The Death Pattern Chapter 5

THE DEATH PATTERN
Chapter-5-Athens

स्थान-एथेंस।
समय-12:50 PM

एक लंबे सफर के बाद ध्रुव , प्राइवेट प्लेन से एथेंस में पहुँच चुका था। इतने लंबे सफर के बाद भी उसके शरीर में थकान नहीं थी क्योंकि उसे यकीन था कि उसके कई सवालों के जवाब इसी शहर में मिलेंगे।
इस बार उसे ये भी पता था कि इस शहर में उसकी मंजिल कहाँ है।
एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही ध्रुव ने अपनी जेब से वो कागज निकाला जो डोडोमा में उसे एक बच्चे ने दिया था। उस समय वो कागज बिल्कुल सादा था ,पर केमिकल्स की महक से ही ध्रुव को पता चल गया कि उसे खास तरह के केमिकल मिश्रित इंक से लिखा गया है, जिसकी लिखावट कुछ समय बाद ही दिखाई देगी।
इस समय उस कागज पर लिखे शब्द साफ साफ दिख रहे थे।उस कागज पर लिखा था-
“अगर अपने बाबा के बारे में जानना चाहते हो तो शाम चार बजे देवता सोरा के मंदिर में पहुँच जाओ।”

ध्रुव की मंजिल भी वही थी, पर यह मैसेज देख कर ध्रुव को आश्चर्य हुआ।कोई हर पल उसकी गतिविधियों पर नजर रखे हुए था।क्या उसे वहाँ अपने बाबा के बारे में पता चलेगा या ये दुश्मन की कोई नई चाल है? इन्हीं सब बातों को सोचते हुए ध्रुव एयरपोर्ट से बाहर टैक्सी स्टैंड तक पहुँच गया।
ध्रुव ने अपनी कलाई में बंधी घड़ी में समय देखा। अभी एक बज रहा था , देवता सोरा के मंदिर पहुँचने में ध्रुव को केवल एक घंटा लगता। पर ध्रुव ने समय से पहले ही वहाँ जाने का निश्चय कर लिया।
ध्रुव एक टैक्सी की तरफ बढ़ गया। इससे पहले कि टैक्सी ड्राइवर कुछ पूछता , ध्रुव ने कहा-“देवता सोरा के मंदिर।”

ड्राइवर ने कुछ कहा नहीं केवल सहमति में सर हिलाया और ध्रुव को लेकर देवता सोरा के मंदिर की तरफ बढ़ने लगा।
एथेंस शहर के बीचों बीच स्थित हैं लिकाबेट्स की पहाड़ियाँ। मात्र तीन सौ मीटर की ऊँचाई वाला लिकाबेट्स सैलानियों के आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं क्योंकि इसकी चोटी से पूरे एथेंस का नजारा देखने को मिलता है। इसी पहाड़ी के दूसरी तरफ स्थित है देवता सोरा का मंदिर।
पर लिकाबेट्स और मंदिर के बीच घने जंगल भी हैं। इन जंगलों में अधिकतर चीड़ के पेड़ है।जंगल में जगह जगह छोटे बड़े पत्थर हैं जिससे आम आदमी का यहाँ पैदल चलना भी काफी मुश्किल है।इसी वजह से ये जंगली इलाका अधिकतर सुनसान ही रहता है।
देवता सोरा के मंदिर का रास्ता सीधा इन जंगलों से न होकर, कुछ दूर घूम कर जाता है। ध्रुव टैक्सी में उसी रास्ते पर बढ़ रहा था और कुछ ही देर में वहाँ पहुँचने वाला था।
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लगभग 12 घंटे पहले-
एथेन्स।
देवता सोरा के मंदिर के पीछे स्थित जंगलों में नाजिम और हामिद एक पूर्व निर्धारित दिशा में बढ़ रहे थे।
रात आधी से ज्यादा गुजर चुकी है, उजाले का कहीं नामो निशान नहीं है। हामिद के हाथों में एक हाई पावर बीम वाली लाइट है जिसके सहारे दोनों बढ़ रहे थे।

हामिद- “बॉस ! इस मंदिर में जाने के लिए हमें इस गुप्त रास्ते से जाना जरूरी है क्या?”

