Sarvnayak Se Trast Part 10

Virakt Haribhakt's Parmanu

सर्वनायक से त्रस्त (पार्ट 10)

बाँकेलाल का षड्यंत्र

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【प्रथम अध्याय : बांकेलाल युगम के आयाम में】

बाँके का घोड़ा कालिया द्रुतवेग से दौड़ा चला जा रहा था जिसपर बांकेलाल, नागराज और हवलदार बहादुर सवार थे

नागराज : कालिया और तेज़। जल्दी करो इससे पहले की द्वार बंद हो जाये हमे वहां पहुंचना है।

कालिया : “गुर्रर्रर्र अब और कितना तेज़ भागू बे! घोड़ा हूँ वायुयान नही गुर्रर्र। एक तो साले तीन तीन उल्लू के पट्ठे मेरे ऊपर बैठे हुए हैं। इनके बोझ से तो मेरी पीठ धँसी जा रही है बहूहूहू। बाकी दोनों तो सींकड़ी हैं लेकिन यह घसियारा जिसकी खाल घास के रंग की है। कुछ ज़्यादा ही भारी है गुर्रर्रर्र।”

कालिया अपनी पूरी ताकत लगा कर दौड़ रहा था और वो सब घने जंगल मे अंदर की ओर बढ़ रहे थे। धीरे धीरे जंगल बहुत ही घना होता जा रहा था। और तभी नागराज चीख उठा

नागराज : वो रहा! वो रहा द्वार! वो तो छोटा होता जा रहा है। जल्दी और जल्दी।

कालिया अपनी नज़रें घुमाता है इधर उधर। मगर उसे द्वार नही दिखा

कालिया : “मुझे तो कोई बेहूदा द्वार नही दिख रहा है! यह घसियारा सच मे उल्लू का पट्ठा है क्या?”

और तभी नागराज कालिया को तुरंत रुकने का आदेश देता है। कालिया ने तुरन्त पावर ब्रेक लगा दिए। तीनो जल्दी से उसके ऊपर से उतरे

नागराज : जल्दी करो ! हवलदार जी पहले आप घुसो जल्दी!

कहकर नागराज ने हवलदार जी को पकड़ा और हवा में आगे की ओर झुकाकर एक झटका दिया। अगले ही पल हवलदार जी गायब हो गए। बांकेलाल और कालिया की आँखें इस दृश्य को देखकर चौड़ी हो गईं । क्योंकि द्वार उन्हें नज़र नही आ रहा था।

नागराज : बाँकेलाल जी अब आपकी बारी।

बांकेलाल : किन्तु मुझे तो कोई द्वार नही दिख रहा!

नागराज : आपको नही दिखेगा वो सिर्फ मुझे दिखता है।

इधर हवलदार जी युगम के आयाम में। कलियुग टीम के कक्ष में आकर गिरे। वो भी कोबी के ऊपर।

कोबी : गुर्रर्र अबे कउन है बे! खाल में भुस भर देब।

हवलदार जी उसकी गोद मे गिरे थे

कोबी : अरे सदाबहार जी! आप!

हवलदार जी त्योरियां चढा कर उसे देखते हैं

H B : हवलदार!

हवलदार जी कोबी की गोद से उतरे। ध्रुव, शक्ति, तिरंगा और स्टील भी उनके पास आ गए

ध्रुव : अरे ! हवलदार बहादुर जी आप आ गए। नागराज कहाँ है? और क्या बांकेलाल आने को तैयार हुआ?

इससे पहले की हवलदार जी कुछ बोलते। एक धम्म की आवाज़ हुई। और कोबी की चीख सुनाई दी

कोबी : अबे अब कौन बा! झोपड़ी का! गुर्रर्र।

सबने देखा कोबी के सर पर कोई टपका था

ध्रुव, तिरंगा, शक्ति एक साथ : बांकेलाल!

कोबी : काँपेलाल!

कहकर कोबी ने बांकेलाल को अपने सर से उतारा। बांकेलाल जी सबको आंखें फाड़ कर देख रहे थे और वो सब भी बांकेलाल को आंखें फाड़ कर देख रहे थे

इधर नागराज कालिया से विदा लेता है

नागराज : अच्छा चलता हूँ कालिया। तुम यहीं रुककर बांकेलाल का इंतज़ार करो नरम नरम घास खाओ ok बाय।

कालिया : “चल निकल बे घसियारे”

नागराज भी अदृश्य द्वार में कूद गया। युगम के आयाम में कलियुग टीम के कक्ष में। सब अभी बांकेलाल को ही देख रहे थे कि कोबी की एक और चीख सुनाई दी

कोबी : अबे अब कउन है रे। सब हमरे ही ऊपर आके लैंड करत हैं गुर्रर्रर्र।

नागराज कोबी के ऊपर से हटा
जब छमिया नागराज की कलाई में वापस घुसी। नागराज कोबी की तरफ पलटा

नागराज : अबे तो द्वार के पास क्यों खड़ा था बे।

कोबी : गुर्रर्र। देखबे नागराज। तू नागराज है तो इसका मतलब यह नही की मेरे ऊपर राज करे। खाल में भुस भर देता हूँ मैं।

नोट : कोबी जब गुस्से में होता है तो उसके मुंह से हर शब्द शुद्ध निकलता है हीही।

नागराज : अच्छा । तू मेरी खाल में भुस भरेगा!

कोबी : और नही तो क्या।

नागराज : बेटा तू कुछ ज़्यादा ही बोल रहा है। अभी तेरी चड्ढी में नागफनी सर्प छोड़ता हूँ।

तभी जुड़वा नागफनी सर्प नागराज के भीतर से बोलते हैं

नागफनी सर्प 1 : “बहूहूहू हमे क्यों घसीट रिये हो बीच में”

नागफनी 2 : “हमे अपनी ज़िंदगी प्यारी है”

नागराज फुसफुसाता है

नागराज : “अबे डर क्यों रहे हो। चड्ढी में जाने को बोल रहा हूँ। लड़ने को थोड़ी न बोल रहा हूँ।

नागफनी सर्प 1 : बहूहूहू यही तो प्रॉब्लम है..

नागफनी सर्प 2 : उसकी चड्ढी में जाना मतलब…

नागफनी सर्प 1 : कभी वापस न आना।

नागराज : “तुम लोग कहना क्या चाहते हो। आज तक तो तुमलोग किसी की भी चड्ढी में जाने से नही डरे। तो इसकी चड्ढी में जाने से क्यों डर रहे हो?”

नागफनी सर्प 1 : क्योंकि…क्योंकि….

नागफनी सर्प 2 : वो सच मे जंगल का राजा है हीही…

नागफनी सर्प 1 : हीहीही….

नागफनी सर्प 2 : अच्छा तो हुड़ अप्पा चलदे हैंगे सुत्ते…

नागफनी सर्प 1 : गुड नाईट।

नागराज : अबे अबे अबे।

कोबी : हीही क्या हुआ नागराज? आजकल तुम्हे पागलपन का दौरा पड़ रहा है क्या? अकेले में क्या फुसफुसाते रहते हो?

तिरंगा : (स्टील से ) “अबे यह नागराज को आजकल क्या हुआ है। क्या फुसफुसाता रहता है।”

स्टील : “अबे वो जो जुड़वा नागफनी सर्प हैं ना ढोलू भोलू”

तिरंगा : “हाँ”

स्टील : “उन्ही से बाते करता रहता है हीही”

तिरंगा : अच्छा। क्या उन दोनों का नाम ढोलू भोलू है?

स्टील : “नही यार। वो तो मैंने रखा है। ढोलू भोलू हीही”।

तिरंगा : “और नागराज कालिया हीहीही”

स्टील : कालिया??

तिरंगा : “हाँ।”

स्टील : “यह कौन”

तिरंगा : “ऐं!! एक बात बताओ तुमने उन दोनों नागफनी सर्पों का नाम ढोलू भोलू कैसे रखा?”

स्टील : “बस ऐसे ही। मन मे आया और रख दिया”

तिरंगा : “ओह अच्छा। मुझे लगा तुम भी छोटा भीम देखते हो। लेकिन एक बात बताओ। तुम्हे कैसे पता चला नागराज उन दोनों से बात करता है?”

स्टील अपनी आंखों की तरफ इशारा करता है

स्टील : “यह आंखें देख रहा है। यह आंखें नही स्कैनर हैं स्कैनर हीहीही”।

नागराज और कोबी का झगड़ा बढ़ने ही वाला था कि तभी ध्रुव वहां पहुंच गया और उसने दोनों को शांत कराया

ध्रुव : नागराज तुमने जो काम करना था। वो तुमने कर लिया।

ध्रुव ने बांकेलाल की तरफ इशारा किया

ध्रुव : अब आगे क्या करना है। चलो उसपे चर्चा करते हैं।

नागराज : हाँ।

ध्रुव ने सभी को आदेश दिया

ध्रुव : सभी दोस्त अपनी अपनी सीटों पर बैठ जाएं।

और फिर सब टेबल के चारों तरफ लगी कुर्सियों पर बैठ गए

ध्रुव : तो जैसा कि आप लोग देख रहे हैं। यह हैं बांकेलाल जी। हैल्लो बांकेलाल जी आपसे मिलकर खुशी हुई।

कोबी : अच्छा! हीहीही(रहस्यमयी हंसी)

नागराज ने कोबी को घूरा

नागराज : तू चुपचाप बैठा रह बे। वरना बत्तीसी बाहर कर दूँगा।

और फिर ध्रुव ने सबको बांकेलाल जी के बारे में बताया

शक्ति,तिरंगा,स्टील एक साथ : हमे इनके बारे में पहले से पता है।

बांकेलाल : हीहीही। माफ कीजियेगा। परंतु मैने आपलोगों को पहचाना नही।

तिरंगा, स्टील और शक्ति बाँकेलाल को कनखियों से घूरने लगे

ध्रुव : अच्छा तो मिलना मिलाना हो चुका। अब। बांकेलाल जी को तो पता ही होगा कि इन्हें यहां क्यों लाया गया है। है ना नागराज ?

