Earth 61 Phase 2 Part 20 (Third Stage)

षष्ठम खंड- योद्धा

उधर स्वर्गलोक में असुरराज शंभूक के आदेश पर जो देवता स्याह विवर के ऊदर में नहीं पहुँचे थे, उनको उन्हीं के स्वर्ग में ही मौजूद कारावास में कैद कर दिया।

यमराज (क्रोधित मुद्रा में)- इन असुरों का मनोबल स्याह विवर और महाकाल छिद्र के कारण इतना अधिक हो गया है अन्यथा इन्हें भी भान है कि स्वयं तो ये स्वर्ग के प्रहरियों को तक परास्त नहीं कर सकते, हमसे क्या ही युद्ध कर सकते हैं।
इंद्र- क्रोध करने से क्या होगा? हमें शांति से इस समस्या पर विचार करना होगा।
वरुण देव- क्या आपको बाबा गोरखनाथ ने मानसिक संपर्क द्वारा कोई जानकारी दी देवराज?
इंद्र- पृथ्वी पर भी भीषण रक्तपात मचा हुआ है लेकिन महाकाल छिद्र का उद्देश्य अब समझ में आ रहा है।
वरुण देव- क्या है उसका उद्देश्य?
इंद्र- त्रिफना को प्राप्त करना, बाबा गोरखनाथ ने इस बात की पुष्टि की है।
वरुण देव- क्या? लेकिन ऐसे तो…..
इंद्र- मुझे ज्ञात है कि त्रिफना उसके हाथ में जाने से क्या अनर्थ हो सकता है लेकिन स्याह विवर के रहते हम क्या कर सकते हैं?
चित्रगुप्त- पिछली बार स्याह विवर को सप्तर्षियों ने कैद किया था, वे ऐसे दोबारा भी कर सकते हैं।
इंद्र- हमें सप्तर्षियों से संपर्क करने का प्रयास करना चाहिए, जैसे कि वे पूर्व में भी अनगिनत कठिनाइयों के पश्चात ही उसे कैद किया गया था और इस समय उसके साथ महाकाल छिद्र की शक्ति है इसलिए वे भी वर्तमान में इस पर अंकुश लगा पाएंगे या नहीं ये कहना कठिन है।
यमराज- मुझे तो ये समझ में नहीं आ रहा कि आखिर त्रिदेवों ने अभी तक हस्तक्षेप क्यों नहीं किया?
इंद्र (मुस्कुराकर)- त्रिदेवों के पास इससे भी ऊपरी स्तर की समस्यायें हो सकती हैं। हमें सिर्फ अपनी समयधारा की चिंता है जबकि उनके पास अनगिनत समयधाराएं हैं और न जाने किस समयधारा में कितनी विकट परिस्थिति हो। तभी तो उन्होंने त्रिफना का निर्माण किया, ताकि उनकी अनुपस्थिति में हम लोग अपनी समयधारा का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकें।
यमराज- तो फिर त्रिफना को सक्रिय किया जाना चाहिए।
इंद्र- महाकाल छिद्र यही तो चाहता है कि त्रिफना किसी प्रकार से सक्रिय हो और उसे स्याह ऊर्जा हर ब्रह्मांड में फैलाने का अवसर मिल जाये। ऐसे वो त्रिदेवों का स्थान भी ले सकता है, फिलहाल अधिक से अधिक ये किया जा सकता है कि त्रिफना को उससे सुरक्षित रखा जाए क्योंकि त्रिफना कैसे कार्य करता है, ये पूरी तरह न कोई देवता जान सका है, ना यक्ष, ना गंधर्व और ना ही सृष्टि का कोई और प्राणी। फिलहाल हमें इस बात पर ध्यान लगाना चाहिए कि क्योंकि हम सब यहाँ कैद हैं तो सप्तर्षियों तक परिस्थिति की विषमता की सूचना कौन लेकर जाएगा? वे कई युगों से न जाने किस गुप्त स्थान पर साधनारत हैं।
चित्रगुप्त- वैसे एक प्राणी है जो सप्तर्षियों को ढूँढकर उन तक हमारी व्यथा को पहुँचा सकता है।
इंद्र- किसकी बात कर रहे हैं आप चित्रगुप्त?
चित्रगुप्त- आपके अनुज (छोटे भाई) देव शिरोमणि की।

यह नाम सुनकर देवराज इंद्र के चेहरे पर मायूसी के बादल छा गए।

चित्रगुप्त- क्या हुआ मान्यवर?
इंद्र- आप तो जानते हैं ना कि अनुज शिरोमणि से हमारे कैसे संबंध हैं? जब सृष्टि के आरंभिक समय में माता अदिति ने देवताओं को जन्म दिया और माता दिति ने असुरों को तब एक भविष्यवाणी हुई थी कि देवताओं और असुरों में सर्वाधिक श्रेष्ठ देव शिरोमणि के जन्म के लिए श्रेष्ठबीज का निर्माण करना होगा। महर्षि कश्यप ने श्रेष्ठबीज को माता अदिति के गर्भ में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया जिससे माता दिति कुपित हो गयीं। तत्पश्चात श्रेष्ठबीज के माता अदिति के गर्भ में स्थानांतरण के लिए महायज्ञ हुआ तब माता दिति ने असुरों के गुरु शुक्राचार्य की सहायता से यज्ञ में विघ्न डाला और श्रेष्ठबीज को अपने गर्भ में स्थानांतरित कर लिया। इस प्रकार से देव शिरोमणि का जन्म तो हुआ परंतु माता दिति की कोख़ से, शिरोमणि को जन्म से ही हर प्रकार की शिक्षा दीक्षा दी गयी, वह देवताओं और असुरों में सर्वश्रेष्ठ था लेकिन ना तो असुरों ने उन्हें कभी स्वीकार किया और ना ही देवताओं ने। इस प्रकार से देव शिरोमणि दुविधावश एकाकी रह गया लेकिन शेष देवताओं के विरोध के उपरांत भी मैंने सदैव शिरोमणि को अपना अनुज माना किन्तु हमारे लाख अनुरोध के बाद भी उसने स्वर्गलोक में अपना स्थान नहीं स्वीकारा और ना ही असुरलोक में। सबसे श्रेष्ठ होने के बाद भी शिरोमणि एक तिरस्कृत योद्धा बन कर रह गया लेकिन उसने अलग अलग ग्रहों पर भ्रमण करके वहाँ वास करने वाली प्रजातियों की सहायता करने की ठानी और शीघ्र ही उसकी कीर्ति “योद्धा” के रूप में चारों ओर फैल गयी। देव शिरोमणि ने योद्धा का नाम धारण करके एक ग्रह से दूसरे ग्रह घुमन्तुओं जैसा जीवन यापन प्रारम्भ कर दिया, हम समय निकालकर उसका कुशल क्षेम लेते रहे किन्तु समय के साथ साथ राज काज के कार्यों ने हमें भी व्यस्त कर दिया।
चित्रगुप्त- क्या आपको लगता है कि देव शिरोमणि हमारी सहायता करेंगे?
इंद्र- शिरोमणि ने पूरे ब्रह्मांड की रक्षा का दायित्व अपने कन्धे पर ले रखा है, उसे इस संकट के विषय में सूचित करना आवश्यक है। हम कुछ समय गहन ध्यान करके देव शिरोमणि की स्थिति का पता लगा सकते हैं और अपने मानस रूप द्वारा उस तक संदेश पहुँचा सकते हैं। देखना कोई असुर सैनिक घूमता हुआ यहाँ कारावास तक ना आये अन्यथा उन्हें हमारे विचार की भनक हो सकती है।
चित्रगुप्त- ठीक है देवराज, आप ध्यान केंद्रित करके देव शिरोमणि की स्थिति का पता करिए। कोई राक्षस सैनिक इस ओर आएगा तो हम सब उसका ध्यान बँटा देंगे।

पृथ्वी से सैकड़ों प्रकाशवर्ष दूर किसी अन्य आकाशगंगा के सौर मंडल में स्थित था जीवन से परिपूर्ण शांतिप्रिय प्राणियों का ग्रह- सौरो। सौरो ग्रह के सभी निवासी हरे रंग के दुबले पतले प्राणी हैं जो कभी किसी के प्रति बैर भाव नहीं रखते और प्रकृति से जुड़े रहने पसंद करते हैं लेकिन आज उस ग्रह की स्थिति एकदम प्रतिकूल थी। बेहद आधुनिक स्तर के जीवों के ग्रह मैकट्रायम की एक टुकड़ी ने सौरो पर हमला कर दिया था, सौरो के अहिंसक निवासी मैकट्रीयम्स का सामना कर पाने में असक्षम थे जो अपने लीडर मैक्रोबॉट और उसके सिपहसालार बर्टऑनिक की अगुवाई में उस ग्रह पर भीषण तबाही मचा रहे थे। मैकट्रीयम्स देखने में धातुई रोबोट जैसे लगते थे लेकिन उनके धातु के शरीरों के अंदर प्राण ऊर्जा मौजूद थी, उनके जैसे भीषण हथियार ब्रह्मांड में कुछेक प्रजातियों के पास ही थे।
उनकी विध्वंसक शिप की बड़ी सी लेज़र गन का शिकार बहुत बड़े पैमाने पर सौरो ग्रह की हरियाली हो रही थी।
सौरो ग्रह का राजा प्रग अपने सिपाहियों के साथ बाकी लोगों को उस विनाश के मंजर से दूर ले जाने का काम कर रहे थे। एक सिपाही उनके पास दौड़ता हुआ आया और बोला- “महाराज! ये अचानक से मैक्रोबॉट ने हमारे ग्रह पर हमला क्यों कर दिया है?”
प्रग चिंतित स्वर में बोला- “पता नहीं! मैकट्रायम से तो हमारे संबंध कभी भी बुरे नहीं थे, उनके पास हम पर हमला करने का कोई कारण नहीं है।”
सिपाही चारों तरफ फैली तबाही को देखकर बोला- “फिलहाल तो हमें ये सोचना चाहिए कि हम इनसे बचें कैसे? क्योंकि जिस पैमाने पर ये विनाश फैला रहे हैं, पूरा ग्रह संकट में है।”
प्रग सिपाही की तरफ देखकर बोला- “तुम चिंता ना करो! कुछ सिपाहियों ने “योद्धा” से संपर्क किया है, वह यहाँ आते ही होंगे।”
सिपाही ने आश्चर्य से पूछा- “क्या? योद्धा हमारे सौरमंडल में उपस्थित थे?”
प्रग मुस्कुराकर बोले- “योद्धा हर उस जगह होता है जहाँ निर्दोष और निर्बल पर अत्याचार हो रहा होता है।”

सौरो ग्रह का प्रशासन प्रजा को जल्दी जल्दी उस स्थान से निकालने का कार्य कर रहा था। अब मैकट्रीयम्स अपनी स्पेसशिप से निकलकर सौरो की धरती पर आ गए थे, उनके विनाशकारी यंत्र न जाने कितने निर्दोषों की जान ले चुके थे। उन्हीं निर्दोषों में एक छोटी सी बच्ची थी जो अपने माता पिता से बिछड़ जाने पर रो रही थी, मैकट्रीयम्स का सेनानायक बर्टऑनिक उस बच्ची के पास पहुँचा और अपने धातुई हाथ को उसके छोटे से माथे पर फिराकर बोला- “चिंता मत करो बालिका, पल भर की मृत्यु में दर्द नहीं होता।”

फिर उसकी कलाई से छोटी सी बंदूक निकली जिसे उसने उस बच्ची के ऊपर तान दिया, बच्ची भय से जड़वत हो गयी थी कि तभी न जाने कहाँ से एक बेहद विचित्र सा अस्त्र हवा में उड़ता हुआ आया और बर्टऑनिक के यांत्रिक शरीर के परखच्चे उड़ाता वापिस अपने धारक के हाथ में पहुँच गया। सभी मैकट्रीयम्स और सौरोवासियों का ध्यान उस ओर चला गया, जहाँ देव शिरोमणि अपने अद्वितीय अस्त्र ढ़कमानघन के साथ किसी अडिग चट्टान की तरह खड़ा था। छह फुट सात इंच का बलिष्ठ शरीर, घने लंबे बाल और हाथ में थमा धकमानघन उसे बेहद विलक्षण रूप प्रदान कर रहा था। उसको देखते ही सारे सौरोवासी हर्ष से “योद्धा! योद्धा!” के नारे लगाने लगे।

शिरोमणि- जब जब किसी पवित्र भूमि पर तुम जैसे नराधमों के पग पड़ेंगे तो आपके पगों के नीचे से धरातल खींच लेगा शिरोमणि!

अब सारे विध्वंसक लेज़र हथियारों का केंद्र शिरोमणि का शरीर बन गया था, अपने सेनानायक की मौत से विचलित होकर सभी मैकट्रीयम्स ने शिरोमणि को खत्म करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। लेज़र बीम के ताबड़तोड़ प्रहार के बाद धूल का उठता गुबार सब कुछ ढक चुका था लेकिन जैसे ही धूल का वह गुबार छंटा, योद्धा किसी अडिग चट्टान की तरह खड़ा था। ये देखकर सभी मैकट्रीयम्स के साथ उनका राजा मैक्रोबॉट भी चौंक गया। अब शिरोमणि किसी सिंह की मानिंद कुलांचे भरता शत्रु के खेमे में घुस गया, उसके पाषाण जैसे प्रहार के आगे मैकट्रीयम्स के धातुई शरीर बेहद तुच्छ साबित हो रहे थे। ढ़कमानघन से एक साथ निकलने वाले कई तीर एक साथ कई मैकट्रीयम्स को मौत की नींद सुला चुके थे।
धरातल पर पहुँचे सारे मैकट्रीयम्स समाप्त हो चुके थे, अब बस बची थी उनकी बड़ी सी शिप जिसमें मौजूद था उनका राजा मैक्रोबॉट। शिप धरातल से बस बीस फुट ऊपर थी, इससे पहले कि शिप में लगी बड़ी सी लेज़र गन शिरोमणि को अपना शिकार बनाती, वह चीते की सी चपलता से भागा और बेहद ऊँची छलांग भरकर शिप के निचले हिस्से तक पहुँच गया, वहाँ बेहद फुर्ती से उसने ढ़कमानघन को शिप के निचले हिस्से में फँसा दिया और दूसरे हाथ से इतना भीषण प्रहार किया कि अंदर जाने लायक बड़ा छेद हो गया। बस फिर तेजी से बिना समय नष्ट किये शिरोमणि शिप के अंदर पहुँच गया जहाँ सिर्फ मैक्रोबॉट मौजूद था।

मैक्रोबॉट- स्वागत है देव शिरोमणि उर्फ योद्धा।
शिरोमणि- क्यों आये हो तुम यहाँ? और इस आक्रांत के मध्य तुम्हारा उद्देश्य क्या है?
मैक्रोबॉट- मैं तुम्हारा सवाल समझा नहीं।
शिरोमणि- क्या आपका ब्रह्मानुवादक (Universal Translator) नष्ट। भ्रष्ट हो गया है जो मेरी भाषा बूझने में आपको समस्या आ रही है? आखिर क्या उद्देश्य था इस अकस्मात आक्रमण के पीछे?
मैक्रोबॉट- ओह, यानी कि तुम्हें नहीं पता कि समूचा ब्रह्मांड किस प्रकार की समस्या से जूझ रहा है, और पता भी कैसे होगा? तुम तो ब्रह्मांड के इस हिस्से में हो जहाँ स्याह ऊर्जा की धमक अभी तक पहुँची नहीं है।
शिरोमणि- स्याह ऊर्जा? स्पष्ट रूप से बताओ।
मैक्रोबॉट- स्याह ऊर्जा के जनक महाकाल छिद्र पाप क्षेत्र से स्वतंत्र हो गए हैं शिरोमणि, ब्रह्मांड की जितनी प्रजातियों को इस बारे में खबर है वे सभी महाकाल छिद्र की दासता स्वीकार करने को तैयार है। वैसे तो हमें इस तुच्छ ग्रह और यहाँ के प्राणियों से कोई मतलब नहीं था लेकिन महाकाल छिद्र की शरण इसी आधार पर मिलेगी की कौन कितना क्रूर है, यहाँ हम क्रूरता का प्रदर्शन करने ही आये थे। आने वाले समय में पुण्य शक्तियाँ पूरी तरह से नष्ट हो जाएंगी, समझदार वही है जो शक्तिशाली की शरण में चला जाये। मुझे तो ये आश्चर्य है कि तुम्हें देवता होकर इस बारे में कैसे नहीं पता? ओह समझा, तुम तो अपने देव बंधु अथवा असुर बंधुओं से संबंध ही नहीं रखना चाहते। तुम्हें भला कैसे पता होगा? हाहाहा!

मैक्रोबॉट की मशीनी हँसी ने शिरोमणि की क्रोधाग्नि में घी डालने का काम किया था। उसने ढ़कमानघन उठाया और एक ही झटके में मैक्रोबॉट की गर्दन को धड़ से जुदा कर दिया, मैक्रोबॉट के मरते ही शिप भी निष्क्रिय होकर कठोर धरातल पर गिर पड़ा और योद्धा उसमें से बाहर निकल आया। ये छोटी समस्या खत्म हो गयी थी लेकिन मैक्रोबॉट की बातें अभी भी उसके मस्तिष्क में गूँज रही थीं, वह जानता था कि महाकाल छिद्र के स्वतंत्र होने का क्या अर्थ है। उसने अपने आसपास देखा, सौरो ग्रह का वह भाग बुरी तरह तबाह हो चुका था, लोग अपने प्रियजनों के शवों को भीगी आँखों और भारी मन से खोज रहे थे।
तभी अचानक तीव्र प्रकाश हुआ और उसके सामने देवराज इंद्र का मानस रूप आ खड़ा हुआ।
शिरोमणि आश्चर्य से बोला- “भ्राता इंद्र आप! आप यहाँ कैसे?”
इस पर देवराज इंद्र ने उत्तर दिया- “क्या तुम्हें ज्ञात है शिरोमणि कि क्या अनर्थ हुआ है?”