नाजिम ने हामिद को देखा पर कोई जवाब नहीं दिया।
हामिद सकपका गया।कुछ देर बाद फिर उसी ने बोला- “मतलब हम चाहें तो रात में भी मुख्य द्वार खुलवा सकते हैं।”

नाजिम- “वही तो हम नहीं चाहते । यह मंदिर केवल सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है। इस समय रात में मुख्य द्वार खुलवाने से बेवजह समय से पहले हम पर शक जाएगा। और मैं ऐसा बिल्कुल नहीं चाहता।”

जल्द ही दोनों मंदिर के पिछले दरवाजे पर पहुँचे।कोई भी सामान्य आदमी यह नहीं कह सकता था कि वहाँ कोई दरवाजा भी था।वहाँ केवल एक पत्थर की दीवार थी जिसपर छोटे छोटे नुकीले पत्थर उभरे हुए थे।
नाजिम ने दो पत्थरों को एक निश्चित पैटर्न में घुमाया और तुरन्त ही एक छोटा सा छेद उस पथरीली दीवार में नजर आने लगा। वह छेद जिसे हम दरवाजा भी कह सकते हैं,आकार में बहुत ही छोटा था।
हामिद उस दरवाजे में घुसा। वह रास्ता एक 6 फुट की छोटी सी सुरंग में गया जिसे मंदिर की दीवार में पत्थरों को काट कर बनाया गया था।हामिद रेंगते हुए आगे बढ़ा। लगभग एक मिनट में हामिद मंदिर के अंदर था।पर इतनी ही देर में उसकी साँस फूल गयी।
अगले ही मिनट नाजिम भी उसी रास्ते से मंदिर के अंदर आ गया।
मंदिर का मुख्य द्वार बंद था पर फिर भी वहाँ मशालें जल रही थीं , जिससे वहाँ पर्याप्त रौशनी थी।
यह मंदिर भी पत्थरों को काट कर बनाया गया था। पत्थरों की दीवारें गुफा की तरह मालूम होती थीं। मंदिर के बीचों बीच देवता सोरा की मूर्ति थी।
मंदिर में नाजिम के दो आदमी पहले से ही मौजूद थे।मूर्ति के आगे एक आदमी छत से उल्टा लटका हुआ था, जिसके हाथ,पैर और मुँह बँधे हुए थे।उसके नीचे एक बड़ा सा धातु का पात्र रखा हुआ था।
नाजिम से सारी व्यवस्था को ध्यान से देखा। उसके आते ही दोनों आदमी पीछे हट गए । हामिद भी पीछे हटकर दीवार के पास खड़ा हो गया।
कुछ देर तक मंत्र बुदबुदाते हुए नाजिम ने आराधना की। फिर उसने एक बड़ा सा खंजर लिया और लटके हुए आदमी की गर्दन पे एक बड़ा सा घाव किया। वो आदमी जो अब तक शान्ति से लटका था , तड़पने लगा।उसके गर्दन से निकलता हुआ रक्त नीचे रखे धातु के पात्र में इकट्ठा होने लगा।
कुछ ही देर में उसकी छटपटाहट शांत हो गयी और उसके कुछ देर बाद उसका रक्त टपकना भी बंद हो गया।

नाजिम अपने दोनों आदमियों की तरफ मुड़ा- “इसे भी बाकियों के रक्त के साथ मिला कर रख दो और जैसा समझाया था वैसा ही करना।और इस जगह से सारे निशान मिटा दो। सुबह मंदिर खुलने पर किसी को शक नहीं होना चाहिए।”

उसके बाद नाजिम और हामिद उसी रास्ते से मंदिर के बाहर निकल गए।

हामिद-“आपको लगता है कल ध्रुव यहाँ आएगा?”

(जिस समय की यह घटना है उस समय ध्रुव समारा में था।)

नाजिम-“जब कुत्तों को अपने इशारे पे नचाना हो तो हड्डियों का सहारा लिया जाता है। और मेरे पास उनकी कमी नहीं।ध्रुव यहाँ जरूर आएगा।”
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वर्तमान समय–

ध्रुव देवता सोरा के मंदिर पहुँच चुका था।
अलेक्सांद्रिया के विपरीत यहाँ काफी भीड़ थी।
ध्रुव ने मंदिर के चारों तरफ ध्यान से देखा। सैलानियों का समूह मंदिर को देख रहा था। मंदिर के बाहर कुछ दुकानें भी थी। मंदिर के बाहर पत्थर की कुर्सियाँ बनी हुई थी, जिनपर लोग बैठे थे।
ध्रुव ने मंदिर के बाहर एक चक्कर लगाया। मंदिर के पीछे ही जंगल था जहाँ जाना प्रतिबंधित था।सब कुछ देखने के बाद ध्रुव वापस आकर पत्थर की बनी हुई कुर्सियों में से एक पर बैठ गया।
ध्रुव से कुछ ही दूर पर , मंदिर की दीवार पर मंदिर के ही बारे में प्राचीन भाषा में कुछ लिखा हुआ था। सैलानियों के एक समूह उस दीवार के पास इकट्ठा हुए था। एक टूरिस्ट गाइड उस पर लिखी हुई बातों को समझा रहा था। सब ध्यान से उसकी बातें सुन रहे थे।
ध्रुव के पास भी उसकी आवाज आ रही थी ,ध्रुव भी उसकी बातें सुनने लगा।

