Nagbharat – (Vinash Parv)

नागभारत

‎विनाश पर्व

(Antim Khand)

विनाश और सृजन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
मनुष्य हमेशा विनाश से भागता रहता है , पर कभी ये समझ ही नहीं पाता कि सृजन के लिए विनाश भी आवश्यक है।
कालक्षेत्र की रणभूमि में विनाशलीला अपने चरम सीमा पर थी।
डोगा बौना वामन से लड़ रहा था। डोगा अपने गन से बौना वामन को मारने की कोशिश कर रहा था।

बौना वामन- जो हमेशा से खिलौनों से खेलता है उसे खिलौने से मत डराओ डोगा।

डोगा- ये साधारण खिलौने नहीं है बौना वामन, और अब ये खूनी खेल तुम्हारी मौत के साथ ही खत्म होगा।

बौना वामन ने अपनी हथेली से कुछ टुकड़े डोगा की तरफ फेंके , जोकि अचानक से बढ़कर मशीनी कुत्तों के आकार में बदल गए।
मशीनी कुत्तों ने डोगा को घेर लिया। डोगा उनको नष्ट करने लगा पर सँख्या में ज्यादा होने के कारण कुत्ते डोगा को घायल कर रहे थे। पर डोगा के जुनून को घायल करना नामुमकिन था।
कुछ ही देर में सारे कुत्तों को नष्ट करके डोगा बौना वामन के सामने पहुँच गया।

डोगा- अब इस खेल को खत्म करने का समय आ गया है बौना वामन।

बौना वामन- इतनी जल्दी नहीं डोगा मेरे पास खिलौनों की कोई कमी नही है।

डोगा ने इस बार निशाना साधा पर तुरंत ही बौना वामन की पीठ पर rocket boosters निकल आये और वो तेजी से हवा में उड़ गया।
डोगा उसे देखता ही रह गया। अचानक से नागेन्द्र डोगा के सामने आ गया और डार्ट्स डोगा पर चला दिए। समय रहते डोगा संभल गया और उसने भी दिव्यास्त्र चला दिए , दिव्यस्त्र और डार्ट्स आपस में नष्ट हो गए पर नागेन्द्र और बौना वामन बच कर भागने लगे।
पर अचानक से स्टील सामने आ गया और उसने मेगागन से बौना वामन पर वार कर दिया। दिव्यास्त्रों की ऊर्जा से बौना वामन बच नही पाया और मर गया। इस अफरा तफरी का फायदा उठा कर नागेन्द्र वहाँ से भाग निकला।

डोगा-बिल्कुल सही समय पर आए स्टील ।वरना इस बार भी वो बच कर भाग जाता।

स्टील- हाँ क्योंकि मैं देख रहा हूँ नागेन्द्र नरक शत सेना के साथ मिलकर यही कर रहा है , सबको बचा कर और डार्ट्स का इस्तेमाल करके भाग रहा है। इसीलिये मैं यहाँ पहले ही पहुँच गया , फिर भी नागेन्द्र बच कर भाग ही गया।

ध्रुव और बाकी सब भी उनकी बातें सुन रहे थे।

ध्रुव- सबसे पहले हमें मिस किलर और रोबो को मारना होगा , क्योंकि वे दोनों नरकशत सेना के लिए अभी भी नए अस्त्र बना रहे है। और साथ ही हमें नागेन्द्र को रोकना होगा।

डोगा – मिस किलर अब मेरी टारगेट है। उसका बचना अब मुश्किल है।

स्टील- और मैं रोबो को मारने की कोशिश करूँगा ।

परमाणु- पर एक समस्या अभी भी वहीं है , नागेन्द्र फिर से उन्हें बचाने पहुँच जाएगा ।

भेड़िया-नागेन्द्र की चिंता अब तुम लोग मुझ पर छोड़ दो।

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भेड़िया और नागेन्द्र अब आमने सामने थे ।

भेड़िया- छुप छुप कर बहुत वार कर लिया तुमने नागेन्द्र , अब थोड़ा सीधी लड़ाई भी कर लो।

नागेन्द्र ने डार्ट्स का वार किया पर भेड़िया ने गदा से उन्हें दूर फेंक दिया।

भेड़िया- ये वार मुझपे काम नहीं करेंगे नागेन्द्र।

नागेन्द्र- मेरे पास तुमको मारने के लिए अस्त्रों की कोई कमी नहीं है भेड़िया।

नागेन्द्र ने सर्परस्सी से भेड़िया के हाथों को जकड़ना चाहा ,पर कुछ ही क्षणों में भेड़िया के हाथ आज़ाद हो गए।
भेड़िया ने नागेन्द्र को जकड़ने के लिए अपनी पूँछ बढ़ाई पर नागेन्द्र ने सर्परस्सी से उसे रोक लिया । भेड़िया की पूँछ और सर्परस्सी आपस में गुँथ गयी।
नागेन्द्र ने पूँछ को खींचकर भेड़िया को अपनी तरफ खींचा , पर इससे भेड़िया उसके और करीब आ गया और भेड़िया ने अपनी गदा का एक भरपूर वार नागेन्द्र पर कर दिया। नागेन्द्र दूर जाकर गिर पड़ा।
गुरुदेव और नरकपाशा अब थोड़ा चिंतित लग रहे थे ।

नरकपाशा-यह क्या हो रहा है गुरुदेव ? भेड़िया तो नागेन्द्र को कड़ी टक्कर दे रहा है।

गुरुदेव-केवल टक्कर ही दे पाएगा वो , नागेन्द्र को खत्म करना मुश्किल है।

नरकपाशा-उधर डोगा हमारे शिविर की तरफ बढ़ रहा है ,वहाँ मिस किलर अभी भी अकेली है। क्या हमें भी चलना चाहिए वहाँ?