शिरोमणि- हाँ, विलंब से ही सही परंतु मुझे सब ज्ञात हो गया है। महाकाल छिद्र पाप क्षेत्र से स्वतंत्र हो चुका है।
इंद्र- मात्र महाकाल छिद्र ही नहीं, अपितु ग्रहों का भक्षक स्याह विवर भी स्वतंत्र हो चुका है और उसी के बल पर असुरराज शंभूक ने हम देवताओं को बंधक बना लिया है।
शिरोमणि- भ्राता शंभूक का ये दुस्साहस! हम स्वर्गलोक पहुँचने के लिए शीघ्रातिशीघ्र निकलते हैं।
इंद्र- यहाँ कदापि न आना शिरोमणि, स्याह विवर आधे देवताओं को अपने ऊदर में पहुँचा चुका है और आधे कारावास में कैद हैं। मैं तुमसे कारावास के भीतर से ही संपर्क साध रहा हूँ। तुम भी उसके समक्ष क्षण भर से अधिक नहीं टिक पाओगे।
शिरोमणि- तो फिर आप ही बताइए कि मैं क्या करूँ? स्वर्गलोक मैं आ नहीं सकता और तामसिक प्रवृत्ति वाले अपने असुर भ्राताओं का साथ मैं किसी कीमत पर नहीं दूँगा।
इंद्र- एक ही तरीका है, स्याह विवर को मात्र सप्तर्षि ही रोक सकते हैं क्योंकि पिछली बार भी उन्होंने ही मुख बंधन लगाकर उस पर अंकुश लगाया था। तुम्हें सप्तर्षियों को ढूँढना होगा। मेरी मानसिक तरंगें उन्हें नहीं खोज पा रही हैं इसलिए मैंने तुमसे संपर्क किया है, अब सभी देवताओं की आस तुमसे है।
शिरोमणि- सप्तर्षियों का पता तो मुझे भी नहीं ज्ञात परंतु यदि वे ही इस ब्रह्मांड को बचाने की आखिरी उम्मीद हैं तो मैं उन्हें अवश्य ढूँढूँगा।
इंद्र- शीघ्र करना शिरोमणि, स्याह ऊर्जा की कालिमा तेज़ी से सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त होती जा रही है।

इतना कहकर देवराज इंद्र का मानस रूप अंतर्ध्यान हो गया। योद्धा अवाक रह गया था, उसने इतनी दुष्कर परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी।
राजा प्रग शिरोमणि के पास जाकर बोले- “बहुत धन्यवाद योद्धा, यदि आप ना होते तो शायद पूरा ग्रह काल के गर्त में समा जाता।”
शिरोमणि उनकी तरफ मुड़कर बोला- “मुझे खेद है कि इतने प्रयास के बावजूद कई इतने प्राणी काल के ग्रास हो गए।”

प्रग- यह तो इस ग्रह का दुर्भाग्य है कि हमने कभी इस प्रकार की परिस्थिति के लिए खुद को तैयार नहीं किया परंतु हमने आपका और देवराज इंद्र के मानस रूप का वार्तालाप सुन लिया है। हमें सप्तर्षियों का आवास स्थान ज्ञात है परंतु…..
शिरोमणि- परंतु क्या?
प्रग- हमारे पूर्वजों के समय से एक किवदंती प्रचलित है कि सप्तर्षि एक ऐसे स्थान पर हैं जहाँ जीवन मात्र प्रकाश और ध्वनि के रूप में ही रह सकता है, उसे ब्रह्मांड का अंतिम छोर भी कहा जाता है। वे वहाँ कई युगों से गहन साधना कर रहे हैं, उनसे पूर्व न तो उस स्थान पर कोई गया है और ना ही उनके आगमन के पश्चात वहाँ कोई गया है। यदि आप वहाँ जाकर उनकी साधना भंग करने का प्रयास करेंगे तो कहीं उनके कोप का भाजन ना बन जाएं।
शिरोमणि- इस समय पूरी सृष्टि खतरे में है, ऐसे में मैं अपने जीवन की चिंता नहीं कर सकता। दुविधा बस एक है कि मैं ब्रह्मांड के उस छोर में पहुँचूँगा कैसे?
प्रग- उसकी चिंता करने की आवश्यकता भी आपको नहीं है।

इतना कहकर प्रग आँखें बंद करके कुछ बड़बड़ाया और एक विशुद्ध ऊर्जा का बना घोड़ा योद्धा के सामने प्रकट हो गया।

शिरोमणि- यह तो ऊर्जाश्व है, इन्हें देवता ब्रह्मांड भ्रमण के लिए उपयोग में लाते थे। मुझे लगता था कि यह प्रजाति विलुप्त हो चुकी है।
प्रग- यह प्रजाति अन्य स्थानों से विलुप्त हो चुकी है पर चूँकि हमारा ग्रह पर्यावरण रक्षा को प्राथमिकता देता है, आपको यहाँ ऐसे कई प्राणियों का अस्तित्व मिलेगा जिन्हें आप विलुप्त समझते हैं। यह ऊर्जाश्व बेहद विशिष्ट है, इसका नाम है “खुर्रा”, इससे तेज़ ऊर्जाश्व मैंने आज तक नहीं देखा परंतु ऐसे विलक्षण अश्व का उपयोग कब होता है? किसी युद्ध की स्थिति में या फिर अंतरिक्ष भ्रमण के लिए और दोनों ही परिस्थितियां हमारे लिए संभव नहीं थी। हम अहिंसावादी होने के कारण युद्ध नहीं करते थे और हमारे शरीर अंतरिक्ष के निर्वात को झेलने योग्य नहीं थे परंतु आप युद्ध के लिए भी जा रहे हैं और आपके शरीर पर अंतरिक्ष के वातावरण का भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। हमारी तरफ से यह बहुमूल्य उपहार स्वीकार करें।
शिरोमणि- बहुत बहुत धन्यवाद राजा प्रग, आपका ये उपकार नहीं भूलेगा शिरोमणि।
प्रग- गलत योद्धा, जिस उद्देश्य के लिए आप जा रहे हैं यदि वो सफल हो गया तो पूरा ब्रह्मांड आपका उपकार नहीं भूलेगा।

इसके बाद योद्धा शिरोमणि ने प्रग से विदा ली और खुर्रा पर बैठकर सप्तर्षियों की खोज में ब्रह्मांड भ्रमण पर निकल पड़ा।

ग्रैंड मास्टर रोबो, नताशा और बाकी रोबो आर्मी को पंचनाग महात्मा कालदूत की गुफा तक लेकर आ गए थे।

नागार्जुन- बस, इस गुफा की सीमा के भीतर जाने का अधिकार महात्मा कालदूत के ही पास है। हमें बाहर रहकर ही त्रिफना कि रक्षा करनी होगी।
रोबो- नहीं, हमें गुफा के अंदर जाना चाहिए।
नताशा- लेकिन बाहर रहकर सुरक्षा करने में क्या समस्या है डैड?
रोबो (गुस्से से)- तुम चुप रहो नताशा! मुझसे खुद नागसाम्राज्ञी विसर्पी ने त्रिफना की रक्षा करने के लिए याचना की है, मैं जैसा ठीक समझूंगा वैसा ही करूँगा।

रोबो का अकस्मात क्रोध देखकर नताशा के साथ साथ पंचनागों का भी माथा ठनका।

सर्पराज- गुफा के अंदर जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, यदि त्रिफना की रक्षा करनी है तो बाहर रहकर करो अन्यथा चलते बनो।

सर्पराज की बात सुनकर रोबो ने पहले एक ठंडी आह भरी और फिर मुस्कुराता हुआ बोला- “तुम अगर मेरी बात मान लेते तो जिंदा बच जाते मूर्खों, लेकिन शायद तुम्हारी मृत्यु मेरे ही हाथों लिखी है! रोबो आर्मी, खत्म कर दो सबको!”

कई सारी ऊर्जा गन एक साथ चलीं लेकिन सतर्क पंचनाग फुर्ती से हर वार बचा गए, पंचनागों ने रणभूमि पर देखा था कि किस प्रकार से इस गन से निकली ऊर्जा किरण का स्पर्श मात्र ही प्राणियों को राख के ढेर में बदल सकता है इसलिए वे बेहद सतर्कता से बचने का प्रयास कर रहे थे। नताशा रोबो का यह रूप देखकर हक्की बक्की रह गयी थी।

सिंहनाग- इसे ज़रूर महाकाल छिद्र ने ही भेजा है त्रिफना हासिल करने के लिए!
नागप्रेती- इनके वारों से बचो और आक्रमण करो।

पंचनागों के विलक्षण युद्धकौशल के आगे रोबो आर्मी ऊर्जा गन के बावजूद टिक नहीं पा रही थी। सर्पराज ने ऊर्जा गन के ताबड़तोड़ वार से बचने के लिए गदा मारकर रोबो आर्मी के एक सैनिक को दूसरे सैनिक की गन से निकली ऊर्जा किरण के सामने उछाल दिया, उस सैनिक की राख भी बुरी तरह विखंडित हो गयी। नागदेव ने अपनी दाढ़ी से तीन चार सैनिकों को जकड़ा और नागप्रेती के सामने ला खड़ा किया, नागप्रेती ने उनको बुरी तरह जकड़ लिया और वे उसके कंकाल जैसे शरीर में समाते चले गए। नागार्जुन ऊर्जा किरणों से बचने के लिए हवा में लपका और हवा में ही रहते हुए एक के बाद एक ताबड़तोड़ तीरवर्षा कर दी, उसके तीर इतने सटीक थे कि रोबोआर्मी के चार लोगों को एक साथ बींध डाला। सिंहनाग भी दहाड़कर एक सैनिक पर उछला, उसका ध्यान पीछे की तरफ नहीं था जहाँ दूसरा सैनिक ऊर्जा गन लिए उसी की तरफ बढ़ रहा था लेकिन इससे पहले कि वह सिंहनाग को अपना शिकार बनाता वह खुद उस ऊर्जा किरण द्वारा राख के ढेर में परिवर्तित हो गया जो नताशा की गन से निकली थी। रोबो यह देखकर बेहद क्रोधित हो गया और उसका मशीनी हाथ का थप्पड़ तेजी से नताशा के चेहरे पर लगा, नताशा वह भारी वार झेल नहीं पाई और बेहोश हो गयी। सिंहनाग ने देख लिया था कि नताशा ने उसे बचाया है, वह रोबो की तरफ लपका पर रोबो की लेजर आई से निकली किरण उसके सिर को भेदती हुई पार निकल गयी। सिंहनाग की आखिरी दहाड़ युद्ध के मैदान में गूँज गयी। नागार्जुन, नागदेव, सर्पराज और नागप्रेती के कानों में वह आवाज़ पिघले शीशे की तरह चुभ गयी। उन्होंने उस तरफ देखा जहाँ सिंहनाग का निर्जीव शरीर पड़ा हुआ था, वहीं पास खड़े रोबो के चेहरे पर क्रूर मुस्कुराहट थी।
“नहीं!” चारों योद्धा एक साथ चीखे, वे रोबो की तरफ तेज कदमों से बढ़ने लगे लेकिन रोबो के शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगे। उसकी आँखें अग्रज की आँखों की तरह पूर्णतयः स्याह हो चुकी थीं, नागार्जुन के सैकड़ों तीर उसके शरीर पर कोई असर नहीं डाल पाये। सर्पराज ने अपना भूमंडा तेजी से उसपर फेंक कर मारा जिसे उसने अपने हाथों से रोककर उसी की तरफ फेंक दिया, भूमंडा बेहद तीव्र गति से सर्पराज से ही टकरा गया, उसकी पसलियाँ टूटकर उसके खून में मिल गयीं और उसके मुँह से रक्त की धारा फूट पड़ी। इससे पहले की नागदेव, नागप्रेती और नागार्जुन कुछ कर पाते, बाकी बची रोबो आर्मी उनकी तरफ बढ़ने लगी। सर्पराज बुरी तरह घायल हो चुका था, सिंहनाग की अकस्मात मृत्यु के बाद बाकी सबके हौंसले भी पस्त हो चुके थे। सबने एक दूसरे का हाथ थाम लिया, नागार्जुन बाकी तीनों की तरफ देखकर बोला “हम सब अच्छी तरह लड़े साथियों, मुझे खुशी है कि अपने जीवनकाल में मुझे नागद्वीप की रक्षा करने का सौभाग्य मिला और तुम जैसे साथी मिले। हम सबका साथ यहीं तक था।”

एक साथ कई सारी ऊर्जा गन एक साथ चल उठीं, ऊर्जा किरणों ने चारों पंचनागों को एक साथ निशाना बना लिया। उन अदम्य साहसी वीरों के शरीर नागद्वीप की भूमि पर ही राख हो गए, जिस भूमि की उन्होंने जीवन पर्यंत रक्षा करती थी।

रोबो के अट्टहास ने वातावरण को दहला दिया था- “हाहाहा! ग्रैंडमास्टर रोबो को रोकने चले थे, जो रोबो से टकराता है वो ऐसे ही धूल में मिल जाता है!”

“नहीं!” नागराज की चीख से पूरा वातावरण दहल उठा था जो ठीक उसी वक्त वेदाचार्य, गोरखनाथ, विसर्पी, कालदूत, धनंजय, बाकी ब्रह्मांड रक्षकों और सेना के बचे खुचे लोगों के साथ घटनास्थल पर पहुँचा था। बचपन के मित्र जिनके साथ वह खेला, कूदा, बड़ा हुआ, उनको बचाने के लिए वह समय पर नहीं पहुँच सका था। विसर्पी और कालदूत भी बिल्कुल स्तब्ध थे, उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि अभी अभी उन्होंने पंचनागों के शरीर को खाक होते देखा।
रोबो अपनी आर्मी की तरफ देखकर बुलंद आवाज़ में बोला- “देखते क्या हो? इन सबको भी राख बना दो!”

रोबो आर्मी ने ऊर्जा गन बाकी लोगों की तरफ तानने से पहले ही नागराज की कलाई से असंख्य नाग निकले जिन्होंने रोबो आर्मी के हर एक व्यक्ति पर धावा बोल दिया और उनके हथियार गिरा दिए। अचानक से सभी लोगों ने रोबो आर्मी पर धावा बोल दिया लेकिन उनके अंदर आश्चर्यजनक शारीरिक परिवर्तन आने लगे, रोबो आर्मी के सैनिक मनुष्य से राक्षस में परिवर्तित हो रहे थे।

रोबो- हाहाहा! ये अवश्य महाकाल छिद्र की महिमा है, उनके रहते तुम हमारा कोई अहित नहीं कर सकते। जय महाकाल छिद्र!

बाबा गोरखनाथ को बेहद तीव्र स्याह ऊर्जा के संकेत प्राप्त हुए, वे चिंतित होकर बोले- “इतनी अधिक भीषण स्याह ऊर्जा के संकेत मिलने का एक ही अर्थ है, स्याह ऊर्जा का जनक खुद रणभूमि में उतर आया है।”

तभी अचानक हर जगह अँधकार छा गया, स्याह आकाश और अधिक स्याह हो गया। बाबा गोरखनाथ की नजरें ऊपर आसमान की ओर उठ गयीं जहां महाकाल छिद्र एक जगह स्थिर खड़ा हुआ था, चार भुजाओं वाला महाकाल छिद्र दूर से भी बेहद भयानक लग रहा था। सबने अब तक उसकी उपस्थिति को भांप लिया था, भेड़िया ने गोरखनाथ से पूछा- “यह नीचे क्यों नहीं आ रहा है बाबा?”
गोरखनाथ- वो नहीं आ सकता क्योंकि त्रिफना अपनी परिधि में किसी विशुद्ध स्याह शक्ति को नहीं आने देता। तभी तो एक के बाद एक वह मनुष्यों को अपनी स्याह ऊर्जा देकर उनके माध्यम से त्रिफना को सक्रिय करना चाहता है। हम उसके मंसूबों को पूरा होने नहीं दे सकते।

इतना कहकर बाबा गोरखनाथ धरातल छोड़कर आकाश में मौजूद महाकाल छिद्र के ठीक सामने जा पहुँचे।

महाकाल छिद्र- तो अंततः हमारा सामना हो ही गया श्वेत शक्तिधारक।
गोरखनाथ- यह सब तो नियति का खेल है, इस खेल में तुम्हारी पराजय भी निश्चित है महाकाल छिद्र।
महाकाल छिद्र- मैं अपनी नियति खुद तय करता हूँ, तुम तुम अपनी चिंता करो।

गोरखनाथ के हाथों से भारी मात्रा में श्वेत ऊर्जा निकली जिससे बचने के लिए महाकाल छिद्र ने भी स्याह ऊर्जा का जवाबी हमला कर दिया।

ब्रह्मांड रक्षक अभी अभी राक्षस सेना में परिवर्तित हुई रोबो आर्मी से भिड़ गए थे। सूरज, मोनिका और चीता उन राक्षसों के वार से बचते हुए फुर्ती से उनकी ज़मीन पर पड़ी हुई ऊर्जा गन हासिल करने में कामयाब रहे। उसके बाद राक्षसीकृत रोबो आर्मी के खेमे में जलजला मच गया, एक के बाद एक सूरज आगे बढ़ता हुआ उनको ऊर्जा किरणों के वार से खाक करता जा रहा था। उसके पीछे पीछे मोनिका और चीता भी उसको कवर देते हुए चल रहे थे। भेड़िया को किसी ऊर्जा गन की ज़रूरत नहीं थी, वह ताबड़तोड़ गदा के वारों से शत्रुओं को ढेर करता चला जा रहा था। एंथोनी और जैकब भी सम्पूर्ण बल लगाकर लड़ रहे थे, वे किसी भी कीमत पर एक भी राक्षस को नागद्वीप की बाकी निर्दोष प्रजा तक पहुंचकर तबाही मचाने से रोकना चाहते थे। पंचनागों कि मृत्यु से द्रवित हो उठे कालदूत तो चीरचला से शत्रुओं को चीरते चले जा रहे थे, उनकी आँखों के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे, राक्षस रोबो आर्मी की एक बड़ी टुकड़ी को वो अकेले ही नेस्तनाबूत कर चुके थे। धनंजय के नेतृत्व में स्वर्णनगरी के योद्धाओं की टुकड़ी और बाकी इच्छाधारी सैनिक नागद्वीप की साधारण जनता की सुरक्षा को सुनिश्चित कर रहे थे।
नागराज,ध्रुव,शक्ति और परमाणु एक साथ कालदूत की गुफा के मुहाने पर खड़े रोबो की तरफ बढ़ रहे थे। वह भी अग्रज की तरह एक स्याह शक्ति में बदल चुका था। इससे पहले की वे कुछ करते, रोबो ने बेहोश पड़ी नताशा को उठाया और उसके मशीनी हाथ से उसकी गर्दन को जकड़ता हुआ बोला- “जितने जल्दी तुम्हारे कदम मेरी तरफ बढ़ेंगे, उतनी जल्दी नताशा की गर्दन पर मेरी पकड़ और मजबूत हो जाएगी।”

