मित्र की महत्ता

संसार में जब जीवन शुरू हुआ और मानव ने आपसी संसर्ग करके मानव जाति की बेल को आगे बढ़ाया तो उन अव्यवस्थित समूहों को व्यवस्थित करने के लिए उन्हें एक संस्था की आवश्यकता महसूस हुई , तथा उसके पश्चात् रिश्तो का जन्म हुआ। आपसी संसर्ग करने वाले नर नारी पति पत्नी कहलाये और उनके द्वारा उत्पन्न हुए नए वंश उनकी संतान कहलायी गयी। इन रिश्तों  के साथ साथ अन्य रिश्तो की भी स्थापना की गयी जिसमे सर्वप्रथम विवाह नामक संस्था के द्वारा दो विपरीत लिंग वाले मानवों को एक सम्बन्ध में जोडा  गया , उनकी सन्तानो के बीच भाई बहन जैसे रिश्तों की भी नींव  रखी गयी , आवश्यकतानुसार तथा समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ अन्य रिश्तों का भी प्रादुर्भाव हुआ तथा इस प्रकार एक अव्यवस्थित झुण्ड की जगह एक सभ्य समाज पनपने लगा। सभी रिश्तों को कुछ सीमाओं तथा दायित्वों से बाँधा गया। प्रत्येक रिश्ते में कुछ अधिकार थे तो कुछ कर्तव्य भी थे। और यही क्रम आज तक चला आ रहा है।

सर्वविदित है के अधिकार अक्सर कर्तव्यों पर भारी पड जाते हैं , कर्तव्य का निर्वाह करने के स्थान पर प्रत्येक मनुष्य केवल अधिकारों के लिए ही लड़ता हुआ पाया जाता है। उसी प्रकार सभी प्रकार के रिश्तों को भी किसी ना किसी प्रकार के स्वार्थ ने आदिकाल से घेरा हुआ है। हालाँकि स्वार्थ भी कहना उचित नहीं किन्तु प्रत्येक रिश्ते प्रत्येक सम्बन्ध के पीछे कुछ निश्चित उद्देश्य और अपेक्षाएं अवश्य होती हैं। विवाह होने के उपरांत पत्नी की अपेक्षाएं होती हैं के पति उसकी समस्त शारीरिक , सांसारिक और आर्थिक आवश्यकताओं का निर्वाह करेगा। पति की अपनी पत्नी से भी इसी प्रकार की कुछ अपेक्षाएं होती हैं।  कुछ समय बाद संताने पैदा होती हैं। सन्तानो की अपेक्षाओं से तो सारा जग विदित है।  उधर सन्तानो के लालन पालन में व्यस्त माता पिता की अपेक्षा होती है के उम्र के ढलते पड़ाव पर संताने उन्हें सहारा देंगी , उनका ख्याल रखेंगी , खैर कितना ख्याल रखते हैं ये तो सब जानते हैं , और इस विषय में किसी टिप्पणी की आवश्यकता भी नहीं।  बात केवल अपेक्षाओं की चल रही है तो उसी पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक रिश्ता भाई बहन दादा पोता चाचा भतीजा , ससुर सास सब के सब किसी न किसी तरह का स्वार्थ या अपेक्षा एक दूसरे से अवश्य रखते हैं और इसी प्रकार से ये सिलसिला अनवरत आज तक चला आ रहा है।

और फिर इन सब स्वार्थ से परिपूर्ण , धोखे से भरे और अपेक्षाओं के नीव पर खड़े रिश्तों के बीच आता एक ऐसा सम्बन्ध जिसे रिश्ते का नाम भी नहीं दे सकते और सभी रिश्तों से ज्यादा घनिष्ठता है फिर भी उसमे। दो प्राणियों के बीच एक ऐसा रिश्ता जिसमे त्याग भाव की अधिकता , निच्छल प्रेम की अधिकता और स्वार्थ की अनुपस्थिति है।
मित्र का रिश्ता।

