Nagbharat (Sabha Parv)

नागभारत
सभा  पर्व

[ This Story Is Written By Akash Pathak For Comic Haveli ]

स्थान -नागद्वीप
नागद्वीप की सभा ।
फरसा अपने फरसे से सभा में उत्पात मचा रहा था ।
तभी नागराज वहाँ आता है ।

नागराज-रूको फरसा ।तुम ऐसा क्यूँ कर रहे हो ?

फरसा-कुछ नहीं , बस अपने फरसे की धार तेज कर रहा था।

इसी के साथ वह नागराज पर वार कर देता है ,उसके हाथ बहुत तेजी से चल रहे थे।नागराज ने उसको सर्पों से बाँधना चाहा पर उसके फरसे ने नागों को काट दिया ।

नागराज-उफ !इसके हाथ तो बहुत तेजी से चल रहे हैं । मेरे जख्म तो भर जायेंगे पर अंगों को कटने से बचाना होगा।

नागराज अपने इच्छाधारी रूप में आ गया । अब उसका शरीर भी तेजी से लहरा रहा था । उसने सावधानी से फरसा के फरसे से बचते हुए फरसा के मर्मस्थलों पर प्रहार किया । कुछ ही देर में फरसा पंगु होकर जमीन पर पड़ा था।
“द्वंद हमेशा समान शक्तियों वालों से किया जाता है।”

नागराज ने मुड़कर देखा । सभा के मुख्य द्वार पर नागेन्द्र खड़ा था ।

नागराज-मेरी तुमसे कोई शत्रुता नहीं है ।
नागेन्द्र-परंतु मेरे मित्रों से तो अवश्य है ।
इसी के साथ नागेन्द्र ने नागराज पर वार कर दिया ।
नागेन्द्र के कलाइयों से सर्प निकलकर नागराज की तरफ बढ़ने लगे ।
नागराज-तुम बहुत बड़ी मूर्खता कर रहे हो । नागसम्राट नागराज को कोई भी सर्पबंधन नहीं बाँध सकता ।
परंतु नागेन्द्र ने जैसे ध्यान ही नहीं दिया । उसकी कलाइयों से निकले असंख्य सर्प नागराज को ढ़कने लगे । नागराज ने नागफनी सर्पों का आव्हान किया ।नागफनी सर्प नागराज के हाथों पर लिपटने लगे । नागराज ने अपने हाथों का प्रयोग अारी की तरह करना शुरू किया । नागेन्द्र के सर्प कटकर गिरने लगे ।
नागेन्द्र ने नागराज पर विष फुँकार से प्रहार किया , नागराज ने भी नागेन्द्र पर विष फुँकार से वार किया। शीघ्र ही दोनों की विष फुँकारें आपस में टकराने लगी। विश्व के दो सबसे बड़े विषधारियों के टकराव से नागद्वीप की सभा काँपने लगी। शीघ्र ही सभा में भीड़ इकट्ठी हो गयी ।

अमात्य , परमाणु , डोगा , तिरंगा ,स्टील सब सभा में आ गये ।
अमात्य-रूक जाओ नागराज । तुम अब नागद्वीप के भावी सम्राट भी हो , तुमको इस प्रकार सभा में युद्ध करना शोभा नहीं देता ।
अमात्य ने नागेन्द्र की तरफ मुड़ते हुए कहा -हम मेहमानों से भी इस प्रकार की अशिष्टता की आशा नहीं रखते ।
नागेन्द्र-आप क्या रखते हैं , क्या नहीं इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता । मैं तो बस अपने मित्रों की सहायता कर रहा था ।

तभी सभा में नरकपाशा और गुरूदेव प्रवेश करते हैं।
नरकपाशा- रूक जाओ मित्र इनसे तर्क करना व्यर्थ है।
नरकपाशा को देखते ही नागराज क्रोधित हो गया ।