ध्रुव- तुम अपनी ही बेटी की जान ले लोगे?
रोबो- कौन बेटी? जो मुझे ठोकर मारकर तेरे पास चली गई?
ध्रुव- ये तुम नहीं महाकाल छिद्र की स्याह शक्तियों का जोर बोल रहा है रोबो, वही स्याह शक्ति जो इस वक्त तुम्हारे रग रग में प्रवाहित हो रही है। जिस रोबो को मैं जानता हूँ वह कभी अपनी बेटी पर आँच नहीं आने दे सकता।
रोबो- तो फिर समझ लो कि वह रोबो मर गया, यह रोबो सिर्फ महाकाल छिद्र का भक्त है जो उनके उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ भी करेगा। अब चुपचाप मुझे त्रिफना लेने के लिए गुफा के अंदर जाने दो और इस लड़की को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा।

ध्रुव ने शक्ति को कुछ इशारा किया, शक्ति ने हल्के से सिर हिला दिया। इससे पहले की रोबो कुछ समझ पाता, शक्ति उसके पीछे पहुँचकर उसे नताशा से दूर उछाल चुकी थी और बेहोश नताशा को ध्रुव के पास ले आयी थी।
“तुम सब मिलकर भी मुझे नहीं रोक पाओगे!” रोबो क्रोध से बोला, देखते ही देखते उसका शरीर सामान्य मनुष्य के शरीर का चौगुना हो गया। उसकी आँख से निकलने वाली लेज़र किरण भी अतिभीषण हो गयी थी, ध्रुव तो लेज़र किरण की मार से बच गया लेकिन नागराज उसकी चपेट में आ गया। नागराज को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे नरक की दहकती भट्टी में झोंक दिया हो, शक्ति ने ऊष्मा प्रहार करके रोबो को नागराज से दूर किया। नागराज के शरीर से धुआँ उठने लगा था, ध्रुव को लेज़र किरण की बढ़ी हुई शक्ति का अहसास हो चुका था। जिस किरण ने नागराज जैसे महाशक्तिशाली का यह हाल कर दिया, उसकी चपेट में आकर उसकी राख भी नहीं बचती।
शक्ति ने रोबो के आधे मशीनी शरीर की धातु को पिघलाने के प्रयास किया लेकिन स्याह ऊर्जा के कवच के कारण वह असफल रही। परमाणु भी तीव्र ब्लास्ट्स छोड़कर शक्ति का साथ देने लगा।

ध्रुव (नागराज के पास पहुँचकर)- तुम ठीक हो नागराज?
नागराज- उफ्फ, हाँ ध्रुव। सूक्ष्म सर्पों को घाव भरने में थोड़ा समय लगेगा, इस कमबख्त की स्याह ऊर्जा मिश्रित लेज़र किरण बेहद घातक है। तुम लोगों को बचना होगा।
ध्रुव- बचना नहीं, मुझे लगता है कि हमें त्रिफना रोबो को सौंप देना चाहिए।
नागराज- ये तुम क्या कह रहे हो ध्रुव? दिमाग तो ठीक है?
ध्रुव- मेरा दिमाग एकदम ठिकाने पर है नागराज, पहले मेरी योजना तो सुनो।

उधर ध्रुव नागराज को अपनी योजना सुना रहा था और वहाँ शक्ति और परमाणु रोबो से भिड़े हुए थे। रोबो के अंदर अग्रज जैसा ही आश्चर्यजनक बाहुबल आ गया था, शक्ति और परमाणु को सिर्फ उसकी लेज़र आई से ही नहीं बल्कि अचानक से बढ़ी हुई शारीरिक क्षमता से भी बचना था। तभी अचानक रोबो के मशीनी हाथ में परमाणु की गर्दन आ गयी, उसने परमाणु को ट्रांसमिट होने का मौका दिए बगैर कठोर धरातल पर पटक दिया।
शक्ति ने प्रचंड ऊष्मा प्रहार करने की कोशिश की लेकिन रोबो में एक हाथ मारकर उसे भी दूर झटक दिया।
रोबो की मशीनी आँख से स्याह ऊर्जा मिश्रित लेज़र किरण का वार का शिकार शक्ति बन गयी, उस किरण की इंटेंसिटी इतनी तीव्र थी कि शक्ति को घुटनों के बल बैठने को मजबूर कर दिया।
यह देखकर ध्रुव नागराज से बोला- “जल्दी करो नागराज! त्रिफना लाकर रोबो को सौंप दो वरना वह शक्ति को मार डालेगा!”

शक्ति ने इतनी भीषण पीड़ा कभी नहीं सही थी, उसकी त्वचा झुलसने लगी थी, उसके अपना अंत नज़दीक लगने लगा था कि अचानक ही रोबो की लेज़र किरण उस तक पहुँचना बंद हो गयी। वह मौके के फायदा उठाकर तुरंत वहाँ से हट गई लेकिन तभी उसने मुड़कर जो देखा तो उसकी साँसे हलक में अटक गयीं, अब वह समझ गयी थी कि रोबो ने लेज़र किरण का भीषण वार क्यों बंद किया, क्योंकि उसके और लेज़र किरण के तीव्र वार के बीच में आ गया था उसका मुँह बोला भाई विनय उर्फ वन्डरमैन परमाणु लेकिन अफसोस कि एस्बेस्टस की पोशाक के नीचे परमाणु सिर्फ एक सामान्य इंसान था जो इतनी भीषण ऊर्जा का वार झेलने में पूरी तरह अक्षम था। लेज़र किरण ने उसके शरीर को बुरी तरह झुलसा दिया था, एस्बेस्टस की पोशाक तो शरीर से बुरी तरह उधड़ ही गयी थी लेकिन साथ ही साथ त्वचा भी बुरी तरह जल गई थी। रोबो भी बहादुरी और बेवकूफी भरा यह कृत्य देखकर बुरी तरह अवाक रह गया था।
परमाणु ने मास्क उतार दिया और मुस्कुराकर सामने खड़ी शक्ति से बोला- “मैंने तुमसे क्या कहा था चंदा, जब तक तुम्हारा ये भाई जिंदा है, तुम पर किसी भी तरह की आँच नहीं आने देगा।”

इतना कहकर परमाणु उर्फ विनय का निर्जीव शरीर धरातल पर ढेर हो गया। शक्ति धीरे धीरे चलते हुए उसके निर्जीव शरीर के पास पहुँची और वहीं बैठ गयी, उसे अब दुनिया की कोई खबर नहीं थी, यह खबर भी नहीं कि रोबो एक बार फिर लेज़र आई द्वारा किरण छोड़कर उसका भी वही हश्र करने जा रहा था।
तभी नागराज और ध्रुव एक साथ चिल्लाये “रोबो!”
रोबो ने एकदम से उनकी तरफ देखा, उनके हाथ में चमचमाती त्रिफना मूर्ति थी जिसे वे गुफा में जाकर ले आये थे। नागराज उसे त्रिफना मूर्ति दिखाते हुए बोला- “यही चाहिये थी ना तुझे? ये ले!”

नागराज ने त्रिफना को रोबो की तरफ उछाल दिया जिसे उसने हवा में ही थाम लिया लेकिन त्रिफना को थामते ही स्याह ऊर्जा से भरा उसका विशालकाय शरीर फिर से सामान्य होने लगा। इससे पहले की वह कुछ समझ पाता, नागराज की आँखों से निकले भीषण अग्नि प्रवाह ने उसे बुरी तरह झुलसा दिया। परमाणु का निर्जीव शरीर देखकर नागराज का जो पारा चढ़ा था, उसे रोबो की चीखें भी शांत नहीं कर पा रही थीं। वह जब रुका, तब रोबो का आधा इंसानी शरीर खाक हो चुका था और आधा मशीनी शरीर गल चुका था। शक्ति को तो जैसे इन सब घटनाओं से फर्क पड़ना ही बंद हो गया था, वह बस पथराई सी विनय के निर्जीव शरीर के पास बैठी हुई थी।

ध्रुव- त्रिफना किसी भी प्रकार की स्याह ऊर्जा को नष्ट कर देता है इसलिए महाकाल छिद्र ने अभी तक खुद इसे लेने का प्रयास नहीं किया था, वो किसी और के ज़रिए त्रिफना को सक्रिय करवाना चाहता था। उसने अग्रज, अनीस और अब रोबो के जरिये त्रिफना को सक्रिय करवाना चाहा, त्रिफना को स्पर्श करते ही उन्हें दी गयी महाकाल छिद्र की शक्ति नष्ट हो जाती और वे सामान्य इंसान रह जाते लेकिन अगर वे त्रिफना को सक्रिय कर देते तो ना जाने क्या आफत हो जाती।
नागराज- हम समय पर अपनी योजना को अमल में नहीं ला पाये जिसकी वजह से एक और नायक की आहुति चढ़ गई।
ध्रुव (शक्ति की ओर देखकर)- परिवार को खोने का दुख मैं समझता हूँ शक्ति, बीते समय में हमने न जाने कितने नायकों को खो दिया है। आगे न जाने कितने नायकों को खोएंगे लेकिन स्याह शक्तियों से भिड़ना ही होगा, शोकाकुल होकर हम कमज़ोर पड़ जायेंगे।
शक्ति (धीमी आवाज़ में)- यहाँ से जाओ।
नागराज- लेकिन शक्ति….
शक्ति (तीखे स्वर में)- मैंने कहाँ ना यहाँ से जाओ!

इसके बाद नागराज और ध्रुव ने बात आगे बढ़ाना ठीक नहीं समझा, वे त्रिफना को लेकर वहाँ से चले गए। शक्ति वहीं बैठी रही, उस व्यक्ति के निर्जीव शरीर के पास जिसने शक्ति को सही और गलत में फर्क करना सिखाया था, अगर वह व्यक्ति ना होता तो शायद शक्ति उर्फ चंदा बहुत पहले मार्ग भटक जाती। उसने देखा कि पूरी तरह झुलसे मास्क में इयरफोन अभी तक लगा हुआ था जिसमें से विनय के मामा कमलकांत का की घबराई हुई आवाज़ बार बार गूँज रही थी।
“विनय! क्या हुआ मेरे बच्चे? तू कुछ बोलता क्यों नहीं, आखिर हुआ क्या है?”

सप्तम खंड- इति

शिरोमणि खुर्रा पर बैठकर ब्रह्मांड का अंतिम छोर कहे जाने वाले स्थान पहुँच चुका था। उसे ज्ञात था कि ऊर्जाश्व सैकड़ों प्रकाश वर्ष की दूरी कुछ ही क्षणों में तय कर लेते हैं लेकिन खुर्रा उसकी उम्मीद से भी परे निकला। वह स्थान एकदम निर्जन था, आसपास बड़ी बड़ी चट्टानें उड़ रही थीं लेकिन सप्तर्षि तो दूर कोई मामूली परग्रही प्राणी तक दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था। तभी शिरोमणि को चारों ओर से आवाज़ गूँजती सुनायी दी।

“तुम कौन हो प्राणी? तुम्हें ज्ञात नहीं कि यह निषिद्ध क्षेत्र है?”

शिरोमणि को कोई भी प्राणी दूर दूर तक नहीं दिखा, उसने उत्तर दिया- “मैं हूँ दिति पुत्र शिरोमणि! ब्रह्मांड में स्याह ऊर्जा का वर्चस्व नित वृद्धि कर रहा है, स्वर्गलोक में असुरों ने स्याह विवर की सहायता से अपना अधिकार कर लिया है। मैं सप्तर्षियों की सहायता प्राप्त करने हेतु निवेदन करने आया हूँ।”

वह आवाज़ फिर से गूँजी- “यह ब्रह्मांड का अंतिम छोर है दिति पुत्र शिरोमणि, यहाँ श्वेत अथवा स्याह ऊर्जा का कोई अस्तित्व नहीं है। तुम्हारे लिए भी श्रेयस्कर यही होगा कि यहाँ से तत्क्षण लौट जाओ।”

शिरोमणि की भौंहें तन गयीं, वह दृढ़ निश्चय से भरी आवाज़ में बोला- “मैं इतनी दूर इसलिए नहीं आया कि यहीं से वापस प्रस्थान कर जाऊँ, आपको क्या लगता है कि यदि सप्तर्षि इस महायुद्ध में किसी पक्ष से नहीं लड़ेंगे तो स्याह शक्तियाँ इस स्थान को छोड़ देंगी? वे समूचे ब्रह्मांड को लील जाने को आतुर हैं, महाकाल छिद्र या स्याह विवर जैसी महाशक्तियाँ यहाँ भी अवश्य पहुचेंगी और तब मैं प्रार्थना करूँगा कि इस स्थान का हश्र वैसा ना हो जैसा अभी स्वर्गलोक का हुआ है।”

वह ध्वनि कुछ पलों के मौन के बाद बोली- “तुम्हारा कथन विचार करने योग्य है शिरोमणि, तुमको इस क्षेत्र के अंदर प्रवेश का अवसर दिया जा सकता है परंतु इस क्षेत्र के अंदर किसी भी जंतु का अस्तित्व ध्वनि या प्रकाश के स्वरूप में ही रहता है। तुम भी इस क्षेत्र के अंदर जाते ही अपना मूल स्वरूप खो दोगे।”

शिरोमणि- मैं अपने लिए इतना चिंतित नहीं हूँ जितना इस समूचे ब्रह्मांड के लिए, यदि मेरा मूल स्वरूप नष्ट हो तो हो जाये लेकिन सप्तर्षियों को देवताओं की सहायता करनी ही होगी क्योंकि फिलहाल पूरे ब्रह्मांड में वही हैं जो स्याह विवर जैसी शक्ति का सामना कर सकते हैं।

“तो फिर ठीक है शिरोमणि, मैं इस क्षेत्र में प्रविष्ट होने का मार्ग प्रशस्त करता हूँ!”

उस आवाज़ के इतना कहते ही अंतरिक्ष के शून्य में ही अचानक से एक तीव्र गति से घूमता द्वार प्रकट हो गया। शिरोमणि ने खुर्रा को वहीं छोड़ दिया और उस घूमते हुए द्वार की ओर बढ़ा, द्वार का स्पर्श करते ही उसकी उंगलियाँ एकदम से अदृश्य हो गयीं परंतु यह बात उसके इरादों को नहीं डिगा पायी। धीरे धीरे शिरोमणि अपना पूरा शरीर द्वार के भीतर ले गया, शिरोमणि के ठोस स्वरूप का अस्तित्व समाप्त हो गया था। वह भी ब्रह्मांड में गूँजने वाली एक ध्वनि बनकर रह जाने वाला था…………या शायद नहीं। शिरोमणि की आँखें खुलीं, उसने अपने मुख को स्पर्श करके देखा, उसका ठोस स्वरूप ज्यों का त्यों था। वह उस क्षेत्र में था जिसे ब्रह्मांड का अंतिम छोर कहते हैं, उसका शरीर गुरुत्वाकर्षण बल के अभाव के कारण शून्य में ही तैर रहा था। उसके समक्ष अपने अपने आसन पर उपस्थित थे सप्तर्षि अर्थात महर्षि भृगु, महर्षि अंगिरा, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि पुलस्त्य, महर्षि पुलह, महर्षि क्रतु एवं महर्षि अत्रि। उनके अलावा उस पूरे क्षेत्र में न कोई बड़ा ग्रह तो छोड़ो बल्कि एक छोटा मोटा उल्कापिंड भी नहीं था। शिरोमणि ने अपने हाथ प्रणाम की मुद्रा में जोड़कर कहा-

“दिति पुत्र शिरोमणि का प्रणाम स्वीकार करें मान्यवर!”

इस पर सप्तर्षियों के समूह में से महर्षि भृगु मुस्कुराकर बोले- “प्रणाम तो हमें तुम्हारा करना चाहिए वत्स शिरोमणि। तुम्हें देवताओं और असुरों में से किसी ने सच्चे हृदय से नहीं स्वीकारा तो तुम ब्रह्मांड के योद्धा बन गए और आज उन्हीं अपने देवता बधुओं के लिए इतना बड़ा त्याग करने को भी मान गए। वाकई तुम विलक्षण हो शिरोमणि, स्याह विवर और महाकाल छिद्र का स्वतंत्र होना वाकई चिंता का विषय है लेकिन हम गहन साधना में लीन ना होते तो पाप क्षेत्र के खुलने का पता कुछ पूर्व ही चल जाता परंतु अभी भी अधिक देर नहीं हुई है। हम अपनी सम्मिलित शक्ति से एक बार फिर उनको बंधक बना लेंगे।”

महाकाल छिद्र और बाबा गोरखनाथ का युद्ध भी पूरे उफान पर था, दोनों एक दूसरे को पराजित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे थे। तभी महाकाल छिद्र की नज़र धरातल पर चल रहे युद्ध पर पड़ी, उसने देखा कि रोबो आर्मी को ब्रह्मांड रक्षकों ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है तो वह चीख उठा- “नहीं! त्रिफना को मैं प्राप्त करके रहूँगा, भले ही उसके लिए मुझे रोबो के लोगों को बनाना पड़े मृत्यु से परे!”

महाकाल छिद्र की आँखों से तीव्र स्याह ऊर्जा निकली जो, रोबो आर्मी के हर मृत सैनिक की लाश से जा टकराई। उन सभी लाशों में हरकत होने लगी, ये देखकर वहाँ मौजूद सूरज, मोनिका, चीता, एंथोनी, जैकब, भेड़िया और कालदूत सकते में आ गए। अचानक एक लाश हवा में तीव्र गति से उड़ते हुए गयी और दूसरी लाश से जुड़ गई, दूसरी लाश तीसरी लाश से जुड़ गई और ऐसा करते करते सारी लाशें आपस में जुड़ने लगीं। कुछ ही पलों में लाशों के ढेर ने छब्बीस फ़ीट के मानव का आकार ले लिया।

भेड़िया- ये..ये क्या है?

एंथोनी- महाकाल छिद्र ने सारे मुर्दों को एक साथ जोड़कर एक प्रकार के महामुर्दे की रचना कर दी है।

सूरज (दाँत भींचकर)- मुर्दा हो या महामुर्दा, सबको राख कर देगी ये ऊर्जा गन।

महामुर्दे पर सूरज ने ऊर्जा गन चला दी, महामुर्दे के शरीर का कुछ हिस्सा ऊर्जा गन की वजह से राख हो गया लेकिन सभी को आश्चर्य तब हुआ जब राख हुआ हिस्सा वापस सही सलामत होकर वापिस जुड़ गया। विसर्पी ने भी राजदंड की शक्ति की सहायता से उसके शरीर से कुछ मुर्दों का अलग कर दिया लेकिन वे वापस जाकर शरीर के साथ जुड़ गए। कालदूत ने चीरचला के प्रयोग से उसको कुछ क्षति पहुँचायी लेकिन फिर से उस क्षति की पूर्ति हो गयी।

चीता- ये..ये क्या? इसको क्षति क्यों नहीं पहुँच रही?

