Voh Kaun Thi

वो कौन थी ????

स्थान : अमोला-अकबरपुर रोड
जगह : अमोला से लगभग 2 किलोमीटर दूर जंगल के पास
समय : रात के लगभग 9 बजे

एसीपी अमर एक केस के सिलसिले में उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव अमोला से वापस अपने ऑफिस अकबरपुर जा रहे थे जो लगभग 20 किलोमीटर का सफर था, और ठंड का मौसम था रात के लगभग 9:00 बज रहे थे। हल्की धुंध भी छाई थी वो अकेले ही अपनी जीप धीरे धीरे ड्राइव करते हुए जा रहे थे। अमोला से कुछ 2 किलोमीटर के बाद एक मोड़ आता है वहां पुराना बस स्टॉप था और वहीं से जंगल शुरू हो जाता है, जैसे ही वो उस मोड़ पर पहुँचने वाले थे कि जीप की रोशनी में देखते हैं कि मोड़ पर एक महिला भूरी सी शाल ओढ़े खड़ी थी और रुकने का इशारा कर रही थी। अमर ने जीप की स्पीड थोड़ी कम कर दी और मन ही मन सोचने लगा कि कहीं ये किसी की चाल तो नही है, कि जैसे ही मैं गाड़ी रोकूँ जंगल मे छिपे हुए हत्यारे आकर हमला कर दे क्योकि ठंड के इस मौसम में गांव देहात के इलाकों में 7:00 बजे के बाद पूरा इलाका सुनसान हो जाता है कोई जल्दी घर से बाहर नही निकलता। ये सोचते ही अमर के रौंगटे खड़े हो गए फिर उसने सोचा की अगर कही ये महिला सचमुच किसी मुसीबत में फँस गयी हो तो, फिर यही सब सोचते सोचते उसने गाड़ी उसके पास ले जाकर रोक दी, लेकिन गाड़ी स्टार्ट ही रखी और एक्सीलेटर पर पैर टिका के रखा कि कहीं अगर कुछ गड़बड़ हुई तो तुंरत गाड़ी भगा लेगा और  फिर उस महिला से पूछना शुरू किया।
एसीपी अमर :- कौन हैं आप ? और इतनी रात गए यहाँ जंगल के पास क्या कर रही हैं ?
महिला :- ओह! आप पुलिसवाले हैं मुझे लगा कोई और गाड़ी है।
एसीपी अमर :- मैंने पूछा कौन हैं आप और इतनी रात को यहाँ क्या कर रही हैं ?
महिला :- माफ कीजियेगा मैं जरा घबरा गई थी, मेरा नाम शांति है, मैं अकबरपुर के सेठ मुरारीलाल झा की इकलौती बेटी हूँ और यहां अमोला के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका हूँ। आज स्कूल में क्लासेज के बाद टीचर्स की मीटिंग थी जिसकी की वजह से देर हो गयी और मेरी बस छूट गयी, बस मैं तबसे यहीं इंतजार कर रही थी कि तभी आप आ गये मुझे लगा कोई सवारी गाड़ी है और मैने रुकने का इशारा कर दिया।

फिर अमर ने इधर उधर ध्यान से देखा और उससे बोला

एसीपी अमर :- अच्छा चलिये मैं भी अकबरपुर ही जा रहा हूँ आप को भी छोड़ दूंगा।

शांति थोड़ी देर असमंजस में खड़ी रही फिर चलने को तैयार हो गयी। अमर ने उसे गाड़ी में बिठाकर गाड़ी दौड़ा दी और रास्ते में कुछ सोचते हुए उससे पूछ बैठा …
एसीपी अमर :- अच्छा एक बात बताइये आप अमोला के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाती हैं तो उसके पीछे की तरफ जो ईट का भठ्ठा है उसके मालिक दुर्जन सिंह के बारे कुछ जानती हैं कि कैसा आदमी है या कुछ गैरकानूनी काम करता है या नही ?

शांति गुस्से और घृणा से एक बार अमर को देखती है फिर अगले ही पल एकदम शांत होकर कहती है।

शांति :- मैं उसके बारे में कुछ नही जानती मैं यहाँ बच्चों को पढ़ाने आती हूँ और फिर सीधे घर निकल जाती हूँ इसलिए यहां के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नही है क्योंकि मुझे यहाँ आये अभी एक साल ही हुए हैं ।

तब अमर कहता है।

एसीपी अमर :- फिर आप अनन्या के बारे में तो जरूर जानती होंगी वो भी आपकी तरह अमोला के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाती थी और एक साल पहले अचानक कहीं गायब हो गयी थी तबसे उसका कोई पता नही है।

अनन्या का नाम सुनकर शांति के चेहरे पर मायूसी आ गयी और दुखी स्वर में बोली  …

शांति :- हाँ जानती हूँ । वो सिर्फ यहाँ पढ़ाती ही नही थी बल्कि उसने गांव गांव में बंधुआ मजदूरी के खिलाफ मुहिम भी छेड़ रखी थी और शायद इसी वजह से वो गायब भी हुई है ।

तब अमर ने फिर पूछा

एसीपी अमर :- और कुछ जानती हैं आप इस विषय मे ?

