Earth 61 Phase 2 Part 20 (Second Stage)

तृतीय खंड- धराशायी योद्धा

सूरज की रोशनी फसलों पर पड़ रही थी, जो उनको और अधिक खूबसूरत बना रही थी। हवा के कारण फसलें लहलहा रही थीं, उन्हीं लहलहाती फसलों के बीच 16 वर्ष का सूरज अपने अदरक चाचा के साथ चहकता हुआ खेल रहा था।

सूरज- चाचा आप कभी मुझे छोड़कर तो नहीं जाएंगे ना?
अदरक- नहीं बेटे, मैं हमेशा तेरे पास रहूँगा।

तभी अचानक आसमान में कहीं बेहद तीव्र प्रकाश दिखाई दिया, अदरक को वह प्रकाश धीरे धीरे अपनी तरफ खींचने लगा। अदरक के पैर धीरे धीरे हवा में उठने लगे और वह आसमान की ओर उड़ते हुए जाने लगे।

अदरक- सूरज! मैं और नहीं रुक पाऊंगा बेटे, अपना ख्याल रखना।

सूरज रोता हुआ उनके पीछे भागा- “नहीं चाचा! आप मेरे पिता के साथ साथ मेरे गुरु भी हैं, मैं आपके बिना क्या करूँगा? रुक जाइये चाचा, रुक जाइये!”

तब तक अदरक चाचा आसमान में चमकती उस तीव्र रोशनी में कहीं खो चुके थे। सूरज को तभी एक और आवाज़ सुनाई दी- “सूरज! तुम हमेशा मेरे सबसे अच्छे दोस्त रहोगे!”

उसने मुड़कर देखा कि सोलह वर्ष का अभय उसके पीछे खड़ा था। यही वह उम्र थी जब वह पहली बार मिले थे। अभय भी धीरे धीरे उठता हुआ आसमान में चमकती उस रोशनी की तरफ बढ़ने लगा, यह देखकर सूरज चीख उठा- “ऐसा नहीं हो सकता! आप दोनों ही मुझे छोड़कर नहीं जा सकते! नहीं जा सकते आप!”

“नहीं!” चीखता हुआ सूरज अचानक से ही सपनों की उस दुनिया से निकलकर यथार्थ के धरातल पर वापिस आ चुका था। उसके शरीर पर अभी भी उसकी पोशाक थी लेकिन चेहरे पर अब डोगा का नकाब नहीं था, विचारों के झंझावात ने एक बार फिर से उसकी आँखें नम कर दी थीं। मोनिका जो लोमड़ी की पोशाक में ठीक उसके बगल में खड़ी थी उसने धीरे से पूछा- “क्या तुम ठीक हो सूरज?”

सूरज ने हल्के से सिर हिला दिया। मोनिका,सूरज, धनंजय, ध्रुव, नागराज, परमाणु, हल्दी, धनिया, काली और चीता मठ की बाकी जनता के सामने एक बड़े से मंच पर खड़े थे। ये मंच मठ के सर्वोत्तम योद्धाओं को वीरगति प्राप्त होने पर उनके सम्मान समारोह के लिए उपयोग किया जाता था ताकि मठाधीश उनके बारे में चंद शब्द बोलकर उन्हें सम्मानित कर सकें। मठ की साधारण जनता से लेकर खूँखार से खूँखार हन्टर्स तक सबकी आंखें नम थीं, मठाधीश ध्रुव जनता को संबोधित करने के लिए आगे बढ़े।

ध्रुव- ये मेरा दुर्भाग्य है कि कभी मुझे अपने कार्यकाल में काले डकैतों के साथ काम करने का मौका नहीं मिला। हालांकि मैं उनके बारे में सुनता बहुत था लेकिन जब तक आपको एक योद्धा के साथ युद्ध करने का अवसर नहीं मिलता तब तक आप उस योद्धा को अच्छी तरह नहीं जान पाते। इस मामले में मैं खुशकिस्मत रहा कि मुझे अदरक जी के साथ काम करने का अवसर मिला, वो अदरक जो कभी मठाधीश के पद के प्रबल दावेदार हुआ करते थे, वो अदरक जो मठ छोड़ने के बाद भी मठ की जनता के बारे में सोचा करते थे, वो अदरक जिनके रहते कभी बाहरी ताकतों की जुर्रत नहीं हुई कि मठ की तरफ आँख उठाकर देख सकें, वो अदरक जिन्होंने जीवन पर्यंत गौरांगी से निस्वार्थ भाव से प्रेम किया ये जानते हुए भी कि वे कभी इस जीवन में एक नहीं हो पाएंगे। आखिर ऐसे योद्धा के साथ एक युद्ध लड़ने का अवसर प्राप्त होना भी मेरे लिए गौरव की बात थी पर अफसोस कि मेरे सामने ही वह महान योद्धा धराशायी हो गया, फिर कभी ना उठने के लिए। वो चाहते थे कि उनके पार्थिव शरीर को मठ की धरती पर ही दो ग़ज़ ज़मीन दी जाए तो मेरी भला क्या बिसात की उनका आदेश टाल सकूँ, उनका अधिकार उनको अवश्य सौंपा जाएगा और हन्टर्स के इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों द्वारा अंकित किया जाएगा। अदरक जी के साथ ही वीरगति को प्राप्त हो गया इस मठ का एक और अद्वितीय योद्धा जो यहाँ अंगरक्षक अभय के नाम से जाना जाता था और बाहर देशभक्त डिटेक्टिव तिरंगा के नाम से, अभय ने हमेशा धरती की रक्षा को सर्वोपरि रखा, चाहे वो मठ की धरती हो या देश की, वह कभी अपने कर्तव्यों के निर्वाहन से पीछे नहीं हटा………..अपनी आखिरी साँस तक भी नहीं। इन दोनों योद्धाओं के सम्मान के लिए शब्द कम पड़ जाएंगे और जो महायुद्ध हम लड़ने जा रहे हैं उसमें न जाने और कितने योद्धा शहीद हो जाएंगे लेकिन हम हार नहीं मानेंगे। मेरे साथी हन्टर्स और मैं इस मठ की रक्षा के लिए बड़े से बड़े खतरे से भी भिड़ जाएंगे, चाहे जान जाए या रहे लेकिन अंतिम श्वास तक धरती की रक्षा करेंगे हम!

ध्रुव के आखिरी वाक्य तक नम हुई आँखें जोश से परिपूर्ण हो गयी थीं। सभी एक स्वर में बोले- “हाँ, हम धरती की रक्षा के लिए बड़े से बड़े खतरे से भिड़ जाएंगे!”

फिर एक बड़े से शानदार ताबूत को लाया गया जिसका ऊपरी खोल पारदर्शी था, ताबूत के अंदर मौजूद निष्प्राण अदरक चाचा सबको दिखाई दे रहे थे, ये दृश्य देखकर कई आँखों से फिर आँसू बहने लगे।

धनिया रोते हुए बोले- “इनके चेहरे का तेज अभी तक बरकरार है, ऐसा लगता है कि अभी उठ खड़े होंगे और मुझे डाँटने लगेंगे।”

काली- हमारा भाई मरा नहीं है धनिया, वो अमर हो गया है।
हल्दी- मृत्यु भी हमारे भाई के चेहरे से सुकून नहीं छीन पायी, ऐसा लग रहा है मानो चैन की नींद सो रहे हों।

मोनिका शांत खड़े सूरज के पास डोगा का मास्क लेकर गई। सूरज के चेहरे पर दुख और आक्रोश के भाव एक साथ थे, मोनिका बोली- “यह मास्क पहन लो सूरज! इस जंग में हमें डोगा की ज़रूरत पड़ेगी।”

सूरज- जंग तो मैं लडूँगा मोनिका लेकिन यह मास्क पहनकर नहीं।
मोनिका- लेकिन क्यों?
सूरज- ये मास्क सिर्फ एक मास्क नहीं था बल्कि एक जरिया था सूरज और डोगा के जीवन को अलग अलग रखने का ताकि डोगा की क्रूरता का असर सूरज के जीवन पर ना पड़े लेकिन अब जब मेरा भाई जैसा दोस्त और मेरे पिता समान अदरक चाचा ही नहीं रहे तो भला इस मास्क का क्या उपयोग? अब से सूरज ही डोगा है और डोगा ही सूरज है, जिन तामसिक शक्तियों की वजह से अभय और अदरक चाचा आज हमारे साथ नहीं हैं उन्हें धूल में मिला दूँगा मैं क्योंकि डोगा समस्या को सुलझाता नहीं बल्कि जड़ से उखाड़ फेंकता है।

ध्रुव सबसे अलग थलग खड़े नागराज के पास पहुँचा।

ध्रुव- क्या सोच रहे हो नागराज?
नागराज- यही की मेरी वजह से डोगा और काले डकैतों को कितना कुछ सहना पड़ा और अदरक जी ने अपने आखिरी वक्त में क्या किया? अपनी जान देकर मेरी जान बचाई? अगर अदरक उस वक्त कैंसर उर्फ अनीस का ध्यान नहीं बंटाते तो वह मेरे शरीर के टुकड़े टुकड़े कर सकता था और मैंने क्या किया? मुम्बई पहुँचकर इन्हीं लोगों पर हमला किया था? आज वाकई अपने आपको नायक कहते हुए शर्म आ रही है, असली नायक तो तिरंगा और अदरक जैसे लोग हैं जो आज हमारे बीच नहीं हैं।
ध्रुव- तो उनकी स्मृति का सम्मान करो नागराज, मुँहतोड़ जवाब दो उन तामसिक शक्तियों को जो इनकी मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार हैं।

तभी उन्होंने देखा कि शक्ति सुपर इंडियन, भेड़िया, एंथोनी और जैकब को लेकर मठ की धरती पर आ पहुँची थी।

वह नागराज और ध्रुव की तरफ बढ़ते हुए बोली- “मैं जानती हूँ कि ये सही समय नहीं है लेकिन कुछ ऐसा है जो तुम दोनों का जानना बहुत ज़रूरी है।”

फिर उसने उन दोनों को अग्रज के हमले और त्रिफना की उसकी खोज के बारे में सब बता दिया।

नागराज (हैरानी से)- क्या? महाकाल छिद्र को त्रिफना चाहिए?
ध्रुव- वह ज़रूर सभी समयधाराओं में स्याह ऊर्जा को फैलाना चाहता होगा, त्रिफना अगर उसके हाथ लगा तो एक ब्रह्मांड नहीं, कई ब्रह्मांड उसके कब्जे में होंगे।
नागराज- मैं तुरंत महात्मा कालदूत से संपर्क करता हूँ, उनको बताना होगा कि नागद्वीप पर हमला होने वाला है ताकि वे सतर्क रहें। धनंजय से कहकर स्वर्णनगरी के देवों को भी सहायता के लिए बुलाना होगा, हमें नहीं पता कि इस महायुद्ध में जीत किसकी होगी लेकिन अब हमें पृथ्वी की हर छोटी बड़ी ताकत को इकट्ठा करना होगा ताकि पूरे जीजान से युद्ध कर सकें।

स्वर्गलोक में देवताओं और असुरों के बीच भयानक जंग छिड़ी हुई थी। इतना भीषण संग्राम हो रहा था जो समस्त सृष्टि को दहलाने की क्षमता रखता था, असुरराज शंभूक और देवराज इंद्र की टक्कर बहुत भयानक थी।

शंभूक- हम असुरों को सदैव ही इस अवसर की प्रतीक्षा थी, स्याह शक्तियों के जनक महाकाल छिद्र का स्वतंत्र होना इस बात का संकेत है कि शीघ्र ही ना केवल स्वर्गलोक वरन सम्पूर्ण सृष्टि पर हमारा वर्चस्व फैलने वाला है।
इंद्र- देवता तुमसे कहीं अधिक शक्तिशाली हैं मूर्खों! तुम पूर्व में भी कभी विजयी नहीं हुए और इस समय भी नहीं हो पाओगे।

इतना कहकर इंद्र ने वज्र का भरपूर प्रहार शंभूक के शरीर पर किया जिससे शंभूक बुरी तरह घायल हो गया।

इंद्र- बस वज्र का एक प्रहार और, फिर तेरा अस्तित्व ही मिट जाएगा। तुम असुर तो देवताओं की तरह अमर भी नहीं हो जो जानलेवा प्रहारों से बच पाओ।

इससे पहले की इंद्र वज्र का दूसरा प्रहार शंभूक पर करते, किसी प्राणी की बहुत बड़ी छाया ने पूरे स्वर्ग को ढक लिया। जब सबने मुड़कर देखा तो उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही, स्याह विवर अपने विशाल रूप में महाकाल छिद्र के साथ देवासुर संग्राम के हिस्सा बनने आ चुका था। स्याह विवर के चमगादड़ के समान दो पंख थे और हर एक पंख का आकार एक महानगर जितना था, उसके इस वृहदाकार को देखकर ही कई देवताओं को मूर्छा आने लगी थी। असुरों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी थी, स्याह विवर ने अपने विशाल नथुनों में हवा खींची और इसी के साथ कई देवता खींचते हुए उसके नथुनों में चले गए।