जैकब- महाकाल छिद्र ने बहुत गहरी चाल चली इस बार। जीवित प्राणी को तो हम नष्ट कर सकते हैं लेकिन उसे अपने किस वार से नष्ट करें जो हो मृत्यु से परे।

एंथोनी- मेरी ठंडी आग का भी इस पर कोई प्रभाव नहीं पहुँचेगा।

कुछ इच्छाधारी नागसैनिक उससे लड़ने आगे पहुँचे लेकिन महामुर्दे ने उन्हें अपनी विशाल मुट्ठी में उठाया और अपने ही शरीर का हिस्सा बना लिया। वे सैनिक उसके स्पर्श मात्र से ही उसके शरीर का हिस्सा बन गए थे।

जैकब- सब लोग पीछे हटकर वार करो! इस मुर्दे का स्पर्श बहुत घातक है।

उधर कुछ दूरी पर नताशा धीरे धीरे होश में आ रही थी, ध्रुव को अपने पास बैठा देखकर वह एकदम से चौंक गयी।

ध्रुव- कैसी हो नताशा?

नताशा- उफ्फ, डैड ने मुझे बेहोश कर दिया था। मेरा सिर अभी तक झन्ना रहा है। क्या वो त्रिफना लेने में सफल तो नहीं हो गए?

ध्रुव (गहरी साँस लेकर)- कुछ ऐसा है जो तुम्हारा जानना बेहद ज़रूरी है नताशा। तुम्हारे पिता के ऊपर महाकाल छिद्र का वश था, वे तुम्हें मारने की धमकी दे रहे थे। हमने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन..लेकिन उन्होंने हमारे दोस्त को मार दिया। रोबो ने परमाणु की जान ले ली।

नताशा की आँखें पथरा गयीं, उसने ध्रुव से पूछा- “डैड कहाँ हैं ध्रुव?”

ध्रुव- तुम्हें यह समझना होगा कि हमारे पास कोई और रास्ता नहीं था।

नताशा (चीखकर)- डैड कहाँ है ध्रुव?

ध्रुव (आँखें झुकाकर)- हमें उन्हें मारना पड़ा, वरना वह त्रिफना को सक्रिय कर देते।

उसके बाद नताशा कुछ नहीं बोली, उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले। बड़ी मुश्किल से उसकी ज़ुबान से बोल फूटे-
“त..तुमने ही तो कहा था कि उनके ऊपर स्याह शक्तियों का कब्ज़ा था, इसका मतलब तो ये हुआ कि उनके द्वारा किये गए कुकृत्यों के ज़िम्मेदार वह खुद नहीं थे। तुम उन्हें बचा सकते थे ध्रुव, तुम उन्हें बचा सकते थे!”

ध्रुव- काश कि मैं ऐसा कर पाता नताशा लेकिन ये संभव नहीं था, तुम होश में नहीं थी वरना….

नताशा- सही कहा, मैं होश में नहीं थी। होती तो अपने पिता की हत्या ना होने देती। अब तो तुम लोगों के ऊपर से नायक तिमिर योग का प्रभाव भी कब का खत्म हो गया, तो अब क्या बहाना है तुम तथाकथित नायकों के पास दूसरों की बलि लेने का! तुमने मेरा विश्वास तोड़ दिया ध्रुव, बहुत बुरी तरह तोड़ दिया।

इतना कहकर नताशा जाने लगी कि अचानक ध्रुव ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला- “तुम्हें ठंडे दिमाग से सोच विचार करने की ज़रूरत है नताशा, तुमने तो आसानी से रिश्ता खत्म करने के लिए बोल दिया लेकिन मेरे बारे में सोचा तुमने। अपने परिवार के खत्म होने के बाद शायद मैं भी राह भटक जाता अगर अंधेरे में उम्मीद की किरण बनकर तुम मेरे जीवन में नहीं आती। रोबो ने परमाणु को मार दिया तो तुमको लगता है कि उसे बचाया जा सकता था लेकिन अगर परमाणु के हाथों रोबो की हत्या हो गयी होती, तब भी तुमको इंसानियत याद रहती?”

नताशा पीछे मुड़े बिना बोली- “यहाँ से चले जाओ ध्रुव और मेरी जिंदगी से भी।”

ध्रुव के चेहरे से ऐसा लगा कि वह बहुत कुछ कहना चाहता था लेकिन उसने खुद को रोका और मुड़कर चला गया।

तब तक नागराज भी युद्धस्थल पर पहुँच गया था। नागराज के हाथ में त्रिफना देखकर सबकी बाँछे खिल गयीं।

कालदूत उसके समीप आकर बोले- “त्रिफना को तुमने अपने अधिकार में लेकर अच्छा किया नागराज, मुझे भय था कि कहीं रोबो इसे सक्रिय ना कर दे।”

नागराज (निराश भाव से)- रोबो को तो मैंने मार दिया महात्मन लेकिन दुख की बात तो ये है कि उसके कारण हमारा एक और साथी मारा गया, दिल्ली को अपनी छत खोनी पड़ी।

यह सुनकर महात्मा कालदूत भी दुखी हो गए, वे भारी गले से बोले- “आखिर यह महायुद्ध कितनी आहुतियाँ लेगा? पहले हमारे पाँचों वीर पुत्रों की जीवनलीला समाप्त हो गयी और अब एक और साहसी योद्धा मारा गया।”

नागराज (क्रोधित होकर)- अब तो चाहे जितनी कुर्बानियां देनी पड़ें लेकिन पुण्य शक्तियाँ ही जीतेंगी ये महायुद्ध। ये प्राणी कौन है जो तबाही मचा रहा है?

कालदूत- यह महाकाल छिद्र की स्याह ऊर्जा द्वारा रोबो आर्मी के सैनिकों के मुर्दा शरीरों को जोड़कर बनाया गया महामुर्दा है। इसके स्पर्श से बचना होगा अन्यथा हम भी इसके शरीर का एक हिस्सा बनकर रह जायेंगे।

नागराज- इससे निपटने का तरीका भी है मेरे पास, त्रिफना स्पर्श मात्र से स्याह ऊर्जा को पूरी तरह नष्ट कर देता है। महामुर्दा स्याह ऊर्जा द्वारा ही चल रहा है, यदि मैं इसके समीप जाकर त्रिफना को इसके शरीर से स्पर्श करवाने में कामयाब हो जाऊँ तो स्याह ऊर्जा समाप्त हो जाएगी और सारे मुर्दे अपनी साधारण अवस्था में आ जायेंगे।

कालदूत- योजना तो अच्छी है नागराज लेकिन बेहद सावधानी से इसके स्पर्श से बचकर इसके समीप जाना होगा।

नागराज तेजी से उड़ता हुआ त्रिफना लेकर महामुर्दे के समीप पहुँचा और महामुर्दे के शरीर के एक हिस्से से त्रिफना को स्पर्श भी करवा दिया लेकिन उसे ये देखकर बेहद आश्चर्य हुआ कि महामुर्दा को उससे कोई फर्क नहीं पड़ा। महामुर्दा का हाथ नागराज पर पड़ने ही वाला था, यदि वह तुरंत इच्छाधारी कणों में न बदल जाता तो।
नागराज को वापिस धरातल पर आना पड़ा।

भेड़िया- तुम ठीक तो हो? आखिर क्या सोचकर तुम उसके इतने करीब चले गए थे?

नागराज- मैं तो त्रिफना का स्पर्श करवाकर उसकी स्याह ऊर्जा को खत्म करने गया था लेकिन इस पर तो कोई असर ही नहीं हुआ। आखिर वजह क्या हो सकती है?

शायद महाकाल छिद्र ने इसके निर्माण के लिए स्याह ऊर्जा का नहीं बल्कि किसी प्रकार के तंत्र का प्रयोग किया है, ये तो जाहिर सी बात है क्योंकि महामुर्दा यदि स्याह ऊर्जा से निर्मित किया गया प्राणी होता तो त्रिफना को प्राप्त करने हेतु उसे स्पर्श करते ही निष्क्रिय हो जाता। ये तो कोई जीवित इंसान भी नहीं है जो त्रिफना के स्पर्श से स्याह ऊर्जा नष्ट होने के बावजूद बच पाता।

सूरज- वजह छोड़ो, आखिर इसे नष्ट कैसे करें अब? कोई भी प्रचंड वार इसके शरीर को तोड़ता है तो यह वापिस जुड़ जाता है।

नागराज के पास इस बात का जवाब नहीं था।
वेदाचार्य भी काफी समय से अपनी मानस तरंगों द्वारा युद्ध की विभीषिका को भाँपने का प्रयास कर रहे थे। भारती ठीक उनके पास खड़ी थी, वह बोली- “ये महामुर्दा मृत्यु से परे हो गया है दादाजी, इससे वही निपट सकता है जो स्वयं मृत्यु से परे हो जैसे कि मैं।”

वेदाचार्य- तुम कहना क्या चाहती हो भारती?

भारती- यही कि महामुर्दे के अंत के लिए आपको “कृष्णिका भंवर” तिलिस्म को सक्रिय करना होगा। मैं जानती हूँ कि इस तिलिस्म का सक्रिय होना बेहद जटिल है लेकिन दुनिया में सिर्फ आप ही हैं जो ऐसा कर सकते हैं।

वेदाचार्य- ल..लेकिन कृष्णिका भंवर तिलिस्म को सक्रिय करने के लिए एक शक्तिशाली आत्मा का प्रयोग होता है, आत्मिक ऊर्जा से सक्रिय हुआ ये तिलिस्म प्राण ऊर्जा को पूरी तरह से सोख लेता है। यह अमर देवताओं और अविनाशी प्रेतों को मारने में भी सक्षम है लेकिन जिस जीवित प्राणी की आत्मा इसे सक्रिय करेगी वह ना सिर्फ मृत्यु को प्राप्त होगा बल्कि उसकी आत्मा का भी कोई अस्तित्व ना रहेगा इसलिए सिर्फ यही ऐसा तिलिस्म है जिसका विकट से विकट परिस्थिति में प्रयोग करने से पहले भी सौ बार सोचा जाता है।

भारती- मुझे ज्ञात है दादाजी, शक्तिशाली से शक्तिशाली आत्मा की आत्मिक ऊर्जा भी कृष्णिका भंवर को मात्र कुछ मिनटों के लिए ही खोले रख पाएगी इसीलिए मैं अपनी आत्मिक ऊर्जा को तिलिस्म खोलने में व्यय करूँगी।

वेदाचार्य- कभी नहीं! जो तुम कह रही हो उसका अर्थ समझती हो? तुम्हारी आत्मा का वजूद खत्म हो जाएगा।

भारती- महामुर्दा के बढ़ते कदमों को रोकना है तो मुझे आत्मिक ऊर्जा को व्यय करना ही होगा दादाजी। आपकी गलती की वजह से पाप क्षेत्र खुला, क्या आप नहीं चाहेंगे कि आप ब्रह्मांड को गर्त में जाने से बचा पाएं? मैं वैसे भी मृत हूँ, ये तो मेरा सौभाग्य है कि मृत्यु के बाद भी मेरी आत्मा इतने बड़े खतरे को टालने के काम आ रही है।

वेदाचार्य का सिर झुक गया, वे बोले- “तिलिस्म सक्रिय करने के लिए कुछ समय लगेगा।”

भारती की नज़र नागराज पर पड़ी जो बाकियों के साथ महामुर्दे से निरर्थक लड़ाई कर रहा था। वह वेदाचार्य से बोली- “यानी कि कुछ वक्त मेरे पास है, मैं एक बार और नागराज से मिलना चाहती थी।”

इस पर वेदाचार्य कुछ नहीं बोले, उन्हें तिलिस्म को सक्रिय करने के लिए एकाग्रचित होने की ज़रूरत थी। इच्छाधारी सैनिक अपने घातक हथियारों से महामुर्दे के शरीर को पूरी तरह विखंडित कर दे रहे थे लेकिन वो वापिस जुड़ जाता था। विसर्पी धनंजय से बाकी नागद्वीप की सुरक्षा को लेकर विचार विमर्श कर रही थी।

धनंजय- नागसाम्राज्ञी, मैंने स्वर्णनगरी के योद्धाओं को नागद्वीप की जनता की सुरक्षा के लिए तैनात तो कर दिया है पर क्या आपको नहीं लगता कि हमारे हथियार यहाँ ज़्यादा काम आते?

विसर्पी- घातक से घातक हथियार भी महामुर्दे के बढ़ते कदमों को रोक नहीं पा रहे, बस उसे कुछ समय के लिए विखण्डित कर देते हैं। हमें इसका कोई स्थायी हल निकालना होगा, तब तक आप नागद्वीप की रक्षा कीजिये। इसके लिए हम आपके आभारी रहेंगे।

धनंजय- इसमें आभार की कोई बात नहीं, निर्बलों की रक्षा करना हमेशा से वीरों का कर्तव्य रहा है।

तभी विसर्पी को अचानक अपने भीतर कुछ हलचल महसूस हुई, भारती की आत्मा उसके अंदर प्रविष्ट कर रही थी।

धनंजय- आप ठीक हैं नागसाम्राज्ञी?

तब तक विसर्पी के शरीर पर भारती पूरी तरह से कब्ज़ा जमा चुकी थी, वह धनंजय की बात का जवाब दिए बिना ही नागराज की तरफ बढ़ी।
नागराज सूरज, मोनिका, भेड़िया, एंथोनी, चीता, सुपर इंडियन और जैकब को परमाणु और रोबो की मृत्यु की खबर दे चुका था। सब लोग अवाक रह गए थे लेकिन सूरज की स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं आया, सिवाय इसके की वह ऊर्जा गन उठाकर फिर से महामुर्दे से भिड़ने चल दिया।

मोनिका- जब से अदरक चाचा की मृत्यु हुई है, सूरज को किसी भी बात का फर्क पड़ना बंद हो गया है।

नागराज- उसे समय दो मोनिका, उसके इरादे फौलाद के ज़रूर हैं पर दिल मोम जैसा ही है जिसे किसी भी निर्दोष की हत्या तुरंत विचलित कर देती है।

तभी विसर्पी आगे बढ़कर नागराज के पास आई, नागराज उसे देखकर बोला- “हाँ कहो विसर्पी, क्या महात्मा कालदूत ने महामुर्दे से निपटने का कोई तरीका सुझाया?”

विसर्पी की आँखें नागराज को ऐसे घूर रही थीं जैसे न जाने कितने समय बाद उसे देख रही हो, उसने धीरे से नागराज के गाल पर हाथ रख दिया। नागराज को युद्ध के मध्य में उसकी ये विचित्र हरकत समझ में नहीं आयी, उसने पूछा- “विसर्पी ये तुम क्या….”

विसर्पी बात बीच में ही काटकर बोली- “आखिर इतने समय बाद मैं तुमसे फिर से मिल ही गयी।”

नागराज ये सुनकर सकते में आ गया। शरीर विसर्पी का ही था लेकिन आवाज़ किसी और की थी, उसकी आवाज़ नागराज ज़िन्दगी में नहीं भूल सकता था। उसकी आँखें हल्की नम हो गयी थीं, साथ में विसर्पी के रूप में भारती की आँखें भी नम हो चली थीं।

नागराज- भ.. भारती? ये तुम हो?

भारती- हाँ नागराज, ये मैं ही हूँ।

नागराज उसका हाथ अपने हाथों में लेकर बोला- “मुझे माफ़ कर देना भारती, मैं तुम्हारी आत्मा को अग्रज के चंगुल से बचा ना सका। तुम्हें इतनी यातना सहनी पड़ी।”

भारती नागराज के आँसू पौंछते हुए बोली- “अग्रज द्वारा दी गयी सारी यातनाएं मैं आज भूल चुकी हूँ नागराज, तुमसे मिलने का मौका जो मिल गया।”

नागराज- मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ।

भारती- तुम किसी के गुनहगार नहीं हो नागराज, तुम वो व्यक्ति हो जिससे मैंने अपने पूरे जीवन में पहली और आखिरी बार सच्चा प्रेम किया।

नागराज- जब वेदाचार्य ने बताया कि उन्होंने तुम्हें पुनर्जीवित करने के लिए ये सब किया तब मेरे मन में भी एक आशा जग गयी थी कि शायद तुम वापिस आ पाओ लेकिन शायद नियति को ये मंज़ूर नहीं था।

भारती- अग्रज ने जो किया सो किया, वेदाचार्य या तुम इस ब्रह्मांड की वर्तमान परिस्थिति के लिए दोषी नहीं हैं। दादाजी को माफ कर देना नागराज, उन्होंने पूर्णतयः मेरे लिए ही ये सब किया।

तभी वेदाचार्य युद्धभूमि के बीचोंबीच आकर ज़ोर से चिल्लाये- “जल्दी करो भारती, तिलिस्म धीरे धीरे सक्रिय हो रहा है।”

भारती- अब मेरे जाने का समय हो गया है नागराज, इस बार हमेशा हमेशा के लिए।

इतना कहकर विसर्पी के रूप में भारती ने आखिरी बार नागराज को बाँहों में भर लिया। भारती विसर्पी के शरीर से निकलकर तिलिस्म रचना के लिए चल दी। यह बात नागराज ने महसूस कर ली थी, वह चिल्ला उठा- “नहीं भारती! इस बार मत जाओ!”

भारती की आवाज़ नागराज के कानों में पड़ी- “अलविदा नागराज! विसर्पी का ख्याल रखना और अपना भी।”

वेदाचार्य के माथे पर आती शिकन से पता चल रहा था कि वे तिलिस्म रचना के लिए कितना ज़ोर लगा रहे थे, तेज़ हवाएं चल उठीं, बिजलियाँ कड़क उठीं। भारती की आत्मिक ऊर्जा अब तिलिस्म रचना की प्रक्रिया में सम्मिलित हो चुकी थी, उसकी ऊर्जा का व्यय होने लगा जिसकी वजह से उसकी आत्मा सबको दिखाई भी देने लगी।

एंथोनी- अब मुझे समझ में आ गया कि ये क्या कर रहे हैं, ये कृष्णिका भंवर तिलिस्म का निर्माण कर रहे हैं जो महामुर्दे जैसे अविनाशी प्राणी को भी नष्ट करने में सक्षम है।

जैकब- लेकिन सिर्फ एक इंसानी रूह इस तिलिस्म के निर्माण के लिए काफी नहीं होगी।

एंथोनी – कहना क्या चाहते हो?