“मरूग धर्म के देवता सोरा का यह मंदिर लगभग दो हजार वर्ष पुराना है।तब मरूग धर्म के अनुयायी अपने धर्म का विस्तार करने के लिए लंबी लंबी यात्रायें कर रहे थे।उन्होंने इस मंदिर की स्थापना की थी।और मंदिर के बाहर उन्होंने ही इस मंदिर और देवता सोरा के बारे में लिखा था।” -गाइड ने कहा।

दीवार के पास खड़े सैलानी ध्यान से उसकी बातें सुनते जा रहे थे।
“यह एक पौराणिक कथा है।वर्षों पूर्व सोरा नाम का एक राजा था जिसने अपने जुड़वा भाई मोरा की मदद से सभी राज्यों को अपने अधीन कर लिया था। और शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए उसने देवता बनने की ठानी। उसके लिए किसी ऐसे इंसान की बलि देने की जरूरत थी जो उसी समय पैदा हुआ हो जब सोरा पैदा हुआ था। सोरा ने बहुत ढूँढा पर उसे ऐसा कोई नहीं मिला। तब मोरा ने अपनी बलि दे दी।जुड़वा होने के कारण दोनों के जन्म का समय भी एक था। देवता बन कर सोरा ने बहुत से पराक्रमी कार्य किए और उसे देवताओं का राजा बना दिया गया। बाद में मोरा के बलिदान के कारण उसे भी देवता की उपाधि मिली। मोरा को पृथ्वी का कार्य भार सौंपा गया और सोरा को पृथ्वी के बाहर का।”
इतना कह कर गाइड रूक गया। वहाँ खड़े सैलानियों में खुसुर फुसुर होने लगी । शायद वो इस घटना के सही या गलत होने पर डिस्कसन कर रहे थे।
पर पूरी कहानी सुन कर ध्रुव का दिमाग चकरा गया। वह खड़ा होकर इस दीवार और उसपे लिखी अजीब सी भाषा को देखने लगा। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था ,पर वह अपने ख्यालों में खोया हुआ एकटक उसी दीवार को देख रहा था।शायद वो टूटी हुई कड़ी उसे मिलने वाली थी जो उसके सारे सवालों का जवाब देगी।

‘भड़ाम…”

ध्रुव के बगल में एक विस्फोट हुआ , वहाँ मौजूद लोगों में भगदड़ मच गई। ध्रुव जैसे सोते से जगा।
ध्रुव ने अपने पीछे देखा। एक आदमी लगभग 10 फ़ीट ऊपर हवा में उड़ रहा था। उसके हाथ पैर और पीठ में रॉकेट बूस्टर लगे हुए थे जिनकी सहायता से वह उड़ रहा था।हाथों और पैरों में लगे बूस्टर्स उसे हवा में इधर उधर मुड़ने में मदद कर रहे थे।
उसके हाथों में बड़े बड़े ब्रेसलेट थे जिनसे छोटे छोटे गोले निकल रहे थे जो जमीन पर टकराते ही फट रहे थे।
निर्विवाद रूप से उन सब गोलों का निशाना ध्रुव ही था। ध्रुव ने चारों तरफ देखा, कोई भी छिपने की जगह नहीं थी सिवाय मंदिर के।
ध्रुव मंदिर में घुस गया। ब्लास्ट करने वाला भी ध्रुव के पीछे पीछे मंदिर में घुस आया। बाहर से आती विस्फोटों की आवाज से मंदिर पहले ही लगभग खाली हो चुका था। बचे खुचे लोग उस अजीब से उड़ते आदमी को देखकर भाग गए।

“ब्लास्टर से बचना नामुमकिन है ध्रुव।” -उसने ध्रुव को निशाना बनाते हुए कहा।

ध्रुव ने मंदिर में चारों तरफ देखा , उसे बचाव का कोई साधन नहीं नजर आया। जब लड़ाई में बचाव करना मुश्किल होता है तो केवल एक ही रास्ता बचता है-आक्रमण।
ध्रुव तेजी से एक दीवार की तरफ दौड़ने लगा।

“तुम कितनी भी तेज भाग लो ध्रुव ,पर इस डेड एन्ड से बच कर नही जा सकते।”

