Rahasya

Ek Raat Bhooton Ke Saath

                रहस्य

स्थान- वृहद हिमालय में एक स्थान।

ग्वाड़ गांव जहां तक़रीबन 20-30 परिवार रहते थे।

समय रात के 8:30 बजे। 

सर्दियों का मौसम इस समय अपनी पराकाष्ठा पर था इसीलिए पूरा गांव बर्फ से ढका हुआ था, ठंड इतनी की हड्डियों को तक जमा दे, शाम को 7 बजे का समय भी रात 12 बजे जैसा लगने लग जाताथा।

सभी गांव वाले अपना सारा काम धन्धा 6 बजे तक निपटा कर अपने घरों में बंद हो जाते हैं, काम की कमी एक बड़ी समस्या हो जाती है आजकल।

बंटी एक 9 साल का लड़का अपने घर में रजाई के अंदर लेटा हुआ है….

देखने से वो बीमार लग रहा था।

बंटी- माँ । आज बहुत ठंड हो रही है।

कमला- बेटा आज मौसम कुछ ज्यादा ही खराब लग रहा है…. चांद निकला हुआ है आसमान साफ है लेकिन ठंड कम नही हुई है।

सुरेंद्र- लगता है बंटी की तबियत ज्यादा खराब हो जायेगी ऐसे में। मैं बगल में ही वैद्य जी से जाकर इसके लिए दवाई ले आता हूं।

“नहीं बाहर बहुत ठंड है आप भी मत जाओ”

कमला कहती है।

तभी उनके घर से कुछ दूर –

“वर्षों के बाद आज मौका मिला है…. “

“जी भर के आनंद उठाओ…”

हइहीहीही… हइहीही…….हइहीहीही

हंय……. हंय………….. हंय…

इन हडकंपा देने वाली आवाजो ने पूरे आस पास के वातावरण को बदल दिया था….

ये आवाजे धीरे धीरे गांव की तरफ बढ़ रही थी….

ग्वाड़ गांव की ओर ये आवाजे धीरे धीरे गहरी होती जा रही थी…..

बंटी और उसके माता पिता इन आवाजो से डर रहे थे…..

फिर अचानक उनके दरवाजे पे दस्तक हुई….

ठक…….. ठक……ठक……

बंटी और उसके माँ पिता ने एक दूसरे को कस के पकड़ लिया……

कुछ देर बाद दरवाजा फिर बजा

ठक………ठक……ठक…..

फिर दरवाजा एक झटके से खुल गया….

इसके साथ ही गांव में हर घर से अब वीभत्स आवाजे निकलने लगी

“बचाओ”

आह

नहीईईईई

चीखने चिल्लाने की आवाजों ने आस पास के किसी भी गांव के लोगो को सोने न दिया…. और जब सुबह हुई…

तो ग्वाड़ गांव बचा था तो सिर्फ अधखाई लाशें और  उनकी हड्डियों का ढेर …..

कुछ दिन पहले-

स्थान- प्रेमनगर

दिल्ली पब्लिक स्कूल-

गेट के बाहर 6 बच्चे जो देखने मे कक्षा-12 या कक्षा -11 के होंगे, बातें कर रहे हैं—–

श्वेता – क्यों न हम सभी कोई अच्छी से लव स्टोरी देखने चलें।

प्रीति- हां श्वेता ठीक कह रही है आजकल यारियां जैसी एक अच्छी लव स्टोरी आयी है।

अमन- क्या ये मूवी मूवी लगा रखा है।

अरमान – दिमाग खराब कर रखा है इन लोगो ने अब यारियां  भी कोई मूवी है। क्या कहता है शिवा ?

शिवा का इन लोगो की तरफ कोई ध्यान नही था वो तो बस प्रिया से बात करने में व्यस्त था।

प्रीति – ये देखो इनका अभी से चालू है।

सभी साथ मे हंसने लगते हैं।

अरमान शिवा के कंधे पर हाथ मारता है जिससे शिवा का ध्यान टूटता है।

अरमान- क्या कहता है शिवा चले मूवी देखने।

शिवा- चलो। कब का प्लान है?

अमन- प्लान?? क्यों मजाक करता है यार जब इन लड़कियों का मन करेगा तभी चलना होगा।

सभी लड़के एक साथ हंस पड़ते हैं।

श्वेता- वो तब तो और अच्छा है वैसे भी छुट्टियां शुरू होने वाली है क्यों न बृहस्पतिवार को चलें।

सभी बृहस्पतिवार का दिन तय करते हैं जो तीन दिन बाद आने वाला होता है।

दिन बृहस्पतिवार-

स्थान- ओरिएंट सिनेमा हॉल

अरमान सबसे पहले आकर सभी के लिए फ़िल्म की टिकट ले लेता है।

फ़िल्म के शुरू होने तक सभी आ जाते हैं।

सभी फ़िल्म देखते हैं और फ़िल्म देखकर हॉल से बाहर आ जाते हैं।

सभी अब फ़िल्म के बारे में बातें करने लगते हैं।

लेकिन प्रिया का ध्यान न तो मूवी में था न ही उसका ध्यान अब तक इनकी बातों में था।

वो सुबह से ही गुमसुम सी थी।

उसकी तरफ प्रीति का ध्यान जाता है और उससे पूछती है कि वो उदास क्यों हैं?

प्रिया पहले तो कुछ नहीं कहती लेकिन प्रीति के जोर देने पर कहती है-

प्रिया- हमारी छुट्टियां शुरू होने वाली है और पापा का ट्रांसफर हो गया है अब मुझे भोपाल जाना होगा।

इतना कहते ही प्रिया रोने लग जाती है।

इतने में वहाँ सभी आ जाते हैं।

प्रिया शिवा के गले लग जाती है और रुँधे गले से कहती है-

प्रिया- शिवा तुमसे दूर नहीं जाना चाहती बिल्कुल भी नहीं।

शिवा उसे शांत करता है।

शिवा और प्रिया एक दूसरे से प्यार करते थे। जिन्होंने साथ जीने मरने की कसमें खायी थी। साथ चलने की कसमें खाई थी।

प्रीति- अरे प्रिया तो क्या हुआ वहाँ से तू फ़ोन पर तो बात कर ही सकती है शिवा से, फिर परेशान क्यों होती है?

प्रिया (रुँधे गले से)- तुम नही समझोगी प्रिया।

(शिवा से) मुझे कहीं ले चलो शिवा प्लीज।

शिवा कुछ नहीं कहता बस देखता रहता है प्रिया को।

अमन- ये सब छोड़ो रोना धोना। ये बताओ मैंने कहा था कि इस बार छुट्टियों में मेरे गांव ग्वाड़ चलो। क्या कहते हो चलें?