जैकब- तिलिस्म रचना के लिए मैं अपनी प्रेतात्मा की आहुति देने को तैयार हूँ।

एंथोनी- पागल मत बनो जैकब, कोई और रास्ता ज़रूर होगा।

भेड़िया- अरे अरे, आखिर क्या सोच रहे हो तुम जैकब? मुझे भी तो बताओ।

कुछ बताने के बजाए वे तीनों आपस में गले मिले और जैकब ने कहा- “साथ काम करके अच्छा लगा मित्रों, भले ही ये कुछ समय के लिए अस्थायी संधि थी लेकिन आज मैं गर्व से कह सकता हूँ कि मैं ब्रह्मांड रक्षक टीम का हिस्सा था जहाँ मुझे गजब के योद्धा और तुम जैसे अच्छे दोस्त मिले। चलता हूँ एंथोनी, यह प्रेत अब आखिरी बार दुनिया को बचाएगा।”

जैकब इतना कहकर वेदाचार्य की ओर बढ़ गया, उसको विदा करते वक्त भेड़िया और एंथोनी की आँखें सबसे अधिक नम थीं। जैकब की प्रेतात्मा भी तिलिस्म रचना में भारती की सहायता करने लगी। वेदाचार्य की तिलिस्म रचना के लिए बेहिसाब आत्मिक ऊर्जा मिलने से, धीरे धीरे हवा में ही कृष्णिका भंवर उत्पन्न होने लगा और महामुर्दे को अपनी ओर खींचने लगा। भारती और जैकब की आत्मिक ऊर्जा का तेजी से क्षरण हो रहा था। महामुर्दा तीव्र गति से भंवर की ओर खिंचने लगा और तिलिस्म के प्रभाव से महाकाल छिद्र की प्रचंड तंत्र ऊर्जा छिन्न भिन्न होने लगी जिसने कई आत्माओं के बंधन से महामुर्दे का निर्माण किया था। जल्द ही महामुर्दा कृष्णिका भंवर का शिकार होकर निष्क्रिय हो गया, शरीर से जुड़े सारे मुर्दे अलग अलग हो गए और इसी के साथ ही भारती और जैकब की आत्मिक ऊर्जा का पूरी तरह से क्षरण हो गया था। वेदाचार्य भी बूढ़े शरीर पर पड़े अत्यधिक दबाव के कारण बेहोश होकर गिर पड़े थे। सब कुछ एकदम शांत हो चुका था।

ऊपर आकाश में गोरखनाथ की शक्तियों से भिड़ा हुआ महाकाल छिद्र बुरी तरह चीख पड़ा- “नहीं! मेरी आखिरी युक्ति भी विफल कर दी इन लोगों ने, मैंने सोचा था कि इस बार स्याह ऊर्जा के बजाय अपने तंत्र ज्ञान की सहायता से कई आत्माओं को बाँधकर उनके मुर्दे द्वारा एक महामुर्दे का निर्माण करूँगा लेकिन उसे भी इन मनुष्यों ने रोक दिया।”

गोरखनाथ- तुमने हमेशा से मनुष्यों को कमतर ही आंका महाकाल छिद्र और ये पहले भी तुम्हारी पराजय का कारण बना था और आज भी बनेगा।

महाकाल छिद्र- नहीं गोरखनाथ! अब मैं मनुष्यों का कम नहीं आंकने वाला बल्कि अब मैं ऐसा कदम उठाने जा रहा हूँ जिसके बाद पृथ्वी का अस्तित्व अधिक समय के लिए नहीं रहने वाला। पहले तो मैं पुण्य शक्तियों की भक्ति चाहता था लेकिन अब लगता है कि उन्हें नष्ट कर देने में ही भलाई है।

इतना कहकर महाकाल छिद्र ने स्वर्गलोक पर कब्ज़ा किये स्याह विवर से मानसिक संपर्क साधा। अब तक शांत बैठा स्याह विवर अचानक से सतर्क हो गया। स्वर्ग के सिंहासन पर विराजमान शंभूक ने स्याह विवर से पूछा- “क्या बात है स्याह विवर? आप चिंतित लग रहे हैं।”

स्याह विवर- महाकाल छिद्र ने मुझसे मानसिक संपर्क साधा है, ज़रूर कोई बड़ी मुसीबत होगी। मुझे पृथ्वी की ओर प्रस्थान करना होगा।
शंभूक- क्या? लेकिन यहाँ कारावास में कैद देवता न जाने कब कौन सी चाल चल दें, आपकी आवश्यकता यहाँ अधिक है।

स्याह विवर ने शंभूक पर ऐसी दृष्टि डाली कि वह अंदर तक कांप गया।

स्याह विवर- स्मरण रहे शंभूक, स्याह विवर ने न तो आज तक किसी की दासता स्वीकार की है और ना ही आगे कभी स्वीकारेगा। जब मैंने अपने रचयिता ब्रह्मदेव से विद्रोह कर दिया तो किसी और का महत्व ही क्या है। महाकाल छिद्र की सहायता करने मैं पृथ्वी की ओर जा रहा हूँ, आशा है कि तुम यहाँ अल्प समय के लिए स्तिथि पर पूर्णतः नियंत्रण रखोगे।

इसके बाद शंभूक के मुँह से कोई बोल नहीं फूटे, स्याह विवर ने अपना विराट रूप धरा और पृथ्वी की ओर कूच कर गया। पृथ्वी तक पहुँचने में स्याह विवर को अधिक वक्त नहीं लगा, उसका शरीर इतना विकराल था कि धरती पर खड़े लोगों को भी वह स्पष्ट रूप से नज़र आ रहा था। उसका ये आकार देखकर किसी कमजोर दिल वाले को मूर्च्छा आ जाती, उसके शरीर से लगे पंख ही इतने विशाल आकार के थे जो पूरा का पूरा महानगर घेरने की क्षमता रखते थे।

नागराज- हे देव कालजयी! तो यह है स्याह विवर!

कालदूत- हाँ नागराज, यही है स्याह विवर। सृष्टि की सर्वप्रथम रचनाओं में से एक।

स्याह विवर तीव्र गति से सूर्य की तरफ बढ़ रहा था, उसकी मंशा समझकर गोरखनाथ उसकी ओर बढ़े लेकिन पीछे से महाकाल छिद्र ने उन पर भीषण स्याह ऊर्जा का वार कर दिया।

महाकाल छिद्र- कहाँ चले गोरखनाथ? अभी हमारा द्वंद्व समाप्त नहीं हुआ है।

इतना कहकर महाकाल छिद्र ने अपने नेत्रों से किरणें छोड़ीं जिनसे गोरखनाथ सही समय पर अपना बचाव नहीं कर पाए और अचेत होकर किसी परकटे पक्षी की तरह धरातल से टकराने के लिए बढ़ने लगे लेकिन एंथोनी ने उन्हें बीच में ही थाम लिया और टेलीपोर्ट करके सुरक्षित धरती पर ले आया।

स्याह विवर सूर्य तक पहुँच गया, सूर्य का ताप उसको कोई क्षति नहीं पहुँचा पा रहा था। उसने अपना विशाल मुख खोला और सूर्य को खाना शुरू किया। सूर्य विखण्डित होने लगा, स्याह विवर के हाथों के बल से सूर्य अपनी धुरी से भी कुछ कुछ हटने लगा। तभी अचानक एक ऊर्जा पाश ने, स्याह विवर की गर्दन को जकड़कर उसे पीछे खींच लिया। देव शिरोमणि सप्तर्षियों के साथ उस स्थान पर पहुँच चुका था और सप्तर्षियों ने अपनी सम्मिलित शक्ति द्वारा स्याह विवर पर “मुख बंधन” लगा चुके थे, तब तक देर हो चुकी थी सूर्य पूरी तरह से अपनी धुरी से हट चुका था।

सूर्य की स्थिति के कारण पृथ्वी पर भी त्राहि त्राहि मच गई थी। युद्धस्थल पर भी सब लोग बैचैन हो उठे थे, तभी सबने देखा कि आँखों में अंगारे भरे शक्ति चली आ रही थी, वह एक स्थान पर रुककर चीख पड़ी- “हे काली माँ, तूने एक बार मुझे अपनी शक्ति का अंश देकर मेरे प्राणों की रक्षा की थी लेकिन आज मुझे तेरी शक्ति का एक टुकड़ा नहीं बल्कि पूरी शक्ति चाहिए। मेरे शरीर को धारण कर ले काली माँ!”

अचानक ही शक्ति के समक्ष एक ऊर्जा पिंड प्रकट हो गया, उसमें से आवाज़ आयी- “पुत्री चंदा! तुमने मेरी शक्ति का उपयोग अपने निजी स्वार्थ को परे रखकर सदैव ही दूसरों के हित के लिए किया लेकिन मेरी ऊर्जा एक नश्वर मनुष्य के शरीर में समाने के लिए नहीं बनी। तुम्हारा शरीर इतना अधिक ऊर्जा प्रवाह झेल नहीं पायेगा और कुछ ही समय में भस्म हो जाएगा।”

शक्ति आँखों में आँसू भरकर बोली- “इन स्याह शक्तियों की वजह से मेरा भाई मारा गया है माँ और अब पूरी दुनिया खत्म होने जा रही है। यदि मैं आपकी ऊर्जा को कुछ ही समय के लिए धारण कर सकती हूँ तो कुछ ही समय के लिए सही लेकिन इन दुष्टों का नाश आवश्यक है।”

इसके बाद वह ऊर्जा पिंड शक्ति के शरीर के अंदर समा गया और धीरे धीरे शक्ति का शरीर बेहद विराट आकार धारण करने लगा। उसके गले में नरमुंड, एक हाथ में प्याला तो दूसरे में कटार प्रकट हो गयी, जिव्हा भी बाहर निकल आयी थी। अब शक्ति शक्ति नहीं रह गयी थी, साक्षात माँ काली बन गयी थी। इस रूप को देखकर सबसे पहले कालदूत के हाथ खुद ब खुद जुड़ गए, उसके बाद बाकी सब भी भक्तिभाव से नतमस्तक हो गए। माँ काली का वह विराट रूप अंतरिक्ष की ओर बढ़ चला।
उस रूप को देखकर महाकाल छिद्र और स्याह विवर के भी हृदय में भय का संचार होने लगा था। देव शिरोमणि और सप्तर्षि भी माँ काली के ऐसे रूप को देखकर नतमस्तक हो गए।

माँ काली के विराट रूप के समक्ष स्याह विवर का आकार भी बेहद नगण्य लगने लगा था। अचानक उनके माथे का तीसरा नेत्र चमका और भीषण ऊर्जा प्रवाह सीधे स्याह विवर के हृदय को चीरते हुए निकल गया, स्याह विवर के शरीर में हरकतें बंद हो गईं थीं, अचानक ही उसका शरीर अंतरिक्ष की गहराइयों में विलीन हो गया। उसके मरते ही उसके शरीर के भीतर कैद देवता भी स्वतंत्र हो गए थे। फिर माँ काली महाकाल छिद्र की ओर मुड़ी, महाकाल छिद्र ने माँ काली के उस विराट रूप पर अपनी पूरी शक्ति से स्याह ऊर्जा के वार किए लेकिन वे वार वैसे ही साबित हुए जैसे एक टैंक के ऊपर कंकड़ की वर्षा। माँ काली का तीसरा नेत्र एक बार फिर खुला और महाकाल छिद्र के शरीर को झुलसा दिया। ऊर्जा का इतना प्रचंड प्रवाह चंदा का नश्वर शरीर अधिक समय तक नहीं झेल सकता था, माँ काली का विराट रूप एकदम से लोप हो गया और साथ ही साथ चंदा के शरीर का अस्तित्व भी पूरी तरह से समाप्त हो गया।

महाकाल छिद्र चीख उठा- “क्या सोचते हो तुम सब? कि मेरी मृत्यु के पश्चात यह खेल समाप्त हो जाएगा! खेल तो अभी शुरू होगा! मैं हर समयधारा पर राज करना चाहता था लेकिन लगता है कि यह उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा इसलिए मैं अपने मरते हुए शरीर से इस ब्रह्मांड के कण कण में स्याह ऊर्जा का समावेश कर दूँगा। देखते ही देखते स्याह शक्ति इस पूरे ब्रह्मांड को अपने आगोश में ले लेगी, हर जड़ और चेतन के अंदर प्रवेश कर जाएगी!”

स्याह ऊर्जा के जनक महाकाल छिद्र का शरीर पूरी तरह से भस्म हो गया लेकिन उसके शरीर में बसी भीषण स्याह ऊर्जा ब्रह्मांड में उत्सर्जित होने लगी। समीप से घटनाक्रम के साक्षी बने सप्तर्षि और देव शिरोमणि को धीरे धीरे अपने अंदर स्याह शक्ति का आभास होने लगा।

देव शिरोमणि- उफ्फ, लगता है हम यह महायुद्ध जीतकर भी हार जाएंगे। महाकाल छिद्र की स्याह ऊर्जा से ब्रह्मांड का कोई प्राणी अछूता नहीं रहेगा, देवतागण भी नहीं।

स्याह विवर के ऊदर की कैद से निकले देवता भी अपने भीतर स्याह ऊर्जा का संचार महसूस कर रहे थे। पृथ्वी पर स्याह ऊर्जा का प्रभाव दिखने में अधिक समय नहीं लगा, सामान्य लोग तेजी से परिवर्तित हो रहे थे, स्याह ऊर्जा लोगों की आत्मा से जुड़कर उन्हें पापी बनने पर मजबूर कर रही थी। नागद्वीप का युद्धक्षेत्र भी इससे अछूता नहीं था, विसर्पी के कहने पर नागद्वीप की साधारण जनता की रक्षा के लिए रुके स्वर्णनगरी के योद्धाओं और धनंजय पर इस स्याह शक्ति का प्रभाव सबसे पहले दिखा। वे नागद्वीप के अंदर घुसकर निर्दोष इच्छाधारी नागों को अपने घातक हथियारों द्वारा मारने लगे, चीखती चिल्लाती महिलाएं और रोते बिलखते बच्चों की आवाज़ें भी उनको ये कुकृत्य करने से रोक नहीं पा रही थीं। शीघ्र ही नागद्वीप का वह हिस्सा शमशान घाट नज़र आने लगा। जलते हुए घर और धरती पर पड़ी लाशें देखकर किसी का भी हृदय विचलित हो सकता था लेकिन धनंजय और उसके लोग पूरी तरह से स्याह ऊर्जा के वश में हो चुके थे।
नागद्वीप के युद्धक्षेत्र का भी यही हाल था, धीरे धीरे स्याह शक्ति सब पर अपना वर्चस्व जमाती जा रही थी। इच्छाधारी नागसैनिक आपस में एक दूसरे को मारने लगे थे, एंथोनी और भेड़िया के चेहरों पर भी क्रूरता नज़र आने लगी थी, हालांकि वे इससे लड़ने का प्रयास कर रहे थे लेकिन स्याह ऊर्जा का बहाव इतना अधिक था कि आखिरकार उसने इन दोनों नायकों को भी अपने चपेट में ले ही लिया।

कालदूत ये सब देखकर नागराज से बोले- “शायद यही इस सृष्टि का अंत है नागराज, महाकाल छिद्र की मृत्यु के बाद उसके शरीर से निकलती स्याह ऊर्जा हर प्राणी की आत्मा को गुलाम बनाने को आतुर है।”

नागराज- क्या कोई रास्ता नहीं बचा है महात्मन? क्या हम सब स्याह शक्ति के गुलाम बन जाएंगे? क्या पुण्य शक्तियों का नामोनिशान मिट जाएगा?
कालदूत (कुछ सोचकर)- एक रास्ता है, अपने हाथ में थमे त्रिफना को सक्रिय करो नागराज। कोई भी पुण्य शक्ति त्रिफना को सक्रिय कर सकती है, बस थोड़ा सा एकाग्र होकर ध्यान लगाने की आवश्यकता है। त्रिफना को सक्रिय करते ही विभिन्न समयधाराओं का अधिकार तुम्हारे हाथ में होगा, इस समयधारा को ठीक करने का यही अवसर है।

कालदूत की बात मानकर नागराज त्रिफना सक्रिय करने जा ही रहा था कि तभी भेड़िया की गदा के जोरदार वार ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया और त्रिफना भी अलग गिर गया। नागराज ने देखा कि गुर्राता हुआ भेड़िया उसी की तरफ बढ़ रहा था।

नागराज- होश में आओ भेड़िया, मैं तुम्हारा मित्र हूँ।

भेड़िया ने इसके उत्तर में एक और बार गदा का जोरदार वार किया लेकिन इस बार नागराज ने अपने दोनों हाथों से वार को रोक लिया और भेड़िया को दूर उछाल दिया।
सुपर इंडियन और सूरज एंथोनी से जूझ रहे थे।

सूरज (ठंडी आग से बचते हुए)- क्या तुम्हें अपने शरीर के अंदर कोई हलचल सी मचती महसूस नहीं हो रही?

सुपर इंडियन- नहीं तो, ऐसा शायद इसलिए होगा क्योंकि स्याह शक्तियां आत्मा पर प्रभाव डालती हैं और मेरे पास आत्मा है ही नहीं।

एंथोनी ने ठंडी आग को और अधिक विस्तृत ढंग से फैलाना शुरू किया। सूरज और सुपर इंडियन को अपने शरीर के भीतर झुरझुरी सी होती महसूस हुई। तभी चीता और मोनिका ने एक साथ ऊर्जा गन का वार एंथोनी के शरीर पर किया लेकिन वह फुर्ती से टेलीपोर्ट होकर दूसरी जगह पहुँच गया।

सूरज- एंथोनी होश में आओ! तुम हममें से एक हो।

मोनिका- इसका कोई फायदा नहीं सूरज, अब हमें एंथोनी को काबू करने के बारे में नहीं बल्कि नष्ट करने के बारे में सोचना होगा।

सूरज- नहीं, कोई दूसरा रास्ता ज़रूर होगा।

चीता- कोई दूसरा रास्ता नहीं है सूरज, अगर हमें खुद को बचाना है तो स्याह शक्ति से प्रभावित प्राणियों को खत्म ही करना होगा।

वे लोग अपनी बहस को ज़्यादा देर तक जारी नहीं रख पाए क्योंकि एंथोनी एक बार फिर उन पर ठंडी आग के प्रचंड वार करने लगा था। सुपर इंडियन ने लंबी उछाल भरी और ठीक एंथोनी के पीछे पहुँचकर उसे अपनी ब्रेसलेट से निकलने वाली तीव्र ध्वनि तरंगों का निशाना बना लिया। एंथोनी का मस्तिष्क बुरी तरह झन्ना उठा।

सुपर इंडियन- होश में आओ एंथोनी, हम कुछ समय पहले ही तो एक साथ लड़ रहे थे, क्या तुम्हें कुछ याद नहीं?

