The Black Demon Part 3

श्रृंखला :- The black demon [ part 3 ]

अध्याय तीन

ब्लैक कॉफिन


रिकैप :- अब तक आपने पढ़ा की किस तरह प्रोफेसर जावेद अपने असिस्टेंट अब्दुल के साथ मोहन नगर के काले जंगलों में भटकते हैं। उन काले जंगलों में जहाँ कभी काले राक्षसों का राज हुआ करता था। प्रोफेसर और अब्दुल उन जंगलों में भटकते हुए राक्षसों के महल तक जा पहुँचते हैं। वे महल में दाखिल होते हैं और काफी इधर उधर घूमने के बाद उन्हें एक तहखाना मिलता और उस तहखाने में उन्हें मिलता है एक मकबरा जिसमे रखा होता है एक…..Black Coffin

अब आगे :-

प्रोफेसर के वकील दिव्यांशु त्रिपाठी धड़धड़ाते हुए अंदर दाखिल हुए थे। उनके पीछे चार पांच लोग और थे जो साथ दाखिल हुए थे। दिव्यांशु त्रिपाठी अपने स्थान पर आ कर रूक गए।

“देर से आने के लिए माफ़ी चाहूँगा माय लॉर्ड। पर सुबूत और गवाहों को साथ लाना ज़रूरी था।” दिव्यांशु त्रिपाठी सर झुकाते हुए बोले।

प्रोफेसर जावेद ने उन पाँचों लोगों पर नज़र डाली और मुस्कुरा दिए। वो पांचो भी हल्के से मुस्कुरा दिए ।

“तो कैसे सुबूत और गवाह ले कर आए हैं आप? मिस्टर दिव्यांशु।”  जज ने पूछा।

“माय लॉर्ड। सब से पहले मैं गवाहों को कटघरे में पेश करने की इजाज़त चाहूँगा।”

“इजाज़त है” जज साहब हाथ का इशारा करते हुए बोले।

“थैंक यू” दिव्यांशु साहब पलटे और उन पांच व्यक्तियों को इशारा किया । जल्द ही वे पांचो कटघरे में खड़े थे।

दिव्यांशु त्रिपाठी जज की ओर मुखातिब हुए “जज साहब । इन से मिलिए , ये हैं प्रोफेसर जावेद के दोस्त अमन, अनिल, सुनील, साहिल और समीर जी। इन लोगों को प्रोफेसर ने जंगल के पास वाले हाईवे पर बुलाया था।”

“पर हम कैसे मान लें की ये वही लोग हैं!” उत्कर्ष पाल जो अभी तक शांत हो चुके थे एक बार फिर एक्शन में आ गए।

“आपको मानना तो पडेगा ही। क्योंकि इन्ही लोगों से प्रोफेसर ने मुलाक़ात की थी” दिव्यांशु जबड़ा भींचते हुए बोले।

इस बार उत्कर्ष पाल ने नया सवाल कर डाला। “अगर ये लोग प्रोफेसर के दोस्त थे तो प्रोफेसर ने बताया क्यों नही?”

“क्योंकि प्रोफेसर नही चाहते थे की उनके दोस्तों की जान भी खतरे में पड़ जाए!” दिव्यांशु त्रिपाठी लगभग क्रोधित होते हुए बोले।

“प्रोफेसर नही चाहते थे की उनके दोस्तों की जान भी खतरे में पड़े, से क्या मतलब है आपका?”  उत्कर्ष पाल चौंककर बोले।

“ये खुद प्रोफेसर बताएंगे…” दिव्यांशु त्रिपाठी ने प्रोफेसर की ओर मुड़ते हुए कहा “प्रोफेसर अब आप बताईये आपको कैसी धमकियां दीं गई थीं?”

प्रोफेसर जावेद ने जैसे कुछ सोचा और सांस खींचते हुए बोलना शुरू किया ।
“जब तक मैंने अपना एक्सपेरिमेंट राज़ रखा था तब तक सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन जब मैंने मीडिया में इतनी बड़ी कामयाबी का ज़िक्र किया अपने एक्सपेरिमेंट के बारे में बताया, उसके दुसरे ही दिन मुझे एक अनजान नंबर से कॉल आई, कोई शख्स था जिसने मुझसे मेरा एक्सपेरिमेंट उसके हवाले कर देने के लिए कहा। मैंने उससे बिना डरे मना कर दिया और फोन काट दिया। लेकिन फिर अगले दिन उस शख्स की कॉल आई । इस बार उसने मुझे जान से मारने की धमकी दी। उसने कहा की बैठे बैठे वो मेरे घर को बम से उड़ा सकता है। और अचानक ही मेरे सामने मेज़ पर रखे गमले में ब्लास्ट हो गया। उधर फोन पर वो शख्स अट्टहास कर उठा। उसने मुझसे कहा , ‘तेरे पास आखिरी मौक़ा है, या तो खुद अपना एक्सपेरिमेंट हमारे हवाले कर या अपनी गुप्त लैब का पता बता, हम खुद वो एक्सपेरिमेंट ले उड़ेंगे। और हाँ पुलिस या अपने अन्य किसी साथी को कुछ मत बताना वरना तेरे साथ साथ वो भी मरेंगे। हा हा हा’  कॉल काट दी गई। मैं बहुत ज़्यादा डर गया था। समझ में नही आ रहा था अब क्या करूँ। तब मैंने अपने सच्चे दोस्तों से मदद लेने के बारे में सोचा..”

