गए। उसने क्रोध से शक्ति की ओर देखा, उसकी आँखों से निकलीं तंत्र किरणों ने शक्ति को कई फ़ीट दूर उछाल दिया।

शक्ति- कौन है तू? क्यों फैला रहा है महानगर में मौत का तांडव?
अग्रज (मुस्कुराकर)- मैं हूँ महाकाल छिद्र का दास अग्रज। मैंने तबाही इस उम्मीद से फैलाई थी कि नागराज मुझे रोकने आएगा लेकिन कोई बात नहीं, अपनी काम की जानकारी मैं तुम्हीं लोगों से उगलवा लूँगा।
शक्ति- क्या जानकारी चाहिए तुझे?
अग्रज- त्रिफना कहाँ है?
शक्ति (चौंककर)- क्या? तुझे त्रिफना के बारे में कैसे पता?
अग्रज- तुम्हारे इस सवाल से पता चलता है कि तुम्हें त्रिफना के बारे में पता है फिर तो तुम मुझे अवश्य बताओगी।

क्रोध से शक्ति की तीसरी आंख खुल गयी, वह बोली- “तुझे त्रिफना नहीं मृत्यु मिलेगी दुष्ट!”

अग्रज के हाथों में साधारण सी हरकत हुई और शक्ति के चारों तरफ तंत्र ऊर्जा का एक आवरण बन गया।

शक्ति- ये..ये क्या?
अग्रज- ये परावर्तन (reflection) तंत्र है। तुम अपनी जिस भी शक्ति का इस्तेमाल करोगी वह परावर्तित होकर तुम पर ही जा लगेगी। इस बार मैंने सड़क के निचले हिस्से को भी तंत्र ऊर्जा से ढक दिया है ताकि तुम यहाँ से बाहर ना निकल पाओ। अब तुम तीसरे नेत्र का प्रयोग कर सकती हो, यदि खुद को भस्म करना चाहो तो।

तभी तीव्र गति से आती भेड़िया की गदा अग्रज के शरीर से टकराई और वह पीछे गिर गया। उसने देखा कि भेड़िया, सुपर इंडियन, एंथोनी और जैकब उसकी तरफ ही बढ़ रहे थे। सुपर इंडियन ने अपने ब्रेसलेट्स से तीव्र ध्वनि तरंगें छोड़ना शुरू किया, जैकब ने भी भीषण तंत्र ऊर्जा का वार किया, एंथोनी ने भी ठंडी आग का उपयोग किया। तीनों के सम्मिलित वार के कारण अग्रज को तकलीफ अवश्य हुई लेकिन वह धीरे धीरे आगे बढ़ता रहा।
ये देखकर तंत्र वार करता जैकब आश्चर्य से बोला- “ये..ये कोई साधारण तांत्रिक नहीं है, किसी भी तांत्रिक में इतनी शक्ति नहीं हो सकती कि वह हमारे सम्मिलित वारों को झेल सके!”
तंत्र किरणों के घेरे में कैद शक्ति चिल्लाई- “इसके वारों से बचना, इसे महाकाल छिद्र ने विलक्षण शक्तियाँ देकर शक्तिशाली बना दिया है, शायद चंडकाल से भी ज़्यादा शक्तिशाली!”
लेकिन शक्ति ने चेतावनी देने में देर कर दी थी, तब तक अग्रज हवा में उठा और उसके हाथ के एक इशारे से सड़क का वह भाग भी उखड़कर हवा में आ गया जिसपर भेड़िया, सुपर इंडियन, एंथोनी और जैकब खड़े थे। फिर उसने सड़क के उस भाग को हवा में ही गोल गोल घुमाना शुरू किया, फिर अपने दोनों हाथों को आगे करके ऐसा चक्रवात पैदा कर दिया जिसने सभी रक्षकों को फँसा लिया। सभी रक्षक चक्रवात में इतनी तीव्र गति से घूम रहे थे कि उनकी सोचने समझने की शक्ति खत्म होती जा रही थी।
अग्रज तंत्र आवरण में कैद शक्ति से बोला- “अब भी समय है, यदि तुमको त्रिफना के बारे में कुछ भी ज्ञात हो तो मुझे बता दो वरना इनकी हालत और खराब हो जायेगी। मैंने इन्हें किसी मामूली चक्रवात में नहीं बल्कि स्याह ऊर्जा से बने चक्रवात में फँसाया है जिससे ये चाहकर भी नहीं निकल सकते।”