एंथोनी ने उसकी तरफ देखा और एकदम से टेलीपोर्ट होकर उसके सामने पहुँच गया, सुपर इंडियन ऐसी स्थिति के लिए तैयार नहीं था, वह बुरी तरह सकपका गया और एंथोनी का भीषण मुक्का उसकी ठोढ़ी से जा टकराया जिसने उसे पीछे गिरने पर मजबूर कर दिया। सुपर इंडियन न एक ही मुक्के में मुँह से काफी खून उगल दिया लेकिन ये देखकर एंथोनी के हाव भाव में हल्का सा परिवर्तन आने लगा। वह वहाँ से टेलीपोर्ट होकर सीधे सूरज के पास पहुँचा और उसके हाथ में थमी ऊर्जा गन अपनी छाती से सटाते हुए कहा- “मेरे शरीर को खत्म कर दो, एक बार ये शरीर नष्ट हो जाये तो फिर मेरी आत्मा कुछ नहीं कर पायेगी क्योंकि सारी शक्तियाँ मेरे इस मुर्दा शरीर में ही हैं।”

सूरज- नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता।

एंथोनी (जबड़े भींचकर)- बहुत मुश्किल से मैं स्याह शक्ति की कैद से आज़ाद हुआ हूँ और ज़्यादा देर तक इस स्थिति में नहीं रहूँगा। मुझे खत्म कर दो वरना मैं तुमको और तुम्हारे दोस्तों को एक झटके में खत्म कर दूँगा।

सूरज (गहरी साँस लेकर)- अलविदा दोस्त, साथ काम करके अच्छा लगा।

एंथोनी- मुझे भी, हालांकि पृथ्वी के ऐसे अप्रत्याशित अंत की उम्मीद हममें से किसी को नहीं थी लेकिन हमसे जो बन पड़ा हमने किया।

अब सूरज का हाथ ट्रिगर दबा चुका था, सूरज के साथ साथ मोनिका और चीता ने भी अपनी अपनी ऊर्जा गन से एंथोनी को शिकार बना लिया था। तीन तरफ से आते ऊर्जा किरणों के भीषण वार ने एंथोनी के शरीर को राख के ढेर में परिवर्तित करने में दो पल भी नहीं लगाए थे।

दूसरी तरफ महात्मा कालदूत की गुफा से कुछ दूर नताशा एकांत में सुबक रही थी। तभी उसने देखा कि स्वर्णनगरी के कुछ चार पाँच सैनिकों की टुकड़ी उसकी तरफ बढ़ रही थी, वे आक्रमण की मुद्रा में लग रहे थे, वे पास आये तो नताशा बुरी तरह चौंक गई, उन सबके चेहरे बुरी तरह राक्षसीकृत हो गए थे। उसके हाथ अपने बगल में पड़ी ऊर्जा गन पर कस गए थे। जैसे ही वे पास आये, पहला आक्रमण नताशा ने ही किया, ऊर्जा गन का एक वार उनमें से एक सैनिक के कवच को चीरकर उसके शरीर को भेदता हुआ चला गया लेकिन उसके बदले में उनके हथियारों से निकले कई वार उसकी तरफ बढ़ गए थे। नताशा भले ही फुर्तीली थी लेकिन इतने सारे वारों से एक साथ बचना उसके लिए भी असंभव था, तभी अचानक उसकी कमर को किसी ने कसके पकड़ लिया और इससे पहले कि वो कुछ समझ पाती, एक झटके के साथ ही वह हवा में थी। ध्रुव ने स्टार लाइन की मदद से उसे वहाँ से निकाल लिया था।

नताशा (हैरानी से)- ध्रुव? तुम तो चले गए थे?

ध्रुव- मैं युद्धक्षेत्र तक पहुँचा तो मुझे अपने लोग आपस में ही लड़ते दिखे, मुझे पता था कि तुम अकेली हो, तुम्हारी चिंता हुई इसलिए मैं यहाँ चला आया।
नताशा- आखिर इतनी बड़ी मात्रा में पुण्य शक्तियाँ पाप शक्तियों में कैसे बदल गयीं?

ध्रुव- पहले इनको छकाते हैं, उसके बाद इन सब बातों पर विचार करेंगे।

ध्रुव उतरने ही वाला था कि दो छोटे छोटे चक्र घूमते हुए आये जिन्होंने नाइलो स्टील की बनी स्टार लाइन को काट दिया। ध्रुव और नताशा एक साथ कठोर धरातल पर गिरे, ध्रुव की नज़र उन योद्धाओं पर पड़ी जो तेज़ी से उनके पीछे आ रहे थे। सबसे आगे वाले योद्धा को देखकर वह बुरी तरह चौंक गया था, वह उसका मित्र धनंजय था, उसका चेहरा किसी राक्षस की तरह हो गया था लेकिन ऐसी अवस्था में भी उनको पहचानना कोई मुश्किल बात नहीं थी।

नताशा- उफ्फ, ध..ध्रुव मुझे भी अपने दिमाग के भीतर जबरदस्त हलचल लग रही है।
ध्रुव- अपने आपको संभालो नताशा, स्याह शक्तियाँ सबको अपने काबू में करने की चेष्टा कर रही हैं। इनसे वही ज़्यादा देर तक बच सकता है जिसकी इच्छाशक्ति प्रबल होगी, एक बार भी इनको हमारे ऊपर हावी होने का अवसर मिल गया तो हमारा हाल भी धनंजय और स्वर्णनगरी के बाकी योद्धाओं जैसा हो जाएगा।

तब तक धनंजय और बाकी लोगों ने उन दोनों पर फिर से हमला करना शुरू कर दिया था। ध्रुव और नताशा भागकर कालदूत की गुफा के पीछे छिप गए, स्वर्णनगरी के दो योद्धा उनको खोजने के लिए गुफा के पास आए। अचानक पत्थर के पीछे छिपे ध्रुव ने अपने गले से चिड़िया की आवाज़ निकालनी शुरू कर दी, आसमान में उड़ते तमाम परिंदों ने स्वर्णनगरी के उन योद्धाओं पर हमला कर दिया। वे बुरी तरह बिफर गए और इधर उधर हथियार चलाने लगे, चिड़ियों के झुंड को चीरकर निकले ध्रुव के हाथ में दो नुकीले पत्थर थे जो उसने एकदम सटीक तरीके से दोनों सैनिकों के माथे पर दे मारे। वे बुरी तरह चकरा गए, ध्रुव ने एक सैनिक को लात मारकर उसके हाथ से उसका हथियार छीन लिया और बिना मौका दिए उन दोनों को उन्हीं के घातक हथियार द्वारा मौत के घाट उतार दिया। पत्थर के पीछे छुपी नताशा बाहर निकल आयी, अब तक सभी पक्षी इधर उधर छंट गए थे और ध्रुव खड़ा था, दोनों सैनिकों की लाश के ऊपर हाथ में बंदूक लिए।

वह अपनी तरफ बढ़ती नताशा को देखकर बोला- “तुम सही कहती थीं नताशा, मैं एक हत्यारा ही बन चुका हूँ, बल्कि हम सारे तथाकथित रक्षक हत्यारे बन गए हैं और इसके लिए हम नायक तिमिर योग को दोष भी नहीं दे सकते लेकिन एक सच जानती हो? इस दुनिया को रक्षकों की नहीं बल्कि हत्यारों की ही ज़रूरत है जो समस्या को जड़ से उखाड़ फेंके, डोगा की तरह।”

नताशा कुछ कहना चाहती थी लेकिन दूर से आते पदचापों की आवाज़ ने उन दोनों का ध्यान खींचा। धनंजय बाकी सैनिकों के साथ उसी ओर बढ़ रहा था, ध्रुव और नताशा ने अपनी अपनी बंदूकें संभाल लीं और एक साथ उन पर हमला बोल दिया। धनंजय के तीन सैनिक तो बिना उन तक पहुँचे ही ढेर हो गए लेकिन धनंजय ने फुर्ती से स्वर्णपाश निकालकर ध्रुव की ओर फेंक दिया, ध्रुव को स्वर्णपाश ने बुरी तरह बाँधकर ज़मीन पर गिरा दिया। नताशा ने धनंजय पर ऊर्जा गन का वार किया लेकिन उसकी पोशाक का अदृश्य कवच एक्टिवेटेड था जो उसे सभी प्रकार के ऊर्जा वारों से सुरक्षा देता था।
वह ध्रुव के पास पहुँचकर अपनी कलाई से ऊर्जा ब्लास्ट करके उसकी इहलीला समाप्त करने ही वाला था कि स्वर्णपाश से बँधा हुआ ध्रुव अपना शरीर लुढ़काकर उसकी तरफ आया और एक ज़ोरदार टक्कर से धनंजय के पाँव धरती से उखड़ गए। धनंजय संतुलन खोकर ठीक सामने पड़ी नुकीली चट्टान पर गिरा और वह चट्टान उसके पेट को चीरते हुए दूसरी ओर निकल गयी, उसकी एकाग्रता टूटने के कारण ध्रुव भी स्वर्णपाश से मुक्त हो गया।

ध्रुव वापिस खड़ा हो गया, और धनंजय की लाश को देखकर बोला- “मैं जानता था कि इसका अदृश्य कवच किसी भी प्रकार के ऊर्जा वार को रोक सकता है लेकिन किसी ठोस वस्तु के वार को नहीं।”

नताशा दौड़कर उसके पास पहुँची- “ध्रुव तुम ठीक तो हो ना?”

ध्रुव- मेरी फिक्र ना करो नताशा, अगर तुम खुद को मेरे जीवन से बेदखल कर चुकी हो तो अपनी बात पर अमल करना भी सीखो। मुझे अभी अभी अपने एक घनिष्ठ मित्र की जान लेनी पड़ी, तुम मुझसे ठीक रहने की उम्मीद कर रही हो?

धनंजय के शरीर में शायद अभी कुछ प्राण बाकी थे, उसका हाथ घूमा और कलाईबन्द से भीषण ऊर्जा ब्लास्ट निकला। ध्रुव की तेज नज़रों ने ये देख लिया था, उसने नताशा को ब्लास्ट के सामने से हटाया पर स्वयं के लिए इतनी फुर्ती ना दिखा सका। ऊर्जा वार उसके पेट में छोटा सा सूराख बनाता दूसरी ओर निकल गया, ये देखकर नताशा के कंठ से चीख फूटी “ध्रुव!”

ध्रुव के लिए साँस लेना मुश्किल हो रहा था, उसने पीछे पड़े पत्थर पर पीठ टिकाई और तेज तेज साँसें लेने लगा, नताशा उसके पास पहुँची। ध्रुव उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बोला- “मर तो मैं तभी गया था जब वक्र ने मेरे परिवार को खत्म कर दिया था, फिर इस अर्थहीन जीवन को जीने का मतलब क्या था? सिर्फ एक ही मलाल रह गया कि मैं इन शैतानी शक्तियों से अपनी पृथ्वी की रक्षा नहीं कर पाया। वो देखो नताशा एक श्वेत उजला द्वार खुल रहा है और उस पार खड़े मेरे माता पिता और मेरी बहन मुझे पुकार रहे हैं, मुझे जाना होगा। तुम्हारे पिता की मौत का बेहद अफसोस है मुझे, हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।”

नताशा- म..मुझे माफ़ कर दो ध्रुव, क्रोध में मैंने तुमको न जाने क्या क्या कह दिया था। मेरे पिता के बाद अब तुम मुझे छोड़कर मत जाओ, प्लीज् मत जाओ।

नताशा की इस बात का ध्रुव ने कोई जवाब नहीं दिया, जो हाथ नताशा ने पकड़ा हुआ था वो शांत पड़ गया था, हमेशा हमेशा के लिए।

उससे थोड़ी दूरी पर युद्धस्थल में भी भीषण हलचल मचनी शुरू हो गई थी। सबसे पहले तांत्रिक इरी अपनी तंत्र शक्तियों के बल पर वहाँ प्रकट हुआ, वह भी स्याह शक्तियों का गुलाम बन चुका था। उसकी तंत्र शक्तियों ने जलजला ला दिया, वह कालदूत से भिड़ गया।

इरी- कालदूत! मेरे दोनों योद्धा तेरी वजह से युद्धभूमि में मारे गए!

कालदूत- होश में आओ इरी, ये तुम नहीं बल्कि तुम्हारे भीतर मौजूद स्याह शक्ति बोल रही है।
इरी- अब मरने के लिए तैयार हो जा कालदूत, ले संभाल मेरा तंत्र वार!

इरी के प्रचंड तंत्र वार को कालदूत ने चीरचला पर सोख लिया और उसकी तरफ कालसर्पी फेंका जिसने उसे बुरी तरह जकड़ लिया।

कालदूत- क्षमा करना मित्र लेकिन जब तक हमें इस समस्या का स्थायी हल नहीं मिल जाता, तुम्हें इसी अवस्था में रहना होगा।

नागराज ने भी भेड़िया को तीव्र विषफुंकार द्वारा बेहोश कर दिया था जिससे वह अधिक नुकसान ना कर सके। कुछ समय के लिए युद्धक्षेत्र एकदम शांत हो गया था लेकिन यह तूफान से पहले वाली शांति थी। नागराज धरातल पर पड़े त्रिफना को ढूँढने लगा, उसके हाथ से छूटने के बाद त्रिफना न जाने कहाँ गुम हो गया था पर अचानक एक बार फिर युद्धक्षेत्र में हलचल सी मचने लगी। नागराज, विसर्पी, सूरज, सुपर इंडियन, मोनिका, चीता और कालदूत ने देखा वह दृश्य जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, जो सामान्य इंसान स्याह शक्ति के कारण बुरी तरह विकृत हो गए थे, उन्होंने आकाश मार्ग से आकर एक साथ नागद्वीप पर धावा बोल दिया था। इन विकृत मनुष्यों के पास अतिरिक्त शक्तियाँ भी आ गई थीं जैसे उड़ने की शक्ति, अत्यधिक बाहुबल इत्यादि। आकाश मार्ग से आते ये मनुष्य धरातल पर उतरे और बाकी योद्धाओं को चारों तरफ से घेर लिया।

मोनिका विचलित होकर बोली- “उफ्फ, ये सब तो सामान्य लोग हैं जिनको बचाने की कभी हमने शपथ ली थी। इनमें बच्चे, बड़े, बूढ़े, हर प्रकार के लोग शामिल हैं, हम इन्हें नहीं बचा पाए, हम ये युद्ध हार गए हैं सूरज।”

सूरज- एक योद्धा तब तक नहीं हारता जब तक उम्मीद का एक कतरा भी बाकी है, स्याह शक्तियाँ तो हम पर भी हावी होने का प्रयास कर रही हैं लेकिन हम भी तो अपनी इच्छाशक्ति के कारण बचे हुए हैं। हमारे जैसे और भी लोग होंगे जिन्होंने इच्छाशक्ति के बल पर खुद को बचाकर रखा होगा।

तभी सूरज के मुंह पर एक प्रचंड घूँसा पड़ा जिसने उसको ज़मीन सूँघने पर मजबूर कर दिया। उसने मुड़कर देखा तो काली, धनिया और हल्दी के विकृत अवतार उसके सामने खड़े थे जिन्हें देखकर वह, मोनिका और चीता बुरी तरह विचलित हो उठे।

सूरज- उफ्फ! आप लोग भी स्याह शक्तियों का शिकार हो गए।

धनिया- हमारा भाई हमसे दूर हो गया और तू जो उनका और हमारा सबसे अच्छा शिष्य होने का दम्भ भरता है, वही उनको नहीं बचा पाया।

हल्दी- अदरक अगर आज हमारे साथ नहीं है तो उसकी सबसे बड़ी वजह तू है सूरज। तेरे भीतर का डोगा हमारे भाई को खा गया!

अपने चाचाओं ऐसे रूप सामने देखकर सूरज का रहा सहा मनोबल भी बुरी तरह टूट चुका था।
वह आँखों में आँसू भरकर बोला- “आप तीनों ने सही कहा, नहीं बचा पाया मैं उस व्यक्ति को जिसने मुझे सूरज से डोगा बनाया। मैं खुशी खुशी आपके हाथों मरने को तैयार हूँ।”

स्याह ऊर्जा तीनों चाचाओं पर बुरी तरह से हावी थी, वे फिर से सूरज की तरफ बढ़ने लगे कि चीता और मोनिका उनसे जाकर भिड़ गए।

चीता- ये मुझे समझ में नहीं आया, यदि हम लोग स्याह ऊर्जा से अपनी इच्छाशक्ति के कारण बच सकते हैं तो ये क्यों नहीं।

मोनिका- अदरक चाचा की मृत्यु के बाद तीनों चाचा बेहद शोकाकुल हो गए थे। उन्होंने हमारे साथ युद्ध में शामिल होने के लिए भी मना कर दिया था, शोक में डूबे होने के कारण ये वातावरण में फैली स्याह ऊर्जा से उतने अच्छे से नहीं भिड़ पाये और स्याह ऊर्जा ने बेहद आसानी से इनके शरीरों पर कब्ज़ा कर लिया।

चीता और मोनिका युद्धकला में सिद्धहस्त ज़रूर थे लेकिन उन तीनों महारथियों से भिड़ना उनके वश की भी बात नहीं थी जो अपनी कलाओं द्वारा एक पूरी सेना को रोकने की क्षमता रखते थे। जल्द ही तीनों चाचाओं ने चीता और मोनिका को बेबस करके घुटनों के बल बैठा दिया था। वे सूरज की ओर देखकर बोले- “तूने हमसे हमारा भाई छीना, हम तुझसे तेरा प्यार छीनेंगे।”

दुख में डूबे सूरज के चेहरे पर एक बार फिर आक्रोश आ गया, वह बोला- “मोनिका और चीता को छोड़ दीजिए चाचा, उनसे आपकी दुश्मनी नहीं है।”

काली (मुस्कुराकर)- सही कहा, दुश्मनी तो हमारी तुझसे है लेकिन तुझे दर्द का अहसास तभी होगा जब इनकी जान जाएगी।

सूरज अब खड़ा हो गया, उसकी मुट्ठियाँ भिंच गयी थीं। वह आगे बढ़कर बोला- “मैं आप तीनों चाचाओं की इज़्ज़त करता हूँ और आप लोगों के लिए जान भी दे सकता हूँ लेकिन तुम तीन मेरे चाचा नहीं हो, उनके रूप में तीन भयानक राक्षस हो जिन्हें रोकना डोगा का काम है।”