नागराज-ये सब क्या मूर्खता है नरकपाशा , तुम नागद्वीप के राजविवाह में आए हुये प्रतिभागी हो, मेहमान हो इसलिये अभी तक जीवित हो । यहाँ से शीघ्र ही लौट जाओ वरना तुमको अपने अमर होने पर भी पश्चाताप होगा ।
नरकपाशा-राजविवाह? यह कोई राजविवाह नहीं एक स्वांग था । एक छल था।
डोगा और अन्य ब्रह्माण्ड रक्षक केवल ध्यान से सुन रहे थे ।
अमात्य-छल ? कैसा छल ? तुम इस स्वंयवर में विजयी नहीं हुए तो अब हमपे छल का आरोप लगा रहे हो ।
इस बार उत्तर गुरूदेव ने दिया ।
गुरूदेव-छल ही तो था यह स्वंयवर । इसकी शर्त जानबूझकर ऐसी रखी गयी थी जो केवल नागराज ही पूरी कर सकता था । देव कालजयी के विष से निर्मित दंड को केवल एक विषधारी ही तोड़ सकता था और वही हुआ।
डोगा -तुम भी तो स्वंय को विषधारी बोलते हो नरकपाशा , उस समय तुम्हारा विष कहाँ गया था ।

अमात्य-इसमें कोई छल नहीं था । वह दंड कोई साधारण दंड नहीं था , वह हमारे पूर्वजों का राजदंड था । युगों पूर्व जब नागद्वीप की स्थापना हुई थी तब राजा उसी दंड का प्रयोग करते थे , परंतु समय के साथ दंड भी बदल गया । इसी कारण महात्मा कालदूत भी स्वंयवर में उसी दंड का प्रयोग करना चाहते थे क्योंकि विषर्पी का होने वाला पति ही नागद्वीप का भावी सम्राट होगा और जो सम्राट राजदंड ही नहीं उठा सकता वह कैसा सम्राट?
तिरंगा – इन सबको समझाना व्यर्थ है अमात्य । मुझे समझ नहीं आ रहा आखिरकार इन्होंने नागद्वीप में इतना उत्पात क्यूँ मचा रखा है?
गुरूदेव -यह उत्पात नहीं नाराजगी है , इनको ऐसा लगता है कि नरकपाशा के साथ छल हुआ है । बस इसीलिये सब नाराज हैं ।
गुरूदेव मन ही मन प्रसन्न हो रहा था । वह जान रहा था कि यह तो बस एक बहाना था । नर्कशत सेना का वास्तविक काम तो बस सबको भटकाना था ताकि नरकपाशा आसानी से नीलमणि को प्राप्त कर सके। और वही हुआ था ।

परमाणु-आखिर तुम सब चाहते क्या हो ।
गुरूदेव-द्वंद ।
स्टील-कैसा द्वंद ।
नरकपाशा-मैं तुम पाँचों से एक द्वंद करना चाहता हूँ।
अमात्य -यह कैसी मूर्खता है नरकपाशा , शीघ्र ही तुम नागद्वीप से लौट जाओ वरना मैं भूल जाऊँगा कि तुम हमारे मेहमान हो । हम राजविवाह के शुभ अवसर पर किसी को हानि नहीं पहुँचाना चाहते ।
नरकपाशा -मैं लौट जाऊँगा परंतु तुम यह स्वीकार करो की यह स्वंयवर एक छल था । एक स्वांग था।
नागराज-तुम मुझे क्रोधित कर रहे हो नरकपाशा , मैं तुमसे द्वंद अवश्य करूँगा , परंतु यह उचित समय नहीं है ।
नरकपाशा-यही उचित समय है नागराज , विवाह में आए हुए बहुत से मेहमान भी यहीं है । क्या तुम नहीं चाहते कि वे भी देखें कि नागद्वीप के भावी सम्राट ने छल नहीं किया ।
नागराज -ठीक है , परंतु यह द्वंद मैं अकेले लडूँगा , लेकिन हारने पर तुम सबको तुरंत ही नागद्वीप छोड़ कर जाना होगा ।