गुरुदेव- डोगा का इंतेजाम हो चुका है नरकपाशा , अगर जरुरत पड़ी तभी वहाँ जायेंगे हम।

इधर डोगा मिस किलर के पास पहुँच चुका था।
मिस किलर नरकशत सेना के शिविर में अकेली थी।

मिस किलर-स्वागत है डोगा , हमारे शिविर में तुम्हारा स्वागत है ।

डोगा- तुम मेरा नही अपनी मौत का स्वागत कर रही हो मिस किलर। अब तुम यहाँ से भाग नही सकती।

डोगा ने अपनी गन से मिस किलर की टारगेट बनाया।

मिस किलर- भागने की जरूरत तो अब तुम्हें पड़ेगी डोगा , पर अफसोस तुम यहाँ से भाग नही पाओगे ।

इतना कहते ही डोगा के सामने एक रोबोट प्रकट हो गया। डोगा ने रोबोट को मारने के लिए गन चलाई पर उसकी गन से दिव्य ऊर्जा के वारों की जगह केवल साधारण गोलियाँ ही निकलीं। डोगा के आश्चर्य का कोई ठिकाना नही था।

मिस किलर ठहाके लगाकर हँसने लगी- इतना आश्चर्य चकित क्यों हो डोगा , यहाँ तुम्हारे दिव्यास्त्र नही काम आयेंगे। यहाँ चारो तरफ ऐसे कम्पन हो रहे है जो दिव्यास्त्रों को प्रकट नहीं होने देंगे।

डोगा(मन में)- यह सही कह रही है , दिव्यास्त्र भी कम्पनों की वजह से ही प्रकट होते है , पर जरूर यहाँ ऐसा कोई यंत्र होगा जिससे ऐसा हो रहा होगा।क्योंकि बाकी कालक्षेत्र में तो ऐसी कोई समस्या फिलहाल नही है ।सबसे पहले इस मिस किलर को ही खत्म करना होगा।

डोगा ने एक शक्तिशाली लांचर का वार किया पर लांचर मिस किलर के ऐसे आर पार हो गया जैसे वो वहाँ थी ही नहीं।
‎रोबोट डोगा पर लगातार वार कर रहा था।

‎डोगा(मन में)-ओह! यह मिस किलर नही उसकी 3-D इमेज है , पर वो है कहाँ। ‎सबसे पहले इन कम्पन करते यंत्रो का कुछ करना पड़ेगा ताकि दिव्यास्त्रों की ऊर्जा यहाँ आ सके।

‎नरकपाशा और गुरुदेव सारा दृश्य देख रहे थे।

‎नरकपाशा- ये यन्त्र तो कमाल का है गुरुदेव , क्या इसे आपने बनाया……

‎गुरुदेव- नही इसे मिस किलर ने ही बनाया है ,और डोगा के मरने के बाद हम पूरे कालक्षेत्र में इसका प्रयोग करेंगे।

‎डोगा(मन में)- अगर यंत्र कहीं होगा तो जरूर इन दीवरों के पास होगा क्योंकि दीवरों के बाहर इन यंत्रों का कोई असर नहीं हो रहा है।

‎डोगा के वारो का रोबोट पर कोई असर नहीं हो रहा था। डोगा अपनी पैनी नजर से चारों तरफ देख रहा था। इसी असावधानी में रोबोट डोगा के पास आ गया। डोगा ने रोबोट को किक मारी पर रोबोट पर कोई खास असर नही हुआ , रोबोट ने डोगा के पैर पकड़ कर उसे हवा में उठा लिया।
‎मिस किलर की 3D इमेज यह देख कर खूब हँस रही थी।

‎डोगा(मन मे)-उफ! अब मैं क्या करूँ।कैसे छुड़ाऊं अपने आप को।अरे वह क्या है? जरुर वही होगा यंत्र। उसे तो साधारण ग्रेनेड से भी खत्म किया जा सकता है , शुक्र है अभी मेरे हाथ आजाद हैं।

‎ डोगा ने एक दिशा में ग्रेनेड फेंका और एक जोरदार धमाका हुआ। उसके बाद डोगा ने अपनी गन से रोबोट को निशाना बनाया। इस बार गन से निकली ऊर्जा ने रोबोट को वाष्प में बदल दिया।

‎उसके बाद डोगा ने दूसरी तरफ आवाज देकर कहा- छुपने का कोई फायदा नही है मिस किलर , मैं जानता हूँ तुम वहाँ छुपी हो।

‎थोड़ी ही देर में मिस किलर वहाँ दिखने लगी। उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
‎मिस किलर-प…पर तुम्हें कैसे पता चला मैं और यंत्र दोनों कहाँ हैं?

‎डोगा-इन दीवरों पर लगे यंत्र को ढूंढना कोई कठिन काम नहीं था। और कालक्षेत्र में लगातार हो रहे विस्फोटों से निकलते गाढ़े धुँए में तुम अपने आप को नहीं छुपा पाई।यंत्र को ढूंढ़ने के ही दौरान मैंने एक तरफ धुएँ में मानवाकृति देखी और समझ गया कि वो तुम ही हो सकती हो। धुंआ तुम्हारे अदृश्य शरीर के आर पार नहीं जा पाया।

मिस किलर ने अपनी गन डोगा की तरफ तान दी पर वो जानती थी कि वो गन भी अब उसे नही बचा सकती।
“खेल अब खत्म हुआ” डोगा ने कहा और उसके गन से निकली दिव्य ऊर्जा मिस किलर की जान लेती चली गयी।
पूरा शिविर उसकी चीखों से गूँज उठा।
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धीरे धीरे नरकशत सेना के सदस्य मृत्यु को प्राप्त होने लगे।
‎रोबो स्टील और धनंजय से लड़ रहा था।
‎धनजंय रोबो को स्वर्ण पाश से बाँधने की कोशिश कर रहा था पर रोबो उसकी पकड़ में नहीं आ रहा था।
‎स्टील के मेगागन के वार रोबो के शरीर को छूते ही निस्तेज हो जा रहे थे।इससे पहले की दिव्यास्त्र अपना कार्य करते कुछ ही क्षणों में वे गायब हो जा रहे थे।
‎रोबो ने अपनी लेजर आई का वार किया पर स्टील बच गया।

‎स्टील(मन में)- इसका आधा शरीर धातु का बना है , इसको टारगेट करके पिघलाया जा सकता है।