महाकाल छिद्र- ये सही है कि तुम देवता अमर होते हो लेकिन तुमको बंदी तो बनाया ही जा सकता है जैसे तुमने मुझको पाप क्षेत्र में बंदी बनाया था वैसे ही अब तुम सब भी हमारे बंधक बनोगे, स्याह विवर का विशाल ऊदर (पेट) बनेगा तुम्हारा कारावास।

स्याह विवर ने एक बार फिर नथुनों में साँस भरी और कई देवतागण उस साँस के साथ खिंचकर उसके ऊदर में पहुँच गए। देवताओं को बचाने के लिए देवराज इंद्र ने वज्र द्वारा स्याह विवर का ऊदर फाड़ने का प्रयत्न करने लगे लेकिन तभी उनके शरीर से अति भीषण स्याह ऊर्जा का प्रहार आकर टकराया जो कि महाकाल छिद्र ने किया था।

महाकाल छिद्र- तुम देवतागण सृष्टि की सबसे प्राचीन स्याह शक्तियों को समाप्त करने का विचार भी अपने मन में कैसे ला सकते हो? अब एक ही मार्ग शेष है देवराज इंद्र, स्वर्ग का सिंहासन मेरे भक्त शंभूक को सौंप दो और हमारी सत्ता स्वीकार कर लो। जिस युद्ध में पराजय तय है वह युद्ध लड़ने का कोई अर्थ नहीं।

देवराज इंद्र ने अपने चारों ओर देखा, जितने भी देवता बचे थे उनमें से अधिकांश के चेहरे पर भय व्याप्त था और जितने लोग बहादुरी से अंतिम श्वास तक युद्ध करना चाहते थे वे भी मन ही मन जानते थे कि हारा हुआ युद्ध लड़ने का कोई अर्थ नहीं।

देवराज इंद्र ने महाकाल छिद्र की ओर देखकर कहा- “ठीक है महाकाल छिद्र, यदि ये मेरी प्रजा के हित में है तो मैं स्वर्ग की सत्ता शंभूक को सौंपकर तुम्हारा बंधक बनने को तैयार हूँ।”

असुरों की प्रसन्नता का कोई ठिकाना ही नहीं था, चारों ओर से “महाकाल छिद्र की जय! महान स्याह विवर की जय!” के नारे गुँजायमान होने लगे।

महाकाल छिद्र (असुरों की ओर देखकर)- यह तो हमारी विजय का प्रथम चरण है, हमारा युद्ध देवताओं, मानवों, यक्ष, गंधर्व आदि से नहीं बल्कि त्रिदेवों से है। श्वेत ऊर्जा के हर उस धारक से है जो पुण्य की रक्षा करना चाहता है, उन सबको वश में करने के लिए मुझे त्रिदेवों की सम्मिलित शक्ति द्वारा निर्मित त्रिफना चाहिए जो कि पृथ्वी पर ही कहीं है। फिर मैं स्याह ऊर्जा की कालिमा को एक ब्रह्मांड में नहीं बल्कि अनेकों ब्रह्मांड में फैला सकता हूँ।

तभी अचानक महाकाल छिद्र को अग्रज का मानसिक संदेश प्राप्त हुआ, “अपने परम भक्त का अभिवादन स्वीकार करें महाकाल छिद्र, मुझे त्रिफना की स्थिति ज्ञात हो गयी है। वह नागद्वीप नामक एक स्थान पर है, मैं उसे प्राप्त करने के लिए उसी ओर बढ़ रहा हूँ।”
महाकाल छिद्र ने अग्रज से मानसिक संपर्क स्थापित करके उसे उत्तर दिया- “बहुत अच्छे वत्स, तुमने मेरी आशा के अनुसार कार्य किया है! मैं स्याह ऊर्जा से निर्मित सबसे शक्तिशाली दासों को तुम्हारी सहायता करने भेजूँगा, भले ही इसके लिए मुझे कितनी ही स्याह ऊर्जा क्यों न व्यय करनी पड़े पर मैं त्रिफना को प्राप्त करके रहूँगा!”

चतुर्थ खंड- रण

बहुत ही अनुपम दृश्य था वह, नागद्वीप पर भी ऐसा दृश्य कभी देखने को नहीं मिला था। अलग अलग प्रजातियों के इच्छाधारी सर्प एक ही जगह पर एकजुट हो गए थे, उनके सामने एक ऊँची सी मचान पर खड़े थे नागसाम्राज्ञी विसर्पी और महात्मा कालदूत।
विसर्पी ने बुलंद आवाज़ में बोलना शुरू किया- “ये शायद ना सिर्फ मानवों का, ना सिर्फ इच्छाधारी नागों का बल्कि शायद हर प्रकार की पुण्य शक्ति का सबसे कठिन समय है! दो महाशक्तियाँ पाप क्षेत्र की कैद से आज़ाद हो गयी हैं और उनके अनुयायी पूरे ब्रह्मांड पर कब्ज़ा करना चाहते हैं। नागसम्राट नागराज भी इसी सिलसिले में नागद्वीप से बाहर गए हुए थे कि उन्हें उन पाप शक्तियों की मंशा का पता चले, नागराज ने कुछ ही समय पहले महात्मा कालदूत को संपर्क साधकर बताया है कि महाकाल छिद्र ने अपने एक अनुयायी अग्रज को त्रिफना लाने यहाँ पर भेजा है, मतलब स्पष्ट है कि वह हर समयधारा पर कब्ज़ा करना चाहता है। अग्रज आएगा तो अकेला नहीं होगा उसके साथ महाकाल छिद्र की सेना होगी, हमें हर हाल में उनका सामना करके त्रिफना को सुरक्षित करना है, अपनी अंतिम साँस तक त्रिफना को महाकाल छिद्र के हाथ नहीं लगने देंगे हम!”

अलग अलग प्रजाति की सभी नागसेनाओं में जोश का संचार हो गया, वे एक स्वर में बोल उठे- “त्रिफना की रक्षा से बढ़कर अभी कुछ नहीं है! हम प्राण दे देंगे पर त्रिफना नहीं!”

विसर्पी- मुझे यही उम्मीद थी आप सबसे, अब महात्मा कालदूत आप सबको हमारी रणनीति के बारे में बताएंगे।

इतना कहकर विसर्पी थोड़ा पीछे हटी और कालदूत आगे आकर बोले- “इस युद्ध में भीषण रक्तपात होने की संभावना है, मैं इस बात से मना नहीं करूँगा लेकिन हमें किसी भी कीमत पर युद्ध की चपेट में निर्दोष नागद्वीपवासियों को आने से बचाना होगा इसके लिए हमें यह युद्ध नागद्वीप की परिधि से थोड़ा बाहर रहकर लड़ना होगा। प्रस्तर सर्प अपनी प्रजाति के सर्प योद्धाओं के साथ अग्र शेषनाग द्वीप पर रहेंगे, इनका अडिग शरीर शत्रु के पहले धावे की तीव्रता को रोकेगा। धूम्र सर्पों का कबीला ठीक उनके पीछे के सौ द्वीपों पर तैनात रहेगा क्योंकि उन पर कोई भी जैविक या विध्वंसक वार असर नहीं करता। गुंथी सर्पों का कबीला पश्चिम के द्वीपों से नागद्वीप की रक्षा करेगा, इनके असाधारण मजबूत शरीरों से बने जाल पूर्ण गति से उड़ते वायुयान को भी रोक सकते हैं। पूर्वी दिशा में स्वयं नाग साम्राज्ञी विसर्पी पंचनागों और बाकी बचे सैनिकों के साथ तैनात रहेंगी। मैं जल के भीतर रहकर सभी क्षेत्रों पर नज़र रखूँगा, कोई भी खतरा जलगत होकर जाने का प्रयास करेगा तो मैं उसे रोकूंगा, अब बस हमें उस हमले की प्रतीक्षा करनी है जो किसी भी पल हो सकता है।”

शीघ्र ही समस्त नागयोद्धा अपनी अपनी जगह ले चुके थे और उस हमले की प्रतीक्षा कर रहे थे जो किसी भी पल नागद्वीप पर हो सकता था। अचानक से ही शांत समुद्र में हलचल होने लगी, अपने आप पानी में उथल पुथल मचने लगी। प्रस्तर सर्पों के सेनापति ने जल के अंदर महात्मा कालदूत से मानसिक संपर्क साधकर कहा- “तैयार हो जाइए महात्मन! महाकाल छिद्र की सेना इसी ओर बढ़ रही है!”

वाकई में बेहद विलक्षण सेना थी वह जो अग्रज के नेतृत्व में नागद्वीप की ओर बढ़ रही थी। अलग अलग विशेषताओं वाले राक्षसों का निर्माण किया था महाकाल छिद्र ने जो समुद्र के थोड़ा सा ऊपर से उड़ते हुए वायुवेग से नागद्वीप की ओर बढ़ रहे थे। अग्रज को दूर से ही प्रस्तर सर्प दृष्टिगोचर हो गए थे जो उनको रोकने की पूरी तैयारी में थे, अग्रज ने अपनी स्याह शक्तियों द्वारा समुद्र की लहरों को उठाया और प्रस्तर सर्पों पर पूरे वेग से वार किया लेकिन चट्टानी शरीर वाले प्रस्तर सर्प टस से मस भी नहीं हुए।

अग्रज ये देखकर अपनी सेना के एक पाषाण जैसे विशाल आकार के असुर से बोला- “शिलाधारी! ये परखने के समय आ गया है कि कौन अधिक अभेद्य है, ये लोग या तुम।”

शिलाधारी प्रस्तर सर्पों पर काल की मानिंद लपका, उसका आकार लंबे चौड़े प्रस्तर सर्पों से भी दस गुना अधिक था। कुछ प्रस्तर सर्पों ने उसका सामना करने का प्रयास किया लेकिन उसके मुष्टि प्रहारों से ही उनका चट्टानी शरीर बुरी तरह खील खील हो रहा था। शिलाधारी ने कई प्रस्तर सर्पों को तो अपने पैरों तले रौंद डाला था। प्रस्तर सर्प की अपेक्षा उसका बल अतुलनीय था इसलिए जल्द ही उनकी सेना में खलबली मच गई, उन्होंने अपने चमत्कारी आयुध प्रयोग करने की ठानी। प्रस्तर सर्पों के सेनापति ने अपना विशाल गांडीव उठाया और एक विलक्षण तीर द्वारा शिलाधारी पर वार किया, उस तीर में से आकाश को कंपा देने वाली बिजली निकली जो शिलाधारी के शरीर को बेध गई। उसका शरीर खील खील हो गया, ये देखकर बाकी प्रस्तर सर्पों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी।
अग्रज क्रोधित होकर बोला- “इतना प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं है, शिलाधारी तुमसे जीत नहीं पाया लेकिन तुम्हारी काट मुझे पता चल चुकी है, अब इन व्यवासुरों से बचकर दिखाओ!”

अग्रज के इशारे पर तीन चार नीले रंग के सामान्य आकार के असुर प्रस्तर सर्पों की तरफ बढ़े, प्रस्तर सर्पों में अब तक अति आत्मविश्वास आ चुका था, उन्हें लगा कि जब शिलाधारी जैसी प्रचंड शक्ति का खात्मा कर सकते हैं तो इनको तो चुटकियों में मसल देंगे। वे प्रहार करने के लिए आगे बढ़े की तभी अचानक व्यवासुरों ने हाथों को घुमाना शुरू किया जिससे आसपास की हवा उनके हाथों के पास संचयित होना शुरू हुई, धीरे धीरे इतनी हवा संचयित हो गयी कि वे हाथों से तीव्र तूफानी हवा का प्रहार करके प्रस्तर सर्पों के शरीरों को तोड़ने लगे, उनके सेनापति ने फिर से चमत्कारी गांडीव का प्रयोग करने की सोची लेकिन तीव्र हवा के कारण उसके हाथ से गांडीव ही उड़ गया। व्यवासुरों के हाथों से उत्पन्न हवा का दाब इतना तीव्र था कि ना तो प्रस्तर सर्प उनके पास जाकर प्रहार कर सकते थे और ना ही अपने शरीरों को टूटने से बचा सकते थे, वे पूरी तरह असहाय हो चुके थे। तभी अचानक अग्र शेषनाग द्वीप के पीछे वाले द्वीपों पर तैनात धूम्र सर्प भी उनकी सहायता को आ गए लेकिन व्यवासुरों के तूफानी हवा के वारों के कारण उनका धुएँ से निर्मित शरीर भी छितराने लगा। धूम्र सर्पों का शरीर विषैले धुएँ का बना था, व्यवासुर उन्हें तेज़ी से खत्म करने में सक्षम तो थे लेकिन विषैला धुआँ वातावरण में फैलने से उन्हें साँस लेने में दिक्कत आ रही थी। एक व्यवासुर जो सबसे आगे बढ़कर प्रस्तर सर्पों और धूम्र सर्पों के शरीर को तेज हवा द्वारा छितरा रहा था, वह हाथों से पैदा होते तीव्र हवा के वेग को एक ही दिशा में केंद्रित रख पा रहा था जिससे हमला करते प्रस्तर सर्प और धूम्र सर्प उसकी तरफ नहीं बढ़ पा रहे थे लेकिन धूम्र सर्पों के शरीर को खंड खंड करने से वातावरण में इतना अधिक विषैला धुआँ फैल गया जिसके कारण उसका दम बुरी तरह घुटने लगा, उसने तूफान को प्रस्तर और धूम्र सर्पों के हमले की ओर केंद्रित ना करके अपने आसपास के धुएँ को छितराने लगा ताकि उसे साफ हवा मिल पाए लेकिन इसी मौके का फायदा उठाकर एक प्रस्तर सर्प तेज़ी से उसके पास पहुँचा और उसको अपने पैरों तले कुचल दिया। यह देखकर बाकी व्यवासुर बेहद क्रोधित हो गए और वे वायु के वेग को अपनी शक्ति के एक एक कतरे का इस्तेमाल करते हुए बढ़ाने लगे जिससे सर्प उन तक हमले के लिए भी ना पहुँच पायें और उनके आसपास की विषैली हवा भी छितर जाए। लंबी खिंचती इस मुठभेड़ के कारण अग्रज को अवसर मिल गया इधर उधर ध्यान देने का, उसने देखा कि आसपास के सभी द्वीपों पर इच्छाधारी सैनिकों का दस्ता तैयार है, उसने मन ही मन सोचा-
“ओह! तो इन्हें मेरे आगमन के बारे में पहले से पता था इसलिए इतना सटीक व्यूह रचकर युद्ध कर रहे हैं ये। मुझे नागद्वीप के बारे में शक्ति ने बताया था ज़रूर उसने ही किसी प्रकार से इन सबको मेरे बारे में सूचित किया होगा जिसका अर्थ ये हुआ कि वह मेरे परावर्तन तंत्र से बच गयी। खैर, इन सब व्यर्थ के विचारों से अच्छा मैं त्रिफना को पाने पर ध्यान लगाऊँ, भले ही ये इच्छाधारी नाग कैसा भी व्यूह बना लें पर अग्रज को नहीं रोक सकते।”

