Nagbharat – (Kaal Parv)

नागभारत
काल पर्व
मनुष्य हमेशा से प्रकृति को अपने वश में करना चाहता रहा है , परन्तु जिसको वह अपने वश में नहीं कर सकता वो है- काल।
भूतकाल में हुई घटनाओं को बदला नहीं जा सकता और भविष्य काल में क्या होगा यह किसी को ज्ञात नहीं रहता , पर भूत काल और भविष्य काल के मध्य एक और काल भी है जो हमारा भविष्य निर्धारित करता है , वो है-वर्तमान काल।
【वर्तमान काल】
वर्तमान समय में घटनाएं बहुत तेजी से घट रही थीं।
स्थान-असम।
वन के बाहर खड़ा नागेन्द्र कुछ आदमियों को निर्देश दे रहा था।
नागेन्द्र- जल्दी जल्दी सारे यंत्रों को वन के बाहर लगा दो और उनको अदृश्य करने वाला बटन भी दबा देना।
नागेन्द्र(स्वयं से)-अब देखता हूँ कैसे बचोगे तुम सब।
कुछ समय पश्चात-
वन के भीतर भेड़िया और अन्य ब्रह्मांड रक्षक फूजो बाबा के आश्रम से दूर युद्ध कलाएँ सीख रहे थे।
डोगा- भेड़िया तुम्हारी गदा है बहुत काम की , हर जगह लेकर जाना भी नहीं पड़ता और पुकारने पर तुरंत प्रकट भी हो जाती है।
भेड़िया- यह कहीं नहीं जाती बस इसके अणु में होने वाले कंपन बदल जाते है , और ये अदृश्य हो जाती है। पर मेरे दिव्य कड़ो की वजह से हमेशा मेरे आस पास ही रहती है और मेरे पुकारने पर तुरंत प्रकट हो जाती है।
परमाणु- वाह भेड़िया , तुमको तो इसके पीछे का विज्ञान भी पता है।
तिरंगा- यही विज्ञान हमारे दिव्यास्त्रों के लिए भी कार्य करता है।
डोगा-मैं भी अपने गन के लिए ऐसा ही कुछ बनाऊँगा , ताकि उसे हर जगह ना लेकर जाना पड़े।
स्टील कुछ समय से बहुत शांत था।
स्टील- भेड़िया , जल्दी से कबीले वालों को सतर्क कर दो , अचानक से धरती के कंपन बढ़ रहे हैं , शायद कोई भूकंप आने वाला है।
भेड़िया आश्चर्यचकित होते हुए- परंतु कैसे , अगर कोई बड़ा भूकंप आने वाला होता तो जानवरों को अवश्य पता होता।

तिरंगा- धीरे धीरे कंपन भी बढ़ रहे हैं।
डोगा- परन्तु ये आवाज कैसी , लग रहा है कोई हाथियों का विशाल झुण्ड हमारी तरफ ही आ रहा है।
परमाणु- लग नहीं रहा , ये अवश्य वही है हाथियों का विशाल झुंड।

सबने देखा धूल का विशाल गुबार उनकी तरफ ही बढ़ रहा था।

भेड़िया – परंतु इस दिशा में तो कई कबीले हैं , इस वेग से बढ़ता हुआ ये झुंड उन कबीलों को तबाह कर देगा। मुझे जाना होगा।
डोगा- मैं भी चलता हूँ तुम्हारे साथ।

भेड़िया और डोगा कबीलों की तरफ बढ़ गए।

परमाणु- हमें भी यहाँ से शीघ्र निकलना होगा।

सब दूसरी दिशा की तरफ बढ़ने लगे।

तिरंगा-इस प्राकृतिक आपदा के समय हमें जंगल और जंगल वासियों की रक्षा भी करनी चाहिए।

स्टील- परंतु मुझे यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं लग रही। मेरे यंत्रो से पता लग रहा है कि वातावरण में विभिन्न प्रकार की ध्वनि तरंगे फैली हुई हैं जैसे पराध्वनिक तरंगे( ultrasonic waves) ।मनुष्य इन तरंगों को नहीं सुन सकता परन्तु जानवर इन तरंगों को अवश्य सुन सकते है। शायद इसी कारण जानवरों में भगदड़ मच गई है।

तिरंगा- परन्तु तुम ये तो पता कर ही सकते हो न कि इन तरंगो का स्रोत कहाँ पर है।

स्टील-नहीं , वही तो पता नहीं चल रहा मुझे।यहाँ कुछ अन्य तरंगे भी हैं जो इसमें बाधा उतपन्न कर रहीं है।

परमाणु- परंतु सबसे महत्वपूर्ण ये कंपन है। आखिर इन सबका क्या मतलब है। इन कम्पनों की तीव्रता भी अब बढ़ नहीं रही है।

तिरंगा- पर अगर ये कम्पन लगातार होते रहे तो धीरे धीरे सारे वृक्ष गिरने लगेंगे।

स्टील- इस प्रकार तो कुछ ही समय में ये सारे वृक्ष गिर जाएंगे और ये वन नष्ट हो जायेगा।

तिरंगा- परंतु अगर ये कम्पन यांत्रिक हैं , तो अवश्य वो यंत्र वन के बाहर ही होगा।

परमाणु- ठीक है , तो हम भी वन के बाहरी भागों में चल कर देखते हैं।

कुछ समय पश्चात-

तिरंगा, स्टील और परमाणु वन के बाहर बढ़ रहे थे।

तिरंगा – कम्पन अचानक से बढ़ गए हैं यहाँ, वो यंत्र अवश्य कहीं आस पास होगा।

अचानक से परमाणु का हाथ किसी वस्तु से टकराया

परमाणु- यहाँ है। यहाँ है वो यंत्र पर अदृश्य है। इससे ही वो कम्पन हो रहे है ।

परमाणु ने पूरे तीव्रता के साथ उसपर वार किया। परन्तु यंत्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत यंत्र को छूते ही परमाणु के शरीर में भी तीव्र कम्पन होने लगे और उसे यंत्र को छोड़ना पड़ा।