‎स्टील ने वार किया , रोबो के चेहरे पर एक बेचैनी दिखने लगी। पर कुछ ही देर में वो अस्त्र भी गायब हो गया। इस बार रोबो ने एक शक्तिशाली वार किया और स्टील दूर जा गिरा।
‎धनंजय स्टील को संभालने पहुँचा।

‎स्टील- उफ! अगर अस्त्र कुछ देर और रुक जाता तो अवश्य उसका धातुई शरीर गल जाता।

‎धनंजय- पर ये दिव्यास्त्र गायब कैसे हो जा रहे हैं।

‎स्टील- पता नहीं ऐसा कैसे हो रहा है।

‎डोगा उनकी बातें सुन रहा था उसने मिस किलर के यंत्र के बारे में सबको बताया।

‎स्टील- पर यहाँ तो ऐसा कोई यंत्र नहीं है । और यहाँ मेरे दिव्यास्त्र प्रकट भी हो रहे हैं ।पर पता नहीं गायब कैसे हो जा रहे हैं?

‎धनंजय और स्टील फिर संभल चुके थे।

‎धनंजय- मेरे पास एक उपाय है। मैं स्वर्ण वार से इसके धातुई शरीर को स्वर्ण में बदल दूँगा।तुम फिर वही वार करना ।स्वर्ण को गलाना आसान होगा।

‎स्टील- ठीक है। आशा करता हूँ यह योजना काम कर जाए।

‎धनंजय के स्वर्ण वार को छूने वाली हर चीज स्वर्ण में बदलती जा रही थी पर रोबो को जैसे उनके प्लान का अंदाजा था । वो हर बार बच जा रहा था।

‎रोबो- मुझको स्वर्ण में बदलना नामुमकिन है धनंजय । तुमको याद होगा कि स्वर्णनगरी को खोजने वाला सबसे पहला इंसान मैं ही था। तुम्हारे बाद मैं एक बार फिर स्वर्णनगरी पर हमला करुँगा । और इस बार पूरी स्वर्णनगरी को अपना गुलाम बनाऊँगा।

‎स्टील और धनंजय अब झुंझलाहट में वार कर रहे थे।

‎स्टील- ऐसे काम नहीं चलेगा धनजंय ,मैं इसपे तीव्र गति से चलने वाली आरीनुमा अस्त्रों का वार करुँगा।

‎स्टील के वार भी रोबो के पास जाकर कुछ ही क्षणों में गायब हो जा रहे थे ।

‎स्टील(मन में)- आखिर ये हो कैसे रहा है?

‎रोबो(मन में)-चाहे जितनी भी कोशिश कर लो पर यह रहस्य तुम नहीं जान पाओगे। यह सब हेल्पर की ही कृपा है । दिव्यास्त्रों की काट बनाने का पूरा रहस्य तो हम नहीं जान पाए पर कुछ हद तक उसके पीछे का सिद्धांत जरूर जान गए थे । मिस किलर और मैंने उन्हीं सिद्धांतो से इन दिव्यास्त्रों को कुछ हद तक कंट्रोल करना सीखा था। इस समय मेरे शरीर के मशीनी भाग में ऐसे ही यंत्र है जो इन दिव्यास्त्रों को मुझ तक पहुंचते ही उनके कम्पनों को बदल कर उन्हें गायब कर दे रहा है।

रोबो शायद ये भूल रहा था कि कोई ऐसा भी है जो बिना इस रहस्य को जाने भी उसको खत्म कर सकता है।
‎स्टील और धनंजय का साथ देने के लिये अब ध्रुव भी वहाँ पहुँच गया था।

‎ध्रुव- एक तीव्र वार रोबो के पैरों पर करो ,अचानक वार से वह संभल नही पायेगा।

‎ध्रुव का सोचना बिल्कुल सही था , पर रोबो तुरन्त ही संभल गया। धनंजय ने उसे स्वर्णपाश में कैद करना चाहा पर असफल रहा।
‎स्टील और धनंजय ने अपने वारों को जारी रखा ।
ध्रुव को सामने देख कर रोबो ने ध्रुव को अपना निशाना बना लिया।

ध्रुव- लगातार वार करते रहो स्टील।

स्टील- लगातार वारों का भी असर नहीं हो रहा है ध्रुव, मेरे भीषण से भीषण वार भी रोबो के शरीर में धँसते ही गायब हो जा रहे हैं। और उन वारों से हुए घाव भी तुरंत भर रहे हैं।

धनंजय- घाव तो नीलमणि के प्रभाव से भर रहे हैं पर ये दिव्यास्त्र क्यों गायब हो रहे हैं?

ध्रुव-हमें दिव्यास्त्रों का प्रयोग ऐसे करना होगा कि वो रोबो को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुँचा पाएँ।

स्टील- ऐसा तो तभी होता जब रोबो का शरीर डंडे की तरह पतला होता और गायब होने से पहले ही दिव्यास्त्र उसके शरीर को काट देते।

ध्रुव-यस!

‎स्टील की बात सुनकर ध्रुव चौंका , जैसे उसे रोबो को खत्म करने का तरीका मिल गया हो।

‎धनंजय- क्या हुआ ध्रुव?

‎ध्रुव- रोबो की गर्दन ।किसी भी मनुष्य की गर्दन बाकी शरीर के अपेक्षा पतली होती है। स्टील इस बार तुम रोबो की गर्दन को निशाना बनाओ।पर ध्यान रहे निशाना चूकना नही चाहिए । अगर रोबो को हमारी योजना का पता चल गया तो वो अपनी गर्दन को बचाने का भी इंतजाम कर लेगा।

‎स्टील- निश्चिन्त रहो ध्रुव , निशाना नहीं चूकेगा। ‎रोबो के अंत के ख्याल ने स्टील के शरीर मे फुर्ती भर दी ।

उसने एक शक्तिशाली दिव्यास्त्र का आवाहन कर दिया ,गायब होने से पहले दिव्यास्त्र रोबो के गर्दन के आर पार हो गया। कालक्षेत्र उसकी चीखों से गूँज उठा।उसकी गर्दन अब केवल धातुई भाग के जरिये उसके धड़ से लटक रही थी।
‎धम्म!
‎रोबो का शरीर कालक्षेत्र की भूमि पर ही गिर पड़ा।
‎नताशा भी वहाँ पहुँच गयी।
‎रोबो की ये हालत देख कर नताशा की आँखें भर आयी। नताशा ने अपनी आँखें बंद कर ली। उसकी आँखों से आँसुओ की बूंदे कालक्षेत्र की भूमि पर गिरी।