अग्रज बाकी राक्षस सेना की तरफ मुड़कर बोला
– “साथियों इस प्रकार से हमें एक मोर्चे पर लड़ते नहीं रहना, इच्छाधारियों ने हमारे लिए अलग अलग मोर्चों पर सैनिक तैनात किए हैं, हमें भी एक साथ अलग अलग मोर्चों पर लड़ना होगा। चारों दिशाओं में फैलकर इन इच्छाधारियों को मुँहतोड़ जवाब देना होगा!”

अग्रज के आदेश पर उनकी राक्षस सेना इधर उधर फैलकर पूर्वी और पश्चिमी द्वीपों पर भी हमला करने लगी। युद्ध अब बेहद विस्तृत स्तर पर पहुँच गया था। पश्चिम के द्वीपों पर स्थित गुंथी सर्पों का जाल राक्षसों को आगे बढ़ने का अवसर नहीं दे रहा था, राक्षसों और गुंथी सर्पों में राक्षसों का पलड़ा ही भारी था लेकिन पूर्वी द्वीप पर पहुँचे राक्षसों को तो जैसे काल ने साक्षात न्योता दे दिया था क्योंकि नागसाम्राज्ञी विसर्पी अपने राजदंड की शक्ति से राक्षसों का तेजी से खात्मा कर रहीं थीं, साथ ही नागद्वीप के सबसे कुशल योद्धा पंचनाग भी बेहद कुशलता के साथ राक्षसों का खात्मा करने में जुट गए थे।
अग्रज समुद्र के कुछ फ़ीट ऊपर हवा में स्थिर रहकर पूरी परिस्थिति पर नज़र रखे हुए था, तभी अचानक से समुद्र से निकले कालदूत ने उसकी गर्दन को फुर्ती से कालसर्पी के शिकंजे में लिया और उसे भी खींचकर समुद्र के नीचे ले गए। ऊपरी सतह के साथ साथ समुद्र की सतह के नीचे भी अब महायोद्धा कालदूत और अग्रज का अनोखा द्वंद शुरू हो चुका था। कालसर्पी की पकड़ अग्रज की गर्दन पर कसती ही जा रही थी, वह पूरी ताकत लगाकर भी कालसर्पी की कैद से छूट नहीं पा रहा था। कालदूत ने उसका अंत करने के लिए चीरचला को कसकर अपने हाथों में पकड़ा और उसके शरीर पर पूरी ताकत से वार किया, समुद्र में भीषण उफान आ गया, पानी की हलचल जब स्थिर हुई तो कालदूत ने देखा कि अग्रज के शरीर पर चीरचला का कोई असर नहीं हुआ, उन्हें हज़ारों वर्ष पूर्व का वह वाकया याद आ गया जब चंडकाल के वज्र जैसे शरीर पर भी चीरचला का कोई असर नहीं हुआ था। तभी अग्रज ने अपने हाथों को फैलाया और तंत्र किरणों के जाल ने उसके और कालदूत के शरीर को ढक लिया, कालदूत को समझ में ही नहीं आया कि ये क्या हो रहा है कि तभी उन्होंने देखा कि कालसर्पी अपने आप ढीला पड़ गया और अग्रज की गर्दन छोड़ दी। ये देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ, तंत्र किरणों के उस जाल के अंदर समुद्र का पानी भी नहीं आ पा रहा था जिसके कारण अग्रज और कालदूत बात करने में सक्षम थे।

कालदूत- ये..ये कैसा तंत्र है जिसने कालसर्पी को ही बेबस कर दिया?
अग्रज- मुझे लग ही रहा था कि इच्छाधारी शक्ति के साथ तुम दैवीय शक्तियों के भी धारक हो सर्प इसलिए मैंने इस तंत्र की रचना की जिसके अंदर दैवीय ऊर्जा काम नहीं करती।
कालदूत (क्रोध से)- दैवीय ऊर्जा काम नहीं करेगी तो क्या, इच्छाधारी शक्ति तो अभी भी मेरे पास ही है। मैं उसी से तेरा नाश करूँगा!

इतना कहकर कालदूत ने अग्रज के शरीर को अपनी कुंडली में जकड़ लिया और धीरे धीरे कुंडली को और अधिक कसने लगे, जिस कुंडली की जकड़ से फौलाद को चकनाचूर होने में समय नहीं लगता था वह अग्रज के शरीर पर असर नहीं डाल पा रही थी। अग्रज ने दोनों हाथों का इस्तेमाल करके कुंडली खोली और दोनों हाथों से दुम पकड़कर कालदूत को दूर छिटक दिया। फिर हाथों से स्याह ऊर्जा का जोरदार वार कालदूत पर किया जिससे वो अचेत हो गए। कालदूत ने अचेत शरीर को समुद्र में छोड़कर अग्रज फिर से उड़ता हुआ समुद्र से बाहर आ गया, उसने देखा कि व्यवासुरों ने प्रस्तर सर्पों और धूम्र सर्पों के संयुक्त हमले को विफल कर दिया था। पश्चिमी द्वीप पर गुंथी सर्पी राक्षसों को पूरे जीजान से टक्कर दे रहे थे लेकिन राक्षसों के संयुक्त हमले के कारण उनका अवरोध भी कमजोर पड़ने लगा था। पूर्वी दिशा में नागसाम्राज्ञी विसर्पी और पंचनाग राक्षसों का डटकर मुकाबला कर रहे थे लेकिन उन्हें भी थकान का अनुभव होने लगा था। अग्रज की जीत के आसार निकट ही थे कि तभी अचानक से बीच हवा में एक बड़ा सा गोलाकार द्वार और खुला उसमें से निकले स्वर्णनगरी के योद्धा, उनका नेतृत्व करता धनंजय और ब्रह्मांड रक्षक। ये देखकर अग्रज एकदम हतप्रभ रह गया, ऐसे अप्रत्याशित हमले की उम्मीद उसे नहीं थी।
स्वर्णनगरी के योद्धा छोटे छोटे उड़न यंत्रों पर सवार होकर आए थे जिससे उन्हें समुद्र के ऊपर उड़ने में मदद मिल रही थी। उड़ने की काबिलियत ना रखने वाले ब्रह्मांड रक्षक भी ऐसे ही उड़ने वाले यंत्रों पर सवार थे। इन यंत्रों को चलाना एकदम मोटरसाइकिल चलाने जैसा था, चलाने वाले के सामने एक छोटा सा कीबोर्ड जैसा लगा हुआ था जिसके अलग अलग बटन दबाने पर यान का अग्रिम हिस्सा खुल जाता था और उसमें से भिन्न भिन्न यंत्र बाहर की ओर आकर घातक हमला करते थे। इनके आगमन से युद्ध का पासा एकदम ही पलट चुका था, बचे खुचे नागयोद्धाओं के चेहरे पर एक बार फिर से रौनक आ गयी थी, थके हुए इच्छाधारियों में अपने नागसम्राट नागराज को देखकर एक बार फिर जोश का संचार हो गया था।

ऐसे ही एक उड़न यान पर सवार ध्रुव ने धनंजय से कहा- “स्वर्णनगरी के योद्धाओं को लाने के लिए धन्यवाद धनंजय लेकिन अभी तुम्हें एक और ज़रूरी काम करना है।”

धनंजय- जानता हूँ ध्रुव, मुझे बिना समय गंवाये जाना चाहिए।

इतना कहकर धनंजय गोलाकार द्वार बनाकर दोबारा किसी दूसरे स्थान के लिए रवाना हो गया।
पूर्वी द्वीप पर लड़ रहे नागयोद्धा अभी भी इस पूरे प्रकरण से अनभिज्ञ थे क्योंकि भारी तादाद में आते राक्षसों को खत्म करने में ही उनका सारा ध्यान लगा हुआ था। नागसाम्राज्ञी विसर्पी अभी तक राजदंड की शक्ति से न जाने कितने ही राक्षसों का संहार कर चुकी थी, पंचनाग भी पूरी शक्ति से जुटे हुए थे लेकिन तभी एक दस फ़ीट के बलिष्ठ सींगधारी हरे राक्षस ने विसर्पी को पीछे से आकर मुक्का जड़ दिया। पहले से ही बुरी तरह थकी विसर्पी ये वार ना झेल सकी और आगे की ओर गिर पड़ी, राजदंड भी छूटकर एक तरफ गिर गया। पंचनागों का ध्यान भी जंग से हटकर उस ओर चला गया और यही चूक उन पर बहुत भारी पड़ गयी, राक्षसों के एक साथ हुए संयुक्त हमले ने फिर उन्हें संभलने का मौका ना दिया और उन पर एक के बाद एक भीषण वार करके बुरी तरह अशक्त कर दिया। अब एक तरफ सभी पंचनाग बुरी तरह अशक्त होकर धराशायी पड़े थे तो एक तरफ विसर्पी, वह सींगधारी राक्षस ठहाका लगाता हुआ बोला- “हाहाहा, ये सभी महाकाल छिद्र की राक्षस सेना से भिड़ने चले थे। खत्म कर दो इन सभी को और नागद्वीप की तरफ से आने वाले हर अवरोध को ऐसे ही रौंद डालो!”

राक्षस पंचनागों और विसर्पी की तरफ आगे बढ़े और उनमें से कोई भी अपनी रक्षा कर पाने में फिलहाल समर्थ नहीं था। तभी अचानक कहीं से तीव्र हरी विष दाह से भरी लहर आयी और आगे बढ़ रहे राक्षसों के शरीर को कंकाल में बदल दिया। बाकी राक्षसों ने ऊपर आकाश की तरफ देखा जहाँ बेहद क्रोधित नागराज दहकते हुए नेत्रों के साथ हवा में स्थिर खड़ा था।

वह सींगधारी राक्षस क्रोधित होकर बोला- “मेरे साथियों को मारकर तूने अपनी मृत्यु को न्यौता दिया है मानव!”