“और वे दोस्त हम हैं।” कटघरे में खड़े पाँचों शख्स ने हाथ उठा कर कहा।

प्रोफेसर दुबारा बोलने लगे। “हाँ। इन्हें ही मैंने शहर के बाहर वाले हाईवे पर बुलाया था, मदद के लिए।”

“और हम ने प्रोफेसर की हेल्प के लिए एक ख़ास तरह का सुरक्षा यन्त्र तैयार किया था। ताकि प्रोफेसर की लैब को कड़ी सुरक्षा मिल सके।” उन पाँचों में से एक, अनिल ने कहा।

“और उसी यन्त्र को हम सूटकेस में पैक कर के लाए थे ।” अमन ने आगे कहा।

“अच्छा ! बड़ी सच्ची कहानी बनाई है।” उत्कर्ष पाल ने कहा। “परन्तु ये कहानी तो तभी सच्ची होगी न जब वो सूटकेस और उसमे रखा सुरक्षा यन्त्र हमे देखने को मिलेगा।” उत्कर्ष पाल ने विजयी मुस्कान के साथ कहा।

“वो सूटकेस तो तभी मिलेगा न जब अब्दुल उसे यहाँ लेकर उसपस्थित होगा।” दिव्यांशु त्रिपाठी ने एक रहस्मयी मुस्कान के साथ कहा।

“क्या मतलब है आपका?” उत्कर्ष पाल का होठ सिकुड़ गया।

दिव्यांशु त्रिपाठी ने विजयी मुस्कान के साथ जवाब दिया “मतलब ये की असली मुजरिम वही है।”

“क्या!!!”

दिव्यांशु जी के मुंह से ये जुमला सुनते ही सभी ने मुंह फाड़ दिए । प्रोफेसर जावेद की तो आँखें भी फट पड़ीं थीं।

“ये आप क्या कह रहे हैं ? वकील साहब।” प्रोफेसर ने हैरत से पूछा।

“सच कह रहा हूँ मैं। आपकी लैब से आपका एक्सपेरिमेंट उड़ा देना वाला आपका अपना असिस्टेंट अब्दुल उर्फ़ अब्दुल्लाह अली ही है।”

“नही ये झूठ है। मैं नही मानता । ये बिल्कुल झूठ है, वो ऐसा नही कर सकता।” प्रोफेसर नज़रें इधर उधर करते हुए बोले।

“अच्छा! तो फिर आज वो यहाँ उपस्थित क्यों नही है। ये बताना चाहेंगे आप?” दिव्यांशु ने पूछा।

प्रोफेसर बोले “क्योंकि तीन दिन पहले ही उसका एक्सीडेंट हो गया था। उसके बाएं पैर पर कार चढ़ गई थी।”

“पर फिर भी अब्दुल आराम से चल ले रहा था फर्क इतना था की वो हल्का लँगड़ा रहा था।और आपके लैब में चोरी कब हुई? आज से दो दिन पहले।” इतना कहकर दिव्यांशु त्रिपाठी ने एक पेन ड्राइव अपनी जेब से निकाली और जज की ओर बढ़ा दी। “माय लॉर्ड, इस पेन ड्राइव में वो वीडियो है जो प्रोफेसर की लैब के ठीक बाहर लगे कैमरे ने शूट की थी। चोर चाहे जितना भी शातिर हो, वो गलती कर ही जाता है, उसने सभी कैमरे से तो खुद को बचा लिया पर उस छोटे कैमरे की नज़रों से नही बच सका जो लैब के दरवाज़े में एक कोने में चिपका हुआ था।”

वीडियो प्ले किया गया। जज साहब की आँखों के सामने वीडियो चलने लगा। और उस वीडियो में नज़र आया वो शख्स जिसने काले कपड़े पहन रखे थे और मुंह पर काला मास्क था।

अचानक दिव्यांशु जी जज साहब से बोले “आप इसकी चाल को नोट कर रहे हैं? देखिये लँगड़ा कर चल रहा है। और जिस पैर से ये लँगड़ा रहा है वो बायाँ पैर है।”

दिव्यांशु ने तो मानो पठाका फोड़ दिया था। जज के साथ प्रोफेसर की आँखें भी फ़ैल गईं।