तब शांति ने कहा

शांति :- हाँ थोड़ी बहुत जानती हूँ , सबसे ज्यादा बंधुआ मजदूरी उसी ईंट के भठ्ठे पर होती है जिसके मालिक के विषय मे आप मुझसे पूछ रहे थे , उसने अनन्या को धमकी भी दी थी कि वो अपनी मुहिम बन्द कर दे वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहे । हो ना हो अनन्या के गायब होने में उसी का हाथ है।

ये सब सुनकर अमर सोच में पड़ गया कि कही आज का केस और अनन्या का केस एक दूसरे से जुड़े तो नही हैं ?
फिर इधर उधर की बाते करते करते वो अकबरपुर के चौक पर पहुच गए तभी शांति खुश होते हुए बोल उठी।

शांति :- अरे हम अकबरपुर आ पहुचे हैं वो देखिए अकबरपुर का पेट्रोल पंप।

तभी अमर कहता है

एसीपी अमर :- तो आपको यहीं छोड़ दूं ?

शांति ने कुछ सोचते हुए कहा

शांति :- आगे से राइट ले लीजिए और आगे वाली गली के पास गाड़ी रोक दीजियेगा मैं वहीं से चली जाऊंगी ।

फिर अमर गाड़ी आगे बढ़ाते हुए ले जाकर उसी गली के पास रोक देता है जिसके बारे में शांति ने उसे बताया था।
शांति झटपट गाड़ी से उतरती हुई बोली।
शांति :- मैं आपको थैंक्स नही बोलूंगी बल्कि आपको अपने घर आने का न्योता देती हूँ , आप परसो किसी भी समय आइयेगा और चाय नाश्ता करके ही जाइयेगा परसों मैं पूरे दिन घर पर ही रहूंगी।
इतना बोलकर शांति हँसती हुई उस अंधेरी गली में चली गयी। फिर अमर अपने ऑफिस लौट आया और आज दिन भर उसके साथ जो जो घटित हुआ था उस पर गंभीरता से विचार करने लगा……………

★★★कुछ घण्टे पहले★★★

समय :- सुबह 8:00 बजे
स्थान :- अकबरपुर
जगह :- पुलिस हेडक्वार्टर

कमिश्नर का केबिन-
केबिन में एसीपी अमरकांत शेखावत की एंट्री होती है और तभी कमिशनर साहब बोल उठते हैं

कमिशनर साहब :- आओ एसीपी अमर बैठो तुमसे जरूरी बात करनी है।

तब एसीपी अमर ने कहा :- सर ऐसी क्या जरूरी बात है जो आप मुझे इतनी सुबह सुबह मिलने के लिये बुला लिया ?

कमिशनर साहब :- बैठो तो सही सारी बातें विस्तार से बताता हूँ।

तब अमर कुर्सी खींच कर बैठ जाता है और कमिशनर साहब कहते हैं …

कमिशनर साहब :- अमर, मैंने तुम्हें एक खास केस के बारे में बताने के लिए बुलाया है, ध्यान से सुनना फिर फैसला करना कि तुम्हे केस लेना है या नही ।

फिर कमिशनर साहब बताना शुरू करते हैं……

यहां से लगभग 20 किलोमीटर दूर एक गांव है अमोला वहाँ पर एक ईंट का भठ्ठा है जिसका मालिक है दुर्जन सिंह जो कि एक नम्बर का छटा हुआ बदमाश है इसके खिलाफ कई केसेज दर्ज हैं लेकिन फिर भी वो सबूतोंऔर गवाहों के अभाव के कारण हर बार बच जाता है। वो जितना चालाक और धूर्त है उतना ही क्रूर और वहशी भी है। पिछले एक साल में उसके भठ्ठे के पास ये चौथी वारदात हुई है , पहली तीन वारदात में विक्टिम लापता है और इस वारदात में विक्टिम मर चुका है और उसकी लाश उसी ईट के भठ्ठे के पास रखी हुई है जहाँ उसकी मौत हुई थी और मुझे पूरा यकीन है कि उसकी हत्या हुई है।
मैं चाहता हूँ कि इस बार केस तुम हैंडल करो और उस जालिम दुर्जन सिंह को पक्के सबूतों के साथ गिरफ्तार करो ।

थोड़ी देर सोचने के बाद अमर ने जवाब दिया

एसीपी अमर :- सर मैं ये केस ले रहा हूँ । ये मेरे लिए चैलेंज होगा, एक ऐसे अपराधी को सलाखों के पीछे पहुचाना जो हर बार कानून की आँखों मे धूल झोंक कर बच जाता है।

