Prarabdh Part – 1

प्रारब्ध 

भाग – 1

कार्तिकेयपुर
प्रकृति ने एक सुंदर, अद्भुत एवं अद्वितीय सम्पदाओं से परिपूर्ण किया था इस देश को |
इस देश पर महाबलशाली, पराक्रमी देवतुल्य सम्राट सिंहनाद राज करते थे।।
जिनके राज में नर नारी पशु पक्षी सभी खुश रहते हों जहाँ स्वयं सूर्य भी प्रातः दर्शन करने हेतु ही उदित होते हों….

हाय दुर्भाग्य आज वहाँ रक्त की नदियां बह रही हैं…. मैदान रक्त रंजित है… हज़ारो शव क्षत विक्षिप्त अवस्था में मैदान पर पड़े हैं….
आसमान में चील कौवे गिद्ध दावत उड़ाने को आतुर हो रहे हैं….

दूर मैदान के मध्य एक 8 फुट की मजबूत कद काठी के बलिष्ठ एवम ओजवान योद्धा मुँह के बल घायल अवस्था में पड़े हैं….
हाय ये तो सम्राट सिंहनाद हैं…
मृत्यु आज उनके आलिंगन को खड़ी है..
सूर्य भी अस्त होने को आया है जिसकी लालिमा से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो सारा संसार शोक में डूबा हो….

यकायक एक मजबूत कदकाठी  वाला , रौद्रता जिसके मुख को अधिक क्रूर बनाती है , वह अतिक्रूर राक्षस राक्षस-राज विराध उस योद्धा सम्राट सिंहनाद के निकट आता है…..

राक्षसराज विराध- हाहाहाहा ये है वो सम्राट सिंहनाद जिससे देवता भी भयभीत होते हैं ? चल उठ सिंघनाद देख तेरी मृत्यु तेरे सम्मुख खड़ी है….क्या एक कायर की मृत्यु चाहता है… उठ युद्ध कर….

घायल अवस्था में पड़े सम्राट सिंहनाद उठने का साहस करते हैं…
तलवार उनके हाथ में आज पहाड़ जैसी प्रतीत हो रही है अत्यंत भारी….
वह लड़खड़ा कर खड़े होते हैं…
किन्तु हाय धिक्कार है राक्षसराज के लिए…
राक्षसराज विराध तलवार का  तीव्र वार करता है जिससे सम्राट सिंहनाद की गर्दन डोर जा गिरती है….
युद्धभूमि राक्षसराज विराध के अट्टाहास से गूंज जाती है….

कार्तिकेयपुर राजमहल में….
पूजाघर में एक ऊँची विशाल महादेव की मूर्ति लगी है जिसके सम्मुख घबराई हुई एक महिला बैठी है।

सहसा वहाँ एक दासी दौड़ी आती है एवं खड़ी हो जाती है…
महिला की आँखे उस पर प्रश्न की दृष्टि से स्थिर हो जाती हैं ….

दासी- महारानी । सम्राट युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हो गए ।
वो महिला महारानी क्षिप्रा थी।
महारानी एकदम से निढाल भूमि पर गिर जाती हैं…
उनकी आंखों से अश्रु अनवरत बहने लगे जाते हैं……

तभी वहाँ महागुरु आदियोगी का आगमन होता है…..

महागुरु- महारानी खुद को संभालिये। कार्तिकेयपुर की प्रजा का दायित्व अब आपके सम्मुख दृष्टि लगाए बैठा है…..
ये समय अश्रु बहाने का नही है महारानी राक्षसराज महल की ओर ही आ रहा है… आप यक्ष लोक जाने की तैयारी करें अविलंब…
महारानी अपने अश्रु पोंछते हुए…
महारानी क्षिप्रा- प्रणाम महागुरु। क्षमा कीजियेगा किन्तु इस संकट की घड़ी में कार्तिकेयपुर नही छोड़ सकती। सम्राट ही नहीं रहे तो में जीवित रह कर क्या करूँगी…. भागने के स्थान पर मैं राक्षसराज से लड़कर मृत्यु प्राप्त करना पसन्द करूँगी।
महागुरु- महारानी ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें आपको शोभा नही देती… आने वाले महाराज की तो सोचिये जिसका जीवन आपके जीवन पर निर्भर है… कार्तिकेयपुर के भविष्य के लिए आपको प्रस्थान करना होगा…. कृपया शीघ्रता करें….

महारानी दुःखी मन से यक्ष लोक प्रस्थान करती हैं…

कुछ ही समय उपरांत राक्षसराज विराध महल में पहुंच जाते हैं किंतु महारानी को ना पाकर क्रोधित हो जाते हैं एवं ज्वाला उत्पन्न कर महल को रख के ढेर में परिणित कर देते हैं।

6 माह पश्चात-

यक्ष राज दाहुन अपने कक्ष में टहल रहे हैं, उनके माथे पर चिंता की लकीरें देखी जा सकती हैं, वे काफी चिंतित एवं व्याकुल हैं

अचानक महल किलकारियों से गूँजने लगता है…. यक्षराज के चेहरे पर खुशी छा जाती है..

ठीक उसी समय एक दासी दौड़ी चली आती है

दासी- यक्षराज की जय हो। यक्षराज महारानी को पुत्र हुआ है एवं महारानी भी कुशल हैं।

यक्षराज दाहुन कुछ नही कहते वो बस दौड़ा चला जाते हैं जाते जाते दासी को एक माला देते हैं ये लो तुम्हारा पुरस्कार ….