“लेकिन ये कैसे हो सकता है की वो अब्दुल ही हो।” प्रोफेसर ने पूछा।

“बताता हूँ।” दिव्यांशु साहब ने अपनी जेब से इस बार एक प्लास्टिक की पुड़िया निकाली और उसे खोल कर उसमे से निकाला “जूते का फटा हुआ चमड़ा। ये चमड़ा मुझे प्रोफेसर की लैब की काफी छान बीन करने के बाद मिला था। मुझे उम्मीद नही थी की ये छोटा सा चमड़ा मुझे मुजरिम तक पहुँचा देगा पर फिर भी मैंने इसे अपनी जेब में रख लिया। अब्दुल पर शक तो मुझे तब ही हो गया था जब पूछताछ करने पर वो सही ढँग से कुछ नही बता रहा था और आनाकानी कर रहा था। इसलिए मैं इस चमड़े को लेकर सीधा उस मोची के पास पहुँचा जहाँ से अब्दुल अपना जूता सही करवाता था। उससे पूछताछ करने पर पता चला की ये अब्दुल के जूते का ही चमड़ा था। और किस्मत से अब्दुल ने अपना जूता उसी दिन उस मोची के यहाँ छोड़ा था बनने के लिए। मैंने चमड़ा मिलाया । बिल्कुल उसी शेप में कटा हुआ चमड़ा उसके जूते से निकला हुआ था। और मोची के द्वारा पहचान करने पर मेरा शक पक्का हो गया। यानी की जिसे ढूँढा था गली गली, वो छुरी बगल में ही मिली। अब्दुल ने ही चोरी की थी उसी ने वो सूटकेस भी चुरा लिया ताकि प्रोफेसर अपनी लैब की सुरक्षा न बढ़ा सकें।”

दिव्यांशु त्रिपाठी की बात खत्म हुई और प्रोफेसर के चेहरे पर चिंता और घबराहट के भाव उभर आए। ऐसा कैसे हो सकता है , उनका अपना विश्वासपात्र असिस्टेंट जिसके साथ प्रोफेसर ने काले जंगल में वो ताबूत पाया जो प्रोफेसर के नाम को पूरी दुनिया में ऊंचा करने वाला था। वो शख्स प्रोफेसर को धोखा कैसे दे सकता है जो उनके साथ उस जंगल में गया था। प्रोफेसर का दिमाग पुरानी यादों में घूमने लगा…

*

आज से 15 माह पहले :-

प्रोफेसर और अब्दुल हैरत के मारे आँख फाड़े हुए उस ताबूत के पास खड़े थे, उस Black coffin के पास। उस विशालकाय तहखाने में अजीब सा मनहूस सन्नाटा फैला था। जैसे किसी की मृत्यु हो गई हो। अब्दुल अब पूरी तरह डरा हुआ लग रहा था।

“प्रोफेसर! मुझे कुछ सही नही लग रहा। हमे फौरन यहां से निकल चलना चाहिए।” अब्दुल ने बुरी तरह कांपते हुए कहा।

परन्तु प्रोफेसर तो प्रोफेसर थे। “अद्भुत! यकीन नही होता। राक्षस भी अपने मकबरे बनवाते थे! और खुद को ताबूत में रखवाते थे! अद्भुत! बहुत ही अद्भुत!”

“आप के इस अद्भुत के चक्कर में मैं भूत बन जाऊँगा। प्रोफेसर जल्दी चलिए यहाँ से प्लीज़।”