पर ध्रुव बच कर नहीं भाग रहा था। ध्रुव ने तेजी से दौड़ते हुए दीवार पर एक पैर रखा और हवा में ही बैक फ्लिप की कलाबाजी दिखाई। अगले ही पल ध्रुव दस फुट ऊपर उड़ रहे ब्लास्टर की पीठ पर था। दोनों के भार को ब्लास्टर उठा नहीं पाया और दोनों नीचे गिर पड़े। पर ब्लास्टर तुरंत ही संभला और वापस हवा में उड़ने लगा। इस बार उसने ध्रुव को कोई मौका नहीं दिया और अपने ब्लास्ट्स की स्पीड भी तेज कर दी।
ध्रुव वापस एक तरफ दौड़ने लगा कि अचानक उसका पैर किसी पतली सतह से टकराया। वहाँ की जमीन खोखली थी जिसपर लकड़ी का पतला ढक्कन लगाया गया था और इस तरह से रखा गया था कि ऊपर से देखने पर किसीको कुछ भी मालूम न चले।
वह लकड़ी ध्रुव का भार नहीं सह पायी और ध्रुव उस खोखली जमीन में गिर गया।
वह गड्ढा लगभग सात फुट गहरा था और उसमें कोई द्रव्य भरा हुआ था।ध्रुव लगभग तुरंत ही उस गड्ढे से बाहर निकला।
बाहर निकलते ही ध्रुव को पता चला कि उस गड्ढे में खून भरा हुआ था। ध्रुव का पूरा शरीर लाल खून से भीगा हुआ था। ध्रुव को बाहर आते देख ब्लास्टर बाहर भागने लगा । पर इस बार ध्रुव का इरादा उसे वापस जाने देने का नहीं था। ध्रुव ने एक बार फिर दीवार के सहारे लंबी छलाँग लगाई और ब्लास्टर के ऊपर कूद गया।
इस बार ब्लास्टर पीठ के बल गिरा जिसके कारण उसके पीठ पर लगे रॉकेट बूस्टर्स टूट गए और वह घायल भी हो गया। ब्लास्टर अब उड़ नहीं पा रहा था जिससे वह और बौखला गया।उसने एक गोला ध्रुव की तरफ फेंका । ध्रुव फुर्ती से बच गया पर वह गोला ध्रुव के पीछे पथरीली दीवार से जा टकराया। विस्फोट हुआ और पथरीली दीवार के कुछ टुकड़े ध्रुव के सर से टकराये और ध्रुव के होश चले गए।
उस मन्दिर में गुप्त रूप से कैमरे लगे हुए थे जिनकी मदद से नाजिम और हामिद दोनों इस दृश्य को देख रहे थे।
दोनों के चेहरों से साफ पता चल रहा था कि जो भी हो रहा था वो अप्रत्याशित था।

ब्लास्टर अभी भी बेहोश ध्रुव के पास ही खड़ा था।उसी समय उसके कानों में लगे इंस्ट्रूमेंट में नाजिम की आवाज सुनाई दी-
“बैकअप टीम का इंतजार करो।”

ब्लास्टर कुछ देर तक यूँही खड़ा रहा। कुछ देर बाद ही मंदिर में दो नकाबपोशों ने प्रवेश किया। ये दोनों वही थे जो एक रात पहले नाजिम के साथ इसी मंदिर में थे।
उन्होंने ध्रुव को चेक किया। ध्रुव अभी भी होश में नही था। उन्होंने ध्रुव को बाँधा और उसे उठाकर मंदिर से बाहर निकल गए।ब्लास्टर भी उनके पीछे चला गया।
मंदिर के बाहर निकलते ही वे सब मंदिर के पीछे जंगलों में चले गए। ये वही जंगल थे जो लिकाबेट्स की पहाड़ी और मंदिर के बीच में थे। कुछ दूर चलने के बाद वे जंगल मे बनी एक इमारत के पास पहुँचे।

नाजिम और हामिद इस वक्त इसी इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर थे।उन सबके पहुंचते ही वो दोनों भी ऊपर आ गए।
“होश आया?” -नाजिम ने उन दोनों से पूछा।
“अभी नहीं।”
“मर तो नहीं गया।”
“नहीं -नहीं केवल बेहोश है।”
“ठीक है, इसे अच्छी तरह बाँध कर एक कमरे में डाल दो। और इसके आस पास भी मत भटकना , पता नहीं होश में आते ही क्या कर बैठे।” -नाजिम ने कहा।

“ठीक है बॉस।”
“अब जाओ और रात में मेरा संकेत मिलते ही इसे मंदिर में पहुँचा देना।”
इतना कहकर नाजिम और हामिद वापस नीचे चले गए।

रास्ते में-
हामिद -“आपको नहीं लगता बॉस , ध्रुव उम्मीद से पहले ही हमारे कब्जे में आ गया। अगर वो बेहोश नहीं होता तब हमें फिर उसे रात में यहाँ बुलाने के लिए उसके बाबा को चारे की तरह इस्तेमाल करना पड़ता।”