शक्ति को उसकी बात सच मालूम पड़ रही थी क्योंकि चक्रवात में फँसे रक्षक भरसक प्रयास के बाद भी छूट नहीं पा रहे थे, ऊपर से आसपास मौजूद गाड़ियाँ और बिजली के खंभे आदि भी उस चक्रवात की चपेट में आने लगे थे। वह बेबस होकर बोली- “ठीक है, मैं तुमको त्रिफना के बारे में बताऊँगी लेकिन पहले तुम्हें इस चक्रवात को रोकना होगा।”

शक्ति के इतना कहते ही अग्रज का हाथ हवा में एक बार फिर घूमा और चक्रवात थम गया। चक्रवात में फँसे भेड़िया, सुपर इंडियन, एंथोनी और जैकब एकदम अशक्त हो चुके थे।

शक्ति- त्रिफना नागद्वीप पर मौजूद है जो कि इच्छाधारी नागों का द्वीप है। वह ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली इच्छाधारी नाग कालदूत के संरक्षण में है। यह 0 डिग्री अक्षांश और 67.5 डिग्री देशांतर पर स्थित है।
अग्रज- हाहाहा, धन्यवाद शक्ति। इस जानकारी के लिए मैं तुमको जीवित छोड़ना चाहता हूँ लेकिन जब तक रक्षक जीवित रहेंगे तब तक महाकाल छिद्र का स्याह ऊर्जा को ब्रह्मांड में फैलाने का स्वप्न कैसे पूरा होगा? पर मैं अपने वादे का पक्का हूँ, तुम सबको मैं खुद नहीं मारूँगा बल्कि अपने दास को छोड़ जाऊंगा।

इतना कहकर अग्रज ने हवा में हाथ फैलाया और उस हाथ में से उत्पन्न ऊर्जा ने आकार लिया एक हाथी जैसे प्राणी का जो दिखने में भी भयानक लग रहा था।

अग्रज- ये है गजाखू। इसमें इतना बल है कि तुम सबको नष्ट करने के साथ साथ पूरे महानगर में मौत का तांडव मचा सकता है। अब मुझे जाना होगा क्योंकि समय कम है और मुझे नागद्वीप जाकर त्रिफना को ढूँढना है, एक बार त्रिफना मिल जाये तो महाकाल छिद्र को हराने का कोई विकल्प नहीं रह जायेगा।

इतना कहकर अग्रज वहाँ से उड़ता हुआ चला गया लेकिन गजाखू अशक्त पड़े रक्षकों की तरफ भारी कदमों से बढ़ता गया। शक्ति भी परावर्तन तंत्र के अंदर बेबस थी, गजाखू अब तक रक्षकों के बेहद समीप पहुंच चुका था लेकिन इससे पहले की वह अपने भारी भरकम पांवों से उनमें से किसी को कुचल पाता, तेज़ गदा के प्रहार में उसे दूर उछाल दिया था। भेड़िया की कमर पट्टिका ने उसे बाकी नायकों के मुकाबले जल्दी स्वस्थ कर दिया था और वह बहुत अधिक क्रोध में था। बाकी लोग भी अब संभलने लगे थे। भेड़िया गजाखू पर ताबड़तोड़ गदा के प्रहार करता जा रहा था, गजाखू गदा के वारों से पीछे हटता जा रहा था लेकिन अचानक ही उसने गदा का एक तीव्र प्रहार अपने हाथ पर ही रोक लिया और भेड़िया को उछाल फेंका। एंथोनी उस पर ठंडी आग का प्रहार करने लगा लेकिन गजाखू पर उस आग का लेशमात्र भी असर नहीं हुआ, ये देखकर एंथोनी चौंक गया।

एंथोनी- ये क्या? भला संसार में कौन सा ऐसा प्राणी है जिसे नरक की ठंडी आग विचलित ना कर सके?
जैकब- ये कोई असली प्राणी नहीं है एंथोनी, तंत्र ऊर्जा द्वारा निर्मित प्राणी है। तुम्हारी ठंडी आग पीड़ा का अनुभव करवाती है लेकिन इसे पीड़ा का अनुभव तो तब होगा ना जब यह असली जीवित प्राणी होगा।
सुपर इंडियन- तो फिर ठीक है, इसे पीड़ा देने का नहीं बल्कि खत्म करने का प्रयास करते हैं।

सुपर इंडियन ने ब्रेसलेट्स द्वारा बिजली के तेज झटके गजाखू के शरीर में प्रवाहित करने शुरू किए लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। गजाखू दौड़ता हुआ उनकी तरफ आया और एक ही तेज़ वार में तीनों लोगों को हवा में इधर उधर फेंक दिया।

एंथोनी- उफ्फ! ये तो बेहद शक्तिशाली है।
जैकब- इससे निपटने के लिए मुझे भयानक प्रेत रूप में आना होगा। तपनासुर से हुई मुठभेड़ के बाद अब मेरे अंदर इतनी ऊर्जा वापिस संचित हो चुकी है जिससे मैं दोबारा प्रेत रूप में आ सकूँ।
सुपर इंडियन- तो फिर देर किस बात की है?