“अब्दुल। तुम भी न। एक साइंटिस्ट को कभी डरना नही चाहिए।”
कहते हुए प्रोफेसर ताबूत के चारों ओर घूमने लगे। “अद्भुत है इसकी डिज़ाइन। इसके कोनों पर कुछ अजीब सी भाषा लिखी हुई है।”
अचानक प्रोफेसर ने ताबूत के ऊपर हाथ रख दिया। और ऐसा करना उन्हें अब भारी पड़ने वाला था। उस ताबूत पर हाथ रखते हि अचानक उस तहखाने में हलचल होने लगी। अजीबो गरीब डरावनी और भयावह आवाज़ में जैसे सैंकड़ों लोग रूदन करने लगे। अब्दुल ने अपने कानों पर हाथ धर लिए और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगा। प्रोफेसर की आँखें और मुंह फैल गए।
अचानक ऊपर से कुछ आकर नीचे गिरा और ज़मीन पर जमा धुंवा हल्का सा ऊपर उठ गया। प्रोफेसर ने उस चीज़ को देखा । और पहली बार उनकी भी आँख में डर नज़र आया। वो एक बड़ा पत्थर था जो छत से उखड़कर नीचे आ गिरा था। प्रोफेसर चिल्लाए। “अब्दुल!! जल्दी करो! मेरी मदद करो, हमे इस ताबूत को ले कर यहाँ से जल्द से जल्द भागना होगा!!!”
वो ताबूत काफी बड़ा और लम्बा था , पर जब प्रोफेसर और अब्दुल ने मिलकर उसे उठाया तो न जाने कैसे वो एकदम आराम से उठ गया। प्रोफेसर और अब्दुल सरपट भागते हुए सीढ़ी तक पहुँचे। अब तहखाना हिलने लगा था, जैसे भूकम्प आ गया हो। छत से एक एक कर के ईंटे नीचे गिर रही थीं। प्रोफेसर तथा अब्दुल जल्दी जल्दी भागते हुए सीढियां चढ़ने लगे। ज्यों-ज्यों वो सीढ़ियों पर बढ़ते जा रहे थे कम्पन तीव्र होता जा रहा था। अचानक एक बड़ा पत्थर प्रोफेसर के ठीक पीछे वाली सीढ़ी पर गिरा और सीढ़ी टूट गई। प्रोफेसर की सांस आधी ऊपर आधी नीचे रह गई। इसके बाद प्रोफेसर और अब्दुल की रफ़्तार और बढ़ गई। जल्द ही वो ताबूत को लेकर तहखाने से बाहर निकल चुके थे और अब महल में खड़े थे। उन दोनों ने राहत की सांस अभी ली भी नही थी की महल की ज़मीन नीचे गिरने लगी। ऐसा तहखाने की छत टूटने की वजह से हो रहा था। प्रोफेसर और अब्दुल ने अपने जीवन की सबसे तेज़ दौड़ लगाई ताबूत टाँगे हुए। उनके पीछे की ज़मीन भड़-भड़ कर के नीचे गिरती जा रही थी। ज़मीन का गिरना कुछ ही पलों में प्रोफेसर और अब्दुल के कदमों तक पहुँच गया अब किसी भी पल वो दोनों भी ज़मीन के नीचे गिर जाने वाले थे और फिर वहीँ  उनकी कब्र बन जानी थी । परन्तु उससे पहले ही एक लम्बी छलांग के साथ दोनों महल के विशाल द्वार से सीधा जंगल में आ कर गिरे। दोनों के वापस मुड़ने से पहले ही पूरा महल गिर कर ध्वस्त चुका था। रह गया था तो सिर्फ उस महल का विशालकाय टूटा फूटा द्वार।

अब्दुल जल्दी जल्दी लम्बी साँसे खींचने लगा। करीब दो तीन मिनट के बाद उसके मुंह से स्वर निकले। “प्रोफेसर! हम ने बहुत बड़ी गलती कर दी। ये सब हमारी वजह से ही हुआ है। हमने उनका महल गिरा दिया, अब उनकी आत्माएं हम से बदला लेंगी!”

“फ़ालतू की बकवास मत करो” प्रोफेसर अपने कपड़े झाड़ते हुए बोले “उस खण्डहर हो चुके महल को किसी न किसी दिन गिरना ही था।”

जल्द ही अब्दुल और प्रोफेसर ताबूत के साथ काले जंगल से बाहर अपनी जीप के पास खड़े थे। सूरज अब नीले आसामान में डूब रहा था, चिड़ियाँ अपने घोंसलों में चहचहा रही थीं और बादलों के पीछे छिपकर सोता हुआ चाँद जाग कर बाहर आ रहा था।

*

वर्तमान में :-

प्रोफेसर को विश्वास नही हो रहा था। वही अब्दुल जो हमेशा डरा-डरा रहता था, जब से वो काले जंगल से हो कर आया था। वो ऐसा कैसे कर सकता है? वो उस ताबूत और उसमे रखे राक्षस कंकाल को चुराकर क्या करेगा?

तभी अदालत में भीड़ के बीच बैठा वो शख्स जिसने अपना चेहरा नकाब से ढाँक रखा था, खड़ा हो गया और तालियाँ पीटने लगा। “वाह दिव्यांशु त्रिपाठी वाह! दाद देनी होगी तेरे दिमाग की! तूने पता लगा ही लिया की मैं ही असली मुजरिम हूँ।”  अब्दुल ने अपने चेहरे से नकाब हटाते हुए ज़हरीली मुस्कान दी।

“अब्दुल!!!”  प्रोफेसर के मुख से हैरत से भरा स्वर निकला।

“हाँ मैं! मैंने ही चुराया है तेरा एक्सपेरिमेंट। और क्यों चुराया इसका जवाब तेरे साथ साथ पूरी दुनिया को बहुत जल्द मिलने वाला है। हा हा हा ।” अब्दुल पीछे पलटा और तेज़ी से बाहर भागा।  इंस्पेक्टर मनोज दहाड़ उठे। “पकड़ो उसे ! जल्दी!”