‎ध्रुव नताशा के पास पहुँचा।

‎ध्रुव- रोओ मत नता…

‎नताशा- नही ध्रुव मैं नही रोऊँगी। मनुष्य को हमेशा से सही और गलत के बीच में चुनाव करना पड़ता है , पर मैं कभी वो चुनाव कर ही नही पायी।रोबो का यही हश्र होना था। जो पाप जो जुर्म इसने किए थे उनकी यही सजा थी। कोई कुछ नही कर पाता।

‎नताशा की बातें सुनकर ध्रुव कुछ कह नही पाया।
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‎पहले मिस किलर और अब रोबो की मृत्यु के बाद गुरुदेव और नरकपाशा अब बहुत चिंतित थे।नरकशत सेना के केवल कुछ ही लोग जीवित थे।
‎समीकरण तेजी से बदल रहे थे। जो नरकशत सेना ब्रह्मांड रक्षको की दोगुनी थी , वह अब मात्र गिनती की बची थी।

‎गुरुदेव- नागेन्द्र तुम भेड़िया से लड़ने में समय मत बर्बाद करो। अब केवल तुम ही हमारी उम्मीद हो।

नागेन्द्र अभी तक भेड़िया से उलझा हुआ था , पर गुरुदेव की बातें सुनकर और रोबो की मृत्यु की खबर जानकर वह भी चिंतित और क्रोधित हो गया।
‎नागेन्द्र भेड़िया के साथ अपने द्वंद को अधूरा ही छोड़ कर भागने लगा।

‎भेड़िया- भाग कहाँ रहे हो नागेन्द्र। द्वंद तो पूरा करते जाओ।

‎ भागते हुए नागेन्द्र को भेड़िया की पूँछ ने जकड़ लिया । नागेन्द्र ने नागफनी जैसे कँटीले सर्पों की रस्सी से भेड़िया की पूँछ को लपेटना शुरु किया।

‎नागेन्द्र – मैं भाग नही रहा हूँ भेड़िया । मैं जल्द ही आऊँगा।

‎नागेन्द्र ने एक गाढ़ी विष फुंकार छोड़ी , जिसके उस पार कुछ भी देखना असंभव था। उसी विष फुंकार की धुंध में नागेन्द्र भेड़िया की नजरों से ओझल हो गया।
‎नागेन्द्र अब डार्ट्स के साथ साथ विष फुंकार का प्रयोग भी करने लगा।
‎सामान्य लोगों का सांस लेना मुश्किल हो गया। नागराज के लिए भी उस विष को पीना मुश्किल हो गया।
‎नागराज अब आक्रमण करने की जगह बचाव करने लगा। जो लोग डार्ट्स से घायल थे या विष फुंकार की चपेट में थे उनको बचाने में नागराज जुट गया।

‎जीत के इतने करीब आकर भी ब्रह्मांड रक्षकों की जीत सुनिश्चित नहीं हो पा रही थी।
‎ धीरे धीरे अंधेरा कालक्षेत्र को घेरने लगा।
‎( कालक्षेत्र में 23 घंटे प्रकाश और 1 घंटे अंधकार रहता है। विस्तार से जानने के लिए पढ़े -रण पर्व)
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पृथ्वी ।
‎स्थान- महानगर । वेदाचार्य धाम।
वेदाचार्य और भारती कालक्षेत्र की घटनाओं का विश्लेषण कर रहे थे।

‎वेदाचार्य- जिसका डर था वही हो रहा है , नागेन्द्र को रोकना मुश्किल है।

भारती-नागेन्द्र अब छुप कर वार कर रहा है , वरना दिव्यास्त्रों से उसे खत्म किया जा सकता है।

‎वेदाचार्य- यह इतना आसान नही होगा भारती , तुम तो जानती हो कि नागेन्द्र किन परिस्थितियों में उत्पन्न हुआ था ,उसको थोड़ी बहुत शिक्षा तो स्वयं देव कालजयी ने ही दी है, छोटे मोटे दिव्यास्त्रों का उसपर कोई असर नहीं होगा।उसमें भी देव कालजयी का देव विष है। इसीलए वन में कम्पनास्त्र ने उसको अधमरा तो कर दिया पर उसको मार नही पाया।

‎भारती- यह सब आपकी ही भूल का परिणाम है दादाजी।

‎वेदाचार्य- सही कह रही हो भारती , बिना सोचे समझे लिए गए निर्णय हमेशा दुष्परिणाम ही देते है।

‎भारती- कमसे कम एक बार उसे उसकी उत्पति के बारे में तो बता ही देना चाहिए था।शायद वो नरकपाशा का साथ छोड़ देता।

‎वेदाचार्य- समझने का प्रयत्न करो भारती , नागेन्द्र की पुरानी सारी यादें मैंने मिटा दी थी , और अगर नागेन्द्र को बताने के चक्कर में नरकपाशा या गुरुदेव को सच पता चल जाता तो वो नागेन्द्र का और भी खतरनाक उपयोग करने लगते।
‎पर अभी भी मुझे पूर्ण विश्वास है कि नागराज उसे खत्म करने का कोई न कोई तरीका अवश्य निकाल लेगा।

‎भारती – इन बातों का अब क्या फायदा दादाजी, मैं अब इस युद्ध को और नहीं देख पाऊँगी। मैं जा रही हूँ।

‎इतना कहकर भारती उस कक्ष से चली गयी। भारती के जाने के बाद वेदाचार्य जाने कितने देर अपने ही ख्यालों में खोए रहे।
 ‎‎अचानक से जैसे वेदाचार्य को कुछ याद आया।