प्रिया- मैं नही आ सकती।

श्वेता- क्या पागल हो गयी है तू हम सब तो जा रहे हैं तो भी चल न यार। शिवा भी जा रहा है देख (वो शिवा की तरफ उसको मनाने के लिए देखती है)

शिवा- ह..ह..हां हां।

श्वेता- देख ले।

अमन- अरे चलो तो फिर वहाँ देख लेंगे की तुम दोनों को आगे क्या सोचना चाहिए।

अरमान- तो ठीक है सब पैकिंग करके आ जाना संडे को सुबह निकलते हैं।

अमन- हां सब आ जाना तैयार होकर। वहाँ जाने के लिए बस नही मिलती है काफ़ी दूर का रास्ता भी है। ट्रैकर से जाना होगा जल्दी आना।

सभी वहां से अलग होते हैं इस वादे के साथ कि संडे को सब ग्वाड़ के लिए निकलेंगे। संडे सुबह सभी मिलते हैं और एक ट्रैकर बुक करते हैं और ट्रैकर चल पड़ता है। सफर लंबा होने की वजह से ज्यादा देर तक कोई जग नही रह पाया और सभी सो गए। पहाड़ो के मध्य गुजरते कई सुंदर जगहों को कोई और नहीं देख पाया सिवाय प्रिया के…. उसके मन मे कई सवाल थे जो कि इस सफर में उसके हमसफर थे।

शिवा भी जाग रहा था लेकिन वो चुप था । स्टेशन पर पहुँचते ही सब ट्रैकर से उतरते हैं।

अमन – चलो यारों अब पैदल चलने की बारी है।

श्वेता- अबे ये क्या था यार, एक तो इतना लंबा सफर ऊपर से अब पैदल भी चलना है। पहले कह देते मैं आती ही नहीं।

अरमान- चल रे मोटी कब तक यहाँ स्टेशन पे रहेगी। चलो यार रात होने से पहले पहुंचना भी है।

सभी बिना कुछ सवाल जवाब किये चलने लगते हैं। शिवा और प्रिया कुछ दूर चलते हुए उनके पीछे पीछे आ रहे थे।

सभी रात को ग्वाड़ पहुंचते हैं। अमन का घर वैसे तो ज्यादा बड़ा नही था लेकिन उसमें चार कमरे सटे हुए थे। उसके घर में कोई नही रहता था, उसके चाचा थे जो कि अलग मकान में रहते थे।

सभी अमन के घर के आंगन में पहुंचते हैं।

अमन- तुम लोग यहीं रुको मैं अभी चाभी लेकर आता हूँ।

अमन अपने चाचा के घर जाता है जो पास में ही था।

अमन- नमस्ते चाचा जी।

सुरेंद्र- नमस्ते बेटा नमस्ते। कब एई तू ( कब आया तू)?

अमन- बस चचा अभी अभी। उ दोस्त छन इंतज़ार कन्ना चाबी लेकि जोन्दू भोल आलू फिर तब( वो दोस्त इंतज़ार कर रहे हैं तो अभी चाभी लेकर जाता हूँ कल आऊंगा फिर अब)।

सुरेंद्र- खाणु खाणु एई (खाना खाने आना)।

अमन- अच्छा चचा।

अमन चाभी लेकर वापस अपने घर जाता है और सबको उनका कमरा बताता है। सभी फ्रेश होकर अमन के चाचा के यहाँ जाते है और डिनर करके वापस अमन के घर आ जाते हैं। सभी अपने अपने कमरे में जाते हैं थकान इतनी थी कि सब बिना बातें किये सो जाते हैं।

सुबह सुबह अमन के चाचा का लड़का बंटी सबके लिए चाय लेकर आता है, जिससे सबकी नींद टूटती है।

अरमान जो सबसे पहले उठ चुका था।

अरमान- बंटी ये बता भाई कि यहाँ घूमने लायक कोई जगह भी है नजदीक ही जहाँ कोई जाने में भी डरता हो?

बंटी- अमन भैया को काफी पता है।

अरमान- अरे वो कह रहा था कि वो ज्यादा नही जानता यहां के बारे में।

बंटी- पता नहीं लेकिन यहाँ से कुछ दूर एक महल है जो पहाड़ के ऊपर है लेकिन वहाँ जाना मना है मैं भी नही गया कभी भी।

अरमान- अच्छा।

बंटी चाय दे कर चला जाता है। सभी लोग तैयार होकर नाश्ता वगैरह करने के बाद-

अरमान- अमन तूने बताया नहीं कि यहाँ एक महल भी है?

अमन- अबे हल्ला मत कर चुप हो जा… अगर किसी को पता चल गया कि हम लोग महल जा रहे है तो यहाँ दिक्कत आ जायेगी भाई… कोई जाने नही देगा।

अरमान- क्यों भाई ऐसा क्या है यहाँ?

अमन – रास्ते में बताऊंगा। अभी चलो घूमने चलते हैं।

सभी महल की ओर निकल पड़ते हैं।

प्रीति- अब तो बताओ अमन।

अमन-मुझे ज्यादा तो पता नही है क्योंकि कोई भी महल के बारे में बात नही करना चाहता लेकिन कहते हैं कि आज से 500-600 साल पहले यहाँ एक नरभक्षी जनजाति रहा करती थी तब यहाँ का नाम धूम्र गढ़ हुआ करता था। यहां के राजा बलभद्र सिंह ने इस नरभक्षी जनजाति के सभी लोगो को मार दिया और जो बच गए थे उनको अपने महल में एक कोठरी में दफना दिया था।

लेकिन उसके बाद कहा जाता है कि कुछ सालों बाद ये नरभक्षी जिंदा हुए और राजा का पूरा वंश खा गए लेकिन फिर इनका क्या हुआ कोई नही बताता। बस इतना कहा जाता है कि यहाँ नही आना है क्योंकि यहाँ उनकी आत्माएं हैं।

अरमान, प्रीति और श्वेता जोर जोर से हँसने लगते हैं ।

प्रिया- हँसना नही चाहिए क्या पता ये सब सच हो।

शिवा- अरे ये सब बकवास होता है कुछ नही होता ऐसा, क्या ये आत्मा होती तो अब तक किसी को जिंदा भी छोड़ती। हद है यार इन गंवारों के लिए।

अमन उसे घूरता है।

शिवा- माफ कर दे भाई । मतलब था कि जो भी ऐसी बाते करते हैं।

अरमान- सही कह रहा है शिवा।

बाते करते करते ना जाने कब वो महल पहुंच भी गए किसी को पता भी नही चला।

प्रीति- वाह कितना सुंदर महल है।

श्वेता- कितने ठाट रहे होंगे उस राजा के।

अरमान- हां अगर राजा यहाँ से एक नजर भी मारता होगा तो देखो उसको कितना दूर तक दिखाई देता होगा। वह कितनी सुंदर जगह पर बना है।

प्रीति- तुम भी एक महल बना दो मेरे लिए?

अरमान- अबे हट मोटी।

श्वेता- हाहाहा।

राजा का महल जो अब खण्डहर बन चुका था लेकिन उसकी आधी बची इमारतें और ऊँचे ऊँचे टीले उसकी खूबसूरती को बताने के लिए काफी थे। चारों कोनों तरफ ऊँचे ऊँचे टीले थे और बीच मे महल का मुख्य भाग था। चारों ओर ऊँची दीवारें थी मध्य में एक झाड़ियों से भर छोटा मैदान था जो शायद आंगन जैसा रहा होगा, बाकी जगह पत्थर बिछा हुआ था।

सभी इधर उधर घूमने लगे।

प्रीति- अरे शिवा और प्रिया कहां गए?