तिरंगा-रूको !नागराज …………
डोगा-क्या हुआ तिरंगा क्या तुमको नागराज पर भरोसा नहीं ?
तिरंगा-भरोसा है । स्वंय से भी ज्यादा भरोसा है । परंतु……
नरकपाशा ने जैसे उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया ।
नरकपाशा-ठीक है हारने पर हम नागद्वीप से चले जायेंगे परंतु यदि तुम हार गए तो तुम्हें भी हमारी शर्त माननी होगी । बोलो नागराज क्या तुम्हारे पास इतना साहस है ?
नरकपाशा ने बाकी चारों की तरफ देखकर कहा -क्या तुमलोंगो को यह शर्त मान्य है।
नरकपाशा बार बार उनको क्रोध दिला रहा था ।
कहते हैं ईर्ष्या ,क्रोध , दंभ , लालच के कारण मनुष्य विवेकहीन हो जाता है ।
परमाणु-मुझे शर्त मान्य है ।
परमाणु ने बाकियों की तरफ देखा ।
डोगा-हाँ , मुझे भी मान्य है ।
तिरंगा -हाँ , मुझे भी मान्य है । और मुझे नागराज पर पूरा भरोसा है । तुम वापस जाने की तैयारी कर लो।

नागराज अभी भी विचारमग्न था ।
नरकपाशा मन ही मन प्रसन्न हो रहा था । सब कुछ वैसे ही हो रहा था , जैसा उसने सोचा था ।
उसने अपनी वाकचातुर्यता का अंतिम प्रहार किया।
नरकपाशा-परंतु तिरंगा , जिस नागराज पर तुम्हें इतना भरोसा है शायद उसे अपने आप पर ही भरोसा नहीं है । बोलो नागराज क्या तुम्हें मान्य है?
समय बहुत ही बलवान होता है । दंभ ,ईर्ष्या , क्रोध ,लालच के कारण अक्सर सही समय पर मनुष्य गलत निर्णय ले लेता है । प्रभु श्रीराम को ज्ञात था कि स्वर्ण हिरण जैसी कोई चीज नहीं होती परंतु फिर भी वो उसके पीछे गए । धर्मराज युधिष्ठिर ने अपना सर्वस्व जुए में हारने के बाद भी अपनी पत्नी द्रौपदी को दाँव पर लगाया । इन दोंनो ही घटनाओं ने आगे चलकर एक बड़े महायुद्ध को जन्म दिया ।
‎”मुझे मंजूर है । मैं तुमसे द्वंद के लिये तैयार हूँ।” -नागराज ने कहा ।
आज नागराज समय और नरकपाशा दोनों की चाल का शिकार हो रहा था ।


‎_______
थोड़ी देर बाद –
‎नागद्वीप की सभा में आज बहुत हलचल थी।
‎परमाणु ,तिरंगा , डोगा , स्टील ,नर्कशत सेना और अन्य मेहमान जो वापस नहीं गये थे साँसे थाम कर बैठे थे ।
‎सभा के मध्य में नागराज और नरकपाशा खड़े थे।
‎गुरूदेव किनारे ही खड़ा था ।

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‎गुरूदेव -यह बहुत ही साधारण प्रतियोगिता है। दोनों को शारीरिक द्वंद करना होगा । दोनों प्रतिभागी अपने शारीरिक शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं । जिसकी पीठ पहले जमीन पर पड़ेगी वह पराजित माना जायेगा ।
‎”मुझे मंजूर है ।”दोनों ने एक साथ कहा ।
द्वंद शुरू हुआ ।
‎दर्शक दीर्घा में बैठे लोग आपस में बातें कर रहे थे।
‎”अवश्य नागराज ही जीतेगा ।”
‎उधर दोनों प्रतिभागी एक दूसरे को पटखनी देने में प्रयासरत थे । नागराज ने नरकपाशा को दोनों हाथों से पकड़कर गिराना चाहा । पर नरकपाशा ने उसके हाथों को खोलकर उसे दूर उछाल फेंका ।नागराज गिरते गिरते बचा।