अब्दुल अदालत के एग्जिट डोर से बाहर निकल चुका था। पुलिस के सिपाहे धड़धड़ाते हुए उसके पीछे लपक चुके थे। न्यायालय के बाहर काफी चहल-पहल थी। लोग इधर से उधर आ जा रहे थे। इतनी भीड़ में अब्दुल को ढूढ़ना मुश्किल था। इंस्पेक्टर मनोज ने वॉकी-टॉकी पर सबको अच्छी तरह से अलर्ट किया। पुलिस फ़ोर्स भीड़ में घुस गई। लोग अजीब निगाहों से उन्हें देखने लगे। इंस्पेक्टर मनोज का माथा ठनका हुआ था “साला! भरी अदालत में हमारे सामने से निकल भागा । शिट।”

पर अब्दुल भागा कहाँ था। भागेगा तो अब। एक घर्रर्रर्र-घर्रर्रर्र की आवाज़ गूंजी। सब से पहले इंस्पेक्टर मनोज की आँखों ने देखा अब्दुल को। अब्दुल ने बाइक पर बैठे हुए ही अपनी दो उँगलियों से पहले अपनी आँखों की ओर इशारा किया फिर उन्ही उँगलियों से इंस्पेक्टर मनोज की ओर इशारा किया। इंस्पेक्टर मनोज वॉकी-टॉकी पर चिल्लाए। “पकड़ो उसे! हरिअप!”

सभी पुलिसकर्मी फौरन अब्दुल की ओर दौड़े । परन्तु उससे पहले ही अब्दुल एक कुशल रेसर की भाँती अपनी बाइक को भीड़ के बीच से इधर उधर नचाता हुआ रोड पर पहुँच गया जब इंस्पेक्टर मनोज जीप की ओर लपके।

घर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रsssss

गांधी नगर हाईवे पर एक ज़बरदस्त चेसिंग चल रही थी।

तीन पुलिस जीपें, साथ में दो बाइक सवार पुलिस और इन सब से आगे अब्दुल अपनी बाइक से भागा जा रहा था। हवाएं उसके कानों के पास से सनसनाती हुई भाग रही थीं। चिलचिलाहट भरी दोपहर का वक़्त होने के कारण इस समय हाईवे पूरा सुनसान था । और उस सुनसान हाइवे पर पुलिस की गाड़ियां और अब्दुल के बाइक की आवाज़ कान फाड़ने वाले शोर पैदा कर रहे थे।
अब्दुल पूरी स्पीड से भागता जा रहा था और उसके पीछे पड़ी पुलिस भी उतनी ही तेज़ी से उसका पीछा कर रही थी। अचानक अब्दुल को दिखी वो बोलेरो जो उसी हाइवे पर कुछ दूर खड़ी हुई थी। उस बोलेरो ने आधे से हल्का सा कम रास्ता छेका हुआ था और उससे आधा जो रास्ता बचा था उसे जल्द ही वो बस आ कर छेका लेने वाली थी जो बड़ी दूर से आती हुई नज़र आ रही थी , पर वो जिस स्पीड से आ रही थी उस हिसाब से वो अब्दुल से जल्दी वहां पहुँचने वाली थी। अब्दुल की आँखें सिकुड़ गई। उसका पीछे कर रहे इंस्पेक्टर मनोज ने भी देखा वो दृश्य और उसके चेहरे पर मुस्कान थिरक आई।
अचानक अब्दुल ने अपनी बाइक का एक्सलेटर पूरा का पूरा चाँप दिया। मनोज के चेहरे पर आई मुस्कान गायब हो गई। वॉकी-टॉकी पर उसने बाइक सवार पुलिस कर्मियों को आदेश दिया। “रफ़्तार बढ़ाओ!!! इससे पहले की वो बोलेरो को पार कर जाए उस तक पहुँचो! वरना हम उसे शायद नही पकड़ पाएंगे, क्यों की बस की वजह से हमे अपनी गाड़ियों की रफ़्तार कम करनी पड़ेंगी!”
इंस्पेक्टर मनोज के आदेश पर बाइक सवार पुलिस कर्मियों ने भी पूरा एक्सलेटर चाँप दिया।
अब्दुल ने पीछे मुड़कर देखा। बाइक सवार पुलिस कर्मी उससे चार पांच कदम की ही दूरी पर थे। अब्दुल ने और स्पीड बढ़ाई। अब उसके और बोलेरो के दरमियान पन्द्रह सेकेंड्स का फासला रह गया था। जल्द ही यह फासला पांच सेकेंड्स का हो गया। पर हाय अब्दुल की फूटी किस्मत, वो बस उससे पहले बोलेरो तक पहुँच गई और बाकी बची जगह भी समाप्त हो गई। अपनी जीप में बैठा हुआ इंस्पेक्टर मनोज हल्का अट्टहास कर उठा । ड्राईवर की तरफ देखते हुए उसने कहा “अब ये कहाँ जाएगा। अब इसका खेल….”
परन्तु मनोज के वाक्य अधूरे और मुंह पूरा का पूरा खुला रह गया जब अब्दुल की बाइक घरघराती हुई कूद कर उस बोलेरो को पार करती चली गई। अब्दुल के पीछे लगे बाइक सवार अत्यंत रफ़्तार में होने के कारण ब्रेक लगाते-लगाते भी जा कर बोलेरो से टकरा ही गए। एक भीषण टक्कर हुई और बाइक्स के साथ बोलेरो के भी चीथड़े हो गए। एक ज़ोरदार विस्फोट हुआ और बोलेरो हवा में उड़ गई। अब्दुल ने अपनी रफ़्तार कम की और पीछे मुड़कर इंस्पेक्टर मनोज को अंगूठा दिखाकर रफ़्तार फिर से बढ़ाकर भाग निकला जब बोलेरो वापस रोड पर आ कर गिरी।