परमाणु- उफ! अदृश्य होने की वजह से इसका वास्तविक आकार नही पता चल रहा और कम्पनों की वजह से इसको पकड़ना भी मुश्किल है।

तिरंगा- अगर ऐसा ही रहा तो हम इन्हें नष्ट कैसे करेंगे।

तभी भेड़िया की गदा तीव्र वेग से उससे टकरा गई और कम्पन शांत हो गए।
तीनों ने पीछे देखा तो भेड़िया और डोगा उन्हीं की तरफ बढ़ रहे थे।

स्टील- तुम दोनों यहाँ?

भेड़िया-हाँ , कबीले वालों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा कर हम सब इधर ही बढ़ रहे थे।

तिरंगा- परन्तु यह कम्पन अभी रुका नहीं है।

डोगा- ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे बहुत सारे यन्त्र यहाँ लगे है। कुछ देर पहले भी हमने एक ऐसे ही यन्त्र को नष्ट किया है।

भेड़िया- परन्तु इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए हमे इस समस्या के स्रोत को ढूंढना पड़ेगा।इसीलिए हम जंगल के बाहरी भाग की तरफ बढ़ रहे थे।

परमाणु- हमसब भी उसी तरफ बढ़ रहे थे। ऐसा करते है हम दो भागों में बँट जाते हैं और फिर ढूंढते है।

डोगा- ठीक है , मैं और भेड़िया इस तरफ जाते हैं और तुम तीनों उस दिशा में जाओ।

परमाणु- ठीक है।
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मंदिर के बाहर नागराज आदिवासी कबीले वाले से लड़ने में व्यस्त था। नागराज के सीने पर हुआ घाव भी धीरे धीरे भर रहा था।

नागराज(मन में)-इस पर किसी विष का प्रभाव क्यों नहीं पड़ रहा। अचानक से जमीन में भी कम्पन हो रहे हैं , यह भी शायद इसी का किया हुआ है।

इस बार उसने एक साथ कई तीर छोड़ दिये, नागराज तीन पलों के लिए अदृश्य होकर बच गया ।

नागराज(मन में)- सर्परस्सी तो इसको छुए बिना दूर से ही निकल जा रही है। इसपर किसी अन्य चीज़ का प्रयोग करना पड़ेगा। यह वृक्ष , इतने देर के कम्पन के कारण अवश्य कमजोर हो गए होंगे।

नागराज ने इस बार सर्परस्सी दो पेड़ो की तरफ फेंकी , सर्परस्सी उनसे जा कर लिपट गयी। उनको खींचते ही पेड़ आदिवासी की तरफ गिरने लगे। पर वह अत्यंत ही फुर्ती के साथ बच गया।
‎नागराज ने इस बार एक मजबूत पेड़ की तरफ रस्सी फेंकी और उसपर झूल गया। हवा में उड़ता हुआ उसका शरीर उस आदिवासी से जा टकराया । उसके शरीर पर कोई फर्क नहीं पड़ा उल्टे नागराज को ऐसा लगा जैसे वो किसी मजबूत दीवार से टकरा गया ।
‎आदिवासी को क्रोध आ गया। उसने एक बार फिर कई सारे तीर छोड़े , इसबार फिर से नागराज ने अदृश्य हो कर बचना चाहा , परन्तु हवा में उड़ते हुए तीर अदृश्य नागराज के पास जाकर रुक गए । तीन पलों के बाद नागराज का शरीर जैसे ही वापस आया उसके शरीर को एक तेज़ झटका लगा और उसके गले से चीख निकल गयी।
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‎स्थान- दिल्ली।
‎ICU में एंथोनी एक अदृश्य साये से बात कर रहा था।

‎एंथोनी- मुझे पता था तुम मेरा कार्य करने अवश्य आओगे ईरी ।

‎ईरी- मुझे तो आना ही था एंथोनी। तुमने बहुत बार मेरी मदद भी तो की है। पर मुझे एक बात नहीं समझ आयी पहले तुम चाहते थे कि मैं किंग को स्वस्थ करूँ अब तुम ध्रुव को स्वस्थ करने की बात कर रहे हो। तुमको याद तो है ना कि मैं दोनों को ठीक करने में असमर्थ हूँ।

‎एंथोनी- मुझे पता है ईरी। परंतु यह तो तुम भी जानते होगे की समय के साथ सबकी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं।
‎ध्रुव और किंग दोनों अनिश्चित काल के लिए कोमा में हैं , समय के साथ उनदोनों को होश तो आ जाएगा । पर इस समय ध्रुव का ठीक होना ज्यादा जरूरी है। सबकी उम्मीदें ध्रुव से हैं और मेरी उम्मीद तुमसे है।

‎ईरी-ठीक है , जैसा तुम चाहो । मैं ध्रुव को स्वस्थ करता हूँ।

‎ईरी ने ध्रुव के सर पर हाथ रखा । एक अजीब सी ऊर्जा ध्रुव के शरीर में समाने लगी।

‎ईरी- मैंने अपनी योग और तप से अर्जित की हुई ऊर्जा को ध्रुव के शरीर में स्थानांतरित कर दिया है । ध्रुव के दिमाग का क्षतिग्रस्त भाग जल्दी से ठीक होने लगेगा । कल सुबह तक यह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाएगा।
‎ईरी वहाँ से जाने लगा।