नागराज : हाँ । मैने सब कुछ बता दिया है इनको।

ध्रुव : अच्छा तो बांकेलाल जी। अब आपको कोई ऐसी योजना बनानी है जिससे कि यह प्रतियोगिता रुक जाए। बदले में आपको भी बहुत कुछ मिलेगा।

बांकेलाल : 💭हीहीही योजना तो मैं बनाकर आया हूँ💭

सभी सुपर हीरोज़ मीटिंग करने में इतने व्यस्त थे कि उन्हें पता ही नही चला कि दो आंखें इस पूरे घटनाक्रम पर नज़र रखे हुए हैं। कोबी ने पश्चात काल के कक्ष की दीवार में जो छेद किया था। भोकाल उस मे से झाक रहा था और उन सब को देख रहा था। उसने बाँकेलाल को देख लिया

भोकाल : (बांकेलाल!!!! यह धूर्त मक्कार यहाँ कैसे आ गया? और यह ध्रुव नागराज मिलकर क्या बातें कर रहे हैं इससे। ज़रूर कोई गहरा षड्यंत्र तैयार हो रहा है। अभी जाता हूँ युगम के पास और इस घटनाक्रम की जानकारी देता हूँ।)

भोकाल तुरंत ही दुड़ी हो लिया। और युगम क्षेत्र की ओर भागा

युगम क्षेत्र में युगम और अवधि किसी चर्चा में लीन थे। तभी भोकाल दौड़ता हुआ वहाँ पहुंचा। युगम ने भोकाल को दौड़ कर आते हुए देखा और व्यंग्य से कहा।

युगम : क्या हुआ भोकाल आप ऐसे दौड़े क्यों चले आ रहे हैं क्या आपके चड्ढी में चूहे डाल दिये किसी ने? हा हा

भोकाल घुटनो पर हाथ रखकर हांफने लगा

भोकाल : ( हांफते हुए ) यू युगम जी। दरअसल बात यह कि। नागराज और ध्रुव के कक्ष में मैंने बांकेलाल को देखा!

युगम : क्या? बांकेलाल आ गया !

भोकाल : हाँ । लेकिन ! आप तो ऐसे पूछ रहे हैं जैसे आपको पहले से पता हो कि बांकेलाल आने वाला है।

युगम : हुम्म…… हाँ । मुझे पता था। लेकिन मैंने सोचा नही था कि नागराज उसे लेकर इतनी जल्दी आ जायेगा।

भोकाल सोच में डूब गया। फिर कुछ सोचता हुआ बोला

भोकाल : लेकिन जब आपको पता था तो आपने उन्हें रोका क्यों नही और आपको तब यह भी पता होगा कि वो बांकेलाल को क्यों यहां लेकर आये?

युगम थोड़ा नीचे झुकते हुए बोला

युगम : हां मुझे यह भी पता है। मुझे सब पता है कि क्या क्या हुआ। और मैने उन्हें इसलिए नही रोका क्योंकि तुम जानते हो की मेरे पास यह हक़ नही की मैं किसी के काम मे दखल दूँ इसीलिए मैने तुम्हे भी नही रोका था जब तुमने तिरंगा को गड्ढे में गिराया।

भोकाल ने अपनी नज़रें थोड़ा झुका लीं

युगम ने बोलना जारी रखा

युगम : और न ही मैने नागराज की मदद की, जब उसने तिरंगा को ढूंढने के लिए मुझसे कहा। याद रखो। यहाँ जो कुछ हो रहा है या होगा उसमे कोई दखल नही दूँगा न ही तुमलोगों की कोई मदद करूँगा। हाँ सिर्फ प्रतियोगिताएं करवाना मेरा काम है।हां मैं एक चीज़ के लिए तुमलोगों को रोक सकता हूँ–और वो है–तुमलोगों का यहां से भागना। वैसे तो तुम लोग यहाँ से नही निकल सकते लेकिन तुम लोगों ने कोई तरकीब ढूंढ भी ली यहाँ से निकलने की तो–मैं–तुमलोगों को नही भागने दूंगा। या वापस खींच लूंगा।

भोकाल : अच्छा। लेकिन तब आपने नागराज को क्यों नही रोका जब वो बांकेलाल को लाने के लिए यहां से निकला–और–अब जब बांकेलाल यहां आ गया, नागराज उसे यहां लाने में कामयाब हो गया। तो अब आगे क्या होगा। क्या आप नागराज और उसकी टीम को इसके लिए कोई दण्ड देंगे।

युगम ने भोकाल को थोड़ा घूरा। फिर वापस तनकर बैठते हुए बोला

युगम : मैंने आपसे पहले ही कहा। आपलोगों को यहां जो करना है वो करें। मैं कोई दखल नही दूँगा। हाँ पर प्रतियोगिता से आपको नही भागना है।

भोकाल : सब कुछ तो मैं समझ गया। लेकिन अब क्या होगा ? नागराज ने बांकेलाल को यहां क्यों बुलाया ? और क्या अब आप उसे वापस जाने को कहेंगे?

युगम एक बार फिर झुककर भोकाल के करीब आया

युगम : इस सारे प्रश्न का उत्तर एक ही है। मैं भले तुमलोगों की कोई मदद नही कर सकता। लेकिन मैं तुमलोगों से मदद ले सकता हूँ। अब आप जाएं। थोड़ी ही देर में नागराज और ध्रुव बांकेलाल से मुझे मिलवाने आ रहे हैं।

आश्चर्य से चकित भोकाल। वापस पलटा

भोकाल : यह कैसा जवाब दिया है युगम ने। मैं तुमलोगों की मदद ले सकता हूँ बावला हो गया है क्या यह भी।

भोकाल अपने कक्ष के दरवाजे तक पहुंचा और तभी वर्तमान टीम के कक्ष का दरवाज़ा खुला और उसमें से नागराज, ध्रुव और बांकेलाल निकले। भोकाल अपने दरवाज़े पे खड़ा हो गया। नागराज और बांकेलाल की नज़र भोकाल पर पड़ी

नागराज : (यह साला यहां खड़ा होकर क्या कर रहा है। दरवाज़े में छेद कर रहा था क्या)

बाँकेलाल : (अरे ये! ये तो ! भोकाल है। मेरी इससे मुक्का लात हो चुकी है)

भोकाल बांकेलाल को घूर रहा था। ध्रुव की नज़र भी भोकाल पर पड़ी

ध्रुव : हैल्लो भोकाल।

भोकाल ने भी हैल्लो कहा। मगर उसके बोलने के अंदाज़ से ऐसा लगा जैसे वो न चाहते हुए बोला हो।

भोकाल बांकेलाल की तरफ इशारा करता है

भोकाल : यह बोदीलाल यहां कैसे आया?

बाँकेलाल : बांकेलाल।

भोकाल ने बाँकेलाल की बात पर ध्यान नही दिया। तभी नागराज ने कहा।

नागराज : यह हैं बांकेलाल। युगम ने इन्हें भी बुला लिया है। यह भी सुपर हीरो से कम नही।

भोकाल : 💭साला झूठा कहीं का💭अच्छा ! फिर तो यह मेरी टीम में होगा। है ना? लेकिन मैं इसे अपनी टीम में नही लूंगा।

भोकाल ने बांकेलाल को हिकारत से देखते हुए कहा

नागराज ने त्योरियां चढा ली

नागराज : हां बे! इसलिए तो यह हमलोगों की टीम में है।

भोकाल : ज़बान सम्भाल के बात कर थोड़ा।

नागराज : वरना क्या कर लेगा!!

भोकाल : लगाम लगा दूँगा।

नागराज : हा हा हा। शायद तू भूल गया अभी जल्दी ही हमारे कोबी ने तेरे मित्र अश्वराज पे काठी कसी थी। और लगाम लगाया था।

नागराज ने व्यंग्य करते हुए कहा था

भोकाल ने तुरंत दरवाज़ा खोला और अंदर जाते हुए कहा

भोकाल : जल्दी ही बताऊंगा तुझे। अभी तो तू युगम के पास जा।

भोकाल ने धड़ाम से दरवाज़ा बन्द कर दिया
नागराज और ध्रुव, बांकेलाल के साथ आगे बढ़े

●प्रथम अध्याय समाप्त●

【द्वितीय अध्याय◆बांकेलाल की युगम से मुलाकात】

नागराज और ध्रुव, बाँकेलाल के साथ जाने लगे

ध्रुव : नागराज। तुमने उसपर ध्यान दिया?

नागराज : किसपर? अच्छा हां। उसकी अकड़ न। उसकी अकड़ मैं वहीं निकालना चाह रहा था। साले को देखो तो। चोरी भी किया और सीनाजोरी भी दिखाता है।

ध्रुव : अरे नही वो नही। उसकी बात पर। अभी तो तू युगम के पास जा ।

नागराज ने ध्रुव की तरफ देखा

ध्रुव : उसे कैसे पता चला कि हम युगम के पास जा रहे हैं?

नागराज : अरे यार। उसने अंदाज़ा लगाकर ऐसा कहा होगा और क्या-और-अगर उसे मालूम चल भी गया तो क्या प्रॉब्लम है। तुम भी न। इतनी छोटी छोटी बातों पर भी दिमाग लगाने लगते हो।

ध्रुव : ज़रूरी है नागराज। छोटी से छोटी चीज़ को अनदेखा नही करना चाहिए-क्योंकि-एक छोटी सी फुन्सी ही, बड़ी होकर फोड़ा बनती है।

नागराज : ऐं !

ध्रुव : अच्छा नागराज तुम समझ गए हो न हमे क्या बोलना है युगम से।

नागराज : हाँ ।

जल्दी ही वो तीनो युगम क्षेत्र पहुंचे। युगम अपने सिंहासन पे बैठा हुआ था। तीनो उसके सामने जाकर खड़े हो गए । युगम ने पहले नागराज और ध्रुव को देखा। और फिर बाँकेलाल को देखने लगा

नागराज और ध्रुव : युगम धरित्री अस्य:

युगम : युगम धरित्री अस्य:। कहो वीरों कैसे आना हुआ।

ध्रुव युगम का बाँकेलाल से परिचय करवाता है

ध्रुव : युगम जी। यह है बाँकेलाल। और बाँकेलाल जी। यह हैं युगम जी।

बाँकेलाल : (खींसे निपोर कर) हीही। प्रणाम।

युगम : प्रणाम

ध्रुव ने युगम से कहना शुरू किया

ध्रुव : यह यहां कैसे आये। और कब आये यह तो आपको पता ही होगा। हमे अनजान बनने की कोई ज़रूरत नही है।

युगम : हुम्म…..