अमन- क्या पूछ रही है तुझे पता नहीं है वो कहाँ गए हैं? होंगे कहीं अकेले बात करते हुए आखिर उनको बात करने का टाइम भी तो नही मिल पाया है।

श्वेता- अमन सही कह रहा है उन्हें अकेले रहने दो हम अलग घूमते हैं।

प्रिया और शिवा उनसे दूर महल के एक चारों तरफ पत्थरो से बने एक ऊँचे स्थान पर बैठे हुए थे, जिसके चारों कोनों पर एक-एक पत्थरों से बने छोटे स्तंभ थे और वो दोनों उनके बीच मे बैठे हुए थे।

शिवा- काश में तुम्हारे लिए ऐसा ही एक महल बना पाता।

प्रिया- मुझे ऐसे ईंट पत्थरों से बना महल नही चाहिए।

शिवा- तो क्या चाहिये तुम्हें?

प्रिया- तुम्हारा साथ बस। तुम जहाँ रखोगे वही मेरे लिए महल होगा।

शिवा- जानती हो न अभी हम इतने बड़े भी नही हुए हैं कि अलग रह सकें तो ऐसी बाते मत बोला करो हर समय।

प्रिया- क्यों न बोलूं, क्या तुम मेरे साथ नहीं रहना चाहते?

शिवा- तुम समझती नही हो। मैं क्यों नहीं चाहूंगा बताओ।

प्रिया- तो फिर बात क्या है?

शिवा- अभी सही समय नहीं आया है, मुझे अभी पढ़ने में ध्यान लगाना है। फिर जॉब लगा तो तुमसे शादी करूँगा।

प्रिया- तो साथ रहकर भी कर सकते हैं। मुझे भोपाल नही जाना तुमसे दूर बस। तुम्हारे साथ ही रहूंगी अब बस।

तभी वहां अरमान आ जाता है जो टहलते टहलते वहाँ पहुंच जाता है।

अरमान- सॉरी यार तुम्हें डिस्टर्ब कर दिया लेकिन अब शाम होने वाली है तो हमें चलना चाहिए हमारे पास टॉर्च भी ज्यादा नही है और सुना है यहाँ जंगली जानवर भी हैं।

लेकिन इसी बीच उसकी नजर चारों ओर खड़े स्तंभो पर पड़ती है तो अरमान उन चारों स्तंभो में से एक छोटे स्तंभ के पास खड़ा हो जाता है।

अरमान- कैसे हो तुम लोग हमें यहाँ बुलाया भी नहीं। ये देखो इन खम्भों में ये बुक जैसी क्या है!

अरमान जोर से चिल्ला कर सबको वहाँ बुलाता है। जब वहाँ सब पहुंच जाते है प्रिया और शिवा भी ये सब देखकर चकित थे।

खंभे पर एक पुस्तक रखी गयी थी जिसके पेज ताम्रपत्र के बने हुए थे और जिसके चारों ओर संस्कृत भाषा में “ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम् क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट् स्वाहा।” भूत बाधा मंत्र उकेरा गया था।

अरमान उस बुक को खोलता है और पढ़ना ही शुरू करता है कि प्रीति उसे रोक देती है।

प्रीति- तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? दिख नही रहा है क्या अजीबोगरीब मंत्र लिखा हुआ है इसमें।

अरमान- कुछ नही होता। अब क्या काम करेंगे ये मंत्र।

इतना कहकर वो बुक खोलने की फिर कोशिश करता है की तभी शिवा उसे रोक देता है।

शिवा- पागलो जैसे काम मत कर बुक को बंद ही रहने दे अगर गांव वाले मन करते हैं तो जरूर कोई तो बात होगी।

अमन- अरमान दिमाग मत कर खराब और रहने दे इसे ऐसे ही। चल घर चलते हैं।

अरमान- अरे यार अच्छा रुको मुझे ये मंत्र तो पढ़ने दो की आखिर लिखा क्या है इस बुक के चारों ओर के मंत्र में।

अरमान मंत्र को जैसे जैसे मंत्र को पढ़ता जाता है, आसमान का रंग बदलता जाता है, बादल आसमान को घेर लेते हैं, आसमान का रंग काला हो जाता है। जैसे ही मंत्र पूरा होता है कड़कड़ाहट के साथ खम्भो के बीच के स्थान के पत्थर अलग होते जाते हैं और अंदर एक कमरा दिखने लगता है लेकिन इतने में प्रिया अरमान को एक तरफ खींच लेती है।

प्रिया- तुम लोग का क्या सच मे दिमाग खराब हो गया है। देख नही रहे हो मौसम कैसा हो गया है?

अमन- चलो यार यहाँ से अब तो।

अरमान- अबे क्या बेवकूफ हो तुम लोग? नीचे खजाना हो सकता है।

प्रीति- अरमान प्लीज चलो यहाँ से।

श्वेता- खजाना दिख रहा है तुझे अरमान ये? दिख नही रहा है मंत्र कैसा अजीब सा है और देख ये कैसा मंत्र था केवल एक बार पढ़ा और ये पत्थर खुल गए हैं।

अरमान- अबे तुम लोग समझ क्यों नही रहे हो यार… राजा ने सबको डराने के लिए ऐसा कहा होगा।

शिवा- एक थप्पड़ पड़ने वाली है तुझपर अगर तू चला नही वापस तो।

अरमान- ठीक है चलो। मैं भी किन पागलो के साथ आ गया हूँ।

श्वेता – हां हम पागल हैं पर तू वापस चल।

अरमान जाते जाते बुक उठाना चाहता था लेकिन शिवा ने बुक भी नही उठाने दी और अरमान गुस्से में उनके साथ हो जाता है, सभी रात को घर पहुंचते हैं। अरमान के मन मे अब भी गुस्सा था और वो गुस्से में अपने कमरे में चल जाता है।

अमन- उसे जाने दो उसका दिमाग खराब हो गया है।

शिवा- अब रात बहुत हो चुकी है फालतू इस पर बहस करने से क्या फायदा। चलो सभी सो जाते है कल सुबह नई जगह चलेंगे तो उसका मूड ठीक हो जाएगा।

सभी अपने कमरे में चले जाते हैं, चारपाई पर श्वेता और अरमान बैठे हुए थे और बातें कर रहे थे-

अरमान- अरे कैसे लोग हैं यार इनको इतनी अक्ल नही है कि ये बीसवीं सदी है और ये अब भी भूत पिशाच पर यकीन करते हैं।

श्वेता- वो गलत भी तो नही हैं ना यार। जब गांव वाले नहीं जाते वहाँ तो जरूर कोई बात होगी।

अरमान- गांव वाले तो गंवार हैं जो पुराने जमाने की बातों को आज भी सच मान बैठे हैं। वहाँ जरूर कोई खजाना होगा।

श्वेता- खजाना होता तो क्या गांव वाले उसे ले न चुके होते?