‎”नहीं भारती , यह तुम क्या करने जा रही हो।”
‎वेदाचार्य ने पूरे वेदाचार्य धाम में भारती को ढूँढा पर वो कहीं नही थी।
‎”भारती!!!!”
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‎कालक्षेत्र-
‎नागराज ने अंधकार में नागेन्द्र को ढूँढ लिया।

‎नागराज- यह लुकाछिपी का खेल बन्द कर दो नागेन्द्र।

इतना कह कर नागराज ने नागेन्द्र पर एक दिव्यास्त्र चला दिया। पर नागेन्द्र बच कर फिर अंधेरे में गायब हो गया, केवल उसकी आवाज गूँजी-
‎”अभी तो खेल में मजा आना शुरु हुआ है नागराज , और तुम कहते हो खेल बन्द कर दूँ।”

‎नागराज को पीछे से धक्का लगा, नागेन्द्र नागराज की पीठ पर वार करके फिर भाग गया।

‎नागराज- सारे लोग ध्यान से सुनो , आकाश में एक कृत्रिम सूर्य का निर्माण करो । जल्दी से।

‎कुछ ही देर में एक कृत्रिम सूर्य का निर्माण हो गया पर कुछ क्षणों में वो लुप्त हो गया।

‎तिरंगा-ये क्या हो गया।

‎परमाणु – ये भी उन्ही की कारस्तानी होगी वरना कृत्रिम सूर्य इतना शीघ्र नही विलुप्त होता।

‎उसी समय एक प्रकाश पुंज आकाश में प्रकट हुआ।एक बार फिर कालक्षेत्र प्रकाशमान हो गया।

‎डोगा- अब ये क्या है?

‎नागराज- ये तो कोई ऊर्जा लगती है।

‎ध्रुव- ये जो कुछ भी है ,कालक्षेत्र के बाहर से आया है ,हो सकता है गुरुदेव ने अपना कोई मददगार बुलाया हो।

‎नागराज- पर ये तो लगभग असंभव है। कोई कालक्षेत्र में किसी प्रकार की ऊर्जा क्यो भेजेगा?

‎इससे पहले की कोई कुछ समझ पाता वह ऊर्जा नागेन्द्र के शरीर मे समा गयी। नागेन्द्र बुरी तरह तड़पने लगा।सब आश्चर्यचकित हो कर यह दृश्य देख रहे थे।
‎कुछ देर बाद जब नागेन्द्र का शरीर शांत हुआ तो उसके शरीर का गहरा नीला रंग अब गायब था, उसके शरीर का रंग अब हल्का नीला था।

‎नागराज – मैं समझ गया , यह अवश्य अमृत ऊर्जा थी जो किसी भी विषधारी के लिए मृत्यु समान होती है।

‎ध्रुव- पर ये ऊर्जा कालक्षेत्र में किसने भेजी?

‎नागेन्द्र फिर संभला और नागराज पर वार करने लगा।

‎परमाणु- यही समय है नागराज , मौका मत चूको।

इस बार नागराज ने त्रिशूलनुमा अस्त्र का आवाहन किया जो नागेन्द्र के शरीर में तीन छेद करता हुआ उसके आर पार चला गया।
‎इस महागाथा का एक मुख्य पात्र नागेन्द्र अब मर चुका था। पर कैसे ये अभी भी सबके लिए रहस्य बना हुआ था।
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‎अँधेरा अब समाप्त हो चुका था।
नागेन्द्र के बाद अब केवल गुरुदेव और नरकपाशा ही जीवित थे।डर अब उन दोनों के चेहरों पर नृत्य कर रहा था।

नरकपाशा- यह क्या हो गया गुरुदेव?अब हमारे बचने का कोई मार्ग शेष नही है। हम यहाँ से भाग भी नही सकते। कुछ करिए गुरुदेव।

गुरुदेव गंभीर स्वर में बोला-मेरे पास अभी भी एक उपाय है। तुम तो जानते होगे कि मैं यंत्रों का ज्ञाता हूँ, पर मैंने तिलिस्म ज्ञान भी सीखा है। अब वही तुम्हें बचाएगा।

नरकपाशा- ये आप क्या कह रहे है गुरुदेव। केवल मैं क्यू , क्या आप नही बचना चाहते , और सबसे मुख्य बात हम बचेंगे कैसे?

गुरुदेव- कालक्षेत्र की कुंजी ही बचाएगी अब तुम्हें।

नरकपाशा- पर वो तो कालक्षेत्र में ही कहीं खो गयी है न?

कुछ देर बाद-
सारे ब्राह्मण रक्षक और विस्तृत ब्रह्मांड रक्षक नरकपाशा और गुरुदेव के पास पहुँच गए।

तिरंगा- अब कोई फायदा नहीं है गुरुदेव, अब तुम्हें बचाने वाला कोई नहीं।

तिरंगा ने गुरुदेव पर वार कर दिया।

गुरुदेव-अगर हम नही बचेंगे तो कोई नही बचेगा।

इतना कहते हुए गुरुदेव ने अपने हाथ में लिया हुआ एक छोटा सा दंड तोड़ दिया।किसी के कुछ समझने से पहले ही तिरंगा का वार गुरुदेव की जान लेता चला गया।पर आश्चर्य जनक रूप से उसका शरीर हवा में विलीन हो गया।

नागराज – ये…ये तो कालक्षेत्र की कुंजी थी जिसे गुरुदेव ने तोड़ दिया। मैं उस कुंजी को पहचानता था।पर उसे इतने आसानी से तोड़ना असंभव था।

डोगा- पर ऐसा क्यो। मरते समय बुड्ढा पागल हो गया था क्या?