ध्रुव : अब इन्हें यहां क्यों लाया गया यह नागराज बताएगा।

ध्रुव ने नागराज की तरफ़ देखा और नागराज ने बताना शुरू किया

नागराज : तो। युगम जी । आपने हमसे कहा था कि इस प्रतियोगिता में साम, दाम, दण्ड, भेद सब जायज़ है । तो बाँकेलाल को हम लोग यहाँ लाएं अपना सलाहकार बनाने के लिए। अब बाँकेलाल जी हमारे साथ रहेंगे और हमे सलाह देने का काम करेंगे।

युगम : अच्छा ! तो ध्रुव क्या करेंगे अब?

नागराज : आ.. वो.. ध्रुव का काढ़ा खतम हो गया है। इसलिए इसका दिमाग..

ध्रुव ने नागराज की तरफ घूरा। नागराज चुप हो गया

ध्रुव : युगम जी। बात यह है कि । एक से भले दो-है न।

नागराज : अब हमारे पास दो दो सलाहकार हैं। हमे जीतना है । और जीतने के लिए हम ज़्यादा से ज़्यादा कोशिश करना चाहते हैं।

थोड़ी देर खामोशी रही। फिर युगम ने खामोशी तोड़ी

युगम : अच्छा ठीक है। तो आपलोग इन्हें अपने साथ रख सकते हैं।

नागराज, ध्रुव : धन्यवाद युगम जी। बहुत बहुत धन्यवाद।

वो तीनो वापस जाने के लिए पलटे। लेकिन तभी बाँकेलाल फिरसे युगम की ओर पलटे

बाँकेलाल : (चूना लगाते हुए) युगम जी आपसे मिलकर अच्छा लगा।

युगम ने भी मुस्कुराते हुए उत्तर दिया

युगम : हमे भी आपसे मिलकर अच्छा लगा बाँकेलाल जी।

बाँकेलाल : मैं आपको एक भेंट देना चाहता हूँ।

बाँकेलाल ने अपनी पोटली उतारी। जो उसने कमर पे बांध रखी थी। उसे आगे बढाते हुए बाँकेलाल ने कहा

बाँकेलाल : यह लीजिये। वैसे तो कोई खास चीज़ नही है आपको भेंट स्वरूप देने के लिए। लेकिन आप गाय का यह शुद्ध दूध भेंट स्वरूप स्वीकार करें। मैं हमेशा पानी की जगह अपनी पोटली में गाय का दूध लेकर चलता हूँ। यह बहुत पौष्टिक होता है।

युगम ने बहुत ही गच्च होकर उसका भेंट स्वीकार किया

युगम : वाह गाय का दूध। आज पहली बार मैं दूध पियूँगा। वाह बाँकेलाल आपका बहुत बहुत धन्यवाद। हम प्रसन्न हुए। आज से आप हमारे मित्र।

बाँकेलाल : हीही। यह तो मेरी खुशनसीबी है। 💭हीहीही बेटा अभी तो शुरुआत हुई है💭

नागराज, ध्रुव के कान में फुसफुसाया

नागराज : “बड़ी अजीब बात है। बाँकेलाल हमेशा गाय का दूध पीता है। यहां तक कि जंगल मे भटकते वक़्त भी गाय का दूध लिए घूमता है। मगर फिर भी सींकड़ी का सींकड़ी है। हीहीही”

ध्रुव ने सबकी तरफ से युगम से विदा ली

ध्रुव : अच्छा तो युगम जी हमलोग चलते हैं अब।

युगम : अवश्य।

और फिर तीनो वापस चल दिये

रास्ते में

नागराज : बाँकेलाल जी। क्या आप हमेशा गाय का दूध ही पीते हैं पानी की जगह??

बाँकेलाल ने नागराज को देखा। उनके मुँह से निकला…

बाँकेलाल : न..हाँ हाँ । क्या हुआ।

नागराज : कुछ नही ऐसे ही।

तभी ध्रुव ने बाँकेलाल से पूछा

ध्रुव : अच्छा बाँकेलाल जी। आपने कोई योजना सोची अभी तक?

बाँकेलाल : 💭हीहीही योजना पे अमल भी कर लिया। बस अब पूरा होने का इंतज़ार है💭

ध्रुव : किस सोच में पड़ गए। बाँकेलाल जी।

बाँकेलाल विचारों की दुनिया से वापस आता है

बाँकेलाल : आ….क क कुछ नही, अरे अभी तो मैं यहां आया हूँ। थोड़ी यहाँ की स्थिति को समझने दो-फिर-योजना बनाता हूँ कोई।

ध्रुव : ok

फिर वो तीनो अपने कक्ष तक पहुंच गए। जैसे ही वो अंदर घुसे। तिरंगा, कोबी, स्टील और शक्ति ने उन्हें घेर लिया

शक्ति : क्या हुआ? क्या कहा युगम ने?

स्टील, तिरंगा : हाँ हाँ हमे भी बताओ।

कोबी : हां हां हमका भी बताओ। का कहा सुगम ने बकलोल जी को।

बाँकेलाल ने खौरिया कर कोबी को जवाब दिया

बाँकेलाल : श्रीमान लोमड़ जी। मेरा नाम बाँकेलाल है।

कोबी : गुर्रर्रर्र अउर हमरा नाव कोबी है। लोमड़ नाही।

शक्ति ने एक बार फिर वही बात दोहराई

शक्ति : ध्रुव बताओ हमे। क्या हुआ?

ध्रुव : युगम मान गया और क्या। उन्होंने कहा है कि बाँकेलाल यहाँ रह सकते हैं।

नागराज : और तो और। बाँकेलाल और युगम की मित्रता हो गयी।

नागराज और ध्रुव से यह जवाब सुनने के बाद शक्ति, स्टील और तिरंगा के मुंह ऐसे लटक गए मानो इस खबर को सुनकर उन्हें तगड़ा झटका लगा हो। साफ जाहिर था कि उन्हें खुशी नही हुई थी

नागराज : अब बाँकेलाल आप थोड़ा आराम करें और फिर कुछ खतरनाक तरकीब भिड़ायें

नागराज ने बाँकेलाल को एक कमरे का रास्ता दिखाया, बाँकेलाल आराम करने ले लिए घुस गए वहाँ

●द्वितीय अध्याय समाप्त●

【तृतीय अध्याय◆लापता हवलदार बहादुर】

थोड़ी देर बाद जब सब इधर उधर हो गए। स्टील एक तरफ से आया
स्टील तिरंगा को साइड में लेकर गया

तिरंगा : क्या हुआ ?

स्टील : यार मुझे गुस्सा आ रहा है।

तिरंगा : वो तो मुझे भी आ रहा है। यह मक्खीचूस बोदिलाल एक नम्बर का-वाहियात-इंसान है गुर्रर्रर्र।

स्टील : मुझे तो यह नही समझ आ रहा-कि-ध्रुव इस पचड़े में कैसे पड़ गया, मतलब की-पहले तो उसे नागराज का यह आईडिया वाहियात लग रहा था।

तिरंगा : वो तो मुझे भी समझ न आ रिया। जब बाँकेलाल आया नागराज के साथ। तो उस वक़्त भी ध्रुव ने कोई उल्टी प्रतिक्रिया नही दिखाई। उलटा उनसब के साथ बैठकर मीटिंग करने लगा। और अब मैं शर्त लगाकर कहता हूँ कि वो मक्खीचूस इंसान एक वाहियात किस्म की तरकीब भिड़ायेगा जिसमे उसी का फायदा होगा।

स्टील : और मैंने तो सुना है कि वो अगर किसी का बुरा करता है-तो-उल्टा उसका भला होता है।

तिरंगा : अच्छा । मैने नही सुना। अगर ऐसा होता है तो अच्छी बात है। लेकिन-एक बात सुन लो वो एक नम्बरी षडयंत्रकारी और मक्कार किस्म का इंसान है।

स्टील : हाँ यह बात तो मैं भी कहता हूँ। उस बेहूदे इंसान की दोस्ती से अच्छी, कोबी जैसे इंसान से दुश्मनी है।

“क्या बोला कोबी जैसा इंसान!!गुर्रर्रर्र”

कोबी अभी अभी उनके पास आया था, और उसने स्टील की बात सुन ली थी

स्टील : क्या हुआ? गुस्सा क्यों रहा है? कोबी ही तो बोला है। गोभी थोड़ी न बोला।

कोबी : गुर्रर्रर्र कोबी जैसा इंसान ! मैं तुझे नही छोड़ूंगा साले टीनके भंगार।

कोबी ने अपनी गदा का आव्हान करने के लिए अपने हाथ उठा दिए। और यह सब जानते हैं कि जब कोबी के हाथ मे उसकी गदा प्रकट हो जाती है तो कोबी प्रलय ला सकता है। तिरंगा समझ गया कोबी किस बात से गुस्सा हुआ है। कोबी के मंत्र बोलने से पहले ही तिरंगा ने उसके हाथ पकड़ लिए

तिरंगा : क्या करते हो कोबी-जाने दो-दोस्त है तुम्हारा। गलती हो गयी हम दोनों से गलती हो गयी। तुम…तुम इंसान नही हो तुम जानवर हो। हाँ तुम जानवर हो-गलती हो गयी-माफ करदो हम दोनों तुमसे माफी मांगते हैं।

तिरंगा ने स्टील से इशारा किया। स्टील भी समझ गया
स्टील : हे हे हे…. गलती से निकल गया कोबी बेटे म मेरा मतलब भैया-गलती से निकल गया। क्या करूँ स्टील की ज़बान है न फिसल जाती है -हे हे।

कोबी का गुस्सा थोड़ा शांत होने लगा

कोबी : हाथ छोड़ बे मच्छर।

तिरंगा ने कोबी के हाथ छोड़ दिये
कोबी,स्टील से बोला

कोबी : अच्छा भवा माफी मांग लिए बेटा। नई ते मार मार के उ हालत कर देता हम। की खुद को भंगार में बेचना पड़ता तेरे को। अब दोबारा इंसान बोलके गाली मत बकिये। ठीक हा न। समझे कि नाही।

स्टील : समझ गया कोबी जी, समझ गया। गुर्रर्रर्र(दबी हुई)।

कोबी चला गया

तिरंगा : यह साला जानवर बुद्धि। इसके सामने कुछ न बोलो तो अच्छा है। हमेशा बहाना खोजा करता है मार करने का।

स्टील : क्यों। अभी तो तू बोल रहा था कोबी की दुश्मनी अच्छी।

तिरंगा : दुश्मन से याद आया!! परमाणु अभी तक नही लौटा यार-और- ना ही डोगा।

स्टील : डोगा को गायब हुए 4-5 दिन हो गए और परमाणु उसकी खोज में कई घंटों से लापता है।

तिरंगा : और नागराज और ध्रुव को तो कोई होश ही नही है। बेचारे परमाणु ने कई चक्कर लगाए उसे ढूंढने के लिए। और अब वो खुद कई घण्टो से लापता है । और ध्रुव और नागराज को तो कोई परवाह ही नही है।

स्टील : हाँ । बेचारा परमाणु न जाने कहाँ होगा। एक बार तो डोगा को खोजने गया और उसे मिल गया हवलदार बहादुर। उसे ही लेकर वापस आ गया। और अब फिरसे डोगा को ढूंढने निकला हुआ है ना जाने कई घंटों से हां

तिरंगा : अरे हाँ ! हवलदार बहादुर से याद आया। कहाँ हैं हवलदार बहादुर? कहीं दिख नही रहे।

स्टील : हीहीही हवा निकाल रहे हैं।

तिरंगा : मतलब ?!