फिर खड़े होकर सैल्यूट मारते हुए अमर ने कहा

एसीपी अमर :- अच्छा सर चलता हूँ दुर्जन सिंह के अब तक के केस फाइल्स को पहले स्टडी करूँगा, फिर अमोला जाऊंगा छानबीन के लिए ।

फिर अमर तेजी से बाहर निकल गया । इसके बाद अमर अपने ऑफिस आकर केस की फाइल्स स्टडी करता है इन सब मे दोपहर के 3 बज जाते हैं, फिर अमर एक बार घड़ी की तरफ देखता है और हवलदार को जीप निकालने के लिए कहता है। फिर फाइल्स को सहेज कर रखने के बाद अमर तेजी से बाहर निकल जाता है और जीप में बैठकर अमोला के लिए निकल पड़ता है ।

◆◆लगभग 1 घण्टे बाद◆◆

दुर्जन सिंह के भठ्ठे पर ●●●●

जब एसीपी अमर वहां पहुचते हैं तब लाश के पास भीड़ लगी थी और सभी लोग तरह तरह की बातें कर रहे थे तब एसीपी अमर के साथ आये कांस्टेबलों ने भीड़ को वहां से हटाया और एसीपी अमर लाश का निरीक्षण करने लगे ।
थोड़ी देर बाद……

एसीपी अमर लाश का निरीक्षण करते हुए दुर्जन सिंह से पूछते हैं

एसीपी अमर :- इसकी मौत कैसे हुई ?

दुर्जन सिंह :- माईबाप ये इस पुरानी चिमनी पर चढ़ गया था और वहीं से कूद कर आत्महत्या कर ली इसने ।

एसीपी अमर :- अच्छा उस समय तुम कहाँ थे ?

दुर्जन सिंह :- माईबाप वो जो दूसरी नई चिमनी बन रही है ना, मैं वहीं था इसकी चीख सुनकर यहां आया और इसे इस हालत में देखा।

एसीपी अमर मन ही मन सोच रहे थे (बहुत ही घाघ आदमी है ऐसे हाथ मे नही आएगा) फिर प्रत्यक्ष में बोले

एसीपी अमर :- किसी ने इसे चिमनी पर चढ़कर कूदते हुए देखा था ?

भीड़ में से कोई जवाब नहीं आया तब अमर ने एक बार ध्यान से लाश को देखा और देखते ही वो चौंक उठा । (शायद उसको कोई क्लू मिल गया था)
पर इससे पहले वो कुछ और पूछता दुर्जन सिंह ने उन्हें एक तरफ बुलाया और फिर फुसफुसाते हुए बोला –

दुर्जन सिंह :- माईबाप अब छोड़िए ना पूछताछ करना अब जो चला गया सो चला गया , आप क्यों मेरे भठ्ठे को बदनाम कर रहे हैं ।
मैं आपसे वादा करता हूं ,की लाखन के परिवार का खर्च मैं उठाऊंगा आप इस मामले को यहीं खतम कीजिये ।

लाखन का नाम सुनकर अमर एक बार फिर चौंक जाता है और गुस्से से दांत पीसते हुए कहता है –

एसीपी अमर :- मामले को खतम जरूर करूँगा लेकिन इसके तह तक जाने के बाद ।

दुर्जन सिंह:- माईबाप तह में क्या रखा है आप तो बस नोट तह करने के बारे में सोचिए।

ये सुनते ही अमर ने और भी गुस्से में कहा

एसीपी अमर:-नोट तुम ही रखो तुम्हारे जनाजे में काम आएंगे ।

ये सुनते ही दुर्जन सिंह वहाँ से पैर पटकते हुए भठ्ठे के दूसरी तरफ चला गया जहां नई चिमनी बन रही थी।