नाजिम के होठों पर एक विजयी मुस्कान तैर रही थी।

नाजिम-“मैंने कहा था ना , मैंने ध्रुव के काम करने के पैटर्न का विश्लेषण किया है। मुझे पता था कि ध्रुव किन परिस्थितियों में कैसे काम करता है। मेरा बनाया हुआ प्लान फुल प्रूफ था। अब इस मिशन को पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता।”
नाजिम की आवाज में अहंकार था। और समय गवाह है कि अहंकार हमेशा मनुष्य का विनाश ही करता है।
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दोनों आदमी ध्रुव को उसी इमारत की पहली मंजिल पर ले गये।
इमारत की बनावट और रंग कुछ इस तरह थी कि आसानी से दूर से दिखाई न दे। इमारत इतनी ऊँची भी नहीं थी कि जंगल के ऊपर से दिखाई दे। इसका एक कारण जंगलों का घना होना भी था। वह इमारत बहुत पतली भी थी, जिससे की अगर कोई दूर से देखे भी तो उसे कोई चट्टान या दीवार मालूम हो।
दोनों ने ध्रुव को एक कमरे में बंद कर दिया और बाहर से दरवाजा बंद कर दिया।
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पाँच घण्टो बाद —
लगभग रात के बारह बजे।
दोनों नकाबपोश इस समय उसी इमारत के बाहर पहरा दे रहे थे।
तभी एक के ट्रांसमीटर पर एक मैसेज आया।
“ओके बॉस, हम अभी लाते हैं।”-उसने कहा ।
दूसरी तरफ नाजिम की आवाज थी-“सावधानी से कोई गड़बड़ न हो।”
“रघुराम का क्या करना है?”-नकाबपोश ने पूछा।
“सड़ने दो उसी कमरे में ।”- नाजिम की आवाज में झुँझलाहट थी।
उसके बाद नकाबपोश ने कुछ और पूछने की हिम्मत नहीं की।
दोनों उसी कमरे में गए जहाँ ध्रुव को छोड़ा था। ध्रुव को होश आ चुका था पर मुँह बँधा होने के कारण उसके मुँह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी।
उन्होंने ध्रुव को फिर से बेहोश किया और जंगल के रास्ते मंदिर के पिछले भाग की तरफ बढ़ने लगे।
एक नकाबपोश ने पत्थरों को घुमाकर दरवाजा खोला।फिर उन्होंने बँधे हुए ध्रुव को उसी छोटे से दरवाजे में ढकेल दिया।
ध्रुव मंदिर के अंदर गिरा।
दोनों नकाबपोश वापस चले गए।
मंदिर के अंदर गुप्त रास्ते के पास हामिद खड़ा था। उसने ध्रुव को उठाया और मंदिर के मुख्य भाग की तरफ बढ़ने लगा।
मंदिर के मुख्य भाग में नाजिम पहले से ही मौजूद था।

हामिद ने ध्रुव को एक बलिवेदी के पास बाँध दिया।उसकी गर्दन बलिवेदी के ऊँचे हिस्से पर थी, उसके घुटने मुड़े हुए थे। और हाथ पीछे की तरफ बंधे हुए थे।
कुछ घंटों पहले ही ध्रुव इसी जगह खून से नहा गया था, उसी खून के दाग अभी भी उसके शरीर पे मौजूद थे।
नाजिम ने पानी से भरा हुआ एक बड़ा सा बर्तन उठाया और सारा पानी ध्रुव के ऊपर उड़ेल दिया। पानी पड़ने से ध्रुव के शरीर पर मौजूद सारे दाग मिट गए और उसे होश भी आ गया।

“ध्रुव…….सुपर कमांडो ध्रुव!” -नाजिम ने ध्रुव को देखते हुए कहा।-“तुमको शायद पता नहीं ,पर तुम एक बहुत ही महान कार्य के निमित्त एवं साक्षी बनने जा रहे हो।तुमको शायद पता नहीं कि तुम्हें खुद नियति ने चुना है।”

ध्रुव ने बिना नाजिम की बात सुनते हुए कहा-“तुम बहुत बड़ी बेवकूफी कर रहे हो नाजिम।तुम्हें……….”

“तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।”-नाजिम ने ध्रुव की बात को बीच में ही काटते हुए कहा-“ब्ला… ब्ला…ब्ला। यही कहना चाहते हो न तुम।”
नाजिम की आवाज में अब गंभीरता थी-“एक बात जानते हो ध्रुव , जब कोई ये नहीं जान पाता कि सामने वाला क्या कर रहा है तो लोग उस सामने वाले को गलत साबित करने लग जाते हैं। यही मनुष्यों का मूल स्वभाव है। तुम भी नहीं जानते कि मैं क्या कर रहा हूँ या क्या करने वाला हूँ, इसीलिए तुम मुझे गलत कह रहे हो।”

ध्रुव-“क्या तुम को अब भी लगता है नाजिम कि मुझे मारने से तुम्हें शक्तियाँ मिलेंगी?”