स्टील : मतलब टॉयलेट में हैं। विशालगढ़ के जंगलों की हवाओं ने उनपर बुरा असर किया है और अब वो बैठकर पुड़पुड़ाने से ज़्यादा पुरपुरा रहे हैं।

तिरंगा : अच्छा।। तभी मैं सोच रहा था कहाँ से पुर पुर की आवाज़ें आ रही हैं।

स्टील : बहरहाल। चलो लंच करते हैं। टाइम हो गया है।

तिरंगा : वो तो मुझे पता है टाइम हो गया है भोजन का। लेकिन!! तुम कबसे भोजन करने लगे।

स्टील : पागलों वाली बातें क्यों कर रहे हो। तेल की बड़ी बड़ी बोतलें और ग्रीस का डिब्बा लेकर मैं यूं ही घूमता हूँ क्या। स्लर्प आज तो जमकर ग्रीस हूरूँगा नमक मसाला मिलाकर यम यम। और रात में जमकर दारू मेरा मतलब अल्कोहल मिला हुआ तेल ढरकूँगा।

कहकर स्टील हॉल की तरफ बढ़ गया
तिरंगा ने अपना मुँह ऐसे बनाया जैसे नीम के पत्ते खा लिए हों

तिरंगा : 💭यू… ग्रीस भी कोई खानेवाली चीज है भला। और यह तेल में अल्कोहल मिलाकर ढरकता है? अजीब है। ओह । इसीलिए तो एक दफा खबर आई थी कि स्टील को नाले में गिरा हुआ पाया गया, वो रात भर नाले में गिरा पड़ा था। शर्त लगाकर कह रहा हूँ पी कर लुढक रहा होगा साला रात में। और यहां भी पी रहा है। इसीलिए-इसीलिए मैं कहता हूँ लड़कियां बहुत खतरनाक चीज़ हैं। मैं इस बात के लिए भी शर्त लगा सकता हूँ कि अपनी पत्नी रोमा या फिर अपनी गर्लफ्रेंड सलमा की याद में पीता है साला। सच मे….सच मे लड़कियां बड़ी भयंकर होती हैं। मशीनी मानव भी पियक्कड़ बन गया बहूहूहू। खतरनाक है रे बाबा, बहुत खतरनाक है लड़कियों का चक्कर। अच्छा हुआ तिरंगा बेटे तू लड़कियों के चक्कर मे इतना नही रहता वरना तेरा हाल भी नागराज, ध्रुव, डोगा, स्टील और परमाणु जैसा होता। हाँ । सभी तो परेशान हैं अपनी अपनी प्रेमिकाओं से। नागराज विसर्पी और भारती से परेशान। ध्रुव नताशा और रिचा से परेशान। डोगा की ज़िंदगी मे भी पचड़े हैं, एक बार अपनी दर्दकथा सुना रहा था बेचारा की उसकी प्रेमिका हमेशा उसे परेशान किये रहती है और चाहती है कि वो डोगा बनना छोड़ दे। और परमाणु। बेचारा। उसकी लाइफ में भी दो-दो मुसीबतें हैं। उसकी एक गर्लफ्रेंड। जिससे वो परमाणु के रूप में मिला करता है, वो उसका असली चेहरा देखने के लिए बेचारे को हमेशा परेशान किये रहती है, बोलने से काम नही बनता तो जज़्बाती हो जाती है। अब बेचारा परमाणु अपना राज़ तो बता नही सकता उसे, तो बेचारे को उसके पास से भागना पड़ता है और अगली बार मिलने के लिए दस बार सोचना पड़ता है बेचारे को। वहीं दूसरी तरफ, जो उसकी दूसरी गर्लफ्रेंड है वो बेचारे को उसके असली रूप में परेशान किये रहती है। और-और कोबी। बेचारा। उसके साथ तो सबसे बड़ा अन्याय करती है उसकी अपनी बीवी। बीवी है उसकी-लेकिन- गुलछर्रे उड़ाती भेड़िया के साथ। च् च् च् कोबी बेचारा-दर्द का मारा। और अब स्टील का भेद भी खुल गया। जनाब मशीन वाले तेल में अल्कोहल मिला कर पीते हैं और नालों की सैर किया करते हैं।ले दे कर…. सबके सब परेशान है, सिर्फ मैं और एंथोनी ही ऐसे हैं जिनकी लाइफ में लड़की नाम की मुसीबत नही है। अब एक बात मैने पक्का कर लिया है। ज़िन्दगी में कभी लड़की नही पटाऊँगा। कुँवारा मर जाऊंगा पर शादी नही करूँगा, लड़की ज़िन्दगी को नर्क बना देती है बहूहूहू। नो प्रेमिका-नो शादी-नो बर्बादी।💭

यही सब सोचता हुआ तिरंगा भोजन कक्ष में आ गया जहाँ एक बड़ी मेज लगी हुई थी जिस पे तरह तरह के पकवान रखे हुए थे। मेज के चारों तरफ कुर्सियां लगी थीं जिसपे बाकी सब पहले से बैठे थे। नागराज और ध्रुव बाईं तरफ अगल बगल बैठे हुए थे और उनके बगल में स्टील भी बैठा था जो बड़े चाव से ग्रीस खा रहा था।शक्ति आखिरी छोर पे अकेले बैठी थी। दाईं तरफ बाँकेलाल बैठे हुए थे और उसके बगल में कोबी बैठा था, जो जल्दी जल्दी ढेर सारा भोजन अपनी प्लेट में डाल रहा था। तिरंगा ने स्टील पर एक दया भरी दृष्टि डाली, मानो बेचारा स्टील गमों का मारा है। और फिर उसी के सामने बाँकेलाल के बगल में बैठ गया। ध्रुव तिरंगा से पूछने लगा

ध्रुव : अरे तिरंगा! इतनी देर क्यों लगा दी? सबसे पहले तो तुम्ही आते हो।

नागराज : और कोबी।

नागराज ने बात पूरी की

ध्रुव : क्या हुआ तिरंगा ?

तिरंगा : कुछ नही….वो मैं कुछ सोच , कुछ निष्कर्ष निकालने में लगा हुआ था।

ध्रुव : अच्छा क्या निष्कर्ष निकला?

ध्रुव ने चिकन लेगपीस चबाते हुए पूछा

तिरंगा : यही की….ज़िन्दगी में कभी भूल कर भी लड़कियों के चक्कर मे नही पडूंगा और न ही कभी शादी करूँगा।

तिरंगा ने एक सांस में अपनी बात पूरी की और स्टील की तरफ एक और दयाभाव वाली दृष्टि डाली। जो बड़े मजे से ग्रीस खा रहा था। फिर तिरंगा ने प्लेट में भोजन उलटना शुरू किया

नागराज और ध्रुव हैरान होकर एक दूसरे को देख रहे थे

नागराज ध्रुव के कान में फुसफुसाया

नागराज : “क्या इसने अभी अभी जो बका वो सच है? या फिर मेरे कान बज रहे थे”

ध्रुव ने फुसफुसाना शुरू किया

ध्रुव : “यकीन तो मुझे भी नही हो रहा है। वो शख्स जो हमेशा हमारे आगे दिन रात गिड़गिड़ाया करता था। यार मेरी किसी से सेटिंग करवा दो प्लीज़ यार प्लीज़ तुम लोगों ने इतनी सेटिंग्स कर रखी है, एक मुझ गरीब की भी करवा दो। ऐसा कहने वाला यह शख्स आज कह रहा है, ज़िन्दगी भर कुँवारा रहेगा।”

नागराज : “वैसे अच्छा फैसला किया बेचारे ने,ज़िन्दगी झंडू होने से बचा ली अपनी हीही। मेरे बस में होता तो मैं इसका सेटिंग करवा देता, पर बच गया लौंडा।”

ध्रुव : “मैं भी चाहता तो किसी लफंगी से सेट करवा देता इसे। पर बाद में यही बन्दा मुझे गालिया बकता फिरता हीहीही। यही सोच कर मैने इसकी मदद नही की। और वैसे भी-मैं-किसी का बुरा नही करता।”

नागराज : “ऐसा बुरा करने में मुझे तो बहुत मज़ा आता, ज़रा वो भी तो देखता लड़कियां कैसे लाइफ में डंडु घुसाकर झंडू बना देती हैं बूहूहू। पर अफसोस मैं उसकी सेटिंग न करवा सका।”

नागराज और ध्रुव की फुसफुसाहट जारी थी कि तभी, शक्ति की आवाज़ ने उनका ध्यान भंग किया

शक्ति : तुम लोग क्या खुसर-पुसर कर रहे हो। तुम लोग टीम लीडर हो ज़रा सा भी बड़प्पन नही दिखा रहे हो।

नागराज : बड़प्पन??

शक्ति : कहने का मतलब है किसी की कोई परवाह है तुमलोगों को, खुद खाने बैठ गए हो! हवलदार जी कहाँ हैं ??

नागराज : अरे हाँ! ध्रुव! हम तो भूल ही गए थे हवलदार बहादुर नाम का बन्दा भी मौजूद है हमारे बीच।

शक्ति : (त्योरियां चढ़ाकर) वो बन्दा इस वक़्त कहाँ मौजूद है यह किसी को पता है?

स्टील और तिरंगा जमकर हूरने में लगे हुए थे। इसलिए शायद वो दोनों यह बात चीत नही सुन रहे थे, सिर्फ उन्हीं दोनों को पता था कि हवलदार जी कहाँ है

ध्रुव : कहाँ है…कहाँ हैं हवलदार जी?