‎नागराज -(मन में )हम्फ ! यह क्या हो रहा है । मेरे अंदर असंख्य नागों का अतिरिक्त बल है , फिर भी यह मुझपर हावी होता प्रतीत हो रहा है। शायद यह गुरूदेव के गुप्त प्रयोग के कारण हो रहा है जिससे नागपाशा अब नरकपाशा बन गया है। या कोई अन्य बात है।
‎विसर्पी इन बातों से बेखबर अपने कक्ष में बैठी थी। दासियों को अमात्य का सख्त आदेश था कि विसर्पी को कुछ भी न बताया जाए । वह अगली सुबह होने वाली अपनी विदाई के बारे में विचारमग्न थी ।
‎उधर सभा में द्वंद अपने चरम सीमा पर था ।
‎नरकपाशा ने मुष्टि प्रहार से नागराज को गिराना चाहा पर नागराज उछलकर बच गया ।
‎नागराज ने फुर्ती से नरकपाशा को गले और कमर से पकड़कर हवा में उठा लिया । उसी पल नरकपाशा ने नागराज के पीठ पर प्रहार किया । नागराज की पकड़ कुछ ढ़ीली हुयी । नरकपाशा तेजी से नीचे उतरा और नागराज को उठाकर उछाल दिया । यह सब इतना अप्रत्याशित कि नागराज सँभल नहीं पाया और पीठ के बल गिर पड़ा ।

‎पूरा महल काँप उठा।
‎सभी की आँखें आश्चर्य से खुली रह गयीं। सभा में सन्नाटा छा गया । मानों वायु ने भी अपनी गति रोक दी थी ।
‎”वााााहहहहह!नरकपाशा जीत गया । ” सभा के उस भयावह सन्नाटे को चीरते हुए गुरूदेव चिल्ला उठा ।
‎ विसर्पी अपने कक्ष में थी ।
‎विसर्पी-यह कंपन कैसी? विषाली शीघ्र पता करो।
विसर्पी ने कक्ष में उपस्थित एक दासी से कहा ।
‎विषाली बाहर गयी परंतु वापस नहीं आई । विसर्पी द्वार की तरफ बढ़ी । उसने द्वारपाल से पूछा।
‎विसर्पी-मैंने विषाली को कुछ पता करने के लिए भेजा था , देखो वह कहाँ रह गयी ।
‎द्वारपाल-क्षमा करिये राजकुमारी मैंने ही उसे वापस भेजा है ।
‎विसर्पी-परंतु क्यों?

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‎द्वारपाल-क्षमा करें परंतु अमात्य ने आपको कुछ भी बताने से मना किया है ।

‎विसर्पी-तुम मुझे क्रोधित कर रहे हो , अमात्य का तो पता नहीं परंतु यदि तुमने मुझे कुछ नहीं बताया तो मेरे क्रोध को झेल नहीं पाओगे।
विसर्पी के उस क्रोधित रूप को देखकर द्वारपाल डर गया और सब कुछ बता दिया ।
‎विसर्पी -उफ! यह क्या हो गया ।
‎यह सुनकर विसर्पी भी सभा की ओर चली गयी।
‎_______
‎स्थान – मरू ग्रह
‎महात्मा कालदूत -परंतु द्वार क्यों नहीं खुल रहा?
‎धनंजय-पता नहीं शायद ब्रह्म पाश की ऊर्जा मुझसे सँभल नहीं रही।
‎जिंगालू-यह ब्रह्म पाश क्या है?
‎ध्रुव- यह भी एक प्रकार का स्वर्ण पाश ही है । युगों पूर्व जब स्वर्ण नगरी में राजा का शासन चलता था तो वहाँ के प्रथम राजा को स्वंय ब्रह्मा ने यह दिया था यह किसी भी आयाम का द्वार खोल सकता है । जब मैं मदद के लिये स्वर्ण नगरी गया तो मुझे पता चला कि इस आयाम में कोई नहीं आ सकता । स्वंय देवताओं ने इसे ऐसा बनाया था। फिर मुझे ब्रह्म पाश के बारे में पता चला । यह वर्षों से एक धरोहर के रूप में रखा हुआ था ।बड़े से बड़े योद्धा भी इसे नहीं प्रयोग कर पाते हैं। परंतु इतने बड़े खतरे के कारण धनंजय ने इसे प्रयोग करने का निर्णय लिया ।