नाजिम-“किसने कहा मैं तुम्हें मारने वाला हूँ।मैं तुम्हारी बलि चढ़ाने वाला हूँ ।”

“समझने की कोशिश करो नाजिम।”-ध्रुव ने नाजिम को समझाने की कोशिश की।

“समझ तो तुम नहीं रहे” -नाजिम ने झुँझलाते हुए कहा-” मैं तुमको शुरू से समझाता हूँ।

नाजिम ने एक लंबी साँस ली।
“इस मंदिर को देख रहे हो ध्रुव।”-नाजिम ने मंदिर को देखते हुए कहा।

फिर उसकी नजरें ध्रुव पर टिक गयीं।
नाजिम ने ध्रुव को देखा, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को देखता है।
शिकारी अपने शिकार के लिए पहले जाल बिछाता है, फिर अपने शिकार का इंतजार करता है।
बिना अपनी पलकें झपकाए , अपनी साँसो को थाम कर शिकारी अपने शिकार का इंतेजार करता है।
और आखिर में शिकारी का धैर्य , उसका इंतजार रंग लाता है। शिकार शिकारी के जाल में फँस जाता है। तब शिकारी के चेहरे पर एक मुस्कान आती है। उसकी आँखों में एक चमक पैदा हो जाती है।
नाजिम की आँखों मे भी कुछ वैसी ही चमक थी।

नाजिम ने कहना जारी रखा- “इस मन्दिर को लगभग दो हजार सालों पहले बनाया गया था। उस समय नए नए धर्म जन्म ले रहे थे। पुराने धर्म अपना विस्तार कर रहे थे। लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाया जाता था। लोगों को भी जिस धर्म मे सुविधा होती थी उसे अपना लेते थे।उस समय आदमी पैदा किसी और धर्म में होता था और मरता किसी और धर्म मे था।पूरी दुनिया ‘धर्म संकट’ में थी।संकट मरूग धर्म पर भी था।उसी समय उन्होंने भी अपना विस्तार करने का निर्णय लिया।”
नाजिम एक पल के लिए रुका, उसने ध्रुव को देखा और फिर उस मंदिर को देखने लगा-“विस्तार करने के लिए उन्होंने यात्राएँ की और मंदिर बनाये। उन्हीं में से एक मंदिर ये भी है। ये मन्दिर प्रतीक है शक्ति का, आस्था का।और अब ये मंदिर साक्षी बनेगा तुम्हारी बलि का और मेरे देवत्व का। इस दिन के लिये मैंने बहुत तैयारियाँ की हैं।”

“तैयारियाँ तो तुमने वाकई बहुत पहले से की थीं, ल्योन में शॉप्स खोलना , मेरे बाबा को वर्ल्ड टूर का टिकट देना, उनको ऐसे शहरों में भेजना जिनका आपस मे कोई नाता न हो और अंत में मेरे बाबा का नकली हमशक्ल बनाकर उसको मार देना। तुमको पता था अपने बाबा को ढूंढने मैं जरूर जाऊँगा।वैसे मुझे शक ही नहीं यकीन भी है कि मेरे बाबा को अलेक्सांद्रिया में ही उनके हमशक्ल से बदल दिया गया होगा ।” -ध्रुव ने कहा।
नाजिम ठहाका लगाकर हँसा- “तुम वाकई बहुत समझदार हो ध्रुव , लोग वैसे ही तुम्हारे दिमाग का लोहा नहीं मानते। अब तक तुम ये भी जान चुके होगे की मैं केवल तुम्हारी ही बलि क्यों लेना चाहता हूँ। उसके लिए मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।”

नाजिम ध्रुव के पास गया और उसकी आँखों में आँखे डालकर कहने लगा -” आज से लगभग 25  साल पहले , लगभग 5000 किलोमीटर दूर दो बच्चों का जन्म हुआ।ठीक एक ही समय पर। उन दोनों की नियति तभी जुड़ गई थी। जानते हो वो दोनों कौन थे, एक था मैं और एक थे तुम। फिर लगभग 6 साल पहले हम दोनों के माता पिता की मृत्यु हो गयी, एक ही तरह आग में जलकर। पर तुम उनकी मौत का बदला अपने हाथों से नही ले पाए और मैंने उनकी मौत का बदला लिया, अपने हाथों से। यही फर्क है …. यही फर्क है साधारण इंसान में और एक देवता में। उस दिन मुझे पता चला कि मेरा जन्म किलिमंजारो की घाटियों में भटकने के लिए नहीं हुआ। समारा मेरे लिए पर्याप्त नहीं था। और डोडोमा की वो जेल भी मेरे लिए नहीं थी। इसी कारण मैं जेल तोड़कर भागा । अपनी शक्तियों का विस्तार किया। अपने बलबूते पर अपना साम्राज्य खड़ा किया। पर अभी भी मैं एक इंसान ही था। अब वक्त था मेरे देवता बनने का। उसके लिए मुझे जरूरत थी किसी ऐसे इंसान की जिसका जन्म ठीक उसी समय हुआ हो जब मेरा जन्म हुआ था। पर देवता सोरा की तरह मेरा कोई जुड़वा भाई नहीं था। फिर मैंने खोज शुरू की। इंटरनेट पर तुम्हारी सारी जानकारी थी। तुम्हारे जन्म का समय बिल्कुल मेरे समय से मिलता था। मैंने और ढूँढा पर कोई और मुझे मिला नहीं। तब मैंने तुमको ही अपना लक्ष्य बनाया। तुम्हारे ऊपर रिसर्च की, उसी समय ल्योन और कई अन्य जगह शॉपिंग मॉल खोले , लगभग छः महीनों से मैं अपना जाल बुन रहा था , मैंने जिन शहरों में तुम्हारे बाबा को भेजा उनमें कोई समानता नहीं थी।”