नागराज धीरे धीरे उस द्वीप के धरातल पर उतरा और ठीक उसी राक्षस के समक्ष जा खड़ा हुआ।

नागराज- मृत्यु को न्यौता तो तूने दिया है, मेरी मंगेतर और मेरे मित्रों को चोट पहुँचाकर।

सींगधारी राक्षस ने मुट्ठी भींचकर पूरी ताकत से नागराज के शरीर पर वार करना चाहा लेकिन नागराज ने बड़े आराम से उस वार को अपने हाथ पर रोक दिया और फिर खुद एक तेज़ मुक्का मारकर उस राक्षस को कई फ़ीट पीछे उछाल दिया। अब तक पंचनाग और विसर्पी भी थोड़ा बहुत संभल चुके थे, उन्होंने भी देखा वह अद्भुत दृश्य- एक तरफ सैकड़ों की तादाद में राक्षस थे और दूसरी तरफ अकेला नागराज। राक्षस हमला करने के लिए पूरे वेग में आगे बढ़े, नागराज भी मुस्कुराकर धीरे धीरे उनकी तरफ बढ़ने लगा। शीघ्र ही बड़े बड़े कद वाले राक्षसों की हड्डियाँ चटकने की आवाज़ पूरे वातावरण में गूँजने लगीं, नागराज राक्षसों को घुमा घुमाकर एक दूसरे पर फेंक रहा था, कईयों के सीने को उसने द्वीप पर मौजूद विशाल शिलाओं द्वारा बेध दिया था, तो कइयों को विषफुँकार से चकराकर मौत के घाट उतार दिया था, उसके नागफनी सर्पों ने न जाने कितने राक्षसों के शरीर को काट डाला था। जब गिनती के राक्षस बचे तो वह भयाक्रांत होकर द्वीप से भागने लगे, नागराज ने भी उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की क्योंकि वह जानता था कि ये राक्षस सीधे अपने सेनानायक के पास ही जायेंगे और उनका सेनानायक था अग्रज।

नागराज पंचनागों और विसर्पी की तरफ मुड़ा, विसर्पी दौड़कर उसके गले जा लगी।

विसर्पी- मैं जानती थी कि तुम मुझे बचाने ज़रूर आओगे।
नागराज- कैसे न आता, तुम पर भला कोई आंच आने दे सकता था मैं?
पंचनाग- वाह मित्र, तुमने तो उन राक्षसों को छठी का दूध याद करा दिया।
नागराज- ये सब तो प्यादे हैं मित्रों, मुझे चाल चलने वाले तक पहुँचना है।

तभी एक उड़न यान पर सवार ध्रुव वहाँ आ पहुंचा।

ध्रुव- वाह! तुमने यहां से राक्षसों का सफाया ही कर दिया लेकिन बाकी द्वीपों की हालत और भी बुरी है, राक्षस तादाद में बहुत अधिक हैं।
नागराज- ये मैंने भी महसूस किया है, तुमने नताशा को ग्रैंडमास्टर रोबो की सहायता लेने भेजा था ना, क्या हुआ?
ध्रुव- हाँ, मैंने धनंजय को मठ भेज दिया है जहाँ से वह नताशा को लेकर ग्रैंडमास्टर रोबो के अड्डे पर जाएगा। उसे मैंने आर्मी समेत जल्दी आने के लिए कह दिया है क्योंकि यहाँ स्वर्णनगरी के योद्धाओं के संचालन के लिए उसकी आवश्यकता पड़ेगी। फिलहाल हम युद्ध पर ध्यान केंद्रित करते हैं, इनके कदम नागद्वीप पर पड़ने से पहले ही उखाड़ने होंगे।

धनंजय नताशा को लेकर ग्रैंडमास्टर रोबो के भव्य महल की बाहरी परिधि में पहुँच चुका था।

धनंजय- क्या तुमको लगता है कि रोबो हमारी सहायता करेगा? ध्रुव ने बताया था कि उसके साथ रहने के लिए तुम कमांडर पद छोड़कर यहाँ से चली गयी थीं।
नताशा- वह मेरे पिता हैं धनंजय, एक पिता अपनी बेटी से कुछ समय के लिए नाराज़ ज़रूर हो सकता है लेकिन उसकी समस्याओं को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। वैसे भी यह समस्या केवल ब्रह्मांड रक्षकों की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की है।

नताशा धनंजय के साथ महल में बेधड़क प्रवेश कर गयी, आसपास खड़े गार्ड्स ने उनको रोकने की कोशिश तो दूर नज़रें उठाकर देखने की हिम्मत भी नहीं की।

धनंजय- वाह! तुम्हारा आज भी इन पर बहुत दबदबा है।
नताशा (मुस्कुराकर)- ये दबदबा नहीं सम्मान है जो मैंने रोबो की बेटी नहीं बल्कि कमांडर नताशा के तौर पर कमाया है।

नताशा और धनंजय मुख्य हॉल में आ गए थे जहाँ कुछ गार्ड्स दायीं और बायीं तरफ कतारबद्ध तरीके से खड़े थे और सामने बड़ी सी सिंहासननुमा कुर्सी पर बैठा था ग्रैंडमास्टर रोबो। नताशा को देखते ही रोबो उठ खड़ा हुआ, उसके चेहरे पर एक अलग ही प्रसन्नता थी।

रोबो (सिंहासन से उठकर)- वाह! आज मेरी बेटी मुझसे मिलने आयी है।
नताशा- कैसे न मिलने आती? अपने पिता से हमेशा के लिए मुँह थोड़ी ना मोड़ सकती थी।

रोबो धीरे धीरे चलता हुआ नताशा के पास आया और बोला- “लेकिन मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम सिर्फ मुझसे मिलने नहीं आयी हो?”

नताशा- और आपको ऐसा क्यों लगा?
रोबो- मैं आँख और कान बंद नहीं रखता नताशा, मुझे पता है कि दुनिया में अजीब अजीब राक्षस प्राणियों का हमला हो रहा है। आसमान में सूर्य नज़र नहीं आ राहज इतनी कालिमा छाई हुई है। मैं ध्रुव जैसा तेज़ दिमाग तो नहीं रखता लेकिन फिर भी बता सकता हूँ कि तुम्हारा मुझसे मिलने का मकसद मेरी रोबो आर्मी की सहायता प्राप्त करना है।
नताशा- एक महायुद्ध लड़ा जा रहा है डैड, स्याह शक्तियों का पलड़ा पल प्रतिपल भारी होता जा रहा है। ये शक्तियाँ पूरे ब्रह्मांड पर अपना वर्चस्व कायम करना चाहती हैं और जहाँ तक मैं आपको जानती हूँ, आप अपना वर्चस्व आसानी से जाने नहीं देंगे। दुनिया की हर बड़ी शक्ति इन शक्तियों से लड़ने के लिए एकजुट हो गयी है, आपकी रोबो आर्मी भी अगर हमारा साथ देगी तो जंग आसान हो जाएगी।
रोबो (मुस्कुराकर)- तुम अगर इतनी लंबी चौड़ी बात बोलने के बजाय सिर्फ सहायता करने के लिए भी बोल देतीं तो भी मैं खुशी खुशी पूरी आर्मी को तुम्हारे साथ भेज देता। अभी रोबर्ट से कहकर सारे घातक हथियार मंगवाता हूँ और रोबो आर्मी को तैयार होने के लिए कहता हूँ।
नताशा- मुझे पूरी उम्मीद थी कि आप मुझे निराश नहीं करेंगे। आर्मी के पूरी तरह तैयार होते ही धनंजय द्वार बनाकर हमको युद्धक्षेत्र में ले जाएगा।
रोबो- ठीक है, मैं अभी आता हूँ। अपने गुप्त चैम्बर से कुछ सामान लेना है।

धनंजय रोबो के जाते ही नताशा से धीरे से बोला- “क्या है कुछ ज़्यादा ही जल्दी नहीं मान गए?”

नताशा- क्योंकि उन्हें भी स्थिति की गंभीरता का आभास है, हर बार दाल में कुछ काला हो ये ज़रूरी नहीं है धनंजय।

रोबो का महल बहुत भव्य था, रोबो आर्मी चौबीस घंटे सुरक्षा के लिए तैनात रहती थी। अलग अलग इतने लंबे चौड़े गलियारे थे जिसमें बड़े बड़े कमरे बने हुए थे, रोबो ऐसे ही एक गलियारे में मुड़ गया। इधर उधर कोई गार्ड नहीं खड़ा था फिर भी उसने एक सरसराती निगाह हर ओर दौड़ाई, जब वह पूरी तरह से निश्चिंत हो गया तब जाकर वह बोला- “हमें कोई नहीं सुन पायेगा, अब आप बाहर आ सकते हैं महाकाल छिद्र।”

रोबो के इतना कहते ही 35-40 वर्ष के व्यक्ति के साधारण रूप में महाकाल छिद्र उनके सामने प्रकट हो गए।

महाकाल छिद्र- तो क्या सोचा तुमने वत्स?
रोबो- मैं आपका साथ देने को तैयार हूँ, बस मेरी बेटी को कुछ नहीं होना चाहिए। उसे नहीं पता कि वह हारी हुई जंग को जीतने की कोशिश कर रही है लेकिन मुझे पता है कि स्याह शक्तियों का पलड़ा भारी है और इस युद्ध के बाद उसी का ओहदा कायम रहेगा जो जीतने वाले पक्ष की ओर से लड़ेगा।
महाकाल छिद्र- मेरा साथ देकर तुमने अपना भविष्य सुरक्षित कर लिया है वत्स, युद्ध के पश्चात हमारी रची गयी सृष्टि में तुम्हारा महत्वपूर्ण पद होगा। तुम्हारी बेटी को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाएगा लेकिन इससे पहले भी मैंने पृथ्वी के दो मानवों को बेहिसाब शक्तियाँ प्रदान की थीं, उनमें से एक तो रक्षकों के हाथों मारा गया और दूसरा अभी त्रिफना को पाने के लिए युद्ध लड़ रहा है। तुम्हारी रोबो आर्मी जाएगी तो पुण्य शक्तियों की सहायता करने लेकिन अग्रज के असफल होने की स्थिति में तुम्हें ही त्रिफना लाना होगा मेरे पास।
रोबो- वैसे बुरा ना मानें तो एक बात पूछूँ महाकाल छिद्र?
महाकाल छिद्र- अवश्य वत्स, पूछो क्या पूछना चाहते हो?
रोबो- आप खुद इतने अधिक शक्तिशाली हैं कि देवता भी आपके समक्ष नहीं टिक पाये, तो आप स्वयं ही त्रिफना को लेने क्यों नहीं जाते?
महाकाल छिद्र- क्योंकि त्रिफना का निर्माण त्रिदेवों ने किया है वत्स। मैं और स्याह विवर सृष्टि के आरंभ से मौजूद विशुद्ध स्याह ऊर्जा से निर्मित प्राणी हैं, त्रिफना का स्पर्श स्याह शक्ति को तेजी से खत्म कर सकता है। हममें से किसी ने भी त्रिफना का स्पर्श भी किया तो मृत्यु निश्चित है लेकिन जब हम किसी मानव को अपनी शक्ति देते हैं और वह त्रिफना को स्पर्श करने में सफल हो जाता है तो बेशक त्रिफना उसके अंदर से मेरी दी हुई शक्ति को खत्म कर देगा लेकिन वह मानव बचा रहेगा। त्रिफना को सक्रिय करने पर कई सारी भिन्न भिन्न समयधाराओं के द्वार खुल जायेंगे और फिर मैं एक नहीं बल्कि अनेकों समयधाराओं में स्याह ऊर्जा की कालिमा का विस्तार कर सकता हूँ।
रोबो- आप चिंता न करें महाकाल छिद्र त्रिफना अवश्य सक्रिय होगा।
महाकाल छिद्र- यही उम्मीद है वत्स, स्याह विवर को फिलहाल मैंने स्वर्गलोक में ही रहने दिया है क्योंकि बंधक बना देवराज इंद्र कुछ न कुछ चाल चलने का प्रयास अवश्य करेगा लेकिन अगर उसकी जरूरत हुई तो उसे भी इस युद्ध में शामिल कर लिया जाएगा।

इतना कहकर महाकाल छिद्र अंतर्ध्यान हो गए और रोबो युद्धक्षेत्र में जाने की तैयारियों में जुट गया।

पंचम खंड- रक्तपात

अग्र शेषनाग द्वीप का मोर्चा अब उड़न यंत्रों पर सवार ध्रुव, भेड़िया, कुछ असाधारण शक्ति वाले हन्टर्स और परमाणु ने संभाल लिया था। व्यवासुर संख्या में कम अवश्य थे लेकिन उनके हाथों से उत्पन्न भीषण चक्रवात किसी को भी उनके समीप पहुँचकर हमला करने का अवसर ही नहीं दे रहा था और दूर से किये गए वारों को वो वैसे ही छितरा दे रहे थे। कुछ हन्टर्स ने उड़न यान से उनके पास जाने की कोशिश की लेकिन ऐसा करते ही वे हवा के बवंडर में फँस गए और व्यवासुरों ने उन्हें कठोर धरातल पर पटककर उनके शरीर और उड़न यान के चिथड़े चिथड़े कर दिए। ध्रुव और भेड़िया एक ही उड़न यंत्र पर सवार थे जिसे ध्रुव चला रहा था और भेड़िया पीछे बैठा था।