फिर अमर ने लाश का पंचनामा किया और लाश को पोस्टमॉर्टम के लिए कॉन्स्टेबल्स के साथ एम्बुलेंस में शहर भेज दिया ये सब करते करते शाम घिर आयी थी सूरज डूब चुका था और जल्दी ही अंधेरा होने वाला था ।
एसीपी अमर ने गाँववालों से लाखन के घर का पता लिया जो कि भठ्ठे के दाहिनी ओर था और पहुँच गया। उसके घर पर वहां जाकर देखा कि लाखन के घर पर कोई नही है फिर अमर घर की तलाशी लेने लगा लेकिन उसे वहां कुछ भी नही मिला फिर कुछ सोच कर अमर लाखन के घर के पिछवाड़े चला गया वहां जाकर देखा कि वहां मिट्टी के तीन टीले थे जो लगभग 2 फुट ऊंचे और 3 फुट चौड़े थे। जिन्हें देखकर अमर को कुछ शक हुआ तो वो टॉर्च जलाकर टीलों का निरीक्षण करने लगा अचानक उसने कुछ आहट सुनी और झटके से पलट कर टॉर्च की रोशनी उस आहट पर डाली और देखा कि दो चूहे एक कंगन जैसी चीज को इधर उधर कर रहे थे पहले तो वो उसको नजरअंदाज कर गया फिर कुछ सोच कर उसने उस कंगन जैसी चीज को उठा लिया जो की वास्तव में एक कंगन ही था फिर अमर ने उस कंगन को थोड़ा सा साफ किया और टॉर्च की रोशनी में अच्छे से देखने लगा और ध्यान से देखते ही वो चौंक उठा वो कंगन खालिस सोने का बना था।
तब अमर ने सोचा की ये तो लाखन का तो नही हो सकता तो फिर जरूर इसके पीछे कुछ राज है और इतना सोचते ही अमर ने उस कंगन को रुमाल में लपेटा और अपने जेब के हवाले कर दिया ।
थोड़ी देर बाद वो फिर गांव पहुचा और गांववालों से लाखन के बारे पूछताछ करने लगा जिससे उसे पता चला कि लाखन के घर कुछ दिन पहले ही बेटा पैदा हुआ था जिससे लाखन की खुशी का ठिकाना नही था वो इतना खुश था कि गाँववालों को दावत भी दी थी ।
ये पता चलने के बाद अमर मन ही मन सोचने लगा-
(इसका मतलब लाखन के पास आत्महत्या करने का कोई कारण नही था और कमिश्नर साहब सही थे इसकी हत्या हुई है)
ये सब करते करते रात हो चुकी थी रात के लगभग 9 बज चुके थे इसके बाद अमर अकेले अपनी गाड़ी में शहर के लिए निकलता है रास्ते मे उसकी मुलाकात एक लड़की शांति से होती है जो अकबरपुर के सेठ मुरारीलाल झा की इकलौती बेटी थी , तब अमर उसको साथ लेकर अकबरपुर पहुचता है उसको उसके घर छोड़ने के बाद अमर अपने ऑफिस आ जाता है।
तभी अचानक कॉन्स्टेबल की आवाज सुनकर अमर अपनी विचारधारा से बाहर आ जाता है

★★★अब वर्तमान समय★★★

कॉन्स्टेबल :- सर क्या हुआ? कहाँ खोये हुए थे आप?कही रास्ते मे कोई मिल गई थी क्या जिसके ख्यालों में आप खोये हुए थे?
एसीपी अमर :- शटअप वीर सिंह!!!
अमर को अचानक से उस कंगन की याद हो आती है और उसके साथ साथ लाखन की याद भी आ जाती है तब वो कुछ सोचते हुए अपनी चेयर से उठता है और अनन्या के केस की फाइल को लेकर एक बार फिर से ध्यान से पढ़ता है और उसकी आँखे हजार वाट के बल्ब के मानिंद चमक उठती हैं ।
अब उसको बस लाखन के पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार था जो उसको कल शाम से पहले नही मिलने वाली थी ।

◆◆अगले दिन ◆◆
अमर सुबह सुबह एक सुनार की दुकान पर पहुचा और उस कंगन की अच्छी तरह से सफाई करवाई और फिर अपने ऑफिस आकर एक बार फिर से दुर्जन सिंह के केसेज की फाइल्स पढ़ने लगा । करीब चार घण्टे के बाद लगभग 1:00 बजे अमर अचानक से अपनी चेयर से उठा और ऑफिस से बाहर निकल गया ।
शाम को लगभग 5:00 बजे अमर पुलिस फोरेंसिक विभाग में मौजूद था और डॉक्टर सिन्हा उसे बता रहे थे ।
डॉक्टर सिन्हा :- देखिए एसीपी साहब इसकी जांच के बाद एक बात तो पक्की है की इसकी हत्या हुई है वो भी गला घोंट कर ।
एसीपी अमर मन ही मन सोचते हुए ( हूँ… इसका मतलब मेरा शक सही था और कमिश्नर साहब भी सही थे ) फिर प्रत्यक्ष में बोले
एसीपी अमर :- अच्छा डॉक्टर साहब आप बता सकते हैं इसकी हत्या कब की गई है?
डॉक्टर सिन्हा :- जी बिल्कुल , इसकी हत्या कल सुबह लगभग 4:00 बजे के आसपास की गई है।
एसीपी अमर :- ओह्ह , ठीक है आप अपना काम कीजिये मैं चलता हूँ ।
डॉक्टर सिन्हा :- एक मिनट एसीपी साहब एक बात बताते जाइये , आपको कब शक हुआ कि इसका खून हुआ है ?
एसीपी अमर :- डॉक्टर साहब, जब मैंने इस लाश को पहली बार देखा था उसी समय मुझे शक हुआ था क्योंकि अगर ये ऊपर से गिरते समय या कूदते समय जिंदा होता तो इसके आस पास काफी मात्रा में खून फैला हुआ होना चाहिए था जोकि नही था खून सिर्फ इसके सर के पास ही था, वो भी थोड़ा सा ।
दूसरी बार तब शक हुआ जब इसका नाम मुझे पता चला, ये अनन्या के केस में दो और लोगों के साथ प्राइम सस्पेक्ट था ।
अमर ने आगे कहा —
अब पूरा केस शीशे की तरह साफ हो गया है बस इस कंगन का इस केस से कुछ लेना देना है या नही ये पता चल जाय फिर दुर्जन सिंह को मेरे हाथों से कोई नही बचा सकता ।
अच्छा डॉक्टर साहब एक काम याद आ गया है अभी मैं चलता हूँ आपसे बाद में आकर मिलुंगा ।
फिर अमर अपने ऑफिस आ गया और इस केस की फाइल को अच्छे से तैयार करके रात को घर आ गया ।