अरमान- राजा ने झूठ फैलाने के लिए ये बात फैलाई होगी न यार।

श्वेता- तुम चुप रहो और सो जाओ।

श्वेता आगे कुछ नही बोलती और सोने चली जाती है। अरमान उसे नही रोकता। सारी रात अरमान खजाने को पाने की इच्छा के चलते सो नही पाता और वो डिसाइड करता है कि वो कल सुबह सबके उठने से पहले महल चला जायेगा। जैसे तैसे रात बीतती है, सुबह सूरज की पहली किरण के साथ बंटी एक बार फिर सबके लिए चाय लेकर आता है, वो सबको चाय पकड़ाता है।

शिवा- (श्वेता से) अरमान को भी बुला दे यार वो कब तक सोएगा अब।

श्वेता- मैं नहीं जाने वाली।

शिवा- अब क्या हो गया तुम्हारे बीच। (अमन से) तू बुला दे यार उसको।

अमन- ठीक है मैं ही ले आता हूँ।

अमन अरमान के कमरे तक जाता है लेकिन दौड़ कर जल्द ही वापस आ जाता है।

अमन- वो कमरे में नही है और आस पास भी नहीं है। श्वेता क्या हुआ था कल तुम दोनों के बीच?

श्वेता- कुछ भी नहीं। वो बस महल को लेकर गुस्सा था सबसे।

शिवा- लगता है उसका दिमाग खराब हो गया है जल्दी करो हमें भी चलना चाहिए उसके साथ ही वो ज्यादा दूर भी नहीं गया है।

अमन- हां तुम लडकियां यहीं रुक जाओ।

श्वेता- नहीं मैं नही रुकूँगी।

शिवा- अरे नहीं ना यार। क्या मैं आता हूँ न यार उसे लेकर।

प्रिया- हमारे आने में क्या है?

शिवा अब मना नही कर पाया। सभी तेजी से महल की ओर निकल पड़ते हैं।

वही उनसे कुछ दूर-

अरमान- उफ्फ कितना लंबा रास्ता है। चलो अच्छा हुआ अब परेशान करने वाला कोई नही है।

अरमान अपना बैग नीचे उतारता है और एक टॉर्च और एक मैग्नीफाइंग ग्लास अपने पास रखता है। एक पत्थर के स्तंभ के पास खड़ा हो जाता है जिस पर वो कल खड़ा हुआ था।

अरमान- यहाँ चार खम्भे एक  जैसे हैं देखता हूँ पहले की आखिर इनमें अंतर क्या है!

अरमान सभी छोटे खम्भों का निरीक्षण करता है।

अरमान- ये सभी एक जैसे हैं और तो और सबके ऊपर एक जैसी बुक रखी हुई है सबसे अजीब बात ये है कि इन सब बुक्स के चारों ओर एक जैसा मंत्र लिखा हुआ है। चलो खैर फिर पड़ता हूँ इस मंत्र को।

अरमान उस मंत्र को दोबारा दोहराता है लेकिन इस बार कुछ भी नही होता है। वो बुक को खोलता है लेकिन उसमें उसे कुछ समझ नही आता। वो बुक को ऐसे ही रखता है।

अरमान- ये क्या हुआ! कुछ भी नही हुआ आगे दूसरी बुक को देखता हूँ अब।

अरमान दूसरे खम्भे तक जाता है और उस बुक को खोलता है लेकिन वो बुक भी पहली बुक की तरह थी जिसे वो समझ नही पाता। लेकिन वो एक बार और जोर से बुक के चारो तरफ उकेरे मंत्र को पढ़ता है और आसमान फिर काला होने लगता है बदल घुमड़ने लगते हैं। अरमान खुश हो जाता है अब वो एक एक करके सभी बुक्स के किनारे उकेरे हुए मंत्र को पढ़ने लगता है।

लास्ट बुक के किनारे को जैसे ही पढ़ना खत्म करने ही वाला था कि उसे एक जोर का धक्का लगता है।

अमन- तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या देख नही रह है तू कि ये क्या हो रहा है। देख अपने चारों तरफ ।

अरमान इधर उधर देखता है तो पता है कि आसमान पूरी तरह काला हो चुका था और हवाएँ बहुत तेज चलने लगी थी जो झाड़ियां महल में उग आए थी वो बेतहाशा तेज हवाओं के कारण तेज आवाज करने लगी थी।

अरमान- रुक जाओ न यार तुम्हे किसने बुलाया यहाँ। मुझे मेरे काम करने दो।

शिवा- करने दो इसे काम देखते हैं इसे क्या मिलता है?

अमन- शिवा अब तू भी इसका सपोर्ट कर रहा है?

प्रीति- सपोर्ट की बात नही है। जब वो मान नही रहा है तो।

प्रिया- तो क्या हम लोग उसकी गलत बात भी मान जाएं?

अरमान इस बीच मौके का फायदा उठाकर अंतिम खम्भे पर लिखा हुआ अंतिम मंत्र भी पढ़ लेता है। अमन उसे देख लेता है और उसे एक जोरदार धक्का अरमान को देता है जिससे खम्भे में रखी बुक अरमान के हाथ मे रह जाती है। एक जोर की खटाक की आवाज से चारों खम्भो के बीच बना फर्श पूरी तरह खुल जाता है और मौसम शांत हो जाता है। धक्के से अरमान को थोड़ी चोट आ जाती है।

अरमान (कराहते हुए)- आह। देख लो मूर्खों कुछ भी नही हुआ। फालतू का ड्रामा आता है तुम लोगों को।

सभी का ध्यान अब अंधेरे कमरे में थी जो कि फर्श के हटने से बनी थी।

अरमान- देख लो देख लो। अब यहाँ अंदर खजाना जरूर होगा और मैं तुम लोगों में से उसे किसी को भी नहीं दूँगा।

शिवा- ये सब क्या है यार।

अमन- वाह यार मस्त है ये तो।

प्रीति- मुझे ये ठीक नहीं लग रहा है।

प्रिया- प्रीति ठीक कह रही है।

अरमान- जिसे जाना है जाओ।

अरमान अपनी जेब मे रखी टॉर्च को जलाता है और अपना बैग उठाकर अंधेरे कमरे में कूद जाता है।

अरमान- अबे यहाँ काफी कमरे हैं  आ जाओ नीचे।

अमन- चलो चलते हैं।

शिवा- चलो।

श्वेता- नहीं मैं नही आऊँगी।

अमन- सब चलो।

इतना कहकर अमन और अरमान कमरे में उतर जाते हैं। उनके पीछे पीछे सबको जाना पड़ता है।

सभी अंदर पहुंचकर-

अमन- अरे ये क्या है भाई काफी सारे कमरे हैं यहाँ तो।

प्रीति- इनको अगर एक एक करके देखा जाएगा तो काफी टाइम लग जायेगा। अरे लेकिन ये बताओ अरमान कहाँ है?

श्वेता- उसकी अभी आवाज आई थी यहीं होगा। पहले उसे ढूँढो सब।

इतना कहते ही श्वेता की आंखों में आँसू आ गए। सब अरमान को जोर जोर से आवाज देने लगे उसे ढूंढने लगे। ढूंढते ढूंढते शाम होने को आयी थी। तभी प्रीति की चीख निकल जाती है। सभी उसे ढूंढते ढूंढते उस तक पहुंचते हैं।

शिवा- क्या हुआ प्रीति तुम चिल्ला क्यों रही हो?

प्रीति एक तरफ इशारा करती है जहाँ अरमान बेहोश पड़ा था। पानी अरमान के मुँह पर मारा जाता है, जो अरमान के बैग में रखी बोतल में ही था। अरमान धीरे धीरे अपनी आंखें खोलता है।

शिवा- क्या हुआ था अरमान? तुम बेहोश क्यों हुए?