सूरज ने एक बार फिर अपनी यूटिलिटी बेल्ट में फोल्ड करके रखा हुआ डोगा का मास्क निकाला और उसे पहन लिया। अब एक बार फिर वह सूरज से बन चुका था डोगा। तीनों चाचा भी चीता और मोनिका को छोड़कर उससे भिड़ने पहुँच गए। डोगा बेहद सतर्क था, वह अपने चाचाओं की काबिलियत जानता था और अब तो स्याह ऊर्जा के कारण उन्हें अतिरक्त बाहुबल भी मिल रहा था। डोगा उछला और घुटने का बेहद सधा हुआ वार हल्दी की नाक पर किया जिससे उनकी नाक से खून बह निकला और वह पीछे हट गए लेकिन इस चक्कर में उसका ध्यान धनिया पर नहीं गया जिन्होंने पीठ पर मारे गए एक ही बॉक्सिंग पंच से उसे भीषण पीड़ा का अहसास दिला दिया। काली की सटीक लात भी सीधा उसके मुँह पर पड़ी, काली दूसरी लात भी मारना चाहते थे लेकिन डोगा ने उनकी लात को हवा में ही पकड़ उन्हें घुमाकर पीछे वार करने को तैयार खड़े धनिया पर फेंक दिया। दोनों ही लोग बुरी तरह चकरा गए, तब तक डोगा हल्दी से जाकर भिड़ गया। कराटे के एक एक दांव पेंच में माहिर होने के बावजूद डोगा हल्दी के वारों से बच नहीं पा रहा था, अत्यधिक बाहुबल भी परेशानी का एक कारण था। फिर भी डोगा ने हल्दी से भिड़ने के लिए पूरी जान लगा दी, उसकी पोशाक हर तरफ से कट फट गई थी लेकिन हार नहीं मान रहा था। डोगा और हल्दी एक दूसरे पर कराटे का बेहद सटीक वार कर रहे थे, डोगा एकाग्रचित होकर बस एक सही वार करने का मौका ढूँढ रहा था और वह उसे तब मिला जब हल्दी ने दायाँ हाथ उठाने में हल्की सी देरी कर दी, तब तक डोगा ने हल्दी के चेहरे पर एक सटीक वार किया जिससे हल्दी की गर्दन सुन्न हो गयी और वह धरती पर गिर पड़े। तब तक पीछे से धनिया ने आकर कमर के सहारे डोगा को पकड़कर उसे गिरा दिया, काली ने भी उसके छटपटाते हाथों को मजबूती से पकड़ लिया। उनकी रगों में बहती स्याह ऊर्जा ने उन्हें इतना अतिरिक्त बल दिया था कि डोगा का अब उनके चंगुल से निकलना असंभव था, तब तक हल्दी भी उठ खड़ा हुआ और एक नान चाक लेकर उसकी तरफ बढ़ने लगा। डोगा अब समझ चुका था कि इंसानियत का एक कतरा भी इनके अंदर नहीं बचा था, वरना गर्दन तक सुन्न कर देने वाले वार से इतनी जल्दी उबर पाना असंभव था। नान चाक का एक ही सटीक वार उसकी गर्दन तोड़ सकता था, काली और धनिया के चंगुल में वह हाथ पैर भी नहीं हिला पा रहा था। उसकी तरफ धीरे धीरे बढ़ते हल्दी के पीछे भी कोई खड़ा था, वह मोनिका थी जिसने ऊर्जा गन हल्दी पर तानी हुई थी। मोनिका ने सूरज की तरफ देखा, सूरज ने आँखें एकदम से भींचकर खोलीं जैसे उसे गन चलाने की मूक स्वीकृति दे रहा हो। फिर मोनिका की ऊर्जा गन से भीषण ऊर्जा निकलकर हवा में प्रवाहित हुई और हल्दी का शरीर राख बन गया, धनिया और काली बुरी तरह चौंक गए लेकिन उनसे चीता की ऊर्जा गन का वार आ टकराया और उन्हें तुरंत राख में बदल दिया।
अब डोगा उनके चंगुल से आज़ाद हो चुका था, मोनिका जब तक उसके पास पहुँची, उसने फिर से अपना मास्क उतार दिया और मोनिका की तरफ देखकर बोला- “मेरे बारे में लोगों को एक भ्रम है कि डोगा कभी चीखता नहीं, चाहे जितना भी दर्द हो लेकिन डोगा नहीं चीखता। आज इतनी जोर से चीखेगा डोगा की उसकी आवाज़ स्वर्ग में बैठे देवताओं को भी सुनाई देगी।”

उसके बाद सूरज बुरी तरह चीखा, वाकई उसकी इस चीख से पूरा वातावरण दहल उठा था। चीता और मोनिका बेबस खड़े थे, उनको समझ में नहीं आ रहा था कि सूरज को सांत्वना आखिर दें भी तो कैसे जिसने एक ही दिन में अपने चारों चाचाओं को खो दिया था।

नागराज, विसर्पी, सुपर इंडियन और कालदूत की तरफ भी काफी भीड़ आ रही थी।

नागराज- ये सब तो साधारण लोग हैं, इनको भला मैं कैसे नुकसान पहुँचा सकता हूँ?
सुपर इंडियन- साधारण लोग थे लेकिन अब नहीं हैं। अगर इनको नहीं मारा तो ये हमें मार देंगे।
विसर्पी- इस आपदा का स्थायी हल क्या है महात्मा कालदूत? महात्मन? आप मुझे सुन पा रहे हैं?

कालदूत ने जवाब नहीं दिया बल्कि घूमकर विसर्पी की तरफ देखा, कालदूत के तीनों शरीर बेहद विकृत और राक्षसी हो चुके थे। उनकी दुम के एक ही वार से नागराज, विसर्पी और सुपर इंडियन उड़ते हुए दूर जा गिरे। बाकी सब विकृत मनुष्यों ने भी उन्हें घेर लिया और हमला कर दिया। भेड़िया जिसे नागराज की फूँकार ने बेहोश कर दिया था, वह भी होश में आकर एक बार फिर नागराज से भिड़ गया।

वेदाचार्य उसी समय होश में आ गए उन्होंने मानस तरंगों द्वारा महसूस किया कि दूसरी ओर बेहोश पड़े गोरखनाथ के आसपास स्याह ऊर्जा से प्रभावित विकृत मनुष्यों की भीड़ जमा हो रही है। उन्होंने अपनी तिलिस्मी शक्तियों से सबको दूर दूर उछाल दिया और खुद गोरखनाथ के पास पहुँचे और उनके कंधे को हिलाकर बोले- “आप ठीक हैं बाबा गोरखनाथ?”

गोरखनाथ वेदाचार्य के प्रयासों से धीरे धीरे होश में आ गए लेकिन अपने चारों तरफ मचती तबाही देखकर हतप्रभ रह गए।

गोरखनाथ- ये..ये क्या अनर्थ हो गया? मुझे समस्त ब्रह्मांड से सिर्फ स्याह ऊर्जा के संकेत ही क्यों आ रहे हैं।
वेदाचार्य- क्योंकि अब बचाने को कुछ नहीं बचा है बाबा, जितनी भी गिनती की श्वेत शक्तियाँ बची हैं वे भी या तो स्याह ऊर्जा के नियंत्रण में आ जाएंगी या फिर इसी युद्धभूमि पर वीरगति को प्राप्त हो जाएंगी।

गोरखनाथ- ऐसा नहीं हो सकता, त्रिफना को सक्रिय करना होगा। त्रिफना कहाँ है?
वेदाचार्य- एक क्षण ठहरिये, मैं अपनी मानस तरंगों द्वारा त्रिफना का पता लगाता हूँ।

वेदाचार्य ने त्रिफना की स्थिति ज्ञात करने के लिए ध्यान लगाया, वे एकदम से बोले- “त्रिफना हमसे सौ ग़ज़ की दूरी पर एक पाषाण शिला के पीछे है।”

गोरखनाथ- मेरी शक्तियां महाकाल छिद्र से भिड़ंत के बाद बेहद क्षीण हो चुकी हैं लेकिन मुझे लगता है कि अभी भी इस युद्ध में कुछ योगदान देने लायक शक्ति बाकी है मेरे अंदर। चलो त्रिफना को प्राप्त करने चलते हैं।

गोरखनाथ और वेदाचार्य त्रिफना के बिल्कुल करीब पहुँच चुके थे कि तभी एक विशाल दुम की मार ने उन दोनों को त्रिफना से दूर कर दिया। कालदूत का राक्षसी रूप उनसे भिड़ने पहुंच गया था।

गोरखनाथ- उफ्फ, कालदूत को भी स्याह ऊर्जा ने अपना शिकार बना लिया। अभी मेरी और तुम्हारी शक्ति बेहद क्षीण है वेदाचार्य, हम कालदूत का सामना कर पाने में सक्षम नहीं होंगे।

कालदूत ने उन दोनों को अपनी कुंडली में जकड़ लिया और युद्ध में अधिक ऊर्जा व्यय कर पाने के कारण दोनों ही कालदूत की मजबूत पकड़ से छूट पाने में असमर्थ थे।
भेड़िया से लड़ते लड़ते नागराज भी धीरे धीरे अपने ऊपर से नियंत्रण खोता जा रहा था, उसने अपने पास खड़े सुपर इंडियन से कहा- “ऐसे हम कभी नहीं जीत पाएंगे, पूरी सृष्टि का अस्तित्व अब त्रिफना को सक्रिय करने पर ही टिका है। त्रिफना वहाँ महात्मा कालदूत के पास पड़ा हुआ है, तुम्हें त्रिफना को सक्रिय करना होगा।”

सुपर इंडियन- ठीक है, मैं यहाँ से निकलकर त्रिफना को प्राप्त करने की कोशिश करता हूँ।

सुपर इंडियन ने ऊंची छलांग भरी और त्रिफना के समीप पहुँच गया, उसे देखकर कालदूत की कुंडली में कैद गोरखनाथ चिल्ला उठे- “जल्दी करो वत्स, त्रिफना को सक्रिय करो। सभी समयधाराओं का अधिकार किसी पुण्य शक्ति के पास होगा तभी हम विजय हासिल कर पाएंगे।”

कालदूत का ध्यान भी सुपर इंडियन पर गया, उन्होंने सुपर इंडियन पर चीरचला से प्रहार करने का प्रयास किया लेकिन सुपर इंडियन तब तक फुर्ती से त्रिफना हासिल करके एक ही छलांग में उनसे दूर निकल गया।
नागराज और विसर्पी तेजी से स्याह शक्ति में बदल रहे थे और साथ ही साथ वे अन्य स्याह शक्तियों से प्रभावित लोगों से लड़ भी रहे थे।

नागराज चिल्लाकर दूर से ही सुपर इंडियन से बोला- “सच्चे मन से चाहोगे तो त्रिफना खुद ब खुद सक्रिय हो जायेगा, इसे कोई पुण्य शक्ति ही जाग्रत कर सकती है।”

सुपर इंडियन- उम्म्फ! मैं कोशिश कर रहा हूँ लेकिन कुछ हो नहीं रहा है। आखिर क्या कारण हो सकता है?

सुपर इंडियन त्रिफना को सक्रिय करने में व्यस्त था और उसके पीछे एक विकृत नागसैनिक धीरे धीरे भाला लेकर कदम बढ़ा रहा था। सुपर इंडियन को पदचापों की भनक मिलने में थोड़ी देरी हुई, वह मुड़ा तब तक वह नागसैनिक तेजी से भाला उसकी तरफ बढ़ा चुका था, वह भाला उसके सीने में पेवस्त हो जाता लेकिन न जाने कहाँ से एक ऊर्जा किरण आयी और उस नागसैनिक को राख कर दिया। सुपर इंडियन ने देखा कि ऊर्जा किरण मारने वाला था सूरज मोनिका के साथ उसकी तरफ ही आ रहा था।

सूरज- क्या हुआ? त्रिफना काम क्यों नहीं कर रहा?
सुपर इंडियन- ये तो मैं भी नहीं बता सकता।
मोनिका- एक कारण मुझे समझ में आ रहा है, त्रिफना को कोई भी सक्रिय कर सकता है लेकिन सुपर इंडियन कोई साधारण मानव नहीं है, एक क्लोन है जिसके अंदर आत्मा नहीं है। क्या पता त्रिफना को कोई ऐसा व्यक्ति ही सक्रिय कर सकता हो जिसके अंदर आत्मा हो? जैसे कि मैं या तुम।
सूरज- तो क्या मुझे इस त्रिफना को सक्रिय करने का प्रयास करना चाहिए?
मोनिका- जब दांव पर पूरा ब्रह्मांड लगा हो तो हर तरह का प्रयास करना चाहिए।

सूरज ने सुपर इंडियन से त्रिफना हाथ में लिया और अपनी आँखें मूंद लीं। कुछ देर उसकी आंखें बंद रहीं, जब उसकी आँखें खुलीं तो वह, मोनिका और सुपर इंडियन युद्धक्षेत्र में नहीं थे बल्कि किसी अन्य स्थान पर ही थे। उस स्थान पर चारों तरफ रोशनी ही रोशनी थी।
अचानक अपने सामने एक तीस फ़ीट बड़े तीन सिर वाले सर्प को देखकर तीनों सकपका गए, वह सर्प मनुष्य जैसी आवाज़ में सूरज की तरफ देखकर बोला- “घबराओ मत मनुष्य, तुम त्रिफना को सक्रिय करने में सफल रहे। अब त्रिफना तुम्हारा दास है। ये समयधारा और बाकी अनंत समयधारायें तुम्हारे इशारे की गुलाम हैं।”

सूरज- त..तुम कौन हो?

त्रिफना- मैं ही त्रिफना हूँ सूरज।

मोनिका- क्षमा कीजियेगा पर हमको तो लगता था कि त्रिफना सिर्फ एक मूर्ति है, हमें नहीं पता था कि आप एक जीते जागते प्राणी हैं।

त्रिफना- कुछ प्राणियों को सजीव और निर्जीव की सरल परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता, मैं भी एक ऐसा ही प्राणी हूँ। अब तुम अनेकों समयधाराओं के सम्राट हो सूरज, बधाई हो।

सूरज- मुझे अनंत समयधाराओं पर राज करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, बस मेरी समयधारा से स्याह ऊर्जा का नाश कर दो।

त्रिफना- अब तो तुम ब्रह्मांड की अनंत समयधाराओं के इकलौते स्वामी हो, तुम चाहो तो अन्य किसी समयधारा में भी रह सकते हो जहाँ इस प्रकार की समस्याएं ना हों।

सूरज- मैंने कहा ना कि मुझे राज करने में या सम्राट बनने में कोई दिलचस्पी नहीं।

त्रिफना- तो फिर मुझे खेद है कि मैं आपकी आज्ञा का पालन करने में सक्षम नहीं हूँ। आपकी पूरी समयधारा को स्याह ऊर्जा ने इतनी अधिक क्षति पहुंचा दी है कि इसकी क्षतिपूर्ति लगभग असंभव है।

सुपर इंडियन- तो क्या कुछ नहीं किया जा सकता? आप तो स्वयं त्रिदेवों की सम्मिलित शक्ति द्वारा बने हैं, आपके पास कोई तो रास्ता होगा।
त्रिफना (कुछ देर मौन रहकर)- एक रास्ता है।
सूरज- क्या?
त्रिफना- आपकी समयधारा को स्याह ऊर्जा ने भीषण क्षति पहुँचा दी है, यदि उस पूरी की पूरी समयधारा को ही नष्ट कर दिया जाए तो स्याह ऊर्जा भी अपने आप ही खत्म हो जाएगी। मैं एक समयधारा को नष्ट करके उसकी जगह दूसरी समयधारा का निर्माण करने की क्षमता रखता हूँ लेकिन……
सूरज- लेकिन क्या त्रिफना?

त्रिफना- उस समयधारा से जुड़े हर एक प्राणी का अंत हो जाएगा, आप तीनों फिलहाल एक ऐसे स्थान पर हैं जो हर प्रकार की समयधारा से परे है लेकिन आपकी समयधारा के खत्म होते ही आपका अस्तित्व भी खत्म हो जाएगा। उसकी जगह नई समयधारा का पुनःनिर्माण होगा। अब बताइये, क्या चाहते हैं आप सब?
सूरज- तो हमारी समयधारा के समाप्त होने पर स्याह ऊर्जा भी हमेशा हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी?
त्रिफना- बिल्कुल।

फिर सूरज मोनिका और सुपर इंडियन की तरफ मुड़ा और पूछा- “आप लोगों की क्या राय है?”