महारानी के कक्ष के बाहर महागुरु आदियोगी एवं यक्षराज दाहुन बालक को हाथ में लिए खड़े हैं…..
यक्षराज दाहुन- महागुरु इतने माह के दुःख के पश्चात क्षिप्रा को कुछ सुख की प्राप्ति हुई है, काश सम्राट सिंहनाद जीवित होते।

महागुरु- यक्षराज। इस बालक ने संसार के दुखों को समाप्त करने हेतु ही जन्म लिया है…..

संसार में इसे किसी का भय नही होगा.. इसीलिए इसका नाम “निर्भय” रखा जाता है…

यक्षराज- निर्भय।

महागुरु- महारानी को बताइयेगा मैं बालक को लेने 7 वर्ष पश्चात आऊंगा।

केवल इतना कहकर महागुरू वहाँ से चले जाते हैं।

यक्षराज दाहुन का मन विचलित हो जाता है… वह महारानी के कक्ष की ओर प्रस्थान करते हैं…..

महारानी को बालक पकड़ाते हैं।

महारानी क्षिप्रा- भैया। कैसा है मेरा पुत्र…. आप चिंतित क्यों हैं?

यक्षराज- कुछ नहीं क्षिप्रा। बहुत सुंदर है तुम्हारा पुत्र।

यक्षराज- क्षिप्रा। महागुरु आदियोगी आये थे।

क्षिप्रा- क्या कहा भैया! आदियोगी आये थे।। मुझसे मिलकर क्यो नही गए?

यक्षराज- हाँ। जल्दी में थे….. बालक का नाम निर्भय सुझाया है।

क्षिप्रा- निर्भय ! अतिसुन्दर…

यक्षराज दाहुन क्षिप्रा को बाकी अंश नहीं बताता है।

धीरे धीरे बालक की क्रीड़ाओं एवं गतिविधियों के आंनद में 7 वर्ष कब बीत गए पता ही नही लगा।

फिर एक दिन-

महागुरू आदियोगी यक्ष भवन में प्रवेश करते हैं।

यक्षराज- प्रणाम महागुरू।

महागुरू- आयुष्मान भव।

यक्षराज कैसे आना हुआ महात्मन?

महागुरू- निर्भय की ये 7वीं वर्षगांठ है यक्षराज। निर्भय के जाने का समय हो गया है।

क्रमशः

Written By Devendra Gamthiyal for Comic Haveli 

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20 Comments on “Prarabdh Part – 1”

  1. बहुत ही अच्छी स्टोरी है देवेन्द्र भाई।

    सबसे पहले तो आपको बधाई देना चाहता हूँ इस नई श्रृंखला की शुरुआत करने के लिए और दूसरी बधाई हवेली एक नया सुपर हीरो देने के मामले में आप दुसरे नंबर पर हैं। वैसे देखा जाये तो सुपर हीरो के मामले में आप पहले नंबर पे हैं क्योंकि सोन्या जो ने सुपर हीरोइन बनाई है।

    दूसरी बात यह स्टोरी मुझे बहुत पसन्द आई शुरुआत बहुत ही अच्छी है इस कहानी की और चूँकि यह कहानी भूतकाल की है। तो इसमें अत्यधिक हिंदी का इस्तेमाल बहुत अच्छा लगा आपने शब्दों का इस्तेमाल बहुत ही ज़बरदस्त ढंग से किया है।

    मैं तो सोच रहा था यह कहानी खत्म ही न हो और मैं पढ़ता चला जाऊं।खैर। अब अगले पार्ट का इंतज़ार है जिसमे मालूम चलेगा की महागुरु आदियोगी निर्भय को कहाँ ले गए।

    1. धन्यवाद तल्हा भाई
      आशा करता हूं आगे का पार्ट भी आपको पसंद आये

    2. Haveli ka pahla hero bahut pahle aa chuka hai dark realms me sameer ke roop me ,
      Nirbhay ko shiksha deeksha ke liye le jana hai waise .

  2. बहुत बढ़िया कहानी है देवेंद्र जी।
    राजाओ की कहानियां वो भी इतने अच्छे वर्णन के साथ , मज़ा आ गया ।
    आशा करता हूँ कि अगले भाग में कहानी अच्छे से एक्सप्लेन करेंगे।

  3. Bahut hi accha bhai ..
    Kahani ko bahut hi acche dang se prastut kiya gya he
    Word padh kr aise lag rha h drishy hi samne aa ja rhe he
    Upper se 5th paragraph
    Fourth last line me shayed waha दूर he use edit kr dijiyega bs

  4. वाह वाह बेहद शानदार गुरुजी

    शब्दो का चयन और उपयोग बेहद शानदार तरीके से किया गया है,पढ़ते वक्त दिमाग मे चित्र बनते जा रहे है, अब देखना है कि आदियोगी जी निर्भय को कहा ले जाते है।

    शुरुआत तो जबरदस्त है,अंधेरे का सन्नाटा पसार कर उजाले को लाने की ट्रिक कोई आपसे सीखे।
    एक और बेहद शानदार कहानी के लिए बहुत बहुत बधाई एवं शुक्रिया।

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