अरमान अपनी टॉर्च की रोशनी एक तरफ करता है, जहाँ केवल हड्डियों का ढेर पड़ा हुआ था। जिसे देखकर सभी के होश उड़ जाते हैं।

अमन- जरूर ये हड्डियां नरभक्षियों की होगी। गांव वाले सही कहते होंगे फिर तो हर बात। जल्दी निकलो यहाँ से अब तो।

प्रीति- अमन सही कह रहा है चलो सब यहां से।

शिवा- सही है सब बाहर की ओर भागो।

सभी तेजी से बाहर की ओर भागते हैं। जैसे तैसे गिरते पड़ते वो लोग चारो खम्भों के बीच वाले फर्श तक पहुंचते हैं। सब तेजी से बाहर निकलते हैं लेकिन अरमान जैसे ही चढ़ने वाला होता है अचानक वो फर्श कड़कड़ाहट की आवाज से बंद होकर पहले के जैसे जुड़ जाता है। श्वेता जोर जोर से रोने लग जाती है। कुछ ही पलों के भीतर फर्श के पत्थर फिर खुल जाते हैं और अमन टॉर्च नीचे देखने के लिए करता है। सभी टॉर्च की रोशनी में देखते हैं कि अरमान का अध खाया शरीर जमीन पड़ा हुआ था। जिससे खून लगातार बह रहा था। श्वेता बेहोश हो जाती है जिसे अमन मुश्किल से गिरने से बचाता है।

शिवा- भागो सब यहाँ से यहाँ रुकना ठीक नहीं है। चलो कोई रुको मत ।

अमन जल्दी से श्वेता के मुँह पर पानी मारता है जिससे वो होश में आती है लेकिन फिर रोने लग जाती है।

प्रीति-  मैंने पहले ही कहा था मुझे ये सब सही नही लग रहा है। तुम लोगो की ही गलती है ये।

प्रिया- अभी लड़ने का टाइम नही है जल्दी करो और भागो यहाँ से।

फर्श के अंदर से हइहीहीही… हइहीही…… की आवाजें आने लगी। भागने की जल्दबाजी में प्रीति का पैर मुड़ गया।

प्रीति- आह।

अमन उसे उठाने की कोशिश की लेकिन प्रीति के शरीर से खून निकलने लगे गया था। अमन डर गया था वो थोड़ा सहम गया। तभी प्रीति के पैर से मांस का एक टुकड़ा हवा में ही उसके शरीर से अलग हो जाता है। प्रीति के मुँह से भयंकर चीख निकल गयी। धीरे धीरे उसके पैरों फिर पीठ से मांस के लोथड़े अलग होने लगे और चीखते चीखते दर्द से प्रीति मर जाती है। अमन ने आगे कुछ नही सोचा और भागने लगा।

हइहीहीही… हइहीही…… की आवाज और तेज होने लगी।

अमन बहुत तेज दौड़ने लगा लेकिन दौड़ते दौड़ते उसके शरीर से मांस के लोथड़े निकलने लगे गए। अभी श्वेता, शिवा और प्रिया ज्यादा दूर भी नही गए थे कि श्वेता थकने लगी वो थोड़ा रुककर बैठ गयी।

शिवा- रुको मत अब घर नजदीक ही है जल्दी चलो।

प्रिया- अमन और प्रीति दिखायी नही दे रहे हैं।

शिवा- वो आ रहे होंगे। जल्दी चल प्रीति खड़ी उठ।

श्वेता – मुझसे चला नही जाता। प्लीज कुछ देर रुको।

प्रिया- अब घर पहुंचकर ही रुकेंगे श्वेता खड़ी हो जाओ। भगवान के लिए चलो।

हइहीहीही… हइहीही…… की आवाजें नजदीक आने लगी जो और डरावनी हो गयी थी।

शिवा ने श्वेता को जबरदस्ती खड़ा किया।

शिवा- भाग जल्दी।

तीनो फिर से भागने लगे गए लेकिन थकान की वजह से श्वेता की रफ्तार कम होने लगी। अचानक से श्वेता का सिर गिर कर पहाड़ी से नीचे लुढ़कने लगता हैं। जो लुढ़कते हुए शिवा और प्रिया से आगे निकल गया।

पीछे से आवाज आयी-

“हर्रर्रर्र हर्रर्रर्र एक एक मांस का टुकड़ा जरूरी है बर्बाद मत करो”

शिवा ने पीछे देखा तो कुछ बिना खाल के मांस के लोथड़ों से बने साये दिखायी देने लगे थे। अब शिवा पीछे नही देखता और और तेज भागने लगता है। भागते हुए शिवा का पैर एक पत्थर में फंस गया और वो बहुत जोर से जमीन पर गिरा और उसने पीछे देखा तो वो मांस के लोथड़ों से बने साये उसके काफी नजदीक आ गए थे।

शिवा- प्रिया पीछे मत देखना जल्दी भागो।

प्रिया शिवा की आवाज में उसका दर्द पहचान गयी और वो एकदम से रुक गयी और पीछे शिवा के पास आ गयी।

शिवा- यहाँ मत आओ प्लीज। मेरे पीछे देखो वो अजीब से साये पास आ गए हैं। भाग जाओ यहाँ से।

गिरने से शिव का सिर फट गया था और उसके सिर से खून बहने लगे गया था।

शिवा- प्लीज चली जाओ।

प्रिया (अपने आँसू पोंछते हुए)- शिवा शायद यहीं तक हमारा सफर था लेकिन याद रखो तुम्हे मेरा ही होना है अगले जन्म में।

शिवा ने पीछे देखा तो वो साये हइहीहीही… हइहीही .. करते हुए बहुत पास आ गए थे।

शिवा- प्लीज भाग जाओ यहां से प्लीज।

प्रिया- एक बार आई लव यू बोल दो प्लीज।

शिवा की आँखों से आंसू बहने लगे।

प्रिया- प्लीज बोल दो। मुझे चैन मिल जाएगा प्लीज बोल दो, चैन से मरना है मुझे।

शिवा- आई लव यू।

शिवा और प्रिया के शरीर से वो साये आकर लिपट गए और उनकी चीखों से जंगल दहल उठा।

“वर्षों के बाद आज मौका मिला है…. “

“जी भर के आनंद उठाओ…”

हइहीहीही… हइहीही…….हइहीहीही

हंय……. हंय………….. हंय…

वर्तमान-

ग्वाड़ गांव में सुबह आस पास के गांव से बहुत से भीड़ जमा हो गयी। सब उन अधखाई लाशों के बीच किसी को देखने लगे कि कहीं कोई बचा तो नही है लेकिन कोई जिंदा नही था।

सुबह पुलिस भी गांव पहुंच गई। सभी शवों को जलाने की व्यवस्था कर दी गयी। पुलिस ने अपने स्तर पर खोजबीन की।

सभी से उनके बयान लिए गए लेकिन पुलिस किसी नतीजे पर नही पहुँची। कुछ पुलिस वाले वहीं आस पास के गांव वालों की सुरक्षा के लिए वहीं रुक गए। गांव के बड़े बुजुर्गों में डर था, उसी बात का डर जो उन्होंने अपने पूर्वजों से सुनी थी।