गजाखू एक बार फिर उन पर हमला करने के लिए तैयार हो रहा था लेकिन इस बार जैकब वापिस अपने भयानक प्रेत रूप में बदलकर उससे भिड़ गया। जैकब ने गजाखू को उठाकर पटक दिया जिसके कारण सड़क भी बुरी तरह टूट गयी, गजाखू ने भी जैकब को घूंसा मारा। तभी एक विलक्षण घटना घटी, घूँसे के स्पर्श मात्र ने जैकब को वापिस उसके सामान्य रूप में बदल दिया। गजाखू उस पर झपटने वाला था पर इससे पहले ही भेड़िया ने पीछे से आकर अपने पंजों से उस पर वार कर दिया। गजाखू का सारा ध्यान भेड़िया पर केंद्रित हो गया, बल में गजाखू भेड़िया से दोगुना था लेकिन भेड़िया चपलता से उसके वारों को बचा जा रहा था।

एंथोनी- तुम ठीक तो हो जैकब? तुम उसके वार से सामान्य कैसे हो गए?
जैकब- इसका कारण तो मैं भी नहीं समझ पा रहा….एक मिनट! ये एक तंत्र प्राणी है, अग्रज ने इसको कुछ सोच समझकर ही हमें मारने भेजा है। ये अपने स्पर्श से किसी भी प्रकार की दूसरी तंत्र ऊर्जा का क्षरण कर सकता है, इसी कारण से मैं वापिस प्रेत रूप में नहीं आ पा रहा हूँ।
एंथोनी- ओह, तंत्र ऊर्जा का प्रयोग हम कर नहीं सकते और ताकत में ये हमसे कई गुना आगे है। शक्ति इसे पलभर में तीसरी आंख द्वारा खत्म कर सकती है लेकिन वह खुद एक तंत्र घेरे में कैद है।
सुपर इंडियन- एक मिनट! शक्ति तंत्र घेरे में कैद है, इसका मतलब इस गजाखू के स्पर्श से वह तंत्र घेरा भी नष्ट हो सकता है क्योंकि वह तंत्र ऊर्जा का क्षरण कर सकता है।
एंथोनी (मुस्कुराकर)- वाह, ध्रुव की संगत का असर हुआ है तुम पर। ये गजाखू मुझे कोई समझदार प्राणी नहीं लग रहा, हम इसका इस्तेमाल शक्ति को स्वतंत्र करवाने के लिए कर सकते हैं।

उधर गजाखू के प्रचंड वारों से भेड़िया का बुरा हाल था। पत्थर जैसे घूंसे उसके शरीर पर जगह जगह पड़कर उसकी हड्डियां चटका दे रहे थे लेकिन फिर भी वह मैदान में डटा हुआ था। तभी ऊँची छलांगें भरता सुपर इंडियन आया और ब्रेसलेट्स द्वारा तीव्र ध्वनि तरंगों का वार गजाखू के ऊपर कर दिया, इतनी तेज आवाज सुनकर वह चिंघाड़ उठा और उसका ध्यान भेड़िया से हटकर सुपर इंडियन पर चला गया। सुपर इंडियन बेहद कुशलता से उसके वारों से बच रहा था और साथ ही साथ उस पर तीव्र ध्वनि तरंगों का वार भी करता जा रहा था। सुपर इंडियन के साथ साथ अब एंथोनी के वार भी सम्मिलित हो गए थे, गजाखू ने ध्यान नहीं दिया कि उन पर वार करने की कोशिश करते करते वह उस जगह पहुँच गया है जहाँ शक्ति परावर्तन तंत्र में कैद थी। एंथोनी और सुपर इंडियन एकदम गजाखू के सामने जा पहुँचे, गजाखू ने बिना सोचे समझे दोनों हाथों से भीषण प्रहार किया लेकिन उसी समय एंथोनी सुपर इंडियन को लेकर वहाँ से गायब हो गया और उसका तेज़ हाथ उस तंत्र घेरे पर पड़ा जिसमें शक्ति कैद थी। गजाखू के स्पर्श के कारण वह तंत्र घेरा पूरी तरह से छिन्न भिन्न हो गया और उसमें से आज़ाद हो गयी शक्ति! शक्ति का तीसरा नेत्र जो बहुत देर से फड़क रहा था, उसका प्रहार उसने सीधे सामने खड़े गजाखू पर किया। गजाखू का पूरा शरीर धू धू कर जल उठा, वह पीड़ा से बुरी तरह चीखने लगा और उसकी पीड़ा तभी शांत हुई जब वह कुछ ही क्षणों में राख के ढेर में बदल गया।

शक्ति बाकी सबकी ओर देखकर बोली- “तुम लोग ठीक तो हो?”