बाँकेलाल के बगल में बैठा कोबी भी बोल पड़ा

कोबी : अरे हां ! केहर गए….केहर गए हवादार जी! चंचेड़ेलाल जी तो हमरे बगल में बइठे हैं। लेकिन बदबूदार बदाहुर जी कहाँ गए?

बाँकेलाल को गुस्सा आ गया

बाँकेलाल : ओए सर्पराज । इस लोमड़ प्राणी को समझाओ ज़ुबान को लगाम लगाए, मैं चंचेड़ेलाल नही बाँकेलाल हूँ।

नागराज खुद से फुसफुसाया

नागराज : “अब जो हैं, वही न बोलेगा बेचारा”

बाँकेलाल : (नागराज से) क्या सोच रहे हो? समझाओ इस लोमड़दास को। वरना मैं कोई तरकीब नही बताने वाला किसी भी तरह की।

नागराज, कोबी की तरफ मुड़ा

नागराज : क्यों बे कोबी तूने कंचेलाल आ..म मेरा मतलब बाँकेलाल को चंचेड़ेलाल क्यों बोला हीही गुर्रर्रर्रर्रर्र।

कोबी : तो इस टीपेलाल को भी बोल हमरा को लोमड़ न बोले।

कोबी को गुस्सा आने लगा था

नागराज : तूने मुझसे बदतमीज़ी से बात की साले जानवर रुक अभी नाखून उखाड़ता हूँ तेरे।

नागराज उठ खड़ा हुआ, कोबी भी डंडे की तरह तनकर खड़ा हो गया।

शक्ति ने दोनों की तरफ हाथ लहराए

शक्ति : (गुस्से में)बैठ जाओ….बैठ जाओ दोनों। नागराज तुम भी न, तुम जानते हो इसके शब्द सही नही निकलते। इसके मुंह से बोलो की जगह बोल निकल गया और क्या। तुम क्यों बेचारे के पीछे पड़े रहते हो।

नागराज : अरे क्या बेचारा बेचारा!! कुछ नही बेचारा है वो। गुस्से में तो हर बात साफ साफ निकलती है सही सही शब्द निकलते हैं। साला नाटक किया करता है यह।

कोबी बैठ चुका था। फिरसे खड़ा हो गया

कोबी : (नागराज से) अबे अपनी तरह नाटकबाज समझा है क्या!!

नागराज तुरन्त अपनी जगह खड़ा हो गया

नागराज : (शक्ति से) देखो…देखो कैसे बोल रहा है!

शक्ति ने कोबी को घूर कर कहा

शक्ति : कोबी….बैठ जाओ। गुस्सा शांत करो अपना, और सही ढंग से बोलना सीखो।

ध्रुव : इसके बोलने से पहले इसे सुई कोंच दो। जब भी यह बोलना शुरू करे सुई कोंच दो, इसे गुस्सा आ जायेगा और फिर यह हर बात सही बोलेगा हीहीही।

शक्ति के शांत कराने की वजह से कोबी का गुस्सा शांत हो गया था। लेकिन ध्रुव के व्यंग्य के बात कोबी का गुस्सा फिरसे चढ़ने लगा

कोबी : अब तू शुरू हो गया बे। तू तो मेरे बाएं हाथ का है, एक हाथ मे गायब कर दूंगा मैं तुझे।

ध्रुव : (अपनी जगह से उठते हुए) कोशिश करके देख ले। लोमड़ी के।

शक्ति ने इस बार सबको डाँट कर बैठने को कहा

शक्ति : क्या है यार! तुमलोग ज़रा ज़रा सी बात पर आपस मे लड़ने लगते हो!! दोस्त हो कि दुश्मन हो तुम लोग। भोकाल और उसकी टीम को देखो कभी आपस मे लड़ते हैं सब..

“धड़ाम!!!!”

एक जोरदार आवाज़ गूंजी जैसे किसी ने किसी को उठाकर पटक दिया हो

“साले टुच्चे तूने मुझे गधा कहा!! अश्वमानव हूँ मैं अश्वमानव। नही छोडूंगा अब तो तुझे!”

“अबे घोड़ा मानव है तो हरकतें गधों वाली क्यों करता है, झुलसवा दूंगा। बिजलिका से”

पश्चात काल के कक्ष से आ रही आवाज़ें साफ साफ सुनाई दे रही थीं। अश्वराज और गोजो आपस मे मुक्कालात कर रहे थे

ध्रुव : हा हा हा। देख लो शक्ति। वहाँ तो कोबी से भी बड़े वाले मौजूद हैं। गधे के पट्ठे।

शक्ति : छोड़ो अब यह सब। तुमलोग कहाँ की बातें कहां ले आये। हवलदार बहादुर अभी तक भोजन के लिए नही आए।

तभी शक्ति की नज़र स्टील और तिरंगा पे पड़ी

शक्ति : तुम दोनों कुछ नही बोल रहे हो, क्या तुमलोगों को पता है हवलदार बहादुर कहाँ हैं।

लेकिन तिरंगा और स्टील ने कोई जवाब नही दिया दोनों जमकर हूरने में लगे हुए थे

शक्ति ने चीख कर पुकारा उन्हें। “स्टील!! तिरंगा!!”। दोनों हड़बड़ा गए और शक्ति की तरफ देखने लगे

तिरंगा : क्या कोई हंगामा हुआ क्या ?

स्टील : हाँ क्या हुआ??

शक्ति : हैं!!! तुमलोगों ने कुछ सुना नही क्या क्या हुआ?

तिरंगा, स्टील : न न…..नही तो।

तिरंगा : क्यों क्या हुआ है??

ध्रुव : कुछ नही बस छोटा सा भूकम्प आया था।

स्टील : युगम क्षेत्र में भूकम्प!!

शक्ति : (तिरंगा से) हवलदार बहादुर कहाँ हैं खाने पर क्यों नही आए।

स्टील : ओह! अरे वो तो…

तिरंगा : हवा निकाल रहे हैं।

स्टील : हाँ मैं गुज़र रहा था टॉयलेट के बगल से तो जोरदार पुरपुराहट सुनाई दी। मुझे लगा कोबी होगा, लेकिन कोबी तो पुरपुराता कम है पुड़पुड़ाता ज़्यादा है। फिर मैंने सोचा कौन है यह बंदा। फिर मुझे लगा लगता है ध्रुव ने गलती से कोई गलत काढ़ा पी लिया है और पेट मे ढाई किलो गैस जमा हो गया है…

स्टील ने ध्रुव की तरफ देखा

ध्रुव : (दबी हुई)गुर्रर्रर्र…..

स्टील हड़बड़ा कर पलटा

स्टील : लेकिन फिर मुझे याद आया कि ध्रुव तो कभी कोई गलती कर ही नही सकता…

स्टील ने फिर ध्रुव को देखा…, ध्रुव के चेहरे पर गर्वीली मुस्कान थी

स्टील जासूसी अंदाज़ में फिर बोला

स्टील : फिर्रर्र मैंने सोचा। हो न हो यह नागराज है, जो गलती से जमालघोटा खाकर यहाँ बैठा हुआ है…..

स्टील ने अब नागराज की तरफ नज़र घुमाई

नागराज के होंठ हिल रहे थे और दबी हुई गुर्राहट निकल रही थी

नागराज : (दबी हुई ) गुर्रर्र गुर्रर्रर्र।

स्टील : लेकिन फिर्रर्र मेरे दिमाग मे ख्याल आया कि जमालघोटा खाने के बाद सीधे पुड़पुड़ाहट शुरू हो जाती है और वैसे भी नागराज हर चीज़ देख भाल कर खाता है।

नागराज के चेहरे पर भी हल्की गर्वीली मुस्कान आयी

स्टील : फिर्रर्र मैंने सोचा लगता है शक्ति…

शक्ति : मेरे बारे में एक भी उल्टा शब्द तुम्हारे मुंह से निकला तो पिघलाकर तुम्हारे मुंह का आकार बदल दूँगी।

स्टील : अरे प प पूरी बात तो सुनो। तुम्हारे बारे में ख्याल आने ही वाला था कि तभी मैंने सोचा शक्ति इतनी बदतमीज़ नही है जो टॉयलेट में बैठकर इतनी तेज तेज़ पुरपुरायेगी।

स्टील ने एक सांस में बात खत्म कर दी

शक्ति : वेरी गुड।

स्टील ने इस बार एक एक शब्द चबा कर बोलना शुरू किया

स्टील : और फिर–मुझे–लगा कि–नामुराद तिरंगा–बैठा हुआ है इसमें–लेकिन फिर– मैने देखा–तिरंगा एक जगह कोने में खड़ा था–और–अपनी डायरी में–कोई शायरी लिख–रहा था।

स्टील रुका और बाँकेलाल कि तरफ एक नज़र घुमाई, और सामान्य अंदाज़ में बोला

स्टील : फिर ख्याल आया…लगता है दीदेलाल अ मेरा मतलब बाँकेलाल जी बैठे हैं इसमें…

इससे पहले की बाँकेलाल, कोबी की तरह स्टील को झिड़कते….

स्टील : लेकिन फिर मुझे तुरन्त याद आया कि बाँकेलाल जी तो अपने कमरे में आराम कर रहे हैं। हाँ… तो अब ले देकर बचता है कौन। एक ही बन्दा। और वो हैं हवलदार बहादुर जी। मैं समझ गया वही बैठे हुए हैं अंदर। बेचारे। विशालगढ़ की हवाओं ने उनके अंदर हवा भर दी च् च् च्।

स्टील ने दुखी होकर बात पूरी की

शक्ति : जब तुमको पता था कि वो कहाँ है। तो इतनी देर से बता क्यों नही रहे थे।

ध्रुव : और वो बन्दा कई घंटों से टॉयलेट में ही बैठा है?

स्टील : अरे लेकिन तुमलोगों ने मुझसे पूछा ही कब । की मैं बताता।

नागराज : बड़ी अजीब बात है। इतनी देर से बैठ कर बन्दा कर क्या रहा है। कितनी गैस भर गई है?

अबतक सब पर्याप्त भोजन कर चुके थे

ध्रुव : चलो देखते हैं क्या बात है। हवलदार जी अभी तक निकले क्यों नही टॉयलेट से? 