ध्रुव- “समानता तो थी ही नाजिम, ये वही शहर थे जहाँ दो हजार सालों पहले मरूग लोगों ने यात्राएँ की थी। पर दुर्भाग्य वश मरूग लोगों के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी। इसीलिए मैंने सोचा कि ये सब केवल पुराने शहर हैं।”

नाजिम- “बिल्कुल सही। इसमें वो दो शहर भी थे जहाँ मैं तुम्हे पहुँचाना चाहता था, अलेक्सांद्रिया और एथेंस। क्योंकि बलि देने से पहले कुछ रस्मों को पूरा करना था। देवता मोरा के मंदिर में स्थित पवित्र कुंड में स्नान और देवता सोरा के मंदिर में रक्त स्नान। वो स्नान खास ऐसे लोगों के रक्त से था जिन्होंने एक निश्चित नक्षत्र में जन्म लिया था। और इन सबके लिए चारा बना रघुराम।”

ध्रुव-“मुझे बाद में शक हुआ कि नबीला भी तुम्हारी ही भेजी हुई थी।”

नाजिम ने जोरदार ठहाका लगाया।

ध्रुव ने नाजिम को ध्यान से देखा-“ओह तो नबीला कोई और नहीं तुम ही थे।”

नाजिम- “सही समझे ध्रुव , पर थोड़ी देर से। तुमने कई बार हमसे आगे जाने की कोशिश की पर आखिर में हमारे जाल में फंस ही गए। तुम भारत से ल्योन कब आये हमें पता नहीं चला पर फिर भी आखिर तुम हमारे निगरानी में आ ही गए। तुमने समारा जाकर हमारे बारे में जानना भी चाहा..या यूँ कहे जान भी गए। पर कोई फायदा नहीं । तुम अगर कोई चालाकी करते भी तो रघुराम हमारे पास था ही। मैंने तुम्हारे काम करने के पैटर्न का अच्छे से विश्लेषण किया था ध्रुव , मुझे पता था तुम अपनों के लिए खुद बखुद मेरे इशारों पर नाचोगे।और आखिर में इस मिशन के द एन्ड होने का समय आ गया है।”

हामिद ध्यान से दोनों की बातें सुन रहा था। उसी समय ट्रांसमीटर पर एक मैसेज आया। हामिद ने मैसेज सुना।

“क्या बकते हो…”-हामिद की आवाज में बेचैनी थी।
उसने ट्रांसमीटर वापस रख दिया।
नाजिम-“क्या हुआ?”

पर हामिद से पहले ध्रुव बोल उठा-“तुमने कहा था न कि इस मिशन के एन्ड होने का समय आ गया है।पर गलत। अभी तो क्लाइमेक्स बचा है।” ध्रुव के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।

नाजिम ने हामिद की तरफ देखा । उसकी नजरें पूछ रहीं थी की कि क्या हुआ है?
आखिरकार हामिद ने कहा-“रघुराम गायब है। पूरी बिल्डिंग में रघुराम नहीं है।”
—————————————–
Story Continues in-
The Death Pattern ..
Final chapter …
[Chap 6-The Climax]
—————————–
नमस्कार मित्रों , आशा करता हूँ आपको यह कहानी पसंद आई होगी। कई सवालों के जवाब मिले तो कई ऐसे सवाल भी हैं जिनके जवाब आपको अगले एवं अंतिम भाग में मिलेंगे।
तब तक इस कहानी से जुड़े किसी भी प्रकार के प्रश्न आप कर सकते है। अभी तक कि कहानी आपको कैसी लगी , यह बताना भी न भूलें।
धन्यवाद ।

Written By – Akash Pathak for Comic Haveli

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5 Comments on “The Death Pattern Chapter 5”

  1. Kafi achche se likha hai ye part bhi…
    Majedar hai isme wo interest nhi jaag paya jo pichhale parts me tha.
    Dhruv aaj bhi kewal 25 saal ka hai aur najim bhi…
    Jama nhi ye mujhe..
    Aur ye mandir ka tarika aur bhgwan banne ka tarika achcha hai..
    Bali wala concept bhi achcha hai…
    Climax kaisa hoga janne me maja aayega..
    Asha hai wo simple to bilkul nhi hoga..
    All d best