मित्रता के रिश्ते से हालाँकि सभी परिचित हैं, हजारो उदाहरण हमारे इतिहास में मौजूद हैं जो मित्रता और मित्रता में किये गए त्याग के किस्सों  से भरे पडे हैं। उपरोक्त समस्त रिश्तों की कसौटी पर अगर मित्रता के रिश्ते को रखें तो समझ आता है कि मित्र कभी नहीं चाहता के दूसरा मित्र पूरी उम्र उसकी समस्त जरूरतों का निर्वाह करे , बल्कि ये अवश्य चाहता है के वो किसी भी तरह मित्र के काम आ सके। सबसे ज्यादा आयु भी मित्र के रिश्ते की ही बताई गयी है , जैसे की पति पत्नी का रिश्ता कम से कम बीस वर्ष की आयु के साथ शुरू होता है , लगभग उसी प्रकार माता पिता और संतान का रिश्ता भी उसी आयु से शुरू होता है , जबकि मित्र अगर बचपन में मिल जाए तो जीवन के अंत तक साथ रहते हैं।  भाई बहन के रिश्ते की आयु भी अधिक होती है किन्तु विवाहोपरांत सम्बन्धो में दूरियां आ जाती हैं और केवल कुछ अपेक्षाओं के धागे ही उस रिश्ते को बांधे रखते हैं। अक्सर समाज में लोगो को रिश्तों से कुंठित होते हम सबने देखा है , कोई पत्नी से दुखी , कोई संपत्ति विवाद में भाइयों से दुखी , कोई शराब पीने वाले संतान से दुखी लेकिन कभी किसी मित्र से दुखी मित्र को नहीं देखा।

एक किस्सा याद आता है इसी बात पर , लगभग दस वर्ष पहले मेरे साथ एक दुर्घटना हुई थी , जिसके चलते दाहिने पैर में स्टील की प्लेट डालनी पड़ी थी। उस समय रिश्तेदारों और मित्र का फर्क देखने और समझने का अच्छा अवसर और समय मिला।  ठीक होने के लगभग साढ़े तीन साल बाद मैं और मेरा मित्र अस्पताल गए उस प्लेट को निकलवाने के लिए , रजिस्ट्रेशन करने वाली मैडम ने कहा आपके साथ कौन आये हैं उनका नाम और उनके साथ रिश्ता लिखवा दीजिये , और रिश्ते के नाम पर मेरी धीमी सी हंसी निकल गयी।  खैर बड़ी आश्चर्यचकित सी होकर उन्होंने मित्र का नाम और रिश्ते में मित्रता लिखकर रजिस्ट्रेशन कर दिया।  मित्रता की कोई स्थायी परिभाषा नहीं होती, जिस व्यक्ति के साथ भी समय बिताना हमें अच्छा लगता है और जिसके साथ हमारे सबसे कम वैचारिक मतभेद होते हैं उसे सच्चा मित्र कहा जा सकता है। हालांकि वर्तमान समय में मित्रता का रिश्ता भी धीरे धीरे अपेक्षाओं का मोहताज बनता जा रहा है, जब जीवन में ऐसी कोई कठिनाई आती है जिसमें वाकई सहारे की ज़रुरत हो तब मित्रता की असली परीक्षा होती है। इसलिए कहा जाता है की कुछ समय के लिए असफलता का स्वाद भी लेना चाहिए ताकि पता तो चले की उस समयकाल में आपके साथ कौन कौन है।

तथ्यों में किसी प्रकार की त्रुटि हुई हो तो अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ।

नमस्कार।

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5 Comments on “मित्र की महत्ता”

  1. हीहीही। बहुत ही गजब का लेख। हमारे चाचा श्री तो एक्सपर्ट हैं। लेख लिखने में। घसीट-घसीटकर कलम परचम लहरा देते हैं। मुझे इनके लेख बड़े अच्छे लगते हैं। मित्रता पर लिखा ये लेख पढ़कर मज़ा आ गया। पर आज के ज़माने में ऐसे दोस्त और दोस्ती बहुत कम……………………………….भी नही देखने को मिलते । इस लेख में एक रोचक घटना भी जान्ने को मिली की दस वर्ष पहले चाचा के पैर में इंपेक्टर स्टील मेरा मतलब स्टील डाला गया था। सुन कर दुःख नही हुआ हीही। क्योंकि दस साल पुरानी बात है इसलिए मैं भूल गया हूँ।
    मुझे पता नही मैं रिव्यू में क्या क्या लिखे जा रहा हूँ। क्योंकि मेरा भेजा ये लेख पढ़ने के बाद घूम गया है। क्योंकि आपको तो पता है की मुझे इनके लेख *बड़े अच्छे* लगते हैं। हीहीही।

    अगले लेख का इंतज़ार है।
    क्योंकि फिर भेजा घुमाने का मन कर रहा

  2. mujy eysha kyun lgaa ki jese abi aur bi bhut kuch likhnaa baaki thaa …kasam sy bhut gjb likha hy …bus suru suru ki history dhykh kar hyraan rhy gya tha ki eysha hota tha hmaary smaaj m

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