‎एंथोनी – तुम हमारे साथ नहीं आ रहे ईरी? तुम तो जानते ही हो कि आने वाले महायुद्ध में हमें तुम्हारे जैसे लोगों की जरुरत पड़ेगी।

‎ईरी- फिलहाल अभी तो नहीं , मैं मुर्दों की दुनिया में वापस जा रहा हूँ। मुर्दो की दुनिया मे भी मेरी जरूरत है।
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‎भेड़िया और डोगा जंगल के बाहरी भागों की तरफ बढ़ रहे थे।

‎डोगा- कम्पनों की तीव्रता फिर बढ़ रही है।इसका मतलब एक और यंत्र यहीं कहीं आस पास होगा।

‎भेड़िया-हाँ ऐसा ही होगा।

तभी भेड़िया की नजर नागेन्द्र के एक आदमी पर पड़ी , जो वापस नागेन्द्र के पास जा रहा था।

‎भेड़िया- ये मनुष्य कौन है। वेशभूषा से तो जंगली नहीं लग रहा।

‎डोगा- यह जो भी है , इन यंत्रो के बारे में अवश्य जानता होगा।

‎तब तक उस आदमी ने भी दोनों को देख लिया। उसने अंधाधुंध गोलियाँ चला दी।
‎भेड़िया ने गदा उसकी तरफ फेंकने के लिए हाथ उठाया ही था कि डोगा ने उसे रोक दिया।

‎डोगा-रुको भेड़िया यह हमें इन यंत्रो के बारे में पूरी जानकारी दे सकता है । इसको जीवित ही पकड़ना होगा।

‎भेड़िया ने एक पेड़ की टहनी तोड़ी और उस आदमी की तरफ उछाल दी। बंदूक उसके हाथों से गिर गयी।उसने भागने की कोशिश पर तब तक डोगा और भेड़िया उस तक पहुंच चुके थे।

‎डोगा- यहाँ से भागना अब बेकार है। सच सच बताओ ये कैसे यंत्र है , और यहाँ ऐसे कितने यंत्र हैं?

‎उस आदमी ने एक शब्द भी नहीं बोला।

‎भेड़िया – ये ऐसे नहीं बोलेगा।

‎भेड़िया को भी क्रोध आ गया। उसने एक टहनी तोड़ी और उसकी हथेली में घोंप दी। उसके मुँह से एक हृदय विदारक चीख निकल गयी।

‎डोगा- तुम हमें जानवर बनने पर मजबूर कर रहे हो। हम तुम्हें मारेंगे नहीं पर ऐसी हालत जरूर कर देंगे कि तुम्हें अपने जीवित होने पर भी अफसोस होगा।

‎दर्द से चीखता हुआ वह आदमी सब बताने लगा।
‎” बताता हूँ। सब बताता हूँ।यह सब प्राचीन विज्ञान की मदद से बनाये गए यंत्र हैं , जो धरती में कम्पन पैदा करते है। उन्ही से विभिन्न प्रकार की ध्वनि तरंगे भी निकल रहीं है। ऐसे कुल बीस यंत्र हैं जो हमने इस वन के बाहरी भागों में लगाया है।और ऐसा करने के लिए नागेंद्र ने हमें……”

‎वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाया था कि एक गोली उसके सर को भेदती हुई निकल गई।
डोगा और भेड़िया दोनों चोंक गए।

‎डोगा- लगता है इसका कोई और साथी इधर ही है।

‎भेड़िया- हाँ । सही कहा। आओ देखते हैं।

‎डोगा और भेड़िया दोनों गोली चलने की दिशा में दौड़ने लगे।
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‎रात एक बार फिर जंगल को अपने आगोश में ले रही थी। पर पूर्णिमा की रात में निकला हुआ पूरा चाँद रात में भी प्रकाशमान था।
‎लगातार हो रहे कम्पन भी अब अपना असर दिखा रहे थे।
‎नागेन्द्र अपने कार्य के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा था।
‎उसके तीन आदमी उसके पास खड़े थे।

‎नागेन्द्र- तुम तीनों तो आ गए , बाकी दोनों कहाँ है?

‎तब तक परमाणु , स्टील और तिरंगा भी उधर ही पहुँच गए। नागेन्द्र को देखते ही तीनों क्रोधित हो गए।

‎नागेन्द्र- मुझे पता था तुम सब जल्दी ही बाहर आओगे। जब चूहों को बिल से निकालना हो तो चारा लगाना ही पड़ता है।

‎परमाणु- कुछ ही देर में तुझे पता चल जाएगा कि चूहा कौन है।

‎नागेन्द्र(मन में)-अब बस इनसे किसी प्रकार दिव्यास्त्रों का प्रयोग करवाना है। उसके बाद मेरा काम हो जाएगा।

‎नागेन्द्र के आदमी उनकी तरफ बढ़े पर कुछ ही पलों में सब जमीन पर बेसुध पड़े थे।
‎तभी पाँचवा आदमी दौड़ता हुआ आया , पर नागेन्द्र तक पहुँचने से पहले ही भेड़िया की गदा ने उसके होश छीन लिए।
‎डोगा और भेड़िया भी घटनास्थल पर पहुँच चुके थे।

‎डोगा-अब हम बिल्कुल सही जगह पर पहुँचे है। अब तुम हमें बताओगे की ये सब कैसे रुकेंगे वरना तुम्हारी हालत भी तुम्हारे आदमियों जैसी ही होगी।