गांधीनगर हाईवे अब समाप्त होने वाला था और शुरू होने वाला था “सिटी का वो विशालकाय पुल जो समुद्र के ऊपर बनाया गया है। इससे पहले की अब्दुल उस पुल तक पहुंचे हमे उस तक पहुंचना है, क्यों की उस पुल पर दोपहर के वक़्त भी काफी जाम लगा होता है। अगर अब्दुल उस जाम में गुम हो गया तो उसे पकड़ना और मुश्किल हो जाएगा। जल्दी करो। क्विक।” इस्पेक्टर मनोज ने आखिरी आदेश दिया।

गांधी नगर की सीमा पर:-

एक कॉमिक्स लाइब्रेरी के बाहर एक युवक अपनी बाइक पर बैठा हुआ था। उसने पीठ पर बैग टांग रखा था। चेहरे से कोई हीरो से कम नही, देखने से उम्र 17-18 के आस पास लग रही थी। उसकी हल्की हरी आँखों में अद्भुत चमक थी। उसने जीन्स और शर्ट पहन रखी थी, उसके सर के बाल बहुत खूबसूरत और नए स्टाइल में कटे हुए थे। पैरों में स्टाइलिश जूते । युवक देखने से जितना स्मार्ट लग रहा था उसकी बाइक उतनी ही पुरानी लग रही थी। वो बैठा-बैठा बाइक की पेट्रोल टँकी पर तबला बजा रहा था और गा रहा था “मेरे सपनो की रानी कब आएगी तू….आई रुत मस्तानी कब आएगी तू….चली आ तू चली आ…”

“आ गई तेरे सपनों की रानी।” एक और नौजवान युवक बाइक पर बैठे युवक के पास आता हुआ बोला। उसके हाथ में राज कॉमिक्स का नया सेट था । उसकी आँखें भी हल्की हरी थीं, जिनपर उसने डबल  बैटरी वाला चश्मा लगा रखा था । उसने गहरी नीली जीन्स और ब्लैक शर्ट पहनी हुई थी। सर पर तिरछा कैप लगा रखा था। उसके चेहरे पर भी वैसा ही तेज़ था जैसा बाइक पर बैठे युवक के था। उस युवक ने बाइक वाले युवक की ओर कॉमिक्स बढ़ाते हुए कहा “ले तेरे सपनों की रानी।”

“वाह! थैंक यू मेरे भाई।” बाइक वाले युवक ने कॉमिक्स लपकते हुए कहा।

“चल-चल! तुझसे एक घण्टा छोटा हूँ इसी बात का फायदा उठा लेता है। अगर तू छोटा होता तब बताता मैं।”  दूसरे युवक ने नाक फुलाते हुए कहा।

“अरे नाराज़ क्यों होता है छोटे भाई। चल तू भी पढ़ लियो, पहले इसे बैग में रख दे , प्यारे बॉन्ड।” बाइक वाले युवक ने बॉन्ड की ओर कॉमिक्स बढ़ा दी। बॉन्ड ने कॉमिक्स उस युवक की पीठ पर टँगे बैग में रखना शुरू कर दिया।

“रख दिया। अब चल बाइक स्टार्ट कर जेम्स।” बॉन्ड ने कहा।

जेम्स नज़रे तिरछी कर के बॉन्ड को घूरने लगा।

“क्या हुआ? बाइक क्यों नही स्टार्ट कर रहा?”