ध्रुव- इन पर किसी तरह से अप्रत्याशित हमला करना होगा, सीधी लड़ाई में तो जीतना मुश्किल लग रहा है।
भेड़िया- लेकिन कैसे? ये चक्रवात पैदा करके किसी भी चीज़ को अपने निकट पहुँचने ही नहीं दे रहे।
ध्रुव- चक्रवात के निर्माण कैसे होता है? जब समुद्र से उठने वाली गर्म तथा आद्र हवायें सूर्य से प्राप्त उष्मा के कारण तेजी से ऊपर उठती हैं तो अपने पीछे कम दबाव का क्षेत्र छोड़ जाती हैं। कम दबाव वाले क्षेत्र में एक शून्य या खालीपन पैदा हो जाता है जिससे आसपास की हवा दौड़कर उस खाली जगह को भरने की कोशिश करती है जिस वजह से चक्रवात बनता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि गोल गोल घूमते इस बवंडर का केंद्र शांत होता है जिसे eye of the storm भी कहते हैं। अब इनके हाथों से पैदा होने वाले तीव्र बवंडर प्राकृतिक तो हैं नहीं लेकिन कहीं न कहीं ये भी इसी मैकेनिज़्म पर काम कर रहे होंगे और यदि ऐसा है तो इस बवंडर का केंद्र यानी इनके हाथ का तला एकदम शांत होगा।
भेड़िया- यानी कि हम इनके हाथों के तले पर वार करें लेकिन कैसे?
परमाणु- बहुत आसान है, श्रिंक होने से मेरे शरीर का घनत्व बढ़ जाता है इसलिए मैं श्रिंक होकर बवंडर के केंद्र में जाऊंगा और इनके हाथों को चीरता हुआ दूसरी ओर निकल जाऊंगा।
ध्रुव- लेकिन यह जानलेवा कदम है परमाणु। यदि हन्टर्स की तरह तुम भी बवंडर के केंद्र से जरा सा इधर उधर होकर उसकी परिधि में आ गए तो तुम्हारी जान को खतरा हो सकता है।
परमाणु- इन्होंने मेरे दोस्त की जान ली है ध्रुव, इन्हें खत्म करने के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूँ।

इतना कहकर परमाणु तेजी से श्रिंक हुआ और व्यवासुरों कि तरफ बढ़ चला और उनमें से एक के हाथों द्वारा उत्पन्न बवंडर के अंदर चला गया। जैसा कि ध्रुव ने कहा था, बवंडर का केंद्र एकदम शांत था, परमाणु तेजी से उड़ता हुआ गया और उस व्यवासुर के हाथ का तला फाड़कर निकला। वह व्यवासुर बुरी तरह चीख उठा, उसके हाथों ने बवंडर पैदा करना बंद कर दिया ये देखकर ध्रुव और बाकी बचे हन्टर्स ने अपने उड़न यंत्रों पर लगे कीपैड पर उंगलियाँ चलायी जिससे उनके उड़न यंत्र का अग्रिम भाग खुल गया और जानलेवा ऊर्जा किरण ने व्यवासुर को अपना शिकार बना लिया। भेड़िया भी ध्रुव के उड़न यान से कूद पड़ा और परमाणु द्वारा निष्क्रिय किये गए व्यवासुरों को अपनी गदा का शिकार बनाने लगा। एक के बाद एक सभी व्यवासुरों के साथ यही नीति अपनायी गयी, परमाणु श्रिंक होकर उनके हाथों को भेद डालता जिससे बवंडर रुक जाता और बाकी लोग उन पर हमला कर देते। यह व्यवासुरों का दुर्भाग्य था कि उनके शरीर इतने सक्षम नहीं थे कि उड़न यंत्रों के भीषण ऊर्जा वार या भेड़िया की गदा के प्रचंड प्रहारों के आगे कुछ क्षण के लिए भी टिक जाते इसलिए देखते ही देखते अग्र शेषनाग द्वीप से व्यवासुरों का सफाया हो गया।

भेड़िया- वाह! तुम्हारी योजना तो कमाल की थी ध्रुव!
ध्रुव- अब यह द्वीप पूरी तरह खाली हो चुका है, यहाँ सुपर इंडियन के साथ हकीम कीमियादास को भी भेजता हूँ ताकि वे मठ से लाये तमाम विलयनों को यहाँ लाकर अस्थायी चिकित्सालय बना लें ताकि युद्ध में घायल हुए हमारे हन्टर्स को बलवर्धक और अन्य प्रकार के जल्दी ठीक कर देने वाले काढ़े समय पर उपलब्ध करवाए जा सकें। अगर कोई छोटी मोटी विपदा यहाँ आती भी है तो उससे सुपर इंडियन निपट लेगा।

पश्चिमी द्वीप पर सबसे भीषण समर छिड़ा हुआ था। अग्रज ने अब एक नई रणनीति अपनाई थी जिसके तहत उसने सभी बचे खुचे राक्षस सैनिकों को इधर उधर छितराने के बजाय एक साथ एक ही द्वीप पर युद्ध करने का निर्देश दिया, उसका मानना था कि एक ही दिशा में निरंतर वार करने से वह कुछ सैनिकों के साथ नागद्वीप में प्रविष्ट हो भी सकता है लेकिन अलग अलग द्वीपों पर बिखरे रहने से ऐसा करने में कठिनाई आएगी। पश्चिमी द्वीप पर सूरज, मोनिका और चीता ने उड़न यंत्रों द्वारा तहलका मचाया हुआ था। उनके सटीक प्रहारों ने राक्षसों के छक्के छुड़ा दिए थे, गुंथी सर्पों में भी लड़ने का आत्मबल वापिस लौट आया था। शक्ति, एंथोनी और जैकब स्वर्णनगरी के योद्धाओं के साथ पश्चिमी द्वीप के दूसरे कोने पर प्रचंड युद्ध कर रहे थे। तभी नागराज, विसर्पी और पंचनागों के साथ पश्चिमी द्वीप पर पहुँचा और ताबड़तोड़ हमले करने लगा, अग्रज अब तक प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में शामिल नहीं हुआ था लेकिन अब उसके सब्र का बाँध टूट गया था।

वह चीख उठा- “बस बहुत हुआ! अब मैं खुद तुममें से हर एक को चुन चुन कर मारूँगा!”

अग्रज ने दोनों हाथों से स्याह ऊर्जा के प्रचंड वार करने शुरू किए। उसके ऊर्जा वार स्वर्णनगरी के कुछ योद्धाओं को जा लगे और वे अपने उड़न यंत्र से गिरकर काल के गाल में समा गए।

अग्रज- हाहाहा! अग्रज से भिड़ने का अंजाम यही होता है!

नागराज के कानों में भी अग्रज के यह शब्द पड़े, वह तुरंत उड़कर अग्रज के सामने जा पहुँचा।

नागराज- तो तू है अग्रज! वेदाचार्य का पोता और भारती का भाई।
अग्रज- हाँ नागराज! मैं ही हूँ वह शख्स जिसने नायक तिमिर योग को सक्रिय किया, तुम नायकों को भ्रष्ट किया और अब तुम्हारे सामने खड़ा है महाकाल छिद्र का प्रतिनिधि बनकर!
नागराज- महाकाल छिद्र का प्रतिनिधि? वेदाचार्य ने तो बताया था कि तूने ये सब भारती को पुनर्जीवित करने के लिए किया था।
अग्रज- मूर्ख है वेदाचार्य! मैंने ये सब सिर्फ अपने लिए किया, वेदाचार्य से मुझे झूठ बोलना पड़ा ताकि उसे मेरे असली इरादों की भनक तक ना लगे। हाँ ये सच है कि भारती की आत्मा को मैंने कैद करके रखा था लेकिन अपना मतलब पूरा होने पर मैंने उसे छोड़ दिया।
नागराज (क्रोधित होकर)- अब तक मुझे लगता था कि तूने भारती को जीवित करने के लिए ये सब किया लेकिन अच्छा किया जो तूने मुझे अपना असली उद्देश्य बता दिया। अब तुझे ऐसी भयानक मौत देगा नागराज जिसे देखकर महाकाल छिद्र भी काँप उठेगा।
अग्रज- मैं चंडकाल से भी अधिक शक्तिशाली हो चुका हूँ नागराज, मुझे हराना तेरे बस की बात नहीं रही।

इतना कहकर अग्रज ने तीव्र वार नागराज के सीने पर किया, नागराज को इतने शक्तिशाली वार की आशा नहीं थी। वह काफी दूर पूर्वी द्वीप के धरातल पर जा गिरा, उसके पीछे पीछे उड़ता हुआ अग्रज भी वहाँ आ पहुँचा। नागराज सम्भलकर बोला- “इस पाप क्षेत्र के खुलने से एक फायदा तो हुआ है, इतने शक्तिशाली जीवों के साथ भिड़ंत होने लगी है जिन पर मुझे खुलकर वार करने में कोई संकोच नहीं करना होगा।”

इतना कहकर नागराज ने भी एक अति प्रचंड मुष्टि प्रहार से अग्रज को कई फ़ीट पीछे धकेल दिया। अग्रज और नागराज में शारीरिक द्वंद आरम्भ हो गया था जिसमें कभी अग्रज नागराज पर भारी पड़ता तो कभी नागराज अग्रज पर। उनके भीषण प्रहारों से पूरा पूर्वी द्वीप समतल हुआ जा रहा था। ध्रुव, परमाणु, भेड़िया और बाकी हन्टर्स भी पश्चिमी द्वीप के युद्ध में शामिल होने पहुँच चुके थे। नागराज ने अग्रज को व्यस्त कर दिया था जिसके कारण राक्षसों के पास रणनीति बनाने वाला कोई नहीं था, वे यह युद्ध धीरे धीरे हार रहे थे। तभी हवा में एक बड़ा सा द्वार खुला और धनंजय, नताशा और ग्रैंड मास्टर रोबो की आर्मी के साथ रण में पहुंच गया। ध्रुव उन्हें देखकर अपने उड़न यंत्र द्वारा उनके पास आ गया- “वाह धनंजय! तुम इन लोगों को लेकर एकदम समय पर यहाँ आ पहुँचे हो, बाजी धीरे धीरे हमारे हाथ में आ रही है। अब पलड़ा पूरी तरह हमारे पक्ष में झुकने से कोई नहीं रोक सकता।”

रोबो (कुटिल मुस्कान के साथ)- तुम चिंता मत करो ध्रुव, इस युद्ध का वही परिणाम होगा जो हम चाहेंगे। इनसे निपटने के लिए हम अपनी ऊर्जा गन भी लेकर आये हैं जो पल भर में ही इन राक्षसों को राख में बदल देगी।

उसके बाद रोबो आर्मी भी ऊर्जा गन द्वारा राक्षसों पर प्रहार करने में जुट गई। कुछ कमजोर राक्षस तो ऊर्जा गन का एक वार खाकर ही राख में बदल जा रहे थे लेकिन कईयों पर ऊर्जा गन पूरी की पूरी खाली करनी पड़ रही थी लेकिन युद्ध में रोबो आर्मी के आगमन से बहुत ज़्यादा फर्क पड़ा था क्योंकि राक्षसों की संख्या बहुत तेजी से घट रही थी।

उधर अग्रज और नागराज के शारीरिक द्वंद में स्याह शक्ति की अधिकता के कारण अग्रज नागराज पर भारी पड़ने लगा था। नागराज उसके घूँसों को रोकने की नाकाम कोशिश कर रहा था लेकिन उसके प्रचंड मुक्के नागराज की पसलियों को तोड़ने की क्षमता रखते थे, मजबूरी में नागराज को विषफुँकार का प्रयोग करना पड़ा। अग्रज स्याह शक्ति धारी अवश्य था लेकिन शरीर तो एक इंसान का ही था, फूँकार के संपर्क में आते ही उसे हल्के हल्के चक्कर आने लगे।

अग्रज- उफ्फ, तो तू अब अतिरिक्त शक्तियों का प्रयोग करेगा? तो फिर ठीक है, मैं भी ऐसा ही करूँगा।

अग्रज के हाथों से तंत्र किरणें निकलीं और नागराज के आसपास की हवा प्रगाढ़ होती चली गयी जिसके कारण उसे साँस लेने में तकलीफ होने लगी।

नागराज- मैं अंतरिक्ष के निर्वात काफी समय तक जीवित रह सकता हूँ अग्रज, तू ऐसे मेरा दम नहीं घोंट सकता।

नागराज ने अग्रज की ओर बढ़ने का प्रयास किया लेकिन उसका पूरा शरीर भारीपन महसूस कर रहा था। वह बड़ी मुश्किल से एक एक इंच हिल पा रहा था।

अग्रज- तू बहुत शक्तिशाली है नागराज, लगता है वायु को और अधिक प्रगाढ़ करना होगा।

ऐसा कहकर अग्रज ने अपने हाथों से कुछ इशारा किया और नागराज को अपने शरीर पर और अधिक दबाव महसूस होने लगा। वह धरती पर गिर पड़ा, अब उससे एक इंच और भी हिला नहीं जा रहा था। अब उसे साँस लेने में भी तकलीफ हो रही थी।

अग्रज- हाहाहा, तू अंतरिक्ष के निर्वात में जीवित रह सकता होगा नागराज लेकिन अग्रज के प्रगाढ़ वायु क्षेत्र में अधिक देर जीवित नहीं रह पायेगा। महाकाल छिद्र द्वारा प्रदान की गई शक्तियों ने मेरी तंत्र ऊर्जा के स्तर को कई गुना अधिक बढ़ा दिया है, मेरा सामना नहीं कर सकता तू।

नागराज वाकई अग्रज की शक्ति के आगे बेबस हो चुका था।

नागराज की बेबसी का अहसास स्वर्गलोक में देव कालजयी को भी हो रहा था जो बाकी देवताओं के साथ स्याह विवर के बंधक थे। स्वर्ग के सिंहासन पर अब तक असुरराज शंभूक कब्ज़ा जमा चुका था। देवराज इंद्र ने देव कालजयी के चेहरे के बदलते भाव देखकर पूछा- “क्या हुआ देव कालजयी?”