‎नागेन्द्र(मन में)-उफ! भेड़िया के रहते हुए इनसे दिव्यास्त्रों का प्रयोग करा पाना तो मुश्किल है।

नागेन्द्र अब पाँचो के बीच घिर चुका था।
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‎मंदिर के पास नागराज एक बड़े झटके से उबर चुका था ।

‎नागराज(मन में)-उफ! इसके तीर तो हवा में रुक भी सकते हैं । आगे से मुझे और सावधान रहना पड़ेगा।

‎नागराज के कलाइयों से इस बार बीसियों सर्परस्सियाँ निकलीं और कमजोर हो रहे पेड़ो पर जाकर लिपट गयीं।

‎नागराज- तुम दो पेड़ो से तो बच सकते हो पर इतने पेड़ो से नहीं बच सकते ।

नागराज ने सब सर्परस्सियो को एक साथ खींचना शुरू किया। उसके हाथ की नसें दिखने लगी।
आदिवासी मनुष्य ने भी अपने धनुष पर तीर चढ़ा लिया था। वातावरण में बह रही हवाओं ने भी अपनी गति बढ़ा ली ।
आदिवासी मनुष्य की दाढ़ी , जिसे देख कर लगता था जो कभी सँवारी नहीं गयी होगी वो भी हवा में उड़ने लगी। उसके नीचे उसका नीला गला अब चंद्रमा की रोशनी से चमक रहा था।

नीले गले को देख कर नागराज चौंक गया।

नागराज- उफ! यह मैं क्या कर रहा था।

सर्परस्सियाँ उसके हाथ से छूट गयीं। उसको इस बात का एहसास हो गया कि वो कितनी बडी भूल कर रहा था। वह स्वयं काल से युद्ध कर रहा था।
आदिवासी के धनुष से निकला तीर कई तीरों में बँट गया और नागराज का शरीर भेदने के लिए बढ़ गया। नागराज ने किसी प्रकार का प्रतिकार नहीं किया। नागराज के शरीर तक पहुँचने से पहले सारे तीर गायब हो गये।
‎नागराज अपने घुटनों के बल बैठ गया ,और उसके दोनों हाथ स्वयं ही प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गए।

‎नागराज- मुझे क्षमा कर दीजिए प्रभु । मैं आपको पहचान नहीं पाया। अपने आराध्य महादेव को नहीं पहचान पाया।

‎तब तक आदिवासी मनुष्य भी गायब हो चुका था। अब वहाँ पर केवल एक प्रकाश पुंज था।एक दिव्य आवाज गूँजी-
‎” यह मैं नहीं था पुत्र । यह केवल मेरी एक माया थी। तुमने हमेशा से सत्य का साथ दिया है। तुम ही नागों और मानवों में श्रेष्ठ हो। यह केवल तुम्हारी एक परीक्षा थी जिसमें तुम उत्तीर्ण हुए ।तुमने अंत तक हार नहीं मानी। तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम दशम अस्त्र के योग्य हो।तुम्हारी काल मृत्यु आराधना सफल हुई।मैं तुम्हें दशम अस्त्र का मंत्र प्रदान करता हूँ। सही समय पर इसका उच्चारण करने पर यह प्रकट हो जाएगा।”

‎इसीके साथ नागराज ने एक मंत्र सुना जिसे उसने कंठस्थ कर लिया।

‎”विजयी भव”

और इसी के साथ ‎कुछ ही क्षणों में वह दिव्य प्रकाश भी लुप्त हो गया ।
सब कुछ सामान्य हो गया। नागराज के लिए यह सब बिल्कुल स्वप्न जैसा था।
नागराज का ध्यान लगातार हो रहे कंपनों की तरफ गया। वह फूजो बाबा के आश्रम की तरफ बढ़ने लगा।
फूजो बाबा अपने आश्रम में ही थी। रात के समय के बावजूद भी आश्रम में काफी चहल पहल थी ।विसर्पी भी वही थी। पर नागराज ने उससे बात करना उचित नहीं समझा। उनके बीच मे करने के लिए बातें बहुत थीं पर समय नहीं था।

‎विभिन्न कबीले वाले वहीं जुटे हुए थे।फूजो बाबा नागराज को देखकर प्रसन्न हुए । उन्होंने कम्पनों से हो रहे नुकसान के बारे में नागराज को बताया।

‎फूजो- कबीले वालों के अनुसार भेड़िया और अन्य को वन के बाहरी भागों के तरफ बढ़ते हुए देखा गया है।

‎नागराज- ठीक है बाबा। मैं भी उधर ही जाता हूँ।सबके वहाँ जाने का यही अर्थ है कि उन्होंने इस समस्या के स्रोत का पता लगा लिया होगा।
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भेड़िया ,डोगा, तिरंगा, स्टील और परमाणु से घिरा हुआ नागेन्द्र संयम से काम ले रहा था।
‎नागेन्द्र ने अपने दाहिने हाथ से तिरंगा पर एक वार किया।तिरंगा बच गया पर वह वार सीधा एक पेड़ पर लगा जो कुछ ही पलों में जलकर राख हो गया।
‎भेड़िया ने अपनी गदा से नागेन्द्र पर वार किया , पर नागेन्द्र उछल कर बच गया।
‎नागेन्द्र ने अपने हाथ में लगे यंत्र में एक बटन दबाया और एक जहरीली धुंध फैलनी लगी। धुंध के प्रभाव में आने वाले सारे वृक्ष मुरझाने लगे।