◆◆अगले दिन ◆◆

आज की सुबह खास थी , आज अमर शांति से मिलने जाने वाला था इसीलिए सुबह से ही काफी खुश नजर आ रहा था ।
सुबह के लगभग 8:00 बजे अमर तैयार होकर घर से निककता है आज उसने वर्दी नहीं पहनी बल्कि फॉर्मल ड्रेस पहन कर निकला और सीधे ऑफिस गया और कुछ काम निपटाने के बाद 10:00 बजे ऑफिस से निकला और लगभग आधे घण्टे के बाद वो सेठ मुरारीलाल के बंगले के सामने खड़ा था ।
अमर ने आगे बढ़ कर दरवाजे की घण्टी बजायी थोड़ी देर बाद एक अधेड़ उम्र की महिला दरवाजा खोलती है और अमर को देख कर पूछती है
अधेड़ महिला :- कौन हैं आप? और किससे मिलना है आपको?
अमर ने बड़ी शालीनता से जवाब दिया
एसीपी अमर :- मैं एसीपी अमर हूँ , और मुझे सेठ मुरारीलाल से मिलना है।

ये सुनकर वो महिला उन्हें अंदर ले गयी और ड्राइंग रूम में बैठा कर सेठ जी को बुलाने चली गयी , तब अमर ने एक बार चारो तरफ नजर घुमाई और कमरे को ध्यान से देखने लगा । हर चीज बहुत ही करीने से सजा कर रखी गयी थी और देखने से ऐसा लगता था कि काफी दिनों से एक भी चीज को हाथ नही लगाया गया है फिर अमर ने देखा उसके दायीं तरफ एक कांच के शोरूम में एक प्यारी सी बच्ची की फ़ोटो रखी है अमर के मन मे उत्सुकता जागी और वो उठकर शोरूम के पास जाकर ध्यान से देखने लगा तभी पीछे से किसी के आने की आहट हुई और एक गम्भीर आवाज ने अमर की तन्द्रा भंग कर दी वो सेठ जी की आवाज थी उन्होंने पूछा
सेठ मुरारीलाल :- कहिए एसीपी साहब कैसे आना हुआ ?
अमर वापस आकर सोफे पर बैठ गया और बोला
एसीपी अमर :- नमस्ते सेठ जी , परसों मैं एक केस के सिलसिले में अमोला गया था वहां से लौटते वक्त आपकी बेटी शांति मुझसे मिली थी उसने ही मुझे आज चाय पर बुलाया था ।
ये सुनकर सेठ जी अचानक से बोल उठे
सेठ मुरारीलाल :- देखिए आपको कोई गलतफहमी हुई है शांति नाम की मेरी कोई बेटी नहीं है । मेरी सिर्फ एक ही बेटी है जिसका नाम अनन्या था अनन्या झा ।
ये सुनकर अमर बेइंतहा चौक उठा और आश्चर्य से बोला
एसीपी अमर :- अनन्या !!! वही अनन्या जो एक साल पहले रहस्यमय तरीके से गायब हो गयी थी ।
ये सुनते ही सेठ जी के चेहरे पर मायूसी आ गयी ,लेकिन अमर ने बोलना जारी रखा-
एसीपी अमर :- तो फिर वो कौन थी ? !!!
सेठ मुरारीलाल :- ये मुझे कैसे पता होगा ?
एसीपी अमर :- हुम्म! सही कहा आपने आपको कैसे पता होगा । लेकिन फिर उसने झूठ क्यों बोला की वो आपकी बेटी है ।
सेठ मुरारीलाल :- ये तो वही बता सकती है । लेकिन जहाँ तक मुझे पता है अनन्या के बाद कोई भी यहाँ से अमोला के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने नही गया ।
अमर एक बार फिर चौंककर कहता है
एसीपी अमर :- क्या !!! तो फिर वो कौन थी ?!!! फिर बुद्बुटाते हुए कहता है
लेकिन मेरा मन ये मानने को कतई तैयार नही है कि वो झूठ बोल रही थी , वो निश्छल चेहरा ,वो मासूम आंखें , वो सहज और शांत बोलने का ढंग नही नही मुझे विश्वास नही हो रहा कि वो सब झूठ था एक फरेब था , लेकिन उसकी हालत देखकर यही लग रहा था कि वो सचमुच किसी मुसीबत में फस गयी थी । उसने कहा था कि क्लास के बाद टीचर्स की मीटिंग में उसे देर हो गयी थी ।
तभी अमर की बात काटते हुए सेठ मुरारीलाल बोल उठे
सेठ मुरारीलाल :- क्या कहा आपने क्लास के बाद टीचर्स की मीटिंग होने के कारण देर हो गयी थी , अरे जिस दिन अनन्या का खून हुआ था उस दिन भी वो टीचर्स की मीटिंग के कारण स्कूल से देर से निकली थी फिर कभी उसका पता नही चला सुबुक !सुबुक !