“करूँगा न । पर पहले उन दो नैनो मॉस्कीटोज़ को वापस मेरे बैग में रख दे।” जेम्स ने गुर्राते हुए कहा।

“कौन से नैनो मॉस्कीटोज़?” बॉन्ड ने भी गुर्राते हुए पूछा।

“वही जो तूने अभी अभी मेरे बैग से निकाल कर अपने दोनों कानों में ठूंसे हैं, गाना सुनने के लिए। वे अब खराब हो चुके हैं । तेरी ही वजह से । मैंने उन्हें गाना सुनने के लिए नही बनाया था! पर तूने गाना सुन सुनकर उन्हें खराब कर दिया। काश मैंने उनमे म्यूजिक इक्विपमेंट डाला ही न होता।”

“और न ही ब्लूटूथ कनेक्टर।”  बॉन्ड ने चिढ़ाते हुए कहा।

“गुर्र। चोरी और सीना जोरी! अब चुपचाप उन्हें बैग में रख दे, कान से निकालकर। वरना गाना सुनाने के बजाए तेरे पर्दे फाड़ते हुए बाहर निकल जाएंगे खराब हो चुके वे नैनो मॉस्कीटोज़।”   जेम्स दांत दिखाते हुए बोला।

“अरे बाप रे! ले भाई रख देता हूँ मैं।”   बॉन्ड ने उन्हें वापस जेम्स के बैग में रख दिया। और बाइक पर बैठ गया।

जेम्स ने बाइक स्टार्ट की और तभी उनके बगल से एक तेज़ हवा का झोंका सा निकला ।

“अबे अबे अबे! कौन था?” एक्सलेटर घुमाता जेम्स रुक गया ।

“पता नही। कोई बाइक से था..” बॉन्ड के शब्द पूरे होने से पहले ही पुलिस की गाड़ियां उनके ठीक बगल से हवा की तरह गुज़रीं।

“अरे बाप रे! अब ये क्या था।” बॉन्ड अपने आप से बड़बड़ाया।

“पुलिस! लगता है कुछ गड़बड़ है।” जेम्स ने अपने आप से बोलते हुए कहा।

बॉन्ड ने भौंहें तिरछी करते हुए जेम्स से पूछा “अब हम क्या करने वाले हैं?”

“फ़िलहाल तो…..हीरोगिरी।” जेम्स ने बाइक दौड़ा दी। अब दो खिलाड़ी और आ चुके थे मैदान में।

जेम्स फुल स्पीड से बाइक भगाता हुआ जल्द ही उस जीप तक पहुँच गया जिसमे इंस्पेक्टर मनोज बैठा हुआ था।

“सर क्या हुआ? धूम 4 की शूटिंग चल रही क्या?”  जेम्स ने रफ़्तार कम करते हुए पूछा।

“तुम दोनों जो भी हो, फ़ालतू की बकवास कर के पुलिस के काम के बीच टांग मत अड़ाओ।”  मनोज फुंफकारते हुए बोला।

“हम हेल्प करें क्या कुछ?” बॉन्ड ने इंस्पेक्टर मनोज से पूछा।

“तुम्हारी बाइक को देखकर ऐसा नही लगता की तुम दोनों उसे पकड़ पाओगे।” इंस्पेक्टर मनोज जेम्स की बाइक को हिकारत से देखते हुए बोले।

“जेम्स! दिखा दे इन्हें! हमारी बाइक की बेइज़्ज़ती नही होनी चाहिए।” बॉन्ड ने जेम्स का कन्धा थपथपाते हुए कहा।

जेम्स ने बाइक में लगा एक स्विच दबा दिया। और देखते ही देखते उस बाइक में बदलाव होने लगे। खटारा सी दिखने वाली वो बाइक धीरे-धीरे नया रूप लेने लगी। अभी तक जिसमे एक साइलेंसर था, अब दो हो गया। बाइक का रंग भी तेज़ी से बदलने लगा। देखते ही देखते बाइक पूरी तरह नई और खतरनाक दिखने लगी।

इंस्पेक्टर मनोज की आँखें चौड़ी हो गईं। जेम्स इंस्पेक्टर की ओर देखता हुआ बोला। “क्यूं सर। अब करूं हेल्प? हा हा।”

तत्काल ही जेम्स ने बाइक में लगा एक और स्विच दबा दिया जिसपर लिखा हुआ था, नाइट्रो। बाइक ने एक झटके में बिजली जैसी रफ़्तार पकड़ ली। इंस्पेक्टर मनोज ने फ़टी-फ़टी आँखों के साथ ड्राईवर से सवाल किया। “ये दोनों लौंडे थे कौन??”

“पता नही। शायद दुसरे ग्रह से आए हुए प्राणी।”   ड्राईवर ने मूर्खों वाला जवाब दिया।

जहाँ तक पुलिस वाले अब तक नही पहुँच सके थे यानी अब्दुल तक। वहाँ जेम्स-बॉन्ड 6 सेकेंड्स में पहुँच गए। विशालकाय पुल शुरू होने ही वाला था। दूर से ही उस पुल पर जमे ट्रैफिक को देखा जा सकता था। जेम्स ने अपनी बाइक अब्दुल के करीब ले जाकर पूछा। “क्यों अंकल! ऐसा क्या काण्ड कर दिया जो धूम थ्री का आमिर खान बनना पड़ा आपको।”    अब्दुल चौंक गया । उसने उन दोनों की तरफ देखा और फिर पुल की तरफ।