‎परमाणु-सब सावधान रहना । यह बहुत ही जहरीली धुंध है।

‎स्टील- हमें जल्दी ही इसकी काट ढूंढनी पड़ेगी।

‎तिरंगा- अगर नागराज होता तो जरूर इस जहर को निष्क्रिय कर देता।

‎अचानक से डोगा को कुछ याद आया।

‎डोगा- तब तक हम विसर्पी से मदद ले सकते हैं , आखिर वो भी तो एक इच्छाधारी ही है।

‎स्टील- पर तब तक बहुत देर हो जाएगी।

‎डोगा- अगर ऐसा है तो हमें अमृतास्त्र का प्रयोग कर देना चाहिए वह हर प्रकार के विष का भक्षण कर सकता है।

‎परमाणु- भूलो मत डोगा , नीलमणि को वापस मरु ग्रह पर जाने में अभी भी दो प्रहर शेष हैं ।

‎भेड़िया क्रोधित हो चुका था।

‎भेड़िया- अब ये लड़ाई आर पार की होगी। या तो मेरा वन बचेगा या ये नागेन्द्र।

‎भेड़िया नागेन्द्र की तरफ बढ़ने ही लगा था कि नागराज वहाँ आ गया। नागेन्द्र को देखते ही वह सब समझ गया।

‎नागराज- रुको भेड़िया , इससे मैं निपटता हूँ। तुम इन यंत्रो को नष्ट करने की कोशिश करो जो कि पूरे वन में नुकसान पहुंचा रहे है।

‎भेड़िया और अन्य अलग अलग दिशाओं में चले गए।अब नागराज और नागेन्द्र आमने सामने थे।
‎नागराज ने अपने शरीर से अनगिनत साँपो को निकाला । उसके सर्प जहरीली धुंध को पीने लगे।

‎नागराज – तुमको बहुत शौक है ना जहर फैलाने , अब आजमाओ अपना जहर।

‎नागेन्द्र ने अपना वार किया जो कि नागराज के बाएं हाथ को घायल कर गया।

‎नागराज(मन में)-इसका विष तो बहुत ही तीव्र है।

‎नागराज ने सर्परस्सियों से नागेन्द्र के दोनों हाथों को बाँध दिया।

‎नागेन्द्र- तुम सच में मूर्ख हो क्या। मेरे सर्प कुछ ही क्षणों में मेरे हाथ आजाद करा देंगे।

‎नागेन्द्र ने कुछ ही क्षणों में अपने हाथों को आजाद करा लिया। नागराज ने ध्वंसक सर्प छोड़े जो नागेन्द्र के यंत्र में जाकर फट गए।

‎नागेन्द्र- इन छोटे मोटे धमाकों से इस यंत्र कोई नुकसान नहीं होगा।

‎नागराज और नागेन्द्र एक बार फिर भिड़ गए।
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‎नागेंद्र और नागराज की लड़ाई बहुत देर तक चलने वाली थी। भेड़िया और अन्य यंत्रों को ढूँढ कर नष्ट करने में लगे थे।
‎सूर्य भी पृथ्वी पर अपना प्रकाश फैलाने आकाश में आ चुका था।
‎स्थान- महानगर।
‎वेदाचार्य धाम।
‎शक्ति अपने सफर के आखिरी पड़ाव पर थी।
‎शक्ति ने वेदाचार्य और भारती को भी सारी स्थितियों से अवगत कराया।

‎वेदाचार्य- मैं सारी स्थिति से अवगत हूँ शक्ति , पर मैं नहीं आ पाऊँगा अब इन बूढ़ी हड्डियों में किसी भी प्रकार का युद्ध लड़ने को क्षमता शेष नहीं है। हाँ अगर भारती जाना चाहे तो मैं……

‎वेदाचार्य की बात खत्म होने से पहले ही भारती बोल उठी।

‎भारती- मैं भी नहीं जा सकती शक्ति , इस समय दादाजी को मेरी सख्त जरूरत है। और वैसे भी मैं तुमलोगों की ज्यादे मदद भी नहीं कर सकती।

‎शक्ति- ऐसा मत कहो भारती। तुम तिलिस्म की ज्ञाता हो , तुमने नागराज का साथ हमेशा दिया है। अपना निर्णय सोच समझ कर लो भारती।

‎भारती- मैंने सोचकर ही ये निर्णय लिया है , शक्ति।

अब शक्ति के लिए वहाँ कुछ भी शेष नहीं बचा था। अपने सफर के आखिरी पड़ाव पर उसे असफलता ही हाथ लगी।
शक्ति के जाने के बाद-

वेदाचार्य- तुमको जाना चाहिए था भारती।नागराज को सच में तुम्हारी जरूरत पड़ सकती है।

भारती- नहीं दादाजी, विसर्पी से नागराज का विवाह होने के बाद मेरा नागराज से दूर रहना ही उचित है।हम तीनों के लिए यही सही रहेगा।

भारती उस कमरे से चली गयी।
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स्थान- दिल्ली।
ध्रुव को होश आ चुका था। ध्रुव की माँ रजनी , श्वेता , नताशा और कमिशनर राजन बहुत खुश थे।
एंथोनी ने ध्रुव को सारी बाते बताई।
ध्रुव ने शक्ति को ब्रह्मांड रक्षकों की फ्रीक्वेंसी पर कॉल किया।
वेदाचार्य धाम से निकल रही शक्ति ने फ़ोन उठाया।
ध्रुव के होश में आने की खबर सुनकर शक्ति अत्यंत खुश हुई। उसने ध्रुव को सारी बाते बताई।

शक्ति- मैं तुम्हारे पास दिल्ली आना चाहती थी , पर मुझे लगा ये काम भी महत्वपूर्ण है।और आखिरकार तुम सही समय पर होश में आ ही गये।