जिंगालू-ओह !
‎ध्रुव ने धनंजय के कंधे पर हाथ रखकर कहा -परेशान न हो धनंजय । जिस प्रकार तुम एक बार द्वार खोल चुके हो उसी प्रकार इस समय भी खोल दोगे। तुम एक महान योद्धा हो। केवल तुम ही ब्रह्म पाश का प्रयोग कर सकते हो। केवल कुछ पल ही हैं हमारे पास।
ध्रुव की बातों ने जादुई असर किया । धनंजय ने एक बार फिर प्रयास किया और द्वार खुल गया ।
‎___
‎नागद्वीप सभा।
‎नरकपाशा – हा हा हा । आखिरकार तुम हार गए।अब तुम्हें मेरी शर्त माननी होगी ।
‎डोगा -हम तुम्हारी कोई शर्त नहीं मानेंगे।
‎थोडांगा -क्यों नहीं मानोगे ? तुम लोगों ने ही कहा था कि तुम्हें शर्त मान्य है ।
नरकपाशा – ‎तुम पाँचों को मेरी शर्त माननी ही होगी वरना यह सभा एक रण क्षेत्र बन जायेगी ।
‎इसी के साथ नर्कशत सेना भी चिल्ला उठी-“हाँ हाँ माननी ही होगी वरना हमसे युद्ध करो”

‎गुरूदेव-सोच लो नागराज इस युद्ध में जीते कोई भी पर हार नागद्वीप की ही होगी । और मुझे यकीन है तुम ऐसा नहीं चाहोगे।
‎नागराज-क्या शर्त है तुम्हारी ?क्या चाहते हो हमसे?
‎गुरूदेव-वनवास !
‎तिरंगा-वनवास । कैसा वनवास?
नरकपाशा ने कमर पट्टिका से नीलमणि निकाली ।
‎नरकपाशा-जब तक यह नीलमणि पृथ्वी पर है तब तक तुम लोगों को वन में रहना होगा और अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं करना होगा ।
गुरूदेव-ज्यादा नहीं बस बारह वर्ष।
तभी विसर्पी प्रवेश करती है ।
‎विसर्पी -ये सब क्या हो रहा है? मैं इस सभा में हुई किसी भी मूर्खता को मान्य नहीं करती ।
‎”चुप कर मूर्ख नागिन” इतना कहकर रोबो ने विसर्पी पर लेजर आई का वार कर दिया ।
‎”रोबो…. तुमने अपनी मृत्यु पर स्वंय हस्ताक्षर कर लिया ।”नागराज चीख उठा ।

‎इससे पहले कि विसर्पी बचने का प्रयत्न करती उसके और लेजर के बीच एक द्वार खुलने लगा ।
‎स्वर्ण द्वार ।
‎लेजर किरणें उसमें जाकर समा गयीं ।
‎पूरा द्वार खुलते ही ध्रुव नजर आने लगा ।उसके पीछे शक्ति ,धनंजय और विस्तृत ब्रह्माण्ड रक्षक भी थे।
‎”ध्रुव”सब एक साथ चिल्ला उठे।
‎गुरूदेव -यह सब अभी जीवित हैं?
‎परमाणु-तुम कहाँ थे ध्रुव?
इससे पहले कोई कुछ और बोलता ।
‎महात्मा कालदूत -यहाँ क्या हो रहा है?
‎नरकपाशा ने पूरी बात बताई -अब आप ही बताइए क्या इन्हें मेरी शर्त नहीं माननी चाहिए।
‎महात्मा कालदूत -यह सब कैसी मूर्खता है नागराज।
‎डोगा-नागराज की जगह यदि आप रहते तो आप भी यही करते । गलती यदि इसकी है तो हम भी इसके जिम्मेदार हैं ।मुझे स्वीकार है ।
‎परमाणु-मुझे भी स्वीकार है ।
‎डोगा-पर यह मत भूलना नरकपाशा कि जब हम वापस आयेंगे तो वो तुम्हारा अंतिम समय होगा।
‎नागराज -ठीक है अभी तो हम जा रहे हैं परंतु……
‎नागेन्द्र- सारे किंतु परंतु अब वन में करना ।बारह वर्षों तक।
‎धनंजय-बारह वर्ष नहीं केवल बारह दिन। उसके बाद नीलमणि पृथ्वी से विलुप्त हो जायेगी।
‎गुरूदेव-परंतु ऐसा कैसे होगा ।
‎विसर्पी ने ध्यान नहीं दिया।
‎विसर्पी -मैं भी चलूँगी …
‎महात्मा कालदूत -परंतु फिर नागद्वीप को कौन …
‎विसर्पी-नागद्वीप को विषांक सँभालेगा।
‎विषांक जोकि महात्मा कालदूत के साथ ही वापस आ गया था बोल पड़ा-परंतु दीदी।
‎विसर्पी-यह मेरा आदेश है विषांक।
‎विषांक कुछ न बोल सका।