कालजयी- मेरा परम् भक्त नागराज बहुत कष्ट में है देवराज और मैं उसकी सहायता भी नहीं कर सकता क्योंकि मैं यहां बंधक बना हुआ हूँ।
इंद्र- पहले हम अपनी सहायता कर लें वही बहुत है देव कालजयी। अच्छा हुआ बाबा गोरखनाथ यहाँ से जल्दी चले गए, यदि वे भी बंधक बना जाते तो हमारे सारे विकल्प खत्म हो जाते। मैंने उनसे चोरी छिपे मानसिक संपर्क स्थापित करके उन्हें यहाँ की स्थिति की जानकारी दे दी है। अब वही कुछ कर सकते हैं।

“दादाजी! उठिए दादाजी!” -ये शब्द होश में आते ही वेदाचार्य के कान में पड़े, वे झट से उठ बैठे।
वे बहुत देर से अग्रज के हमले के बाद से उसी जगह बेहोश पड़े थे जहाँ अग्रज उन्हें छोड़ गया था। उन्हें किसी की जानी पहचानी मानस तरंगें महसूस हो रही थीं, उनकी आँखों में आँसू आ गए, वे बोले- “भारती! क्या ये तू है मेरी बच्ची?”
“जी दादाजी! ये मैं ही हूँ!” वेदाचार्य के पास खड़ी उजली सी आकृति बोली।

वेदाचार्य- म..मैं कुछ समझा नहीं, मैंने तो तुम्हारी आत्मा को दूर जाते महसूस किया था फिर तुम अभी तक मृत्युलोक के बंधन में कैसे कैद हो?
भारती- मैं भी सभी बंधनों से आज़ाद होकर जा रही थी दादाजी लेकिन जैसा कि कहा जाता है, यदि किसी आत्मा की कोई बड़ी इच्छा अधूरी रह जाये तो वह अतृप्त रूह इस दुनिया में ही भटकती रहेगी।
वेदाचार्य- लेकिन तेरी ऐसी कौन सी इच्छा थी जो मृत्यु से पूर्व अधूरी रह गयी थी?
भारती (कुछ पलों का मौन धारण करके)- नागराज से विवाह करने की इच्छा।
वेदाचार्य (आश्चर्यचकित होकर)- क… क्या? नागराज से विवाह करने की इच्छा? लेकिन तुमने तो मुझे कभी इस विषय में बताया ही नहीं।
भारती- मैंने किसी को भी इस विषय में नहीं बताया था पर मरते समय मैंने नागराज से प्रेम का इज़हार किया था शायद उसी अतृप्त इच्छा की वजह से मैं यहाँ रह गयी और अग्रज ने मुझे कैद कर लिया।

अग्रज का ज़िक्र होते ही वेदाचार्य का क्रोध भड़क उठा, वे बोले- “अग्रज! उसे तो मैं ऐसी मृत्यु दूंगा की उसकी रूह भी थर थर काँप उठेगी।”

भारती- पर अब हम क्या करेंगे दादाजी? अग्रज तो बहुत अधिक शक्तिशाली हो गया है।

“चिंतित ना हो पुत्री, महाकाल छिद्र के हर दास के साथ ही उसका भी अंत निश्चित है।” कहते हुए बाबा गोरखनाथ उसी स्थान पर प्रकट हो गए।

वेदाचार्य- उफ्फ! इतनी विशुद्ध पुण्य ऊर्जा की तरंगें मुझे आज तक प्राप्त नहीं हुईं, आप कौन हैं मान्यवर?
गोरखनाथ- मैं एक तपस्वी हूँ जो पुण्य शक्तियों को जीतते हुए देखना चाहता है। मैं देवताओं की सहायता लेने के लिए स्वर्गलोक गया था लेकिन तभी वहाँ पर भीषण देवासुर संग्राम छिड़ गया, मैं वहाँ रुककर उनकी सहायता नहीं कर सकता था क्योंकि मुझे पृथ्वी की ओर प्रस्थान करना था। जब मैं पृथ्वी पर आ रहा था तभी देवराज इंद्र ने मानसिक तरंगों द्वारा संपर्क करके मुझे बताया कि कैसे उनको और बाकी सभी देवताओं को असुरराज शंभूक ने स्याह विवर और महाकाल छिद्र की सहायता से कैद कर लिया है।
वेदाचार्य- क्या? महाकाल छिद्र ने स्वर्गलोक पर अधिकार जमा लिया? ये तो बहुत बुरा हुआ।
गोरखनाथ- हाँ, ये तो है। पृथ्वी पर आने के बाद मैं कुछ देर के लिए गहन साधना में चला गया ताकि स्वर्ग की आवाजाही से नष्ट हुई अपनी शक्ति में वृद्धि कर सकूँ क्योंकि यदि ये महासमर हमको जीतना है तो हर योद्धा को अपनी पूरी शक्ति से लड़ना होगा। साधना के दौरान मैंने अपने मानस रूप को स्वतंत्र छोड़ दिया था जिससे मैं उस नराधम व्यक्ति का पता कर सकूँ जिसने पाप क्षेत्र के द्वार को खोला था। मानस रूप द्वारा मैंने अग्रज, महाकाल छिद्र और तुम्हारे मध्य हुए वार्तालाप को सुना और धीरे धीरे सारा मामला समझ में आया।
वेदाचार्य (दुखी भाव से)- फिर तो आपको पता चल ही गया होगा कि इस पाप का भागीदार मैं भी हूँ।
गोरखनाथ- तुम्हें पाप क्षेत्र के बारे में पूर्ण जानकारी नहीं थी जिसके चलते तुम अग्रज की बात मानकर पाप क्षेत्र के द्वार को खोलने में उसकी सहायता की। अग्रज ही मुख्य दोषी है लेकिन तुम सत्य कहते हो, तुम्हारा भी काफी हद तक दोष है इस कुकृत्य में लेकिन मेरा साथ देकर तुम अपनी गलती सुधार सकते हो। हमें भी इस महायुद्ध का हिस्सा बनना होगा।

सूरज का क्रोध आज सारी सीमाएं तोड़ चुका था, वह राक्षसों से भिड़ने के लिए किसी भी हद तक जा रहा था। स्वर्णनगरी की तकनीक से बने उड़नयान को वह बेहद कुशलता से चला रहा था। उसके सामने एक बड़ा सा राक्षस हमला करने आया, उसने यान की गति धीमी करने के बजाय और बढ़ा दी और यान को तेजी से उड़ाते हुए राक्षस को टक्कर मार दी, उस राक्षस ने अपने पंजों को यान की सतह पर गड़ा दिया जिससे यान के साथ साथ वह भी हवा में उड़ने लगा। सूरज ने कीपैड पर अपनी उंगलियाँ चलायीं, यान का अग्रिम हिस्सा खुला जहाँ राक्षस का पेट टिका हुआ था और भीषण ऊर्जा वार उसके पेट में एक बड़ा से छेद बनाता चला गया। मृत राक्षस यान से नीचे गिर चुका था।

मोनिका अपना उड़न यान सूरज के बगल में लाते हुए बोली- “सूरज हमें जोश के साथ साथ होश से भी काम लेना होगा, भावनाएं हमारी सबसे बड़ी ताकत होती हैं लेकिन कभी कभी ये हमें अँधा भी बना देती हैं।”

सूरज ने मोनिका की बातों को अनसुना करके यान को और तेज़ी से आगे बढ़ा लिया। चीता अपने उड़न यान पर सवार उन दोनों की बहस को सुन रहा था, वह मोनिका से बोला- “वो फिलहाल तुम्हारी नहीं सुनेगा मोनिका, उसके सिर पर अदरक चाचा का बदला लेने का जो जुनून है वो इन सारी पाप शक्तियों के खत्म हो जाने के बाद ही खत्म होगा।”

रोबो भी अपनी आर्मी के साथ आतंक मचा रहा था, लेज़र आई और हाथ में मौजूद ऊर्जा गन का बेहद कुशलता से प्रयोग कर रहा था। नताशा भी रोबो के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रही थी।
युद्ध में घायल होते हन्टर्स को एंथोनी टेलीपोर्ट करके हकीम कीमियादास के पास पहुँचा देता था जहाँ वे अपने विलयनों के माध्यम से उन्हें पलभर में ठीक कर देते और वे वापिस स्फूर्तिवान होकर युद्धभूमि में पहुँच जाते।
शक्ति ने भी उष्मा द्वारा राक्षसों के हथियारों को पिघलाकर उन्हीं पर वार करने चालू कर दिए, राक्षसों के हथियार ही उन्हीं को काट रहे थे जो राक्षस वहाँ से बच जा रहे थे उन्हें विसर्पी का राजदंड नहीं बख्श रहा था।
शीघ्र ही सभी के संयुक्त प्रयासों के कारण पश्चिमी द्वीप से भी राक्षसों का समूल विनाश हो गया।
किसी के भी चेहरे पर बहुत अधिक प्रसन्नता नहीं थी क्योंकि उनके भी बहुत सारे साथी इस प्रकरण में मारे गए थे। कई सारे इच्छाधारी नाग, स्वर्णनगरी के सैनिक और हन्टर्स की लाशें भी धरातल पर पड़ी हुई थीं, चारों तरफ मौत सी खामोशी छा गयी थी लेकिन यह खामोशी आने वाले तूफान का द्योतक थी।
तभी तालियों की तड़तड़ाहट से पूरा वातावरण गूँज उठा, सबने देखा कि आसमान में उड़ता अग्रज तालियां बजाता हुआ उनकी तरफ ही आ रहा था। उसके साथ साथ तंत्र किरणों के बंधन में कैद बेहोश नागराज का शरीर भी हवा में उड़ रहा था। नागराज की ऐसी हालत देखकर विसर्पी का तो कलेजा मुँह को आ गया था, पंचनाग भी खुद को बहुत विवश महसूस कर रहे थे, सब एकदम अवाक रह गये थे।

अग्रज- बहुत खूब! आखिरकार महाकाल छिद्र की प्रलयंकारी राक्षस सेना को पराजित करने में सफलता प्राप्त कर ही ली तुम लोगों ने। हालांकि इस पूरे प्रकरण में तुम्हारे भी कई योद्धा शहीद हुए लेकिन क्या फर्क पड़ता है, आखिर बाज़ी तो तुम लोगों के हाथ ही आयी। अब समझदारी दिखाओ और मेरे मार्ग से हट जाओ, तुम्हारे काफी लोग इस भीषण रक्तपात में वैसे ही मारे जा चुके हैं तो मुझे उम्मीद है कि तुम सब भी अपना वैसा ही हश्र नहीं चाहते होंगे।

किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, उल्टा सबने अपनी मुट्ठियाँ और अधिक भींच ली थीं। अग्रज को उनका क्रोध महसूस हो रहा था, वह बोला- “ठीक है! अगर तुम सबकी यही इच्छा है तो यही सही, तुम सबकी लाश पर चलकर जाएगा अग्रज त्रिफना को लेने के लिए।”

इतना कहकर अग्रज धरती पर आ गया, रोबो आर्मी ने उस पर ऊर्जा गन से हमला करने का प्रयास किया लेकिन अग्रज के शरीर से निकलती स्याह ऊर्जा ने ऊर्जा गन के वारों को इधर उधर छितरा दिया। असाधारण शक्ति वाले हन्टर्स , इच्छाधारी नाग और स्वर्णनगरी के योद्धा मिलकर उसकी ओर बढ़ने लगे। अग्रज ने धरती पर इतनी प्रचंड लात मारी की पूरा पश्चिमी द्वीप बुरी तरह हिल गया, उसकी तरफ बढ़ते कदम भी बुरी तरह लड़खड़ा गए, फिर उसके हाथ से स्याह ऊर्जा की ऐसी तरंगें निकलने लगीं जो आसपास खड़े हर शख्स की त्वचा को उधेड़कर उसे कंकाल बनाने लगीं। ये सेनाएं मिलकर भी अग्रज का सामना कर पाने में असमर्थ साबित हो रही थीं, इसी उधेड़बुन के बीच अग्रज का ध्यान नागराज के शरीर से हट गया था जो अब उसकी तंत्र ऊर्जा से आज़ाद परंतु अचेतावस्था में एक तरफ पड़ा हुआ था। विसर्पी पंचनागों के साथ नागराज के पास पहुँची, नागार्जुन ने नागराज की नब्ज देखी और विसर्पी की ओर देखकर बोला- “नागराज की नब्ज तो सही चल रही है साम्राज्ञी, पर इसकी तंद्रा भंग होने में पता नहीं कितना समय लगेगा।”

विसर्पी- ये अग्रज तो एक के बाद एक हर योद्धा को मारता चला जा रहा है, हमें नागराज को होश में लाने का प्रयास करना होगा।

तभी रोबो, नताशा और उनकी रोबो आर्मी भी उनके पास पहुंची।

रोबो विसर्पी से बोला- “नागसाम्राज्ञी जी, अग्रज जिस गति से हमारे योद्धाओं का संहार कर रहा है उसको मद्देनज़र रखते हुए हमें उससे भिड़ने की कोई और योजना बनानी होगी लेकिन उससे भी बड़ी चिंता का विषय है कि आपके सारे योद्धा यहाँ हैं जबकि हमारा सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है किसी भी कीमत पर त्रिफना को बचाना।”