कोबी : हम्मे तो जावे ही के पड़ी। बहुत जोर की पुड़पुड़ लग गया है।

कोबी अपनी कुर्सी से उठते हुए बोला

तिरंगा : साले दस किलो खाना अकेले हूरेगा तो क्या होगा!

स्टील : यह इसका रोज़ का ड्रामा है। भोजन के बाद सीधे टॉयलेट में जाकर घुसता है। इतने ज्यादा क्यों हूरता है बे!

तिरंगा : साला इतनी जल्दी पचा कैसे लेता है?

सब टॉयलेट की तरफ बढ़े एक साथ। सबसे आगे कोबी भाग रहा था पिनपिनाते हुए। टॉयलेट के पास पहुंचकर उसने दरवाज़ा पीट डाला

कोबी : अरे ओ तलबगार जी। किवाड़ी खोलो। हमको जोर की लगल है।

बाकी सब भी पहुंच गए

ध्रुव ने दरवाज़े के पास पहुंचकर आवाज़ लगाई

ध्रुव : हवलदार जी!…हवलदार बहादुर जी!!

नागराज : कोई आवाज़ ही नही आ रही है।

स्टील और तिरंगा एक दूसरे से बतियाने लगे

स्टील : अरे अब तक तो सारी गैस निकल जानी चाहिए थी।

तिरंगा : हाँ यार। अब तक तो खाली होकर निकल जाना चाहिए था। हवलदार जी को, कितना गैस जमा कर रखे हैं।

नागराज टॉयलेट के दरवाजे के पास पहुंचा

नागराज : (ध्रुव को हटाते हुए) हटो मैं कान लगाता हूँ।

नागराज ने अपने कान दरवाज़े से लगा दिए और कुछ सुनने की कोशिश करने लगा। इधर कोबी का प्रेशर बढ़ता जा रहा था

कोबी : बहूहूहू मान भी जाव बदबूदार जी। बहुते ही ज़ोर की लगी हमरा को। निकल जाव वरना हम यहीं पुड़पुड़ाए देब बहूहूहू।

नागराज : चुप कर बे।सुनने दे।

बाँकेलाल : (कोबी से) इतना ज्यादा क्यों हूर लिया तुमने लोमड़ जी।

कोबी : गुर्रर्रर्र हमड़ा नाम कोबी से।

तिरंगा : ओये कोबी!! तू अपनी भाषा क्यों बदलता रहता है बे!! एक भाषा मे बोला कर। सुनने वाले को कन्फ्यूज़न हो जाती।

कोबी : क्योंकि अम शर्वभाषी है।

तिरंगा : शर्वभाषी नही। सर्वभाषी।

कोबी : कुश भी हो, टुम शमश गे न।

स्टील : अब यह कौनसी भाषा है।

तिरंगा : जनाब नेपाली बोल रहे है

नागराज ने अब अपने कान दरवाज़े से हटाए

ध्रुव : क्या हुआ??

नागराज : कुछ सुनाई नही दे रहा। सिर्फ हल्की शूं शूं की आवाज़ आ रही है। जैसे कोई धूवाँ उठ रहा हो।

स्टील , तिरंगा : धुँवा नही। गैस। हीहीही।

कोबी को अब बहुत जोर की लग गयी थी, और उसे गुस्सा आने लगा था। कोबी ने गदा का आव्हान किया

कोबी : हे भेड़िया देवता मदद!

उसकी प्रलयंकारी गदा उसके हाथों में प्रकट हो गई। फिर इससे पहले की कोई कुछ समझ पाता। या उसे रोक पाता।

कोबी : फोड़ दूंगा मैं दरवाजा!!! गुर्रर्रर्र।हवाबहार को भी फोड़ दूंगा।

कोबी ने एक जोरदार प्रहार किया दरवाज़ा टूट फूट कर गिर गया। और सभी को टॉयलेट के अंदर आश्चर्य जनक चीज़ दिखी

ध्रुव : बाप रे पूरे टॉयलेट में भयंकर धुँवा भरा हुआ है!

तिरंगा : यह धुँवा नही गैस है। सब अपनी नाक दबा लो।

स्टील : हवलदार जी तो पूरे सिलेंडर निकले। इतने ज्यादा गैस फैला दिया है कुछ नज़र ही नही आ रहा है। खुद वो भी नज़र नही आ रहे।

सभी ने जल्दी जल्दी अपनी नाक दबा ली। कोबी भी अब अंदर जाने के बचाये बाहर खड़ा होकर बेचैन होने लगा

नागराज और ध्रुव ने अभी तक अपनी नाक बंद नही की थी

नागराज : मुझे यह हवलदार बहादुर द्वारा छोड़ा गया गैस नही लग रहा।

ध्रुव बाकी सब की तरफ मुड़ा

ध्रुव : अरे कमअकलों। कभी तो अक्ल इस्तेमाल कर लिया करो। हटाओ अपने अपने नाक पर से हाथ।

सबने जल्दी जल्दी अपने अपने हाथ अपनी नाक पर से हटाए

शक्ति : क्या हुआ ध्रुव??

ध्रुव : क्या हुआ क्या? क्या तुमलोगों को यह लगता है कि कोई शख्स इतना सारा गैस छोड़ सकता है कि पूरा टॉयलेट भर जाए ?

तिरंगा : बात तो सही है। और बदबू भी नही आ रही है। वरना इतनी सारी गैस सूँघ कर कोबी भी बेहोश हो जाये।

ध्रुव : हाँ और हममे से कोई भी बेहोश नही हुआ। इसका मतलब यह है कि यह किसी इंसान द्वारा निकाली गई गैस नही है।

नागराज : मैं पहले ही समझ गया था यह पा…गैस नही है।

बाँकेलाल : तो फिर क्या है?

ध्रुव : यह धुआं है।

तिरंगा : धुआं!!

ध्रुव : हाँ।

स्टील : तुम्हारे कहने का मतलब है हवलदार जी यहां बैठकर मुर्गे भून रहे थे।

ध्रुव : कमअक्लो वाली बात मत करो। यह आग से निकला हुआ धुँआ नही है।

नागराज : तो फिर किस चीज़ का धुँआ है।

ध्रुव : ज़रा इस धुंए को छटने तो दो, मैं पक्का कर लूँ जो मैं सोच रहा हूं वो सच है।

भूरे रंग का वो धुँआ अब छटने लगा था
और जैसे ही धुँआ इतना छट गया, की अंदर का नज़ारा दिखने लगा। सबकी आंखें बाहर कूदने को बेताब हो गईं

स्टील : यह क्या!!! यह तो खाली है!

तिरंगा : हवलदार बहादुर तो हैं ही नही यहां!

ध्रुव : अब मेरा शक यकीन में बदल गया।

शक्ति, नागराज : क्या??

ध्रुव : हवलदार बहादुर गायब हो गए हैं।

सभी के मुंह से एक साथ निकला। “क्या!!!!!!!”

●तृतीय अध्याय समाप्त●

【चतुर्थ अध्याय◆योजना कामयाब】

पृथ्वी पर : भूतकाल में।

विशाल गढ़ के जंगल मे नागराज, बाँकेलाल के घोड़े-कालिया-को अकेला छोड़ आया था।

कालिया : बहूहूहू यह जंगल तो बड़ा ही भयानक है। इतनी गहराई में मैं कभी नही आया, उस घसियारे ने कहा था कि यहीं खड़ा होकर बाँकेलाल का इंतज़ार करूँ। मुझे डर लग रहा है यह जंगल इतना घना है कि दिन में भी अंधेरा है बूहूहू। कहाँ ले गया होगा वो घसियारा, बाँकेलाल को-

तभी कहीं दूर से शेर की दहाड़ सुनाई दी
कालिया की हवा संट हो गयी

कालिया : अरे बाप रे, बूहूहू शेर आ रिया है। भाग ले रे बेटा कालिये।

लेकिन तभी कालिया को आस पास की झाड़ियों और घास पर सरसराहट की ढेर सारी आवाज़ें सुनाई देने लगी
कालिया ने ज़मीन पर नज़रें दौड़ाई,और उसकी हवा एक बार फिर संट हो गयी

कालिया : स स स स साँप, इतने ढेर सारे साँप।

कालिया के चारों तरफ ढेर सारे साँप इकट्ठे हो रहे थे
उन्ही में से एक सांप फुफकारा

सर्प : डर मत रे गधे, हम तेरी रक्षा के लिए आये हैं हीहीही।

दूसरा सर्प : अबे गधा नही घोड़ा है यह।

सर्प : अबे कुछ भी हो। अपने को क्या है।

दरअसल इन सर्पों को नागराज आदेश देकर गया था, की वो जंगली जानवरों से कालिया की रक्षा करें

दूसरा सर्प : (कालिया से) अरे ओ जनाब, डरने की ज़रूरत नही । हम आपकी रक्षा करने के लिए हैं यहां पर। जंगली जानवरों से आपकी रक्षा करेंगे हम।

लेकिन कालिया को उन सर्पों की भाषा समझ नही आ रही थी। उसे सिर्फ फुंफकार सुनाई दे रही थीं जिसे सुनकर कालिया की हवा संट होती ही जा रही थी

कालिया : साँप ही सांप, बाप रे बाप। भाग ले कालिया, वरना शेर से तो तू बच जाएगा मगर यह सांप तुझे चबा जाएंगे मिलकर।

कालिया बहुत ज़्यादा डर गया था। घबराहट में कालिया पूरी ताकत लगा कर भागा। उसके रास्ते मे जो सर्प आये वो भी कुचल गए

एक सर्प : अरे मइया रे। कुचल दिहिस रे, कुचल दिहिस।

दूसरा सर्प : आजकल भलाई का ज़माना रह ही नही गया है बूहूहू। हम उसकी रक्षा के लिए आये और वो हमें ही कुचल के भाग गया।

कालिया बिजली की रफ्तार से भाग रहा था । वो जल्द से जल्द विशालगढ़ पहुंचना चाह रहा था, उसके कानों में अब भी शेर की दहाड़ गूंज रही थी। हालांकि शेर ने दहाड़ना अब बन्द कर दिया था मगर शेर के डर की वजह से उसे हर जगह शेर की दहाड़ ही सुनाई दे रही थी। जंगल की गहराई अब कम होने लगी थी, पेड़ अब कम घने हो गए थे और उनके बीच ज़्यादा जगह दिख रही थी कालिया अब और तेज़ दौड़ने लगा……..। जल्द ही वो जंगल के किनारे पर आ गया। उसे विशालगढ़ की सीमा नज़र आने लगी। जल्द ही कालिया विशालगढ़ में दाखिल हो गया और अब भी बिजली की रफ्तार से भागता रहा। कालिया ने राजमहल से पहले पड़ने वाले बाज़ार में सुपर फास्ट एंट्री की, और द्रुतवेग से लोगों की भीड़ के बीच से गुज़रा। भीड़ बन्दर की भांति, इधर उधर कूद गई-ताकि-कोई टक्कर न खा जाए कालिया से। कालिया एक बुढ़िया के एकदम पास से गुज़रा। उस बुढ़िया की साड़ी उड़ गई। बुढ़िया मारे गुस्से के चीखी

बुढ़िया : कउन रहल रे दहिजरा के पूत !