गुरुदेव की मृत्यु से नरकपाशा पागल सा हो गया।
उसने तिरंगा पर वार करने के लिए अस्त्र फेंका पर तिरंगा बच गया।

नागराज- अब बचने का कोई रास्ता नहीं है नारकपाशा, अब तुम्हारा अंत आ गया है।

नरकपाशा-हा हा हा , ये तो सब जानते है नागराज कि मुझे मारना असंभव है।

नागराज- मैं तुम्हें मारूँगा नहीं पर तुम्हारी ऐसी हालत जरूर कर दूँगा की तुम्हारी आत्मा तुम्हारा शरीर में नही रह पाएगी।

नागराज ने एक दिव्य धनुष का आवाहन किया और नरकपाशा पर वार कर दिया। धनुष से एक बाण निकला ,जो अगले पल सैंकड़ो बाणों में बदल गया।
और उसके अगले पल हजारों,नरकपाशा तक पहुंचते पहुंचते असंख्य बाणों में बदल गया वह एक बाण। नरकपाशा के शरीर को असंख्य भागों में बाट गया वह अस्त्र। नरकपाशा के शरीर के टुकड़े उन बाणों में फंस कर सारे दिशाओं में फैल गए। धीरे धीरे सारे बाण गायब हो गए।
नरकपाशा के शरीर के टुकड़े जो कि कालक्षेत्र की भूमि में नजर भी नही आ रहे थे चारों तरफ फैल गए थे।

ध्रुव- हमें सावधान रहना होगा नरकपाशा अभी भी जीवित हो सकता है।

पर अगले कुछ देर में कुछ नही हुआ।सारे लोग शांत से खड़े रहे।
डोगा की आवाज ने शांति भंग की।

डोगा- मुझे लगता है कि अब नरकपाशा नहीं जीवित हो सकता।

तिरंगा- पर नरकपाशा इतनी आसानी से कैसे खत्म हो गया? वह तो अमर था।

परमाणु- उसके पास तो नीलमणि की शक्तियां भी थीं , उसने प्रतिरोध भी नही किया।

शक्ति- क्योंकि उसको लगा होगा कि अब उसका बचना नामुमकिन है। वैसे भी उसके हर कृत्य के पीछे गुरुदेव का ही हाथ रहता था ,उसके बिना वह कुछ नही था।

ध्रुव-मुझे अभी भी आशंका है, कहीं ……

नागराज- नही ध्रुव , अब नरकपाशा नही जीवित होगा ।

स्टील -पर अगर वो इस प्रकार नही मरता तो हम क्या करते?

नागराज- उस दशा में हम दशम अस्त्र का प्रयोग करते।तुम लोग व्यर्थ ही चिंता कर रहे हो।अब वो नही वापस आएगा।

एंथोनी- चिंता की बात तो अब है।अपने चारों तरफ देखो ।

कालक्षेत्र का आकाश धीर धीरे कालक्षेत्र की भूमि की तरफ बढ़ रहा था।

शक्ति- ये क्या हो रहा है?

ध्रुव- कालक्षेत्र सिंकुड़ कर छोटा हो रहा है।

स्टील- पर ये कैसे हो रहा है।

डोगा- ये जरूर उसी बुड्ढे गुरुदेव की वजह से हुआ होगा।

परमाणु- कालक्षेत्र की कुंजी तोड़ने से ही ऐसा हुआ होगा।

धनंजय- पर ये कालक्षेत्र का द्वार तो खुल जाना चाहिए था। नरकशत सेना तो पूर्ण रूप से नष्ट हो गयी फिर ये द्वार क्यों नही खुल रहा।

एंथोनी- कही ऐसा इसलिये तो नही हुआ कि नरकपाशा पूर्ण रूप से मरा नही और वो अभी भी यही है।

नागराज-जरूर इसीलिए। तुम सही कह रहे हो एंथोनी इसके शरीर के कणों को हमें यहाँ से बाहर फेंकना होगा। तभी ये द्वार खुलेगा ।

विसर्पी- पर जो भी करना होगा शीघ्र हो करना होगा वरना हम आकाश और भूमि के बीच ही दब जाएँगे।

परमाणु ने नागराज की तरफ देखा- क्या सोच रहे हो नागराज ?

नागराज- पर.. मैं उसका प्रयोग…

परमाणु- और रास्ता ही क्या है?

लोमड़ी-कोई हमें भी बताएगा क्या बात कर रहे हो तुम दोनों?

परमाणु- दशम अस्त्र । अब वही हमें बचा सकता है।

डोगा- हाँ , अब यही एक तरीका है। वैसे भी अगर नरकपाशा इस तरह नही मरता तो तुम उसी का प्रयोग करते।

परमाणु- तुम दशम अस्त्र का आवाहन करो नागराज ,, तब तक हम उसके शरीर को इकठ्ठा करने का रास्ता ढूंढते है।

तिरंगा- पर हमें ध्यान देना होगा कि वह कहीं जीवित न हो जाए।

कालक्षेत्र तेजी से सिंकुड़ रहा था।
नागराज को भी यही रास्ता ठीक लगा , वह दशम अस्त्र का आवाहन करने लगा।
ध्रुव खुद में ही बड़बड़ाने लगा-कहीं न कहीं कुछ जरूर छूट रहा है।पहले गुरुदेव का मरते ही हवा में गायब हो जाना। हो सकता है ऐसा दिव्यास्त्र की वजह से हुआ हो। पर उसने कालक्षेत्र की कुंजी को इतनी आसानी से कैसे तोड़ दिया। और नरकपाशा , वह इतनी आसानी से कैसे मर गया , माना कि वह प्रतिरोध नही कर सकता था पर, पर उसके शरीर को तो प्रतिरोध करना चाहिए था। आखिर उसके शरीर में नीलमणि की ऊर्जा थी । वह तो नष्ट नही हो जाती। अरे यह क्या है? हे भगवान!
ध्रुव ने जमीन पर से कोई चीज उठायी और लगभग चिल्लाते हुए नागराज की तरफ भागा-रुक जाओ नागराज यह सब एक चाल है। नरकपाशा अभी जीवित है। बस वह यहाँ छुपा है कहीं।
ध्रुव की बात सुनकर नागराज भी एक क्षण के लिए आश्चर्य चकित रह गया।
परमाणु , डोगा , तिरंगा भेड़िया आदि सब ध्रुव के पास पहुंच गए।

डोगा- क्या हुआ ध्रुव?

ध्रुव- रुको मैं बताता हूँ तुम सबको , पर पहले किसी ऐसे अस्त्र का प्रयोग करो जो चारो तरफ फैली हुई तंत्र , तिलिस्म या माया शक्ति को नष्ट कर सके।

परमाणु ने तुरंत ही एक ऐसे ही अस्त्र का संधान किया। कालक्षेत्र अब सामान्य नजर आने लगा । आकाश अपने जगह पर ही स्थिर था।

स्टील- तो क्या ये सब एक माया जाल था?