पूरे दिन सभी आस पास के गांवों में इसी बात की चर्चाएं आम थी कि कहीं ये वही सब फिर से शुरू तो नही हो गया।

कठूड गांव-

आज अतिरिक्त सुरक्षा हेतु गांव वालों द्वारा  दरवाजे को और मजबूती से बांधा गया था। पुलिस भी गश्त दे रही थी। रात होते ही जंगल मे चहलकदमी शुरू हो गयी जंगल मे भयानक आवाजे आनी शुरू हो गयी। जंगल से आती वीभत्स आवाजो ने पुलिस और गांव वालों को डरा दिया…. वो आवाजें नजदीक आती गयीं।

जंगल मे-

हइहीहीही… हइहीही…….हइहीहीही

हंय……. हंय………….. हंय…

“जल्द ही हम अपना स्वरूप प्राप्त कर लेंगे”

“इस बार हमें कोई नही रोक सकता कोई नही”

“चलो दावत उड़ाई जाए”

हइहीहीही… हइहीही…….हइहीहीही

गांव के नजदीक पहुंचते ही इनकी आवाजों और सरसराहट ने गांव वालों को भयंकर भयभीत कर दिया। कुछ साये जिनसे मांस के लोथड़े लटक रहे थे अब वो नजर आने लगे थे। पुलिसवालों ने उन्हें देखते ही गोलियां चलानी शुरू कर दी लेकिन किसी पर भी असर न हुआ। वो साये एकदम से एक पुलिस वाले के नजदीक आये और उसे उठा के चीर दिया। उसके शरीर से मांस नोचते हुए खाने लगे। तांडव शुरू हो चुका था सभी साये हर एक घर में घुसते गए चीखों से पूरा वातावरण दहल उठा। सुबह फिर वही लाशों के ढेर था, अधखायी लाशों के ढेर। 

दूसरे गांव के ही एक बुजुर्ग ने देखा ये वीभत्स नजारा तो उनसे देखा ना गया।

बुजुर्ग- यु त हुण ही छौ। लगदु च फिर ह्वेगी व्यि सब शुरू। (ये तो होना ही था लगता है वो सब फिर से शुरू हो गया)

एक अन्य आदमी- बकवास मत करो यार। इन्हें चुप कराओ कोई यहाँ इन सब शवों को उठाने में मदद करो और इनका अंतिम संस्कार करने में आगे आओ।

बुजुर्ग- बहुत समय पहले की बात है जब राजा बलभद्र सिंह ने

सिंह ने सभी नरभक्षियों को अपने महल के बीचों बीच जीवित दफना दिया था तो नरभक्षी भूख प्यास और बिना हवा के वहाँ मर गए….

एक नवयुवक- इस बुड्ढे का मुंह बंद करवाओ, बचपन से यही कहानी सुना रहा है।

एक और नवयुवक- इस बुड्ढे को कभी नही दिखता की कब क्या कहना चाहिए। इसे यहाँ ये नही दिख रहा है कि हम किस भय में जी रहे हैं।

बुजुर्ग- जब नरभक्षी सारे मर गए तो उनकी आत्माएं महल में ही तांडव करने लगी… समय के साथ साथ वो आत्माएं और शक्तिशाली होने लगी..

नवयुवक- बुड्ढे चुप हो जा चुप हो जा। इस दुख की घड़ी में भी अपना ये राग मत गा।

तभी गांव में कुछ लोग आते हैं जिन पर कहा जाता था कि कोई गांव की रक्षा के लिए देवी देवता आते हैं (पश्वा)।

उनमें से ही एक आदमी- बाबा जी सही कह रहे हैं ये किसी जानवर या फिर इंसानो का काम नही है, ये सब आत्माओं के काम हैं, बहुत शक्तिशाली आत्माओं के काम।

दूसरा आदमी- इनको कैसे रोका जाए ये सोचना होगा वरना ये धीरे धीरे सबका नाश कर देंगे। बाबाजी आप बोलो जो भी कहना चाहते हो।

नवयुवक- ये कहानी हमेशा से सुनते आ रहे हैं आज तक तो कुछ हुआ नही तो आज कैसे हो जाएगा ये सब।

आदमी- चुप रहो। और कहने दो बाबा जी जो कहना चाहते हैं।

बुजुर्ग- (बाबाजी आगे बोलना शुरू करते हैं) “जैसे जैसे वो आत्माएं शक्तिशाली होने लगी उन्होंने महल में रक्तपात प्रारम्भ कर दिया। महल में आये दिन एक एक करके कोई न कोई मरने लगा। महाराज बलभद्र सिंह के प्रपौत्र महाराज मणिभद्र सिंह के आते आते उनका हत्याओं के सिलसिला चलता रहा लेकिन अब हत्याएं जल्दी जल्दी घटित होने लगी।”

“सभी हत्याएं रात के अंधेरे में ही घटित होती थी कभी किसी को सुबह मरते हुए नही देखा गया था।”

“पहले तो मणिभद्र सिंह ने भी इसे अपने बाप दादाओं की तरह ही इसे केवल बाघ और गुलदारों का हमला ही माना लेकिन जैसे जैसे मरने वालों की संख्या में बढ़ोतरी होने लगी उन्हें अंदेशा हुआ कि ये जरूर किसी ऊपरी ताक़त का हाथ है।”

“इसीलिए महाराज मणिभद्र सिंह ने अपने राज्य के सबसे बड़े तांत्रिक से ही इसका उपाय करने को कहा।

तांत्रिक ने जो खुद को भैरव का पश्वा बताता था, ने ऐसी व्यवस्था करने की कोशिश की कि नरभक्षी आत्माएं महल को हानि न पहुंकि सके।”

“लेकिन तांत्रिक आत्माओं को कमजोर समझने की भूल कर बैठा।”

“लेकिन इससे नरभक्षी आत्माओं को क्रोध चढ़ आया और उसी रात नरभक्षी आत्माएं पूरे महल में तांडव करती हुई सभी को लील गयी। महाराज मणिभद्र सिंह की भी मृत्यु हो गयी।

महल में कोई भी ना बच सका सबको बड़ी निर्ममता से नरभक्षी आत्माएं खा चुकी थी।”

“तांत्रिक को अपनी भूल का बहुत पश्चाताप हुआ। उसने आस पास के कई पश्वाओं को बुलाया और आधी रात को नरभक्षी आत्माओं को बड़ी मशक्कत के बाद महल के बीचोबीच बनी कोठरी में जहाँ नरभक्षियों को महाराज बलभद्र सिंह ने दफनाया था, वहीं कैद कर लिया और उसके चारों ओर चार स्तंभ लगा दिए जिनमें भूतबाधा मंत्र और भूतबाधा मंत्रो की किताब स्थापित कर दी गयी वो चारों स्तंभ चारों अलग अलग दिशाओं में स्थापित किये गए और सब आस पास के गांवों में ये कहलवा दिया कि कभी भी किसी भी दशा में महल ना जाएं।”

“यदि एक बार आत्माएं फिर से अपना शरीर पा गयी तो फिर उन्हें रोकना नामुमकिन हो जाएगा”

“तब से कोई भी उस महल में नहीं गया लेकिन इतने सालों बाद वो फिर वापस आ गए हैं”

एक आदमी- तो अब वो नरभक्षी वापस आ गए हैं?