अब चौंकने की बारी अमर की थी अमर ने चौंकते हुए पूछा
एसीपी अमर :- क्या!!! अनन्या का खून हुआ था ! लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में तो इस बात का कोई जिक्र ही नही है ।
सेठ मुरारीलाल रोते हुए कहते हैं :- सुबुक ! कैसे होगा आपके कानून की एक खामी है जब तक लाश नही मिल जाती कानून की नजरों वो मरा नही माना जाता।
एसीपी अमर :- सेठ जी आप मुझे विस्तार से सारी बातें बताइये फिर मैं अच्छे से सोच पाऊंगा की दोषियों को कैसे पकड़ा जाय ।
सेठ जी एक लंबी सांस लेकर कहते हैं
सेठ मुरारीलाल :- वैसे मुझे पुलिस पर अब रत्ती भर भी भरोसा नही है लेकिन आप एक जिम्मेदार ऑफिसर हैं इसलिए मैं आपको सब कुछ बताता हूँ जिसके बाद शायद मेरी अनन्या को इंसाफ मिल सके ।
एसीपी अमर :- सेठ जी मैं आपसे वादा करता हूँ अनन्या को इंसाफ जरूर मिलेगा ।
तब सेठ मुरारीलाल अतीत की यादों में खो जाते हैं और बताना शुरू करते हैं
सेठ मुरारीलाल :- उस दिन शनिवार था और नवम्बर महीने की ठंडी थी, लेकिन फिर भी अनन्या समय से तैयार होकर हमेशा की तरह स्कूल के लिए निकल गई थी और जाते जाते उसने मुझे ये बता दिया था कि आज उसे आने में देर हो सकती है क्योकि क्लास के बाद टीचर्स की मीटिंग है , फिर जो वो गयी तो फिर कभी लौट के नही आई सुबुक…..सुबुक
उस दिन शाम को मेरी एक संस्था के साथ मीटिंग थी मैं रात को मीटिंग से वापस आया तब सुषमा जो अनन्या की आया थी उसने बताया कि अनन्या अभी तक घर नही आई है ये सुनते ही मैं बस स्टैंड की तरफ भागा लेकिन आधे रास्ते मे ही मुझे पुलिस की जीप ने रोक लिया और इंस्पेक्टर ने पूछा
इंस्पेक्टर :- आप ही सेठ मुरारीलाल झा हैं ?
सेठ मुरारीलाल :- जी ! मैं ही मुरारीलाल झा हूँ।
इंस्पेक्टर :- आपकी बेटी अभी तक घर नहीं आयी है ना?
ये सुनकर मेरे मन मे आशंकाओं का बवंडर उठने लगा फिर मैंने इंस्पेक्टर को जवाब दिया
सेठ मुरारीलाल :- जी , उसी को खोजने जा रहा था
तब इंस्पेक्टर ने कहा
इंस्पेक्टर :- आप हमारे साथ चलिये आपको खून से लतपथ कुछ कपड़ों की शिनाख्त करना है ।
ये सुनकर मुझे झटका सा लगा और मैं अपने होश खोने लगा तभी एक कांस्टेबल ने फुर्ती से जीप से उतरकर मुझे सम्हाल लिया और उसी हालत में जीप में बैठाकर अमोला के लिए चल दिया और अकबरपुर से अमोला तक के रास्ते का मुझे आभास तक नही हुआ ।
कुछ देर बाद जीप रुकी और मुझे नीचे उतारा गया तब मैंने देखा जीप में बैठे कॉन्स्टेबल्स बड़ी बड़ी टॉर्च लाइट्स साथ लेकर आये हैं फिर हम जंगल के पुराने बस स्टॉप से जंगल के अंदर की तरफ बढ़ने लगे चलते चलते रास्ते मे इंस्पेक्टर ने कहा
इंस्पेक्टर :- कल लखनऊ से खोजी कुत्तों को लाया जाएगा और इस इलाके की अच्छी तरह से छानबीन की जाएगी ।
फिर हम घटनास्थल पर पहुचे वहाँ पहुचते ही मैने देखा की अनन्या की भूरी सी शॉल जो वो सुबह लेकर आई थी झाड़ियों में फँसी है अचानक से मेरी नजर एक कपड़े के टुकड़े पर पड़ती है जो अनन्या की साड़ी का टुकड़ा था फिर मैंने देखा जहाँ पर ये सब मिले थे वहाँ के पौधे,झाड़ियां इतनी बुरी तरीके से टूटी फूटी थी कि लग रहा था यहां किसी की जम कर लड़ाई हुई है मेरी अनन्या ने आखिर तक हार नही मानी थी उन जालिमों से डट कर लड़ी थी और ये सब देखकर मेरा कलेजा मुह को आ गया और मैं वहीं चिल्लाते हुए बेहोश हो गया
अनन्याsssssss अनन्याsssssss अनन्याsssssss
सुबुक…..सुबुक……..सुबुक……