तब विसर्पी ने ध्यान दिया कि महात्मा कालदूत काफी समय से युद्धभूमि में नज़र नहीं आये थे, किसी अनहोनी की आशंका से उसका दिल कांप उठा।
वह रोबो से बोली- “आपने सही कहा, हमारे कई नागसैनिक मारे जा चुके हैं और बाकी अग्रज से एक नाकामी भारी जंग लड़ रहे हैं जिसे जीतने की कोई आशा नहीं। ऐसे में और अधिक काली शक्तियों का वार हम शायद झेल ना पायें। क्या आप लोग नागद्वीप के अंदर जाकर त्रिफना की निगरानी कर सकते हैं? आपकी रोबो आर्मी के आते ही राक्षस सेना का सफाया बहुत तेज़ी से हो गया था, मुझे उम्मीद है कि त्रिफना की रक्षा करने में आप पूरी तरह समर्थ होंगे। मैं पंचनागों को आपके साथ भेज दूँगी।”

रोबो- बिल्कुल, पवित्र त्रिफना की रक्षा करने का सौभाग्य मेरे जैसे अपराधी को मिल रहा है, शायद ईश्वर खुद चाहते हैं कि मैं अपने पापों का प्रायश्चित इस काम को करके करूँ।
विसर्पी- पंचनागों इनके साथ नागद्वीप की परिधि के अंदर महात्मा कालदूत की गुफा तक जाओ जहाँ त्रिफना मौजूद है। फिलहाल त्रिफना की सुरक्षा के लिए हमारे पास कोई भी बेहतर विकल्प नहीं है, तब तक मैं नागराज को होश में लाने का प्रयत्न करती हूँ। वही अग्रज को कड़ी टक्कर से सकने में सक्षम है।

इसके बाद पंचनाग रोबो आर्मी के साथ नागद्वीप की परिधि के अंदर चले गए, इस भीषण रक्तपात से दूर।
अग्रज की स्याह शक्तियाँ चरम पर थीं, उसकी आँखें पूरी तरह काली हो चुकी थीं और आवाज़ में भी भारी बदलाव आ चुका था। कोई भी उसके आगे क्षण भर से अधिक टिक ही नहीं पा रहा था। शक्ति, परमाणु, एंथोनी, जैकब और भेड़िया ने अग्रज को घेर लिया।

अग्रज- हाहाहा! तो तुमको लगता है कि तुम महाकाल छिद्र के दास को रोक सकते हो!
शक्ति- इस बार हम तुझे जीतने का कोई मौका नहीं देंगे। सब एक साथ वार करो इस पर!

शक्ति के इतना कहते पर एंथोनी ने पूरी ताकत से ठंडी आग द्वारा अग्रज के शरीर में अकड़न पैदा करना शुरू किया, जैकब एक से एक भीषण तंत्र वार करने लगा, परमाणु सबसे उच्च इंटेंसिटी के परमाणु छल्ले छोडने लगा। सूरज, मोनिका,चीता और ध्रुव ने भी स्वर्णनगरी के मृत सैनिकों के घातक हथियार उठाये और अग्रज के शरीर को निशाना बना लिया। अग्रज पर भी लगातार किये जा रहे वारों का असर दिखने लगा था, उसके माथे पर शिकन आ रही थी, उसने अपनी पूरी ताकत को इकट्ठा किया और उसके शरीर से भीषण स्याह ऊर्जा उत्सर्जित हुई जिसने सभी ब्रह्मांड रक्षकों को उठाकर दूर दूर फेंक दिया। सभी दूर दूर छितर गए, अग्रज गहरी साँस लेकर बोला- “तुम लोगों ने मेरे समय और ऊर्जा, दोनों को ही काफी नष्ट करवा दिया है लेकिन अब मैं और समय व्यर्थ नहीं करूँगा, सीधे नागद्वीप के अंदर प्रवेश करूँगा।”

वाकई अग्रज के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए कोई नहीं था, सारे ब्रह्मांड रक्षक स्याह शक्ति के उस झटके भरे वार से तुरंत उबर पाने में असमर्थता महसूस कर रहे थे। ब्रह्मांड रक्षकों के अचेत होने से बाकी बचे सैनिकों का मनोबल भी बुरी तरह टूट गया, जब अग्रज नागद्वीप की ओर बढ़ रहा था तब उसे रोकने के लिए और किसी ने आगे आने की हिम्मत नहीं की।

विसर्पी अचेत नागराज की ओर देखकर आँसू बहा रही रही, वह बोली- “नागराज, आज से ज़्यादा ज़रूरत मुझे तुम्हारी कभी नहीं पड़ी है। तुम्हें होश में आना ही होगा, मेरे लिए नहीं तो नागद्वीप के लिए तुम्हें ऐसा करना ही होगा।”

तभी उसके पीछे प्रकाश से भरी चकाचौंध हुई, उसने मुड़कर देखा तो बाबा गोरखनाथ, वेदाचार्य और भारती की आत्मा के साथ खड़े थे। भारती की आत्मा की मौजूदगी का एहसास उस वक्त वेदाचार्य और बाबा गोरखनाथ के अलावा किसी को भी नहीं था। विसर्पी वेदाचार्य को देखकर बेहद चकित हुई “व..वेदाचार्य आप?”

वेदाचार्य- मैं इस युद्ध में तुम्हारा साथ देने आया हूँ विसर्पी।

गोरखनाथ की नज़र बेहोश नागराज पर पड़ी, उन्होंने विसर्पी से पूछा- “नागराज को क्या हुआ है?”

विसर्पी- पता नहीं! अग्रज के भीषण प्रहारों के बाद से अब तक बेहोश है।

गोरखनाथ नीचे झुके और नागराज के माथे पर हल्के से हाथ फेरकर बोले- “हम्म, स्याह ऊर्जा से भरे वार के कारण इसका मस्तिष्क सुन्न हो गया है। मैं अपनी श्वेत ऊर्जा द्वारा ना सिर्फ इसके शरीर के भीतर बसी स्याह ऊर्जा को नष्ट करूँगा बल्कि इसके शरीर में प्रवाहित देव ऊर्जा में भी मेरी श्वेत ऊर्जा सम्मिलित हो जाएगी। यदि महाकाल छिद्र स्याह ऊर्जा देकर अग्रज को पाप फैलाने के लिए भेज सकता है तो मैं भी नागराज को श्वेत ऊर्जा का अंश प्रदान करके उसका मुँहतोड़ जवाब दूँगा।”

बाबा गोरखनाथ ने अपनी आँखें बंद कीं, उनका हाथ अभी भी नागराज के माथे पर था, हाथ से निकलती हल्की श्वेत किरणें नागराज के मस्तिष्क से होकर पूरे शरीर में प्रविष्ट हो चुकी थीं, अचानक नागराज की उंगलियों में हल्की सी हरकत हुई, वह धीरे धीरे आँखें खोल रहा था। अब नागराज अचेतावस्था से पूरी तरह बाहर आ चुका था, वह उठ खड़ा हुआ और बाबा गोरखनाथ के पाँव छूकर बोला- “यदि आप ना होते तो मेरे प्राण बचना मुश्किल था, धन्यवाद।“
फिर अचानक ही उसकी नज़र वेदाचार्य पर पड़ी और उसका गुस्सा भड़क उठा।

नागराज- आप यहाँ पर क्या कर रहे हैं? समूचे ब्रह्मांड को गर्त में धकेलकर चैन नहीं मिला आपको?
वेदाचार्य- मैं जानता हूँ कि मैं तुम सबका गुनाहगार हूँ नागराज और मेरा अपराध माफी के योग्य नहीं लेकिन फिर भी मैं तुमसे माफी माँगता हूँ।
नागराज- माफी मुझसे नहीं भारती से माँगनी चाहिए आपको, यदि वो जीवित होती तो क्या उसे आपका ये रूप देखकर दुख नहीं होता?

वेदाचार्य उसे बताना चाहते थे कि भारती ठीक उनके बगल में ही मौजूद है पर भारती ने उन्हें मना कर दिया।
वे बोले- “मैं इस महायुद्ध में तुम्हारी हर संभव सहायता करूँगा, जितना मुझसे बन पड़ेगा।“

गोरखनाथ- आप दोनों की बातचीत में बाधा डालने का खेद है परंतु अग्रज नाम की समस्या, पल प्रतिपल नागद्वीप की ओर बढ़ती जा रही है, ये वार्तालाप उसे रोकने के बाद भी किया जा सकता है।
नागराज (क्रोध से)- अग्रज की चिंता ना करें बाबा गोरखनाथ, आपकी श्वेत ऊर्जा ने मेरे भीतत जिस नई शक्ति का संचार किया है, वो उस पर बहुत भारी पड़ने वाली है।“

“रुक जाओ!” यह बुलंदी भरी आवाज़ अग्रज के कानों में जैसे ही पड़ी, नागद्वीप की सीमा तक पहुँचे उसके कदम रुक गए। उसने पीछे मुड़कर देखा तो सुपर इंडियन खड़ा था। वह अग्र शेषनाग द्वीप पर हकीम कीमियादास के साथ हन्टर्स के लिए घाव जल्दी ठीक करने वाले काढ़े बनवा रहा था लेकिन जैसे ही उसने पश्चिमी द्वीप से उठते कोलाहल के स्वर सुने तो उसका माथा ठनका, जब वह वहाँ पहुँचा तो बेबस पड़े ब्रह्मांड रक्षकों के साथ ढेर सारी लाशें देखकर वह अंदर तक दहल गया। उसे दूर नागद्वीप की ओर बढ़ता अग्रज दिखाई दिया और अब वह उसके सामने खड़ा था।

अग्रज- ओह मानवता का एक और रक्षक जो अग्रज को ललकारने की हिम्मत दिखा रहा है।
सुपर इंडियन- तू अपनी शक्ति के दम पर ही हमें ललकारने की हिम्मत दिखा पा रहा है, तुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि बगैर स्याह शक्तियों के हमारा सामना करने की सोच भी सके।
अग्रज- मेरे पास भाषण सुनने के लिए वक्त नहीं है और ना ही तुझसे भिड़ने का। तुझे मैं तंत्र खोल में ढक रहा हूँ अगर इस खोल से बाहर आने का प्रयास करेगा तो तेरे शरीर को नहीं बल्कि आत्मा को आघात पहुँचेगा क्योंकि इस खोल को आत्माओं को कैद करने के लिए ही बनाया गया है। शरीर को आघात पहुँचाने वाले तंत्र बंधनों का तोड़ तुम लोग दिमाग का इस्तेमाल करके निकाल ही लेते हो लेकिन आत्मा को नुकसान पहुँचाने वाले बंधन से कैसे छूटोगे?

इतना कहकर अग्रज ने सुपर इंडियन के पूरे शरीर को पारदर्शी तंत्र खोल में ढक दिया लेकिन उसको बेहद आश्चर्य हुआ जब उसने देखा कि सुपर इंडियन बिना किसी खास मेहनत के उस पारदर्शी खोल को हाथों से फाड़कर बाहर निकल आया।

अग्रज (बेहद हैरान होकर)- ये..ये कैसे संभव है?
सुपर इंडियन- तूने कहा था कि ये आत्मा पर आघात करने वाला तंत्र है लेकिन जब किसी के अंदर आत्मा ही ना हो तो उसका क्या किया जाए?
अग्रज- यानी तेरे अंदर आत्मा ही नहीं है? आखिर तू किस प्रकार का जीव है?
सुपर इंडियन- मेरे अंदर आत्मा भले ही ना हो लेकिन आत्मीयता तुझसे बहुत अधिक है।

सुपर इंडियन अग्रज की ओर उछला और ब्रेसलेट्स से निकलने वाली तीव्र ध्वनि तरंगों का निशाना उसके कानों को बना लिया। अग्रज तड़प उठा, उसके कान के पर्दे बुरी तरह झन्ना गए। उछल कूद करते सुपर इंडियन को पकड़ पाना भी बेहद मुश्किल था, अग्रज ने अपने स्याह काले नेत्रों से तीव्र किरण वार किया जो सुपर इंडियन के शरीर पर एकदम सटीक लगा। सुपर इंडियन उस भीषण वार को झेल नहीं पाया और उसका उछलता कूदता शरीर बाकी ब्रह्मांड रक्षकों की तरह एकदम अशक्त हो गया। अग्रज ने उसे गर्दन से पकड़कर हवा में उठा लिया और दूर फेंक दिया। इससे पहले की अग्रज उस पर और कोई प्रहार कर पाता, बचे खुचे घायल नागसैनिक, हन्टर्स और स्वर्णनगरी के योद्धा इकट्ठा हुए। वे अधमरे सुपर इंडियन और अग्रज के बीच मजबूत दीवार की तरह खड़े हो गए और बोले- “इस बच्चे तक पहुँचने से पहले तुम्हें हमारी लाशों पर से गुज़रना होगा।”

अग्रज (मुस्कुराता हुआ)- वाह! तुम लोगों के जज्बे की मैं दाद देता हूँ, एक जान बचाने के लिए हज़ार जानें आगे आ गयीं। क्या तुमने देखा नहीं कि तुम्हारे कितने साथियों की लाशें मैंने बिछा दीं, फिर भी तुम लोगों को अक्ल नहीं आयी?