“कौन हो तुम लोग?”     अब्दुल ने अचंभित हो कर पूछा।

“जेम्स-बॉन्ड।” जेम्स और बॉन्ड ने मिलकर कहा।

“अभी मैं तुम दोनों को लेट जेम्स-बॉन्ड बना दूंगा।”    अब्दुल बोला।

“वो कैसे?”    जेम्स-बॉन्ड ने आश्चर्यचकित हो कर पूछा।

“ऐसे।”  कह कर अब्दुल ने एक ज़ोरदार किक जेम्स की बाइक पर मारी। जेम्स ने बैलेंस तो सम्भाल लिया पर उसकी बाइक अब दूसरी दिशा में घूम गई। उस दिशा में जहाँ पुल की रेलिंग बनी हुई थी। जेम्स के बाइक की स्पीड इतनी ज़्यादा थी की अब वो ब्रेक भी लगाता तब भी कोई फायदा नही था। अब उनकी बाइक रेलिंग तोड़कर सीधा समुद्र में जा गिरने के लिए बढ़ रही थी।

क्रमश :

कैसा लगा आपको ये तीसरा भाग?
आशा करता हूँ आप सभी को पसन्द आया होगा। आगे और भी ज़बरदस्त कहानियाँ आप तक आती रहेंगी। कृपया रिव्यूज़ ज़रूर दें। मैंने ये कहानी आपके लिए लिखने में बहुत मेहनत की । अब आप हमारे लिए रिव्यू लिखकर थोड़ी मेहनत कर दें।

धन्यवाद।

Written by – Talha Faran for Comic Haveli

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4 Comments on “The Black Demon Part 3”

  1. uff lahani kahan sy kahan phunvha di ..mujy tho ab bi ykin nhi ho rha ki is kahani m 2 hero ya fir superhero ki entry huyi hy….aur yeh bike kounsi company ki thi ..mujy bi chahihy ..aur ykin nhi aa rha ki abdul hi sara kiya dra lar rha hy …mahal m tho dr ky maary us sy bola bi nhi ja rha tha …story ky vilin ki tho abi entry binnhi huyi …tho kahani shayd abi suru bi nhi …is hisaab sy itna tho sure hy ki kahani bhut lmbi jaany vali hy ..aur jiss hisaab sy aap likh rhy hy us hisaab sy yeh agly saal hi puri hogi….hehehe …means thody part jaldi jaldi leke aaya kary …

  2. bahut badhiya kahani thi talha.. james bond ka mujhe intejar tha jo ki khatm hua..
    action scenes jabardast hai. aur kahni me mystry bhi bharpoor hai. .
    akhir abdul ne aisa q kiya ?
    Court wale scene ko aur badhiya kiya ja sakta tha..
    baki…
    waiting for more actions of our new heroes james bond

  3. Bhut bhut #Shandar khani hai, ab to hme heros bhi mil gye h
    Raj comics ke liye aapka prem प्रदर्शित है
    Jo बेहद सराहनीय hai

    अब तो हमे बस अगले पार्ट का इंतजार है।

  4. पिछले भाग के मुकाबले ये भाग ज्यादा बेहतर लगा। बिल्कुल ही एक्शन और रोमांच से भरपूर था ये भाग। पिछले भाग की तरह ही ये भाग भी कोर्ट रूम ड्रामा के साथ शुरू हुआ जो कि बहुत ही अच्छे ढंग से दिखाया गया । कोर्ट रूम ड्रामा मैं जो रोमांच रखना जरूरी होता है एक पाठक को बांधे रखने के लिए वो बहुत ही अच्छे ढंग से इस कहानी में पिरोया गया है जिसके लिए मैं लेखक को बधाई देना चाहूंगा। मगर सस्पेंस थोड़ा ज्यादा जल्दी खोल दिया गया। थोड़ा बाद मैं खुलता तो ज्यादा अच्छा लगता। सस्पेंस भी अप्रत्याशित नही लगा। सस्पेन्स कहानी लिखने के लिए सबसे जरूरी बात ये होती है कि आपको खूब कैरेक्टर्स को अपनी कहानी में डालना चाहिए जिससे कि पाठक को आप कंफ्यूज कर सके कि असली गुनहगार कौन है। आपने कहानी में केवल दो ही मुख्य पात्र रक्खे है इसलिए गुज़ करना आसान हो गया। अब बात करते है एक्शन की तो वो इस कहानी में बहुत ही उम्दा ढंग से दिखाया गया। वो गुनहगार को पकड़ने के लिए जो पुलिस चेस दिखाया गया है वो बहुत ही अव्वल दर्जे के दिखाए गए है। बड़ा मजा आया पढ़कर बिल्कुल रोमांच से भर गया। आखिर में जेम्स और बांड का करैक्टर गुदगुदा गया। उनकी एंट्री अप्रत्याशित थी इसलिए और मज़ा आया। बाकी उनके कारनामे देखने के लिए अगले भाग का इंतज़ार रहेगा।

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