पूरे 48 घंटों के बाद मुझे होश आया और होश में आने के बाद मैं नर्स से कहकर मेरे कमरे के बाहर खड़े कॉन्स्टेबल को बुलाकर उससे पूछा कि क्या हुआ अनन्या के बारे में कुछ पता चला , खोजी कुत्तों को कुछ मिला या नहीं तब उसने जो बताया उसे सुनकर मेरी हालत और बिगड़ गयी और मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया था लेकिन डॉक्टर्स की मेहनत से किसी तरह मौत के मुह से बाहर निकल आया था मैं , एक दिन शायद आपको ये सब बताने के लिए ।
तब अमर ने पूछा
एसीपी अमर :- ऐसा क्या मिल गया था खोजी कुत्तों को जिसके बारे में सुनकर आपकी ऐसी हालत हो गयी?
सेठ मुरारीलाल :- वो सब याद करता हूँ तो आज भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं
फिर भी सुनिए मैं सब बताता हूँ ।
खोजी कुत्तों को सबसे पहले उसी जगह पर ले जाया गया जहाँ अनन्या की शॉल मिली थी वहाँ से गंध लेकर वो चले तो जंगल मे घूमते घूमते जंगल के दूसरी तरफ निकल गए जहाँ एक नहर बहती है उसी नहर के पास जाकर वो जाकर रुक गए और भौंकना शुरू कर दिया वहां पहुँच कर छानबीन करने पर तीन लोग सामने आए जिनके पास कुत्ते गए और उन पर भी भौंका था वो भी तीन तीन बार उनकी जगह बदलने के बाद भी वो तीनो लाखन, हरिया,और माधव थे ।
एक बार फिर कुत्तों को उसी जगह वापस लाया गया जहां से वो चले थे इस बार कुत्ते थोड़ी दूर जाकर एक पेड़ का चक्कर काटकर जंगल के अंदर की ओर चले गए थोड़ी दूर जाने पर एक जगह झाड़ियां टूटी मिली जैसे वहां पर कुछ छुपाया गया था अचानक इंपेक्टर ने देखा वहां आसपास की पत्तियों पर खून के छीटें थे अब शक की कोई गुंजाइश ही नही थी कि अनन्या की हत्या हो चुकी है लेकिन बहुत तलाशने पर भी उसकी लाश नही मिली मिला तो सिर्फ कंगन वो भी सिर्फ एक हाथ का ।
कंगन का जिक्र होते ही अमर चौंक कर कहता है
एसीपी अमर :- क्या कहा आपने कंगन ???
सेठ मुरारीलाल :- जी कंगन ही कहा लेकिन आप क्यों पूछ रहे हैं ?
एसीपी अमर :- क्या वो कंगन अब भी आपके पास है?
सेठ मुरारीलाल :- मेरे पास वही तो एक निशानी बची है अनन्या की इसीलिए उसे सम्हाल कर रखा है ।
एसीपी अमर :- क्या मैं वो कंगन देख सकता हूँ?
सेठ मुरारीलाल :- जी जरूर , मैं लेकर आता हूँ ।
तभी एक महिला चाय नाश्ता लेकर आ गई तब सेठ जी ने अमर को नाश्ता करके को कहा और खुद अंदर चले गए फिर थोड़ी देर के बाद वो एक छोटी सी कपड़े की पोटली लेकर वापस आ गए और अमर को वो पोटली देते हुए कहा
सेठ मुरारीलाल :- लीजिये एसीपी साहब देख लीजिए
एसीपी अमर ने पोटली में से कंगन बाहर निकाला और फिर आश्चर्य से बोल उठे
एसीपी अमर :- ओह माई गॉड!!
अब मुझे समझ में आ गया कि जो मुझे मिली थी वो कौन थी और वो मुझे क्यों मिली थी।
सेठ मुरारीलाल :- आपको पता चला गया की, वो कौन थी ??
एसीपी अमर :- हाँ ! और वो कोई और नही आपकी बेटी अनन्या ही थी और वो मुझे इस कंगन तक पहुँचाने के लिए मुझसे मिली और घर आने का न्योता दिया क्योंकि इसका दूसरा जोड़ा मेरे पास है और अब मैं जा रहा हूँ अनन्या के गुनहगारों को उनके अंजाम तक पहुँचाने ।
इतना कहकर अमर उठ खड़ा हुआ तब रुंधे हुए गले से सेठ मुरारीलाल ने कहा
सेठ मुरारीलाल :- आप स,सच कह रहे हैं, वो मेरी अनन्या थी , आज मुझे विश्वास हो गया कि ईश्वर सबके साथ न्याय करते हैं और अब मुझे यकीन हो गया कि मेरी अनन्या को न्याय जरूर मिलेगा ।
फिर एसीपी अमर जल्दी से अपने ऑफिस पहुचते हैं और पुलिस फोर्स के साथ तुरन्त अमोला के लिए निकलते हैं ।