नवयुवक- पागल हो गया है ये बुड्ढा।

आदमी- बाबाजी की कहने को अगर सच मान लिया जाए तो अब कौन है यहां इतना बड़ा तांत्रिक?

बुजुर्ग- पहले खुद को बचाओ आज। शाम होने में कुछ ही टाइम बचा है।

जो पश्वा आये थे उनमें से एक-

“ बाबा जी सही कहते हैं सबसे पहले इसकी व्यवस्था की जाए फिर आगे देखेंगे। इससे कम से कम ये पता भी चल जाएगा कि क्या ये सब वही हैं या नहीं”

नवयुवक- जो करना है करो।

सभी पश्वा ये निश्चित करते हैं कि आज पूजा होगी और शाम को देवताओ को खुश करने के लिए पशुबली दी जाएगी। पूजा गांव वालों के एक संयुक्त पूजा स्थान पर की जानी थी, दोपहर में ही पूजा शुरू कर दी गयी, देवताओ को प्रसन्न करने के लिए बलि भी दी गयी। गांव में ही एक स्थान पर आग जलाई गई और ढोल दमाऊं की थाप पर एक मुख्य पूजा करवाई गयी।

एक पश्वा पर देवता आया और वो बोला-

“इससे कुछ नही होगा तुम केवल आज के लिए सुरक्षित रह पाओगे, कल सुबह होते ही तुम्हे उसी तांत्रिक के वंशज को ढूंढ के लाना होगा जिस पर भैरव आता हो, वही तुम्हें मार्ग दिखायेगा और तुम्हें उसके साथ मिलकर फिर से नरभक्षी आत्माओं को वहीं बंद करना होगा जहाँ वो दफन हैं।”

“इसके लिए तुम्हें कल सुबह ही एक पूजा करनी होगी जिसमें इक्कीस जोड़ी ढोल दमाऊं के साथ तुम्हे मंत्रोच्चार करते हुए महल तक जाना होगा और आत्माओं को वहीं बंधक बनाना होगा।”

इतना कहते ही पश्वा से देवता अंतर्ध्यान हो गया।

इसके बाद पश्वा शाम को ही तांत्रिक के वंशज को ढूंढने निकल पड़ते हैं जो जीवित था लेकिन गांव छोड़ चुके था। शाम ढलते ढलते सभी गांव वालों के मन मे भय था और उन्हें ये डर भी था कि अगर कहीं वो तांत्रिक नहीं मिला तो क्या होगा। शाम ढलने को आयी…. सभी गांववाले एक साथ वहीं एक मैदान में एक साथ बैठ गए जहाँ पूजा चल रही थी। जंगल मे सरसराहटें होने लगी लोहा ने एक दूसरे को पकड़ लिया। एक तेज झोंका हवा का आया और सभी नरभक्षी आत्माएं पूजा स्थल से कुछ ही दूर दिखने लगीं। सब लोगों को साक्षात मौत दिखने लगी थी। नरभक्षी सायों ने बहुत कोशिश की लेकिन वो पवित्र स्थान में प्रवेश नहीं कर पाए। गांववालों ने डरते हुए बिना सोए पूरी रात गुजारी। सुबह होते ही पश्वा तांत्रिक के वंशज को ले आते हैं। पूजा स्थान पर ही ढोल दमाऊं के साथ पूजा फिर से प्रारंभ की जाती है। दिन भर ढोल दमाऊं की थाप पर सभी विधि विधान सम्पूर्ण किये गए। इतने सारे ढोल दमाऊं के एक साथ बजने से वातावरण में एक कम्पन होने लगा। तांत्रिक में भैरव आने लगा और उसने सभी गांववालों को अपने साथ महल की ओर चलने को कहा। सभी गाँववाले पेशवाओं और तांत्रिक(भैरव) के पीछे पीछे चलने लगे। ढोल दमाऊं भी बजते हुए जा रहे थे और मंत्रोच्चार भी साथ ही साथ चल रहा था।

“ॐ ह्रीं श्रीं चक्रेश्वरी, चक्रवारुणी,
चक्रधारिणी, चक्रवे गेन मम उपद्रवं
हन-हन शांति कुरु-कुरु स्वाहा।”

धीरे धीरे शाम होने लगी…. लेकिन अभी तक सभी लोग महल के आधे रास्ते को भी पर नहीं कर पाये थे। महल से अजीब अजीब आवाजे आने लगीं । मौसम खराब होने लगा काले बादलों ने आसमान को घेर लिया। अब रास्ता और भयानक नजर आने लगा। तेज हवाएं चलने लगी जो सरररर सरररर करके कानों के पास से जैसे ही गुजरने लगती थी लोगो की रूह भी कांपने लग जाती। महल की तरफ जैसे जैसे लोग बढ़ते जाते है वैसे ही आत्माओं की आवाज बढ़ती जाती है जो कि ढोल दमाऊं की ढम ढम में और भयंकर लगने लगी थी।

“ॐ ह्रीं श्रीं चक्रेश्वरी, चक्रवारुणी…….”

मंत्र भी लगातार बोला जा रहा था।

कुछ ही देर में गांववालों को महल की दिशा से उनकी तरफ तेजी से पेड़ उखड़ते दिखे और साथ में कुछ आदम कद आकृतियां आती दिखी जिनसे मांस के लोथड़े लटक रहे थे।

नरभक्षी आत्माएं

“हइहीहीही… हइहीही…….हइहीहीही”

“हइहीहीही… हइहीही…….हइहीहीही” करती हुई बढ़ती चली आयी।

“💬 अर्रर्रर्रर तुम लोग अब नही बच सकते अर्रर्रर्रर आज हम सबको एक साथ खाकर अपनी सदियों से चली आ रही भूख को मिटायेंगे अर्रर्रर्र💬”

“💬अर्रर्रर्रर किसीको मत छोड़ना अर्रर्रर्रर सबका नाश करदो 💬“

हइहीहीही… हइहीही…….हइहीहीही

हइहीहीही… हइहीही…….हइहीहीही

हंय……. हंय………….. हंय…

गांववालों में दहशत छा गयी। तांत्रिक सबको शांत करता है।

तांत्रिक – डरो मत हम सब नजदीक पहुँच गए हैं। सभी ढोल वाले कोनों पर चले जाओ और ढोल वहीं से बजट रहो कुछ नही होगा। ध्यान रहे कोई पीछे न छूटे।

ढोल वालों ने सबको घेर लिया और वहीं से ढोल को और जोर जोर से बजाने लगे। पूरे वातावरण में ढोल की ढम ढम ढम की आवाज गूँजने लगी।

ॐ ह्रीं श्रीं चक्रेश्वरी, चक्रवारुणी…..