ध्रुव-तुमने जो किया सही किया शक्ति , अब तुम दिल्ली आ जाओ हम तीनों साथ में ही असम के लिए निकलेंगे।
शक्ति दिल्ली के लिए उड़ गई।
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गुप्त द्वीप पर गुरुदेव असम में चल रही घटनाओं को देख रहा था। नीलमणि को विलुप्त होने में अब कुछ ही क्षण शेष थे।नागेन्द्र को असफल होता देख उसे बहुत क्रोध आ रहा था।
गुरुदेव ने नागेन्द्र से संपर्क किया।

” जल्दी करो नागेन्द्र , अब केवल कुछ ही क्षण शेष है। कुछ भी करो नागराज या किसी अन्य को दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने के लिए बाध्य करो जल्दी।”



असम में गुरुदेव की बातें सुन रहा नागेन्द्र अपना निर्णय ले चुका था।

नागेन्द्र(मन में)- अब मुझे इन कम्पनों की तीव्रता औऱ बढ़ानी होगी उससे ये यंत्र जल्दी बंद हो जाएँगे पर और कोई भी रास्ता नहीं बचा है।

नागेन्द्र ने नागराज से लड़ते हुए अपने कमर में लटक रहे एक रिमोट जैसे यंत्र में एक बटन दबा दिया। कम्पनों की तीव्रता बहुत बढ़ गयी। जमीन पर खड़ा रहना भी मुश्किल हो गया।
नागराज ने नागेन्द्र से रिमोट छीनना चाहा।

नागेन्द्र- ज्यादा चालाकी मत करो नागराज , इस रिमोट से हुआ कार्य कभी वापस नहीं होता।

नागराज के पास अब कोई मार्ग शेष नही था। उसने सबसे संपर्क किया।

तिरंगा- हमने आठ यंत्रो को नष्ट कर दिया है ,पर अभी भी बारह शेष हैं।

नागराज – रुको मैं जो कह रहा हूँ , सब ध्यान से सुनो। मैं स्पंदनास्त्र का प्रयोग करने जा रहा हूँ , तुम सब दिव्यास्त्रों की मदद से उनकी प्रतिलिपियाँ बनाओ वो जाकर उन यंत्रो के पास विपरीत कम्पन पैदा करेगी , इस तरह कुछ ही देर में कम्पन विपरीत कम्पनों को निष्क्रिय कर देंगे।

तिरंगा- पर मुख्य स्पंदनास्त्र का लक्ष्य कौन होगा।

“नागेन्द्र । आज वह जीवित नहीं बचेगा।”

नागराज में स्पंदनास्त्र का आवाहन किया । बाकियों ने भी प्रतिलिपियाँ बनाई। मुख्य अस्त्र ने नागेन्द्र को लक्ष्य बनाया ।
नागेन्द्र कुछ नही कर पाया। उसका शरीर बुरी तरह से काँपने लगा।

नागेन्द्र- तुमने नियमों का उल्लंघन किया है, अब तुम आजीवन ……

नागेन्द्र अपनी बात भी पूरी नहीं कर पाया।

नागराज- शायद तुमको ज्ञात नहीं नागेन्द्र कि नीलमणि के विलुप्त होने के बाद ही हमने यह अस्त्र संधान किया है।

नागेंद्र अब कुछ नही कर सकता था। तीव्र कम्पनों के कारण उसका रक्त रोम छिद्रों से बाहर आने लगा । कुछ ही देर में उसकी मृत्यु निश्चित थी।

नीलमणि के विलुप्त होने के आधे घंटे बाद नरकपाशा , गुरुदेव और कुछ अन्य नरकशत सेना भी वहाँ पहुंच गयी।

नरकपाशा- क्या लगता है गुरुदेव , क्या ये सब कालक्षेत्र में जाने के लिए तैयार होंगे?

गुरुदेव- तैयार करना पड़ेगा , इन सबका कालक्षेत्र में मरना जरूरी है , वरना इस युद्ध के बाद ये धरती ही शेष नहीं बचेगी जिसपर हम राज कर सके। वैसे ही जब तक यह हमारे पास है परमाणु ही उन सभी को कालक्षेत्र में ले जाएगा।

गुरुदेव ने एक बूढ़े आदमी की तरफ इशारा किया जिसने ओवरकोट पहन रखा था औऱ नर्क शत सेना के साथ ही चल रहा था।
गुरुदेव और नरकपाशा को देखते ही नागराज क्रोधित हो गया। भेड़िया और अन्य भी घटना स्थल पर आ गए थे।

गुरुदेव- कुछ भी करने से पहले मेरी बात सुनो नागराज। तुमको लग रहा होगा की ये कम्पन बंद हो जाएंगे पर ऐसा होगा नहीं , कुछ ही देर में विपरीत कम्पनों के कारण ये दोनों यंत्र अनुनाद (resonance) की अवस्था में पहुँच जाएंगे। तब ये दोनों यंत्र बिना किसी ऊर्जा के अनन्त काल तक यूँ ही कम्पन करते रहेंगे, पर उससे पहले ये धरती ही नष्ट हो जाएगी।

नागराज- तुम मुझे बातों में मत फंसाओ , वनवास की अवधि अब खत्म हो चुकी है अब तुम सबको मुझसे कोई नहीं बचा सकता।

‎नरकपाशा – हम भी तुमसे कम नही है नागराज। पर हम चाहते है कि ये युद्ध कालक्षेत्र मे लड़ा जाए।