शक्ति- और सबसे बड़ी बात ये सब किया किसने।

ध्रुव- गुरुदेव ने , वह मरकर भी तिलिस्म में बदल कर हमें धोखा दे रहा था। वास्तव में नरकपाशा मरा नहीं है , उसकी मृत्यु और कालक्षेत्र का सिंकुड़ना दोनों हमारे लिए एक भ्रम था ताकि नागराज दशम अस्त्र से कही और के लिए आयाम द्वार खोल दे और असली नरकपाशा जो कि यहीं कहीं छुपा हुआ है हमें धोखा देकर यहाँ से भाग जाए।

नरकपाशा जो कि छुपा हुआ था बाहर आ गया।

“मैं कभी ये समझ नही पाता ध्रुव कि तुम्हे हर बात पता कैसे चल जाती है”-नरकपाशा ने कहा।

डोगा- हाँ ध्रुव , ये तुम्हे कैसे पता चला?

ध्रुव- इससे , यह शायद कालक्षेत्र की असली कुंजी है जोकि नष्ट नही हुई थी और यही पर थी ।इसको यहाँ देखते ही मैं सब समझ गया।

नरकपाशा- ओह!तो यह यहाँ थी , कालक्षेत्र की कुंजी हमें मिली नही इसीलिए हमने नकली कुंजी से तुमलोगों को बेवकूफ बनाना चाहा। ताकि जल्दबाजी में तुम सब दशम अस्त्र से आयाम द्वार खोलो और मैं भाग जाऊ।

नागराज ने नरकपाशा पर वार करना शुरु कर दिया।
नरकपाशा- नही नागराज । गुरुदेव ने मेरी वजह से अपने प्राण भी दे दिये। मुझे मारना इतना आसान नही है।

नरकपाशा नागराज और अन्य को कड़ी टक्कर दे रहा था।इसका शरीर कट कर फिर जुड़ जा रहा था।

ध्रुव- अब हमें वही उपाय लगाना होगा नागराज जो हमने पहले सोचा था।

नागराज- सही कहा ध्रुव।

नागराज ने बाकियों से कहा- सुनो सब मैं इस बार दशम अस्त्र से दश अत्यंत नारकीय और सुनसान आयामों को खोलूँगा । तुम सबको इसके शरीर को दश भागों में काटना होगा जिन्हें मैं उन्ही आयामों में भेज दूँगा जहाँ उसके टुकड़े कभी वापस नही आ पाएंगे। और नरकपाशा सदैव के लिए समाप्त हो जाएगा।

“ठीक है”- सब एक साथ ही बोल उठे।

नरकपाशा का अंत अब लगभग तय था , नागराज ने दशम अस्त्र का आवाहन कर दिया। सारे ब्रह्मांड रक्षकों ने नरकपाशा को उर्जाओं में कैद कर लिया और उसके शरीर को विभक्त करने ही वाले थे।
मौत नरकपाशा के चेहरे पर साफ नजर आ रही थी।

नरकपाशा- रुक जाओ नागराज , मुझे माफ़ करदो , आखिर मैं तुम्हारा चाचा हूँ।

नागराज- एक ऐसा चाचा जिसने मेरे माता पिता को मार डाला।

नरकपाशा-वो सब मैंने सत्ता और खजाने के लालच में किया था नागराज , पर वो मेरी भूल थी और उसकी सजा मुझे मिल चुकी है।मुझे दशम अस्त्र से किसी सुरक्षित आयाम में भेज दो। मैं अपने जीवन की भीख माँगता हूँ नागराज।

नागराज- वाह नरकपाशा आज अपना अंत सामने है तो तुम अपने जीवन की भीख माँग रहे हो । जो कुछ तुमने किया है वो अक्षम्य है।

नरकपाशा- मैंने । मैंने तो कभी कुछ किया ही नही नागराज । जो कुछ भी मैंने किया गुरुदेव के कहने पर किया। शायद मैं गुरुदेव और नियति दोनों के हाथ की कठपुतली था।

नागराज को रुका देखकर ध्रुव चिंतित हो गया- क्यों रुके हो नागराज , दशम अस्त्र का आवाहन तुमने कर दिया है, अब बस उसके शरीर को उन आयामो में भेजना है।

ध्रुव की बात अनसुना करके नरकपाशा ने बोलना जारी रखा-अगर मेरे हाथों तुम्हारे माता पिता का वध नही होता तो आज तुम विश्व के सबसे बड़े रक्षक नही होते । तुम्हारे रक्षक बनने के लिए उनका मरना आवश्यक था। मैं तो बस एक जरिया था। अब तो गुरुदेव भी नही है नागराज, मुझे जाने दो।

नागराज के हाथ ढीले पड़ने लगे , आखिर वो भी तो एक इंसान ही था ।
जो काल को अपने हाथों से रोक सकता था आज काल ने उसी नागराज के हाथ रोक लिए थे।

पर विसर्पी चुप नही रह सकी- नही नागराज तुम इसको माफ नही कर सकते , भले ही इसके पीछे गुरुदेव था पर इसने भी कम पाप नही किए है। इसकी वजह से तुमलोगों को वन जाना पड़ा । न जाने कितनों लोगों को इसने कष्ट दिये होंगे। अस्त्र चलाओ नागराज । अंत करो इसका।

इस बार नागराज ने अस्त्र चला ही दिया जो नरकपाशा के शरीर को दस भागों में बांटता चला गया और वो टुकड़े पहले से ही खुले दस आयामो में चले गए। नरकपाशा का अंत सदैव के लिए हो चुका था। कुछ की क्षणों में दशम अस्त्र द्वारा खुले आयाम द्वार बंद हो गए । अगले ही पल कालक्षेत्र का द्वार भी खुल गया।

‎सारे ब्रह्मांड रक्षक और विस्तृत रक्षक एक लंबे महायुद्ध के बाद वापस पृथ्वी पर आ गए ।
‎पृथ्वीवासियों को शायद पता भी नही चला होगा कि उनपर आया एक बहुत बड़ा खतरा टल गया था।
‎——————-
‎नागराज विसर्पी के साथ वेदाचार्य धाम पहुँचा जहाँ एक और सच उसका इंतज़ार कर रहा था।

‎नागराज- भारती कहाँ है दादाजी?