कालिया अब महल के बिल्कुल करीब पहुंच चुका था, जैसे ही उसने महल को देखा उसका उत्साह और बढ़ गया और कालिया और ज़ोर से भागा

कसम बता दिया रिया हूँ मैं। कालिया इस वक़्त इतनी तेज़ भाग रहा था जितनी तेज़ फ़्लैश के दादा भी न भाग पाएं

कालिया ने सोच लिया था कि अब अस्तबल में नही। बल्कि सीधा महल में महल मे एन्ट्री मारेगा और महाराज को बाँकेलाल के बारे में बतायेगा। की एक घसियारा उसे लेकर गायब हो गया है………। और आखिरकार कालिया महल के दरवाजे पर पहुंचा और दोनों दरबानों को नज़रअंदाज़ करके सीधा अंदर घुस गया

दोनों दरबानों को हवा का झोंका सा लगा

पहला दरबान : (दूसरे से)मुझे लग रिया है अभी अभी कोई अंदर घुसा है।

दूसरा दरबान : हा हा हा। कोई नही घुसा। हवा का झोंका था वो।

महल के अंदर : सभा मे

महाराज विक्रम सिंह सिंहासन पर बैठे हुए थे और दाएं बाएं लाइन में मंत्रीगण तथा और कर्मचारी बैठे हुए थे तथा एक तरफ सेनापति-मरखप-गया था, मेरा मतलब खड़ा था। तभी कालिया ने सुपर फास्ट एंट्री की। कालिया बहुत स्पीड में था, उसने सोचा वो सभा में पहुंचकर रुक जाएगा और आराम से महाराज के पास जाएगा। सभा मे पहुंचने पर कालिया ने तुरंत ब्रेक लगा दिए। लेकिन यह क्या!!!, कालिया रुकने के बजाए फर्श पर फिसलने लगा उसने डर के मारे अपने चारों पैर फैला दिए और फिसलता हुआ महाराज की तरफ बढ़ने लगा। महाराज की निगाह उस पर पड़ी। मंत्री गण और मरखप ने भी इस दृश्य को टीप लिया। महाराज के मुख से चीख निकली

विक्रम सिंह : ई!!!!!!! यह क्या चीज़ आ रही है। बचाओ!!!!!!! सेनापति मरखप रोको इस चीज़ को।

मंत्रीगण तुरन्त अपनी कुर्सियों से फुदककर कर पीछे छिप गए। महामंत्री सेनापति के बिल्कुल पास था, उसने सेनापति को पकड़कर उधर धक्का दे दिया

मरखप : 💭अबे बे बे मरवाएगा क्या💭

लेकिन अब सेनापति मरखप के पास भागने का टाइम नही था, मरखप दोनों हाथ हवा में लहराने लगा

मरखप : ओये रुक जा बे गधे।

कालिया : गुर्रर्रर्र गधा बोल रिया है।

टाइम अप हो चुका था।…… कालिया पूरी तेज़ी से आता हुआ मरखप से टकराया। कालिया का सर सीधा मरखप के पेट मे घुसा था। मरखप की जीभ बाहर निकल गई और वह छटक कर महाराज की गोद मे जा गिरा। कालिया महाराज के सिंहासन के पास पहुंचकर खड़ा हो गया।

विक्रम सिंह : सेनापति मरखप। ठीक तो हो।

मरखप उनकी गोद से उतरा और ज़बान अंदर की

मरखप : महाराज मैं ठीक हूँ 💭बूहूहू साले ने सारी अंतड़ियां हिला डालीं💭

गुस्से में मरखप ने कालिया पर नज़र डाली

मरखप : 💭अरे यह तो कालिया है! बाँकेलाल के घोड़ों में से एक। गुर्रर्रर्र अब मैं समझ गया। इसे ज़रूर बाँकेलाल ने भेजा था महाराज को टक्कर जड़कर मारने के लिए💭

सेनापति महाराज की तरफ मुड़ा

मरखप : महाराज यह तो कालिया है। बाँकेलाल का घोड़ा। बाँकेलाल ने…..

कालिया बाँकेलाल का नाम सुनकर हड़बड़ा गया और महाराज के पास पहुंच कर उनके कपड़े मुंह मे पकड़कर खींचने लगा। मरखप कि बात अधूरी रह गई

विक्रम सिंह : यह मुझे कहीं ले जाना चाहता है। इसे तो बाँकेलाल जंगल मे लेकर गया था…कहीं बाँकेलाल मुसीबत में तो नही!

यह शब्द सुनकर कालिया और ज़ोर ज़ोर से महाराज को खींचने लगा

महाराज : (मरखप से) सेनापति! सेना तैयार करो। हम जंगल जाएंगे।

मरखप : जंगल जाने के लिए सेना की क्या ज़रूरत महाराज। सिर्फ एक लोटे की जरूरत पड़ती है।

महाराज ने मरखप को घूरा

मरखप : अच्छा महाराज मैं सेना तैयार करता हूँ हीही।

जल्द ही सेना तैयार हो गई जंगल जाने के लिए। सबके हाथों में लोटा था

विक्रम सिंह सेना के हाथों में लोटा देखकर बिगड़ गए

विक्रम सिंह : लोटा क्यों लेकर आये हो तुम लोग??!!!

सिपाही : महाराज । सेनापति जी ने हमसे कहा था तुमसब को जंगल चलना है। इसलिए हम जल्दी जल्दी लोटा लेकर आ गए।

महाराज : गुर्रर्रर्र हमे बाँकेलाल को बचाने जाना है। अपने अपने हथियार लेकर आओ। जल्दी करो।

सेनापति भी चिल्लाया

मरखप : जल्दी करो। हथियार लेकर आओ मूर्खों !

जल्द ही सेना एक बार फिरसे हाज़िर थी और इस बार उनके पास उनके हथियार थे। महाराज ने अपने रथ पर से सबको आगे बढ़ने का निर्देश दिया। और फिर सेना बढ़ चली जंगल की तरफ। सबसे आगे कालिया था जो रास्ता दिखा रहा था

युगम के आयाम में : कलियुग टीम का कक्ष

मेज के चारों तरफ, नागराज, ध्रुव, तिरंगा, स्टील, शक्ति और बाँकेलाल जी बैठे हुए थे

नागराज : (ध्रुव से ) तो तुम्हारे कहने का मतलब है हवलदार बहादुर टॉयलेट में से अंतर्ध्यान हो गए और कहीं चले गए।

ध्रुव : नही….हाँ वो वहां से अंतर्ध्यान हुए। लेकिन खुद नही…

तभी तिरंगा ने सवाल दाग दिया

तिरंगा : लेकिन ध्रुव। तुम यह कैसे कह सकते हो?

ध्रुव : अब तुम लोग मेरी बात ध्यान से सुनो। देखो तुमलोग कभी किसी ऐसे दुश्मन से तो ज़रूर लड़े होंगे, जिसके पास अंतर्ध्यान होने की शक्ति हो और जब वो तुमसे हारने लगा होगा तो अपनी इसी शक्ति की मदद से अंर्तध्यान होकर भाग गया होगा…

स्टील : तुम कहने क्या चाह रहे हो, मेरे भेजे में कुछ नही घुस रहा है।

तिरंगा : देख तो, हैक नही न कर लिया किसी ने?

स्टील : क्या बकवास कर रहा है!! दिमाग कौन हैक करेगा मेरा?

ध्रुव : तुम सब मेरी बात ध्यान से सुनो। और तुममे से कोई मुझे बताए, जिसके दुश्मन के पास अंतर्ध्यान होने की शक्ति हो।

नागराज कुछ सोचते हुए बोला

नागराज : नागपाशा के पास है यह शक्ति। नही नही! उसे तो गुरुदेव यंत्रो की मदद से टेलीपोर्ट कर लेता है अपने पास।

ध्रुव : सही है।

शक्ति : वैसे मुझे लगता है। अंतर्ध्यान होना भी उसी को बोलते हैं।

स्टील : हैं !! क्या बकवास है?

शक्ति : खैर छोड़ो। ध्रुव तुम कहना क्या चाहते हो यह बताओ।

एक बार फिर सब ध्रुव की तरफ घूमे

ध्रुव : देखो…….मैं तुमलोगों को अब सीधे सीधे बताता हूँ। मेरा सामना कई बार ऐसे विलेन्स से हुआ है, जिनके पास गायब होकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर फूट लेने की शक्ति थी….

शक्ति : तुम्हारे कहना का मतलब है, अदृश्य होने की शक्ति?

ध्रुव : अदृश्य होना अलग बात। मैं गायब होकर फूट लेने की बात कर रहा हूँ।

शक्ति : अच्छा ठीक है। तो तुम कहना क्या चाह रहे हो।

ध्रुव : देखो मेरा आज तक जितने भी ऐसे लोगों से सामना हुआ, जिनके पास अंतर्ध्यान होकर भाग जाने की शक्ति थी। मैंने इस शक्ति की एक बात नोटिस की।

तिरंगा : क्या??

ध्रुव : जब वो इस शक्ति का इस्तेमाल करके भागते थे, तो उस स्थान पर। जहाँ वो अंतर्ध्यान होने से पहले खड़े होते थे, धुँआ फैल जाता था। उसी प्रकार का धुँआ जो टॉयलेट में हवलदार बहादुर के गायब होने के पश्चात भर गया था।

तिरंगा : हाँ हाँ हाँ, मुझे समझ आ गया। मुझे भी याद आ गया । मेरा सामना एक ऐसे बदमाश से हुआ था जिसे मैंने अच्छे से धो डाला और फिर वो लड़ने के लायक न रहा। फिर मैं जैसे ही उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ा। ससुरा गायब होकर भाग गया-और-उस स्थान पर धुँवा छा गया।

नागराज : हाँ मेरा भी सामना हो चुका है ऐसे विलेन से। और उसके भागने के बाद मैंने भी धुँवा देखा था।

स्टील : अरे हाँ मेरा भी सामना हो चुका है।

ध्रुव : (मुंह बनाकर) अब सभी के सामने होने लगे।

शक्ति : (ध्रुव से) इसका मतलब। हम जब टॉयलेट के पास पहुंचे, उसी पल हवलदार जी गायब हुए?