‎नागराज कालक्षेत्र के विषय में जानता था।

नागराज- ‎नहीं यह तुम्हारी कोई अन्य चाल है।

‎गुरुदेव ने नागेन्द्र की तरफ ध्यान दिया। उसके शरीर मे केवल कुछ ही क्षणों के लिए प्राण शेष थे।

‎गुरुदेव- तुम स्पंदनास्त्र को वापस ले लो औऱ मैं भी इन यंत्रो को बंद कर देता हूँ।

‎नागराज को यह उचित लगा। उसने स्पंदनास्त्र को वापस बुला लिया। गुरूदेव ने भी अपने यंत्रो को बंद कर दिया। कम्पन अब बंद हो गए। नागेन्द्र मृत्यु के मुँह से जीवित बच गया।

‎नरकपाशा-मैं कालक्षेत्र के दोनों द्वारों को खोलने वाला हूँ , नागराज यकीन करो यह द्वंद हमारा आखिरी द्वंद होगा।

‎नरकपाशा ने एक यंत्र की मदद से दो द्वार खोल दिये।

‎ ‎नरकपाशा- देखो मैं तुम्हारे लिए अपने तरफ से एक मददगार भेज रहा हूँ।

‎नरकपाशा के इतना कहते ही ओवरकोट पहने हुए आदमी दोनो द्वारों में से एक में बढ़ने लगा।

‎सबने उसकी तरफ देखा पर कोई उसे पहचान नहीं पाया । या शायद नहीं , परमाणु उसे पहचान गया था।

‎परमाणु चिल्ला उठा – रुको , अंदर मत जाओ।

‎पर तब तक वो आदमी अंदर जा चुका था । परमाणु भी उसके पीछे अंदर जा चुका था।
‎तिरंगा परमाणु को रोकने के लिए दौड़ा पर देर हो चुकी थी।तिरंगा ने अंदर जाने की कोशिश नहीं की।
‎उसको निर्णय सोच समझ कर लेना था।

‎नरकपाशा- परमाणु ने तुम्हारा द्वार चुन लिया है नागराज अब निर्णय तुम सबको लेना है कि तुम सब अंदर जाओगे या परमाणु को मरने के लिए छोड़ दोगे। पर ध्यान रहे एक प्रहर में द्वार बंद हो जायेगा।

‎नरकपाशा , नागेन्द्र और गुरुदेव के अलावा बाकी नरक शत सेना दूसरे द्वार में चली गयी।

‎ ‎नरकपाशा- अब मैं भी चलता हूँ नागराज , बाकी सेना के साथ मैं भी आऊँगा कालक्षेत्र में।

‎भेड़िया और अन्य ने नरकपाशा को रोकने की कोशिश की पर नागराज ने उन्हें रोक दिया।
‎गुरुदेव, नागेन्द्र और नरकपाशा के जाते ही ध्रुव, शक्ति और एंथोनी वहाँ पहुँच गए।कुछ ही देर में उनको सारी बातें पता चल गयीं।नागराज और अन्य को भी ध्रुव के घायल होने का पता चला।

‎एंथोनी- पर नागराज तुमलोगों को कमसे कम नरकपाशा को रोकना चाहिये था।

‎शक्ति- नहीं , मुझे लगता है कि कालक्षेत्र ही इस महायुद्ध के लिए सबसे उपयुक्त जगह है।

‎नागराज- हाँ , अगर परमाणु कालक्षेत्र में नही भी जाता तो भी मैं गुरुदेव की बात मान लेता । इस बार उन्होंने अति आत्मविश्वास के चक्कर में अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार ली है।

‎ध्रुव- पर ये कालक्षेत्र है क्या? और ये कहाँ है।

‎नागराज- युगों पूर्व एक असुर था – कलंकासुर ।उसको कुछ खास शक्तियाँ प्राप्त थीं। उसने देवताओं के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।उसके पास एक खास शक्ति थी वह असुर स्त्रियों के प्रजनन काल को कम कर सकता था , इससे बहुत जल्दी जल्दी असुर पैदा होने लगे जिस गति से असुर सेना मरती उसी गति से फिर आ जाती। तब देवताओं ने एक कालक्षेत्र का निर्माण किया । यह कोई आयाम या ग्रह नहीं था, बल्कि एक क्षेत्र था।इसमें दो पक्षों के योद्धा जा सकते थे , अकेले कोई भी पक्ष का योद्धा वहाँ नहीं जा सकता था ।और इसमें देवताओ और असुरों के पक्ष से कोई एक ही पक्ष बाहर आ सकता था। नियम ऐसे थे कि जब तक कोई भी पक्ष पूरी तरह मृत्यु को प्राप्त न हो जाये , दूसरा पक्ष बाहर नहीं आ सकता था। हमेशा की तरह इस युद्ध में भी देवता विजयी हुए और तबसे ये कालक्षेत्र सुनसान ही पड़ा हुआ है , क्योंकि यह किसी के उपयोग का नहीं।

‎ ध्रुव- पर नरकपाशा ने दोनों द्वारों को कैसे खोल लिया?और परमाणु क्यों चला गया कालक्षेत्र में?