[ This Story Is Written By Akash Pathak For Comic Haveli ]
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थोड़ी देर में पूरा नागद्वीप खाली होने लगा ।
‎सब वापस चले गये।
‎विस्तृत ‎ब्रह्माण्ड रक्षकों को ध्रुव ने वापस भेज दिया। वह और शक्ति भी उन पाँचों और विसर्पी के साथ सर्प नौका में महानगर की तरफ बढ़ रहे थे।
‎विसर्पी-हम महानगर जा रहे हैं?
‎ध्रुव-नहीं वहाँ से हम असम जायेंगे। मेरी नजर में उससे सुरक्षित जगह और कोई नहीं।
‎रास्ते में सब शांत ही थे ।
‎ध्रुव ने मजाकिया लहजे में कहा-माफ करना विसर्पी मैं तुम्हारी शादी में नहीं आ पाया।
‎विसर्पी -माफ कर दूँगी पर पहले यह बताओ तुमको नताशा को रोबो सिटी से भगाकर क्यों शादी करनी पड़ी ?
‎ध्रुव-बता दूँगा । बड़ी लंबी कहानी है।
‎नागराज को छोड़कर सब हँसने लगे।
‎नागराज-परंतु उससे पहले ये बताओ तुम कहाँ थे ? ‎ये नीलमणि क्या है ।और सबसे बड़ी बात यह बारह वर्षों की जगह बारह दिनों में कहाँ और क्यों गायब हो जायेगी?
‎ध्रुव-बताता हूँ । सब विस्तार से बताता हूँ।

To Be Continued…

Nagbharat (Nagdweep Parv)

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Written By – Akash Pathak for Comic Haveli 

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10 Comments on “Nagbharat (Sabha Parv)”

  1. ई न चलबे।मुझे अभी चहिये पूरी कहानी,मुझसे न होगा इंतज़ार,गुर्रर्रर्रर्रर्रर्ररर।

  2. अब क्या होगा? क्या है यह नीलमणि। यह है क्या और बारह दिनों में कहाँ और क्यों गायब होने वाली है। सच में यह पार्ट बहुत ही गज़ब लगा पढ़कर ऐसा लग रहा है। जैसे महानागायण पढ़ रहा रहा हूँ। सारा दृश्य आँखों के सामने उड़ रहा था जैसे मूवी देखने बैठा हूँ।
    लाजवाब है यह सिरीज़ आपने सुपर हीरोज़ को लेकर सच में एक गज़ब को सिरीज़ बना दी है।

  3. बस नागराज का हारना थोडा सा बुरा लगा। बाकि कहानी बहुत अच्छी जा रही है।नीलमणि का रहस्य भी बताइये अगले अंक में।

  4. आपके comments के लिए धन्यवाद।आपलोगो को कहानी पसंद आई उसके लिए भी धन्यवाद
    कभी कभी जीतने के लिए हारना जरूरी होता है।
    नीलमणि का रहस्य अगले भाग में पता चलेगा।

    1. जी अगला पार्ट पब्लिश हो गया है….
      नागभरत नीलमणि पर्व…

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