ध्रुव ने कुछ सोचने के अंदाज़ में कहा

ध्रुव : नही…….। मुझे लगता है हवलदार बहादुर बहुत पहले ही गायब हो चुके थे।

तिरंगा : तो फिर धुँवा कैसे इतनी देर तक भरा हुआ था? वो भी इतना ज़्यादा।

ध्रुव एक-एक कि तरफ घूरता हुआ बोला

ध्रुव : तुम लोग ज़रा भी दिमाग इस्तेमाल नही कर रहे हो, अरे वो आग से निकला हुआ साधारण धुँवा थोड़ी न था। जो दीवारों से चिपक कर सूख जाता। हमलोगों ने जब टॉयलेट का दरवाजा खोला तब धुँवा बाहर निकल कर-हवा-में विलीन होकर गायब हो गया। अब समझ गए तुम लोग।

नागराज : मैं सब कुछ समझ गया, पर एक बात मेरी समझ मे नही आ रही है कि….

ध्रुव : हवलदार पास तो ऐसी कोई शक्ति नही है।

नागराज : हाँ।

ध्रुव : देखो……….। अब मैं समझ गया । क्या हुआ है।

शक्ति : क्या??

ध्रुव : हवलदार बहादुर को युगम ने गायब करके पृथ्वी पर उनके घर पहुंचा दिया है…।

सभी के मुंह से एक साथ निकला

‘क्या!!!!!!’

तिरंगा : लेकिन युगम ऐसा क्यों करेगा? वो तो किसी की कोई मदद नही करता….

ध्रुव : तरस खाकर।

स्टील : तरस खाकर??

स्टील ने हैरत भरे अंदाज़ में कहा

ध्रुव नागराज की तरफ मुड़ा

ध्रुव : नागराज तुम बता रहे थे कि हवलदार बहादुर की याददाश्त वापस आ गई थी….

बाँकेलाल : मुझसे मिलने के बाद, क्योंकि मेरी और उसकी मुलाकात पहले भी हो चुकी है।

ध्रुव : हुम्म…….। तो…..अब तुमलोग सुनो। हुआ यह होगा कि , जब उनकी याददाश्त वापस आ गई, उन्हें अपने और अपने परिवार के बारे में सबकुछ याद आ गया। तो उन्हें उनकी बहुत याद आने लगी होगी। वो परेशान भी हो गए होंगे, की उनके परिवार का पता नही क्या हाल होगा। और शायद वो जमकर रोना चाहते होंगे।

शक्ति : रोना चाहते होंगे…..।

ध्रुव : हाँ । तभी तो वो आते ही टॉयलेट में घुस गए, ताकि जमकर आंसू बहा सकें।

उसी वक़्त स्टील को जोरदार हंसी आने लगी, हंसी के मारे वो दोहरा हो गया

नागराज : क्या हुआ बे???

स्टील : हा हा हा, ध्रुव का दिमाग लगता है चल गया है, कैसी अजीब अजीब बातें कर रहा है। हवलदार बहादुर रोना चाहते होंगे। वो छोटा सा बच्चा है क्या जो रोना चाहता था। हा हा हा हा हा हा हा हा हा ।

ध्रुव शांति से जवाब देता है

ध्रुव : एक काम करता हूँ। तुम्हे भी मैं ले जाकर किसी भयानक आयाम के भयानक ग्रह पर फेंक देता हूँ, जहाँ तुम्हारे सिवा कोई नही होगा। तीस साल तक वहीं पड़े रहना तुम, देखना हूँ तुम्हे अपने परिवार को याद करके रुलाई आती या हंसी आती है।

स्टील का थोबड़ा खिसियाहट के मारे लटक गया नागराज, अपनी जगह पर खड़ा हुआ

नागराज : एक मिनट एक मिनट….। नागराज ने ध्रुव की तरफ नज़र घुमाई

नागराज : ध्रुव तुम यह कहना चाह रहे हो, की युगम ने हवलदार बहादुर को वापस पृथ्वी पर भेज दिया है। क्योंकि हवलदार बहादुर को रोता देखकर उसे उसपर तरस आ गया।

ध्रुव : बिल्कुल सही।

नागराज : तो फिर चलो युगम से ही चलकर पूछ लेते हैं न। और वैसे भी। अच्छी बात है हवलदार बहादुर अपने घर पहुंच गए।

स्टील : हाँ चलो युगम से ही पूछ लेते हैं अब। लेकिन उससे पहले मैं एक बात सवाल पूछना चाहता हूँ।

ध्रुव : क्या???

स्टील : युगम हवलदार बहादुर की मदद करेगा ही क्यों? जबकि वो किसी की मदद नही करता।

ध्रुव : वो हमारी मदद नही करता है, क्योंकि हम सर्वनायक के प्रतिभागी हैं। जबकि हवलदार बहादुर का इससे कोई लेना देना नही है। इसीलिए जब वो टॉयलेट में बैठकर रो रहे होंगे, तब युगम को उन पर तरस आ गया और उसने उन्हें अंतर्ध्यान करके पृथ्वी पर पहुंचा दिया होगा।

स्टील : समझ गया।

तिरंगा : अब मुझे भी एक बात कहनी है।

सभी एक साथ : क्या??

तिरंगा : यह युगम बड़ा ही बदतमीज़ बन्दा है, टॉयलेट में भी नज़र रखता है।

इससे पहले की तिरंगा की इस बात पर सब जमकर हँसते। वहां अवधि प्रकट हो गई

सभी के मुंह से एक साथ स्वर फूटे

‘अरे अवधि तुम!!’

अवधि : हाँ मैं। नागराज और ध्रुव तथा बाँकेलाल जी। आपलोगों को युगम ने बुलाया है वो बहुत बड़ी मुसीबत में हैं।

इस खबर को सुनने के बाद बाँकेलाल की बांछे खिल गई

बाँकेलाल : 💭हीहीही लगता है मेरी योजना कामयाब हो गई💭

नागराज , ध्रुव और बाँकेलाल अवधि के पीछे चल दिये। नागराज तथा ध्रुव को समझ नही आ रहा था कि युगम के ऊपर कैसी समस्या आ गई। वो दोनों अभी खुद उसके पास जाने वाले थे हवलदार बहादुर के बारे में पूछने के लिए-मगर-युगम किसी भयंकर मुसीबत में पड़ कर खुद ही उन्हें बुला रहा है, क्या हो सकती है वो मुसीबत

जबकि बाँकेलाल

बाँकेलाल : 💭हीहीही। आखिरकार योजना सफल हो गई, मुझे पक्का पता है कि क्या हुआ है उस युगम के साथ-जमाल घोटा-मिला हुआ गधी का दूध आखिकार पी लिया उसने हीही। अब । बस युगम का सिंहासन मुझे मिल जाएगा, उसके बाद मैं करूंगा पूरे ब्रह्मांड का बेड़ा गर्क।💭

युगम के ही आयाम में : एक दूसरे ग्रह पर
काल परमाणु की लाश अपने कंधों पर टांग कर एक ओर तेज़ी से बढ़ता जा रहा था

काल : लप लप लप लप लप। आररररर्घ्घघघ । मुझे युगम क्षेत्र का रास्ता नही मिल रहा है, कहाँ है? कैसे पहुंचूंगा मैं युगम क्षेत्र। गरर्रर्रर्रर्रर्र कोई बात नही जल्द ही रास्ता मुझे मिल जाएगा। जल्द ही पहुँचूँगा मैं युगम क्षेत्र।

●चतुर्थ अध्याय समाप्त●

क्रमश :

दोस्तों दोस्तों दोस्तों।
बूहूहू माफ कीजियेगा, आपलोग भी सोच रहे होंगे मैं कितना बड़ा बेहया किस्म का इंसान हूँ। एक तो कहानी लिखने में इतना लेट करता हूँ ऊपर से हर पार्ट में यही वादा करता हूँ कि यह आखिरी है, यह आखिरी है। पर । पर वादा पूरा नही कर पा रहा। मुझे बेहद अफसोस। भाई बहुत परेशानियां चल रही हैं मेरे साथ।
पर जैसा आपने इस भाग में पढ़ा। घटनाएं तेज़ी से घटनी शुरू हो चुकी हैं। कुछ ही वक़्त में काल युगम क्षेत्र पहुंच जाएगा और फिर युद्ध शुरू हो जाएगा। अगले पार्ट में बहुत कुछ मालूम चलेगा। और मैं इस बार पक्का वादा करता हूँ अगला पार्ट आखिरी होगा-अगर-मैंने वादा पूरा नही किया तो आपलोग मेरी कहानियां पढ़ना ही छोड़ दीजियेगा।

अब इस कहानी को पढ़कर जल्दी जल्दी रिव्यूज़ दे दीजिए, आपके रिव्यूज़ जितने ज्यादा और जितने अच्छे होंगे। अगला पार्ट उतनी ही जल्दी मिलेगा। देखिए एक बात मैं बता देता हूँ।
जब मैं आपलोगों अच्छे और ज़्यादा से ज़्यादा रिव्यूज़ देखता हूँ न तो इतना अच्छा लगता है कि उसी वक़्त अगला पार्ट लिखना शुरू कर देता हूँ और तब कहानी भी बढ़िया लिख पाता हूँ। लेकिन कम रिव्यूज़ देखने के बाद लिखने का मन ही नही करता और अगर लिखता भी हूँ तो उतना अच्छा नही लिख पाता। तो मैं यही कहना चाहता हूँ । रिव्यू ज़रूर दें।

धन्यवाद😊

Written By Talha Faran for Comic Haveli 

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10 Comments on “Sarvnayak Se Trast Part 10”

  1. बहुत बढ़िया कहानी है ।
    हँसते हँसते पेट दर्द होने लगा।
    मज़ा आ गया।

  2. Bahut badhiya, bahut maza aaya, waqt par part aayenge to lambi kahani se koi fark nahi padta. Aap aise hi badhiya kahani likhte rahe

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