स्वर्णनगरी की बची टुकड़ी का नेतृत्व करता घायल धनंजय बोला- “तुम अब भी नहीं समझे कि शत्रु चाहे जितना भी शक्तिशाली हो, पुण्य के पक्षधर ना डरते हैं और ना ही पीछे हटते हैं।”

अग्रज- तो फिर ठीक है, यदि तुम लोगों की मृत्यु की इच्छा इतनी प्रबल है तो मैं क्या कर सकता हूँ। अपनी मौत का सामना करने के लिए तैयार हो जाओ।

हालांकि सभी सैनिक दृढ़ निश्चय के साथ खड़े थे लेकिन अग्रज के बढ़ते कदमों के साथ ही उनके दिलों की धड़कनें भी बढ़ रही थीं क्योंकि सच्चाई यही थी कि वे एक साथ मिलकर भी मौत के उस परकाले का सामना नहीं कर सकते थे।

“सब लोग पीछे हट जायें, मुझे अग्रज से एक पुराना हिसाब चुकता करना है।”
इस जानी पहचानी आवाज़ को सुनकर सबके हृदय में प्रसन्नता का संचार हो गया। अग्रज के साथ साथ सब सैनिकों और अधमरे पड़े सुपर इंडियन ने भी देखा कि अग्रज को ललकारने युद्धभूमि में फिर आ चुका था………इच्छाधारी नागराज। नागराज इस रूप में आधा सर्प था और आधा मानव।
उसका यह रूप वाकई बहुत प्रभावशाली था, आँखों में दहकते अंगारे उसके क्रोध की गवाही दे रहे थे, दो टांगों की जगह धरती पर लहराकर चलती विशाल पूँछ पहाड़ को भी अपनी कुंडली में जकड़कर तोड़ने का बल रखती थी, चेहरे पर एक विशेष प्रकार का तेज था जो शायद बाबा गोरखनाथ द्वारा दी गयी श्वेत ऊर्जा का असर था। नागराज का ये रूप देखकर अग्रज भी बेहद प्रभावित हुआ था।

अग्रज- तेरा ये इच्छाधारी रूप काफी प्रभावशाली है लेकिन आज ये भी तेरे काम नहीं आने वाला।

अग्रज ने दोनों हाथों से तीव्र स्याह ऊर्जा का प्रहार नागराज के शरीर पर किया, नागराज ने बचने की कोई कोशिश नहीं की, स्याह ऊर्जा उसके शरीर से टकराकर छितरा गई। अग्रज की आँखें चौड़ी होती चली गयीं, नागराज मुस्कुराते हुए बोला- “अब मेरी बारी!”

नागराज के नेत्रों से भीषण हरी दहकती अग्नि ने अग्रज को अपना शिकार बना लिया, इस विष दाह से अग्रज बुरी तरह तड़प उठा। ब्रह्मांड रक्षक अब अग्रज के वार से उबरकर धीरे धीरे होश में आ रहे थे लेकिन वह भी इस लड़ाई के दर्शक मात्र बनकर रह गए थे।
नागराज की विशाल पूँछ ने तड़पते हुए अग्रज को जकड़कर हवा में उठा लिया, नागराज बोला- “मेरी दोस्त थी भारती और तेरी बहन। आखिर कोई इतना निर्दयी कैसे हो सकता है कि अपनी मृत बहन की मृत्यु से भी अपने लाभ के बारे में सोचे, उसकी आत्मा को अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कैद रखे, इसके लिए वाकई बेहद निचले स्तर की सोच चाहिये।”
अग्रज के शरीर पर कुंडली की जकड़ बढ़ती ही जा रही थी लेकिन उसके रगों में भी महाकाल छिद्र द्वारा दी गयी स्याह ऊर्जा प्रवाहित हो रही थी। अपना सम्पूर्ण बल लगाकर वह किसी तरह नागराज की कैद से आज़ाद हो गया, वह क्रोध के आवेग में वह फिर से नागराज की तरफ बढ़ा लेकिन नागराज ने अपने दोनों हाथों से उसके दोनों हाथों को पकड़ लिया। दोनों के जबड़े बुरी तरह भिंच गए थे, नागराज की रगों में बहती श्वेत ऊर्जा और अग्रज के रगों में बहती स्याह ऊर्जा पूरे उफान पर पहुँच गई। उनके शरीर से हो रहे ऊर्जा के उत्सर्जन से बचने के लिए सारे लोग उस स्थान से दूर चले गए। नागराज और अग्रज अपना सम्पूर्ण बल लगा रहे थे, जहाँ अग्रज की आँखें स्याह ऊर्जा की अधिकता के कारण एकदम स्याह हो गयी थीं वहीं नागराज की आँखें उजली श्वेत ऊर्जा से भर गई थीं।
यह जंग अब इच्छाशक्ति की जंग बन चुकी थी अचानक नागराज पूरी शक्ति से चीखा और अग्रज के दोनों हाथों को उसके कंधों से उखाड़कर अलग कर दिया। अग्रज की चीत्कार से आसपास खड़े सभी लोग दहल गए, वातावरण में ऊर्जा का उत्सर्जन बंद हो चुका था, बिना हाथों वाला अग्रज ज़मीन पर घुटने के बल बैठा हुआ था।

अग्रज- ये..ये तूने क्या किया?
नागराज- तू इसी के लायक था, मुझे तो अफसोस है कि मैं तेरा हश्र इससे और अधिक भयानक नही कर सका।

अग्रज बुरी तरह बिदक उठा, उसका शरीर नागराज की आँखों के सामने हवा में उठता चला गया।

अग्रज- मेरे हाथ उखाड़कर तू समझ रहा है कि ये खेल खत्म हो गया? अरे मूर्ख, त्रिफना तो महाकाल छिद्र प्राप्त करके रहेंगे, मैं नहीं तो कोई और सही लेकिन अब तुम पुण्य शक्तियों की जीत संभव नहीं।

तभी अचानक चीरचला उसके हृदय को चीरते हुए दूसरी तरफ से निकल आया, महात्मा कालदूत ने अग्रज की बची खुची साँसे भी छीन ली थीं। अग्रज का निष्क्रिय शरीर धरती पर गिर पड़ा, साथ ही समुद्र के पानी से बुरी तरह भीगे कालदूत भी धरती पर आ गए। कालदूत को देखकर सभी सैनिकों में हर्ष की लहर दौड़ गयी, विसर्पी की भी जान में जान आ गयी। नागराज इच्छाधारी रूप से सामान्य रूप में वापस आ गया और कालदूत के पास पहुँचकर पूछा- “आप कहाँ थे महात्मन?”

कालदूत- इस महाकाल छिद्र के दास ने हमें अचेत करके समुद्र के तल में मरने के लिए छोड़ दिया था। नहीं जानता था कि कालदूत सदियों पुराना साधक है जो पानी से भी ऑक्सिजन के तत्वों को खींचकर श्वास ले सकता है। लोग सही कहते हैं, शक्तिशाली से शक्तिशाली योद्धा भी अति आत्मविश्वास के कारण मारे जाते हैं।

फिर कालदूत को बाबा गोरखनाथ नज़र आते हैं जो कंधे पर शिकांगी नेवले को लादे उन्हीं की तरफ बढ़े चले आ रहे थे।
गोरखनाथ (मुस्कुराते हुए)- कैसे हो कालदूत?
कालदूत (आश्चर्य से)- बाबा गोरखनाथ आप? पचास हज़ार वर्ष बाद आज दर्शन हुए हैं आपके।
गोरखनाथ- तुम्हें तो पता ही है कालदूत की श्वेत शक्तियों को साधने के लिए गहन साधना की आवश्यकता होती है। वैसे भी पाप क्षेत्र के बंद हो जाने के बाद मुझे नहीं लगा था कि ब्रह्मांड में स्याह ऊर्जा की कालिमा फिर कभी फैल पाएगी।
कालदूत- स्याह ऊर्जा की कालिमा तो फैल ही रही है बाबा और अब तो महाकाल छिद्र त्रिफना प्राप्त करने के लिए भी ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहा है।
गोरखनाथ- मुझे आशंका थी कि महाकाल छिद्र त्रिदेवों की शक्ति से बने त्रिफना को प्राप्त करने का प्रयास करेगा क्योंकि ऐसा करके वह सभी समयधाराओं पर काबू करके सीधे इस सृष्टि के रचयिता ब्रह्मदेव को चुनौती दे सकता है परंतु वह ऐसा स्वयं नहीं कर सकता अन्यथा त्रिफना की शक्ति उसे भस्म कर देगी इसलिए वह ये सब पैंतरे आजमा रहा है। फिलहाल त्रिफना की सुरक्षा का क्या प्रबंध है?
विसर्पी- मैंने रोबो आर्मी और पंचनागों को त्रिफना की सुरक्षा के लिए भेज दिया है।
गोरखनाथ- मैं ध्यान लगाकर पता करता हूँ कि आसपास के वातावरण में कोई स्याह शक्ति मौजूद है या नहीं।

गोरखनाथ ने आँखें मूँद लीं, कुछ क्षण बाद ही उनके माथे पर चिंता की लकीरें आ गयीं, उन्होंने एकदम से अपनी आँखें खोलीं और बोले- “तीव्र स्याह शक्तियों के संकेत मिल रहे हैं।”

नागराज- ये संकेत कहाँ से मिल रहे हैं बाबा?
गोरखनाथ- नागद्वीप के भीतर से।
विसर्पी- नागद्वीप के भीतर से? पर कैसे? कहीं……उफ्फ! ये मैंने क्या कर डाला?
नागराज- क्या हुआ विसर्पी?
विसर्पी- मैंने रोबो और उसकी पूरी टीम को पंचनागों के साथ महात्मा कालदूत की गुफा के बाहर त्रिफना पर निगरानी रखने के लिए भेज दिया है नागराज और मुझे शक है कि ग्रैंडमास्टर रोबो महाकाल छिद्र का दास बन चुका है।

क्रमशः

Written by- Samvart Harshit for Comic Haveli

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3 Comments on “Earth 61 Phase 2 Part 20 (Second Stage)”

  1. जब कोई कहानी लिखी जाती है तो उसका फैलाव ये दर्शाता है कि लिखने वाली की पकड़ कहानी पे कितनी है। बड़ी कहानी में ऐसा बहुत बार देखा जाता है कि कहानी तो ओवरआल अच्छी होती है पर उसके कुछ पार्ट्स औसत या खराब हो जाते हैं। पर इस कहानी में हर्षित ने ये दिखा दिया है कि अगर आप अपनी सोच को खुली छूट दे और प्रयोग से नहीं डरे तो आप लेखन के क्षेत्र में कोई भी मुकाम पा सकते हैं। 20 अध्याय और 2 लाख के आस पास वर्ड्स में फैली ये महागाथा न सिर्फ राइटर की लेखन शक्ति बल्कि उसकी उसी सोच का नतीजा है। मसाले सबके पास होते हैं पर क्या हर कोई एक अच्छा कुक हो सकता है। नही। वैसे ही इस कहानी को लिखने के लिए घटनाएं, पात्र, जानकारी कोई भी हासिल कर सकता था पर उसे ऐसे धागे में पिरोना की हीरों का नौलखा हार बन जाये ये सब के बस की बात नहीं थी। हर्षित ने ये कर दिखाया है और बड़ी खूबसूरती से।
    कुछ कुछ पार्ट्स हैं जो और अच्छे हो सकते थे पर ये एक पाठक का कहना है। लिखने वाले के नजरिये से ये कहानी इससे अच्छी नही हो सकती थी जिसमे दुख, खुशी, प्यार, नफरत आदि का बेजोड़ समन्वय है।
    एक बार फिर earth 61 फेज 2 की अपार सफलता के लिए राइटर हर्षित, एडिटर देव और उनकी पूरी टीम को मेरी बधाई और धन्यवाद की उन्होंने एक ऐसे अविस्मरणीय कहानी का हिस्सा बनने का हमे भी मौका दिया।।

  2. इतनी जबरदस्त कहानी लिखी है कि मै सोच रहा सारे किरदार का चेहरा सामने नजर आ रहा है जैसे मै कोई फिल्म देख रहा हू
    इतनी गहराई से सोच पाना और उसे हकीक़त में पन्नों पे उतारना बेहद कठिन काम है लेकिन सच में आपने कमाल कर दिया

    जैसे लोग अंग्रेजी कॉमिक के दीवाने है जल्द ही इन कॉमिक को भी एक नए रूप में लाना जरूरी थी वरना लोग भूलने लगते है मुझे भरोसा है आप यह कार्य करते रहेंगे

    धन्यवाद

    1. बहुत धन्यवाद पंकज कुमार जी और पीयूष जी।
      आगे भी आपको इसी प्रकार की कहानियां देने का प्रयास रहेगा।

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