‎नागराज- यह तो मुझे भी नहीं पता।

‎तिरंगा-नरकपाशा यह सोचता है कि हम सब कालक्षेत्र में ही मर जायेंगे। इसीलिए वो हमें वहाँ भेजना चाहता है।

‎नागराज- हॉ। पर अब समय आ गया है निर्णायक युद्ध का।

‎शक्ति- हाँ हमें जल्द ही जाना होगा , वरना द्वार भी बंद हो जाएगा।

‎ध्रुव- मैं विस्तृत ब्रह्मांड रक्षकों को भी बुला देता हूँ। धनजंय की मदद से सब जल्द ही यहाँ आ जाएंगे।

‎शक्ति- मैं भी कोशिश करती हूँ कुछ ही देर में नताशा, शीना और बाकियों को यहाँ लाने की।

‎नागराज –
“अब कालक्षेत्र में ही नरकपाशा और नरकशत का विनाश होगा। ऐसा रण होगा कि स्वयं कालक्षेत्र भी कांप उठेगा। नरकपाशा को अपने अमर होने पर भी पश्चाताप होगा।”
‎———–समाप्त———–
‎■गाथा जारी है नवम पर्व में – रण पर्व■

Written By – Akash Pathak for Comic Haveli 

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9 Comments on “Nagbharat – (Kaal Parv)”

  1. वाह अद्भुत

    मजा आ गया हर एक चीज अच्छी थी।
    कालक्षेत्र का रहस्य भी अच्छा है नरकपाशा ने कैसे द्वार ढूंढे ये जानना दिलचस्प होगा

    1. धन्यवाद देवेंद्र जी।
      आशा करता हूँ अगले भागो में आपको सारे सवालों का जवाब मिले।

  2. Nice Going…..Story me action badhta hi ja rha hai. Release ninth part soon. Kaal kshetra me kya hoga ye janane ke liye utsuk hoon.

  3. इस पार्ट को देखकर लगा कि यह बहुत ही लम्बा पार्ट है। लेकिन स्टोरी कब खतम हो गई पता ही नही चला।
    स्टोरी की शुरुआत असम के जंगलों से ही हुई। नागेंद्र ने योजना बहुत ही तगड़ी बनाई थी, ब्रह्मांड रक्षकों को दिवयास्त्र का इस्तेमाल करने पर मजबूर करने के लिए। स्टोरी पढ़ते वक्त बहुत ही मज़ा आ रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे सारा सीन मेरी आँखों के सामने चल रहा है (ये तो इस स्टोरी का हर पार्ट पढ़ते वक्त लगता है)। इस पार्ट में सभी सुपर हीरोज़ को बराबर की जगह दी गई। सभी के रोल मज़ेदार लगे। दिव्यस्त्रो के नाम भी गजब होते हैं।

    नागराज जिस काल नामक आदिवासी से लड़ रहा था। इस पार्ट में पता चला कि वो शिवजी जी की माया थी। और काल मृत्यु आराधना की यही सबसे कठिन परिक्षा थी। जिसमे नागराज सफल हो गया और उसे दशम अस्त्र प्राप्त हुआ। अब बस इंतज़ार है तो इस बात का, की नागराज दशम अस्त्र का प्रयोग कब और कैसे करेगा।

    उधर नागेंद्र ने सभी सुपर हीरोज़ को जंगल से बाहर इक्कठा कर लिया । उसे किसी तरह उनसे दिवयास्त्र का प्रयोग कराना था। और अंत मे नागराज ने दिवयास्त्र का प्रयोग कर ही दिया। और वो भी उसी नागेंद्र के ऊपर()। उस समय तो मुझे लगा कि नागेंद्र भइया टपकेंगे इस बार, बहुत ज़्यादा उछल कूद मचा चुके हैं ()।परंतु। नागेंद्र पर किया हुआ वार नागराज ने अंत मे आपस ले लिया (भैं….वैं…..)। इतनी तमन्ना थी नागेंद्र को मरता हुआ देखने की (☹)। खैर अभी न सही। बाद में ही सही। लेखक ‛आकाश पाठक’ जी ने जो किया है सोच समझहकर ही किया है। नागेंद्र एक बहुत ही अहम किरदार लगता है इस स्टोरी का। और उसे इतनी जल्दी और इतनी आसानी से मार देना अन्याय होगा उसके साथ।

    भारती द्वारा ब्रह्मांड रक्षकों की मदद करने से इनकार करना अच्छा नही लगा। भारती इसलिए नही तैयार हुई कि वहाँ विसर्पी और नागराज होंगे (और भारती को वो सीन देखकर अच्छा नही लगता☹)। बस इसीलिए भारत ने शक्ति को मना कर दिया कि वो नागराज और बाकी की मदद नही करेगी। ( लड़कियाँ होती ही ऐसी हैं। गुस्से में होंगी तो दिमाग काम ही नही करता उनका)

    और आखिर में नए आयाम,नही नही क्षेत्र के बारे में जानने को मिला। आकाश भाई के दिमाग को दाद देना होगा(⚫नज़र लगे)। नए नए आईडियाज़ कहाँ से लाते हैं। हर पार्ट में कुछ नया पढ़ने को मिलता है। और इसीलिए ये सिरीज़ सबसे अलग है। नरकपाशा की नरकशत सेना प्रवेश कर गई है काल क्षेत्र में । जल्द ही सुपर हीरोज़ भी प्रवेश कर जाएंगे। और तब। दोनों दलों में से वापस आएगा तो सिर्फ एक दल। या तो सुपर हीरोज़ का या फिर सुपर विलेन्स का। और मुझे पता है सुपर हीरोज़ ही वापस आएंगे। और अगर सुपर हीरोज़ वापस आते हैं तो इसका मतलब सुपर विलेन्स का काम तमाम हो चुका है()। लेकिन नरकपाशा का क्या होगा? वो तो अमर है? क्या वो मर जायेगा? (☹)

    ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनका बेसब्री से इंतज़ार है मुझे।।।।

    1. वाह तल्हा जी का रिव्यु जिसपर एक कहानी लिखी जा सकती है ।
      बहुत सही

    2. धन्यवाद तल्हा ।
      आशा करता हूँ आगे भी कहानी आपको पसंद आएगी।

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