सुपर इंडियन- अगर और कोई विकल्प नहीं है तो मुझे ये मंज़ूर है।

मोनिका- अब तक तो बची खुची श्वेत शक्तियाँ भी स्याह ऊर्जा का शिकार हो गयी होंगी, अगर स्याह ऊर्जा के अंत के लिए हमारे अस्तित्व का अंत आवश्यक है तो फिर यही सही।
सूरज (मोनिका का हाथ अपने हाथ में लेकर)- तुम्हारे साथ बिताया गया एक एक लम्हा मेरे जीवन के सबसे खूबसूरत लम्हों में से एक था। अदरक चाचा के जाने पर तुम्हीं ने मुझे हिम्मत बंधाई वरना मैं कभी उस सदमे से ना उबर पाता। भले ही हमारा अस्तित्व ना रहे पर हमारे प्रेम का अहसास किसी भी ब्रह्मांड की कोई शक्ति नहीं मिटा पाएगी।

मोनिका- मुझे उम्मीद है कि हम दोनों फिर मिलेंगे, किसी और समय में, किसी और जीवन में।

उस वक्त सूरज और मोनिका के साथ सुपर इंडियन की भी आँखें हल्की सी नम हो गईं थीं।

त्रिफना- तो क्या निर्णय रहा आप सबका?
सूरज- मैं आपको आदेश देता हूँ कि हमारी समयधारा को मिटाकर एक नई समयधारा की रचना कीजिये ताकि स्याह ऊर्जा का समूल विनाश संभव हो सके।
त्रिफना- मैं मानवों को कभी नहीं समझ पाऊंगा, तुमको जो लोभ मैंने दिया उससे तो शायद देवता भी नहीं बच पाते। तुम समस्त समयधाराओं के एकमात्र सम्राट बनकर राज कर रहे होते लेकिन तुमने अपनी समयधारा के साथ मिट जाना कुबूल किया। मैं अपनी शक्ति से उस समयधारा को मिटाकर स्याह ऊर्जा के समूल अस्तित्व को ही समाप्त कर दूँगा और एक ऐसी समयधारा का पुनः निर्माण करने का प्रयास करूँगा जहाँ की वास्तविकता पिछली समयधारा से अधिक भिन्न ना हो।

त्रिफना के इतना कहते ही उस ब्रह्मांड में हर तरफ अंधकार छाने लगा, नागराज और विसर्पी को उस वक्त कई सारे विकृत मनुष्यों ने घेर रखा था। उसने जब अपनी तरफ बढ़ते उस घुप्प अंधकार को देखा तो उसे समझ में आ गया कि अंत निकट है, उसने लड़ना छोड़कर विसर्पी को अपनी बाँहों में भर लिया। शीघ्र ही उस घुप्प अंधकार में समाकर उन दोनों का अस्तित्व समाप्त हो गया। नताशा अभी तक ध्रुव की लाश के पास बैठी उसे एकटक निहार रही थी, उसे पता भी नहीं चला कि कब उसे वह घुप्प अंधकार निगल गया। अंतरिक्ष में मौजूद देव शिरोमणि और सप्तर्षि स्याह ऊर्जा से प्रभावित देवताओं से जूझ रहे थे कि चारों तरफ फैलता घुप्प अंधकार उन्हें भी निगल गया। अपनी समयधारा से परे सूरज, मोनिका और सुपर इंडियन भी समझ चुके थे कि अंत निकट है। सबसे पहले सुपर इंडियन ने आँखें बंद कर लीं और विलीन हो गया, ये देखकर सूरज और मोनिका एक दूसरे के गले लग गए और धीरे धीरे उनका अस्तित्व भी समाप्त हो गया। पूरी की पूरी समयधारा नष्ट हो चुकी थी, स्याह ऊर्जा का भी अब कोई नामोनिशान नहीं था, चारों ओर अंधकार का साम्राज्य था लेकिन उस अंधकार में धीरे धीरे प्रकाश की एक किरण दिखाई दी। वह प्रकाश की किरण द्विगुणित होने लगी, अंधकार अब मिट रहा था, एक समयधारा के नष्ट होने के बाद अब दूसरी समयधारा का निर्माण हो रहा था। ब्रह्मांड का पुनः निर्माण हो रहा था और साथ ही साथ ब्रह्मांड के सभी आयामों, सौरमंडल, ग्रह, तारे आदि भी वापिस उत्पन्न हो रहे थे। पृथ्वी का भी पुनः सृजन हुआ और नव निर्माण हुआ सारी वास्तविकता का।

महानगर-

“राज को मेरे केबिन में भेजो निशा।” भारती ने निशा को फोन करके कहा।
थोड़ी ही देर में सूट बूट पहने और चश्मा लगाए राज भारती के केबिन में खड़ा था- “आपने बुलाया मैडम?”

भारती ने मुस्कुराकर उसकी तरफ देखकर कहा- “मेरे सामने ये नाटक मत करो नागराज, फिलहाल आसपास भी कोई नहीं है।”

“फिर भी सावधानी तो लेनी ही पड़ती है ना भारती।” -नागराज ने चश्मा उतारते हुए कहा

“लेकिन तुमने मुझे क्यों बुलाया है?”

भारती गंभीर स्वर में बोली- “इस बार नागमणि और नागपाशा मिलकर तुम पर हमला करने की योजना बना रहे हैं, दादा वेदाचार्य पर पिछली रात हमला हो गया था। हमलावर नागपाशा का ही आदमी था लेकिन उसे जैसा ही डरपोक, दादाजी ने उसे अच्छी तरह धुनकर ये जानकारी उगलवाई।”

नागराज हल्के से मुस्कुराकर बोला- “ये दोनों कभी नहीं सुधरेंगे, मुझे नाग पंचमी समारोह में शामिल होने के लिए नागद्वीप निकलना था लेकिन लगता है कि महात्मा कालदूत और विसर्पी से क्षमा माँगनी होगी क्योंकि जब तक महानगर में एक भी खतरा मौजूद है, तब तक चैन की साँस नहीं ले सकता विश्वरक्षक नागराज।”

राजनगर-

“अरे ध्रुव बेटा! नाश्ता करके जा!” – रजनी रसोई से बोलती हुई बाहर आयी।
सीढियों से उतरता ध्रुव एकदम ठिठक गया, वह बोला- “मैं लेट हो जाऊँगा मम्मी, नाश्ता आकर कर लूँगा।”

डाइनिंग टेबल पर बैठी श्वेता चुटकी लेते हुए बोली- “माँ यह किसी अपराधी से भिड़ने नहीं बल्कि नताशा से मिलने के लिए इतना उत्सुक है!”

ध्रुव ने गुस्से से उसकी तरफ देखा और फिर सकपकाते हुए रजनी से बोला- “ऐसा कुछ नहीं है मम्मी! इस बंदरिया के मजाक को गंभीरता से मत लेना!”

सोफे पर हाथ में अखबार पकड़े राजन मेहरा बोले- “तो इसमें गलत क्या है भाई! लड़का जवान हो रहा है, लड़कियाँ तो आगे पीछे घूमेंगी ही।”

यह सुनकर श्वेता और रजनी भी दबी हुई हँसी हँसने लगे, ध्रुव झेंपते हुए बोला- “क्या पापा आप भी! अच्छा मैं चलता हूँ, शाम को स्टील के साथ एक चैरिटी फंक्शन में भी जाना है।”

दिल्ली-

परमाणु गगनचुंबी इमारतों को पार करता हुआ लगातार प्रोबॉट के संपर्क में था।
वह तेजी से उड़कर आगे बढ़ता हुआ बोला- “सिचुएशन क्या है प्रोबॉट?”
उसके मास्क में लगे इयरफोन में एक मशीनी आवाज़ गूँजी- “एक व्यक्ति ने कुतुबमीनार को ज़िंदा कर दिया है, वह खुद को इतिहास कह रहा है।”

परमाणु मजाकिया अंदाज में बोला- “इतिहास को तो मैं इतिहास बनाऊँगा, लोकेशन पर और कोई ब्रह्मांड रक्षक नहीं पहुँचा क्या?”

इसके जवाब में प्रोबॉट फिर बोला- “तिरंगा पहुँचा था लेकिन वह सिर्फ बचने की कोशिश कर रहा है और भीड़ में से कई स्त्रियां चीखी हैं इसका मतलब शक्ति के पहुचने में भी ज़्यादा समय नहीं…….लो! शक्ति तो घटनास्थल पर पहुँच भी गयी।”

परमाणु खुश होकर बोला- “वाह! अब शक्ति से तो यह इतिहास बचने से रहा, भला हो शक्ति का जो मेरा काम आसान कर दिया। अब शीना के साथ मैं अपनी डेट पूरी कर पाऊँगा।”

रूपनगर-

कुछ संदिग्ध लोग कब्रिस्तान में अवैध रूप से लाश चुरा रहे थे। दूर किसी कब्र पर बैठा एक कौआ बुरी तरह कर्कशा रहा था, ये देखकर एक व्यक्ति दूसरे से बोला- “ये कौआ दिमाग खराब कर रहा है माइकल! इसे गोली मार दे!”

माइकल नाम का व्यक्ति कौए को गोली मारने के लिए आगे बढ़ा लेकिन उसी वक्त वह कब्र बुरी तरह फट गई जिस पर कौआ बैठा था और उसके भीतर से निकला ज़िंदा मुर्दा एंथोनी। एंथोनी को देखकर वह व्यक्ति घबरा गया और एक के बाद एक ताबड़तोड़ गोलियाँ चला दीं लेकिन एंथोनी उसकी तरफ बढ़ता रहा और एक ही मुक्के में उसे ढेर कर दिया। माइकल के साथी भी सचेत हो गए थे, वे दौड़ते हुए उसी दिशा में गये लेकिन एंथोनी के हाथों से निकलती ठंडी आग ने उनके भी होश फाख्ता कर दिये।
बेहोश अपराधियों को देखकर कौआ फिर से कर्कशाने लगा, ये देखकर एंथोनी बोला- “नहीं प्रिंस, इनका कृत्य लाख घिनौना सही लेकिन इनकी जान लेने का हक हमें नहीं है। इससे आगे पुलिस सब देख लेगी।”
इतना कहकर एंथोनी एक बार फिर कब्र के भीतर समा गया।

असम-

ऐलीफेंटा गुपचुप तरीके से कुछ कबीले के लोगों द्वारा ड्रग्स को जंगल में ला रहा था।
तभी एक व्यक्ति घबराया से उसके पास दौड़ता हुआ आया और बोला- “ऐलीफेंटा, वो..वो हमारे एक ट्रक को भेड़िया ने पकड़ लिया है! उसे यहाँ का पता भी मिल गया है!”

ऐलीफेंटा क्रोधित होकर बोला- “मैंने पहले ही कहा था कि माल इधर उधर पहुँचाने के लिए कोई और साधन ढूँढो, भुगतो अब!”

तब तक ऐलीफेंटा के सामने खड़े खबरी को एक लंबी सी पूँछ खींच ले गयी, सामने हाथ में गदा लिए भेड़िया चेहरे पर क्रूर मुस्कुराहट लिए खड़ा था। भेड़िया को देखकर ऐलीफेंटा की घिग्घी बंध गयी, वह विपरीत दिशा में दौड़ने लगा लेकिन अधिक देर तक नहीं दौड़ पाया क्योंकि तीव्र गति से आती गदा ने उसे टक्कर देकर गिरा दिया था।

भेड़िया ऐलीफेंटा के सिर पर सवार होकर बोला- “अगर हनु फूजो बाबा को ट्रक के बारे में ना बताता तो तुम लोग आराम से नशीले पदार्थ जंगल में लाते रहते।”

ऐलीफेंटा बुरी तरह घबराकर बोला- “म..मुझे माफ़ कर दो भेड़िया, मैं भटक गया था।”

भेड़िया दाँत भींचते हुए बोला- “तूने पिछली बार भी यही कहा था और मैंने तुझे जाने दिया था लेकिन याद है कि मैंने पिछली बार क्या कहा था? कि अगर दोबारा इस जंगल में दिखाई दिया तो तेरी बोटी बोटी करके अपने भेड़ियों को खिलवा दूँगा और भेड़िया अपनी जुबान का बहुत पक्का है। चले आओ! चले आओ मेरी भेड़िया फौज के सिपाहियों!”

ऐलीफेंटा ने देखा कि सामने से बहुत सारे भूखे भेड़िए आ रहे थे, भेड़िया बोला- “अब मैं गदा से तेरे टुकड़े करूँगा और इन भेड़ियों को खिला दूँगा। जो भी मेरे जंगल को किसी भी तरह से दूषित करने का प्रयत्न करेगा उसे भयानक मौत देगा भेड़िया।”

मैट्रो सिटी-

इंस्पेक्टर कनखजूरा तेजी से अपनी हाईटेक पुलिस गाड़ी को भगा रहा था, उसके बगल में बैठा हवलदार बोला- “सर! सेक्टर 19 से खबर आ रही है कि खुद को अंकल मेट्रो कहने वाले अपराधी ने वहाँ एक बॉम्ब प्लांट कर दिया है जैसा कि उसने पिछले महीने सेक्टर 18 में किया था।”

कनखजूरा बिना हवलदार की तरफ देखे बोला- “लेकिन पिछली बार की तरह हमें देर नहीं करनी वरना वो अज्ञात मददगार एक बार फिर खुद को पुलिस से बेहतर साबित करने में सफल हो जाएगा। मैट्रो सिटी के गठन के समय ही मैंने सोचा था कि पुलिस फ़ोर्स ही यहाँ की सुपर हीरो होगी, इसके लिए मैंने “नो सुपरहीरो एक्ट” पास करने की अपील भी की थी सरकार से लेकिन हमारी सरकार कुछ ज़्यादा ही आलसी हो गयी है इसलिए उसे सुपरहीरोज़ पर निर्भर रहना पसंद है। ये देखो बातों बातों में हम सेक्टर 19 भी पहुँच गए, अब यहाँ के हालातों का जायजा ले लेते हैं।”

इंस्पेक्टर कनखजूरा और हवलदार गाड़ी से निकले लेकिन तभी सामने उन्हें दिखा वह विचित्र दृश्य, अंकल मैट्रो एक लोहे के खंभे पर नाइलो स्टील की तारों से बंधा बेहोश पड़ा हुआ था और उसके साथ ही बंधा हुआ था वह बॉम्ब जिसे पुलिस के पहुँचने से पहले ही निष्क्रिय कर दिया गया था।

यह देखकर कानखजूरा दांत भींचकर बोला- “समझ में नहीं आता कि ये सो कॉल्ड सुपरहीरो हर जगह हमसे पहले कैसे पहुँच जाता है? आखिर कौन है ये?”

उसके बगल में खड़ा हवलदार बोला- “सर पक्की तौर पर सूचना तो किसी के पास नहीं है लेकिन लोग उसे सुपर इंडियन बुलाने लगे हैं।”

ये नाम सुनकर कानखजूरा बोला “हम्म सुपर इंडियन! लगता है आने वाले दिनों में इस सुपर इंडियन और हमारे बीच छत्तीस का आंकड़ा रहेगा।”

और आखिरकार….

मुम्बई-

सुहावने मौसम में सूरज काला चश्मा लगाए बाइक के साथ ट्रैफिक में फँसा हुआ था, वह मन ही मन बोला- “सूरज बेटा आज तो तू गया! अदरक चाचा जिम लेट पहुंचने की वजह से तेरी क्लास ले लेंगे। लगता है आज रात की गश्त भी नहीं हो पाएगी”

तभी उसकी नज़र बस स्टैंड पर खड़ी एक सुंदर सी लड़की पर पड़ी। परेशानी उस लड़की के चेहरे पर साफ नजर आ रही थी, वह बार बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी को देखकर बस का इंतज़ार कर रही थी। ट्रैफिक के आगे बढ़ते ही सूरज बाइक को बस स्टैंड के बगल में ले जाकर बोला- “एक्सक्यूज़ मी मैडम! क्या आप बस की राह देख रही हैं?”
वह लड़की उसकी तरफ देखकर बोली “जी हाँ, लेकिन मुझे नहीं लगता कि बस जल्दी आने वाली है।”

सूरज ने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा- “आपको जाना कहाँ है?”

उस लड़की ने उत्तर दिया- “मेरा कम्पटीशन था स्वामी विवेकानंद स्टेडियम में।”

ये सुनकर सूरज को कौतूहल हुआ, उसने पूछा- “विवेकानंद स्टेडियम में? लेकिन वहाँ तो आज…. अच्छा तो क्या आप एक एथलीट हैं?”

वह लड़की मुस्कुराते हुए बोली- “जी मैं एक जिम्नास्ट हूँ।”

सूरज ट्रैफिक पर सरसरी निगाह दौड़ाता हुआ बोला- “देखिए, ऐसे ट्रैफिक में बस मिलना मुश्किल है। यदि आप चाहें तो मैं आपको लिफ्ट दे सकता हूँ।”

हल्की मुस्कुराहट के साथ वह लड़की सूरज की ओर देखते हुए बोली- “यदि आप चांस मारने की कोशिश कर रहे हैं तो मैं पहले ही बता दूँ कि मेरे भाई इंस्पेक्टर चीता छिछोरों को बहुत मारते हैं।”

सूरज हँसकर बोला- “जी नहीं, मैं चांस नहीं मार रहा बल्कि मदद करना चाहता हूँ आपकी। वैसे नाम क्या है आपका?”

“मोनिका!” वह लड़की बाइक के पीछे बैठते हुए बोली।

सूरज ने बाइक स्टार्ट कर दी, थोड़ी दूर जाने के बाद ट्रैफिक खत्म हो गया था और सड़क एकदम सपाट थी जिस पर बाइक सामान्य गति से चल रही थी।
मोनिका ध्यान से सूरज को देखते हुए बोली- “ऐसा लगता है जैसे मैंने आपको कहीं देखा है, अरे बाप रे! आप तो पिछली बार मुम्बई में आयोजित बॉडीबिल्डिंग की चैंपियनशिप जीते थे, मैं अपने भाई के साथ वह प्रतियोगिता देखने आई थी। आपका नाम याद नहीं आ रहा मुझे।”

“सूरज!”

सूरज मुस्कुराते हुए बोला- “मेरा नाम सूरज है!”

एक समयधारा का अंत और एक नई समयधारा का आगाज़ हो चुका था।

समाप्त

Written by- Samvart Harshit for Comic Haveli

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5 Comments on “Earth 61 Phase 2 Part 20 (Third Stage)”

  1. शब्दो से परे
    प्रशंसा के लिए शब्द ही नही
    मुझे अंत एकदम धांसू लगा
    कुछ कुछ एंडगेम की याद आई पर उससे भी अच्छी
    उत्कृष्ट अंत

  2. भाई समयधारा के अंत तक के पहले की कहानी बहुत बढ़िया लगी। एक एक कर के सभी नायक वीरगति को प्राप्त हो रहे थे। पहले परमाणु फिर अदरक चाचा फिर बाकी सभी। मेरे तो आंखों से आंसू आ गये पढते पढते। दिल भर आया था अपने सभी नायकों का अंत होता देखकर। क्योंकि भले ही आप ने कहानी अलग आयाम को लेकर लिखी है। पर इन हीरोज को बचपन से पढते आये है। अपना बचपन हमने इन्हीं के साथ बिताया है। इसलिए इन के अंत पर दुख भी बहुत हो रहा है।
    ऐसा नही है कि कहानी बढिया नही है। बहुत बढ़िया है। आप का लेखन ही इतना जोरदार है कि कोई भी आप की लेखन कला का दिवाना हो जाये।
    पर जिस तरह आप ने EARTH 61 PHASE 1 से यह कहानी शुरु की। और इस का EARTH 61 PHASE 2 भी लाये। मुझे लगा था कि आगे भी इसे और पढने को मिलेगा। पर आप ने समयधारा को ही खत्म कर दिया। मुझे उम्मीद ही नहीं थी कि इस कहानी का अंत इस तरह होगा।
    मुझे इस के लास्ट भाग का बहुत बेसब्री से इंतजार था। पर इस का इस तरह का अंत देखकर बहुत निराशा हुई। क्योकि आप ने EARTH 61 का वजूद ही खत्म कर दिया है। लगता है कि अब EARTH 61 के बारे मे कोई कहानी पढने को नहीं मिलेगी। इस का अब इति श्री हो गया है।
    ऐसा नही है कि यह बढिया नहीं है। बस इसकी उम्मीद नहीं थी। मेरे ऐसा कहने से आप को मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो उस के लिये क्षमाप्रार्थी हू।

    1. जी विजय जी आपको सही लगा, फेज 3 अब नहीं आएगा लेकिन अगर बहुत लोगों की इच्छा हुई तो एक 4 भाग की मिनी सीरीज लेकर आऊंगा जिसमें मुख्य घटनाओं से हटके earth 61 में ही चल रही अन्य घटनाओं को दर्शाया जाएगा।

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