ढोल की थाप के साथ साथ बोले जा रहे मंत्रो ने नरभक्षी आत्माओं को क्रोधित कर दिया और उन्होंने सब गांववालों हर ओर से घेर लिया।

नरभक्षी आत्माओं की आँखों की कोटर (जिनमे आँखे नही थी) लाल हो चुके थे और जो भी उनको देखता वो सिहर जा रहा था। आत्माओं ने जोर जोर से आवाज निकालना शुरू कार्ड दिया। तांत्रिक अब और तेज तेज चलने लगा। इस जल्दबाजी और डर के माहौल में कुछ लोग घेरे से बाहर हो गए। आत्माओं ने उनके बदन के कई टुकड़े कर दिए और उन्हें भीड़ के बीच फेंकते जा रहे थे। जैसे तैसे लोग महल में उसी जगह पहुँचे जहाँ नरभक्षियों को दफनाया गया था। तांत्रिक(भैरव) ने सबको इशारा किया कि वो सभी बाकी पश्वा चारो स्तंभो में खड़े हो जाएं और उसके साथ मंत्रोच्चार करें।

“ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम् क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट् स्वाहा।”

मंत्र बोलना शुरू किया लेकिन काफी देर बोलने पर भी उन्हें कोई अंतर होता हुआ दिखाई नहीं दिया।

गांववालों में से किसीने बोलना शुरू किया-

“अब नहीं बचने वाले हम लोग अब तो ये मंत्र भी काम नही कर रहा है भगवान बचा हमें”

तब किसी और ने कहा-

“ मुझे शहर चले जाना चाहिए था गांव में रहना ही बेकार है”

कोई और कह पड़ा-

“ मुझ पर मेरा पूरा परिवार निर्भर करता है मैं क्यों आया गांव”

तांत्रिक सबको चुप करता है-

“ सब शांत हो जाओ तुम्हे डरने की कोई बात नही है…”

एक स्तंभ पर खड़ा पश्वा बोलता है-

“यहाँ किताब नहीं रखी है मंत्रोच्चार वाली”

तांत्रिक- “उसे ढूँढो किताब में उन सभी नरभक्षियों के बारे में लिखा है इसीलिए वो किताब से आजाद नही जो पाए थे। ढूँढो उस किताब को”

मन्त्रोच्चारण बंद होने से नरभक्षी आत्माओं को मौका मिल गया। महल में एक तूफान आ गया जिससे सभी इधर उधर उड़ने लग गए। सभी आत्माएं गांववालों पर टूट पड़े हर तरफ खून ही खून फैलने लगा। कई लोग मारे जा चुके थे तांत्रिक ने मंत्रोच्चार फिर से शुरू कर दिया। नरभक्षी आत्माएं दर्द से कराह उठीं।

तांत्रिक- मंत्र को बोलते रहो और जल्दी किताब ढूँढो।

काफी मेहनत के बाद किताब हाथ लगी, जिसे फिर से स्थापित किया गया और फिर-

“ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते…………”

मंत्र बोलना शुरू किया गया। आत्माओं की हलचल कम हो गयी। मंत्रोच्चार शुरू होने से आसमान में हलचल फिर से शुरू हो गयी एक अजीब सी रोशनी ने पूरे महल को घेर दिया। स्तम्भों के बीच फर्श के अंदर बने फर्श से एक अजीब हवा का गुब्बार से बाहर निकला और सभी नरभक्षी आत्माओं को अपने साथ लेता हुआ फर्श के अंदर चला गया। फर्श एक झटके से बन्द हो गया और सब कुछ शांत हो गया। चाँद की रोशनी से सारा महल नहा गया। सब कुछ सही हो चुका था। सबके चेहरे पर ये खुशी थी तो अपनो के खोने का गम भी था।

लेकिन अंत भला तो सब भला।

———————समाप्त———————-

 

This story has been written by Devendra Gamthiyal exclusively for Comic Haveli.

14 Comments on “Rahasya”

  1. वाह देवेन्द्र भाई वाह। जितनी तारीफ करूं स्टोरी की , कम है। बहुत ही मजेदार+डरावनी। मुझे तो बहुत पसंद आई बहुत ही ज़्यादा पसन्द आई। दृश्यों को बयान करने का तरीका लाजवाब था आपका, पढ़कर सच मे डर का अहसास हुआ। आप हर तरह की स्टोरी लिखने में माहिर हैं मानना पड़ेगा(नज़र न लगे⚫)

    अब आता हूँ स्टोरी पे–

    जैसा कि कहानी का नाम है “रहस्य” यह सच मे रहस्मयी कहानी है शुरुआत भी रहस्मय तरीके से हुई। स्टोरी में शुरू में लव स्टोरी भी दिखी। शुरू में मुझे लगा कि ये ही सब शिवा और उसके दोस्त मिलकर कुछ करेंगे । पर। उनका रोल तो कहानी शुरू करने के लिए था, एक पल को तो मुझे नही अच्छा लगा यह जब नरभक्षियों की आत्माओं ने उन सभी को मार दिया-लेकिन-शायद यही होना सही था।

    उन सबको मारने के बाद नरभक्षियों की आत्माओं ने खूनी खेल शुरू कर दिया। नरभक्षि आत्माओं का किरदार बहुत ही भयानक और रहस्मयी लगा। पहले ग्वाड़ गांव वीरान हुआ उसके बाद कथूड गाँव।

    अंत मे पश्वों ने एक तांत्रिक के साथ मिलकर उन नरभक्षियों को कैद किया उसमे के गांव वालों की जाने भी गईं पर अंत में सब शांत हो गया।

    नरभक्षियों की आत्माएं एक बार फिरसे कैद हो चुके हैं-हाँ-वो कैद हुए हैं कैद–जैसे पहले कैद थे वैसे फिर कैद हो गए हैं–पूरी तरह खत्म नही हुए हैं , सिर्फ कैद हो गए हैं। और मुझे डर है कहीं वो फिरसे न लौट आएं। हर्रर्र हईहीहीही हईंहीही।

    स्टोरी पूरी तरह रहस्मयी और डरावनी थी कहीं कहीं पर डर के मारे मेरे सर के पीछे के बाल खड़े हो गए। और एक बार सिहरन भी दौड़ गई जिस्म में बुहूहूहू।

    मैं तो कहता हूँ इसका नेक्स्ट पार्ट आना चाहिए या फिर ऐसी ही भयानक कोई और स्टोरी।

    देवेंन्द्र भैया ऐसी ही भयानक स्टोरी लिख कर हमें डराते रहिये। मुझे इंतज़ार रहेगा। इसी बहाने मेरे सर के पीछे के बाल भी खड़े हो जाया करेंगे।

  2. बहुत बढ़िया कहानी है देवेंद्र जी।
    लाजवाब।
    स्थानीय भाषा का प्रयोग इसे और भी रोचक बना देता है।

    1. धन्यवाद भाई।
      गलतियां जैसे कि? स्पेलिंग मिस्टेक्स?

  3. Badhiya story hai Devendra ji, Halanki main thodi badi story ki ummed kar rha tha lekin ye length bhi theek hai.

    1. मैंने छोटी की मुझे लगा ज्यादा लंबी हो गयी है।

      धन्यवाद हर्षित जी

  4. स्टोरी बहुत अच्छी हूं मज़ा आ गया पर कुछ जगह ऐसा लग जैसे स्किप कर दी गयी हो स्टोरी स्थानीय भाषा का प्रयोग बहुत ही अच्छा था बस स्पेल्लिंगस का ध्यान रखिये।

    1. अभी prequel भी आएगा भविष्य में इसका ।

      धन्यवाद मोनी जी

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