  2. बहुत ही ज़बरदस्त पार्ट है ये। बहुत सही लिखा है पर रहस्य कुछ जल्दी खुल गया लगता है।शुरुआत हुई ध्रुव के एथेंस पहुँचने से। एथेंस का दृश्य , पहाड़ियों, जंगलो तथा मोरा के मन्दिर का बहुत सटीक वर्णन किया है आकाश भाई ने । पढ़कर लग रहा था मैं उन सभी दृश्यों को देख रहा हूँ। ध्रुव जब मोरा के मन्दिर पहुँचा उस वक़्त एक टूरिस्ट गाइड, सैलानियों को वहां की दीवारों पर क्या लिखा हुआ है ये बता रहा था। उस स्थान तथा उस मन्दिर से जुड़े इतिहास को जानकर बड़ा मज़ा आया। पर जब गाईड, सैलानियों को मोरा तथा सोरा के देवता बनने की कहानी बता रहा था उसी वक़्त सारा का सारा माजरा मेरी समझ में आ गया की क्यों नाज़िम ध्रुव को मारना चाहता है। और हुआ भी वही ।
    वहाँ पर अचानक बम ब्लास्ट होना एक तरफ जहाँ गज़ब सीन था वहीँ ध्रुव का मन्दिर के अंदर भागना मुझे सही नही लगा। ध्रुव जानते हुए भी मन्दिर के अंदर घुस गया की ब्लास्टर के ब्लास्ट्स से मन्दिर को नुक्सान हो सकता है, और ध्रुव भागा ही क्यों? वो तो अपने आस पास की चीज़ों को हथियार बना लेता है । भला वो ध्रुव आज भाग क्यूँ पड़ा। इससे एक बात मालूम पड़ गई की नागराज ध्रुव से बेस्ट है, हीहीही।
    ब्लास्टर ने बड़ी ही आसानी से ध्रुव को बन्दी लिया और नाज़िम के अड्डे पर ध्रुव को कैद कर दिया गया। लेकिन जब ध्रुव को होश आया तो उसने खुद को आज़ाद क्यों नही किया?और, अभी तक नागराज कहीं क्यों नही दिखाई दिया? अगर नागराज को कुछ रोल नही देना था तो फिर स्टोरी में क्यों ले आए ? राजनगर में चण्डिका , ब्लैक-कैट तथा कमांडो फ़ोर्स भी तो है फिर ध्रुव ने नागराज से मदद क्यों मांगी थी। और जब मांगी है तो फिर उसे भी लाओ, गुर्र!
    ख़ैर एक नागराज फैन होने के नाते मेरा ये गुस्सा जायज़ है, हीहीही।
    पर कहानी एकदम तोड़ू-फोड़ू है। मुझे तो ये नागभारत से भी ज़्यादा अच्छी लग रही है। अब-तक की सभी कहानियों में बेस्ट लगी मुझे ये।
    खैर अब ये देखने की जल्दी है की ध्रुव ने क्या प्लान बनाया है? उसके दद्दा आज़ाद कैसे हो गए। ज़रूर नागराज आया है बचाने, हीहीही।
    अगले पार्ट में मालूम चली।

    कोबी : भेस्ट आफ लक, आकाश बाबू।
    मैं : आप कहाँ से आ गये जनाब भेड़िया-थोबड़ ?
    कोबी : हमार को भी बहुते नीक लगल करत ही आकाश बबुआ की कहानी।
    मैं : वो सब तो ठीक है, परन्तु आप इतना जल्दी कैसे पढ़ सकते हैं। मेरा मतलब मेरी आपकी स्पीड एक-बराबर नही हो सकती।
    कोबी : भताऊँ कइसे!
    मैं : हाँ।
    कोबी : काण हेयर लाओ।
    मैं : हाँ, अब बोलिये।
    कोबी : आकाश बाबू ने मन्ने को पी. यम. की थी कहाणी, भाटसप पे। हीहीही।
    मैं : क्या! गुर्र ! देखा लूँगा आकाश भाई को। गुर्र!
    कोबी : हीहीही।

  3. Bht hi shandar maza aa gaya
    Per ek baat samjh nahi duniya me lakho logo ka janam hota hai ek nakshatra me phir dhruv hi kyun.
    Waiting for last part
    I can imagin dhruv’s killer smile

  4. Kahani climax par pahuch rahi h, nazim kyu dhruv ko marna cahta vo to pata chal gaya, aur dhruv ussey 2 kadam aagey h ye bhi dikh gaya, dhruv jaanboojhkar aasani se phasa h nazim k jaal me ab last part me jam k dhulai hone wali h nazim ki

  5. कहानी बहुत सही ढंग से आगे बढ़ रही है, हामिद का करैक्टर काफी अच्छा दिखाया है। उसने ध्रुव पर इतनी रिसर्च की और इतने महीने तक उसको जाल में फंसाने की प्लानिंग की, इस चीज़ को भी आपने काफी रोचक ढंग से दिखाया। अब ये भी देखना है की राजनगर में फैले हामिद के ऑपरेटर्स से कमांडो फ़ोर्स लोहा लेगी या नहीं। अंतिम पार्ट के लिए बहुत शुभकामनाएं।

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