सुपर इंडियन- हम सब तो ठीक हैं लेकिन ये त्रिफना क्या है? महाकाल छिद्र को त्रिफना क्यों चाहिए?
शक्ति- त्रिफना वह शक्ति है जिससे कोई भी व्यक्ति ना सिर्फ एक ब्रह्मांड बल्कि अनेकों ब्रह्मांड, समस्त समयधाराओं पर विजय पा सकता है। यदि त्रिफना महाकाल छिद्र के हाथ लग गया तो वाकई ना सिर्फ मनुष्य बल्कि देवता, यक्ष, गंधर्व आदि को भी उसका दास बनने में पलभर का समय लगेगा। मुझे नागराज को इस बारे में सूचना देनी होगी ताकि वह मानसिक संपर्क स्थापित करके कालदूत को इस विषय में बता सके।
सुपर इंडियन (कुछ सोचते हुए)- यदि त्रिफना इतना ही शक्तिशाली है तो हम उसका प्रयोग क्यों नहीं करते महाकाल छिद्र के खिलाफ?
शक्ति- क्योंकि त्रिफना की शक्तियों को संभालना हँसी खेल नहीं है, समयधाराओं से छेड़छाड़ करने से हमारे पूरे ब्रह्मांड पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है। मैं नागराज को ब्रह्मांड रक्षक फ्रीक्वेंसी द्वारा सूचित करती हूँ।

शक्ति ने ब्रह्मांड रक्षक फ्रीक्वेंसी पर नागराज से संर्पक साधा।

शक्ति- नागराज, एक बहुत बड़ी खबर है, त्रिफना से जुड़ी हुई।
नागराज (दुखी आवाज़ में)- क्या महानगर पर आया खतरा टल गया?
शक्ति- हाँ लेकिन……
नागराज- तो पहले तुम सभी रक्षकों को लेकर अरावली की पहाड़ियों पर बने मठ में आ जाओ शक्ति। फिर से एक दुखद घटना हो गयी है, एक रक्षक इस दुनिया से चला गया है।

इतना कहकर नागराज ने संपर्क काट दिया।

क्रमशः

Written by- Samvart Harshit for Comic Haveli

Disclaimer- These stories are written and published only for entertainment. Comic Haveli writers have no intent to hurt feelings of any person, community or group. If you find anything which hurt you or should not be posted here, please highlight to us so we can review it and take necessary action. Comic Haveli doesn’t want to violate any copyright and these contents are written and created by writers themselves. The content doesn’t carry any commercial profit as they are fan made dedications to the comic industry. If any, name, place or details matches with anyone then it will only be a coincidence.

3 Comments on “Earth 61 Phase 2 Part 20 (First Stage)”

  1. Is Bhaag k release k liye kafi wait tha mujhe but jab ye release hua tab se ghar aur office k kaam me jyada busy ho gaya aaj free hote hi pada aur phir se Samvart bhai ki jabardast kahani ka fan ho gaya

    Syah vivar aur kaalchidra ka description bhaut Acha laga

    Adrak chacha ne jo suraj ko emotion me thappad mara vo to theek tha phir laat se bhi peetne lage vo thoda jyada laga aur jab adrak chacha gambheer ghayal huye to unhe dhananjay swarndwar bana k hospital kyu nahi le gaya kyuki ve jhatke me nahi mare the

    Aur lomdi to kafi kushal hunter h but usko jyada tar koi bachata hua dikhta h ya vo asani se pit jati h

    Anees ka cancer wala roop gajab ka tha

    Superindian ne jo ek musibat se peecha chudane k liye dusri musibat ka hi prayog
    dhruv ki tarah kiya vo bahut acha laga

    Bahut hi gajab mehnat h itni badi gatha likhne me

    10/10

  2. Bahuuuut ReFreshingg part…,
    Actions Descriptions wer Awsum as usual
    ++ Emotions have taken a High Level now

    it seemed Adrkk Chacha liked Abhay/Suraj : 20/19, which makes More Interestingg!!!

    Mythology ko bhi Describe aapse bdhiya koi nhi kr sktaa

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