‎पर वेदाचार्य कुछ न बोले।

‎नागराज – आप बोलते क्यो नहीं दादाजी।

‎वेदाचार्य ने एक गोल सा यंत्र निकाला – इसे सुनो नागराज ।

‎यंत्र से भारती की आवाज निकलने लगी।
‎”मैं जानती हूँ दादाजी, जो मैं करने जा रही हूँ उससे आपको दुख तो होगा पर यही एकमात्र विकल्प है। नागेन्द्र को मारने के लिये अमृत ऊर्जा की आवश्यक्ता है और उसे मैं धारण करूँगी।मेरे जीवन का एक ही उद्देश्य था नागराज , आज मेरा अंत मेरे जीवन के उद्देश्य को पूर्ण करेगा।”

‎नागराज को जैसे काटो तो खून नही वो कुछ समझ नही पा रहा।कालक्षेत्र में अचानक से प्रकट हुई अमृत ऊर्जा का रहस्य अब उसके समझ मे आ रहा था। सब कुछ जीत कर भी वो जैसे सब कुछ हार गया।

‎”मेरे जाने के बाद तुम दुखी मत होना नागराज। मैं सदैव तुम्हारे दिल में रहूँगी । और हाँ मेरे जाने के बाद दादाजी और विसर्पी दीदी का ख्याल रखना।”
कट. ट…
और भारती की आवाज बंद हो गयी।
नागराज ने उस यंत्र को अपने सीने से लगा लिया पर विसर्पी अपने आँसुओ को नही रोक सकी।
वेदाचार्य के आँसू तो शायद पहले ही सूख चुके थे।
————————-
कुछ दिनों में सब कुछ सामान्य हो गया।
रिचा अभी भी शांति चिल्ड्रेंस होम चलाती थी पर अब दुनिया से छुप कर नही रहती थी।
वो अक्सर राजनगर आती थी और ध्रुव और नताशा के साथ ही रहती थी।
विसर्पी नागराज के साथ महानगर में ही रहती थी , नागद्वीप का कार्य भार अब विशांक के हाथों में था जो महात्मा कालदूत के सानिध्य के साथ नागद्वीप पर शासन कर रहा था।
नागराज और विसर्पी कभी कभी नागद्वीप भी जाते।
विसर्पी के रूप में वेदाचार्य को एक नई पोती मिल गयी थी।

एक दिन नागराज के स्वप्न में देव कालजयी ने दर्शन दिए-
“मैं जानता हूँ नागराज तुम्हारे मन में यह प्रश्न होगा कि मैंने नीलमणि की बात तुमको न बता कर ध्रुव को क्यों बताई? ऐसा इसलिए क्योंकि अगर तुम नीलमणि को रोकने के लिए जाते तो फिर तुमको दिव्यास्त्रों का प्रशिक्षण लेने का समय नही मिलता। और बिना उसके तुम दशम अस्त्र का प्रयोग नही कर पाते। नरकपाशा का अंत तुम्हारे हाथों ही होना था नागराज और उसके लिए दशम अस्त्र का प्रयोग आवश्यक था। मुझे बहुत खुशी है कि तुम दोनों ही मेरी आशाओं पर खरे उतरे।आयुष्मान भव पुत्र।”
————————–
उसी समय नागरानी के आयाम में–
एक खंडहर जैसी जगह पर दो महिलायें बात कर रही थीं।
“हमें शीघ्र ही तैयारियां आरम्भ करनी चाहिये गुरुरानी। नीलमणि पृथ्वी पर आने वाली है। इस बार मेरी भतीजी नागरानी और बाकी ब्रह्मांड रक्षिकाओं को कोई नही बचा सकेगा। पूरा ब्रह्मांड हमारे वश में होगा।”

【समाप्त??– या आरम्भ होगी एक नई नागभारत!】

Written By – Akash Pathak for Comic Haveli

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10 Comments on “Nagbharat – (Vinash Parv)”

  1. Wah .mast ending
    Bharati ki death its so sad .per iss love triangle me usse marna hi tha .
    But padhker dukh hua.
    Akash very well written story .keep it up

    1. धन्यवाद मोनी जी।। अगली कहानी भी आपको जल्द ही मिलेगी

  2. Bahoot he badiya kahani likhi hai…pad kar maza aa gaya..sachmuch jabardast story likhi thi..aage bhi jarur likhte rahiye

  3. कहानी पढ़ ली गई और कहानी बहुत ही अच्छी थी इसका रिन्यू शाम को डाल दिया जाएगा ।

  4. बहुत ही उम्दा।
    जो कमी पिछले पार्ट में रह गयी थी आपने इस पार्ट में पूरी कर दी।
    नागेंद्र के मरना काफी जल्दी हो गया उम्मीद थी वो एक दो हीरो को मारकर मरेगा।
    कांसेप्ट जानदार था और एंड बहुत ही लाजवाब।
    भारती को आप सब लोग मारने पर क्यों लगे हैं?
    कोई तो जिंदा छोड़ दो उसे । हाहाहा
    सबके रोल बहुत अच्छे थे पूरी स्टोरी में लेकिन काल क्षेत्र में एंथोनी में निखार नहीं आ पाया।
    आपने एंड में एक नयी कहानी का क्लू छोड़ दिया है आशा है वो कहानी भी बहुत ही जल्दी आएगी।
    मुझे इन्तज़ार रहेगा।
    आगे की कहानियों के लिए आल द बेस्ट

    1. धन्यवाद देवेंद्र जी।
      भारती एक बहुत ही स्ट्रांग कैरेक्टर है , पर उसका मरना कहानी की जरूरत है।।
      एंथोनी और अन्य कुछ किरदारों को कम जगह मिली उसके लिए क्षमा।आगे की कहानियों में इन बातों का ध्यान रखूँगा

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