⚪⚪ एक घण्टे बाद ⚪⚪

एसीपी अमर दुर्जन सिंह के भठ्ठे पर पुलिस फोर्स के साथ धावा बोलते हैं और दुर्जन सिंह के साथ साथ उसके भठ्ठे पर मौजूद कुछ मजदूरों को भी हिरासत में ले लेते हैं तब दुर्जन सिंह अमर से पूछता है
दुर्जन सिंह :- अरे एसीपी साहब ये सब क्या है? आप हम सबको क्यों गिरफ्तार कर रहे हैं ?
एसीपी अमर :- अनन्या के साथ हरिया,माधव और लाखन के खून के जुर्म में तुमको गिरफ्तार किया गया है ।
इतना सुनना था की दुर्जन सिंह पागलों की तरह हँसने लगा
हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा
ओह हो हो हो हा हा हा हा हा
फिर दुर्जन सिंह ने कहा
दुर्जन सिंह :- इन सबको मैने मारा है तो सबूत कहाँ है और लाखन ने तो आत्महत्या की है चिमनी पर से छलांग लगा कर ।
तब एसीपी अमर ने कहा
एसीपी अमर :- सबूत भी मिलेगा और गवाह भी मिलेगा थोड़ी देर रुको तो सही
फिर फोर्स में से कुछ लोगो को बुलाकर लाखन के घर के पिछवाड़े बने मिट्टी के तीनों टीलों को खोदने को कहा।
फिर जब उन टीलों की खुदाई हुई तो उनमें से तीन कंकाल निकले जिनमे से एक कंकाल महिला का था और बाकी के दो कंकाल पुरुष के थे। तब अमर गांव में गया और हरिया और माधव के परिवार से उनके डीएनए सैंपल्स इक्कठे किये और उन सभी को कंकालों के साथ फोरेंसिक लैब के लिए भेज दिया ।
फिर अमर दुर्जन सिंह और उसके साथ पकड़े गए मज़दूरों को लेकर अकबरपुर थाने में पहुँचा और फिर उन सभी से पूछताछ शुरू किया दुर्जन सिंह ने तो मुह नही खोला पर मजदूरों ने थोड़ी सी सख्ती करते ही सब कुछ बक दिया फिर फोरेंसिक लैब से रिपोर्ट भी आ गयी और ये भी साबित हो गया की वो कंकाल अनन्या , हरिया और माधव के हैं फिर अदालत ने इन सभी सबूतों और गवाहों की रोशनी में दुर्जन सिंह को फांसी की सजा और उसका साथ देने वाले मजदूरों को उम्रकैद की सजा सुनाई ।

🔷🔷🔷समाप्त🔷🔷🔷

Written By- Chandan Sikdaar for Comic Haveli

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One Comment on “Voh Kaun Thi”

  1. Chandan ji , achchha likha hai aapne,

    पर कहानी में थोड़े ट्विस्ट और होते तो ज़्यादा आनंद आता ।
    शांति(आत्मा) का रोल बहुत छोटा था ।
    उसे थोड़ा और रहस्यमयी दिखाते कहानी में या स्वयं बदला लेती आत्मा कुछ इस तरह का ।
    तो अधिक आनंद आता ।

    जब मिट्टी के 3 टीले जो लाखन के घर के पीछे दिखे
    ये वाली लाइन आयी । तो सीधा अंदाजा लग गया था कि क्या होने वाला है आगे स्टोरी में , क्योंकि चूहों के जिक्र भी किया आपने ।

    कहीं न कहीं समाज का थोड़ा सच आपने दर्शाया कि दबंग लोग कैसे अपने काम मे रोड़ा बनने वाले लोगों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं ।

    Over all simple and good.

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